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Kainchi Dham में रोजाना 20,000–25,000 श्रद्धालुओं की entry पर विचार, limit पूरी होते ही बंद हो सकता है registration portal

नैनीताल, 13 अक्टूबर 2026: उत्तराखंड के प्रसिद्ध Kainchi Dham में बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करने के लिए Nainital district administration रोजाना आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 20,000 से 25,000 तक सीमित करने पर विचार कर रहा है। प्रस्ताव के मुताबिक, तय संख्या में registrations पूरे होते ही online portal को उस दिन के लिए बंद किया जा सकता है। Char Dham की तर्ज पर हो सकता है registration system प्रशासन Kainchi Dham के लिए Char Dham यात्रा जैसी pre-registration व्यवस्था लागू करने की योजना बना रहा है। इससे अधिकारियों को पहले से पता चल सकेगा कि किसी दिन कितने श्रद्धालु पहुंचने वाले हैं और उसी हिसाब से traffic, parking और crowd management की व्यवस्था की जा सकेगी। 20–25 हजार registrations के बाद portal हो सकता है lock अधिकारियों के मुताबिक प्रस्ताव में रोजाना करीब 20,000–25,000 लोगों को register करने की योजना है। इस सीमा तक registrations पहुंचने के बाद portal को बंद कर दिया जाएगा, जिससे अतिरिक्त भीड़ को रोका जा सके। फिलहाल यह व्यवस्था प्रस्ताव के स्तर पर है और final approval का इंतजार है। बढ़ती भीड़ और traffic jam बनी बड़ी वजह 2026 के पहले छह महीनों में Kainchi Dham में लगभग 24.34 लाख श्रद्धालु पहुंचे हैं। त्योहारों और लंबे weekends के दौरान एक दिन में visitors की संख्या 35,000 से भी ऊपर पहुंचने के मामले सामने आए, जबकि हाल के एक weekend पर करीब 50,000 लोगों की भीड़ ने traffic व्यवस्था पर भारी दबाव डाला। Weekend से शुरू हो सकता है trial प्रस्ताव को राज्य सरकार की मंजूरी मिलने के बाद registration portal लगभग एक महीने के भीतर शुरू किया जा सकता है। शुरुआती चरण में इसे weekends पर trial basis पर लागू करने की योजना पर विचार किया जा रहा है। Alternative routes और temple timings पर भी चर्चा भीड़ कम करने के लिए केवल registration system ही नहीं, बल्कि alternative routes, Ratighat bypass और temple opening time को सुबह 4 बजे करने जैसे प्रस्तावों पर भी चर्चा की जा रही है। उद्देश्य Kainchi Dham के साथ-साथ Almora, Ranikhet और आसपास के इलाकों की ओर जाने वाले traffic को भी सुचारू रखना है। source – The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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Prayagraj में 11 साल बाद शुरू हुई ‘Prayagphilex-2026’, दुर्लभ डाक टिकटों में दिखेगी भारत की विरासत और प्रगति

