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नेताओं की भक्ति या राजनीति का नया रूप? भगवान के स्वरूप में नेताओं की तस्वीरों से फिर छिड़ी बहस

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में नेताओं की प्रशंसा नई बात नहीं है, लेकिन जब किसी राजनीतिक नेता को भगवान, अवतार या धार्मिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगे तो सवाल सिर्फ समर्थकों की भावना तक सीमित नहीं रहता। यह राजनीतिक व्यक्तिपूजा, धर्म और चुनावी संदेश—तीनों के मेल पर बहस छेड़ देता है। हाल के महीनों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं। वाराणसी में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अखिलेश यादव को भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में, हाथ में संविधान लिए दिखाया। वहीं दिल्ली के Press Club of India में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देवता-सदृश तस्वीर के सामने आरती और ‘मोदी चालीसा’ के वीडियो वायरल हुए। इससे पहले लखनऊ में एक पोस्टर में मोदी को श्रीकृष्ण और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अर्जुन के रूप में पेश किया गया था। इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या यह सिर्फ समर्थकों की भक्ति है, या नेताओं की छवि को धार्मिक प्रतीकों के जरिए मजबूत करने की नई राजनीतिक रणनीति? अखिलेश यादव को श्रीकृष्ण, हाथ में संविधान 1 जुलाई 2026 को अखिलेश यादव के जन्मदिन पर वाराणसी में समाजवादी युवजन सभा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने हवन का आयोजन किया। इसी दौरान जारी किए गए पोस्टर में अखिलेश यादव को भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में दिखाया गया और उनके हाथों में संविधान की प्रतियां दिखाई गईं। कार्यकर्ताओं ने इसे न्याय और संविधान की रक्षा का प्रतीक बताया। लेकिन BJP ने पोस्टर का विरोध करते हुए इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देखा और समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं से माफी की मांग की। यहां दिलचस्प बात यह थी कि धार्मिक प्रतीक और राजनीतिक संदेश को एक ही तस्वीर में जोड़ा गया—श्रीकृष्ण का स्वरूप और संविधान। PM Modi की आरती और ‘Modi Chalisa’ अगस्त में दिल्ली से एक और विवाद सामने आया। Press Club of India में आयोजित एक कार्यक्रम के वायरल वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देवता-सदृश स्वरूप में दिखाने वाले cutout के सामने आरती की गई और ‘Modi Chalisa’ का पाठ किया गया। Press Club of India ने बाद में स्पष्ट किया कि उसने इस आयोजन को आयोजित नहीं किया था। उसके मुताबिक hall को press conference के लिए किराए पर लिया गया था और जब वहां अलग तरह की गतिविधि सामने आई तो कार्यक्रम को रोक दिया गया। इसी कार्यक्रम से जुड़े Rajan Singh ने बिहार में प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की योजना की भी बात कही। उन्होंने लगभग ₹112 करोड़ की लागत और पांच एकड़ जमीन पर मंदिर का दावा किया, हालांकि सरकारी जमीन या funding के उनके दावे का स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया था। मोदी ‘कृष्ण’, योगी ‘अर्जुन’ मई 2026 में लखनऊ में लगे एक अन्य राजनीतिक पोस्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान श्रीकृष्ण और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अर्जुन के रूप में दिखाया गया था। पोस्टर में राजनीति को महाभारत के ‘कुरुक्षेत्र’ के प्रतीक से जोड़कर पेश किया गया। इस तरह के पोस्टर बताते हैं कि धार्मिक कथाओं और पात्रों का इस्तेमाल अब केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है; उन्हें राजनीतिक messaging में भी बार-बार इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसा सिर्फ एक Party में नहीं इन उदाहरणों की सबसे अहम बात यह है कि यह प्रवृत्ति किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। अखिलेश यादव के समर्थक उन्हें श्रीकृष्ण के रूप में दिखाते हैं, वहीं दूसरी ओर नरेंद्र मोदी के समर्थक उन्हें राम या कृष्ण जैसे धार्मिक प्रतीकों से जोड़ते दिखाई देते हैं। इसलिए इसे केवल BJP, SP या किसी एक पार्टी की रणनीति कहना सही नहीं होगा। कई बार ऐसे पोस्टर और कार्यक्रम स्थानीय समर्थकों या कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित किए जाते हैं, और जरूरी नहीं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें आधिकारिक रूप से मंजूरी देता हो। यही अंतर समाचार रिपोर्टिंग में महत्वपूर्ण है। नेता से ‘प्रतीक’ बनने तक राजनीति में लोकप्रिय नेता अक्सर अपनी पार्टी से आगे बढ़कर एक प्रतीक बन जाते हैं। समर्थक