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वित्त मंत्रालय ने सितंबर तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की growth 7.3% रहने का अनुमान जताया

नई दिल्ली: वित्त मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक GDP growth करीब 7.3% रहने का अनुमान जताया है। मंत्रालय के Monthly Economic Review में कहा गया कि पहली तिमाही की तुलना में growth थोड़ी धीमी हो सकती है, लेकिन घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियां अभी भी मजबूत बनी हुई हैं। पहली तिमाही में रही थी 7.8% growth अप्रैल-जून 2026 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.8% की वास्तविक GDP growth दर्ज की थी। वित्त मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक दूसरी तिमाही में growth 7.3% रह सकती है, यानी गति कुछ कम होगी लेकिन expansion मजबूत स्तर पर बनी रहेगी। Nowcasting model से आया अनुमान वित्त मंत्रालय ने दूसरी तिमाही की growth का आकलन अपने nowcasting model के आधार पर किया है। इस मॉडल को इस साल के Economic Survey में पेश किया गया था और इसका इस्तेमाल उपलब्ध high-frequency indicators के आधार पर GDP growth का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है। सितंबर में manufacturing activity रही मजबूत सितंबर 2026 में भारत की factory activity सात महीने के उच्च स्तर पर पहुंची। एक निजी सर्वे के अनुसार मजबूत घरेलू और विदेशी मांग की वजह से manufacturing sector में नई तेजी देखने को मिली और hiring तथा business confidence में भी सुधार हुआ। GST collection ₹2 लाख करोड़ के पार सितंबर में GST collection सालाना आधार पर 14.7% बढ़कर ₹2 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच गया। Auto dispatch, UPI transactions और private equity तथा venture capital investments में भी मजबूती दर्ज की गई, जिससे घरेलू आर्थिक गतिविधियों में momentum का संकेत मिला। वैश्विक जोखिम अभी भी बने हुए वित्त मंत्रालय ने मजबूत growth outlook के साथ कई जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया है। भू-राजनीतिक तनाव, महंगा crude oil, वैश्विक financial conditions में tightening और imported inflation भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बने हुए हैं। रुपये और महंगाई पर भी नजर ऊंची crude oil prices और मजबूत डॉलर के कारण रुपये तथा inflation पर दबाव बढ़ सकता है। मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया कि बाहरी झटकों के बावजूद services exports, remittances और विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय अर्थव्यवस्था को कुछ सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं। दूसरी तिमाही के आधिकारिक GDP आंकड़े बाद में 7.3% का आंकड़ा फिलहाल वित्त मंत्रालय का अनुमान है, आधिकारिक GDP growth figure नहीं। सांख्यिकी मंत्रालय के release calendar के मुताबिक जुलाई-सितंबर 2026 तिमाही के आधिकारिक GDP estimates 30 नवंबर 2026 को जारी किए जाने हैं। मजबूत घरेलू मांग से मिल रहा सहारा सरकार का मानना है कि consumption, manufacturing और services में activity के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की underlying momentum मजबूत बनी हुई है। हालांकि आने वाले महीनों में crude prices, inflation, global interest rates और external demand growth की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। source – Ministry of Finance / Ministry of Statistics & Programme Implementation / Reuters / The Times of India जय राष्ट्र न्यूज़

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‘1947 में हम अमेरिका के बराबर थे, फिर गड़बड़ी कहां हुई?’ दावे पर बहस; आंकड़ों में क्या है सच्चाई

