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Trump ने रूस पर प्रतिबंधों को लेकर 60 दिन के रिव्यू का संकेत दिया, रूसी तेल आयात पर भारत को फिलहाल राहत

वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 18 अक्टूबर 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूस से जुड़े प्रतिबंधों और टैरिफ पर अंतिम फैसला लेने से पहले उनके आर्थिक प्रभावों की समीक्षा करने का रुख अपनाया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के मुताबिक, इस प्रक्रिया में 60 दिन तक का समय लग सकता है। इस समीक्षा से भारत के रूसी तेल आयात पर संभावित अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ को लेकर फिलहाल राहत की उम्मीद बनी है। रुबियो बोले—अंतिम फैसले से पहले होगा असर का आकलन अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ट्रंप प्रशासन रूस से संबंधित प्रतिबंधों और टैरिफ पर निर्णय लेने से पहले उनके व्यापक प्रभावों का आकलन करना चाहता है। इसमें वैश्विक ऊर्जा कीमतों, घरेलू महंगाई और रणनीतिक साझेदार देशों पर पड़ने वाले असर जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, समीक्षा की प्रक्रिया में लगभग 60 दिन लग सकते हैं। भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला? भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ लगाए जाने की किसी भी योजना का असर भारतीय तेल रिफाइनरियों, आयात लागत और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। प्रस्तावित अमेरिकी उपायों को लेकर समीक्षा से फिलहाल अतिरिक्त शुल्क की आशंकाओं पर कुछ राहत मिली है। हालांकि, किसी विशेष छूट की कानूनी स्थिति और उसके लागू होने की शर्तों को संबंधित अमेरिकी आदेशों के आधार पर ही स्पष्ट किया जा सकता है। 100% तक टैरिफ की आशंका रिपोर्टों में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की संभावित व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। ऐसे कदम से भारत सहित अन्य आयातक देशों के साथ अमेरिका के व्यापारिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, संभावित टैरिफ की अधिकतम सीमा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर है। किसी शुल्क का लागू होना संबंधित कानून, कार्यकारी आदेश और प्रशासन के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा। वैश्विक तेल कीमतें भी अहम कारक रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में तनाव के बीच ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। रूस पर अतिरिक्त प्रतिबंधों से वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह अमेरिकी प्रशासन के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर ईंधन लागत, परिवहन और महंगाई पर पड़ सकता है। इसी वजह से प्रतिबंधों से जुड़े फैसलों में आर्थिक और रणनीतिक पहलुओं का आकलन महत्वपूर्ण है। भारत पर दबाव पूरी तरह खत्म नहीं समीक्षा की प्रक्रिया को भारत के रूसी तेल आयात को स्थायी मंजूरी मिलने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अमेरिका की आगे की नीति और संभावित टैरिफ संबंधी फैसले भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों तथा भारत की ऊर्जा खरीद रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। अगले 60 दिन रहेंगे महत्वपूर्ण अब नजर अमेरिकी प्रशासन की समीक्षा और उसके बाद होने वाले फैसले पर रहेगी। अंतिम निर्णय से भारत की कच्चे तेल की आयात लागत, घरेलू महंगाई, रुपये और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, प्रभाव की दिशा और सीमा अंतिम नीति तथा वैश्विक तेल बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। स्रोत: Reuters, The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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India-US Trade Deal की पहली Phase Final Drafting में, Sergio Gor बोले—“Big Items Are Done”

नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते की पहली phase अब अंतिम कानूनी मसौदा तैयार करने के चरण में पहुंच गई है। भारत में अमेरिकी राजदूत Sergio Gor ने कहा कि बातचीत तेजी से आगे बढ़ी है और समझौते के बड़े मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। उन्होंने कहा, “Big items are done”, जबकि शेष तकनीकी बिंदुओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। Piyush Goyal ने भी कहा—पहला चरण लगभग फाइनल केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने 15 अक्टूबर को कहा था कि व्यापार समझौते का पहला चरण लगभग अंतिम रूप ले चुका है। फिलहाल कानूनी मसौदे और अंतिम समीक्षा पर काम चल रहा है। भारत की कोशिश है कि समझौता लागू होने के बाद उसके निर्यातकों को बांग्लादेश, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले टैरिफ के मामले में नुकसान न उठाना पड़े। “Big Items Are Done”: Sergio Gor Bloomberg New Economy Forum में Sergio Gor ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बातचीत असाधारण तेजी से आगे बढ़ी है। उनके अनुसार, समझौते के प्रमुख मुद्दों पर पर्याप्त सहमति बन चुकी है और अब बाकी बिंदुओं को सुलझाने पर ध्यान दिया जा रहा है। Tariffs और Market Access रहे अहम मुद्दे भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता में टैरिफ, बाजार तक पहुंच और नियामकीय मुद्दे लंबे समय से प्रमुख विषय रहे हैं। इससे पहले अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि Jamieson Greer ने कहा था कि बातचीत अंतिम चरण में है, लेकिन कुछ मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। इसी वजह से उस समय समझौते को तत्काल अंतिम रूप दिए जाने की संभावना नहीं मानी गई थी। भारतीय निर्यातकों के लिए क्या बदल सकता है? भारत का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी बाजार में अपने निर्यातकों के लिए अधिक अनुकूल और अनुमानित टैरिफ व्यवस्था हासिल करना है। अमेरिका भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में शामिल है। रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल से सितंबर की अवधि में अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात सालाना आधार पर बढ़ा है। व्यापार समझौते के पहले चरण से निर्यातकों को बेहतर बाजार पहुंच और व्यापारिक अनिश्चितताओं में कमी मिलने की उम्मीद है। हालांकि, वास्तविक लाभ समझौते की अंतिम शर्तों और उनके लागू होने पर निर्भर करेगा। Marco Rubio की भारत यात्रा भी अहम अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio की भारत यात्रा भी दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस दौरान आर्थिक सहयोग, ऊर्जा और व्यापक रणनीतिक साझेदारी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। यह बातचीत व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त गति प्रदान कर सकती है। व्यापक व्यापार समझौते पर बातचीत अभी बाकी पहले चरण का अंतिम कानूनी मसौदा तैयार होना महत्वपूर्ण प्रगति है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत-अमेरिका के व्यापक व्यापार समझौते से जुड़े सभी मुद्दे सुलझ गए हैं। दोनों देशों को टैरिफ, बाजार पहुंच और नियामकीय नियमों सहित कई व्यापक विषयों पर आगे भी बातचीत करनी होगी। समझौते की अंतिम शर्तें और लागू होने की समय-सीमा आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होंगी। स्रोत: Reuters, The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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Trump बोले—ईरान में अमेरिकी जमीनी सैनिक भेजने की संभावना कम, परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से भी किया इनकार