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 11 साल के अंतराल के बाद जिला स्तरीय डाक टिकट प्रदर्शनी ‘Prayagphilex-2026’ की शुरुआत 9 अक्टूबर 2026 को हो रही है। तीन दिवसीय यह प्रदर्शनी 9 से 11 अक्टूबर तक नॉर्थ सेंट्रल जोन कल्चरल सेंटर (NCZCC) में आयोजित की जा रही है। इसका आयोजन इंडिया पोस्ट के प्रयागराज डिवीजन की ओर से किया जा रहा है। 2015 के बाद पहली बार आयोजन Prayagphilex का पिछला जिला स्तरीय संस्करण वर्ष 2015 में प्रयागराज में आयोजित हुआ था। इसके बाद अब 11 साल के अंतराल पर शहर को एक बार फिर इस प्रदर्शनी की मेजबानी का अवसर मिला है। तीन दिन चलेगी प्रदर्शनी Prayagphilex-2026 का आयोजन 9 से 11 अक्टूबर तक किया जाएगा। प्रदर्शनी में डाक टिकट संग्रहकर्ताओं, विद्यार्थियों और आम लोगों के लिए विभिन्न प्रकार के डाक टिकट और उनसे जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री प्रदर्शित की जाएगी। ‘India Through Stamps’ है इस बार की थीम इस वर्ष प्रदर्शनी की थीम “India Through Stamps: Heritage, Culture and Progress” रखी गई है। इसके माध्यम से डाक टिकटों के जरिए भारत की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और विकास यात्रा को प्रदर्शित किया जाएगा। दुर्लभ डाक टिकट होंगे आकर्षण का केंद्र प्रदर्शनी में दुर्लभ डाक टिकटों के साथ अन्य फिलेटेलिक सामग्री भी देखने को मिलेगी। इनके माध्यम से आगंतुकों को भारत के इतिहास, प्रमुख व्यक्तित्वों, सांस्कृतिक विरासत और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय घटनाओं से जुड़ी जानकारी मिलेगी। स्टांप कलेक्शन को बढ़ावा देने की पहल इंडिया पोस्ट का उद्देश्य केवल पुराने डाक टिकटों का प्रदर्शन करना ही नहीं, बल्कि फिलेटली यानी डाक टिकट संग्रह करने की रुचि को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है। खास तौर पर स्कूली विद्यार्थियों को इस शौक से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। 10 अक्टूबर को विद्यार्थियों के लिए क्विज और वर्कशॉप प्रदर्शनी के दूसरे दिन, 10 अक्टूबर को स्कूली विद्यार्थियों के लिए फिलेटेलिक क्विज आयोजित की जाएगी। इसके साथ ही डाक टिकट संग्रह से जुड़ी कार्यशाला भी होगी, जिसमें बच्चों को फिलेटली की बुनियादी जानकारी दी जाएगी। कई स्कूलों को दिया गया आमंत्रण प्रयागराज के विभिन्न स्कूलों को प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। आयोजकों का उद्देश्य डाक टिकटों के माध्यम से विद्यार्थियों को इतिहास, भूगोल, कला, विज्ञान और संस्कृति जैसे विषयों से जोड़ना है। पोस्टमास्टर जनरल ने बताया खास अवसर पोस्टमास्टर जनरल राजीव उमराव के अनुसार, जिला स्तरीय फिलेटेलिक प्रदर्शनियां अलग-अलग जिलों में आयोजित की जाती हैं। प्रयागराज को एक दशक से अधिक समय बाद फिर से इस आयोजन की मेजबानी का अवसर मिला है। विश्व डाक दिवस के अवसर पर शुरुआत Prayagphilex-2026 की शुरुआत 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के अवसर पर हो रही है। इस दौरान डाक विभाग देशभर में डाक सेवाओं, वित्तीय समावेशन, डिजिटल पहलों और फिलेटली से संबंधित गतिविधियों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। डाक टिकट सिर्फ डाक भेजने का माध्यम नहीं डाक टिकटों को इतिहास और संस्कृति के महत्वपूर्ण दस्तावेजों के रूप में भी देखा जाता है। पुराने और स्मारक डाक टिकटों के जरिए किसी देश के प्रमुख व्यक्तित्वों, ऐतिहासिक इमारतों, वन्यजीवों, उपलब्धियों और सांस्कृतिक पहचान के बारे में जानकारी मिलती है। नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ने की कोशिश Prayagphilex-2026 को ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के साथ एक शैक्षिक पहल के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे आयोजन पारंपरिक शौक को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और विद्यार्थियों में इतिहास व संस्कृति के प्रति रुचि बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। 11 अक्टूबर तक देख सकेंगे प्रदर्शनी प्रयागराज के निवासी और डाक टिकट संग्रह में रुचि रखने वाले लोग 11 अक्टूबर तक इस प्रदर्शनी का अवलोकन कर सकेंगे। दुर्लभ डाक टिकटों और भारत की डाक विरासत को करीब से जानने के इच्छुक लोगों के लिए यह आयोजन खास अवसर है। स्रोत: The Times of India, India Voice और India Post जय राष्ट्र न्यूज़

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राजस्थान के टेराकोटा कलाकार चंद्रशेखर सैन National Akademi Award के लिए चुने गए

