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CEC और Election Commissioners को मिली immunity पर Supreme Court सख्त, Centre और Election Commission को जारी किया notice

नई दिल्ली, 13 अक्टूबर 2026: Supreme Court ने Chief Election Commissioner (CEC) और Election Commissioners को कानूनी कार्यवाही से मिली व्यापक immunity को चुनौती देने वाली याचिका पर Centre और Election Commission of India (ECI) को notice जारी किया है। मामला Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की Section 16 से जुड़ा है, जो पद पर रहते हुए किए गए आधिकारिक कार्यों को लेकर commissioners को civil और criminal proceedings से protection देता है। ADR ने Section 16 को दी चुनौती यह याचिका Association for Democratic Reforms (ADR) ने दायर की है। याचिका में दावा किया गया है कि Section 16 CEC और Election Commissioners को जरूरत से ज्यादा व्यापक और लंबे समय तक protection देती है, जिससे accountability प्रभावित हो सकती है। Supreme Court ने Centre और ECI से मांगा जवाब Supreme Court ने याचिका पर सुनवाई करते हुए Union Government और Election Commission से जवाब मांगा है। Court ने इस मामले को पहले से लंबित उन petitions के साथ जोड़ दिया है जिनमें इसी provision की constitutional validity को चुनौती दी गई है। मौजूदा और पूर्व Commissioners पर भी लागू होती है protection याचिका में खास तौर पर उस provision पर आपत्ति जताई गई है जिसके तहत official duty के दौरान किए गए acts को लेकर वर्तमान ही नहीं बल्कि पूर्व CEC और Election Commissioners को भी proceedings से protection मिल सकती है। ADR ने Court से इस legal shield की सीमा की समीक्षा करने की मांग की है। इससे पहले भी Supreme Court पहुंच चुका है immunity का मुद्दा CEC और Election Commissioners की immunity को लेकर Supreme Court पहले भी petitions पर सुनवाई कर चुका है। January 2026 में Lok Prahari की याचिका पर भी Centre और ECI को notice जारी किया गया था, हालांकि Court ने उस समय provision पर interim stay लगाने से इनकार कर दिया था। Election Commission की accountability पर बढ़ी बहस यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब Election Commission की powers, उसके फैसलों और CEC की accountability को लेकर कई कानूनी चुनौतियां Supreme Court में लंबित हैं। नई याचिका के बाद अब Court यह जांचेगा कि constitutional authority को दी गई immunity की सीमा कितनी होनी चाहिए और क्या मौजूदा कानून judicial scrutiny की कसौटी पर खरा उतरता है। source – Supreme Court proceedings, India Today, LiveLaw जय राष्ट्र न्यूज़

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जंतर-मंतर प्रदर्शन से पहले सुरक्षा व्यवस्था पर प्रशांत भूषण के सवाल, बोले—पूरी दिल्ली को बंद नहीं किया जा सकता

