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बिहार | बाढ़ पीड़ितों का फूटा गुस्सा, बीजेपी सांसद संजय जायसवाल की गाड़ी पर फेंका गोबर और मिट्टी!

बेतिया: बिहार के पश्चिम चंपारण में बाढ़ से परेशान लोगों का गुस्सा उस समय फूट पड़ा जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी प्रभावित इलाकों का जायजा लेने पहुंचे। बथना स्थित राहत शिविर में ग्रामीणों ने राहत व्यवस्था को लेकर नारेबाजी की। मुख्यमंत्री के जाने के बाद बीजेपी सांसद संजय जायसवाल की गाड़ी को भीड़ ने घेर लिया और कथित तौर पर उस पर गोबर और मिट्टी फेंकी। बथना राहत शिविर में हुआ हंगामा घटना पश्चिम चंपारण के बैरिया प्रखंड स्थित बथना राहत शिविर की है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बाढ़ प्रभावित इलाकों का निरीक्षण करने और राहत कार्यों की समीक्षा के लिए पहुंचे थे। इसी दौरान कई ग्रामीणों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। राहत व्यवस्था से नाराज थे बाढ़ पीड़ित स्थानीय लोगों ने राहत और बचाव व्यवस्था को लेकर नाराजगी जताई। ग्रामीणों का आरोप था कि बाढ़ के कारण घर और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने के बावजूद उन्हें पर्याप्त और समय पर मदद नहीं मिल रही है। प्रशासन का कहना है कि प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव कार्य लगातार जारी हैं। CM सम्राट चौधरी के सामने हुई नारेबाजी राहत शिविर में मुख्यमंत्री की मौजूदगी के दौरान भी कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। स्थिति तनावपूर्ण होने पर सुरक्षाकर्मियों ने मुख्यमंत्री के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी और इसके बाद वह इलाके से रवाना हो गए। सांसद संजय जायसवाल को भीड़ ने घेरा मुख्यमंत्री के जाने के बाद BJP सांसद संजय जायसवाल और स्थानीय विधायक को कुछ समय तक स्कूल परिसर में ही रुकना पड़ा। सुरक्षा बलों ने बाद में सांसद को उनकी गाड़ी तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन बाहर मौजूद भीड़ ने वाहन को घेर लिया। गाड़ी पर फेंका गया गोबर और मिट्टी रिपोर्टों के अनुसार आक्रोशित ग्रामीणों ने सांसद की गाड़ी पर कथित तौर पर गोबर और मिट्टी फेंकी। कुछ प्रदर्शनकारियों ने वाहन पर हाथ भी मारे। इसके बाद पुलिस ने सुरक्षा घेरा बनाकर सांसद को इलाके से बाहर निकाला। पुलिस और सुरक्षा बलों को करनी पड़ी मशक्कत भीड़ बढ़ने के कारण मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को सांसद को सुरक्षित निकालने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में भीड़ और सुरक्षा बलों के बीच अफरा-तफरी की स्थिति दिखाई देने का दावा किया गया है। घटना की विस्तृत परिस्थितियों और जिम्मेदारी को लेकर स्थानीय प्रशासन की जांच महत्वपूर्ण होगी। गंडक नदी के बढ़ते जलस्तर से बिगड़े हालात पश्चिम चंपारण के कई इलाकों में गंडक नदी का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है। निचले क्षेत्रों में पानी भरने और तटबंधों पर दबाव बढ़ने से लोगों की परेशानी बढ़ी है। आसपास के कई जिलों में भी बाढ़ और तटबंध टूटने की घटनाएं सामने आई हैं। प्रशासन ने राहत कार्य जारी रहने का किया दावा अधिकारियों के अनुसार बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है। NDRF और SDRF की टीमों को अलर्ट पर रखा गया है और प्रभावित लोगों तक भोजन, नाव तथा अन्य जरूरी सुविधाएं पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। घटना के बाद सियासी माहौल भी गरमाया सांसद की गाड़ी पर गोबर फेंकने और मुख्यमंत्री के सामने विरोध की घटना ने बिहार में बाढ़ राहत व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। हालांकि घटना के पीछे राजनीतिक संगठन की भूमिका या पूर्व नियोजित विरोध का कोई स्पष्ट प्रमाण अभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। उपलब्ध रिपोर्टों में इसे मुख्य रूप से स्थानीय बाढ़ पीड़ितों के आक्रोश के रूप में बताया गया है। source – Navbharat Times / Prabhat Khabar / ABP News / Media Darshan जय राष्ट्र न्यूज़

