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आज Infantry Day—27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना की पहली टुकड़ी श्रीनगर पहुंची थी

नई दिल्ली: भारत में आज, 27 अक्टूबर 2026, Infantry Day मनाया जा रहा है। यह दिन भारतीय सेना की उस ऐतिहासिक कार्रवाई की याद में मनाया जाता है, जब 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना की पहली infantry troops को हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुंचाया गया था। इस सैन्य अभियान ने जम्मू-कश्मीर की रक्षा में निर्णायक भूमिका निभाई थी। 27 अक्टूबर 1947 को क्या हुआ था? 1947 में जम्मू-कश्मीर पर कबायली हमलावरों और पाकिस्तान समर्थित बलों के दबाव के बीच महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ Instrument of Accession पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद भारतीय सेना को तुरंत श्रीनगर भेजा गया ताकि घाटी और एयरफील्ड की सुरक्षा की जा सके। पहली टुकड़ी श्रीनगर एयरफील्ड पर उतरी भारतीय सेना की 1 Sikh Battalion की टुकड़ी 27 अक्टूबर 1947 की सुबह श्रीनगर एयरफील्ड पहुंची। इस deployment को स्वतंत्र भारत के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में गिना जाता है। भारतीय सैनिकों ने एयरफील्ड को सुरक्षित किया और आगे बढ़ रहे हमलावरों का मुकाबला शुरू किया। Infantry Day क्यों मनाया जाता है? Infantry Day का उद्देश्य उन सैनिकों के साहस और बलिदान को याद करना है जिन्होंने 1947 में जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। यह दिन भारतीय सेना की infantry units की भूमिका, readiness और sacrifice को सम्मान देने का अवसर भी है। श्रीनगर की रक्षा क्यों थी इतनी अहम? अगर श्रीनगर एयरफील्ड पर हमलावर कब्जा कर लेते, तो भारतीय सेना के लिए घाटी में तेजी से reinforcement पहुंचाना बेहद मुश्किल हो जाता। इसी वजह से 27 अक्टूबर की troop airlift को पूरे अभियान का turning point माना जाता है। भारतीय सेना ने दी श्रद्धांजलि हर साल Infantry Day पर सेना के वरिष्ठ अधिकारी और पूर्व सैनिक युद्ध स्मारकों पर शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देते हैं। इस मौके पर 1947 की सैन्य कार्रवाई और infantry के योगदान को याद किया जाता है। 79 साल बाद भी क्यों खास है यह दिन? 2026 में इस ऐतिहासिक सैन्य कार्रवाई को 79 वर्ष पूरे हो रहे हैं। भारतीय सेना के लिए यह दिन केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि duty, courage और rapid response की परंपरा का प्रतीक भी है। स्रोत – Indian Army, Press Information Bureau, Ministry of Defence जय राष्ट्र न्यूज़

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महात्मा गांधी को 5 बार मिला Nobel Peace Prize के लिए नामांकन, फिर भी नहीं मिला सम्मान

