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रुपये को संभालने के लिए RBI की रणनीति में बदलाव, डॉलर की बिक्री के साथ ब्याज दरों पर भी जोर

मुंबई, 17 अक्टूबर 2026: भारतीय रुपये पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब केवल डॉलर की बिक्री और विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप पर निर्भर नहीं दिख रहा है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक परिस्थितियों को सावधानीपूर्वक सख्त करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसमें ब्याज दरों में बढ़ोतरी, बाजार में उपलब्ध नकदी कम करना और बॉन्ड की बिक्री जैसे उपाय शामिल हैं। इसका उद्देश्य महंगाई पर नियंत्रण के साथ-साथ पूंजी के बाहर जाने और रुपये की कमजोरी को सीमित करना है। चार साल बाद बढ़ाई गई ब्याज दर अक्टूबर में RBI ने नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की। यह चार साल में पहली दर वृद्धि बताई गई है। इसके अलावा, बैंकिंग प्रणाली में उपलब्ध नकदी कम करने के लिए बॉन्ड बिक्री और रिजर्व से जुड़े उपाय भी अपनाए गए हैं। इन कदमों से वित्तीय परिस्थितियों को सख्त करने और रुपये को समर्थन देने की कोशिश की जा रही है। 2026 में करीब 6% कमजोर हुआ रुपया इस साल भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 6% कमजोर हुआ है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी और डॉलर की बढ़ती मांग ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि, RBI के हालिया कदमों के बाद रुपया अपने निचले स्तर से करीब 2% उबरने में कामयाब रहा है। केवल डॉलर बेचने से नहीं बनेगी बात? रुपये की गिरावट को थामने के लिए RBI विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाता रहा है। हालांकि, लगातार हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल विभिन्न विदेशी मुद्रा उपायों के तहत RBI करीब 150 अरब डॉलर तक का इस्तेमाल कर चुका है। ऐसे में ब्याज दरों और नकदी प्रबंधन से जुड़े उपाय रुपये को समर्थन देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। दिसंबर में फिर बढ़ सकती हैं ब्याज दरें? सितंबर में महंगाई दर 5.54% तक पहुंचने के बाद दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी को लेकर बाजार में चर्चा तेज हुई है। कुछ विश्लेषक 50 बेसिस पॉइंट तक की सख्ती की संभावना जता रहे हैं। हालांकि, RBI ने दिसंबर में ऐसी किसी बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से निकाले 33 अरब डॉलर रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 33 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। घरेलू ब्याज दरें और यील्ड बढ़ने से रुपये में निवेश की आकर्षकता बढ़ सकती है। इससे पूंजी की निकासी पर अंकुश लगाने में मदद मिलने की संभावना है, हालांकि निवेशकों के फैसले वैश्विक परिस्थितियों और बाजार की धारणा पर भी निर्भर करेंगे। ज्यादा सख्ती से अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी रुपये को सहारा दे सकती है, लेकिन इसके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। कर्ज महंगा होने से कारोबार, आवास ऋण लेने वालों और छोटे कर्जदारों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से RBI के सामने रुपये को स्थिर रखने, महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने और आर्थिक विकास को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक फिलहाल 2013 जैसी अचानक और तीखी आपातकालीन सख्ती के बजाय सावधानीपूर्वक कदम उठाने की रणनीति अपनाता दिख रहा है। स्रोत: Reuters जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये को संभालने के लिए RBI का बड़ा कदम, सरकारी तेल कंपनियों के लिए स्पेशल डॉलर विंडो; फॉरेक्स सट्टेबाजी पर भी सख्ती