जयपुर: राजस्थान के प्रसिद्ध टेराकोटा और दृश्य कलाकार चंद्रशेखर सैन को 65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी 2026 में प्रतिष्ठित ललित कला अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है। उन्हें उनकी टेराकोटा कलाकृति ‘My Entire World – I’ के लिए सम्मानित किया जाएगा। खास बात यह है कि इस वर्ष पुरस्कार के लिए चुने गए कलाकारों में चंद्रशेखर सैन राजस्थान से एकमात्र कलाकार हैं। ‘My Entire World – I’ के लिए मिला सम्मान चंद्रशेखर सैन की पुरस्कार विजेता कलाकृति ‘My Entire World – I’ टेराकोटा माध्यम में तैयार की गई है और इसे Sculpture category में चुना गया है। उनकी कला में प्रकृति, स्मृतियों और मानवीय जीवन से जुड़े भावों को मिट्टी के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। राजस्थान से अकेले कलाकार का चयन 65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी के लिए देश के 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कलाकारों ने अपनी कृतियां भेजीं। इस वर्ष कुल 20 कलाकारों को ललित कला अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है। इनमें राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र कलाकार चंद्रशेखर सैन हैं। 6,175 कलाकृतियां हुईं जमा राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी के लिए देशभर के 2,495 कलाकारों ने कुल 6,175 कलाकृतियां भेजी थीं। पहले चरण की जूरी ने इनमें से 270 artworks को प्रदर्शनी के लिए चुना। इसके बाद दूसरे चरण की जूरी ने 20 कलाकृतियों और उनके कलाकारों को पुरस्कार के लिए चयनित किया। टेराकोटा है चंद्रशेखर की खास पहचान चंद्रशेखर सैन मुख्य रूप से Terracotta Art में काम करते हैं। मिट्टी से बनाई जाने वाली उनकी कलाकृतियों में राजस्थान की लोक परंपराओं और पुरातात्विक विरासत की झलक दिखाई देती है। उनकी कला पर विशेष रूप से कालीबंगा और मोलेला जैसी राजस्थान की ऐतिहासिक और पारंपरिक कला परंपराओं का प्रभाव देखा जाता है। प्रकृति से लेते हैं प्रेरणा चंद्रशेखर की कलाकृतियों में प्रकृति और जैविक आकृतियों को विशेष स्थान मिलता है। पक्षी, जानवर, बीज, पेड़ और प्राकृतिक संरचनाओं जैसे विषय उनकी कला में बार-बार दिखाई देते हैं। वह पारंपरिक टेराकोटा को contemporary visual art के साथ जोड़ने के लिए जाने जाते हैं। 2014 में भी मिल चुका है बड़ा सम्मान चंद्रशेखर सैन को वर्ष 2014 में राजस्थान ललित कला अकादमी का State Art Award भी मिल चुका है। इसके बाद उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी कला का प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय स्तर की कई कला प्रदर्शनियों में हिस्सा लिया। देशभर में 10 से ज्यादा Solo Exhibitions अपने कला करियर के दौरान चंद्रशेखर सैन अब तक देशभर में 10 से अधिक एकल प्रदर्शनियां आयोजित कर चुके हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कलाकृतियों को लगातार पहचान मिली है और वह कई प्रतिष्ठित कला प्रदर्शनियों में अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर चुके हैं। स्पेन में भी प्रदर्शित कर चुके हैं अपनी कला चंद्रशेखर सैन अपनी कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी प्रस्तुत कर चुके हैं। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के माध्यम से स्पेन के Valladolid स्थित Casa de la India में अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई और भारतीय टेराकोटा कला पर व्याख्यान भी दिया। 20 कलाकारों को मिलेगा पुरस्कार इस वर्ष ललित कला अकादमी ने Painting, Sculpture, Drawing, Printmaking और Mixed Media समेत विभिन्न विधाओं के कुल 20 कलाकारों को पुरस्कार के लिए चुना है। राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी का उद्देश्य देश के स्थापित और उभरते कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए राष्ट्रीय मंच प्रदान करना है। राजस्थान की कला को मिली राष्ट्रीय पहचान चंद्रशेखर सैन का चयन राजस्थान की पारंपरिक मिट्टी कला और आधुनिक visual art के संगम के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। उनकी सफलता से राजस्थान की टेराकोटा परंपरा को राष्ट्रीय कला मंच पर एक बार फिर प्रमुख पहचान मिली है। source – Ministry of Culture / Press Information Bureau / DD India / PTI Press Information Bureau जय राष्ट्र न्यूज़

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स्वतंत्रता दिवस और आगामी सांस्कृतिक आयोजनों की तैयारियाँ तेज़, देशभर में विशेष कार्यक्रमों की घोषणा