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मस्तीपुर, बिहार | बाढ़ के बीच खुले में लगाए गए अस्थायी शौचालय, निजता पर उठे सवाल

मस्तीपुर, बिहार: बाढ़ से प्रभावित इलाकों में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए अस्थायी व्यवस्थाएं की जा रही हैं, लेकिन मस्तीपुर से सामने आई खुले स्थान पर लगाए गए अस्थायी शौचालयों की तस्वीरों ने निजता और सम्मान से जुड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। बाढ़ जैसी आपदा के बीच शौचालय की व्यवस्था बेहद जरूरी है, लेकिन पर्याप्त पर्दा और सुरक्षित स्थान नहीं होने पर विशेष रूप से महिलाओं और किशोरियों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। खुले स्थान पर शौचालय की व्यवस्था पर सवाल सामने आए दृश्यों में अस्थायी शौचालय खुले इलाके में स्थापित दिखाई देते हैं। ऐसे में इनके आसपास पर्याप्त घेराबंदी और गोपनीयता की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राहत शिविरों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शौचालय उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन केवल ढांचा खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं माना जाता। लोगों की निजता, सुरक्षा और स्वच्छता भी राहत व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती निजता बाढ़ के दौरान घरों में पानी भरने के बाद बड़ी संख्या में परिवार सड़कों, तटबंधों या ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं के लिए शौच, स्नान और कपड़े बदलने जैसी सामान्य जरूरतें भी बड़ी समस्या बन जाती हैं। बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों पर पहले की रिपोर्टों में भी महिलाओं ने सुरक्षित और निजी शौचालयों की कमी को गंभीर परेशानी बताया है। अस्थायी शौचालय के साथ पर्दे की व्यवस्था जरूरी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बनाए जाने वाले अस्थायी शौचालयों के आसपास उचित घेराबंदी, दरवाजे और पर्याप्त निजी स्थान की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग सुविधाएं, पर्याप्त रोशनी और सुरक्षित रास्ता उपलब्ध होने से ऐसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल अधिक सुरक्षित तरीके से किया जा सकता है। बाढ़ में स्वच्छता भी बनती है बड़ी चुनौती बाढ़ का पानी उतरने या लंबे समय तक जमा रहने के दौरान साफ पानी और शौचालय जैसी सुविधाओं की कमी से स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़ सकते हैं। गंदे पानी के संपर्क, खुले में शौच और अस्वच्छ वातावरण के कारण संक्रमण और जलजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए राहत कार्यों में भोजन और आश्रय के साथ स्वच्छता की सुविधाओं को भी प्राथमिकता देना जरूरी होता है। बिहार में पहले भी सामने आई है ऐसी समस्या बिहार के अलग-अलग बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शौचालय की कमी पहले भी सामने आती रही है। सितंबर 2026 में पूर्णिया के कुछ प्रभावित क्षेत्रों में अस्थायी शौचालय बनाए गए थे, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनकी संख्या जरूरत के मुकाबले कम होने की बात सामने आई थी। वहीं मुंगेर के बाढ़ प्रभावित इलाकों में भी महिलाओं के लिए शौचालय और निजता की समस्या की रिपोर्ट सामने आई है। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा मुद्दा बाढ़ के दौरान स्वच्छता व्यवस्था केवल स्वास्थ्य का सवाल नहीं है। महिलाओं और किशोरियों के लिए यह सुरक्षा और सम्मान से भी सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा है। अगर अस्थायी शौचालय ऐसी जगह लगाए जाते हैं जहां पर्याप्त पर्दा या सुरक्षा नहीं है, तो कई महिलाएं उनका इस्तेमाल करने से बच सकती हैं। इससे उन्हें रात होने का इंतजार करने या अन्य असुरक्षित विकल्प अपनाने की मजबूरी हो सकती है। राहत व्यवस्था में Privacy-Friendly Toilets की जरूरत आपदा प्रबंधन के दौरान ऐसे अस्थायी शौचालयों की जरूरत होती है जिन्हें सुरक्षित और निजी तरीके से इस्तेमाल किया जा सके। शौचालय के चारों ओर पूरी घेराबंदी, अंदर से बंद होने वाला दरवाजा, पर्याप्त रोशनी, महिलाओं के लिए अलग सुविधा और नजदीक सुरक्षित पानी की व्यवस्था राहत शिविरों में बुनियादी जरूरतों का हिस्सा होनी चाहिए। स्थानीय घटना की स्वतंत्र पुष्टि अभी सीमित मस्तीपुर से जुड़े इस विशेष मामले को लेकर विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक स्रोतों में सीमित है। इसलिए तस्वीरों या वीडियो के आधार पर यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि ये शौचालय किस विभाग या एजेंसी द्वारा लगाए गए अथवा बाद में इनके आसपास अतिरिक्त पर्दे या अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं या नहीं। हालांकि बिहार में बाढ़ के दौरान स्वच्छता और महिलाओं की निजता की समस्या कई रिपोर्टों और अध्ययनों में पहले भी दर्ज की जा चुकी है। source – बिहार आपदा प्रबंधन विभाग / Hindustan / Dainik Jagran / Down To Earth / UNICEF जय राष्ट्र न्यूज़

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क्या बिहार में बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा? हर साल तबाही के पीछे नेपाल की नदियां, गाद और अधूरी परियोजनियां

पटना: बिहार में बाढ़ दशकों से बड़ी चुनौती बनी हुई है। खासकर उत्तर बिहार में कोसी, गंडक, बागमती, कमला और महानंदा जैसी नदियां हर मानसून में लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित करती हैं। सरकारें तटबंध, बैराज, जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण परियोजनियों पर काम करती रही हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई एक उपाय सामने नहीं आया है जिससे राज्य को बाढ़ से पूरी तरह मुक्त किया जा सके। नेपाल में भारी बारिश से बढ़ता है बिहार की नदियों का जलस्तर उत्तर बिहार की कई प्रमुख नदियों का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र नेपाल में स्थित है। वहां भारी बारिश होने पर इन नदियों में अचानक पानी बढ़ जाता है और इसका असर बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंचता है। केंद्रीय जल आयोग ने भी संसद में बताया है कि उत्तर बिहार में बाढ़ का एक प्रमुख कारण नेपाल में स्थित ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश के बाद गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानंदा में बढ़ने वाला जलप्रवाह है। केवल तटबंध बनाना क्यों नहीं है पर्याप्त? बिहार में लंबे समय से बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों का इस्तेमाल किया जा रहा है। तटबंध कई क्षेत्रों को सामान्य बाढ़ से सुरक्षा देते हैं, लेकिन अत्यधिक जलप्रवाह, कटाव या संरचनात्मक नुकसान की स्थिति में समस्या गंभीर हो सकती है। इसके अलावा नदियों में लगातार गाद जमा होने से नदी तल ऊंचा होने और जल निकासी क्षमता प्रभावित होने की चुनौती भी बनी रहती है। इसलिए विशेषज्ञ लंबे समय से केवल तटबंधों के बजाय नदी बेसिन, ड्रेनेज और जल प्रबंधन को एक साथ देखने की जरूरत बताते रहे हैं। नेपाल में बड़े बांधों की योजना लंबे समय से चर्चा में भारत और नेपाल के बीच सप्तकोसी बहुउद्देशीय परियोजना और सुनकोसी-कमला डायवर्जन जैसी परियोजनियों पर वर्षों से अध्ययन चल रहा है। सितंबर 2026 से पहले उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार इन परियोजनाओं से जुड़े टोपोग्राफिकल, हाइड्रोलॉजिकल, भूकंपीय और अन्य कई तकनीकी अध्ययन पूरे किए जा चुके हैं, लेकिन परियोजनियां अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची हैं जहां उन्हें बिहार की बाढ़ समस्या का तत्काल समाधान माना जा सके। भारत-नेपाल समन्वय क्यों है जरूरी? बिहार की बाढ़ केवल राज्य की सीमा के भीतर पैदा होने वाली समस्या नहीं है। कई नदियों का प्रवाह नेपाल से आता है, इसलिए दीर्घकालिक समाधान के लिए दोनों देशों के बीच जल प्रबंधन, बांध, बाढ़ पूर्वानुमान और नदी नियंत्रण पर सहयोग जरूरी है। भारत और नेपाल के बीच बाढ़ पूर्वानुमान, कोसी-गंडक परियोजनियों और जल संसाधन प्रबंधन के लिए कई द्विपक्षीय समितियां मौजूद हैं। जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि इन व्यवस्थाओं के माध्यम से दोनों देशों के बीच नदी और बाढ़ प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाती है। 