मुंबई: भारतीय रुपये पर लगातार बने दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 10 अक्टूबर 2026 को कई अहम कदमों की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम की दैनिक डॉलर जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष डॉलर विंडो शुरू करने का फैसला किया है। इसके साथ ही रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन के नियम भी सख्त किए गए हैं, ताकि डॉलर की सट्टा मांग और जरूरत से ज्यादा हेजिंग पर अंकुश लगाया जा सके। 12 अक्टूबर से शुरू होगी स्पेशल डॉलर विंडो RBI की नई सुविधा 12 अक्टूबर से प्रभावी होगी। इसके तहत तीनों सरकारी तेल विपणन कंपनियों की दैनिक डॉलर जरूरत नामित बैंकों के माध्यम से सीधे केंद्रीय बैंक पूरी करेगा। यह व्यवस्था बाजार की परिस्थितियों के आधार पर अगले आदेश तक जारी रहेगी। इस कदम का उद्देश्य तेल कंपनियों की डॉलर खरीद के कारण स्पॉट फॉरेक्स बाजार पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करना है। किन कंपनियों को मिलेगा फायदा? RBI की इस विशेष सुविधा का लाभ फिलहाल तीन सरकारी तेल कंपनियों को मिलेगा: इन कंपनियों को कच्चे तेल के आयात का भुगतान करने के लिए बड़ी मात्रा में अमेरिकी डॉलर की जरूरत होती है। डॉलर की मांग बढ़ने पर रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। स्पॉट फॉरेक्स बाजार पर कम हो सकता है दबाव आमतौर पर तेल कंपनियां अपनी डॉलर जरूरतों को विदेशी मुद्रा बाजार से पूरा करती हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर आयात बिल बढ़ता है और कंपनियों को अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं। RBI की नई व्यवस्था से इन तीनों कंपनियों की डॉलर मांग का एक बड़ा हिस्सा सीधे केंद्रीय बैंक के जरिए पूरा होगा। इससे खुले बाजार में डॉलर की अतिरिक्त मांग कम करने और रुपये में उतार-चढ़ाव नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। डॉलर के मुकाबले रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव? 2026 में अब तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 7 प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है। इसके पीछे कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, विदेशी निवेशकों की निकासी और आयातकों की लगातार डॉलर मांग जैसे कारक बताए जा रहे हैं। हाल के दिनों में रुपया 97 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गया था। इससे आयात की लागत और विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ीं। फॉरेक्स डेरिवेटिव के नियम भी सख्त रुपये को सहारा देने के लिए RBI ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार के नियमों में भी बदलाव किए हैं। इन कदमों में रद्द किए गए कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक करने पर प्रतिबंध और बिना वास्तविक विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रमाण दिए जाने वाले डेरिवेटिव सौदों की सीमा घटाना शामिल है। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य वास्तविक कारोबारी जरूरतों के लिए हेजिंग की सुविधा बनाए रखते हुए सट्टेबाजी से पैदा होने वाले अतिरिक्त दबाव को सीमित करना है। 100 मिलियन डॉलर की सीमा घटाकर 5 मिलियन डॉलर रिपोर्टों के अनुसार, कंपनियां अब वास्तविक विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रमाण दिए बिना अधिकतम 5 मिलियन डॉलर तक की फॉरेक्स डेरिवेटिव पोजिशन ले सकेंगी। पहले यह सीमा 100 मिलियन डॉलर थी। इस बदलाव से बिना अंतर्निहित कारोबारी जरूरत के बड़े डेरिवेटिव सौदे करना अधिक सीमित होगा। RBI को उम्मीद है कि इससे रुपये के खिलाफ सट्टा पोजिशन बनाने की गुंजाइश कम होगी। बड़े विदेशी मुद्रा सौदों पर 20 प्रतिशत रिजर्व की शर्त RBI ने कुछ बड़े विदेशी मुद्रा लेनदेन के लिए 20 प्रतिशत नकद रिजर्व की आवश्यकता भी लागू की है। इस कदम का उद्देश्य आक्रामक डॉलर खरीद और सट्टा कारोबार की लागत बढ़ाना है। हालांकि, इस प्रावधान का वास्तविक असर संबंधित नियमों के दायरे और बाजार में कारोबार करने वाली संस्थाओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। आयातकों की हेजिंग में तेज बढ़ोतरी रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में भारतीय आयातकों ने करीब 77 अरब डॉलर की हेजिंग की, जो एक साल पहले की तुलना में 80 प्रतिशत से अधिक थी। वहीं, निर्यातकों की हेजिंग लगभग 41 अरब डॉलर रही। आयातकों और निर्यातकों की हेजिंग में इस अंतर को विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ने और रुपये पर दबाव के प्रमुख कारकों में से एक माना जा रहा है। कच्चे तेल की कीमतें बनीं बड़ी चिंता भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ जाता है और डॉलर की अधिक जरूरत पड़ती है। मध्य पूर्व में तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत हाल में 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी। महंगा तेल भारत के व्यापार संतुलन और रुपये, दोनों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। RBI पहले भी कर चुका है डॉलर बाजार में हस्तक्षेप रुपये को समर्थन देने के लिए RBI पिछले कुछ हफ्तों में स्पॉट डॉलर बिक्री और विदेशी मुद्रा स्वैप जैसे उपायों का इस्तेमाल करता रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, सितंबर में अपने उच्च स्तर से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 50 अरब डॉलर घटकर 734.6 अरब डॉलर रह गया। विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप को इस गिरावट के संभावित कारणों में शामिल किया गया है। रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद भी दबाव बरकरार 7 अक्टूबर को RBI ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, यह लगभग चार वर्षों में पहली दर वृद्धि थी। हालांकि, ब्याज दर बढ़ाने के बावजूद रुपये पर दबाव पूरी तरह कम नहीं हुआ। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने डॉलर की मांग और विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव गतिविधियों को सीधे प्रभावित करने वाले उपायों की घोषणा की। क्या अब मजबूत होगा रुपया? विश्लेषकों के मुताबिक, RBI के नए कदम निकट अवधि में डॉलर की मांग को नियंत्रित करने और रुपये में तेज उतार-चढ़ाव कम करने में मदद कर सकते हैं। सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर जरूरतों को सीधे पूरा करने से स्पॉट बाजार पर दबाव भी घट सकता है। हालांकि, रुपये की दीर्घकालिक दिशा कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेश के प्रवाह, वैश्विक ब्याज दरों और भारत के व्यापार संतुलन जैसे कारकों पर निर्भर करेगी। इसलिए इन उपायों से रुपये में तत्काल और स्थायी मजबूती की…