नई दिल्ली: आगामी 79वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) और उससे पहले आयोजित होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर देशभर में तैयारियाँ तेज़ हो गई हैं। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, जिला प्रशासन, शैक्षणिक संस्थान और सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय उत्सव को भव्य बनाने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। कई राज्यों में देशभक्ति सांस्कृतिक संध्या, तिरंगा यात्राएँ, कला एवं शिल्प प्रदर्शनियाँ, विद्यालयी कार्यक्रम, लोकनृत्य प्रस्तुतियाँ और युवा महोत्सव आयोजित किए जाने की घोषणा की गई है। लाल किले से होगा मुख्य समारोह नई दिल्ली के लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियाँ अंतिम चरण में हैं। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और विभिन्न एजेंसियाँ आयोजन की व्यवस्थाओं की समीक्षा कर रही हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन, ध्वजारोहण समारोह और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए व्यापक स्तर पर तैयारियाँ चल रही हैं। राज्यों में विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और अन्य राज्यों में स्थानीय प्रशासन द्वारा स्वतंत्रता दिवस सप्ताह के दौरान विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें लोक कलाकारों की प्रस्तुतियाँ, देशभक्ति गीत, नाटक, चित्रकला प्रतियोगिताएँ, हस्तशिल्प मेले और पारंपरिक कला प्रदर्शन शामिल होंगे। युवाओं और छात्रों की भागीदारी विद्यालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में देशभक्ति पर आधारित प्रतियोगिताएँ, भाषण, वाद-विवाद, निबंध लेखन, वृक्षारोपण अभियान और तिरंगा रैलियों की तैयारी की जा रही है। शिक्षा विभाग ने संस्थानों से अधिकाधिक छात्र भागीदारी सुनिश्चित करने की अपील की है। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को मिलेगा बढ़ावा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत नागरिकों से अपने घरों, कार्यालयों और संस्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अपील की जा रही है। प्रशासन विभिन्न स्थानों पर तिरंगा वितरण और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित करेगा ताकि अधिक से अधिक लोग अभियान से जुड़ सकें। पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ स्वतंत्रता दिवस और उससे जुड़े आयोजनों के कारण पर्यटन स्थलों, संग्रहालयों, सांस्कृतिक केंद्रों और स्थानीय बाजारों में गतिविधियाँ बढ़ने की संभावना है। इससे होटल, परिवहन, हस्तशिल्प और छोटे व्यापारियों को भी आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है। निष्कर्ष स्वतंत्रता दिवस केवल राष्ट्रीय उत्सव नहीं, बल्कि देश की संस्कृति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है। देशभर में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम नागरिकों, विशेषकर युवाओं में राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करने और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेंगे। Source: Ministry of Culture | Ministry of Home Affairs जय राष्ट्र न्यूज़

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सारनाथ को UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के बाद देशभर में खुशी की लहर

वाराणसी: भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश स्थल सारनाथ को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के बाद देशभर में खुशी और उत्साह का माहौल है। इस उपलब्धि को भारत की सांस्कृतिक और बौद्ध विरासत के लिए एक ऐतिहासिक सम्मान माना जा रहा है। वाराणसी और सारनाथ में श्रद्धालुओं, बौद्ध भिक्षुओं और स्थानीय लोगों ने इस अवसर का स्वागत किया तथा इसे भारत की समृद्ध विरासत की वैश्विक पहचान बताया। सारनाथ वह पवित्र स्थल है जहाँ भगवान गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था। यही स्थान बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का प्रारंभिक केंद्र माना जाता है और दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु तथा पर्यटक यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ेगी पहचान विशेषज्ञों का मानना है कि UNESCO विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से सारनाथ की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होगी। इससे— संरक्षण और विकास पर विशेष ध्यान सरकार और संबंधित एजेंसियों ने संकेत दिया है कि विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद स्मारकों के संरक्षण, पर्यटक सुविधाओं के विस्तार, स्वच्छता, डिजिटल गाइड सिस्टम और बुनियादी ढांचे को और बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही पुरातात्विक महत्व वाले क्षेत्रों की सुरक्षा भी और मजबूत की जाएगी। बौद्ध जगत के लिए महत्वपूर्ण केंद्र सारनाथ केवल भारत ही नहीं, बल्कि श्रीलंका, थाईलैंड, जापान, म्यांमार, भूटान, वियतनाम और अन्य बौद्ध देशों के श्रद्धालुओं के लिए भी अत्यंत पवित्र स्थल है। यहाँ स्थित धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप, अशोक स्तंभ और सारनाथ संग्रहालय विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। स्थानीय लोगों में उत्साह विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की खबर के बाद स्थानीय व्यापारियों, पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों और होटल उद्योग ने इसे क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए सकारात्मक कदम बताया। पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में विदेशी पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। निष्कर्ष सारनाथ को UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे न केवल बौद्ध धरोहर को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी, बल्कि पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक संरक्षण को भी दीर्घकालिक लाभ मिलने की उम्मीद है। Source: UNESCO | Archaeological Survey of India (ASI) | Ministry of Culture जय राष्ट्र न्यूज़

