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रुपये को संभालने के लिए RBI की रणनीति में बदलाव, डॉलर की बिक्री के साथ ब्याज दरों पर भी जोर

मुंबई, 17 अक्टूबर 2026: भारतीय रुपये पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब केवल डॉलर की बिक्री और विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप पर निर्भर नहीं दिख रहा है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक परिस्थितियों को सावधानीपूर्वक सख्त करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसमें ब्याज दरों में बढ़ोतरी, बाजार में उपलब्ध नकदी कम करना और बॉन्ड की बिक्री जैसे उपाय शामिल हैं। इसका उद्देश्य महंगाई पर नियंत्रण के साथ-साथ पूंजी के बाहर जाने और रुपये की कमजोरी को सीमित करना है। चार साल बाद बढ़ाई गई ब्याज दर अक्टूबर में RBI ने नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की। यह चार साल में पहली दर वृद्धि बताई गई है। इसके अलावा, बैंकिंग प्रणाली में उपलब्ध नकदी कम करने के लिए बॉन्ड बिक्री और रिजर्व से जुड़े उपाय भी अपनाए गए हैं। इन कदमों से वित्तीय परिस्थितियों को सख्त करने और रुपये को समर्थन देने की कोशिश की जा रही है। 2026 में करीब 6% कमजोर हुआ रुपया इस साल भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 6% कमजोर हुआ है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी और डॉलर की बढ़ती मांग ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि, RBI के हालिया कदमों के बाद रुपया अपने निचले स्तर से करीब 2% उबरने में कामयाब रहा है। केवल डॉलर बेचने से नहीं बनेगी बात? रुपये की गिरावट को थामने के लिए RBI विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाता रहा है। हालांकि, लगातार हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल विभिन्न विदेशी मुद्रा उपायों के तहत RBI करीब 150 अरब डॉलर तक का इस्तेमाल कर चुका है। ऐसे में ब्याज दरों और नकदी प्रबंधन से जुड़े उपाय रुपये को समर्थन देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। दिसंबर में फिर बढ़ सकती हैं ब्याज दरें? सितंबर में महंगाई दर 5.54% तक पहुंचने के बाद दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी को लेकर बाजार में चर्चा तेज हुई है। कुछ विश्लेषक 50 बेसिस पॉइंट तक की सख्ती की संभावना जता रहे हैं। हालांकि, RBI ने दिसंबर में ऐसी किसी बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से निकाले 33 अरब डॉलर रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 33 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। घरेलू ब्याज दरें और यील्ड बढ़ने से रुपये में निवेश की आकर्षकता बढ़ सकती है। इससे पूंजी की निकासी पर अंकुश लगाने में मदद मिलने की संभावना है, हालांकि निवेशकों के फैसले वैश्विक परिस्थितियों और बाजार की धारणा पर भी निर्भर करेंगे। ज्यादा सख्ती से अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी रुपये को सहारा दे सकती है, लेकिन इसके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। कर्ज महंगा होने से कारोबार, आवास ऋण लेने वालों और छोटे कर्जदारों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से RBI के सामने रुपये को स्थिर रखने, महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने और आर्थिक विकास को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक फिलहाल 2013 जैसी अचानक और तीखी आपातकालीन सख्ती के बजाय सावधानीपूर्वक कदम उठाने की रणनीति अपनाता दिख रहा है। स्रोत: Reuters जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये को संभालने के लिए RBI का बड़ा कदम, सरकारी तेल कंपनियों के लिए स्पेशल डॉलर विंडो; फॉरेक्स सट्टेबाजी पर भी सख्ती

मुंबई: भारतीय रुपये पर लगातार बने दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 10 अक्टूबर 2026 को कई अहम कदमों की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम की दैनिक डॉलर जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष डॉलर विंडो शुरू करने का फैसला किया है। इसके साथ ही रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन के नियम भी सख्त किए गए हैं, ताकि डॉलर की सट्टा मांग और जरूरत से ज्यादा हेजिंग पर अंकुश लगाया जा सके। 12 अक्टूबर से शुरू होगी स्पेशल डॉलर विंडो RBI की नई सुविधा 12 अक्टूबर से प्रभावी होगी। इसके तहत तीनों सरकारी तेल विपणन कंपनियों की दैनिक डॉलर जरूरत नामित बैंकों के माध्यम से सीधे केंद्रीय बैंक पूरी करेगा। यह व्यवस्था बाजार की परिस्थितियों के आधार पर अगले आदेश तक जारी रहेगी। इस कदम का उद्देश्य तेल कंपनियों की डॉलर खरीद के कारण स्पॉट फॉरेक्स बाजार पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करना है। किन कंपनियों को मिलेगा फायदा? RBI की इस विशेष सुविधा का लाभ फिलहाल तीन सरकारी तेल कंपनियों को मिलेगा: इन कंपनियों को कच्चे तेल के आयात का भुगतान करने के लिए बड़ी मात्रा में अमेरिकी डॉलर की जरूरत होती है। डॉलर की मांग बढ़ने पर रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। स्पॉट फॉरेक्स बाजार पर कम हो सकता है दबाव आमतौर पर तेल कंपनियां अपनी डॉलर जरूरतों को विदेशी मुद्रा बाजार से पूरा करती हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर आयात बिल बढ़ता है और कंपनियों को अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं। RBI की नई व्यवस्था से इन तीनों कंपनियों की डॉलर