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर 2026: महात्मा गांधी को दुनिया भर में अहिंसा और सत्याग्रह के सबसे प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है। हालांकि, उनके जीवन से जुड़ा एक ऐतिहासिक तथ्य आज भी चर्चा का विषय है—गांधी को कभी Nobel Peace Prize नहीं मिला, जबकि आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें पांच अलग-अलग वर्षों में इस सम्मान के लिए नामांकित किया गया था। ये वर्ष थे 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948। पांच बार हुआ नामांकन Nobel Prize के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, महात्मा गांधी का नाम पहली बार 1937 में शांति पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया था। इसके बाद 1938 और 1939 में भी उन्हें नामांकन मिला। भारत की स्वतंत्रता के वर्ष 1947 में और फिर 1948 में भी उनका नाम पुरस्कार के लिए सामने आया। 1948 में क्यों नहीं मिला Nobel Peace Prize? 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। उसी वर्ष Norwegian Nobel Committee ने किसी भी व्यक्ति को शांति पुरस्कार नहीं दिया। समिति ने इसके पीछे यह तर्क दिया कि उस समय कोई उपयुक्त जीवित उम्मीदवार नहीं था। Nobel Prize की आधिकारिक ऐतिहासिक सामग्री में गांधी को पुरस्कार न मिलना एक महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में दर्ज है। उनके योगदान और उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल आज भी उठता है कि यदि वे जीवित रहते, तो क्या उन्हें यह सम्मान मिल सकता था। क्या मरणोपरांत दिया जा सकता था पुरस्कार? गांधी की हत्या के बाद उन्हें मरणोपरांत Nobel Peace Prize देने की संभावना पर विचार किया गया था। हालांकि, उस समय लागू नियमों और समिति की व्याख्या के बीच कई व्यावहारिक तथा कानूनी सवाल थे। Nobel Prize की ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, समिति के अधिकांश सदस्य मरणोपरांत पुरस्कार देने के पक्ष में नहीं थे। अंततः गांधी को यह सम्मान नहीं दिया गया। Dalai Lama को पुरस्कार के दौरान गांधी का जिक्र 1989 में Dalai Lama को Nobel Peace Prize से सम्मानित किए जाने के अवसर पर समिति के अध्यक्ष ने महात्मा गांधी की विरासत का उल्लेख किया था। इस सम्मान को गांधी की स्मृति और अहिंसा के उनके विचारों के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में भी देखा गया। Nobel से कहीं बड़ी है गांधी की विरासत महात्मा गांधी को Nobel Peace Prize भले ही नहीं मिला, लेकिन अहिंसा, सत्याग्रह और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के उनके सिद्धांतों ने दुनिया भर के आंदोलनों को प्रभावित किया। Martin Luther King Jr. और Nelson Mandela सहित कई नेताओं के विचारों और संघर्षों पर गांधी की विरासत का प्रभाव देखा जाता है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी व्यक्ति के ऐतिहासिक योगदान का महत्व केवल पुरस्कारों से तय नहीं होता। गांधी के विचार आज भी शांति, समानता और नागरिक अधिकारों से जुड़ी चर्चाओं में प्रासंगिक बने हुए हैं। स्रोत: NobelPrize.org / Norwegian Nobel Committee जय राष्ट्र न्यूज़

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सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 20वें दिन में, 20 जुलाई तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान

नई दिल्ली: पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुक्रवार को 20वें दिन में प्रवेश कर गई। जंतर-मंतर पर जारी इस आंदोलन के दौरान वांगचुक ने कहा कि वे 20 जुलाई तक हर हाल में आंदोलन जारी रखेंगे और उसी दिन प्रस्तावित शांतिपूर्ण संसद मार्च में हिस्सा लेंगे। उनकी सेहत को लेकर बढ़ती चिंता के बीच समर्थकों, सामाजिक संगठनों और कई सार्वजनिक हस्तियों ने सरकार से संवाद शुरू करने की अपील की है। क्या कहा सोनम वांगचुक ने? वांगचुक ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि वे शारीरिक रूप से कमजोर महसूस कर रहे हैं, लेकिन मानसिक रूप से पूरी तरह दृढ़ हैं। उन्होंने लोगों से 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की और कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाना उनका उद्देश्य है। सेहत को लेकर बढ़ी चिंता भूख हड़ताल लंबी खिंचने के कारण वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उनका वजन काफी कम हुआ है और चिकित्सकीय निगरानी जारी है। इसके बावजूद उन्होंने आंदोलन जारी रखने का फैसला दोहराया है। आंदोलन की प्रमुख मांगें वांगचुक का कहना है कि उनका आंदोलन लद्दाख से जुड़े पर्यावरणीय और प्रशासनिक मुद्दों के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े सवालों पर ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। उनका आग्रह है कि सरकार इन मुद्दों पर संवाद कर ठोस समाधान निकाले। राजनीतिक और सार्वजनिक प्रतिक्रिया आंदोलन को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और सार्वजनिक हस्तियों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई नेताओं ने सरकार से बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। फिल्मकार किरण राव ने भी संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि अभिनेता आमिर खान ने वांगचुक के स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की। 20 जुलाई के संसद मार्च पर नजर अब सबकी नजर 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च पर है। वांगचुक ने कहा है कि यह मार्च शांतिपूर्ण रहेगा और इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात संसद तक पहुंचाना है। सुरक्षा और प्रशासनिक तैयारियों पर भी नजर रखी जा रही है। निष्कर्ष सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुकी है। आंदोलन के 20वें दिन उनकी सेहत, सरकार की संभावित प्रतिक्रिया और 20 जुलाई के संसद मार्च को लेकर पूरे देश की नजर इस घटनाक्रम पर बनी हुई है। Source: PTI एवं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट। Original Report: उपलब्ध आधिकारिक और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर तैयार। जय राष्ट्र न्यूज़