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कारगिल विजय दिवस पर देशभर के युद्ध स्मारकों में विशेष कार्यक्रम, वीर शहीदों को राष्ट्र ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

नई दिल्ली: 26 जुलाई को मनाए जा रहे कारगिल विजय दिवस के अवसर पर देशभर के युद्ध स्मारकों, शहीद स्थलों और सैन्य प्रतिष्ठानों में विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस अवसर पर भारतीय सेना, पूर्व सैनिकों, शहीद परिवारों, जनप्रतिनिधियों और हजारों नागरिकों ने कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर जवानों को श्रद्धासुमन अर्पित किए। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर आयोजित मुख्य समारोह में सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्पचक्र अर्पित कर शहीदों को नमन किया। देश के विभिन्न राज्यों में भी जिला और राज्य स्तर पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम, मौन धारण, तिरंगा यात्रा और सांस्कृतिक आयोजन आयोजित किए गए। कारगिल के वीरों को किया गया याद कार्यक्रमों में वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस दिखाने वाले सैनिकों के बलिदान को याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय सेना ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में दुश्मन को परास्त कर देश की सीमाओं और सम्मान की रक्षा की थी। शहीद परिवारों का किया गया सम्मान कई राज्यों में शहीद सैनिकों के परिजनों को सम्मानित किया गया। स्थानीय प्रशासन और पूर्व सैनिक संगठनों ने उनके योगदान को याद करते हुए सम्मान समारोह आयोजित किए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी विद्यार्थियों ने देशभक्ति गीत, भाषण और नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से कारगिल के वीरों को श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री और रक्षा नेतृत्व ने दी श्रद्धांजलि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि राष्ट्र उनके साहस, त्याग और समर्पण को सदैव याद रखेगा। उन्होंने देशवासियों से सैनिकों के बलिदान से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया। देशभर में देशभक्ति का माहौल कारगिल विजय दिवस के अवसर पर— का आयोजन किया गया। कारगिल विजय दिवस का महत्व 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय के तहत कारगिल क्षेत्र से घुसपैठियों को पूरी तरह खदेड़कर विजय प्राप्त की थी। इस युद्ध में 527 भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके सम्मान में हर वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। निष्कर्ष कारगिल विजय दिवस पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोहों ने एक बार फिर देश को अपने वीर सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान की याद दिलाई। पूरे देश ने एक स्वर में उन शहीदों को नमन किया जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। Source: Ministry of Defence | Indian Army | Press Information Bureau (PIB) जय राष्ट्र न्यूज़

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मानसून के दौरान ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए ASI ने निगरानी बढ़ाई, संवेदनशील स्थलों पर विशेष व्यवस्था