मांग का एक बड़ा हिस्सा सीधे केंद्रीय बैंक के जरिए पूरा होगा। इससे खुले बाजार में डॉलर की अतिरिक्त मांग कम करने और रुपये में उतार-चढ़ाव नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। डॉलर के मुकाबले रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव? 2026 में अब तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 7 प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है। इसके पीछे कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, विदेशी निवेशकों की निकासी और आयातकों की लगातार डॉलर मांग जैसे कारक बताए जा रहे हैं। हाल के दिनों में रुपया 97 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गया था। इससे आयात की लागत और विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ीं। फॉरेक्स डेरिवेटिव के नियम भी सख्त रुपये को सहारा देने के लिए RBI ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार के नियमों में भी बदलाव किए हैं। इन कदमों में रद्द किए गए कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक करने पर प्रतिबंध और बिना वास्तविक विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रमाण दिए जाने वाले डेरिवेटिव सौदों की सीमा घटाना शामिल है। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य वास्तविक कारोबारी जरूरतों के लिए हेजिंग की सुविधा बनाए रखते हुए सट्टेबाजी से पैदा होने वाले अतिरिक्त दबाव को सीमित करना है। 100 मिलियन डॉलर की सीमा घटाकर 5 मिलियन डॉलर रिपोर्टों के अनुसार, कंपनियां अब वास्तविक विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रमाण दिए बिना अधिकतम 5 मिलियन डॉलर तक की फॉरेक्स डेरिवेटिव पोजिशन ले सकेंगी। पहले यह सीमा 100 मिलियन डॉलर थी। इस बदलाव से बिना अंतर्निहित कारोबारी जरूरत के बड़े डेरिवेटिव सौदे करना अधिक सीमित होगा। RBI को उम्मीद है कि इससे रुपये के खिलाफ सट्टा पोजिशन बनाने की गुंजाइश कम होगी। बड़े विदेशी मुद्रा सौदों पर 20 प्रतिशत रिजर्व की शर्त RBI ने कुछ बड़े विदेशी मुद्रा लेनदेन के लिए 20 प्रतिशत नकद रिजर्व की आवश्यकता भी लागू की है। इस कदम का उद्देश्य आक्रामक डॉलर खरीद और सट्टा कारोबार की लागत बढ़ाना है। हालांकि, इस प्रावधान का वास्तविक असर संबंधित नियमों के दायरे और बाजार में कारोबार करने वाली संस्थाओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। आयातकों की हेजिंग में तेज बढ़ोतरी रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में भारतीय आयातकों ने करीब 77 अरब डॉलर की हेजिंग की, जो एक साल पहले की तुलना में 80 प्रतिशत से अधिक थी। वहीं, निर्यातकों की हेजिंग लगभग 41 अरब डॉलर रही। आयातकों और निर्यातकों की हेजिंग में इस अंतर को विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ने और रुपये पर दबाव के प्रमुख कारकों में से एक माना जा रहा है। कच्चे तेल की कीमतें बनीं बड़ी चिंता भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ जाता है और डॉलर की अधिक जरूरत पड़ती है। मध्य पूर्व में तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत हाल में 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी। महंगा तेल भारत के व्यापार संतुलन और रुपये, दोनों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। RBI पहले भी कर चुका है डॉलर बाजार में हस्तक्षेप रुपये को समर्थन देने के लिए RBI पिछले कुछ हफ्तों में स्पॉट डॉलर बिक्री और विदेशी मुद्रा स्वैप जैसे उपायों का इस्तेमाल करता रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, सितंबर में अपने उच्च स्तर से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 50 अरब डॉलर घटकर 734.6 अरब डॉलर रह गया। विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप को इस गिरावट के संभावित कारणों में शामिल किया गया है। रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद भी दबाव बरकरार 7 अक्टूबर को RBI ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, यह लगभग चार वर्षों में पहली दर वृद्धि थी। हालांकि, ब्याज दर बढ़ाने के बावजूद रुपये पर दबाव पूरी तरह कम नहीं हुआ। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने डॉलर की मांग और विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव गतिविधियों को सीधे प्रभावित करने वाले उपायों की घोषणा की। क्या अब मजबूत होगा रुपया? विश्लेषकों के मुताबिक, RBI के नए कदम निकट अवधि में डॉलर की मांग को नियंत्रित करने और रुपये में तेज उतार-चढ़ाव कम करने में मदद कर सकते हैं। सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर जरूरतों को सीधे पूरा करने से स्पॉट बाजार पर दबाव भी घट सकता है। हालांकि, रुपये की दीर्घकालिक दिशा कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेश के प्रवाह, वैश्विक ब्याज दरों और भारत के व्यापार संतुलन जैसे कारकों पर निर्भर करेगी। इसलिए इन उपायों से रुपये में तत्काल और स्थायी मजबूती की…

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रुपया ₹96.39 प्रति डॉलर तक गिरा, crude oil और FII selling का बढ़ा दबाव