नई दिल्ली: 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा प्रतिबंधों को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान उन्होंने अन्य वकीलों के साथ मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, ट्रेनों को रद्द करने और शहर में व्यापक बैरिकेडिंग किए जाने पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के आधार पर पूरे शहर की आवाजाही को प्रभावित करना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में उठा दिल्ली की आवाजाही पर प्रतिबंधों का मुद्दा 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का मुद्दा उठाया गया। कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण समेत कई वकीलों ने मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, ट्रेन सेवाओं को प्रभावित करने और व्यापक बैरिकेडिंग को लेकर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों का असर केवल प्रदर्शनकारियों पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों पर भी पड़ सकता है। प्रशांत भूषण ने पूछा—पूरी दिल्ली को बंद क्यों किया जा रहा है? प्रशांत भूषण ने प्रतिबंधों की व्यापकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए लक्षित और सीमित कदम उठाए जाने चाहिए। उनका तर्क था कि किसी एक स्थान पर प्रदर्शन की आशंका के कारण पूरे शहर की आवाजाही प्रभावित करना जरूरत से ज्यादा सख्त कदम हो सकता है। उन्होंने सुरक्षा संबंधी चिंताओं और नागरिकों की सामान्य आवाजाही के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। 57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध को लेकर चिंता सुनवाई के दौरान बताया गया कि अधिकारियों ने 57 दिल्ली मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध या बंदी की योजना बनाई थी। इस व्यवस्था को लेकर याचिकाकर्ताओं ने चिंता जताई। उनका कहना था कि ऐसे प्रतिबंधों से छात्रों, कर्मचारियों, कारोबारियों और रोजाना मेट्रो से यात्रा करने वाले यात्रियों को परेशानी हो सकती है। याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या इतने व्यापक प्रतिबंध जरूरी थे। दिल्ली आने वाली ट्रेनों पर भी उठे सवाल प्रदर्शन से पहले कुछ दिल्ली आने वाली ट्रेनों को रद्द करने या उनके समय में बदलाव किए जाने का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए अंतरशहरी परिवहन सेवाओं को बड़े स्तर पर प्रभावित करने से आम यात्रियों को अनावश्यक परेशानी हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंधों की व्यापकता पर जताई चिंता सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आवाजाही पर व्यापक प्रतिबंध लगाने को लेकर चिंता जताई। अदालत की टिप्पणियों में आवाजाही पूरी तरह रोकने और उसे नियंत्रित करने के बीच अंतर पर जोर दिया गया। अदालत ने अधिकारियों को ऐसा समाधान तलाशने की आवश्यकता बताई, जिससे सुरक्षा व्यवस्था भी बनी रहे और आम जनता को कम से कम असुविधा हो। सुरक्षा के नाम पर अत्यधिक प्रतिबंधों पर सवाल सुनवाई के दौरान प्रतिबंधों की आनुपातिकता का मुद्दा प्रमुखता से उठा। अदालत ने संकेत दिया कि किसी संभावित गड़बड़ी से निपटने के लिए उठाए जाने वाले कदम परिस्थिति के अनुरूप होने चाहिए। मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय नियंत्रित आवाजाही की संभावनाओं पर विचार करने का मुद्दा भी सामने आया। प्रदर्शन के मद्देनजर 20 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती 10 अक्टूबर के प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मध्य दिल्ली समेत कई इलाकों में 20 हजार से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान तैनात किए गए। कुछ रिपोर्टों में तैनाती की संख्या लगभग 23 हजार से 25 हजार तक बताई गई। प्रशासन का उद्देश्य संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटना और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बनाए रखना था। सैकड़ों बसें और बॉडी कैमरे भी सुरक्षा योजना में शामिल रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने संभावित हिरासत की स्थिति से निपटने के लिए सैकड़ों बसों की व्यवस्था की थी। पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल की योजना भी सुरक्षा प्रबंधों का हिस्सा थी। इसके अलावा, शहर के विभिन्न इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटकर वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में तैनाती की गई। प्रशांत भूषण पहले भी प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए थे 3 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान प्रशांत भूषण भी हिरासत में लिए गए लोगों में शामिल थे। रिपोर्टों के अनुसार, उनके साथ योगेंद्र यादव, नेहा बोरा और अन्य प्रदर्शनकारियों को भी हिरासत में लिया गया था। इस घटनाक्रम के बाद प्रदर्शनकारियों की आवाजाही और पुलिस की कार्रवाई को लेकर बहस तेज हुई थी। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और कानून-व्यवस्था इस मामले में प्रमुख सवाल शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन का है। एक ओर प्रशासन को संभावित गड़बड़ी रोकने और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभानी होती है। दूसरी ओर, शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अधिकार हैं। ऐसे मामलों में प्रतिबंधों की आवश्यकता, उनका दायरा और आम नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार करना जरूरी होता है। व्यापक प्रतिबंधों के बजाय नियंत्रित आवाजाही पर जोर सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए मुद्दों ने इस बहस को केंद्र में ला दिया कि सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान आवश्यक सेवाओं और सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बाधित किए बिना कैसे किया जा सकता है। प्रशांत भूषण और अन्य वकीलों ने प्रतिबंधों की व्यापकता पर सवाल उठाए, जबकि अधिकारियों की ओर से सुरक्षा व्यवस्था को संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति से निपटने के उपाय के रूप में देखा गया। नागरिक स्वतंत्रता को लेकर बढ़ी बहस जंतर-मंतर प्रदर्शन से पहले लगाए गए सुरक्षा प्रतिबंधों ने नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन पर बहस तेज कर दी है। प्रशांत भूषण का मुख्य सवाल यही रहा कि किसी निर्धारित स्थान पर होने वाले प्रदर्शन की आशंका के कारण पूरे शहर की आवाजाही को किस हद तक प्रभावित किया जाना चाहिए। इस मामले ने सुरक्षा उपायों की आवश्यकता के साथ-साथ उनके दायरे और आम लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा को भी महत्वपूर्ण बना दिया है। स्रोत: The Indian Express / Supreme Court proceedings /…