वॉशिंगटन, 16 अक्टूबर 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि ईरान के खिलाफ जारी संघर्ष में अमेरिकी जमीनी सैनिकों को तैनात करने की संभावना बेहद कम है। Newsmax को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास समुद्री सुरक्षा को लेकर तनाव बना हुआ है। Trump ने क्या कहा? ट्रंप ने कहा कि उन्हें ईरान में अमेरिकी सैनिकों को जमीन पर उतारने की जरूरत नजर नहीं आती। उन्होंने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की संभावना को भी खारिज कर दिया। इन टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि फिलहाल अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान में सीधे जमीनी सैन्य अभियान और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से दूरी बनाए रखने की बात कर रहे हैं। हालांकि, इससे संघर्ष के अन्य सैन्य विकल्पों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती। बयान क्यों अहम है? ट्रंप का बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के संभावित अगले कदमों को लेकर चर्चा जारी है। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अमेरिकी सैन्य योजनाकार ईरान के खिलाफ GBU-43/B ‘Mother of All Bombs’ (MOAB) जैसे शक्तिशाली गैर-परमाणु हथियार के संभावित इस्तेमाल पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, इस रिपोर्ट की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी। MOAB एक पारंपरिक गैर-परमाणु बम है। इसके संभावित इस्तेमाल की चर्चा परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से अलग मुद्दा है। Strait of Hormuz में समुद्री खतरा बरकरार ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी नौसेना ने क्षेत्र में वाणिज्यिक जहाजों के लिए खतरे को गंभीर बताया है। जहाजों पर संभावित हमलों और समुद्री परिवहन में व्यवधान ने वैश्विक व्यापार तथा ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां लंबे समय तक व्यवधान रहने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकते हैं। तेल की कीमतों पर भी असर मध्य पूर्व में तनाव और तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका के बीच कच्चे तेल की कीमतों पर बाजार की नजर बनी हुई है। 16 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 105.45 डॉलर प्रति बैरल था। होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही सामान्य स्तर से नीचे रहने की खबरों ने आपूर्ति संबंधी चिंताओं को बढ़ाया है। हालांकि, तेल की कीमतें केवल भू-राजनीतिक तनाव से नहीं, बल्कि वैश्विक मांग, उत्पादन और अन्य बाजार परिस्थितियों से भी प्रभावित होती हैं। ईरान से जुड़े लोगों और संस्थाओं पर नई पाबंदियां अमेरिकी प्रशासन ने 15 अक्टूबर को ईरान से जुड़े 16 व्यक्तियों और 10 संस्थाओं पर नई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखना है। इससे संकेत मिलता है कि जमीनी सैन्य कार्रवाई और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से इनकार के बावजूद वॉशिंगटन ईरान के खिलाफ आर्थिक तथा अन्य रणनीतिक दबाव के विकल्पों का इस्तेमाल जारी रखे हुए है। संघर्ष खत्म होने के संकेत अभी स्पष्ट नहीं ट्रंप की टिप्पणियों से ईरान में अमेरिकी जमीनी सैनिकों की तैनाती और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर उनकी मौजूदा स्थिति सामने आई है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संघर्ष जल्द समाप्त हो जाएगा। हवाई हमले, आर्थिक प्रतिबंध और समुद्री सुरक्षा से जुड़े कदम आगे की अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बने रह सकते हैं। क्षेत्र में हालात किस दिशा में जाएंगे, यह दोनों देशों के अगले फैसलों और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा स्थिति पर निर्भर करेगा। स्रोत – The Indian Express, Reuters जय राष्ट्र न्यूज़

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ट्रंप बोले—चीन और रूस ईरान की मदद नहीं कर रहे; अमेरिकी खुफिया आकलन से अलग बयान