मुंबई: भारतीय रुपया मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को शुरुआती कारोबार में कमजोर होकर ₹96.39 प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। घरेलू मुद्रा पर ऊंची crude oil prices, foreign institutional investors (FII) की बिकवाली और मजबूत dollar का दबाव देखने को मिला। शुरुआती सत्र में रुपया अपने पिछले बंद स्तर के मुकाबले कमजोर खुला और डॉलर के मुकाबले और नीचे फिसल गया। शुरुआती कारोबार में ₹96.39 तक पहुंचा रुपया Interbank foreign exchange market में रुपया कमजोरी के साथ खुला। कारोबार के शुरुआती हिस्से में भारतीय मुद्रा गिरकर ₹96.39 प्रति डॉलर तक पहुंच गई, जो हाल के महीनों में रुपये के सबसे कमजोर स्तरों में से एक है। Crude oil की तेजी बनी बड़ी वजह भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा crude oil imports के जरिए पूरा करता है। जब international crude prices बढ़ती हैं तो तेल कंपनियों की dollar demand भी बढ़ती है। इससे foreign exchange market में रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। FII selling ने भी बढ़ाया दबाव Foreign institutional investors की भारतीय equities से निकासी भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह मानी जा रही है। FII selling बढ़ने पर विदेशी निवेशक भारतीय assets बेचकर dollars में funds convert करते हैं, जिससे dollar demand बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव आता है। मजबूत Dollar का असर Global markets में अमेरिकी dollar की मजबूती ने भी emerging-market currencies को प्रभावित किया। US Treasury yields ऊंचे रहने और Federal Reserve की आगे की monetary policy को लेकर uncertainty से dollar को support मिला है। RBI की intervention पर भी नजर Forex traders की नजर Reserve Bank of India की गतिविधियों पर भी बनी हुई है। आमतौर पर रुपये में तेज volatility होने पर RBI state-run banks के जरिए dollar selling करके बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव सीमित करने की कोशिश कर सकता है। Importers के लिए बढ़ सकती है लागत रुपये की कमजोरी का सीधा असर import-dependent sectors पर पड़ सकता है। Crude oil, electronics, machinery और अन्य dollar-denominated imports महंगे होने से कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। महंगाई पर भी पड़ सकता है असर अगर रुपया लंबे समय तक कमजोर रहता है और crude oil prices भी ऊंची बनी रहती हैं, तो imported inflation का खतरा बढ़ सकता है। Fuel और transportation costs में बढ़ोतरी का असर दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है। Exporters को मिल सकता है कुछ फायदा कमजोर रुपया exporters के लिए कुछ हद तक फायदेमंद हो सकता है। IT services, pharmaceuticals और अन्य export-oriented businesses को dollar में होने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर ज्यादा revenue मिल सकता है, हालांकि इसका प्रभाव sector और hedging strategy पर निर्भर करता है। RBI policy पर बाजार की नजर Currency market की नजर RBI की Monetary Policy Committee की बैठक पर भी है। बाजार यह देख रहा है कि inflation, rupee weakness और crude oil prices को देखते हुए RBI interest rates पर क्या रुख अपनाता है। आगे भी volatility की आशंका आने वाले दिनों में रुपये की दिशा crude oil prices, FII flows, dollar index, US bond yields और RBI policy संकेतों पर निर्भर करेगी। Global uncertainty बनी रहने पर forex market में volatility जारी रह सकती है। source – The Times of India / Reuters / PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये पर फिर दबाव, डॉलर के मुकाबले 96 के करीब पहुंचने की आशंका; कच्चे तेल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का असर

मुंबई: भारतीय रुपया एक बार फिर दबाव में है और 1 अक्टूबर 2026 के कारोबार में डॉलर के मुकाबले 95.96 से 95.98 के आसपास खुलने का अनुमान जताया गया। एक दिन पहले रुपया 95.83 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। ऊंची कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी और मजबूत डॉलर रुपये पर दबाव बढ़ा रहे हैं। बाजार की नजर इस बात पर भी है कि Reserve Bank of India यानी RBI 96 के स्तर के आसपास कितनी मजबूती से हस्तक्षेप करता है। 96 के स्तर के करीब पहुंच सकता है रुपया फॉरेक्स बाजार के अनुमान के अनुसार गुरुवार को रुपया 95.96 से 95.98 प्रति डॉलर के दायरे में खुल सकता है। बुधवार को भारतीय मुद्रा ने कुछ सुधार दिखाते हुए 95.83 पर कारोबार बंद किया था, लेकिन वैश्विक संकेत फिर इसके खिलाफ जाते दिखाई दे रहे हैं। कच्चे तेल की कीमतें बनी सबसे बड़ी चिंता भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर डॉलर की मांग और रुपये पर पड़ता है। Brent crude में बुधवार को करीब 2 फीसदी की तेजी आई, जबकि सितंबर में तेल की कीमतों में लगभग 14 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊंचा तेल आयात बिल रुपये पर अतिरिक्त दबाव पैदा करता है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल अमेरिका की 10 साल की Treasury yield 2007 के बाद के उच्च स्तरों के करीब पहुंच गई है। ऊंची अमेरिकी यील्ड से डॉलर आधारित assets निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं, जिससे emerging markets की currencies पर दबाव बढ़ता है। डॉलर इंडेक्स भी तीन महीने के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। Fed से राहत की उम्मीद भी रुपये को नहीं संभाल पा रही अमेरिकी Federal Reserve द्वारा अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ाने की संभावना पिछले एक सप्ताह में घटी है। इसके बावजूद रुपये को ज्यादा राहत नहीं मिली क्योंकि बाजार का फोकस फिलहाल तेल की कीमतों और लंबी अवधि की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर अधिक है। 