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रुपया ₹96.39 प्रति डॉलर तक गिरा, crude oil और FII selling का बढ़ा दबाव

मुंबई: भारतीय रुपया मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को शुरुआती कारोबार में कमजोर होकर ₹96.39 प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। घरेलू मुद्रा पर ऊंची crude oil prices, foreign institutional investors (FII) की बिकवाली और मजबूत dollar का दबाव देखने को मिला। शुरुआती सत्र में रुपया अपने पिछले बंद स्तर के मुकाबले कमजोर खुला और डॉलर के मुकाबले और नीचे फिसल गया। शुरुआती कारोबार में ₹96.39 तक पहुंचा रुपया Interbank foreign exchange market में रुपया कमजोरी के साथ खुला। कारोबार के शुरुआती हिस्से में भारतीय मुद्रा गिरकर ₹96.39 प्रति डॉलर तक पहुंच गई, जो हाल के महीनों में रुपये के सबसे कमजोर स्तरों में से एक है। Crude oil की तेजी बनी बड़ी वजह भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा crude oil imports के जरिए पूरा करता है। जब international crude prices बढ़ती हैं तो तेल कंपनियों की dollar demand भी बढ़ती है। इससे foreign exchange market में रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। FII selling ने भी बढ़ाया दबाव Foreign institutional investors की भारतीय equities से निकासी भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह मानी जा रही है। FII selling बढ़ने पर विदेशी निवेशक भारतीय assets बेचकर dollars में funds convert करते हैं, जिससे dollar demand बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव आता है। मजबूत Dollar का असर Global markets में अमेरिकी dollar की मजबूती ने भी emerging-market currencies को प्रभावित किया। US Treasury yields ऊंचे रहने और Federal Reserve की आगे की monetary policy को लेकर uncertainty से dollar को support मिला है। RBI की intervention पर भी नजर Forex traders की नजर Reserve Bank of India की गतिविधियों पर भी बनी हुई है। आमतौर पर रुपये में तेज volatility होने पर RBI state-run banks के जरिए dollar selling करके बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव सीमित करने की कोशिश कर सकता है। Importers के लिए बढ़ सकती है लागत रुपये की कमजोरी का सीधा असर import-dependent sectors पर पड़ सकता है। Crude oil, electronics, machinery और अन्य dollar-denominated imports महंगे होने से कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। महंगाई पर भी पड़ सकता है असर अगर रुपया लंबे समय तक कमजोर रहता है और crude oil prices भी ऊंची बनी रहती हैं, तो imported inflation का खतरा बढ़ सकता है। Fuel और transportation costs में बढ़ोतरी का असर दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है। Exporters को मिल सकता है कुछ फायदा कमजोर रुपया exporters के लिए कुछ हद तक फायदेमंद हो सकता है। IT services, pharmaceuticals और अन्य export-oriented businesses को dollar में होने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर ज्यादा revenue मिल सकता है, हालांकि इसका प्रभाव sector और hedging strategy पर निर्भर करता है। RBI policy पर बाजार की नजर Currency market की नजर RBI की Monetary Policy Committee की बैठक पर भी है। बाजार यह देख रहा है कि inflation, rupee weakness और crude oil prices को देखते हुए RBI interest rates पर क्या रुख अपनाता है। आगे भी volatility की आशंका आने वाले दिनों में रुपये की दिशा crude oil prices, FII flows, dollar index, US bond yields और RBI policy संकेतों पर निर्भर करेगी। Global uncertainty बनी रहने पर forex market में volatility जारी रह सकती है। source – The Times of India / Reuters / PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये पर फिर दबाव, डॉलर के मुकाबले 96 के करीब पहुंचने की आशंका; कच्चे तेल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का असर