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One Nation, One Election पर सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय समिति के साथ बैठक रद्द की, संभावित Judicial Review का दिया हवाला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने One Nation, One Election से जुड़े विधेयकों की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति के साथ प्रस्तावित बैठक को रद्द कर दिया है। यह बैठक 6 अक्टूबर को प्रस्तावित थी, जिसमें Chief Justice of India और अन्य सुप्रीम कोर्ट जजों के साथ informal interaction की योजना थी। सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने कहा कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन भविष्य में न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है, इसलिए इस मुद्दे पर प्रशासनिक स्तर पर चर्चा करना उचित नहीं होगा। 6 अक्टूबर को प्रस्तावित थी बैठक Joint Parliamentary Committee ने 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट का दौरा प्रस्तावित किया था। एजेंडा में इसे “Local Study Visit” बताया गया था, जिसमें CJI और अन्य न्यायाधीशों से informal discussion का भी उल्लेख था। बाद में यह कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने Judicial Review का दिया हवाला सुप्रीम कोर्ट के Secretary General’s Office ने संसदीय समिति को बताया कि वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रस्ताव पर विचार किया। इसके बाद यह राय बनी कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट के सामने judicial review के लिए आ सकता है, इसलिए इस विषय पर administrative side पर चर्चा करना “expedient or desirable” नहीं होगा। किन विधेयकों की जांच कर रही है समिति? संसदीय समिति Constitution (129th Amendment) Bill, 2024 और Union Territories Laws (Amendment) Bill, 2024 की जांच कर रही है। इन विधेयकों का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचा तैयार करना है। PP Chaudhary की अध्यक्षता में बनी है JPC One Nation, One Election से जुड़े Bills की जांच करने वाली Joint Parliamentary Committee की अध्यक्षता BJP सांसद और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री P P Chaudhary कर रहे हैं। समिति में कुल 39 सदस्य शामिल हैं और इसे दिसंबर 2024 में गठित किया गया था। समिति प्रमुख ने कहा- Bill पर चर्चा उद्देश्य नहीं था P P Chaudhary ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट दौरे का उद्देश्य विधेयक पर औपचारिक चर्चा करना नहीं था। उनके मुताबिक यह visit समिति के सदस्यों को सुप्रीम कोर्ट और उसकी कार्यप्रणाली से परिचित कराने के लिए थी, खासकर उन सदस्यों के लिए जो पहले वहां नहीं गए थे। कपिल सिब्बल ने उठाई थी आपत्ति राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रस्तावित बैठक पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा कि संसद कानून बनाएगी और यदि उस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी जाती है तो वही मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आ सकता है। ऐसे में sitting judges के साथ पहले से चर्चा separation of powers को लेकर सवाल खड़े कर सकती है। यह सिब्बल का संवैधानिक तर्क था। चार पूर्व CJI समिति के सामने दे चुके हैं राय समिति के सामने चार पूर्व Chief Justices of India भी अपनी राय रख चुके हैं। इनमें J S Khehar, Ranjan Gogoi, D Y Chandrachud और U U Lalit शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने constitutional amendments के बाद simultaneous elections की संभावित वैधता पर विचार रखा, साथ ही Election Commission को मिलने वाली व्यापक शक्तियों को लेकर कुछ चिंताएं भी जताईं। One Nation, One Election क्या है? One Nation, One Election का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक ही समय पर या एक coordinated cycle में कराना है। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे बार-बार चुनाव कराने का खर्च और Model Code of Conduct के कारण प्रशासनिक रुकावट कम हो सकती है। दूसरी ओर आलोचक संघीय ढांचे, राज्यों की विधानसभाओं की अवधि और संवैधानिक जटिलताओं को लेकर सवाल उठाते हैं। अब समिति अपनी प्रक्रिया जारी रखेगी सुप्रीम कोर्ट के साथ प्रस्तावित interaction रद्द होने के बावजूद संसदीय समिति विधेयकों की जांच जारी रखेगी। समिति अलग-अलग संवैधानिक विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों, राजनीतिक दलों और संबंधित संस्थानों की राय लेकर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी। भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के सामने आ सकता है मामला अगर संसद भविष्य में One Nation, One Election से जुड़े संवैधानिक संशोधन पारित करती है और उन्हें अदालत में चुनौती दी जाती है, तो उनकी संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना पड़ सकता है। इसी संभावित स्थिति को देखते हुए शीर्ष अदालत ने मौजूदा informal interaction से दूरी बनाए रखने का फैसला किया। source – Supreme Court of India / The Indian Express / Hindustan Times / Bar & Bench जय राष्ट्र न्यूज़