2025-26 में संयुक्त समिति की बैठक नहीं हुई हालांकि बाढ़ प्रबंधन में भारत-नेपाल सहयोग को महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन सरकारी जानकारी के अनुसार वर्ष 2025-26 में संबंधित भारत-नेपाल संयुक्त समिति की कोई बैठक नहीं हुई। इसी जवाब में केंद्र सरकार ने यह भी कहा था कि स्थायी कोसी-गंडक बेसिन प्राधिकरण बनाने का कोई प्रस्ताव फिलहाल विचाराधीन नहीं है। पिछले तीन वर्षों में बाढ़ प्रबंधन और सीमावर्ती क्षेत्र कार्यक्रम के तहत बिहार को 206.77 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की गई। बैराज और नदी परियोजनियों पर भी चल रहा काम बिहार में बाढ़ नियंत्रण के लिए केवल तटबंध ही नहीं, बल्कि बैराज, नदी लिंक और सिंचाई परियोजनियों पर भी काम करने की योजना है। 2024 के केंद्रीय बजट में कोसी-मेची इंट्रा-स्टेट लिंक सहित कई सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के लिए वित्तीय सहायता की घोषणा की गई थी। इसके साथ कोसी से जुड़ी बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई परियोजनियों के सर्वेक्षण और जांच का भी प्रस्ताव रखा गया था। क्या नदियों की सफाई और गाद हटाना समाधान है? नदियों में गाद जमा होना बिहार की बाढ़ समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन केवल बड़े पैमाने पर ड्रेजिंग करना हर नदी के लिए स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। नदी की प्रकृति, पानी का प्रवाह, गाद की मात्रा, पर्यावरण और लागत का अध्ययन करने के बाद ही अलग-अलग क्षेत्रों के लिए उपयुक्त कदम तय करने पड़ते हैं। साथ ही गांवों के तालाब, प्राकृतिक जल निकासी मार्ग और जलभराव वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखना भी जरूरी माना जाता है। बाढ़ को पूरी तरह रोकना मुश्किल, नुकसान कम करना संभव विशेषज्ञ दृष्टिकोण से बिहार में बाढ़ को पूरी तरह समाप्त करना व्यावहारिक रूप से कठिन है क्योंकि यह राज्य प्राकृतिक रूप से गंगा और उसकी हिमालयी सहायक नदियों के विशाल मैदानी क्षेत्र में स्थित है। लेकिन बेहतर बांध और बैराज प्रबंधन, मजबूत तटबंध, ड्रेनेज सुधार, बाढ़ पूर्वानुमान, जलाशय प्रबंधन, गाद पर वैज्ञानिक अध्ययन और भारत-नेपाल सहयोग के जरिए नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। स्थायी समाधान के लिए एकीकृत रणनीति की जरूरत बिहार की बाढ़ समस्या का समाधान किसी एक बांध, तटबंध या नदी की सफाई से संभव नहीं दिखता। इसके लिए पूरे नदी बेसिन को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है। इस रणनीति में नेपाल के साथ जल प्रबंधन समझौते, आधुनिक बाढ़ पूर्वानुमान व्यवस्था, नदी और ड्रेनेज नेटवर्क का वैज्ञानिक प्रबंधन, संवेदनशील तटबंधों की निगरानी और बाढ़ प्रभावित आबादी के लिए बेहतर पुनर्वास व्यवस्था शामिल करनी होगी। इसलिए सवाल यह नहीं है कि बिहार में बाढ़ को हमेशा के लिए पूरी तरह खत्म किया जा सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि हर साल होने वाली तबाही और जान-माल के नुकसान को कितना कम किया जा सकता है। source – केंद्रीय जल आयोग / जल शक्ति मंत्रालय / गृह मंत्रालय / भारत सरकार जय राष्ट्र न्यूज़

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बिहार में बाढ़ के बीच नीदरलैंड्स में मैथिली ठाकुर का कार्यक्रम, उठे सवाल