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क्या आप जानते हैं?

भारत का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान में स्थित है। यह पश्चिम बंगाल के दक्षिणी भाग में गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के विशाल डेल्टा क्षेत्र में फैला हुआ है। सुंदरबन केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र माना जाता है। सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान को वर्ष 1987 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) का दर्जा मिला। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है और यहां पाए जाने वाले रॉयल बंगाल टाइगर इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं। इसके अलावा खारे पानी के मगरमच्छ, चीतल, डॉल्फ़िन, समुद्री कछुए और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी भी यहां पाए जाते हैं। मैंग्रोव वन तटीय क्षेत्रों को समुद्री तूफानों, चक्रवातों और तटीय कटाव से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये बड़ी मात्रा में कार्बन का भंडारण भी करते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। आज सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान न केवल एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के संरक्षण का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। रोचक तथ्य जय राष्ट्र न्यूज़

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क्या आप जानते हैं? भारत का सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग NH-44 है, जिसकी लंबाई लगभग 3,745 किलोमीटर है।

नई दिल्ली, 26 जून। भारत का सड़क नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े सड़क नेटवर्कों में से एक माना जाता है। इसी नेटवर्क का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highways) हैं, जो देश के विभिन्न राज्यों को आपस में जोड़ते हैं। इन्हीं में राष्ट्रीय राजमार्ग-44 (NH-44) भारत का सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग है। श्रीनगर से कन्याकुमारी तक का सफर NH-44 जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से शुरू होकर तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक जाता है। इसकी कुल लंबाई लगभग 3,745 किलोमीटर है। यह राजमार्ग उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक सीधा सड़क संपर्क उपलब्ध कराता है। कई राज्यों से होकर गुजरता है यह राष्ट्रीय राजमार्ग जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान (कुछ हिस्सों से जुड़ाव), मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु सहित कई राज्यों से होकर गुजरता है। इसके माध्यम से देश के प्रमुख शहर और औद्योगिक क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पुराने कई राष्ट्रीय राजमार्गों का हिस्सा वर्ष 2010 में राष्ट्रीय राजमार्गों की नई नंबरिंग प्रणाली लागू होने के बाद NH-44 का गठन किया गया। इसमें पुराने NH-1A, NH-1, NH-2, NH-3, NH-7 और NH-75 के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग बनाया गया। व्यापार और परिवहन की जीवनरेखा NH-44 देश के व्यापार, उद्योग और माल परिवहन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस मार्ग से प्रतिदिन हजारों मालवाहक वाहन और लाखों यात्री सफर करते हैं। कृषि उत्पादों से लेकर औद्योगिक सामान तक की आपूर्ति में इस राजमार्ग की अहम भूमिका है। पर्यटन को भी मिलता है बढ़ावा यह राजमार्ग देश के अनेक प्रमुख धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यटन स्थलों को जोड़ता है। इसके कारण घरेलू और विदेशी पर्यटकों के लिए यात्रा आसान होती है तथा विभिन्न राज्यों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क भी मजबूत होता है। क्या आप जानते हैं? NH-44 केवल एक सड़क नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह देश के उत्तर और दक्षिण को जोड़ते हुए विकास और संपर्क का मजबूत माध्यम बना हुआ है। स्रोत:सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH), भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) मूल रिपोर्ट:सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, NHAI तथा सार्वजनिक जानकारी के आधार पर जय राष्ट्र न्यूज़