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UPI पर MDR के खिलाफ अंतरिम राहत नहीं, Supreme Court ने रोक लगाने से किया इनकार

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने UPI के चुनिंदा merchant transactions पर लागू होने वाले Merchant Discount Rate (MDR) पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। केंद्र सरकार ने ₹2,000 से अधिक के कुछ person-to-merchant UPI payments पर 0.4% MDR लागू करने का फैसला किया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होनी है। हालांकि अदालत ने इस नीति को अंतिम रूप से वैध नहीं ठहराया है और केंद्र सरकार से इसके कानूनी आधार पर जवाब मांगा है। Supreme Court ने नहीं दी अंतरिम राहत 28 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने MDR व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने नई व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने फिलहाल stay देने से इनकार कर दिया। ₹2,000 से ज्यादा के कुछ Payments पर लगेगा MDR नई व्यवस्था के तहत चुनिंदा person-to-merchant UPI transactions में ₹2,000 से ज्यादा के भुगतान पर 0.4% MDR लगाया जाएगा। यह शुल्क सामान्य UPI user द्वारा सरकार को दिया जाने वाला tax नहीं है। MDR merchant payment ecosystem में payment processing से जुड़ा शुल्क है, जिसे संबंधित banks और payment service providers के बीच बांटा जाता है। आम ग्राहकों से सीधे नहीं लिया जाएगा शुल्क केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि MDR सीधे सामान्य UPI users से नहीं लिया जाएगा। UPI apps को users पर अलग platform fee या hidden charge लगाने की अनुमति भी नहीं होगी। सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था merchant payment ecosystem की लागत को संभालने के लिए बनाई गई है। करीब 96% Transactions पर नहीं पड़ेगा असर केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि करीब 96% merchant UPI transactions इस नई व्यवस्था से प्रभावित नहीं होंगे। ₹2,000 तक के merchant payments पहले की तरह MDR से मुक्त रहेंगे। छोटे merchants के लिए तय zero-MDR व्यवस्था भी जारी रहने की बात कही गई है। Person-to-Person Transfer रहेगा Free अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को UPI के जरिए पैसा भेजता है तो ऐसे person-to-person transfers पर यह MDR लागू नहीं होगा। नई व्यवस्था मुख्य रूप से कुछ बड़े person-to-merchant payments से संबंधित है। Supreme Court ने केंद्र से पूछा कानूनी आधार सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि अगर MDR न तो tax है और न ही सरकारी fee, तो इसे लागू करने का कानूनी आधार क्या है। अदालत ने सरकार को इस पूरे framework की वजह और कानूनी आधार स्पष्ट करते हुए affidavit दाखिल करने को कहा है। RBI और NPCI से भी मांगा जवाब मामले में Reserve Bank of India (RBI) और National Payments Corporation of India (NPCI) से भी जवाब मांगा गया है। अब अदालत आगे की सुनवाई में केंद्र, RBI और NPCI का पक्ष देखने के बाद MDR व्यवस्था से जुड़ी कानूनी चुनौती पर विचार करेगी। 15 अक्टूबर से लागू होने की तैयारी केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि MDR व्यवस्था अभी लागू नहीं हुई है। नया framework 15 अक्टूबर 2026 से लागू होना है। ऐसे में Supreme Court द्वारा अंतरिम रोक नहीं लगाए जाने के बाद फिलहाल इसके निर्धारित तारीख से लागू होने का रास्ता खुला है। क्या ग्राहक को ₹2,000 से ज्यादा भुगतान पर Extra Charge देना होगा? नई व्यवस्था का अर्थ यह नहीं है कि ₹2,000 से ज्यादा का हर UPI payment करने वाले ग्राहक के खाते से सीधे 0.4% अतिरिक्त पैसा काट लिया जाएगा। MDR merchant-side payment processing charge है। सरकार ने merchants को इसे consumers से सीधे वसूलने से रोकने की बात कही है। Stay नहीं मिलने का मतलब फैसला सही घोषित होना नहीं Supreme Court द्वारा interim stay से इनकार किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने MDR व्यवस्था को अंतिम रूप से वैध घोषित कर दिया है। मामला अभी अदालत में लंबित है। केंद्र सरकार और अन्य संबंधित संस्थाओं के जवाब के बाद इसकी वैधानिकता पर आगे सुनवाई होगी। Digital Payments पर असर को लेकर बहस UPI लंबे समय से भारत में zero-cost digital payment system के रूप में तेजी से बढ़ा है। ऐसे में MDR की वापसी को लेकर merchants और digital payment industry में नई बहस शुरू हो गई है। सरकार का तर्क है कि payment infrastructure को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए processing cost की भरपाई जरूरी है, जबकि याचिका में आशंका जताई गई है कि इससे कुछ merchants UPI payments लेने से बच सकते हैं। source – The Indian Express / Business Standard / LiveLaw / Bar & Bench The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान, यौन अपराध मामले में ‘आपत्तिजनक टिप्पणियों’ पर जताई चिंता