29 सितंबर को 96 के पार गया था रुपया भारतीय मुद्रा हाल ही में 96 प्रति डॉलर का स्तर पार कर चुकी है। 29 सितंबर को रुपया कारोबार के दौरान 96.1450 प्रति डॉलर तक गिरा था, जो लगभग दो महीने का निचला स्तर था। बाद में RBI के संभावित हस्तक्षेप से नुकसान कुछ कम हुआ। RBI के हस्तक्षेप पर बाजार की नजर मार्केट डीलर्स के अनुसार सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री को RBI के संभावित हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। हाल के सत्रों में 96 के आसपास रुपये की गिरावट सीमित होती दिखाई दी है, जिससे बाजार में धारणा बनी है कि केंद्रीय बैंक इस स्तर पर अत्यधिक उतार-चढ़ाव नहीं चाहता। हालांकि RBI आमतौर पर किसी निश्चित exchange-rate level को आधिकारिक लक्ष्य घोषित नहीं करता। एक दिन पहले रुपये ने की थी वापसी 30 सितंबर को रुपये ने कमजोरी से वापसी करते हुए 95.83 प्रति डॉलर पर कारोबार बंद किया था। उस दिन कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, एशियाई मुद्राओं में सुधार और संभावित RBI intervention ने भारतीय मुद्रा को समर्थन दिया था। विदेशी निवेश की निकासी भी बढ़ा रही दबाव भारतीय बाजारों से विदेशी पूंजी की निकासी भी रुपये के लिए चुनौती बनी हुई है। तेल की ऊंची कीमतें, मजबूत डॉलर और वैश्विक बॉन्ड बाजार में बढ़ती यील्ड विदेशी निवेशकों के risk appetite को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे emerging markets से पूंजी बाहर जाने का खतरा बढ़ता है। भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है असर अगर रुपया कमजोर रहता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का आयात बिल महंगा हो सकता है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों, औद्योगिक कच्चे माल और डॉलर में भुगतान किए जाने वाले अन्य आयात पर पड़ सकता है। इससे महंगाई और चालू खाते पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। RBI की अगली मौद्रिक नीति भी अहम बाजार की नजर अब RBI की आगामी Monetary Policy Committee बैठक पर भी है। कुछ वित्तीय संस्थानों का अनुमान है कि ऊंची तेल कीमतों और महंगाई जोखिम को देखते हुए केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर सख्त रुख अपना सकता है। हालांकि अंतिम फैसला RBI की MPC ही करेगी। रुपये की आगे की चाल इन संकेतों पर निर्भर आने वाले दिनों में रुपये की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर इंडेक्स, विदेशी निवेश प्रवाह और RBI की बाजार में गतिविधियों पर निर्भर करेगी। फिलहाल 96 प्रति डॉलर का स्तर बाजार के लिए अहम बना हुआ है और इसमें होने वाली हलचल पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। source – Reuters / The Economic Times / Financial Times जय राष्ट्र न्यूज़

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UPI पर MDR के खिलाफ अंतरिम राहत नहीं, Supreme Court ने रोक लगाने से किया इनकार

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने UPI के चुनिंदा merchant transactions पर लागू होने वाले Merchant Discount Rate (MDR) पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। केंद्र सरकार ने ₹2,000 से अधिक के कुछ person-to-merchant UPI payments पर 0.4% MDR लागू करने का फैसला किया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होनी है। हालांकि अदालत ने इस नीति को अंतिम रूप से वैध नहीं ठहराया है और केंद्र सरकार से इसके कानूनी आधार पर जवाब मांगा है। Supreme Court ने नहीं दी अंतरिम राहत 28 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने MDR व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने नई व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने फिलहाल stay देने से इनकार कर दिया। ₹2,000 से ज्यादा के कुछ Payments पर लगेगा MDR नई व्यवस्था के तहत चुनिंदा person-to-merchant UPI transactions में ₹2,000 से ज्यादा के भुगतान पर 0.4% MDR लगाया जाएगा। यह शुल्क सामान्य UPI user द्वारा सरकार को दिया जाने वाला tax नहीं है। MDR merchant payment ecosystem में payment processing से जुड़ा शुल्क है, जिसे संबंधित banks और payment service providers के बीच बांटा जाता है। आम ग्राहकों से सीधे नहीं लिया जाएगा शुल्क केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि MDR सीधे सामान्य UPI users से नहीं लिया जाएगा। UPI apps को users पर अलग platform fee या hidden charge लगाने की अनुमति भी नहीं होगी। सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था merchant payment ecosystem की लागत को संभालने के लिए बनाई गई है। करीब 96% Transactions पर नहीं पड़ेगा असर केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि करीब 96% merchant UPI transactions इस नई व्यवस्था से प्रभावित नहीं होंगे। ₹2,000 तक के merchant payments पहले की तरह MDR से मुक्त रहेंगे। छोटे merchants के लिए तय zero-MDR व्यवस्था भी जारी रहने की बात कही गई है। Person-to-Person Transfer रहेगा Free अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को UPI के जरिए पैसा भेजता है तो ऐसे person-to-person transfers पर यह MDR लागू नहीं होगा। नई व्यवस्था मुख्य रूप से कुछ बड़े person-to-merchant payments से संबंधित है। Supreme Court ने केंद्र से पूछा कानूनी आधार सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि अगर MDR न तो tax है और न ही सरकारी fee, तो इसे लागू करने का कानूनी आधार क्या है। अदालत ने सरकार को इस पूरे framework की वजह और कानूनी आधार स्पष्ट करते हुए affidavit दाखिल करने को कहा है। RBI और NPCI से भी मांगा जवाब मामले में Reserve Bank of India (RBI) और National Payments Corporation of India (NPCI) से भी जवाब मांगा गया है। अब अदालत आगे की सुनवाई में केंद्र, RBI और NPCI का पक्ष देखने के बाद MDR व्यवस्था से जुड़ी कानूनी चुनौती पर विचार करेगी। 