नई दिल्ली: भारत की आजादी के समय आर्थिक स्थिति की तुलना अमेरिका से करने वाला दावा एक बार फिर चर्चा में है। “1947 में हम अमेरिका के बराबर थे, फिर गड़बड़ी कहां हुई?” जैसे दावे सोशल मीडिया और राजनीतिक-आर्थिक बहसों में सामने आते रहे हैं, लेकिन ऐतिहासिक आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि स्वतंत्रता के समय भारत और अमेरिका आर्थिक रूप से बराबर स्थिति में नहीं थे। अमेरिका की अर्थव्यवस्था पहले से थी कहीं बड़ी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे मजबूत औद्योगिक और वित्तीय शक्तियों में शामिल था। इसके विपरीत भारत 1947 में औपनिवेशिक शासन से बाहर आया था और देश के सामने गरीबी, कम औद्योगिक उत्पादन, सीमित बिजली व्यवस्था, कमजोर स्वास्थ्य सुविधाएं और कम साक्षरता जैसी बड़ी चुनौतियां थीं। प्रति व्यक्ति आय में भी था बड़ा अंतर भारत और अमेरिका के बीच अंतर केवल कुल अर्थव्यवस्था का नहीं था। प्रति व्यक्ति आय और उत्पादकता के मामले में भी अमेरिका भारत से काफी आगे था। इसलिए दोनों देशों को 1947 में आर्थिक रूप से बराबर बताना ऐतिहासिक आंकड़ों का सरलीकरण माना जाएगा। रुपये और डॉलर की बराबरी का दावा भी विवादित सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि 1947 में एक रुपया और एक डॉलर बराबर थे। लेकिन ऐतिहासिक विनिमय दर से जुड़े उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि ऐसा सीधा 1:1 संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता। उस समय भारतीय रुपया ब्रिटिश पाउंड से जुड़ी मौद्रिक व्यवस्था के तहत चलता था। फिर भारत पीछे क्यों दिखाई दिया? आजादी के बाद भारत ने नियोजित अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र और आयात नियंत्रण आधारित मॉडल अपनाया। इस मॉडल के समर्थकों का कहना है कि इससे औद्योगिक आधार और सार्वजनिक संस्थान खड़े करने में मदद मिली, जबकि आलोचकों का तर्क है कि लाइसेंस-परमिट व्यवस्था, सीमित प्रतिस्पर्धा और धीमे सुधारों ने कई दशकों तक आर्थिक वृद्धि को सीमित किया। 1991 के बाद बदली आर्थिक दिशा 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने उदारीकरण, निजी निवेश और वैश्विक व्यापार के लिए अर्थव्यवस्था को ज्यादा खोला। इसके बाद सेवा क्षेत्र, IT, विनिर्माण, विदेशी निवेश और निर्यात में तेजी आई और भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ। सवाल तुलना का नहीं, विकास की गति का विशेषज्ञों के अनुसार असली सवाल यह नहीं है कि भारत 1947 में अमेरिका के बराबर था या नहीं, बल्कि यह है कि अलग-अलग दशकों में भारत की विकास दर, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और उत्पादकता कैसे बदली। भारत ने स्वतंत्रता के बाद बुनियादी ढांचे, कृषि, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास के कई संकेतकों में अभी भी विकसित अर्थव्यवस्थाओं से अंतर बना हुआ है। ऐतिहासिक तुलना में संदर्भ जरूरी 1947 के भारत की तुलना आज के भारत या तत्कालीन अमेरिका से करते समय जनसंख्या, युद्धोत्तर आर्थिक संरचना, औपनिवेशिक विरासत और अलग-अलग विकास मॉडल को ध्यान में रखना जरूरी है। बिना इन संदर्भों के “भारत अमेरिका के बराबर था” जैसा दावा अधूरा और भ्रामक तस्वीर पेश कर सकता है। source – भारत सरकार के संसदीय रिकॉर्ड / ऐतिहासिक आर्थिक आंकड़े / World Bank संदर्भ जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये पर फिर दबाव, डॉलर के मुकाबले 96 के करीब पहुंचने की आशंका; कच्चे तेल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का असर