मुंबई: भारतीय रुपया एक बार फिर दबाव में है और 1 अक्टूबर 2026 के कारोबार में डॉलर के मुकाबले 95.96 से 95.98 के आसपास खुलने का अनुमान जताया गया। एक दिन पहले रुपया 95.83 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। ऊंची कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी और मजबूत डॉलर रुपये पर दबाव बढ़ा रहे हैं। बाजार की नजर इस बात पर भी है कि Reserve Bank of India यानी RBI 96 के स्तर के आसपास कितनी मजबूती से हस्तक्षेप करता है। 96 के स्तर के करीब पहुंच सकता है रुपया फॉरेक्स बाजार के अनुमान के अनुसार गुरुवार को रुपया 95.96 से 95.98 प्रति डॉलर के दायरे में खुल सकता है। बुधवार को भारतीय मुद्रा ने कुछ सुधार दिखाते हुए 95.83 पर कारोबार बंद किया था, लेकिन वैश्विक संकेत फिर इसके खिलाफ जाते दिखाई दे रहे हैं। कच्चे तेल की कीमतें बनी सबसे बड़ी चिंता भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर डॉलर की मांग और रुपये पर पड़ता है। Brent crude में बुधवार को करीब 2 फीसदी की तेजी आई, जबकि सितंबर में तेल की कीमतों में लगभग 14 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊंचा तेल आयात बिल रुपये पर अतिरिक्त दबाव पैदा करता है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल अमेरिका की 10 साल की Treasury yield 2007 के बाद के उच्च स्तरों के करीब पहुंच गई है। ऊंची अमेरिकी यील्ड से डॉलर आधारित assets निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं, जिससे emerging markets की currencies पर दबाव बढ़ता है। डॉलर इंडेक्स भी तीन महीने के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। Fed से राहत की उम्मीद भी रुपये को नहीं संभाल पा रही अमेरिकी Federal Reserve द्वारा अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ाने की संभावना पिछले एक सप्ताह में घटी है। इसके बावजूद रुपये को ज्यादा राहत नहीं मिली क्योंकि बाजार का फोकस फिलहाल तेल की कीमतों और लंबी अवधि की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर अधिक है। 29 सितंबर को 96 के पार गया था रुपया भारतीय मुद्रा हाल ही में 96 प्रति डॉलर का स्तर पार कर चुकी है। 29 सितंबर को रुपया कारोबार के दौरान 96.1450 प्रति डॉलर तक गिरा था, जो लगभग दो महीने का निचला स्तर था। बाद में RBI के संभावित हस्तक्षेप से नुकसान कुछ कम हुआ। RBI के हस्तक्षेप पर बाजार की नजर मार्केट डीलर्स के अनुसार सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री को RBI के संभावित हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। हाल के सत्रों में 96 के आसपास रुपये की गिरावट सीमित होती दिखाई दी है, जिससे बाजार में धारणा बनी है कि केंद्रीय बैंक इस स्तर पर अत्यधिक उतार-चढ़ाव नहीं चाहता। हालांकि RBI आमतौर पर किसी निश्चित exchange-rate level को आधिकारिक लक्ष्य घोषित नहीं करता। एक दिन पहले रुपये ने की थी वापसी 30 सितंबर को रुपये ने कमजोरी से वापसी करते हुए 95.83 प्रति डॉलर पर कारोबार बंद किया था। उस दिन कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, एशियाई मुद्राओं में सुधार और संभावित RBI intervention ने भारतीय मुद्रा को समर्थन दिया था। विदेशी निवेश की निकासी भी बढ़ा रही दबाव भारतीय बाजारों से विदेशी पूंजी की निकासी भी रुपये के लिए चुनौती बनी हुई है। तेल की ऊंची कीमतें, मजबूत डॉलर और वैश्विक बॉन्ड बाजार में बढ़ती यील्ड विदेशी निवेशकों के risk appetite को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे emerging markets से पूंजी बाहर जाने का खतरा बढ़ता है। भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है असर अगर रुपया कमजोर रहता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का आयात बिल महंगा हो सकता है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों, औद्योगिक कच्चे माल और डॉलर में भुगतान किए जाने वाले अन्य आयात पर पड़ सकता है। इससे महंगाई और चालू खाते पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। RBI की अगली मौद्रिक नीति भी अहम बाजार की नजर अब RBI की आगामी Monetary Policy Committee बैठक पर भी है। कुछ वित्तीय संस्थानों का अनुमान है कि ऊंची तेल कीमतों और महंगाई जोखिम को देखते हुए केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर सख्त रुख अपना सकता है। हालांकि अंतिम फैसला RBI की MPC ही करेगी। रुपये की आगे की चाल इन संकेतों पर निर्भर आने वाले दिनों में रुपये की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर इंडेक्स, विदेशी निवेश प्रवाह और RBI की बाजार में गतिविधियों पर निर्भर करेगी। फिलहाल 96 प्रति डॉलर का स्तर बाजार के लिए अहम बना हुआ है और इसमें होने वाली हलचल पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। source – Reuters / The Economic Times / Financial Times जय राष्ट्र न्यूज़