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क्या आप जानते हैं? भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान ‘जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान’ 1936 में स्थापित किया गया था

भारत प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता से समृद्ध देशों में गिना जाता है। देश में सैकड़ों वन्यजीव अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान मौजूद हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान कौन सा था? इसका उत्तर है – जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान। जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1936 में की गई थी। उस समय इसका नाम “हैली नेशनल पार्क” रखा गया था। बाद में इसका नाम प्रसिद्ध पर्यावरण प्रेमी, लेखक और वन्यजीव संरक्षक जिम कॉर्बेट के सम्मान में बदलकर जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान कर दिया गया। यह राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड के नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल जिलों में स्थित है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों, नदियों और विविध वन्यजीवों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां बड़ी संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक हर वर्ष घूमने आते हैं। जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान विशेष रूप से बंगाल टाइगर के संरक्षण के लिए जाना जाता है। वर्ष 1973 में भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए “प्रोजेक्ट टाइगर” की शुरुआत भी इसी राष्ट्रीय उद्यान से हुई थी। इस परियोजना का उद्देश्य देश में बाघों की घटती संख्या को बचाना और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण करना था। राष्ट्रीय उद्यान में बाघों के अलावा हाथी, तेंदुआ, हिरण, सांभर, जंगली सूअर, मगरमच्छ और पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियां पाई जाती हैं। जैव विविधता की दृष्टि से यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों में से एक माना जाता है। आज जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान न केवल वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण जागरूकता और इको-टूरिज्म का भी एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह स्थान प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव फोटोग्राफरों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी यह जानकारी महत्वपूर्ण मानी जाती है कि भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान है और इसकी स्थापना वर्ष 1936 में हुई थी। स्रोत:वन एवं पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सार्वजनिक जानकारी मूल रिपोर्ट:सामान्य ज्ञान एवं ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर जय राष्ट्र न्यूज़

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क्या भारत को सभी बड़ी प्रवेश परीक्षाएं CBT मोड में कर देनी चाहिए?