वॉशिंगटन, 14 अक्टूबर 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि चीन और रूस ईरान के साथ जारी युद्ध में किसी महत्वपूर्ण तरीके से उसकी मदद कर रहे हैं। उनका यह बयान अमेरिकी खुफिया आकलनों से अलग है, जिनमें बीजिंग और मॉस्को की ओर से ईरान को सैन्य सहायता दिए जाने की बात कही गई है। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका, चीन और रूस के बीच ईरान को लेकर कूटनीतिक तनाव बना हुआ है और क्षेत्र में जारी संघर्ष के अंतरराष्ट्रीय प्रभावों पर नजर रखी जा रही है। ट्रंप ने क्या कहा? ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि उन्हें नहीं लगता कि चीन या रूस ईरान की किसी महत्वपूर्ण तरीके से मदद कर रहे हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि ऐसी सहायता दी जा रही होती, तो अमेरिकी प्रशासन को इसकी जानकारी मिल जाती। ट्रंप का यह बयान दोनों देशों की भूमिका को लेकर उनके सार्वजनिक आकलन को दर्शाता है। हालांकि, इससे यह स्वतंत्र रूप से साबित नहीं होता कि ईरान को किसी भी प्रकार की बाहरी सहायता नहीं मिल रही है। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों में क्या दावा किया गया? रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया ब्रीफिंग में चीन और रूस की ओर से ईरान को सहायता मिलने की बात सामने आई है। रिपोर्टों में कथित तौर पर उपग्रह तस्वीरों, हथियारों के कलपुर्जों और अन्य सैन्य सहायता का उल्लेख किया गया है। इस तरह ट्रंप के सार्वजनिक बयान और रिपोर्ट किए गए खुफिया आकलनों के बीच अंतर दिखाई देता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर सहायता की पूरी मात्रा, स्वरूप और दोनों देशों की प्रत्यक्ष भूमिका के सभी विवरण स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं किए जा सकते। शी जिनपिंग से बातचीत का भी किया गया था जिक्र ट्रंप पहले भी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत के दौरान ईरान को चीन की संभावित सहायता का मुद्दा उठा चुके हैं। सितंबर में अमेरिकी अधिकारियों ने कहा था कि ट्रंप ने चीन की ओर से ईरान की मदद किए जाने पर आपत्ति जताई थी। अमेरिकी पक्ष के अनुसार, इस बातचीत में ईरान को समर्थन देने के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। हालांकि, किसी कूटनीतिक आश्वासन और जमीन पर वास्तविक गतिविधियों के बीच अंतर हो सकता है। चीन और रूस का अलग-अलग रुख चीन ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया है। वहीं, रूस ने मध्य पूर्व में जारी युद्ध के व्यापक सुरक्षा प्रभावों को लेकर चिंता जताई है और चेतावनी दी है कि क्षेत्रीय संघर्ष परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे सकता है। ट्रंप इससे पहले भी शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को ईरान संघर्ष के संदर्भ में तटस्थ बताया चुके हैं। दोनों देशों के सार्वजनिक बयानों और उनकी कथित सहायता से जुड़े खुफिया आकलनों को अलग-अलग संदर्भों में देखना जरूरी है। अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच बयान के मायने ईरान से जुड़े संघर्ष के बीच चीन और रूस की भूमिका अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का अहम मुद्दा बनी हुई है। वॉशिंगटन के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि तेहरान को बाहरी सैन्य या तकनीकी सहायता किस स्तर पर मिल रही है, जबकि बीजिंग और मॉस्को इस संकट को लेकर अपने-अपने कूटनीतिक रुख रखते हैं। ट्रंप के ताजा बयान और अमेरिकी खुफिया आकलनों के बीच अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि संघर्ष में बाहरी देशों की भूमिका को लेकर सार्वजनिक बयानों और सुरक्षा एजेंसियों के आकलनों में भिन्नता हो सकती है। फिलहाल, चीन और रूस की ओर से ईरान को कथित सहायता के दावों तथा इस संबंध में अमेरिकी आकलनों पर अंतरराष्ट्रीय नजर बनी हुई है। Source: Reuters जय राष्ट्र न्यूज़

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US-Iran War: ट्रंप बोले—ईरानी नेतृत्व को निशाना बनाने में अमेरिका शायद “बहुत आगे” निकल गया, Gulf में उड़ानें प्रभावित

