महात्मा गांधी को 5 बार मिला Nobel Peace Prize के लिए नामांकन, फिर भी नहीं मिला सम्मान
नई दिल्ली, 20 अक्टूबर 2026: महात्मा गांधी को दुनिया भर में अहिंसा और सत्याग्रह के सबसे प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है। हालांकि, उनके जीवन से जुड़ा एक ऐतिहासिक तथ्य आज भी चर्चा का विषय है—गांधी को कभी Nobel Peace Prize नहीं मिला, जबकि आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें पांच अलग-अलग वर्षों में इस सम्मान के लिए नामांकित किया गया था। ये वर्ष थे 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948। पांच बार हुआ नामांकन Nobel Prize के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, महात्मा गांधी का नाम पहली बार 1937 में शांति पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया था। इसके बाद 1938 और 1939 में भी उन्हें नामांकन मिला। भारत की स्वतंत्रता के वर्ष 1947 में और फिर 1948 में भी उनका नाम पुरस्कार के लिए सामने आया। 1948 में क्यों नहीं मिला Nobel Peace Prize? 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। उसी वर्ष Norwegian Nobel Committee ने किसी भी व्यक्ति को शांति पुरस्कार नहीं दिया। समिति ने इसके पीछे यह तर्क दिया कि उस समय कोई उपयुक्त जीवित उम्मीदवार नहीं था। Nobel Prize की आधिकारिक ऐतिहासिक सामग्री में गांधी को पुरस्कार न मिलना एक महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में दर्ज है। उनके योगदान और उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल आज भी उठता है कि यदि वे जीवित रहते, तो क्या उन्हें यह सम्मान मिल सकता था। क्या मरणोपरांत दिया जा सकता था पुरस्कार? गांधी की हत्या के बाद उन्हें मरणोपरांत Nobel Peace Prize देने की संभावना पर विचार किया गया था। हालांकि, उस समय लागू नियमों और समिति की व्याख्या के बीच कई व्यावहारिक तथा कानूनी सवाल थे। Nobel Prize की ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, समिति के अधिकांश सदस्य मरणोपरांत पुरस्कार देने के पक्ष में नहीं थे। अंततः गांधी को यह सम्मान नहीं दिया गया। Dalai Lama को पुरस्कार के दौरान गांधी का जिक्र 1989 में Dalai Lama को Nobel Peace Prize से सम्मानित किए जाने के अवसर पर समिति के अध्यक्ष ने महात्मा गांधी की विरासत का उल्लेख किया था। इस सम्मान को गांधी की स्मृति और अहिंसा के उनके विचारों के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में भी देखा गया। Nobel से कहीं बड़ी है गांधी की विरासत महात्मा गांधी को Nobel Peace Prize भले ही नहीं मिला, लेकिन अहिंसा, सत्याग्रह और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के उनके सिद्धांतों ने दुनिया भर के आंदोलनों को प्रभावित किया। Martin Luther King Jr. और Nelson Mandela सहित कई नेताओं के विचारों और संघर्षों पर गांधी की विरासत का प्रभाव देखा जाता है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी व्यक्ति के ऐतिहासिक योगदान का महत्व केवल पुरस्कारों से तय नहीं होता। गांधी के विचार आज भी शांति, समानता और नागरिक अधिकारों से जुड़ी चर्चाओं में प्रासंगिक बने हुए हैं। स्रोत: NobelPrize.org / Norwegian Nobel Committee जय राष्ट्र न्यूज़