पटना: बिहार के कई जिलों में बाढ़ और भारी बारिश का खतरा बने रहने के बीच अलीनगर से BJP विधायक और लोकगायिका मैथिली ठाकुर के नीदरलैंड्स दौरे को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं। मैथिली ठाकुर नीदरलैंड्स में आयोजित Eindeloos India Festival में सांस्कृतिक प्रस्तुति देने पहुंची हैं। आलोचक एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी प्राथमिकताओं पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि मैथिली पहले ही कह चुकी हैं कि उनके विधानसभा क्षेत्र अलीनगर में बाढ़ जैसी स्थिति नहीं है और वह अपने क्षेत्र के लोगों के संपर्क में हैं। नीदरलैंड्स में सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल हुईं मैथिली मैथिली ठाकुर इन दिनों नीदरलैंड्स के दौरे पर हैं, जहां वह Eindeloos India Festival में बिहार की लोकसंस्कृति और संगीत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। नीदरलैंड्स स्थित इंडिया हाउस में भारत के राजदूत कुमार तुहिन ने मैथिली ठाकुर और बिहार से पहुंचे प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। इस दौरान मैथिली ने पारंपरिक ‘चैती’ लोकगीत भी प्रस्तुत किया। बिहार में बाढ़ और भारी बारिश का खतरा जारी दूसरी ओर बिहार सितंबर में गंभीर बाढ़ की स्थिति से गुजर चुका है। 11 सितंबर तक राज्य के 15 जिलों में करीब 46.88 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए गए थे। गंगा और उसकी सहायक नदियां कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीं। 26 सितंबर को नेपाल के तराई क्षेत्र में भारी बारिश की आशंका को देखते हुए बिहार प्रशासन ने फिर 17 संवेदनशील जिलों के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की और NDRF-SDRF को अलर्ट मोड पर रखा। सोशल मीडिया पर क्यों उठ रहे सवाल? मैथिली ठाकुर के नीदरलैंड्स दौरे की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि राज्य में बाढ़ और बारिश से जुड़ी चुनौतियों के बीच एक विधायक का विदेश में सांस्कृतिक कार्यक्रम करना कितना उचित है। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में इसे जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारियों से जोड़कर आलोचना की गई, जबकि दूसरे यूजर्स ने कहा कि मैथिली कलाकार भी हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेना उनकी पेशेवर भूमिका का हिस्सा है। ये सोशल मीडिया प्रतिक्रियाएं हैं और इन्हें व्यापक जनमत का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। पहले भी बाढ़ को लेकर ट्रोल हुई थीं मैथिली नीदरलैंड्स दौरे से पहले भी मैथिली ठाकुर को बिहार में बाढ़ के दौरान मुंबई में Rolls-Royce में नजर आने को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसके जवाब में मैथिली ठाकुर ने कहा था कि “भगवान की कृपा से मेरे क्षेत्र में बाढ़ जैसी कोई स्थिति नहीं है।” उन्होंने बताया था कि 17 सितंबर को वह अपने क्षेत्र में गई थीं और लोगों से मुलाकात कर स्थानीय स्थिति की जानकारी ली थी। अलीनगर की विधायक हैं मैथिली ठाकुर मैथिली ठाकुर दरभंगा जिले की अलीनगर विधानसभा सीट से विधायक हैं। दरभंगा जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर उन्हें अलीनगर की मौजूदा विधायक के रूप में दर्ज किया गया है। इसी वजह से उनकी गायिका और विधायक—दोनों भूमिकाओं को लेकर अक्सर सार्वजनिक चर्चा होती रही है। उन्होंने इससे पहले भी कहा है कि उनके लिए अपने क्षेत्र के लोगों से मिलना और उनकी समस्याएं समझना उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। मैथिली ने विदेश में बिहार की संस्कृति को किया प्रस्तुत नीदरलैंड्स के कार्यक्रम में मैथिली ठाकुर ने बिहार की पारंपरिक लोकसंगीत शैली को पेश किया। उन्होंने चैती गीत के जरिए बिहार के ग्रामीण जीवन, पारिवारिक रिश्तों और लोक परंपराओं के बारे में भी दर्शकों को बताया। आयोजित कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने उनकी प्रस्तुति की सराहना की। विवाद का केंद्र- कलाकार और जनप्रतिनिधि की दोहरी भूमिका मैथिली ठाकुर को लेकर चल रही बहस का मुख्य मुद्दा उनकी दोहरी