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लिया है, जिसमें एक महिला के कपड़े उतारने की कोशिश और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार से जुड़े कृत्यों को तथ्यों के आधार पर ‘बलात्कार के प्रयास’ के लिए पर्याप्त नहीं माना गया था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले में कुछ टिप्पणियों को “offending observations” बताते हुए आरोपी को नोटिस जारी किया है। 9 जुलाई के पटना हाई कोर्ट के फैसले का मामला मामला पटना हाई कोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने आरोपी हिमांशु कुमार पाठक की उस दोषसिद्धि को रद्द कर दिया था, जो IPC की धारा 376 के साथ धारा 511 यानी बलात्कार के प्रयास से संबंधित थी। हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर कहा था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने जैसी हरकतें, बिना ऐसे स्पष्ट कृत्य के जो बलात्कार करने के इरादे को निर्णायक रूप से दिखाए, ‘attempt to rape’ के अपराध को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं थीं। हालांकि कोर्ट ने इन कृत्यों को महिला की गरिमा भंग करने से जुड़ा अपराध माना था। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणियों को बताया ‘आपत्तिजनक’ 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया। चीफ जस्टिस ने कहा कि फैसले में कुछ “आपत्तिजनक टिप्पणियां” हैं और उन्हें हटाने या फैसला रद्द करने से पहले संबंधित आरोपी का पक्ष सुनना आवश्यक है। आरोपी हिमांशु पाठक को जारी हुआ नोटिस सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी हिमांशु पाठक को नोटिस जारी किया है। पीठ ने बिहार के एडवोकेट जनरल से स्थानीय पुलिस के माध्यम से यह सुनिश्चित करने को कहा कि आरोपी तक नोटिस पहुंचाया जाए, ताकि अगली सुनवाई में उसका पक्ष भी कोर्ट के सामने आ सके। 2008 की घटना से जुड़ा है मामला यह मामला 19 जनवरी 2008 की घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार एक महिला अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने आरोपी के स्टूडियो गई थी। आरोप था कि आरोपी ने महिला के पिता को कंप्यूटर पर फोटो देखने के लिए कहा और इसके बाद स्टूडियो का दरवाजा बंद कर महिला के साथ कथित यौन दुर्व्यवहार किया। महिला द्वारा शोर मचाने पर उसके पिता पहुंचे, जिसके बाद आरोपी वहां से भाग गया। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा निचली अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी ठहराया था। उसे बलात्कार के प्रयास के मामले में तीन साल की कठोर कैद और गलत तरीके से बंद रखने के मामले में छह महीने की सजा सुनाई गई थी। बाद में पटना हाई कोर्ट ने बलात्कार के प्रयास वाली दोषसिद्धि को रद्द कर दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के मामले से भी जुड़ा संदर्भ इस मामले का जिक्र इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में उस समय भी हुआ था, जब अदालत इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अन्य यौन अपराध संबंधी फैसले पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। उस मामले में भी हाई कोर्ट की ओर से यौन अपराध के प्रयास को लेकर की गई व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई थी। शीर्ष अदालत ने बाद में वह फैसला रद्द करते हुए न्यायाधीशों के लिए यौन अपराध मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी दृष्टिकोण को लेकर दिशा-निर्देश दिए थे। अब आगे क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल पटना हाई कोर्ट के फैसले को अंतिम रूप से रद्द नहीं किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि संबंधित आरोपी को सुनने के बाद ही इस पर आगे फैसला लिया जाएगा। मामले को SMW (Crl) No. 5/2026 के रूप में दर्ज किया गया है। आने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि पटना हाई कोर्ट की टिप्पणियों और कानूनी निष्कर्षों में किस हद तक हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। source – Supreme Court Proceedings / LiveLaw / Bar & Bench / Hindustan Times / The Economic Times जय राष्ट्र न्यूज़