वॉशिंगटन, 13 अक्टूबर 2026: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के नेतृत्व को निशाना बनाने की अमेरिकी रणनीति शायद जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ गई। उनके मुताबिक, कई वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों के मारे जाने के बाद संभावित शांति वार्ता के लिए यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि तेहरान में किससे बातचीत की जाए और किसके पास फैसले लेने का अधिकार है। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के बीच कूटनीतिक प्रयास अनिश्चित बने हुए हैं। वहीं, खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं के कारण हवाई और समुद्री परिवहन पर भी असर पड़ रहा है। ट्रंप बोले—ईरान में किससे बातचीत करें, यह स्पष्ट नहीं ओहायो के यंग्सटाउन में एक चुनावी रैली के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरानी नेतृत्व को निशाना बनाने के मामले में अमेरिका शायद “बहुत आगे” चला गया है। उन्होंने संकेत दिया कि वरिष्ठ अधिकारियों के मारे जाने से संभावित वार्ता के लिए उपयुक्त प्रतिनिधियों की पहचान करना कठिन हो सकता है। ट्रंप की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ बातचीत के लिए ईरान में प्रभावी नेतृत्व और निर्णय लेने वाले अधिकारियों की पहचान भी अमेरिकी प्रशासन के सामने एक चुनौती हो सकती है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन जुलाई 2024 से पद पर हैं। हालांकि, ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व की मौजूदा स्थिति और संभावित वार्ताकारों को लेकर अनिश्चितता जताई। ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर ट्रंप के दावे ट्रंप ने रैली के दौरान दावा किया कि युद्ध में ईरान की वायुसेना और नौसैनिक क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने ईरान के सभी 159 नौसैनिक जहाजों के नष्ट होने का भी दावा किया। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है। इसलिए इन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। खाड़ी क्षेत्र में विमान सेवाओं पर असर ईरान युद्ध और क्षेत्र में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों का असर खाड़ी क्षेत्र की हवाई सेवाओं पर भी पड़ रहा है। सऊदी अरब की राजधानी रियाद स्थित किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास हमलों की खबरों के बाद कई एयरलाइंस ने सऊदी अरब जाने वाली उड़ानें रद्द या अस्थायी रूप से निलंबित की हैं। रिपोर्टों के अनुसार, एयर इंडिया, इंडिगो, अकासा एयर, एतिहाद और कतर एयरवेज समेत कई विमानन कंपनियों की सेवाएं प्रभावित हुई हैं। यात्रियों को उड़ानों की स्थिति और संभावित बदलावों के लिए संबंधित एयरलाइन की आधिकारिक सूचना देखने की सलाह दी जाती है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ी समुद्री सुरक्षा की चिंता फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास वाणिज्यिक जहाजों से जुड़ी सुरक्षा घटनाओं ने समुद्री परिवहन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इस क्षेत्र से वैश्विक ऊर्जा व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी तरह का व्यवधान तेल आपूर्ति, माल ढुलाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर सकता है। समुद्री सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं और जहाजों की आवाजाही पर प्रतिबंधों या जोखिमों का असर केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी पड़ सकता है। शांति वार्ता पर अनिश्चितता बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे कूटनीतिक प्रयासों के केंद्र में बने हुए हैं। ट्रंप की ताजा टिप्पणी सैन्य कार्रवाई और कूटनीति के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत है। हालांकि, इससे किसी औपचारिक वार्ता की शुरुआत या समझौते की संभावना की पुष्टि नहीं होती। फिलहाल, संघर्ष का आगे का रुख दोनों देशों के फैसलों, क्षेत्रीय सुरक्षा की स्थिति और कूटनीतिक संपर्कों पर निर्भर करेगा। खाड़ी क्षेत्र में उड़ानों और समुद्री परिवहन पर पड़ रहे असर के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर हालात पर बनी हुई है। Source: Reuters / Al Jazeera / The Indian Express / The Business Standard जय राष्ट्र न्यूज़

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Trump ने Russia Sanctions Bill पर हस्ताक्षर किए; Russian Oil Buyers पर 100% तक Tariff का रास्ता साफ, India पर भी असर संभव

वॉशिंगटन, 18 सितंबर 2026: US President Donald Trump ने Russia पर नए economic sanctions लगाने वाले व्यापक legislation पर हस्ताक्षर कर उसे कानून बना दिया है। नए law के तहत Russian crude oil या natural gas के सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100% तक tariff लगाने का प्रावधान है। India और China Russia के प्रमुख oil buyers में शामिल हैं, इसलिए दोनों देशों पर इसका असर पड़ सकता है। हालांकि India पर 100% tariff तत्काल लागू हो गया है, ऐसा नहीं है; implementation और exemptions से जुड़े फैसलों में US administration के पास व्यापक discretion है। 30 दिनों के भीतर Tariff लगाने का प्रावधान Reuters के मुताबिक कानून President को Russian crude oil या gas के पांच सबसे बड़े importers से आने वाले goods पर 100% तक tariffs लगाने को कहता है। इसके दायरे में वे देश भी आ सकते हैं जो कानून लागू होने के 30 दिन बाद Russian oil या gas की नई खरीद करते हैं या Russia को sanctions evade करने में मदद करने वाले top countries में शामिल पाए जाते हैं। India और China पर क्यों बढ़ा Risk? India और China Russian crude के सबसे बड़े buyers में शामिल हैं। इसी कारण नए US law के तहत दोनों देशों के exports पर अतिरिक्त tariffs का risk बढ़ गया है। हालांकि legislation में किसी specific country का नाम नहीं दिया गया है और top-five countries तय करने की methodology भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इससे implementation में US administration को काफी flexibility मिलती है। India ने पहले ही जताई थी चिंता India ने bill के Congress से पारित होने के बाद Washington को चेताया था कि ऐसे tariffs India-US bilateral relations और global energy stability को प्रभावित कर सकते हैं। New Delhi का कहना रहा है कि उसका energy sourcing decision देश की energy security और 1.4 billion लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया जाता है। Russia की Energy और Defence Sector भी निशाने पर नए sanctions package में सिर्फ third-country tariffs ही नहीं, बल्कि Russian officials, banks, energy और defence industries तथा so-called shadow tanker fleet पर भी कार्रवाई के प्रावधान हैं। US lawmakers का कहना है कि इसका उद्देश्य Moscow की Ukraine war को finance करने की क्षमता पर दबाव बढ़ाना है। Tariffs में Waiver का भी विकल्प Law President को national security grounds पर कुछ tariffs या sanctions waive करने की authority भी देता है। यही वजह है कि experts का कहना है कि कानून का actual economic impact इस बात पर निर्भर करेगा कि Trump administration किस देश पर कितना tariff लगाता है और किन मामलों में exemptions देता है। Global Oil Market पर भी पड़ सकता है असर अगर major buyers Russian crude imports तेजी से कम करते हैं, तो global oil supply chain में disruption और crude prices पर upward pressure बन सकता है। Analysts ने यह भी चेताया है कि ऐसी स्थिति energy-importing देशों के लिए costs बढ़ा सकती है। source – Reuters / Associated Press जय राष्ट्र न्यूज़