भूमिका है। वह एक स्थापित लोकगायिका होने के साथ-साथ निर्वाचित विधायक भी हैं। आलोचक चाहते हैं कि प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में जनप्रतिनिधि की सार्वजनिक मौजूदगी अधिक दिखे, जबकि मैथिली का पक्ष है कि उनके विधानसभा क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति नहीं है और वह क्षेत्र के लोगों से संपर्क में हैं। उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि नीदरलैंड्स दौरे के कारण उनके क्षेत्र में राहत या प्रशासनिक कार्य प्रभावित हुए। फिलहाल मैथिली ठाकुर का नीदरलैंड्स दौरा सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ-साथ राजनीतिक जिम्मेदारियों और कलाकार के पेशेवर जीवन के बीच संतुलन को लेकर नई बहस का विषय बना हुआ है। source – Dainik Jagran / Navbharat Times / India Today / Darbhanga District Administration जय राष्ट्र न्यूज़

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बिहार बाढ़ के बीच दो तस्वीरों ने खींचा ध्यान; एक में बेबसी, दूसरी में मदद की मिसाल

पटना: बिहार में हालिया बाढ़ ने लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित की है। कई इलाकों में घर पानी में डूबे, परिवार राहत शिविरों में पहुंचे और खेती को भारी नुकसान हुआ। इस संकट के बीच सामने आई दो तरह की तस्वीरों ने लोगों का ध्यान खींचा है—एक तरफ अपना घर-सामान गंवाकर अस्थायी शिविरों में रह रहे परिवारों की बेबसी, तो दूसरी ओर नावों और दूसरे साधनों से बाढ़ पीड़ितों तक राहत पहुंचाते लोगों की तस्वीरें उम्मीद का संदेश दे रही हैं। राहत शिविरों में घर लौटने का इंतजार भागलपुर के बाढ़ प्रभावित इलाकों में कई परिवारों को घर छोड़कर राहत शिविरों में रहना पड़ रहा है। तिल्हा कोठी समेत कई जगहों पर लोगों ने प्लास्टिक शीट और उपलब्ध सामान से अस्थायी ठिकाने बनाए हैं। Indian Express की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक कुछ परिवारों के घर अब भी पानी में डूबे हैं। बाढ़ में दस्तावेज, अनाज, पैसे और घरेलू सामान तक बहने या खराब होने की शिकायतें सामने आई हैं। प्रभावित लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि पानी उतरने के बाद उनके पास वापस लौटने के लिए क्या बचेगा। करीब 50 लाख लोगों तक पहुंचा था बाढ़ का असर सितंबर में बिहार में बाढ़ का दायरा लगातार बढ़ा था। एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 15 जिलों में लगभग 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। पटना, भागलपुर, वैशाली, बेगूसराय, खगड़िया और मुंगेर समेत कई जिलों में घर, सड़कें और कृषि भूमि जलमग्न हुईं। इस दौरान गंगा समेत कई नदियों के बढ़े जलस्तर ने ग्रामीण और दियारा क्षेत्रों में सबसे अधिक परेशानी पैदा की। दूसरी तस्वीर में राहत पहुंचाते दिखे सोनू सूद बाढ़ की मुश्किल तस्वीरों के बीच अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनू सूद भी राहत कार्य के लिए बिहार पहुंचे। बेगूसराय के बाढ़ प्रभावित इलाकों में उन्होंने नाव से जाकर लोगों के बीच राहत सामग्री वितरित की और पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। सोनू सूद ने कहा कि बिहार को जब भी मदद की जरूरत होगी, वह लोगों के साथ खड़े रहेंगे। उनकी राहत सामग्री बांटते हुए सामने आई तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी चर्चा में रहीं। प्रशासन और स्थानीय लोग भी राहत कार्य में जुटे बिहार के कई हिस्सों में NDRF, SDRF, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवी समूहों ने नावों के जरिए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और जरूरी सामान उपलब्ध कराने का काम किया। सितंबर की शुरुआत में स्थिति गंभीर होने के दौरान 13 जिलों में 34 लाख से अधिक लोगों के प्रभावित होने की सूचना थी। भागलपुर में एक नाव पलटने के बाद SDRF ने उसमें सवार सभी 10 लोगों को सुरक्षित बचाया था। पानी घटा, लेकिन मुश्किलें बाकी कई क्षेत्रों