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Mamata Banerjee Supreme Court पहुंचीं; TMC का नाम और ‘Jora Ghas Phul’ Symbol Freeze करने के EC फैसले को चुनौती

नई दिल्ली, 19 सितंबर 2026: Former West Bengal Chief Minister और Trinamool Congress founder Mamata Banerjee ने Supreme Court का रुख किया है, जहां उन्होंने Election Commission के उस interim order को चुनौती दी है जिसमें All India Trinamool Congress का नाम और उसका ‘Flowers and Grass’ यानी ‘Jora Ghas Phul’ चुनाव चिन्ह temporarily freeze कर दिया गया था। उनकी writ petition 18 सितंबर को दाखिल की गई। 17 September को EC ने Freeze किया था Name और Symbol Election Commission ने 17 September को TMC में चल रहे factional dispute के बीच interim order जारी किया था। Commission ने कहा कि Mamata Banerjee और Ritabrata Banerjee के नेतृत्व वाले दोनों factions खुद को असली Trinamool Congress बता रहे हैं, इसलिए final decision होने तक original party name और reserved symbol किसी भी faction को इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी। Mamata Faction को मिला ‘Football Player’ Symbol Interim arrangement के तहत Mamata Banerjee-led faction को “Mamata All India Trinamool Congress” नाम और ‘Football Player’ election symbol दिया गया है। Ritabrata Banerjee-led rival faction को “Democratic Trinamool Congress” नाम और ‘Envelope’ symbol allot किया गया है। 6 October के Bypolls के लिए लागू है व्यवस्था Election Commission की यह temporary arrangement 6 October को होने वाले Nandigram और Rejinagar bypolls समेत आगामी चुनावों के लिए लागू होगी। EC ने साफ किया है कि नए नाम और symbols का allotment original Trinamool Congress पर ownership का final फैसला नहीं है। मुख्य विवाद पर अलग से सुनवाई होगी। Supreme Court में EC और Rival Faction को बनाया Respondent Mamata Banerjee की petition में Election Commission of India और Ritabrata Banerjee को respondents बनाया गया है। Petition में EC के interim order को challenge करते हुए original party name और ‘Jora Ghas Phul’ symbol के इस्तेमाल पर लगी रोक के खिलाफ relief मांगी गई है। Mamata ने फैसले को बताया ‘Unconstitutional’ Mamata Banerjee ने EC के फैसले की आलोचना करते हुए इसे “unconstitutional, illegal and undemocratic” बताया है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए “black day” भी कहा। ये Mamata Banerjee के आरोप और राजनीतिक आकलन हैं; Election Commission ने अपना कदम rival claims के बीच interim व्यवस्था के रूप में बताया है। Paragraph 15 के तहत होगा Final फैसला Original TMC name और symbol किस faction को मिलेगा, इसका final determination Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के Paragraph 15 के तहत किया जाना है। इस प्रक्रिया में Election Commission organisational और legislative support समेत दोनों camps द्वारा पेश किए गए documents और claims पर विचार करेगा। source – Supreme Court Proceedings / Election Commission / The Indian Express / LiveLaw जय राष्ट्र न्यूज़

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Nithari Case में बरी हुए Surendra Koli Haridwar में मृत मिले; Police ने शुरू की जांच