15 अक्टूबर से लागू होने की तैयारी केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि MDR व्यवस्था अभी लागू नहीं हुई है। नया framework 15 अक्टूबर 2026 से लागू होना है। ऐसे में Supreme Court द्वारा अंतरिम रोक नहीं लगाए जाने के बाद फिलहाल इसके निर्धारित तारीख से लागू होने का रास्ता खुला है। क्या ग्राहक को ₹2,000 से ज्यादा भुगतान पर Extra Charge देना होगा? नई व्यवस्था का अर्थ यह नहीं है कि ₹2,000 से ज्यादा का हर UPI payment करने वाले ग्राहक के खाते से सीधे 0.4% अतिरिक्त पैसा काट लिया जाएगा। MDR merchant-side payment processing charge है। सरकार ने merchants को इसे consumers से सीधे वसूलने से रोकने की बात कही है। Stay नहीं मिलने का मतलब फैसला सही घोषित होना नहीं Supreme Court द्वारा interim stay से इनकार किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने MDR व्यवस्था को अंतिम रूप से वैध घोषित कर दिया है। मामला अभी अदालत में लंबित है। केंद्र सरकार और अन्य संबंधित संस्थाओं के जवाब के बाद इसकी वैधानिकता पर आगे सुनवाई होगी। Digital Payments पर असर को लेकर बहस UPI लंबे समय से भारत में zero-cost digital payment system के रूप में तेजी से बढ़ा है। ऐसे में MDR की वापसी को लेकर merchants और digital payment industry में नई बहस शुरू हो गई है। सरकार का तर्क है कि payment infrastructure को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए processing cost की भरपाई जरूरी है, जबकि याचिका में आशंका जताई गई है कि इससे कुछ merchants UPI payments लेने से बच सकते हैं। source – The Indian Express / Business Standard / LiveLaw / Bar & Bench The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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India Forex Reserves में बड़ी बढ़ोतरी, एक सप्ताह में $9 Billion से ज्यादा का उछाल

नई दिल्ली: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 14 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का Forex Reserve बढ़कर करीब 716.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया। एक सप्ताह के भीतर इसमें करीब 10 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है और विदेशी मुद्रा भंडार अब लगभग छह महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में यह तेजी ऐसे समय आई है जब वैश्विक बाजारों में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रुपये पर दबाव को लेकर चिंता बनी हुई है। Forex Reserve बढ़कर $716.9 Billion रिपोर्ट के मुताबिक 14 अगस्त तक भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 716.9 अरब डॉलर हो गया। पिछले सप्ताह की तुलना में इसमें लगभग 10 अरब डॉलर का उछाल देखने को मिला। इस बढ़ोतरी के पीछे विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों यानी Foreign Currency Assets (FCA) और सोने के भंडार में हुई वृद्धि की बड़ी भूमिका रही। विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक मजबूती के महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक माना जाता है। इसका इस्तेमाल विदेशी भुगतान, आयात और मुद्रा बाजार में जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप के लिए किया जा सकता है। Foreign Currency Assets में $7.2 Billion की बढ़ोतरी भारत के Forex Reserve का सबसे बड़ा हिस्सा Foreign Currency Assets होता है। ताजा आंकड़ों में FCA में करीब 7.2 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। FCA में अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और जापानी येन जैसी दूसरी प्रमुख मुद्राओं में रखी गई परिसंपत्तियां भी शामिल होती हैं। अलग-अलग मुद्राओं की कीमत में बदलाव होने के कारण डॉलर में व्यक्त किए जाने वाले FCA के मूल्य में भी उतार-चढ़ाव हो सकता है। Gold Reserves ने भी दिया बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा भंडार में इस सप्ताह आई बढ़ोतरी में सोने का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा। भारत के Gold Reserves के मूल्य में करीब 2.7 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई। FCA और Gold Reserves में हुई मजबूत बढ़ोतरी ने कुल Forex Reserve को छह महीने के उच्च स्तर तक पहुंचाने में मदद की। भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में Foreign Currency Assets और Gold के साथ Special Drawing Rights (SDR) तथा International Monetary Fund में भारत की Reserve Tranche Position भी शामिल होती है। 