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US-China के बीच AI Safety पर बड़ी बातचीत की तैयारी, Cyberattacks और Frontier AI Models पर हो सकती है चर्चा

वॉशिंगटन, 5 सितंबर 2026: अमेरिका और चीन तेजी से विकसित हो रही Artificial Intelligence technology से जुड़े सुरक्षा जोखिमों पर mid-September में bilateral dialogue आयोजित करने की तैयारी कर रहे हैं। प्रस्तावित बातचीत में AI-driven cyberattacks, advanced frontier models और दोनों देशों के AI labs के बीच safety information sharing जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं। हालांकि बैठक की तारीख, स्थान और final agenda अभी officially तय नहीं हुए हैं। Trump के दूसरे कार्यकाल में पहली dedicated AI वार्ता यदि यह dialogue होता है, तो Donald Trump के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और चीन के बीच AI safety पर exclusively focused पहली official bilateral discussion होगी। यह ऐसे समय प्रस्तावित है जब दोनों देश frontier AI development में एक-दूसरे के प्रमुख प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं। AI से होने वाले Cyberattacks पर US की चिंता Reuters के अनुसार Washington चाहता है कि दोनों देश AI-directed cyberattacks की monitoring को लेकर किसी तरह का cooperation विकसित करें। एक प्रस्ताव में अमेरिकी और चीनी AI laboratories से संभावित cyber threats की जानकारी साझा करने और AI-linked attacks को रोकने के लिए safeguards मजबूत करने की बात शामिल है। Frontier AI Models भी रहेंगे केंद्र में वार्ता में ऐसे frontier AI models और autonomous agents से पैदा होने वाले risks पर भी चर्चा हो सकती है, जो सीमित human supervision के साथ complex cyber operations कर सकते हैं। हाल के autonomous AI agent incidents ने global AI safety concerns को और बढ़ाया है। Scott Bessent कर सकते हैं US पक्ष का नेतृत्व सूत्रों के अनुसार अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व Treasury Secretary Scott Bessent कर सकते हैं। चीन की ओर से Vice Premier He Lifeng या senior leader Ding Xuexiang संभावित प्रतिनिधि हो सकते हैं। हालांकि participants की final list अभी तय नहीं है। Treasury ने कहा- अभी कोई Meeting तय नहीं इस पूरी development में महत्वपूर्ण बात यह है कि Reuters को U.S. Treasury spokesperson ने बताया कि फिलहाल ऐसी कोई meeting formally planned नहीं है। White House और संबंधित Chinese ministries ने भी proposed talks की official confirmation नहीं की है। इसलिए फिलहाल इसे proposed dialogue के रूप में देखा जा रहा है। Trump-Xi Summit से पहले महत्वपूर्ण पहल प्रस्तावित AI dialogue का समय इसलिए भी अहम है क्योंकि Donald Trump और Chinese President Xi Jinping की 24 सितंबर को Washington में summit होने वाली है। Chinese officials AI safety dialogue को leaders’ summit के संभावित deliverables में से एक मान रहे हैं। source – Reutersजय राष्ट्र न्यूज़

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US-Iran तनाव और बढ़ा: Trump बोले, Iran के Pickaxe Mountain पर जल्द हमला कर सकता है अमेरिका