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6 महीने के निचले स्तर के करीब शेयर बाजार, महंगे कच्चे तेल से Sensex-Nifty पर दबाव

मुंबई: भारतीय शेयर बाजार पर महंगे कच्चे तेल, US-Iran तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और बढ़ती अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का दबाव बना हुआ है। सोमवार की भारी गिरावट के बाद Sensex और Nifty करीब छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गए। 29 सितंबर को भी बाजार की शुरुआत से पहले संकेत कमजोर रहे, जबकि Brent crude करीब $106-$107 प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा। Sensex में 1,124 अंकों की बड़ी गिरावट 28 सितंबर को BSE Sensex 1,124.02 अंक यानी 1.52% गिरकर 72,771.72 पर बंद हुआ। दिनभर बाजार में बिकवाली का दबाव रहा और बैंकिंग, फाइनेंशियल, इंफ्रा, एनर्जी और रियल्टी समेत लगभग सभी प्रमुख सेक्टर लाल निशान में बंद हुए। Nifty 22,800 के नीचे बंद NSE Nifty 50 भी 360.25 अंक यानी 1.56% टूटकर 22,780.25 पर बंद हुआ। इस गिरावट के साथ Nifty करीब छह महीने के निचले स्तर के आसपास पहुंच गया। बाजार पिछले सात सप्ताह से लगातार दबाव में बना हुआ है। महंगा कच्चा तेल बना सबसे बड़ी चिंता भारतीय बाजार के लिए सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की तेजी से आ रहा है। Brent crude सोमवार को एक समय $108 प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया था। 29 सितंबर के शुरुआती कारोबार में भी Brent करीब $106.7 प्रति बैरल पर बना रहा। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमत बढ़ने से देश के import bill, inflation और कंपनियों की लागत पर दबाव पड़ सकता है। US-Iran तनाव का बाजार पर असर अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। Strait of Hormuz की स्थिति और दोनों देशों के बीच बातचीत में गतिरोध के कारण निवेशक जोखिम वाले assets से दूरी बना रहे हैं। इसका असर भारत समेत एशियाई शेयर बाजारों पर दिखाई दे रहा है। सभी प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली सोमवार के कारोबार में सभी प्रमुख sectoral indices गिरावट के साथ बंद हुए। PSU Bank index में करीब 3%, Telecom में लगभग 2.3% की गिरावट दर्ज हुई। Energy, Infrastructure, FMCG, Realty, Private Bank, Metal और Oil & Gas indices भी 1% से ज्यादा कमजोर हुए। Midcap-Smallcap पर भी दबाव बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। Nifty Midcap index करीब 1.6% और Smallcap index लगभग 1.8% गिरा। 190 से ज्यादा शेयरों ने 52-week low को छुआ, जिससे broader market में भी कमजोरी साफ दिखाई दी। विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी Foreign Institutional Investors यानी FIIs की बिकवाली भी बाजार पर दबाव बढ़ा रही है। 28 सितंबर को विदेशी निवेशकों ने करीब ₹5,353 करोड़ के शेयर बेचे, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगभग ₹5,189 करोड़ की खरीदारी की। घरेलू निवेशकों की खरीदारी के बावजूद विदेशी फंडों की लगातार निकासी बाजार की धारणा को कमजोर कर रही है। बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयर टूटे सोमवार की गिरावट में banking और financial stocks का बड़ा योगदान रहा। Bank Nifty करीब 1,108 अंक गिरकर 54,471 के आसपास बंद हुआ। HDFC Bank, ICICI Bank और दूसरे heavyweight शेयरों में कमजोरी से प्रमुख indices पर दबाव बढ़ा। रुपया भी ₹96 प्रति डॉलर के करीब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय रुपये पर भी दिखाई दिया। सोमवार को रुपया कमजोर होकर करीब ₹95.98 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। डॉलर की मजबूती और महंगा crude भारतीय मुद्रा के लिए दोहरी चुनौती बन रहे हैं। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने भी बढ़ाई चिंता US Treasury yields में तेजी से emerging markets पर दबाव बढ़ा है। अमेरिकी 10-year Treasury yield 5.2% से ऊपर पहुंच गई है। ऊंची bond yields के कारण विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी assets ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं, जिससे भारत जैसे emerging markets से capital outflow बढ़ने का खतरा रहता है। 29 सितंबर को भी सतर्क शुरुआत के संकेत 29 सितंबर की सुबह GIFT Nifty ने भारतीय बाजार के लिए लगभग सपाट से कमजोर शुरुआत के संकेत दिए। विश्लेषकों की नजर Nifty के 22,700-22,800 के दायरे पर बनी हुई है। इस स्तर से नीचे कमजोरी बढ़ने पर बाजार में आगे और बिकवाली देखने को मिल सकती है। आगे किन चीजों पर रहेगी नजर? शेयर बाजार की आगे की दिशा मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमत, US-Iran तनाव, विदेशी निवेशकों की गतिविधि और अमेरिकी bond yields पर निर्भर करेगी। यदि Brent crude लंबे समय तक $100 से ऊपर बना रहता है तो भारतीय बाजार के लिए inflation और corporate margins से जुड़ी चिंताएं बनी रह सकती हैं। source – Reuters / Moneycontrol Reuters जय राष्ट्र न्यूज़