जय राष्ट्र न्यूज़ | ओपिनियन डेस्क | 22 जून 2026 प्रस्तावना हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं को लेकर सुरक्षा, पारदर्शिता और संचालन संबंधी चुनौतियों पर लगातार चर्चा होती रही है। NEET, CUET और अन्य बड़ी परीक्षाओं से जुड़े विवादों के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि क्या भारत को सभी प्रमुख प्रवेश परीक्षाएं पूरी तरह CBT (Computer Based Test) मोड में आयोजित कर देनी चाहिए। यह केवल तकनीकी बदलाव का मुद्दा नहीं है, बल्कि शिक्षा प्रणाली के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न भी है। CBT मोड के पक्ष में तर्क CBT परीक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ इसकी पारदर्शिता और सुरक्षा को माना जाता है। प्रश्नपत्रों की डिजिटल डिलीवरी होने से पेपर लीक की संभावना काफी हद तक कम हो सकती है। इसके अलावा परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया तेज होती है और उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में मानवीय त्रुटियों की संभावना भी कम रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक परीक्षा संचालन को अधिक प्रभावी और आधुनिक बना सकती है। परीक्षा प्रक्रिया में तेजी ऑनलाइन परीक्षाओं का एक महत्वपूर्ण लाभ यह भी है कि परिणाम अपेक्षाकृत जल्दी घोषित किए जा सकते हैं। इससे छात्रों को प्रवेश प्रक्रिया और काउंसलिंग के लिए अधिक समय मिलता है। कई विकसित देशों में बड़ी प्रवेश परीक्षाएं पहले से ही डिजिटल माध्यम से आयोजित की जाती हैं। चुनौतियां भी कम नहीं हालांकि CBT मोड के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां भी मौजूद हैं। भारत जैसे विशाल देश में अभी भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर सभी क्षेत्रों में समान रूप से उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के छात्रों को इंटरनेट, कंप्यूटर और तकनीकी संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती हो सकती है। डिजिटल विभाजन का मुद्दा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सभी परीक्षाएं अचानक ऑनलाइन कर दी जाएं तो डिजिटल संसाधनों की कमी वाले छात्रों को नुकसान हो सकता है। इसलिए किसी भी बड़े बदलाव से पहले तकनीकी ढांचे को मजबूत करना और सभी छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक होगा। JEE और अन्य परीक्षाओं का अनुभव JEE Main जैसी परीक्षाएं वर्षों से CBT मोड में आयोजित की जा रही हैं। इस मॉडल ने कई सकारात्मक परिणाम दिए हैं और इसे अपेक्षाकृत सफल माना जाता है। इसी अनुभव के आधार पर कुछ विशेषज्ञ अन्य बड़ी परीक्षाओं को भी धीरे-धीरे डिजिटल मोड में स्थानांतरित करने का समर्थन करते हैं। संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता कई शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण बदलाव के बजाय चरणबद्ध रणनीति अपनाई जानी चाहिए। जहां संभव हो वहां CBT मोड को बढ़ावा दिया जाए और साथ ही तकनीकी पहुंच को मजबूत किया जाए। इससे छात्रों और संस्थानों दोनों को नए सिस्टम के अनुरूप ढलने का समय मिल सकेगा। निष्कर्ष CBT मोड पारदर्शिता, सुरक्षा और दक्षता के लिहाज से कई लाभ प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ डिजिटल पहुंच और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। भारत को सभी बड़ी प्रवेश परीक्षाओं को CBT मोड में बदलने पर विचार करते समय तकनीकी क्षमता, क्षेत्रीय असमानताओं और छात्रों की सुविधा को समान महत्व देना होगा। भविष्य की परीक्षा प्रणाली संभवतः अधिक डिजिटल होगी, लेकिन उसका क्रियान्वयन संतुलित और समावेशी होना चाहिए। स्रोत: National Testing Agency (NTA) मूल रिपोर्ट:https://nta.ac.in जय राष्ट्र न्यूज़

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भारत ने चीन को पछाड़ा: दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बनने की कहानी