वॉशिंगटन, 5 सितंबर 2026: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक और बड़ा बयान दिया है। Trump ने कहा कि अमेरिका ईरान के अत्यधिक सुरक्षित Pickaxe Mountain nuclear site को “बहुत जल्द” निशाना बना सकता है। उनके इस बयान से दोनों देशों के बीच एक और बड़े military escalation की आशंका बढ़ गई है। Natanz के पास है Pickaxe Mountain Pickaxe Mountain ईरान के पहले से क्षतिग्रस्त Natanz uranium enrichment facility के पास स्थित है। Reuters के मुताबिक यह एक heavily fortified site है, जहां पहाड़ के भीतर गहराई में दो tunnel complexes मौजूद हैं। इसी वजह से यह ईरान के nuclear infrastructure से जुड़ी बेहद संवेदनशील जगह मानी जा रही है। Trump बोले- बहुत जल्द हो सकता है हमला White House के Oval Office में reporters से बातचीत के दौरान Trump ने कहा कि अमेरिका Pickaxe Mountain को जल्द निशाना बना सकता है। हालांकि उन्होंने संभावित हमले की कोई निश्चित तारीख या operational details नहीं बताईं। US-Iran के बीच पहले से जारी हैं हमले यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब हाल के दिनों में अमेरिका ने ईरान पर नए air strikes किए हैं और Tehran ने भी जवाबी हमले किए हैं। ईरान ने गुरुवार को अमेरिकी सहयोगी Kuwait को भी निशाना बनाया था। इससे Gulf region में तनाव लगातार बना हुआ है। Trump ने संघर्ष को बताया ‘Military Conflict’ Trump ने मौजूदा लड़ाई को full-scale war कहने से परहेज करते हुए इसे “military conflict” बताया। उन्होंने इसे अमेरिका के लिए “small potatoes” भी कहा। वहीं Vice President JD Vance ने भी इससे एक दिन पहले कहा था कि वह मौजूदा स्थिति को युद्ध नहीं कहेंगे। अब तक 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत Associated Press के अनुसार फरवरी से जारी US-Iran confrontation में अब तक 18 अमेरिकी service members की मौत हो चुकी है और अमेरिकी taxpayers पर इसकी लागत 37.5 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद Trump का कहना है कि अमेरिकी कार्रवाई ने ईरान के nuclear programme को कमजोर किया है। Nuclear programme बना विवाद का केंद्र Trump ने दोहराया कि अमेरिका ईरान को nuclear weapon हासिल नहीं करने देगा। Pickaxe Mountain को लेकर उनकी नई चेतावनी इसी wider nuclear dispute के बीच आई है। किसी भी नए strike से Middle East में पहले से जारी तनाव और अधिक बढ़ सकता है। source – Reuters / Associated Pressजय राष्ट्र न्यूज़

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H-1B Visa पर बड़ा झटका? US में Cap-Subject Petitions पर $103,265 अतिरिक्त Fee का प्रस्ताव, भारतीय Professionals पर बड़ा असर संभव