में अब बाढ़ का पानी कम होने लगा है, लेकिन नुकसान की पूरी तस्वीर पानी उतरने के बाद सामने आ रही है। खेतों में फसल खराब होने, घरों को नुकसान और जरूरी सामान बर्बाद होने से प्रभावित परिवारों के सामने पुनर्वास और रोजमर्रा की जिंदगी दोबारा शुरू करने की चुनौती है। राज्य सरकार ने बाढ़ से फसल गंवाने वाले किसानों के लिए 23 से 29 सितंबर के बीच कृषि इनपुट अनुदान के आवेदन की प्रक्रिया भी शुरू की है। दो तस्वीरें, एक ही त्रासदी के अलग चेहरे बिहार बाढ़ की ये तस्वीरें आपदा के दो अलग पहलू दिखाती हैं। एक ओर ऐसे परिवार हैं जो अपना घर और आजीविका बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन, स्वयंसेवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के राहत प्रयास सामने आ रहे हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रभावित इलाकों में पुनर्वास, फसल नुकसान की भरपाई और बुनियादी सुविधाओं को बहाल करना अगली बड़ी चुनौती होगी। source – The Indian Express / Navbharat Times / Mongabay India / PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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भागलपुर में गंगा की तेज धारा में पलटी मजदूरों की नाव; 19 सुरक्षित, 2 अब भी लापता, SDRF का Search Operation जारी

भागलपुर: बिहार के भागलपुर जिले में गंगा नदी के तेज बहाव के बीच बड़ा नाव हादसा सामने आया है। नवगछिया अनुमंडल के राघोपुर क्षेत्र में बाढ़ और कटाव रोकने के काम में लगे मजदूरों को लेकर जा रही नाव बुधवार, 26 अगस्त 2026 की दोपहर अचानक पलट गई। प्रशासन के latest official figures के मुताबिक नाव पर 21 लोग सवार थे, जिनमें 19 को सुरक्षित बचा लिया गया, जबकि दो लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों की पहचान सिकंदर मंडल और बादल मंडल के रूप में बताई गई है। SDRF की टीम मोटरबोट और अन्य rescue equipment के साथ गंगा में लगातार उनकी तलाश कर रही है। शुरुआती Reports में 18 लोग और 6 Missing बताए गए थे हादसे के तुरंत बाद सामने आई शुरुआती मीडिया reports में नाव पर 18 मजदूर सवार होने, 12 के तैरकर बच निकलने और 6 के लापता होने की जानकारी दी गई थी। लेकिन बाद में जिला प्रशासन और पुलिस से मिली updated information में तस्वीर साफ हुई। Bhagalpur District Magistrate Alankrita Pandey के हवाले से बाद की reports में बताया गया कि नाव पर कुल 21 लोग—19 मजदूर और दो नाविक—सवार थे। SDRF ने 19 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया, जबकि दो लोग लापता रहे। इसलिए खबर publish करते समय 18 सवार, 12 सुरक्षित और 6 लापता वाली शुरुआती संख्या के बजाय latest official count का इस्तेमाल करना ज्यादा सही होगा। कहां हुआ हादसा? घटना भागलपुर जिले के नवगछिया क्षेत्र में राघोपुर तटबंध के पास हुई। यहां पिछले दिनों गंगा के बढ़ते जलस्तर और तटबंध में breach के बाद बाढ़ तथा कटाव रोकने का काम चल रहा था। मजदूर नदी में sandbags डालकर तटबंध को मजबूत करने और कटाव रोकने की कोशिश कर रहे थे। इसी flood-fighting operation के दौरान मजदूरों को लेकर जा रही नाव तेज धारा की चपेट में आ गई। दोपहर करीब 2:30 बजे पलटी नाव अधिकारियों के मुताबिक हादसा 26 अगस्त को करीब दोपहर 2:30 बजे हुआ। Water Resources Department से जुड़े flood-control और embankment repair operations के दौरान नाव गंगा में आगे बढ़ रही थी, तभी वह अचानक असंतुलित होकर पलट गई। नाव के पलटते ही उसमें सवार लोग तेज बहाव में गिर गए और मौके पर अफरा-तफरी मच गई। भंवर बनने की आशंका District Magistrate Alankrita Pandey के मुताबिक preliminary information में आशंका जताई गई कि नदी में अचानक बने whirlpool यानी भंवर के कारण नाव का संतुलन बिगड़ा और वह पलट गई। हालांकि हादसे का exact technical cause जांच के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा। गंगा में इस समय तेज बहाव और बाढ़ की स्थिति के कारण rescue operations