मुंबई: भारतीय रुपया एक बार फिर दबाव में है और 1 अक्टूबर 2026 के कारोबार में डॉलर के मुकाबले 95.96 से 95.98 के आसपास खुलने का अनुमान जताया गया। एक दिन पहले रुपया 95.83 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। ऊंची कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी और मजबूत डॉलर रुपये पर दबाव बढ़ा रहे हैं। बाजार की नजर इस बात पर भी है कि Reserve Bank of India यानी RBI 96 के स्तर के आसपास कितनी मजबूती से हस्तक्षेप करता है। 96 के स्तर के करीब पहुंच सकता है रुपया फॉरेक्स बाजार के अनुमान के अनुसार गुरुवार को रुपया 95.96 से 95.98 प्रति डॉलर के दायरे में खुल सकता है। बुधवार को भारतीय मुद्रा ने कुछ सुधार दिखाते हुए 95.83 पर कारोबार बंद किया था, लेकिन वैश्विक संकेत फिर इसके खिलाफ जाते दिखाई दे रहे हैं। कच्चे तेल की कीमतें बनी सबसे बड़ी चिंता भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर डॉलर की मांग और रुपये पर पड़ता है। Brent crude में बुधवार को करीब 2 फीसदी की तेजी आई, जबकि सितंबर में तेल की कीमतों में लगभग 14 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊंचा तेल आयात बिल रुपये पर अतिरिक्त दबाव पैदा करता है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल अमेरिका की 10 साल की Treasury yield 2007 के बाद के उच्च स्तरों के करीब पहुंच गई है। ऊंची अमेरिकी यील्ड से डॉलर आधारित assets निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं, जिससे emerging markets की currencies पर दबाव बढ़ता है। डॉलर इंडेक्स भी तीन महीने के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। Fed से राहत की उम्मीद भी रुपये को नहीं संभाल पा रही अमेरिकी Federal Reserve द्वारा अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ाने की संभावना पिछले एक सप्ताह में घटी है। इसके बावजूद रुपये को ज्यादा राहत नहीं मिली क्योंकि बाजार का फोकस फिलहाल तेल की कीमतों और लंबी अवधि की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर अधिक है। 29 सितंबर को 96 के पार गया था रुपया भारतीय मुद्रा हाल ही में 96 प्रति डॉलर का स्तर पार कर चुकी है। 29 सितंबर को रुपया कारोबार के दौरान 96.1450 प्रति डॉलर तक गिरा था, जो लगभग दो महीने का निचला स्तर था। बाद में RBI के संभावित हस्तक्षेप से नुकसान कुछ कम हुआ। RBI के हस्तक्षेप पर बाजार की नजर मार्केट डीलर्स के अनुसार सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री को RBI के संभावित हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। हाल के सत्रों में 96 के आसपास रुपये की गिरावट सीमित होती दिखाई दी है, जिससे बाजार में धारणा बनी है कि केंद्रीय बैंक इस स्तर पर अत्यधिक उतार-चढ़ाव नहीं चाहता। हालांकि RBI आमतौर पर किसी निश्चित exchange-rate level को आधिकारिक लक्ष्य घोषित नहीं करता। एक दिन पहले रुपये ने की थी वापसी 30 सितंबर को रुपये ने कमजोरी से वापसी करते हुए 95.83 प्रति डॉलर पर कारोबार बंद किया था। उस दिन कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, एशियाई मुद्राओं में सुधार और संभावित RBI intervention ने भारतीय मुद्रा को समर्थन दिया था। विदेशी निवेश की निकासी भी बढ़ा रही दबाव भारतीय बाजारों से विदेशी पूंजी की निकासी भी रुपये के लिए चुनौती बनी हुई है। तेल की ऊंची कीमतें, मजबूत डॉलर और वैश्विक बॉन्ड बाजार में बढ़ती यील्ड विदेशी निवेशकों के risk appetite को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे emerging markets से पूंजी बाहर जाने का खतरा बढ़ता है। भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है असर अगर रुपया कमजोर रहता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का आयात बिल महंगा हो सकता है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों, औद्योगिक कच्चे माल और डॉलर में भुगतान किए जाने वाले अन्य आयात पर पड़ सकता है। इससे महंगाई और चालू खाते पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। RBI की अगली मौद्रिक नीति भी अहम बाजार की नजर अब RBI की आगामी Monetary Policy Committee बैठक पर भी है। कुछ वित्तीय संस्थानों का अनुमान है कि ऊंची तेल कीमतों और महंगाई जोखिम को देखते हुए केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर सख्त रुख अपना सकता है। हालांकि अंतिम फैसला RBI की MPC ही करेगी। रुपये की आगे की चाल इन संकेतों पर निर्भर आने वाले दिनों में रुपये की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर इंडेक्स, विदेशी निवेश प्रवाह और RBI की बाजार में गतिविधियों पर निर्भर करेगी। फिलहाल 96 प्रति डॉलर का स्तर बाजार के लिए अहम बना हुआ है और इसमें होने वाली हलचल पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। source – Reuters / The Economic Times / Financial Times जय राष्ट्र न्यूज़

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India की Net Direct Tax Collection 13% बढ़कर ₹12.12 लाख करोड़ पहुंची; Advance Tax Collection में भी मजबूत बढ़त

नई दिल्ली: भारत की Net Direct Tax Collection चालू वित्त वर्ष 2026-27 में मजबूत बढ़त दर्ज करते हुए 17 September तक ₹12.12 लाख करोड़ पहुंच गई है। पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले इसमें करीब 13% की वृद्धि हुई है। Central Board of Direct Taxes यानी CBDT के provisional data के मुताबिक, corporate tax और advance tax collections में बढ़ोतरी ने कुल direct tax revenue को support किया है। Net Direct Tax Collection ₹12.12 लाख करोड़ 1 April से 17 September 2026 के बीच सरकार का net direct tax collection ₹12,12,410.71 करोड़ रहा। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह करीब ₹10,73,272 करोड़ था। इस तरह year-on-year basis पर net direct tax revenue में 12.96% की वृद्धि दर्ज की गई। Gross Collection ₹14.32 लाख करोड़ के पार Refunds से पहले सरकार का Gross Direct Tax Collection भी मजबूत रहा। यह करीब 15.19% बढ़कर ₹14.32 लाख करोड़ पहुंच गया, जबकि पिछले साल समान अवधि में यह लगभग ₹12.44 लाख करोड़ था। Direct taxes में मुख्य रूप से corporate tax, non-corporate income tax और Securities Transaction Tax यानी STT शामिल हैं। Corporate Tax Collection में करीब 19.5% की बढ़त Refunds को adjust करने के बाद Corporate Tax Collection करीब 19.48% बढ़कर ₹5.56 लाख करोड़ हो गई। वहीं individuals, Hindu Undivided Families और अन्य non-corporate taxpayers से मिलने वाला Non-Corporate Tax Collection लगभग 6% बढ़कर ₹6.16 लाख करोड़ से अधिक रहा। Advance Tax Collection ₹5.22 लाख करोड़ Tax collection में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण Advance Tax Collection में मजबूत growth रही। 17 September तक advance tax mop-up करीब 16.18% बढ़कर ₹5.22 लाख करोड़ रहा। इसमें corporate advance tax करीब ₹4.16 लाख करोड़ और non-corporate advance tax लगभग ₹1.06 लाख करोड़ रहा। Corporate advance tax payments में करीब 18%, जबकि non-corporate advance tax में लगभग 9.24% की वृद्धि दर्ज की गई। STT Collection में 53% की तेज बढ़त Share market transactions से मिलने वाला Securities Transaction Tax (STT) भी तेजी से बढ़ा है। 1 April से 17 September के बीच STT collection करीब 53% बढ़कर ₹40,214 करोड़ पहुंच गया। पिछले साल समान अवधि में यह करीब ₹26,306 करोड़ था। Refunds भी बढ़कर ₹2.20 लाख करोड़ हुए एक तरफ tax collections में वृद्धि हुई है, वहीं taxpayers को जारी किए गए refunds में भी तेजी दर्ज हुई। CBDT के आंकड़ों के मुताबिक, 17 September तक करीब ₹2.20 लाख करोड़ के refunds जारी किए गए, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 29.19% अधिक हैं। FY27 में ₹26.97 लाख करोड़ का Target सरकार ने FY 2026-27 के लिए direct tax collection का target करीब ₹26.97 लाख करोड़ रखा है। यह FY26 में हासिल ₹23.40 लाख करोड़ के collection से लगभग 15% अधिक है। September तक सामने आए आंकड़े बताते हैं कि corporate earnings, advance tax payments और securities transactions से मिलने वाले tax revenue में बढ़ोतरी बनी हुई है। आने वाले महीनों में final direct tax collection पर corporate profitability, personal incomes और overall economic activity का असर रहेगा। Source – CBDT / Reuters / Economic Times / Business Standard जय राष्ट्र न्यूज़