वॉशिंगटन: अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे हजारों skilled foreign professionals, खासकर भारतीयों, के लिए H-1B Visa को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। Donald Trump administration के तहत U.S. Department of Homeland Security (DHS) ने cap-subject H-1B petitions पर $103,265 की नई अतिरिक्त fee लगाने का प्रस्ताव जारी किया है। अगर यह नियम अंतिम रूप में लागू होता है, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेश से skilled workers को H-1B के जरिए नियुक्त करना बेहद महंगा हो सकता है। यह प्रस्ताव 24 अगस्त को जारी हुआ और 25 अगस्त 2026 को Federal Register में publication के लिए निर्धारित है। फिलहाल यह final rule नहीं है और इसे public comments तथा regulatory process से गुजरना होगा। $103,265 की Fee आखिर है क्या? DHS के official proposed rule के मुताबिक हर H-1B cap-subject petition दाखिल करते समय employer को $103,265 की अलग additional fee देनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मौजूदा H-1B filing fees को replace नहीं करेगी। DHS ने स्पष्ट रूप से इसे additional fee के रूप में प्रस्तावित किया है, यानी applicable होने पर existing filing और statutory fees के ऊपर यह रकम जुड़ सकती है। DHS का अनुमान है कि इससे सालाना लगभग $8.8 billion का revenue जुटाया जा सकता है। Agency ने calculation के लिए 85,000 cap-subject petitions और $103,265 प्रति petition का अनुमान इस्तेमाल किया है। हर H-1B Visa पर नहीं लगेगी यह Fee इस खबर का सबसे जरूरी clarification यही है। प्रस्तावित $103,265 fee हर H-1B petition पर लागू करने का प्रस्ताव नहीं है। Official proposal के अनुसार इसका दायरा मुख्य रूप से: H-1B cap-subject petitions, जिसमें U.S. advanced-degree exemption यानी master’s cap के तहत आने वाली petitions भी शामिल हैं, तक सीमित होगा। Cap-exempt H-1B filings को इस specific proposed fee के दायरे में शामिल नहीं किया गया है। Reuters के मुताबिक मौजूदा H-1B renewals और अमेरिका में पहले से student status पर मौजूद कुछ applicants के cases पर भी इस fee का असर नहीं पड़ने की उम्मीद है। Indians पर इतना बड़ा असर क्यों? भारत H-1B programme का सबसे बड़ा beneficiary रहा है। USCIS के latest detailed congressional data के मुताबिक FY 2024 में approved H-1B petitions में लगभग 71% beneficiaries India-born थे। China करीब 12% के साथ दूसरे स्थान पर था। यही वजह है कि H-1B rules में कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय technology professionals, engineers, financial specialists, researchers और U.S. में hiring करने वाली Indian IT companies के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर भारतीय H-1B holder को personally $103,265 देना पड़ेगा। Fee कौन देगा—Employee या Company? H-1B system में petition U.S. employer दाखिल करता है। नई proposed fee भी petitioners यानी employers पर लगाई जाएगी। इसका सीधा अर्थ है कि Indian professional को सामान्य तौर पर अपने pocket से $103,265 USCIS को जमा करने की बात नहीं है। लेकिन अगर employer के लिए एक foreign employee को hire करने की upfront cost $100,000 से ज्यादा बढ़ जाती है, तो इसका असर hiring decisions पर पड़ सकता है। Companies कम H-1B employees hire कर सकती हैं, ज्यादा senior या high-paying positions को प्राथमिकता दे सकती हैं या jobs को दूसरे देशों में shift करने पर विचार कर सकती हैं। DHS ने खुद अपने regulatory analysis में माना है कि proposed rule का substantial number of small entities पर significant economic impact हो सकता है। छोटे Employers और Startups पर ज्यादा दबाव? इस proposal का सबसे बड़ा सवाल startups और small businesses को लेकर है। DHS के FY 2025 data analysis में cap-subject petitions दाखिल करने वाले 28,649 unique petitioners में 14,541 यानी लगभग 51% को small entities के रूप में पहचाना गया था। $103,265 per petition की additional cost एक large multinational company के लिए भी बड़ी रकम है, लेकिन छोटे startup या research-oriented company के लिए यह foreign talent hiring को लगभग असंभव बनाने जैसी स्थिति पैदा कर सकती है। DHS का प्रस्ताव फिलहाल company size या nonprofit status के आधार पर इस fee में सामान्य छूट देने की बात नहीं करता; proposed rule इसे cap-subject petitioners पर broadly लागू करने की बात कहता है। मौजूदा H-1B Fees कितनी हैं? अभी सामान्य Form I-129 H-1B filing fee employer category और filing method के अनुसार अलग होती है। USCIS fee schedule में standard H-1B filing के लिए लगभग $730-$780, जबकि qualifying small employers और nonprofits के लिए लगभग $460 base filing fee का प्रावधान दिखाया गया है। इसके अलावा circumstances के अनुसार Fraud Prevention Fee, Asylum Program Fee और दूसरी statutory fees लग सकती हैं। Reuters के मुताबिक नई policy से पहले typical H-1B application costs broadly $2,000 से $5,000 के range में रहती थीं, हालांकि employer और petition type के अनुसार total अलग हो सकता था। इसीलिए $103,265 का proposed additional charge एक बेहद बड़ा jump माना जा रहा है। पहले भी लगाया गया था $100,000 Payment नई proposal बिल्कुल शून्य से शुरू नहीं हुई है। Trump administration ने September 2025 में Presidential Proclamation के जरिए कुछ नए H-1B petitions से जुड़ा $100,000 payment requirement लागू किया था। लेकिन June 2026 में Massachusetts की federal court ने उस policy को unlawful मानते हुए implementing guidance को vacate कर दिया। Trump administration ने उस फैसले के खिलाफ appeal की है और मामला अभी appellate court में लंबित है। नई $103,265 proposal उस पुराने $100,000 payment से अलग legal mechanism पर आधारित है। क्या $100,000 + $103,265 दोनों देने पड़ सकते हैं? Official Federal Register proposal में एक बेहद महत्वपूर्ण provision है। DHS ने कहा है कि proposed $103,265 fee Presidential Proclamation के $100,000 payment से अलग है। अगर किसी समय petitioner दोनों requirements के दायरे में आता है, तो technically दोनों amounts लागू हो सकते हैं। हालांकि existing Presidential Proclamation का payment requirement 21 September 2026 के आसपास expire होने वाला है, अगर उसे extend या renew नहीं किया जाता। DHS ने भी कहा है कि मौजूदा schedule के अनुसार proclamation proposed rule के effective होने से पहले expire हो सकता है। इसलिए अभी यह नहीं कहा जा सकता कि companies को निश्चित रूप…

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Trump-Canada Trade War और तेज; Canadian Cars-Trucks पर 50% Tariff की धमकी, Canada भी जवाबी कार्रवाई की तैयारी में