7 सप्ताह में करीब $50 Billion बढ़ा भंडार भारत के Forex Reserve में पिछले कुछ सप्ताह से लगातार मजबूत बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक करीब सात सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 50 अरब डॉलर बढ़ चुका है। अब भारत का Forex Reserve अपने रिकॉर्ड स्तर के भी काफी करीब पहुंच गया है। भारत का अब तक का उच्चतम विदेशी मुद्रा भंडार करीब 728.5 अरब डॉलर रहा है, जो फरवरी 2026 में दर्ज किया गया था। मौजूदा $716.9 billion का स्तर इस रिकॉर्ड से लगभग $11.6 billion कम है। RBI के कदमों से बढ़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह विदेशी मुद्रा भंडार में आई तेजी के पीछे Reserve Bank of India की हालिया नीतियों को भी अहम माना जा रहा है। RBI ने जून में विदेशी उधारी और विदेशी मुद्रा जमा को आकर्षक बनाने के लिए कुछ उपाय किए थे। इनमें overseas borrowings के लिए discounted hedging तथा बैंकों द्वारा विदेशी मुद्रा जमा जुटाने से जुड़े प्रोत्साहन शामिल थे। इन उपायों के जरिए 13 अगस्त तक करीब 57 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आकर्षित होने की जानकारी सामने आई। मजबूत डॉलर inflows के बाद RBI ने विदेशी मुद्रा जमा से जुड़ी अपनी एक hedging सुविधा को तय समय से पहले समाप्त करने का फैसला भी किया है। Rupee के लिए क्यों महत्वपूर्ण है बड़ा Forex Reserve? मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार RBI को मुद्रा बाजार में रुपये की अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा क्षमता देता है। हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव के कारण रुपये पर दबाव देखा गया है। 21 अगस्त को रुपया करीब 95.69 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ और सप्ताह के दौरान लगभग 0.3 प्रतिशत कमजोर हुआ। बाजार में RBI के हस्तक्षेप ने रुपये को 96 प्रति डॉलर के स्तर से नीचे जाने से रोकने में मदद की। हालांकि Forex Reserve का इस्तेमाल किसी निश्चित exchange rate को बनाए रखने की गारंटी नहीं देता, लेकिन बड़ा भंडार बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच माना जाता है। अर्थव्यवस्था के लिए क्या संकेत? Forex Reserve में लगातार बढ़ोतरी भारत की external financial position के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा सकती है। इससे देश को महंगे आयात, अंतरराष्ट्रीय भुगतान और विदेशी पूंजी के अचानक बाहर जाने जैसी परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सकती है। साथ ही बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार निवेशकों के बीच देश की भुगतान क्षमता और आर्थिक स्थिरता को लेकर भरोसा मजबूत करने में भी भूमिका निभाता है। फिलहाल भारत का Forex Reserve 716.9 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है और अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड के करीब है। आने वाले सप्ताहों में विदेशी निवेश प्रवाह, कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की चाल और RBI की नीतियां यह तय करने में अहम होंगी कि विदेशी मुद्रा भंडार में यह तेजी आगे भी जारी रहती है या नहीं। स्रोत – रॉयटर्स, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपया फिर फिसला! डॉलर के मुकाबले ₹95.67 तक पहुंचा, महंगे कच्चे तेल और ईरान तनाव का दबाव

भारतीय रुपया एक बार फिर दबाव में नजर आया है। मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर ₹95.67 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया। रुपये में इस गिरावट के पीछे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव को प्रमुख कारण माना जा रहा है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर भारत पर पड़ रहा है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है और इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनता है। वहीं, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव देखने को मिल रहा है। रुपये की गिरावट को सीमित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से बाजार में हस्तक्षेप किए जाने की भी खबर है। बाजार विशेषज्ञों की नजर अब कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर की मजबूती और ईरान से जुड़े घटनाक्रम पर बनी हुई है। रुपये में लगातार कमजोरी का असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है। खासतौर पर कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। इससे आने वाले समय में महंगाई पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है। हालांकि, कमजोर रुपये से निर्यात करने वाली कुछ कंपनियों को फायदा मिल सकता है, क्योंकि उन्हें विदेशी मुद्रा में होने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर अधिक रकम प्राप्त होती है। फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर निर्भर करेगी। अगर तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो रुपये पर आगे भी दबाव देखने को मिल सकता है। स्रोत: Reuters Jai Rashtra News

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RBI की 19 अगस्त को आने वाली MPC मिनट्स पर बाजार की नजर, ब्याज दर और महंगाई के संकेतों का इंतजार