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Crude Oil महंगा होने से Rupee 95.80/$ के करीब; RBI Intervention पर नजर, Brent $107 के आसपास

मुंबई, 15 सितंबर 2026: Indian Rupee पर मंगलवार को फिर दबाव बढ़ गया है। Rising crude oil prices, मजबूत US Dollar और higher US Treasury yields के बीच Rupee 95.80 प्रति Dollar के महत्वपूर्ण स्तर के करीब पहुंचने की आशंका है। Currency traders की नजर Reserve Bank of India (RBI) पर है, जिसने हाल के sessions में इसी zone के आसपास dollar selling के जरिए Rupee की तेज गिरावट को रोकने की कोशिश की थी। 95.80 बना Rupee के लिए Critical Level Forex market participants के मुताबिक ₹95.80/$ Rupee के लिए महत्वपूर्ण technical level माना जा रहा है। अगर currency इस level के पार लगातार कमजोर रहती है, तो Dollar demand बढ़ सकती है और Rupee ₹96 प्रति Dollar की ओर जा सकता है। RBI इससे पहले 95.70–95.80 zone में market intervention करता रहा है। 95.79 का Level Friday को छुआ था 11 September को Rupee 95.70 पर open हुआ था और intraday 95.79/$ तक गिरा, लेकिन suspected RBI intervention और crude prices में कुछ नरमी से losses कम हुए। उस session के अंत में currency करीब 95.55–95.57/$ के स्तर पर बंद हुई थी। Brent Crude करीब $107 प्रति Barrel Tuesday Asian trade में Brent crude करीब $106.93–$107.20 प्रति barrel तक पहुंच गया। Saudi Arabia के energy infrastructure पर attacks और East-West oil pipeline में disruption से global crude supply को लेकर चिंता बढ़ी है। महंगा Crude Rupee के लिए क्यों है चिंता? India अपनी crude oil जरूरतों का बड़ा हिस्सा imports के जरिए पूरा करता है। Oil prices बढ़ने पर Indian refiners और importers को ज्यादा Dollars खरीदने पड़ते हैं। इससे Dollar demand बढ़ती है और Rupee पर depreciation pressure आता है। महंगा crude India के import bill और domestic inflation को भी प्रभावित कर सकता है। RBI पहले कर चुका है Dollar Selling Recent sessions में traders ने RBI की ओर से spot market में Dollar sales और forex swaps की सूचना दी थी। इन interventions का उद्देश्य Rupee में disorderly volatility को रोकना और market liquidity manage करना था। हालांकि RBI आम तौर पर daily forex intervention की तत्काल आधिकारिक पुष्टि नहीं करता है। US Fed Decision पर भी नजर Currency market की नजर अब US Federal Reserve की 15–16 September meeting पर है। Markets में 25 basis points rate hike की संभावना काफी मजबूत हो गई है। Higher US interest rates Dollar को और मजबूत कर सकते हैं, जिससे emerging-market currencies including Rupee पर अतिरिक्त pressure पड़ सकता है। source – Reuters / Business Standard / RBI Market Data जय राष्ट्र न्यूज़

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भारत की 7.8% GDP Growth पर छिड़ी बड़ी बहस, दो पूर्व Chief Economic Advisers आमने-सामने