भी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। SDRF ने बचाए 19 लोग हादसे की सूचना मिलते ही घटनास्थल पर तैनात State Disaster Response Force यानी SDRF की टीम ने rescue operation शुरू किया। Latest official reports के अनुसार कुल 19 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया। स्थानीय गोताखोरों और ग्रामीणों ने भी rescue operation में प्रशासन की मदद की। बचाए गए लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया और लापता मजदूरों की तलाश नदी के downstream क्षेत्रों में भी की जा रही है। दो मजदूर अब भी लापता Latest reports के मुताबिक दो लोग अब भी नहीं मिले हैं। उनकी पहचान: के रूप में की गई है। 27 अगस्त की fresh स्थिति में दोनों की तलाश जारी बताई गई है। प्रशासन ने अभी दोनों को मृत घोषित नहीं किया है, इसलिए उन्हें “लापता” ही लिखा जाना चाहिए। मजदूर सामान्य यात्रा पर नहीं, Flood-Fighting Work में थे शुरुआती reports में यह भी कहा गया था कि मजदूर रोजमर्रा की मजदूरी के लिए नदी पार कर रहे थे। लेकिन बाद में प्रशासन और पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक वे बाढ़ और तटबंध कटाव रोकने के काम में लगे हुए थे। Workers sandbags लेकर गंगा में erosion-control operation कर रहे थे। इसलिए इसे केवल “मजदूरी करने जा रहे मजदूरों की नाव” बताने के बजाय “कटाव-रोधी काम में लगे मजदूरों की नाव” कहना ज्यादा accurate है। दो दिन पहले टूट गया था तटबंध का हिस्सा राघोपुर इलाके में गंगा का जलस्तर बढ़ने के बाद तटबंध का एक हिस्सा टूट गया था, जिसके चलते आसपास के गांवों में पानी घुसने और बड़े पैमाने पर erosion का खतरा पैदा हो गया। इसी के बाद Water Resources Department की तरफ से emergency flood-fighting और sandbagging operation तेज किया गया था। हादसे के वक्त मजदूर इसी emergency work का हिस्सा थे। बचाए गए मजदूर ने लगाए गंभीर आरोप हादसे में सुरक्षित निकले मजदूर Abhinandan Kumar ने ANI से बातचीत में दावा किया कि नाव डूबने के दौरान तत्काल मदद नहीं पहुंची और लोगों को अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। यह rescued worker का बयान है। Rescue response की पूरी sequence और किसी agency या contractor की जिम्मेदारी जांच के बाद ही तय की जा सकती है। Contractor के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी हादसे के बाद प्रशासन ने safety arrangements को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। कुछ reports के मुताबिक district administration ने संबंधित contractor/vendor के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने और जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए हैं। यह सवाल भी उठ रहा है कि तेज बहाव और flood conditions में मजदूरों को ले जाते समय पर्याप्त: उपलब्ध थे या नहीं। इन पहलुओं की जांच के बाद ही किसी specific व्यक्ति या contractor की negligence स्थापित की जा सकती है। नाव से Sandbags ले जाने पर रोक हादसे के बाद administration ने safety को देखते हुए sandbags ले जाने के लिए नावों के इस्तेमाल पर रोक लगाने और वैकल्पिक माध्यम अपनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। Reports के मुताबिक जहां संभव है वहां tractors के जरिए flood-control material पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। इसका उद्देश्य तेज धारा के दौरान दूसरे workers को ऐसे जोखिम से बचाना है। गंगा के बढ़ते जलस्तर से Bhagalpur में चिंता भागलपुर में पिछले कुछ दिनों से गंगा का बढ़ता जलस्तर कई इलाकों के लिए चिंता बना हुआ है। तटबंध और erosion-control structures पर बढ़ते दबाव के कारण administration को लगातार flood-fighting operations करने पड़ रहे हैं। ऐसे में नदी में काम करने वाले labourers और rescue personnel की सुरक्षा एक…

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