नई दिल्ली: देशभर में सक्रिय मानसून और लगातार हो रही बारिश को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ऐतिहासिक स्मारकों और संरक्षित धरोहर स्थलों की सुरक्षा के लिए विशेष निगरानी अभियान तेज कर दिया है। बारिश से होने वाले संभावित नुकसान, जलभराव, नमी और संरचनात्मक क्षति को रोकने के उद्देश्य से ASI ने अपने क्षेत्रीय कार्यालयों और संरक्षण विशेषज्ञों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। देश के विभिन्न राज्यों में स्थित विश्व धरोहर स्थलों, किलों, मंदिरों, मस्जिदों, गुफाओं और अन्य संरक्षित स्मारकों की नियमित निगरानी की जा रही है ताकि किसी भी प्रकार की क्षति का समय रहते आकलन कर आवश्यक मरम्मत और संरक्षण कार्य किए जा सकें। क्यों बढ़ाई गई निगरानी? मानसून के दौरान लगातार बारिश, अत्यधिक नमी और जलभराव के कारण प्राचीन इमारतों की दीवारों, नींव और पत्थर की संरचनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कई ऐतिहासिक स्मारक सदियों पुराने हैं और उनकी संरचना को सुरक्षित रखने के लिए विशेष संरक्षण उपायों की आवश्यकता होती है। ASI का उद्देश्य समय रहते संभावित जोखिमों की पहचान कर स्मारकों को किसी बड़े नुकसान से बचाना है। किन कार्यों पर दिया जा रहा विशेष ध्यान? मानसून के दौरान ASI द्वारा कई महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं— विश्व धरोहर स्थलों पर विशेष व्यवस्था ताजमहल, लाल किला, कुतुब मीनार, कोणार्क सूर्य मंदिर, हम्पी, अजंता-एलोरा गुफाएं, साँची स्तूप और अन्य प्रमुख संरक्षित स्मारकों सहित कई महत्वपूर्ण धरोहर स्थलों पर निगरानी और रखरखाव को प्राथमिकता दी जा रही है। विशेषज्ञ समय-समय पर इन स्थलों का निरीक्षण कर रहे हैं ताकि किसी भी प्रकार की संरचनात्मक समस्या का तत्काल समाधान किया जा सके। पर्यटकों के लिए भी जारी की गई सलाह ASI ने पर्यटकों से अपील की है कि मानसून के दौरान स्मारकों का भ्रमण करते समय सुरक्षा नियमों का पालन करें। फिसलन वाले क्षेत्रों में सावधानी बरतें, प्रतिबंधित स्थानों पर न जाएं और प्रशासन द्वारा जारी निर्देशों का पालन करें। कुछ स्थानों पर मौसम की स्थिति के अनुसार प्रवेश व्यवस्था में अस्थायी बदलाव भी किए जा सकते हैं। संरक्षण विशेषज्ञों की राय विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और अनियमित वर्षा के कारण ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की चुनौती बढ़ती जा रही है। नियमित निरीक्षण, वैज्ञानिक संरक्षण तकनीकों और आधुनिक निगरानी प्रणालियों के उपयोग से इन धरोहरों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। भारत की सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा भारत में हजारों संरक्षित स्मारक और पुरातात्विक स्थल मौजूद हैं, जो देश की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन धरोहरों का संरक्षण केवल पर्यटन ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को सुरक्षित रखने की दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है। निष्कर्ष मानसून के दौरान ASI द्वारा बढ़ाई गई निगरानी ऐतिहासिक स्मारकों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। नियमित निरीक्षण, जल निकासी व्यवस्था और त्वरित संरक्षण कार्यों के माध्यम से देश की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर किए गए संरक्षण उपाय इन स्मारकों को प्राकृतिक चुनौतियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। Source: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सार्वजनिक जानकारी एवं संरक्षण संबंधी दिशानिर्देश। Original Report: उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं और संरक्षण संबंधी जानकारी के आधार पर तैयार। जय राष्ट्र न्यूज़

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भारतीय नौसेना को एक महीने में मिले चार स्वदेशी नौसैनिक प्लेटफॉर्म, समुद्री सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत को मिला बड़ा बल