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US-Iran तनाव से कच्चा तेल फिर चढ़ा, Brent $106 के करीब; वैश्विक बाजारों की बढ़ी चिंता

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा मध्य पूर्व से तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं ने वैश्विक बाजारों की चिंता फिर बढ़ा दी है। 29 सितंबर 2026 को Brent crude लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में मजबूत होकर करीब 106 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। वहीं WTI crude भी 93 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार करता दिखा। लगातार दूसरे दिन महंगा हुआ कच्चा तेल मंगलवार के शुरुआती कारोबार में Brent crude करीब 105.91 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि बाद के कारोबार में यह 106 डॉलर से ऊपर चला गया। US West Texas Intermediate यानी WTI crude भी बढ़कर करीब 93.32 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता कीमतों को सहारा दे रही है। US-Iran तनाव से बढ़ी चिंता अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव तेल बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है। दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए बातचीत की कोशिशें जारी हैं, लेकिन अभी तक किसी स्थायी समाधान पर सहमति नहीं बन पाई है। हालिया घटनाक्रम के बाद निवेशकों को आशंका है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो मध्य पूर्व से कच्चे तेल की आपूर्ति फिर प्रभावित हो सकती है। Strait of Hormuz पर टिकी दुनिया की नजर वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजर Strait of Hormuz पर बनी हुई है। यह समुद्री मार्ग मध्य पूर्व से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक तेल पहुंचाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में किसी भी तरह की बाधा या सैन्य तनाव से shipping costs बढ़ सकती हैं और crude oil supply पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि इस इलाके से जुड़ी हर नई खबर का असर तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। Middle East से निर्यात में सुधार सितंबर में मध्य पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादकों से crude exports बढ़कर करीब 12.8 million barrels per day पहुंचने के शुरुआती आंकड़े सामने आए हैं। सऊदी अरब और UAE से बढ़ी सप्लाई ने बाजार को कुछ राहत दी है, लेकिन वैकल्पिक shipping arrangements की ऊंची लागत के कारण स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। वैश्विक बाजारों में बढ़ी बेचैनी महंगा तेल केवल energy market तक सीमित नहीं है। इससे दुनिया भर के शेयर बाजारों, currencies और bond markets पर भी दबाव बढ़ रहा है। अमेरिकी 10-year Treasury yield करीब 5.24% तक पहुंच गई है। तेल की बढ़ती कीमतों से inflation फिर तेज होने की आशंका ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। डॉलर हुआ मजबूत मध्य पूर्व में तनाव और अमेरिकी bond yields में तेजी के बीच डॉलर भी मजबूत बना हुआ है। Dollar Index करीब दो महीने के उच्च स्तर के आसपास पहुंच गया है। निवेशक अब अमेरिका के आने वाले inflation और employment data पर नजर रख रहे हैं, क्योंकि इनके आधार पर Federal Reserve की आगे की ब्याज दर नीति का संकेत मिल सकता है। भारत पर भी पड़ सकता है असर भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेश से आयात करता है। ऐसे में crude oil की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने पर देश के import bill, inflation और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। तेल महंगा होने से transport, aviation, logistics और manufacturing कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है। ₹96 प्रति डॉलर के करीब रुपया कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिकी डॉलर की मजबूती के बीच भारतीय रुपया भी दबाव में है। सोमवार को रुपया करीब ₹95.98 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था और बाजार की नजर अब ₹96 के महत्वपूर्ण स्तर पर है। रुपये में तेज गिरावट रोकने के लिए RBI की संभावित दखल पर भी निवेशकों की नजर बनी हुई है। महंगाई बढ़ने का भी खतरा अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो इसका असर ईंधन से लेकर परिवहन और उत्पादन लागत तक दिखाई दे सकता है। इससे कई देशों में inflation पर दबाव बढ़ सकता है और केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो सकता है। अब बातचीत के नतीजों पर नजर तेल बाजार की आगे की दिशा काफी हद तक अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत तथा Strait of Hormuz की स्थिति पर निर्भर करेगी। अगर तनाव कम होता है और तेल की सप्लाई सामान्य होती है तो कीमतों में नरमी आ सकती है। वहीं किसी नए टकराव की स्थिति में crude oil में एक बार फिर तेज उछाल देखने को मिल सकता है। source – Reuters Investing.com Australia जय राष्ट्र न्यूज़