वॉशिंगटन/ओटावा: अमेरिका और कनाडा के बीच trade war और गंभीर होता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने Canada में बने सभी cars, trucks और auto parts पर 50% tariff लगाने की धमकी दी है। Trump के मुताबिक नया tariff 1 January 2027 से लागू किया जा सकता है, अगर दोनों देशों के बीच trade dispute का समाधान नहीं निकलता। यह धमकी ऐसे समय आई है जब Washington और Ottawa के बीच कई दिनों से चल रही trade negotiations टूट चुकी हैं। दूसरी तरफ Canadian Prime Minister Mark Carney ने भी साफ संकेत दिया है कि Canada अमेरिकी दबाव के सामने पीछे नहीं हटेगा और जवाबी tariffs लगाएगा। Trump ने क्या कहा? Donald Trump ने Canada पर अमेरिका के साथ unfair trade practices अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि अगर Canadian automobile companies tariffs से बचना चाहती हैं तो उन्हें अपनी manufacturing United States में shift करनी चाहिए। Trump ने चेतावनी दी कि Canada में बने cars, trucks और auto parts पर tariff 50% तक किया जा सकता है। यह नया auto tariff January 2027 से लागू करने की धमकी दी गई है। हालांकि अभी इसे लागू करने वाला अंतिम tariff order प्रभावी नहीं हुआ है। इसलिए headline में इसे “50% tariff की धमकी” कहना ही सही होगा। पहले से 50% Tariff झेल रहे सैकड़ों Canadian Products Cars और trucks को लेकर Trump की नई धमकी से पहले ही अमेरिका ने Canadian products की एक लंबी सूची पर भारी tariffs लगा दिए हैं। AP की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 550 से ज्यादा Canadian products पर 50% tariff लगाया है, जिनकी कुल annual trade value लगभग $20 billion बताई गई है। इनमें honey, cosmetics, clothing, hockey sticks और कई दूसरे consumer products शामिल हैं। ये tariffs पिछले सप्ताह लागू हुए, जब आखिरी समय पर US-Canada negotiations किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकीं। Deal लगभग हो गई थी Final, फिर कैसे बिगड़ी बात? Trade tensions के बीच कुछ दिन पहले तक दोनों पक्ष किसी agreement के बेहद करीब बताए जा रहे थे। Reuters के मुताबिक proposed deal में Canadian-built vehicles पर अमेरिकी tariff को 25% से घटाकर 15% करने और steel तथा aluminum पर tariffs कम करने जैसे प्रावधानों पर बातचीत चल रही थी। लेकिन final negotiations में Canadian content, auto parts exemptions और medium तथा heavy-duty trucks जैसे मुद्दों पर मतभेद बने रहे। आखिरकार talks collapse हो गईं और दोनों देशों ने एक-दूसरे पर बातचीत विफल करने का आरोप लगाया। Canada भी लगाएगा जवाबी Tariffs Trump administration के फैसलों के बाद Canada ने भी retaliatory action की तैयारी कर ली है। Canadian government ने अमेरिकी products पर dollar-for-dollar retaliatory tariffs लगाने का ऐलान किया है। ये जवाबी tariffs 8 September 2026 से लागू होने हैं। Canada जिन अमेरिकी goods को निशाना बना सकता है उनमें steel, electronics, agricultural equipment और दूसरे products शामिल हैं। 25 August की ताजा development यह है कि Canada अपनी retaliatory tariff list और affected workers तथा industries के लिए support measures की विस्तृत घोषणा करने की तैयारी में है। PM Mark Carney का America पर बड़ा आरोप Canadian Prime Minister Mark Carney ने Trump administration पर Canada की economic sovereignty को कमजोर करने की कोशिश का आरोप लगाया है। Carney का कहना है कि Canada केवल ऐसी trade deal स्वीकार करेगा जो देश के workers और businesses के लिए fair हो। उन्होंने हाल की अमेरिकी trade proposal को economic और national interest के लिहाज से स्वीकार्य नहीं माना। Carney ने Canada की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने और Europe, Asia तथा दूसरे global markets के साथ trade relationships बढ़ाने की रणनीति पर भी जोर दिया है। Canada-US Auto Industry पर सबसे बड़ा खतरा Trump की 50% tariff धमकी का सबसे बड़ा असर North American automobile industry पर पड़ सकता है। Canada और United States की automobile supply chains बेहद closely integrated हैं। कई vehicles और their components manufacturing process के दौरान दोनों देशों की सीमा को एक से ज्यादा बार पार करते हैं। ऐसे में imports पर बड़ा tariff लगाने से केवल Canadian companies ही नहीं, बल्कि American manufacturers की production costs भी बढ़ सकती हैं। Industry representatives ने supply-chain disruption को लेकर चिंता जताई है। Ford, GM समेत Auto Companies पर असर नई tariff धमकी सामने आने के बाद global automobile companies के shares पर भी दबाव दिखाई दिया। Reuters के मुताबिक Ford, General Motors और Toyota समेत कुछ major automakers के stocks में गिरावट देखी गई क्योंकि investors को आशंका है कि Canada-US trade war vehicle production और costs को प्रभावित कर सकता है। अगर 50% tariff वास्तव में January 2027 से लागू होता है तो Canada में manufactured vehicles की American market में कीमत काफी बढ़ सकती है। Canada America के लिए कितना जरूरी? Canada और United States दुनिया के सबसे बड़े bilateral trading relationships में से एक साझा करते हैं। Canada की exports का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार में जाता है। वहीं United States भी Canada से oil, potash, metals, vehicles और कई critical raw materials खरीदता है। यही वजह है कि trade war लंबा खिंचने पर नुकसान केवल Canada तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी manufacturers और consumers पर भी higher costs का दबाव पड़ सकता है। Ontario ने दी Critical Minerals और Electricity की चेतावनी Canada के सबसे बड़े province Ontario के Premier Doug Ford ने भी अमेरिका को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि अगर trade dispute और बिगड़ता है तो Canada electricity और critical minerals जैसे strategic exports को भी leverage के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि अभी Canada ने इन exports को रोकने का अंतिम फैसला नहीं किया है। USMCA पर भी मंडराया संकट बढ़ता विवाद सिर्फ tariffs तक सीमित नहीं है। इससे US-Mexico-Canada Agreement (USMCA) के भविष्य पर भी सवाल उठ रहे हैं। दोनों देशों के बीच पिछले कई महीनों से trade pact, auto industry, steel-aluminum, dairy और अन्य sectors पर विवाद चलता रहा है। हाल की negotiations का टूटना इस economic relationship में और uncertainty जोड़ता है। USMCA ने North America में integrated manufacturing और tariff-free trade के बड़े हिस्से को आधार दिया था। क्या 50% Auto…

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