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। पिछले एक महीने के भीतर नौसेना में चार स्वदेशी नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल किए गए हैं। इनमें अत्याधुनिक युद्धपोत, एंटी-सबमरीन युद्धपोत और सर्वेक्षण पोत शामिल हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म के शामिल होने से भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा, निगरानी क्षमता और हिंद महासागर क्षेत्र में परिचालन शक्ति और मजबूत होगी। साथ ही यह भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन और जहाज निर्माण उद्योग की बढ़ती क्षमता का भी प्रमाण है। कौन-कौन से प्लेटफॉर्म हुए शामिल? रक्षा मंत्रालय के अनुसार, हाल ही में भारतीय नौसेना में INS Tamal, INS Arnala, INS Nistar और INS Himgiri जैसे स्वदेशी या भारत में निर्मित आधुनिक नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल किए गए हैं। इन सभी जहाजों को अलग-अलग परिचालन आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। इनमें पनडुब्बी रोधी अभियान, समुद्री निगरानी, बचाव अभियान और बहुउद्देश्यीय नौसैनिक संचालन जैसी क्षमताएं मौजूद हैं। आत्मनिर्भर भारत को मिली नई मजबूती रक्षा मंत्रालय ने कहा कि इन प्लेटफॉर्म का निर्माण भारतीय शिपयार्ड और घरेलू रक्षा उद्योग की भागीदारी से किया गया है। इससे न केवल रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भारतीय कंपनियों, MSME और रक्षा स्टार्टअप्स को भी नई तकनीक विकसित करने का अवसर मिलेगा। सरकार का लक्ष्य भारत को रक्षा उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में वैश्विक केंद्र बनाना है। नौसेना की परिचालन क्षमता में होगा इजाफा नए प्लेटफॉर्म के शामिल होने से भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा, पनडुब्बी रोधी अभियान और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) मिशनों की क्षमता बढ़ेगी। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सामरिक चुनौतियों को देखते हुए यह विस्तार भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रक्षा उत्पादन में स्वदेशीकरण पर जोर पिछले कुछ वर्षों में भारत ने युद्धपोत, पनडुब्बी, मिसाइल प्रणाली और नौसैनिक उपकरणों के स्वदेशी निर्माण पर विशेष ध्यान दिया है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि स्वदेशी जहाज निर्माण से देश की रणनीतिक क्षमता मजबूत होने के साथ-साथ रोजगार, तकनीकी नवाचार और रक्षा निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा। रक्षा मंत्री ने दी बधाई रक्षा मंत्री ने भारतीय नौसेना, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों, निजी उद्योगों और जहाज निर्माण में शामिल इंजीनियरों एवं कर्मचारियों को इस उपलब्धि पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत लगातार आधुनिक, आत्मनिर्भर और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप रक्षा क्षमताओं का विकास कर रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ेगी रणनीतिक मौजूदगी विशेषज्ञों का मानना है कि नए नौसैनिक प्लेटफॉर्म भारतीय नौसेना की Mission-Based Deployments को और मजबूत करेंगे। इससे समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, समुद्री डकैती विरोधी अभियान, खोज एवं बचाव अभियान और क्षेत्रीय सहयोग को भी नई मजबूती मिलेगी। निष्कर्ष एक महीने के भीतर चार स्वदेशी नौसैनिक प्लेटफॉर्म का भारतीय नौसेना में शामिल होना देश के रक्षा क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। इससे नौसेना की परिचालन क्षमता बढ़ेगी, समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और मजबूत होगी तथा आत्मनिर्भर भारत अभियान को नई गति मिलेगी। आने वाले वर्षों में ऐसे और स्वदेशी रक्षा प्लेटफॉर्म भारतीय सशस्त्र बलों की ताकत को और बढ़ाएंगे। Source: रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence), भारतीय नौसेना। Original Report: रक्षा मंत्रालय और भारतीय नौसेना द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के आधार पर तैयार। जय राष्ट्र न्यूज़

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सावन मास की शुरुआत के साथ शिवालयों में बढ़ी श्रद्धालुओं की आस्था, देशभर में विशेष धार्मिक तैयारियां

नई दिल्ली, 12 जुलाई। भगवान शिव को समर्पित पवित्र सावन मास के शुभारंभ के साथ देशभर के प्रमुख शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने लगी है। काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर, केदारनाथ, सोमनाथ, बैद्यनाथ धाम, त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर और अन्य प्रसिद्ध शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक और धार्मिक अनुष्ठानों की तैयारियां की गई हैं। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। शिव मंदिरों में विशेष आयोजन सावन के पहले सोमवार से ही अनेक मंदिरों में विशेष आरती, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और धार्मिक प्रवचनों का आयोजन शुरू हो गया है। कई स्थानों पर मंदिरों को आकर्षक फूलों और पारंपरिक सजावट से सजाया गया है। श्रद्धालु जलाभिषेक और भगवान शिव के दर्शन के लिए सुबह से ही कतारों में पहुंच रहे हैं। कांवड़ यात्रा की तैयारियां उत्तर भारत के कई राज्यों में कांवड़ यात्रा को लेकर भी तैयारियां तेज हो गई हैं। प्रशासन ने प्रमुख मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था, चिकित्सा शिविर, पेयजल, सफाई और यातायात प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की है। विभिन्न स्वयंसेवी संगठन भी श्रद्धालुओं की सेवा के लिए शिविर लगा रहे हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व हिंदू परंपरा में सावन मास को भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा-अर्चना से सुख, समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यही कारण है कि देशभर में लाखों श्रद्धालु इस अवधि में व्रत, जलाभिषेक और विशेष पूजन करते हैं। प्रशासन की विशेष व्यवस्था बढ़ती भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और मंदिर समितियों ने अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती, सीसीटीवी निगरानी, चिकित्सा सहायता, भीड़ नियंत्रण और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था की है। कई मंदिरों में ऑनलाइन दर्शन और डिजिटल सूचना प्रणाली भी उपलब्ध कराई गई है ताकि श्रद्धालुओं को सुविधा मिल सके। स्वच्छता और पर्यावरण पर जोर धार्मिक आयोजनों के दौरान स्वच्छता बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। श्रद्धालुओं से प्लास्टिक का उपयोग न करने, मंदिर परिसर को स्वच्छ रखने और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की गई है। पर्यटन को भी मिलेगा बढ़ावा विशेषज्ञों का मानना है कि सावन मास के दौरान धार्मिक पर्यटन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इससे स्थानीय व्यापार, होटल, परिवहन और छोटे व्यवसायों को भी आर्थिक लाभ मिलता है। कई राज्यों ने श्रद्धालुओं के लिए विशेष सुविधाओं और यात्रा प्रबंधन की व्यवस्था की है। आस्था का पर्व धार्मिक विद्वानों के अनुसार सावन केवल पूजा-अर्चना का महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। इस दौरान आयोजित धार्मिक कार्यक्रम देश की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखते हैं और लाखों लोगों को एक साझा आस्था से जोड़ते हैं। स्रोत:विभिन्न मंदिर ट्रस्ट, राज्य प्रशासन एवं सार्वजनिक धार्मिक जानकारी। मूल रिपोर्ट:12 जुलाई 2026 तक उपलब्ध सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों एवं आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर। जय राष्ट्र न्यूज़