नई दिल्ली, 5 सितंबर 2026: भारत की पहली तिमाही की 7.8% वास्तविक GDP growth को लेकर आर्थिक बहस तेज हो गई है। पूर्व Chief Economic Adviser Arvind Subramanian ने सरकारी आंकड़ों की transparency और credibility पर सवाल उठाए हैं, जबकि एक अन्य पूर्व CEA K.V. Subramanian ने आंकड़ों का बचाव करते हुए वैकल्पिक 2.6% growth estimate को गलत बताया है। Q1 में 7.8% बढ़ी भारत की अर्थव्यवस्था Ministry of Statistics and Programme Implementation के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक FY 2026-27 की April-June quarter में real GDP बढ़कर ₹81.36 लाख करोड़ रही, जो पिछले साल की समान अवधि के ₹75.46 लाख करोड़ से 7.8% अधिक है। Nominal GDP growth 10.3% दर्ज की गई। Arvind Subramanian ने उठाए transparency पर सवाल Arvind Subramanian ने माना कि भारतीय अर्थव्यवस्था में activity बेहतर हुई है, लेकिन उन्होंने कहा कि 7.8% growth की magnitude को लेकर सरकार को ज्यादा स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। उन्होंने GDP methodology और पुराने आंकड़ों में हुए revisions पर अधिक transparency की मांग की। ‘2.6% वाला calculation technically flawed’ हालांकि Arvind Subramanian ने पूर्व Finance Secretary Subhash Chandra Garg के उस calculation से भी असहमति जताई जिसमें growth को करीब 2.6% बताया गया था। उनके अनुसार इसमें old और new GDP series की तुलना की गई, जो technically सही comparison नहीं है। K.V. Subramanian ने 7.8% आंकड़े का किया बचाव पूर्व CEA K.V. Subramanian ने 2.6% growth वाले दावे को “absolutely bogus” बताते हुए कहा कि अलग-अलग GDP series के आंकड़ों की तुलना करना गलत है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध economic indicators broadly मजबूत growth को support करते हैं। Investment, credit और construction के आंकड़ों का दिया हवाला K.V. Subramanian ने capital expenditure, bank credit, capital goods production और construction activity में मजबूत growth का हवाला देते हुए कहा कि ये indicators 2.6% जैसी कमजोर GDP growth से मेल नहीं खाते। सरकार के official factsheet के मुताबिक Q1 में investment 11.9%, household consumption 7.1% और exports 12% बढ़े। GDP series बदलने से क्यों बढ़ी बहस? भारत ने GDP calculation के लिए नया 2022-23 base year अपनाया है। नई methodology के तहत पुराने GDP estimates में revisions हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि इन revisions की वजह और methodology ज्यादा साफ तरीके से समझाई जानी चाहिए, जबकि सरकार का कहना है कि revised system economy की मौजूदा structure को बेहतर तरीके से capture करता है। एक बात पर दोनों economists सहमत तेज मतभेद के बावजूद Arvind Subramanian और K.V. Subramanian दोनों ने GDP calculation की methodology, underlying data और revisions को लेकर अधिक स्पष्टता और transparency की जरूरत पर सहमति जताई। source – India Today / Ministry of Statistics & Programme Implementationजय राष्ट्र न्यूज़

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India Forex Reserves में बड़ी बढ़ोतरी, एक सप्ताह में $9 Billion से ज्यादा का उछाल