जय राष्ट्र न्यूज रिपोर्टर वेबसाइट | 06 जनवरी 2026 | कृषि संवाददाता भारत ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। देश ने चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बनने का गौरव प्राप्त कर लिया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 5 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में इसकी घोषणा की। 2025 में भारत का चावल उत्पादन 150.18 मिलियन टन तक पहुंच गया, जबकि चीन का उत्पादन 145.28 मिलियन टन रहा। यह पहली बार है जब भारत ने चावल उत्पादन में चीन को पीछे छोड़ा है। यह खबर न केवल भारतीय किसानों के लिए गर्व की बात है, बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है। चावल भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। करोड़ों लोग चावल पर निर्भर हैं, और यह देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने चावल उत्पादन में तेजी से प्रगति की है। लेकिन चीन को पछाड़ना एक बड़ी मील का पत्थर है। आइए जानते हैं कि यह कैसे संभव हुआ, इसके पीछे क्या कारण हैं, और इसका क्या असर पड़ेगा। चावल उत्पादन का इतिहास: भारत और चीन की तुलना चावल उत्पादन में चीन लंबे समय से दुनिया का лидер रहा है। 2020 तक चीन का सालाना उत्पादन लगभग 210 मिलियन टन paddy (कच्चा चावल) था, जबकि भारत का 180 मिलियन टन के आसपास। लेकिन milled rice (प्रोसेस्ड चावल) में भी चीन आगे था। हालांकि, भारत ने धीरे-धीरे अपनी उत्पादकता बढ़ाई। 2024-25 के फसल वर्ष में भारत का उत्पादन 150.18 मिलियन टन milled rice तक पहुंच गया, जो चीन के 145.28 मिलियन टन से अधिक है। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। भारत सरकार की नीतियां, वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों की मेहनत का नतीजा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले 11 वर्षों में भारत ने 3,236 उच्च उपज वाली फसल किस्में विकसित की हैं, जो 1969 से 2014 तक की कुल 3,969 से अधिक हैं। ये किस्में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मजबूत हैं और अधिक उत्पादन देती हैं। चीन में चावल उत्पादन स्थिर रहा, लेकिन भारत ने नई तकनीकों से आगे निकल गया। चीन की कुछ समस्याएं जैसे भूमि प्रदूषण और जल संकट ने भी इसमें भूमिका निभाई हो सकती है, लेकिन मुख्य कारण भारत की प्रगति है। कैसे हुआ यह चमत्कार? मुख्य कारण भारत के चावल उत्पादन में वृद्धि के पीछे कई कारक हैं। सबसे महत्वपूर्ण है उच्च उपज वाली बीज किस्मों का विकास। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, “यह मील का पत्थर उच्च उपज वाले बीज किस्मों और कृषि विज्ञान में प्रगति से संभव हुआ है। भारत अब वैश्विक चावल बाजारों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन चुका है।” 5 जनवरी को मंत्री ने 184 नई फसल किस्मों का अनावरण किया, जो 25 विभिन्न फसलों से संबंधित हैं। इनमें 122 अनाज, 6 दालें, 13 तिलहन, 11 चारा फसलें, 6 गन्ना किस्में, 24 कपास किस्में, और जूट व तंबाकू की एक-एक किस्म शामिल हैं। ये किस्में उत्पादकता बढ़ाने, गुणवत्ता सुधारने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए डिजाइन की गई हैं। चावल की कुछ प्रमुख नई किस्में हैं: सरकार ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि इन नई किस्मों को जल्द से जल्द किसानों तक पहुंचाया जाए। इसके अलावा, कृषि अनुसंधान में निवेश बढ़ाया गया है। भारत ने पश्चिमी बाजारों से वैध रूप से इन किस्मों को लाइसेंस लिया है, जबकि चीन पर जासूसी और बौद्धिक संपदा चोरी के आरोप लगते रहे हैं। पूर्वी भारत में ‘ग्रीन रिवोल्यूशन इन ईस्टर्न इंडिया’ पहल चल रही है। असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सब्सिडी, प्रोत्साहन और उच्च गुणवत्ता वाले खाद दिए जा रहे हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के वाइस चांसलर डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने कहा कि पंजाब की सफलता को पूर्वी भारत में दोहराया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पानी की कमी और पराली जलाने जैसी पर्यावरणीय समस्याएं हो सकती हैं। PAU बाढ़ सहनशील चावल किस्में विकसित कर रहा है, जो पूर्वी क्षेत्रों की बाढ़ वाली जमीनों के लिए उपयोगी होंगी। ये प्रयास जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करेंगे। आर्थिक और वैश्विक प्रभाव यह उपलब्धि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है। भारत अब चावल का निर्यातक बन चुका है। 2024-25 में कृषि निर्यात रिकॉर्ड 450,840 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें चावल का हिस्सा लगभग 24% है, यानी 105,720 करोड़ रुपये। भारत 172 देशों को चावल निर्यात कर रहा है। पिछले दशक में निर्यात दोगुना होकर 20 मिलियन टन से अधिक हो गया है। वैश्विक स्तर पर, यह खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा। मंत्री चौहान ने कहा, “भारत की गोदाम भरे हुए हैं, और हम दुनिया को चावल सप्लाई कर रहे हैं।” जलवायु संकट और खाद्य असुरक्षा के दौर में भारत की भूमिका बढ़ेगी। निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, और कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। किसानों की आय बढ़ेगी। नई किस्में कम पानी और कम लागत में अधिक उत्पादन देंगी। सरकार आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। दालों और तिलहनों में आत्मनिर्भरता के लिए भी प्रयास हो रहे हैं, ताकि आयात कम हो। चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं सफलता के साथ चुनौतियां भी हैं। बढ़ते उत्पादन से पानी की कमी हो सकती है। पंजाब और हरियाणा में भूजल स्तर गिर रहा है। पराली जलाने से प्रदूषण बढ़ता है। पूर्वी भारत में बाढ़ और सूखे की समस्या है। इसलिए, सतत कृषि पर जोर देना जरूरी है। सरकार की योजना है कि दालों और तिलहनों पर फोकस किया जाए। वैज्ञानिकों को निर्देश दिए गए हैं कि आयात निर्भरता कम करने के लिए काम करें। जलवायु सहनशील बीजों से कृषि में क्रांति आएगी। भविष्य में भारत चावल उत्पादन को 200 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य रख सकता है। निर्यात बढ़ाकर विदेशी मुद्रा कमाई जाएगी। किसानों को ट्रेनिंग, सब्सिडी और बाजार पहुंच प्रदान की जाएगी। निष्कर्ष: गर्व का पल भारत का चीन को चावल उत्पादन में पछाड़ना एक बड़ी जीत है। यह किसानों की मेहनत, वैज्ञानिकों की बुद्धिमत्ता और सरकार की नीतियों का परिणाम है। इससे देश आत्मनिर्भर बनेगा और दुनिया में अपनी जगह मजबूत करेगा। लेकिन सतत विकास पर ध्यान देना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी…