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भारत-ऑस्ट्रेलिया ने सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग को नई गति देने पर दिया जोर

मेलबर्न, 9 जुलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा और व्यापार के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग को भी विशेष महत्व दिया गया। दोनों देशों ने छात्र विनिमय कार्यक्रमों, विश्वविद्यालयों के बीच साझेदारी, संयुक्त अनुसंधान और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और व्यापक बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई। शिक्षा क्षेत्र में सहयोग होगा मजबूत बैठक में दोनों नेताओं ने उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने, संयुक्त शोध परियोजनाओं को प्रोत्साहन देने और नई तकनीकों के क्षेत्र में अकादमिक साझेदारी को मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की। दोनों देशों का उद्देश्य छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराना है। छात्र विनिमय कार्यक्रमों को मिलेगा बढ़ावा भारत और ऑस्ट्रेलिया ने छात्र एवं शिक्षक विनिमय कार्यक्रमों का विस्तार करने पर भी जोर दिया। दोनों देशों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम युवाओं को वैश्विक अनुभव प्रदान करने के साथ-साथ नवाचार और कौशल विकास को भी बढ़ावा देंगे। सांस्कृतिक संबंध होंगे और मजबूत बैठक के दौरान भारतीय कला, योग, आयुर्वेद, संगीत और सांस्कृतिक विरासत के प्रचार-प्रसार के लिए संयुक्त कार्यक्रम आयोजित करने पर भी चर्चा हुई। दोनों देशों ने संग्रहालयों, सांस्कृतिक संस्थानों और कलाकारों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। भारतीय समुदाय की भूमिका की सराहना प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री अल्बनीज़ ने ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय की भूमिका की प्रशंसा की। दोनों नेताओं ने कहा कि भारतीय मूल के लोग दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। अनुसंधान और नवाचार पर फोकस दोनों देशों ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वच्छ ऊर्जा और स्वास्थ्य अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। इससे शिक्षा और उद्योग के बीच सहयोग को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है। इंडो-पैसिफिक साझेदारी का मानवीय आयाम विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग केवल द्विपक्षीय संबंधों को ही नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में लोगों के बीच संपर्क (People-to-People Connectivity) को भी मजबूत करेगा। यह दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। भविष्य की दिशा भारत और ऑस्ट्रेलिया ने आने वाले वर्षों में शिक्षा, संस्कृति, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग को और गहरा करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। दोनों देशों का मानना है कि मजबूत सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंध भविष्य की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती प्रदान करेंगे। स्रोत:भारत सरकार, ऑस्ट्रेलिया सरकार एवं दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के आधिकारिक वक्तव्य। मूल रिपोर्ट:9 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी एवं विश्वसनीय समाचार स्रोतों के आधार पर। जय राष्ट्र न्यूज़

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