नई दिल्ली: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 14 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का Forex Reserve बढ़कर करीब 716.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया। एक सप्ताह के भीतर इसमें करीब 10 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है और विदेशी मुद्रा भंडार अब लगभग छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में यह तेजी ऐसे समय आई है जब वैश्विक बाजारों में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रुपये पर दबाव को लेकर चिंता बनी हुई है। Forex Reserve बढ़कर $716.9 Billion रिपोर्ट के मुताबिक 14 अगस्त तक भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 716.9 अरब डॉलर हो गया। पिछले सप्ताह की तुलना में इसमें लगभग 10 अरब डॉलर का उछाल देखने को मिला। इस बढ़ोतरी के पीछे विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों यानी Foreign Currency Assets (FCA) और सोने के भंडार में हुई वृद्धि की बड़ी भूमिका रही। विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक मजबूती के महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक माना जाता है। इसका इस्तेमाल विदेशी भुगतान, आयात और मुद्रा बाजार में जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप के लिए किया जा सकता है। Foreign Currency Assets में $7.2 Billion की बढ़ोतरी भारत के Forex Reserve का सबसे बड़ा हिस्सा Foreign Currency Assets होता है। ताजा आंकड़ों में FCA में करीब 7.2 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। FCA में अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और जापानी येन जैसी दूसरी प्रमुख मुद्राओं में रखी गई परिसंपत्तियां भी शामिल होती हैं। अलग-अलग मुद्राओं की कीमत में बदलाव होने के कारण डॉलर में व्यक्त किए जाने वाले FCA के मूल्य में भी उतार-चढ़ाव हो सकता है। Gold Reserves ने भी दिया बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा भंडार में इस सप्ताह आई बढ़ोतरी में सोने का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा। भारत के Gold Reserves के मूल्य में करीब 2.7 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई। FCA और Gold Reserves में हुई मजबूत बढ़ोतरी ने कुल Forex Reserve को छह महीने के उच्च स्तर तक पहुंचाने में मदद की। भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में Foreign Currency Assets और Gold के साथ Special Drawing Rights (SDR) तथा International Monetary Fund में भारत की Reserve Tranche Position भी शामिल होती है। 7 सप्ताह में करीब $50 Billion बढ़ा भंडार भारत के Forex Reserve में पिछले कुछ सप्ताह से लगातार मजबूत बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक करीब सात सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 50 अरब डॉलर बढ़ चुका है। अब भारत का Forex Reserve अपने रिकॉर्ड स्तर के भी काफी करीब पहुंच गया है। भारत का अब तक का उच्चतम विदेशी मुद्रा भंडार करीब 728.5 अरब डॉलर रहा है, जो फरवरी 2026 में दर्ज किया गया था। मौजूदा $716.9 billion का स्तर इस रिकॉर्ड से लगभग $11.6 billion कम है। RBI के कदमों से बढ़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह विदेशी मुद्रा भंडार में आई तेजी के पीछे Reserve Bank of India की हालिया नीतियों को भी अहम माना जा रहा है। RBI ने जून में विदेशी उधारी और विदेशी मुद्रा जमा को आकर्षक बनाने के लिए कुछ उपाय किए थे। इनमें overseas borrowings के लिए discounted hedging तथा बैंकों द्वारा विदेशी मुद्रा जमा जुटाने से जुड़े प्रोत्साहन शामिल थे। इन उपायों के जरिए 13 अगस्त तक करीब 57 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आकर्षित होने की जानकारी सामने आई। मजबूत डॉलर inflows के बाद RBI ने विदेशी मुद्रा जमा से जुड़ी अपनी एक hedging सुविधा को तय समय से पहले समाप्त करने का फैसला भी किया है। Rupee के लिए क्यों महत्वपूर्ण है बड़ा Forex Reserve? मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार RBI को मुद्रा बाजार में रुपये की अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा क्षमता देता है। हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव के कारण रुपये पर दबाव देखा गया है। 21 अगस्त को रुपया करीब 95.69 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ और सप्ताह के दौरान लगभग 0.3 प्रतिशत कमजोर हुआ। बाजार में RBI के हस्तक्षेप ने रुपये को 96 प्रति डॉलर के स्तर से नीचे जाने से रोकने में मदद की। हालांकि Forex Reserve का इस्तेमाल किसी निश्चित exchange rate को बनाए रखने की गारंटी नहीं देता, लेकिन बड़ा भंडार बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच माना जाता है। अर्थव्यवस्था के लिए क्या संकेत? Forex Reserve में लगातार बढ़ोतरी भारत की external financial position के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा सकती है। इससे देश को महंगे आयात, अंतरराष्ट्रीय भुगतान और विदेशी पूंजी के अचानक बाहर जाने जैसी परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सकती है। साथ ही बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार निवेशकों के बीच देश की भुगतान क्षमता और आर्थिक स्थिरता को लेकर भरोसा मजबूत करने में भी भूमिका निभाता है। फिलहाल भारत का Forex Reserve 716.9 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है और अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड के करीब है। आने वाले सप्ताहों में विदेशी निवेश प्रवाह, कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की चाल और RBI की नीतियां यह तय करने में अहम होंगी कि विदेशी मुद्रा भंडार में यह तेजी आगे भी जारी रहती है या नहीं। स्रोत – रॉयटर्स, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जय राष्ट्र न्यूज़

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RBI की 19 अगस्त को आने वाली MPC मिनट्स पर बाजार की नजर, ब्याज दर और महंगाई के संकेतों का इंतजार