मुंबई: भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार की नजर अब 19 अगस्त 2026 को जारी होने वाली RBI Monetary Policy Committee (MPC) की बैठक की मिनट्स पर है। निवेशक यह समझने की कोशिश करेंगे कि केंद्रीय बैंक आने वाले महीनों में ब्याज दर, महंगाई और मौद्रिक नीति को लेकर किस दिशा में आगे बढ़ सकता है। RBI ने हालिया बैठक में रेपो रेट 5.25% पर रखा RBI की 3 से 5 अगस्त को हुई MPC बैठक में समिति ने रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखने का फैसला किया था। MPC ने लगातार चौथी बैठक में दरों में बदलाव नहीं किया और अपना रुख Neutral बनाए रखा। अब बाजार की नजर मिनट्स पर इसलिए है क्योंकि इसमें MPC के छह सदस्यों के विचारों और भविष्य की नीति को लेकर उनके आकलन से आगे की दिशा के संकेत मिल सकते हैं। महंगाई पर भी निवेशकों की नजर जुलाई 2026 में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 4.45% हो गई, जो RBI के 4% मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर है। हालांकि यह अभी भी RBI की 2-6% सहनशीलता सीमा के भीतर है। खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी ने कुल CPI को ऊपर खींचा है। ऐसे में निवेशक यह देखना चाहेंगे कि MPC सदस्य महंगाई में हालिया तेजी को अस्थायी मानते हैं या आने वाले महीनों के लिए इसे बड़ा जोखिम समझते हैं। अगली ब्याज दर नीति के संकेत मिल सकते हैं हालिया बैठक में RBI ने रेपो रेट में बदलाव नहीं किया था। अब MPC मिनट्स से बाजार को यह संकेत मिलने की उम्मीद है कि मौजूदा परिस्थितियों में आगे दरों में कटौती, लंबे समय तक यथास्थिति या भविष्य में दरों में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर सदस्यों की सोच क्या है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई, कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां आगे की नीति के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। रुपये और बॉन्ड बाजार पर भी असर MPC मिनट्स का असर केवल ब्याज दरों पर ही नहीं बल्कि रुपये और सरकारी बॉन्ड यील्ड पर भी पड़ सकता है। भारतीय रुपया हाल में डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा है। RBI के हस्तक्षेप ने गिरावट को सीमित किया है, जबकि पश्चिम एशिया में तनाव और ऊंची तेल कीमतें रुपये के लिए चुनौती बनी हुई हैं। वहीं बॉन्ड बाजार में निवेशक यह देख रहे हैं कि RBI की नीति आगे चलकर liquidity और ब्याज दरों को किस तरह प्रभावित कर सकती है। अमेरिका-ईरान तनाव भी अहम फैक्टर बाजार के लिए RBI की नीति के साथ-साथ अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतें भी महत्वपूर्ण हैं। तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी भारत के आयात बिल और महंगाई दोनों पर दबाव डाल सकती है। इसी वजह से MPC मिनट्स में वैश्विक जोखिमों और महंगाई के बीच RBI के आकलन पर बाजार की खास नजर रहेगी। निवेशकों की नजर इन संकेतों पर 19 अगस्त को जारी होने वाली मिनट्स में बाजार मुख्य रूप से इन बातों पर ध्यान देगा: निष्कर्ष 19 अगस्त की RBI MPC मिनट्स बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत साबित हो सकती हैं। रेपो रेट फिलहाल 5.25% पर है, लेकिन जुलाई की 4.45% महंगाई और पश्चिम एशिया से जुड़े जोखिमों के बीच निवेशक यह जानना चाहते हैं कि RBI आने वाले महीनों में ब्याज दरों को लेकर कितना सतर्क रहेगा। Source: Reuters, RBI-related reports, NDTV Profit, Economic Times जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये पर दबाव जारी, ₹95-₹95.50 प्रति डॉलर के दायरे में रहने का अनुमान; RBI और पश्चिम एशिया संकट पर बाजार की नजर

मुंबई: भारतीय रुपया इस सप्ताह भी डॉलर के मुकाबले दबाव में रह सकता है। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि रुपया ₹95 से ₹95.50 प्रति डॉलर के सीमित दायरे में कारोबार कर सकता है। RBI का हस्तक्षेप, कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिका-ईरान तनाव आने वाले दिनों में रुपये की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे। RBI की नजर रुपये की चाल पर भारतीय रिजर्व बैंक रुपये में तेज गिरावट को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने पिछले सप्ताह सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री की, जिससे रुपया ₹95.50 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के नीचे बना रहा। बाजार में यह माना जा रहा है कि RBI रुपये में अचानक और तेज कमजोरी को रोकने के लिए आगे भी हस्तक्षेप कर सकता है। अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी चिंता पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान तनाव रुपये के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। तनाव बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है और भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। भारत अपनी तेल जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में महंगा कच्चा तेल डॉलर की मांग बढ़ाकर रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। RBI की नीति और बाजार की नजर RBI की अगस्त मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखा गया था। अब बाजार की नजर 19 अगस्त को जारी होने वाली MPC बैठक की मिनट्स पर है। निवेशक इससे RBI की आगे की ब्याज दर नीति और महंगाई को लेकर सोच का संकेत तलाशेंगे। NRI डिपॉजिट स्कीम भी चर्चा में RBI ने FCNR(B) डिपॉजिट से जुड़े डिस्काउंटेड फॉरेक्स स्वैप सुविधा की समयसीमा को 30 सितंबर से घटाकर 31 अगस्त कर दिया है। इस योजना के जरिए 50 अरब डॉलर से अधिक का प्रवाह आने के बाद RBI ने समयसीमा पहले खत्म करने का फैसला किया। हालांकि, इस बदलाव से निकट अवधि में रुपये के लिए कुछ दबाव पैदा होने की आशंका भी बाजार विशेषज्ञ जता रहे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार से RBI को मजबूती भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 707 अरब डॉलर के चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इससे