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Crude Oil महंगा होने से Rupee 95.80/$ के करीब; RBI Intervention पर नजर, Brent $107 के आसपास

मुंबई, 15 सितंबर 2026: Indian Rupee पर मंगलवार को फिर दबाव बढ़ गया है। Rising crude oil prices, मजबूत US Dollar और higher US Treasury yields के बीच Rupee 95.80 प्रति Dollar के महत्वपूर्ण स्तर के करीब पहुंचने की आशंका है। Currency traders की नजर Reserve Bank of India (RBI) पर है, जिसने हाल के sessions में इसी zone के आसपास dollar selling के जरिए Rupee की तेज गिरावट को रोकने की कोशिश की थी। 95.80 बना Rupee के लिए Critical Level Forex market participants के मुताबिक ₹95.80/$ Rupee के लिए महत्वपूर्ण technical level माना जा रहा है। अगर currency इस level के पार लगातार कमजोर रहती है, तो Dollar demand बढ़ सकती है और Rupee ₹96 प्रति Dollar की ओर जा सकता है। RBI इससे पहले 95.70–95.80 zone में market intervention करता रहा है। 95.79 का Level Friday को छुआ था 11 September को Rupee 95.70 पर open हुआ था और intraday 95.79/$ तक गिरा, लेकिन suspected RBI intervention और crude prices में कुछ नरमी से losses कम हुए। उस session के अंत में currency करीब 95.55–95.57/$ के स्तर पर बंद हुई थी। Brent Crude करीब $107 प्रति Barrel Tuesday Asian trade में Brent crude करीब $106.93–$107.20 प्रति barrel तक पहुंच गया। Saudi Arabia के energy infrastructure पर attacks और East-West oil pipeline में disruption से global crude supply को लेकर चिंता बढ़ी है। महंगा Crude Rupee के लिए क्यों है चिंता? India अपनी crude oil जरूरतों का बड़ा हिस्सा imports के जरिए पूरा करता है। Oil prices बढ़ने पर Indian refiners और importers को ज्यादा Dollars खरीदने पड़ते हैं। इससे Dollar demand बढ़ती है और Rupee पर depreciation pressure आता है। महंगा crude India के import bill और domestic inflation को भी प्रभावित कर सकता है। RBI पहले कर चुका है Dollar Selling Recent sessions में traders ने RBI की ओर से spot market में Dollar sales और forex swaps की सूचना दी थी। इन interventions का उद्देश्य Rupee में disorderly volatility को रोकना और market liquidity manage करना था। हालांकि RBI आम तौर पर daily forex intervention की तत्काल आधिकारिक पुष्टि नहीं करता है। US Fed Decision पर भी नजर Currency market की नजर अब US Federal Reserve की 15–16 September meeting पर है। Markets में 25 basis points rate hike की संभावना काफी मजबूत हो गई है। Higher US interest rates Dollar को और मजबूत कर सकते हैं, जिससे emerging-market currencies including Rupee पर अतिरिक्त pressure पड़ सकता है। source – Reuters / Business Standard / RBI Market Data जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपया शुरुआती कारोबार में 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.38 प्रति डॉलर पर पहुंचा, कच्चे तेल की कीमतों से दबाव