मुंबई: भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार की नजर अब 19 अगस्त 2026 को जारी होने वाली RBI Monetary Policy Committee (MPC) की बैठक की मिनट्स पर है। निवेशक यह समझने की कोशिश करेंगे कि केंद्रीय बैंक आने वाले महीनों में ब्याज दर, महंगाई और मौद्रिक नीति को लेकर किस दिशा में आगे बढ़ सकता है। RBI ने हालिया बैठक में रेपो रेट 5.25% पर रखा RBI की 3 से 5 अगस्त को हुई MPC बैठक में समिति ने रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखने का फैसला किया था। MPC ने लगातार चौथी बैठक में दरों में बदलाव नहीं किया और अपना रुख Neutral बनाए रखा। अब बाजार की नजर मिनट्स पर इसलिए है क्योंकि इसमें MPC के छह सदस्यों के विचारों और भविष्य की नीति को लेकर उनके आकलन से आगे की दिशा के संकेत मिल सकते हैं। महंगाई पर भी निवेशकों की नजर जुलाई 2026 में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 4.45% हो गई, जो RBI के 4% मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर है। हालांकि यह अभी भी RBI की 2-6% सहनशीलता सीमा के भीतर है। खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी ने कुल CPI को ऊपर खींचा है। ऐसे में निवेशक यह देखना चाहेंगे कि MPC सदस्य महंगाई में हालिया तेजी को अस्थायी मानते हैं या आने वाले महीनों के लिए इसे बड़ा जोखिम समझते हैं। अगली ब्याज दर नीति के संकेत मिल सकते हैं हालिया बैठक में RBI ने रेपो रेट में बदलाव नहीं किया था। अब MPC मिनट्स से बाजार को यह संकेत मिलने की उम्मीद है कि मौजूदा परिस्थितियों में आगे दरों में कटौती, लंबे समय तक यथास्थिति या भविष्य में दरों में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर सदस्यों की सोच क्या है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई, कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां आगे की नीति के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। रुपये और बॉन्ड बाजार पर भी असर MPC मिनट्स का असर केवल ब्याज दरों पर ही नहीं बल्कि रुपये और सरकारी बॉन्ड यील्ड पर भी पड़ सकता है। भारतीय रुपया हाल में डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा है। RBI के हस्तक्षेप ने गिरावट को सीमित किया है, जबकि पश्चिम एशिया में तनाव और ऊंची तेल कीमतें रुपये के लिए चुनौती बनी हुई हैं। वहीं बॉन्ड बाजार में निवेशक यह देख रहे हैं कि RBI की नीति आगे चलकर liquidity और ब्याज दरों को किस तरह प्रभावित कर सकती है। अमेरिका-ईरान तनाव भी अहम फैक्टर बाजार के लिए RBI की नीति के साथ-साथ अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतें भी महत्वपूर्ण हैं। तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी भारत के आयात बिल और महंगाई दोनों पर दबाव डाल सकती है। इसी वजह से MPC मिनट्स में वैश्विक जोखिमों और महंगाई के बीच RBI के आकलन पर बाजार की खास नजर रहेगी। निवेशकों की नजर इन संकेतों पर 19 अगस्त को जारी होने वाली मिनट्स में बाजार मुख्य रूप से इन बातों पर ध्यान देगा: निष्कर्ष 19 अगस्त की RBI MPC मिनट्स बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत साबित हो सकती हैं। रेपो रेट फिलहाल 5.25% पर है, लेकिन जुलाई की 4.45% महंगाई और पश्चिम एशिया से जुड़े जोखिमों के बीच निवेशक यह जानना चाहते हैं कि RBI आने वाले महीनों में ब्याज दरों को लेकर कितना सतर्क रहेगा। Source: Reuters, RBI-related reports, NDTV Profit, Economic Times जय राष्ट्र न्यूज़

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अंतरराष्ट्रीय | US–India Trade Tension: रूस से तेल खरीद पर भारत पर 100% तक टैरिफ का खतरा, अमेरिकी सीनेट के कदम से बढ़ा व्यापारिक तनाव

नई दिल्ली: अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव के बीच रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर संभावित 100% तक अतिरिक्त टैरिफ का मुद्दा शनिवार, 8 अगस्त 2026 को अंतरराष्ट्रीय व्यापार चर्चा में प्रमुख बना हुआ है। अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़े एक विधेयक को 86-11 वोटों से मंजूरी दी है, जिसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत पर 100% टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। विधेयक को आगे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया से गुजरना होगा और इसके बाद राष्ट्रपति के स्तर पर इसके इस्तेमाल का फैसला होगा। अमेरिकी सीनेट ने रूस प्रतिबंध विधेयक को दी मंजूरी अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act को मंजूरी दी। रिपोर्टों के अनुसार, विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति दे सकता है। विधेयक का उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा आय को सीमित करना बताया जा रहा है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदार इस प्रस्ताव के संभावित प्रभाव के दायरे में आ सकते हैं। भारत पर सीधे 100% टैरिफ अभी नहीं लगा है इस घटनाक्रम को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 100% टैरिफ की खबर को तत्काल लागू शुल्क के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जाना है। रिपोर्टों के अनुसार, सदन की अगली प्रक्रिया अगस्त के अंत में होने की उम्मीद है। कानून बनने के बाद भी टैरिफ लगाने का फैसला अमेरिकी प्रशासन के अधिकार और नीति पर निर्भर करेगा। रूस से तेल खरीद बना भारत-अमेरिका विवाद का केंद्र यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना जारी रखा है। रूस से मिलने वाले तेल की कीमत और भारत की रिफाइनिंग क्षमता के कारण यह खरीद देश की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। अमेरिका रूस की ऊर्जा आय को युद्ध से जोड़कर देखता है और प्रमुख खरीदार देशों पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसी वजह से भारत की रूसी तेल खरीद अब भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा बन गई है। भारतीय निर्यातकों के लिए बढ़ सकती है चिंता यदि भविष्य में अमेरिका भारत के उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है, तो इसका सीधा असर अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की कीमत और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ सकता है। अमेरिका भारतीय निर्यात के लिए एक बड़ा बाजार है। इसलिए भारी अतिरिक्त शुल्क की स्थिति में कपड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, रत्न-जवाहरात, रसायन और अन्य अमेरिकी बाजार-निर्भर क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। भारतीय शेयर बाजार और रुपये पर भी नजर अमेरिकी टैरिफ की आशंका के बीच भारतीय निवेशकों की नजर सोमवार को खुलने वाले शेयर बाजार पर रहेगी। खासतौर पर ऐसी कंपनियां जिनका अमेरिका को निर्यात ज्यादा है, उनके शेयरों पर बाजार की प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, रूस से तेल खरीद में किसी बड़े व्यवधान की स्थिति में भारत के लिए वैकल्पिक स्रोतों से कच्चा तेल खरीदने की जरूरत बढ़ सकती है। इससे आयात बिल, रुपये और महंगाई पर भी असर पड़ने की संभावना होगी। तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है असर रूस दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में शामिल है। यदि प्रतिबंधों के कारण रूसी तेल के अंतरराष्ट्रीय प्रवाह में बड़ी बाधा आती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बन सकता है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी से भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर असर पड़ सकता है। भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार के बीच संतुलन की चुनौती भारत के लिए यह मामला केवल अमेरिका के साथ व्यापार का नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ा है। एक ओर भारत को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराने वाले स्रोतों की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध भी भारतीय निर्यात और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में सरकार के सामने दोनों हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी। अब आगे क्या होगा? अब सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक की स्थिति होगी। इसके बाद यह भी देखा जाएगा कि अमेरिकी प्रशासन इस कानून का इस्तेमाल किस तरह करता है और किन देशों को संभावित अतिरिक्त टैरिफ के दायरे में रखा जाता है। भारत की ओर से भी इस घटनाक्रम पर कूटनीतिक और व्यापारिक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल बाजार और कारोबारी वर्ग किसी तत्काल 100% शुल्क के बजाय आगे की अमेरिकी विधायी प्रक्रिया और भारत की प्रतिक्रिया पर नजर रखे हुए हैं। निष्कर्ष रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर 100% तक संभावित अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए नई चुनौती बनकर सामने आया है। अमेरिकी सीनेट द्वारा रूस प्रतिबंध विधेयक को 86-11 वोटों से मंजूरी दिए जाने के बाद भारतीय कारोबार और बाजारों में चिंता बढ़ी है। हालांकि, भारत पर 100% टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। विधेयक को आगे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया से गुजरना है। आने वाले दिनों में अमेरिकी संसद की कार्रवाई, व्हाइट हाउस का रुख और भारत की कूटनीतिक प्रतिक्रिया इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी। Source: Reuters, Economic Times, Hindustan Times, Times of India जय राष्ट्र न्यूज़