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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं: जानिए लक्ष्मी-गणेश पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि, आज इन शुभ योगों में मनेगा पर्व

हर साल की तरह, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या यानी दीपावाली का त्योहार आज देश भर में धूम-धाम से मनाया जाएगा. दिवाली पर महालक्ष्मी के पूजन का विशेष विधान है. इस दिन संध्या और रात्रि के समय शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी, विघ्नहर्ता भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा और आराधना की जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक अमावस्या की अंधेरी रात में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक पर आती हैं और हर घर में विचरण करती हैं, भक्तों को इच्छापूर्ति का आशीर्वाद देती हैं. आज मनाई जा रही दिवाली, जानें तिथि और महत्व पंचांग के अनुसार, 20 अक्टूबर यानी आज दिवाली का पर्व मनाया जा रहा है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान राम चौदह वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, और अयोध्या वासियों ने उनका स्वागत दीप जलाकर किया था, तभी से दिवाली का पर्व मनाया जाता है. दिवाली की तिथि (दीपावली 2025 Tithi): पंचांग के अनुसार, इस बार कार्तिक अमावस्या तिथि की शुरुआत 20 अक्टूबर यानी आज दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर हो चुकी है और तिथि का समापन 21 अक्टूबर को शाम 5 बजकर 55 मिनट पर होगा दिवाली 2025: लक्ष्मी-गणेश पूजन का शुभ मुहूर्त आज दिवाली की पूजा के लिए दो खास मुहूर्त प्राप्त हो रहे हैं, जो इस प्रकार हैं: पहला मुहूर्त (प्रदोष काल): प्रदोष काल की शुरुआत आज शाम 5 बजकर 46 मिनट से होगी और इसका समापन रात 8 बजकर 18 मिनट पर होगा. दूसरा मुहूर्त (स्थिर लग्न – वृषभ काल): स्थिर लग्न का वृषभ काल में भी मां लक्ष्मी के पूजन का अच्छा मुहूर्त माना जाता है, जो शाम 7 बजकर 8 मिनट से शुरू होकर रात 9 बजकर 3 मिनट पर समाप्त होगा. इन दोनों मुहूर्तों के अलावा, मां लक्ष्मी की पूजा का एक खास मुहूर्त शाम 7 बजकर 08 मिनट से शुरू होकर रात 8 बजकर 18 मिनट पर समाप्त हो जाएगा, जिसकी अवधि 1 घंटे 11 मिनट की रहेगी. इसके अतिरिक्त, इस दिन महानिशीथ काल मध्यरात्रि 11 बजकर 41 मिनट से शुरू होकर अर्धरात्रि 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा, जिसका विशेष महत्व तांत्रिक पूजा और साधकों के लिए होता है. दिवाली 2025: आज बन रहे कई शुभ योग दिवाली का यह पर्व आज कई सारे शुभ योगों के बीच मनाया जाएगा, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है: हंस महापुरुष राजयोग: इस दिन देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क राशि में विराजमान होंगे, जिससे हंस महापुरुष राजयोग का निर्माण हो रहा है. वैभव लक्ष्मी राजयोग: शुक्र और चंद्रमा की शुभ स्थिति से इस दिन वैभव लक्ष्मी राजयोग का निर्माण हो रहा है. बुधादित्य राजयोग: तुला राशि में सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य राजयोग का निर्माण भी होगा. इसके अलावा, शनि मीन राशि में वक्री रहेंगे. इन शुभ योगों के कारण दिवाली पर की गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी मानी जाएगी. दिवाली पर पूजन सामग्री और विधि दिवाली के दिन पूजा करने से पहले कुछ आवश्यक पूजन सामग्री अवश्य एकत्र कर लें, जिसमें शामिल हैं रोली, कुमकुम, चंदन, अक्षत, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, पूजा की चौकी, लाल कपड़ा, पान, सुपारी, पंचामृत, रुई की बत्ती, नारियल, गंगाजल, फल, फूल, कलश, आम के पत्ते, मौली, जनेऊ, दूर्वा, कपूर, धूप, दीपक, खील, बताशे, मिठाई आदि.