मुंबई: भारतीय रुपया मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.38 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। वैश्विक बाजारों में जारी अनिश्चितता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रुपये पर दबाव देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में रुपये पर दबाव इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया कमजोर स्तर पर खुला और शुरुआती कारोबार में ₹95.38 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। पिछले कारोबारी सत्र में रुपया करीब ₹95.30 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। मंगलवार की शुरुआत में रुपये की कमजोरी के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक बताए जा रहे हैं। West Asia संकट का बाजार पर असर West Asia में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक निवेशकों की चिंता बनी हुई है। क्षेत्र में शांति वार्ता को लेकर स्पष्ट प्रगति नहीं होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इससे देश का आयात बिल बढ़ने और डॉलर की मांग बढ़ने की संभावना रहती है, जिसका दबाव रुपये पर पड़ता है। महंगा कच्चा तेल बना बड़ी चिंता अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है। रिपोर्टों के मुताबिक Brent crude में भी तेजी देखने को मिली है और बाजार की नजर West Asia से जुड़े घटनाक्रम पर बनी हुई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर देश को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। शेयर बाजार में कमजोरी का भी असर रुपये पर दबाव का एक कारण घरेलू शेयर बाजार में शुरुआती कमजोरी भी रही। मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक शुरुआती कारोबार में दबाव में नजर आए। Reuters के अनुसार शुरुआती कारोबार में Nifty करीब 0.43% और Sensex करीब 0.48% नीचे थे। वित्तीय और बैंकिंग शेयरों में कमजोरी ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया। RBI की भूमिका से बड़ी गिरावट पर रोक रुपये में कमजोरी के बावजूद बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की संभावित दखलंदाजी पर भी नजर बनी हुई है। बाजार सूत्रों के मुताबिक सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री से रुपये को कुछ समर्थन मिला, जिससे शुरुआती गिरावट सीमित रही। विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी रुपये की दिशा के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। महंगाई पर भी पड़ सकता है असर रुपये में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर आने वाले समय में महंगाई पर भी पड़ सकता है। अगर आयातित तेल महंगा होता है, तो परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा कई अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है। निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों पर अब बाजार की नजर कई महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर है। खासतौर पर West Asia संकट, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके अलावा अमेरिकी महंगाई के आंकड़े और भारत के आगामी आर्थिक आंकड़े भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। रुपये के लिए आगे की चुनौती रुपया पिछले कुछ समय से डॉलर के मुकाबले कमजोर स्तरों के आसपास कारोबार कर रहा है। सोमवार को भी शुरुआती कारोबार में रुपया 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.25 प्रति डॉलर पर पहुंचा था। ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आती है या वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो रुपये पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है। वहीं RBI की कार्रवाई और विदेशी पूंजी प्रवाह रुपये को समर्थन दे सकते हैं। निष्कर्ष 11 अगस्त 2026 को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.38 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। West Asia संकट के बीच कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी ने रुपये पर दबाव बढ़ाया। हालांकि RBI की संभावित दखलंदाजी और विदेशी पूंजी प्रवाह से गिरावट को सीमित करने में मदद मिल रही है। आने वाले कारोबार में कच्चे तेल, डॉलर इंडेक्स, विदेशी निवेश और West Asia से जुड़ी खबरें रुपये की दिशा के लिए सबसे अहम संकेतक रहेंगे। Source: PTI / Reuters / Economic Times जय राष्ट्र न्यूज़

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कच्चे तेल की कीमतों और रुपये की चाल पर बाजार की नजर, निवेशकों को RBI के अगले संकेतों का इंतजार

मुंबई: भारतीय शेयर बाजार और वित्तीय क्षेत्र की निगाहें इस सप्ताह कच्चे तेल (Crude Oil) की वैश्विक कीमतों, भारतीय रुपये (Rupee) की चाल और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संभावित संकेतों पर टिकी हुई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि ये तीनों कारक आने वाले दिनों में शेयर बाजार, बॉन्ड यील्ड, महंगाई और विदेशी निवेशकों (FIIs) के रुख को प्रभावित कर सकते हैं। वैश्विक बाजारों में जारी अनिश्चितता, पश्चिम एशिया से जुड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम और डॉलर इंडेक्स में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशक सतर्क रणनीति अपना रहे हैं। क्यों अहम हैं कच्चे तेल की कीमतें? भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बदलाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि कच्चा तेल महंगा होता है तो— इसी वजह से बाजार लगातार ब्रेंट क्रूड और वैश्विक ऊर्जा बाजार की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। रुपये की चाल भी रहेगी महत्वपूर्ण भारतीय रुपया इस सप्ताह निवेशकों के लिए एक प्रमुख संकेतक बना हुआ है। विदेशी निवेश (FII), डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। विश्लेषकों के अनुसार यदि रुपये में अधिक कमजोरी आती है, तो आयात लागत बढ़ सकती है, जबकि स्थिर या मजबूत रुपया बाजार के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है। RBI के अगले कदम पर बाजार की नजर निवेशक अब भारतीय रिजर्व बैंक के अगले मौद्रिक नीति संकेतों का इंतजार कर रहे हैं। फिलहाल बाजार इस बात पर नजर रखे हुए है कि— हालांकि, RBI की ओर से फिलहाल कोई नई नीति घोषणा नहीं की गई है, लेकिन अधिकारियों के सार्वजनिक बयान और आर्थिक आंकड़े निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। शेयर बाजार पर संभावित असर बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इस सप्ताह इन सेक्टरों पर विशेष नजर रहेगी— यदि वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं, तो बाजार में सकारात्मक रुझान देखने को मिल सकता है। वहीं, किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से अस्थिरता बढ़ सकती है। निवेशकों के लिए क्या सलाह? विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों को— निष्कर्ष इस सप्ताह भारतीय बाजार के लिए कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की चाल और RBI के संभावित संकेत सबसे महत्वपूर्ण कारक बने हुए हैं। निवेशकों की नजर घरेलू और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम पर रहेगी, जो आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय कर सकते हैं। Source: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार, वित्तीय संस्थानों के बाजार विश्लेषण और विश्वसनीय आर्थिक मीडिया रिपोर्ट। Original Report: उपलब्ध आर्थिक संकेतकों और बाजार विश्लेषण के आधार पर तैयार। जय राष्ट्र न्यूज़

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