उन्हें किसी खास विचार से जोड़ते हैं—जैसे विकास, सामाजिक न्याय, राष्ट्रवाद, संविधान, धर्म या किसी समुदाय के अधिकार। लेकिन जब यह प्रतीकात्मकता धार्मिक स्वरूप लेने लगती है तो नेता और देवता के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है। राजनीतिक संचार के नजरिए से देखा जाए तो भगवान या धार्मिक पात्र से तुलना नेता को साधारण राजनीतिक व्यक्ति से ऊपर उठाकर नैतिक या भावनात्मक authority देने का प्रयास भी हो सकती है। सोशल Media ने बदल दिया Poster Politics का असर एक समय राजनीतिक पोस्टर किसी शहर या विधानसभा क्षेत्र तक सीमित रहते थे। अब एक छोटा पोस्टर भी कुछ घंटों में पूरे देश में वायरल हो सकता है। Instagram, X, Facebook और WhatsApp के कारण राजनीतिक कार्यकर्ता जानते हैं कि विवादित या असामान्य visual को सामान्य पोस्टर की तुलना में कहीं ज्यादा reach मिलेगी। यही कारण है कि नेता को देवता के रूप में दिखाने वाली तस्वीरें अक्सर तुरंत national debate बन जाती हैं। धार्मिक प्रतीकों वाली तस्वीरें लोगों की भावनाओं से जुड़ती हैं, इसलिए उनका engagement भी ज्यादा होता है। भक्ति और राजनीतिक Branding के बीच महीन अंतर किसी समर्थक के लिए अपने पसंदीदा नेता की पूजा करना व्यक्तिगत श्रद्धा हो सकती है। लेकिन जब उसी गतिविधि में party slogans, राजनीतिक संदेश, चुनावी narrative या organised publicity जुड़ जाती है, तो इसे केवल व्यक्तिगत आस्था कहना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के तौर पर अखिलेश यादव के पोस्टर में संविधान जोड़ना स्पष्ट राजनीतिक संदेश था। उसी तरह ‘Modi Chalisa’ आयोजन में प्रधानमंत्री की राजनीतिक उपलब्धियों को उनकी पूजा के औचित्य से जोड़ा गया। इसलिए कई मामलों में भक्ति और political branding एक-दूसरे में मिलती नजर आती हैं। क्या इससे धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं? विरोध करने वालों का तर्क है कि जीवित राजनीतिक नेताओं की तुलना भगवान से करना धार्मिक परंपराओं का राजनीतिक इस्तेमाल है। अखिलेश यादव को श्रीकृष्ण के रूप में दिखाए जाने पर BJP की प्रतिक्रिया इसी आधार पर थी। दूसरी ओर Modi Chalisa कार्यक्रम को लेकर भी सोशल मीडिया पर कई लोगों ने धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल की आलोचना की। लेकिन समर्थक इसे अपनी आस्था और अभिव्यक्ति का अधिकार बताते हैं। यहीं से विवाद शुरू होता है—एक व्यक्ति के लिए सम्मान, दूसरे के लिए धार्मिक अतिशयोक्ति हो सकता…

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PM मोदी मंदिर विवाद में नया मोड़; राजन सिंह के खिलाफ FIR दर्ज, ‘फर्जी किन्नर’ होने का आरोप

पटना/लखनऊ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की मुहिम और दिल्ली के Press Club of India में ‘मोदी चालीसा’ के आयोजन को लेकर चर्चा में आए राजन सिंह अब नए विवाद में घिर गए हैं। लखनऊ के हजरतगंज थाने में एक transgender activist की शिकायत पर उनके खिलाफ मामला दर्ज होने की खबर सामने आई है। शिकायतकर्ता ने राजन सिंह की transgender identity पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। राजन सिंह ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपने पास वैध transgender certificate होने का दावा किया है। कौन हैं Rajan Singh और क्यों हैं चर्चा में? राजन सिंह बिहार के Transgender Welfare Board से जुड़े रहे हैं और पिछले कुछ हफ्तों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित मंदिर बनाने की अपनी मुहिम को लेकर सुर्खियों में हैं। उन्होंने दावा किया था कि पटना में प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर एक भव्य मंदिर बनाया जाना चाहिए। प्रस्तावित मंदिर के लिए करीब 5 एकड़ जमीन और ₹112 करोड़ की लागत का दावा भी सामने आया था। राजन सिंह ने कहा था कि वह यह मंदिर transgender community को केंद्र सरकार द्वारा दिए गए अधिकारों और पहचान के प्रति आभार के रूप में बनवाना चाहते हैं। हालांकि इस प्रस्ताव की आधिकारिक स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। जुलाई में PTI आधारित रिपोर्टों में Bihar State Transgender Welfare Board द्वारा प्रस्ताव को मंजूरी देने की बात कही गई थी, जबकि बाद की एक रिपोर्ट में बोर्ड की एक अन्य सदस्य ने ऐसे किसी आधिकारिक निर्णय से इनकार किया। इसलिए फिलहाल मंदिर निर्माण को अंतिम सरकारी मंजूरी मिल चुकी परियोजना मानना सही नहीं होगा। ‘Modi Chalisa’ से बढ़ा विवाद 20 अगस्त को दिल्ली के Press Club of India में हुए एक कार्यक्रम ने विवाद को और बढ़ा दिया। वायरल वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक cutout के सामने आरती और ‘Modi Chalisa’ का पाठ करते हुए कुछ लोग दिखाई दिए। तस्वीरों में प्रधानमंत्री को भगवान राम जैसी वेशभूषा में दिखाने वाला cutout भी नजर आया। Press Club of India ने बाद में स्पष्ट किया कि उसने इस कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया था। Club के मुताबिक hall को press conference के लिए बुक किया गया था, लेकिन निर्धारित शर्तों का उल्लंघन होने के बाद कार्यक्रम रोक दिया गया। Lucknow में किसने दर्ज कराई शिकायत? नवभारत टाइम्स और अन्य स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक लखनऊ की transgender activist प्रियंका सिंह रघुवंशी ने हजरतगंज थाने में राजन सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि राजन सिंह transgender community का सदस्य होने का गलत दावा कर रहे हैं और उनकी गतिविधियों से समुदाय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच रहा है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये शिकायतकर्ता के आरोप हैं। किसी व्यक्ति की gender identity के बारे में आरोप को केवल FIR या शिकायत के आधार पर सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। Rajan Singh ने आरोपों पर क्या कहा? राजन सिंह ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके पास वैध transgender certificate मौजूद है। उन्होंने FIR को राजनीतिक साजिश बताते हुए शिकायतकर्ता पर भी राजनीतिक संबंधों के आरोप लगाए हैं। राजन सिंह का कहना है कि उनके documents की जांच की जा सकती है और इससे उनकी identity की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल इस मामले में शिकायतकर्ता और राजन सिंह के दावे एक-दूसरे के विपरीत हैं। पुलिस जांच के बाद ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। क्या FIR ‘Modi Mandir’ बनाने के कारण हुई? उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर FIR सीधे PM Modi का मंदिर बनाने के प्रस्ताव के कारण दर्ज नहीं की गई है। मंदिर का प्रस्ताव और Modi Chalisa का आयोजन राजन सिंह को चर्चा में लाने वाले प्रमुख घटनाक्रम हैं, लेकिन Lucknow में दर्ज शिकायत का मुख्य आधार उनकी transgender identity और समुदाय की छवि को लेकर लगाए गए आरोप बताए जा रहे हैं। इसलिए खबर को “PM मोदी का मंदिर बनाने पर FIR” कहना तथ्यात्मक रूप से अधूरा या भ्रामक हो सकता है। मंदिर के लिए ₹112 करोड़ और Gold Statue का दावा Press Club के कार्यक्रम के दौरान राजन सिंह ने प्रस्तावित मंदिर को लेकर कई बड़े दावे किए थे। उन्होंने कहा था कि मंदिर करीब ₹112 करोड़ में बनाया जाएगा, इसके लिए पांच एकड़ जमीन चाहिए और उसमें प्रधानमंत्री मोदी की ऊंचाई के बराबर सोने की प्रतिमा स्थापित करने की योजना है। हालांकि India Today की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राज्य सरकार द्वारा जमीन या धन उपलब्ध कराने के उनके दावे के समर्थन में उन्होंने कोई प्रमाण पेश नहीं किया था। इसलिए इन आंकड़ों को Rajan Singh का प्रस्ताव या दावा ही माना जाना चाहिए, न कि Bihar सरकार की स्वीकृत योजना। Bihar Transgender Welfare Board में भी मतभेद? मंदिर प्रस्ताव को लेकर Board के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आने की खबर है। एक ओर जुलाई की रिपोर्टों में राजन सिंह और PTI ने दावा किया था कि प्रस्ताव को Board के सदस्यों का समर्थन मिला। दूसरी ओर बाद में Board से जुड़ी सदस्य अनुप्रिया के हवाले से कहा गया कि मंदिर निर्माण का कोई औपचारिक निर्णय नहीं हुआ और यह राजन सिंह की व्यक्तिगत पहल है। इस विरोधाभास के कारण Bihar सरकार या Social Welfare Department की औपचारिक मंजूरी सामने आने तक मंदिर परियोजना की सरकारी स्थिति को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है। अब आगे क्या? Lucknow में दर्ज मामले के बाद पुलिस शिकायत में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध documents की जांच कर सकती है। दूसरी ओर राजन सिंह ने अपनी Modi Mandir मुहिम वापस लेने का कोई संकेत नहीं दिया है। उन्होंने पहले कहा था कि अगर सरकार मंदिर के लिए जमीन और धन उपलब्ध नहीं कराती तो वह अपने पद को लेकर भी फैसला कर सकते हैं। पूरे मामले में तीन अलग-अलग मुद्दे जुड़े हुए हैं—प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर मंदिर बनाने का प्रस्ताव, Press Club में Modi Chalisa कार्यक्रम और अब राजन सिंह के खिलाफ transgender identity को लेकर दर्ज शिकायत। इनमें से किसी भी आरोप पर अंतिम निष्कर्ष पुलिस जांच और आधिकारिक दस्तावेज सामने आने के बाद ही निकाला जाना चाहिए। नोट: राजन सिंह की transgender identity को…

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