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धनतेरस पर सोने के दाम में भारी उछाल, चांदी हुई इतनी सस्ती, जानें आज का ताजा रेट

धनतेरस पर सोने के दाम में भारी उछाल, चांदी हुई इतनी सस्ती, जानें आज का ताजा रेट 

आज धनतेरस का त्योहार है और आज के दिन लोग खरीदारी के लिए सुनार की दुकान पर जरूर जाते हैं. ऐसे में अगर आप सोने चांदी की खरीदारी करने की सोच रहे हैं, या फिर सोने चांदी में निवेश की योजना बना रहे हैं, तो यह आज आपके लिए जरुरी खबर है. बता दें कि सर्राफा बाजार में सोने की कीमत में उछाल देखने को मिला है. तो वहीं दूसरी तरफ चांदी की कीमत में लंबे समय बाद गिरावट आई है. आइए Bankbazar.com के अनुसार जानते हैं सर्राफा बाजार में बिकने वाले सोने-चांदी की कीमत… सोने का भाव (Delhi Gold Price) Bankbazaar.com के मुताबिक, अगर बात की जाए राजधानी दिल्ली के सर्राफा बाजार में बिकने वाले सोने के कीमत की तो यहां सोने की कीमत में उछाल देखने को मिला है. बता दें कि जो 22 कैरेट सोना कल 1,19,650 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिक रहा था. वो आज 1,22,700 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिकेगा. वहीं, अगर बात करें 24 कैरेट सोने की तो जो सोना कल 1,25,630 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिक रहा था, वो आज 1,28,840 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिकेगा. चांदी की कीमत Bankbazaar.com के मुताबिक अगर बात की जाए देश की राजधानी दिल्ली में बिकने वाले चांदी की कीमत की तो आज चांदी की कीमत में लंबे समय बाद गिरावट आई है. बता दें कि सर्राफा बाजार में आज चांदी 2,03,000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकेगी. जो कल 2,06,000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही थी. यूपी में सोने का भाव (UP Gold Price) Bankbazaar.com के मुताबिक यदि बात की जाए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सर्राफा बाजार में बिकने वाले सोने के कीमत की तो यहां सोने की कीमत में उछाल देखने को मिला है. बता दें कि जो 22 कैरेट सोना कल 1,19,650 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिक रहा था. वो आज 1,22,700 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिकेगा. वहीं, अगर बात करें 24 कैरेट सोने की तो जो सोना कल 1,25,630 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिक रहा था, वो आज 1,28,840 रुपये प्रति 10 ग्राम की दर से बिकेगा.

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