RBI को रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए पर्याप्त गुंजाइश मिलती है। आगे क्या देखेंगे निवेशक? आने वाले दिनों में बाजार की नजर मुख्य रूप से इन संकेतकों पर रहेगी: निष्कर्ष फिलहाल रुपये के लिए तस्वीर मिश्रित है। RBI का हस्तक्षेप और मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार तेज गिरावट को रोकने में मदद कर रहे हैं, लेकिन महंगा तेल और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं। Reuters के अनुसार इस सप्ताह रुपया ₹95-₹95.50 प्रति डॉलर के दायरे में रह सकता है। Source: Reuters, Economic Times, RBI-related market reports जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपया शुरुआती कारोबार में 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.38 प्रति डॉलर पर पहुंचा, कच्चे तेल की कीमतों से दबाव

मुंबई: भारतीय रुपया मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.38 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। वैश्विक बाजारों में जारी अनिश्चितता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रुपये पर दबाव देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में रुपये पर दबाव इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया कमजोर स्तर पर खुला और शुरुआती कारोबार में ₹95.38 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। पिछले कारोबारी सत्र में रुपया करीब ₹95.30 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। मंगलवार की शुरुआत में रुपये की कमजोरी के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक बताए जा रहे हैं। West Asia संकट का बाजार पर असर West Asia में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक निवेशकों की चिंता बनी हुई है। क्षेत्र में शांति वार्ता को लेकर स्पष्ट प्रगति नहीं होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इससे देश का आयात बिल बढ़ने और डॉलर की मांग बढ़ने की संभावना रहती है, जिसका दबाव रुपये पर पड़ता है। महंगा कच्चा तेल बना बड़ी चिंता अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है। रिपोर्टों के मुताबिक Brent crude में भी तेजी देखने को मिली है और बाजार की नजर West Asia से जुड़े घटनाक्रम पर बनी हुई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर देश को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। शेयर बाजार में कमजोरी का भी असर रुपये पर दबाव का एक कारण घरेलू शेयर बाजार में शुरुआती कमजोरी भी रही। मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक शुरुआती कारोबार में दबाव में नजर आए। Reuters के अनुसार शुरुआती कारोबार में Nifty करीब 0.43% और Sensex करीब 0.48% नीचे थे। वित्तीय और बैंकिंग शेयरों में कमजोरी ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया। RBI की भूमिका से बड़ी गिरावट पर रोक रुपये में कमजोरी के बावजूद बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की संभावित दखलंदाजी पर भी नजर बनी हुई है। बाजार सूत्रों के मुताबिक सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री से रुपये को कुछ समर्थन मिला, जिससे शुरुआती गिरावट सीमित रही। विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी रुपये की दिशा के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। महंगाई पर भी पड़ सकता है असर रुपये में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर आने वाले समय में महंगाई पर भी पड़ सकता है। अगर आयातित तेल महंगा होता है, तो परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा कई अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है। निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों पर अब बाजार की नजर कई महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर है। खासतौर पर West Asia संकट, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां रुपये की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके अलावा अमेरिकी महंगाई के आंकड़े और भारत के आगामी आर्थिक आंकड़े भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। रुपये के लिए आगे की चुनौती रुपया पिछले कुछ समय से डॉलर के मुकाबले कमजोर स्तरों के आसपास कारोबार कर रहा है। सोमवार को भी शुरुआती कारोबार में रुपया 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.25 प्रति डॉलर पर पहुंचा था। ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आती है या वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो रुपये पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है। वहीं RBI की कार्रवाई और विदेशी पूंजी प्रवाह रुपये को समर्थन दे सकते हैं। निष्कर्ष 11 अगस्त 2026 को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया 8 पैसे कमजोर होकर ₹95.38 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। West Asia संकट के बीच कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी ने रुपये पर दबाव बढ़ाया। हालांकि RBI की संभावित दखलंदाजी और विदेशी पूंजी प्रवाह से गिरावट को सीमित करने में मदद मिल रही है। आने वाले कारोबार में कच्चे तेल, डॉलर इंडेक्स, विदेशी निवेश और West Asia से जुड़ी खबरें रुपये की दिशा के लिए सबसे अहम संकेतक रहेंगे। Source: PTI / Reuters / Economic Times जय राष्ट्र न्यूज़

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