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जुलाई में FPI निवेश ₹42,000 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा, बाजार की नजर अब कॉर्पोरेट नतीजों पर

मुंबई: भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों (Foreign Portfolio Investors – FPI) का भरोसा लगातार मजबूत होता दिख रहा है। जुलाई 2026 में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) ₹42,000 करोड़ के पार पहुंच गया है, जो इस वर्ष का सबसे बड़ा मासिक निवेश माना जा रहा है। मजबूत आर्थिक संकेतकों, स्थिर घरेलू मांग और वैश्विक निवेशकों के बढ़ते विश्वास ने भारतीय बाजार को आकर्षक बनाया है। (timesofindia.indiatimes.com) विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार विदेशी निवेश से बाजार में सकारात्मक माहौल बना हुआ है। हालांकि आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अब Q1 (पहली तिमाही) के कॉर्पोरेट नतीजों पर रहेगी, जो बाजार की अगली दिशा तय कर सकते हैं। क्यों बढ़ा विदेशी निवेश? विश्लेषकों का मानना है कि FPI निवेश बढ़ने के पीछे कई प्रमुख कारण हैं— इन कारणों से विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। अब कॉर्पोरेट नतीजों पर नजर जुलाई के अंतिम सप्ताह में कई बड़ी सूचीबद्ध कंपनियां अपने पहली तिमाही (Q1 FY27) के वित्तीय परिणाम घोषित करेंगी। निवेशक विशेष रूप से इन क्षेत्रों के प्रदर्शन पर नजर रख रहे हैं— यदि कंपनियों के नतीजे बाजार की उम्मीदों के अनुरूप रहते हैं, तो निवेशकों का विश्वास और मजबूत हो सकता है। बाजार के लिए आगे क्या? बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी निवेश का मजबूत प्रवाह भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है। हालांकि वैश्विक ब्याज दरों, कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक घटनाक्रमों पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी। निवेशकों के लिए सलाह विशेषज्ञ निवेशकों को केवल अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के आधार पर निर्णय लेने के बजाय कंपनियों के मूलभूत प्रदर्शन, आय वृद्धि और दीर्घकालिक संभावनाओं को ध्यान में रखकर निवेश करने की सलाह दे रहे हैं। निष्कर्ष जुलाई में ₹42,000 करोड़ से अधिक का विदेशी निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था और पूंजी बाजार में वैश्विक भरोसे का संकेत है। अब बाजार की अगली चाल काफी हद तक Q1 कॉर्पोरेट नतीजों और कंपनियों के भविष्य के मार्गदर्शन पर निर्भर करेगी। Source: National Securities Depository Limited (NSDL) | Times of India | Market Experts जय राष्ट्र न्यूज़

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