हरिद्वार: बहुचर्चित Nithari killings case में सभी मामलों से बरी हो चुके Surendra Koli शुक्रवार, 18 September 2026 को Uttarakhand के Haridwar में मृत पाए गए। Police के मुताबिक उनका शव Bhupatwala इलाके में उस tea stall के पास मिला, जिसे वह पिछले कुछ समय से चला रहे थे। शुरुआती जांच में police ने suicide की आशंका जताई है, लेकिन मौत का अंतिम कारण post-mortem report और आगे की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। Haridwar में चला रहे थे Tea Stall Police के अनुसार Koli पिछले कुछ महीनों से Haridwar में रह रहे थे। उन्होंने पहले Roshnabad इलाके में security guard के तौर पर काम किया था और हाल में Bhupatwala के Sapt Sarovar Road क्षेत्र में tea stall शुरू किया था। शुक्रवार को वहीं उनके मृत होने की सूचना मिलने के बाद police मौके पर पहुंची। नहीं मिला कोई Suicide Note मौके से कोई suicide note बरामद नहीं हुआ है। Police ने Koli के परिवार को घटना की जानकारी दी है और मौत की परिस्थितियों की जांच की जा रही है। Post-mortem examination के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। 2025 में Supreme Court ने अंतिम मामले में किया था बरी Surendra Koli के खिलाफ Nithari killings से जुड़े कुल 13 criminal cases थे। 12 मामलों में उन्हें पहले ही acquit किया जा चुका था। इसके बाद 11 November 2025 को Supreme Court ने curative petition स्वीकार करते हुए आखिरी बचे मामले में भी उनकी conviction को रद्द कर दिया और उन्हें बरी करने का आदेश दिया। Supreme Court ने अपने फैसले में कहा था कि एक ही evidentiary foundation पर अलग-अलग मामलों में विरोधाभासी नतीजे बने रहना न्यायसंगत नहीं होगा। Court ने investigation में कई कमियों का भी उल्लेख किया था। 2006 में सामने आया था Nithari Case Nithari case December 2006 में तब सामने आया था जब Noida के Nithari इलाके में businessman Moninder Singh Pandher के घर के पास drains और आसपास के क्षेत्र से human remains बरामद हुए थे। मामले ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी और कई बच्चों तथा महिलाओं के लापता होने के मामलों की जांच शुरू हुई थी। Koli उस समय Pandher के Noida स्थित घर में domestic worker के रूप में काम करते थे। बाद में उनके खिलाफ कई मामलों में trial चला और अलग-अलग courts से convictions भी हुईं, जिन्हें बाद की judicial proceedings में पलट दिया गया। करीब दो दशक चला Legal Battle Nithari case से जुड़े मामलों में Koli ने करीब दो दशक तक लंबी legal battle लड़ी। Allahabad High Court ने 2023 में कई मामलों में convictions रद्द की थीं, जबकि आखिरी मामला Supreme Court के 2025 के फैसले के बाद समाप्त हुआ। इसके बाद Koli की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हुआ। Police जांच में जुटी Haridwar Police फिलहाल Koli की मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच कर रही है। शुरुआती जांच में suicide की आशंका जताई गई है, लेकिन authorities ने कहा है कि post-mortem और investigation पूरी होने से पहले मौत के कारण पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। Source – The Indian Express / The New Indian Express / Supreme Court Judgment / India Today जय राष्ट्र न्यूज़

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Shiv Sena Symbol Row पर Supreme Court में आज सुनवाई; Uddhav Faction ने Shinde गुट को ‘Real Shiv Sena’ मानने के EC फैसले को दी चुनौती

नई दिल्ली, 15 सितंबर 2026: Supreme Court आज Uddhav Thackeray-led Shiv Sena (UBT) की उन petitions पर सुनवाई करेगा, जिनमें Election Commission के Eknath Shinde faction को ‘real Shiv Sena’ मानने और ‘Bow and Arrow’ चुनाव चिन्ह देने के फैसले को चुनौती दी गई है। यह मामला Supreme Court की आज की cause list में शामिल है और final arguments पहले से जारी हैं। 2023 के Election Commission Order को Challenge Election Commission ने 17 February 2023 को Eknath Shinde-led faction को original Shiv Sena के रूप में मान्यता देते हुए पार्टी का नाम और ‘धनुष-बाण’ (Bow and Arrow) symbol आवंटित किया था। Uddhav Thackeray faction का कहना है कि Election Commission ने पार्टी के organisational structure और internal support को पर्याप्त महत्व दिए बिना legislative majority पर ज्यादा भरोसा किया। August से चल रही Final Hearing Supreme Court ने इस विवाद पर 5 August 2026 से final hearings शुरू की थीं। मामला Chief Justice of India Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi और Justice V Mohana की bench के सामने सुनवाई में रहा है। Uddhav Faction का क्या तर्क? Senior Advocate Kapil Sibal ने Uddhav faction की ओर से दलील दी है कि केवल MLAs की संख्या के आधार पर legislature party, मूल political party पर नियंत्रण नहीं कर सकती। उनका तर्क है कि party organisation का फैसला legislative wing पर प्रभावी होना चाहिए और pending disqualification proceedings को भी Election Commission के फैसले से अलग करके नहीं देखा जा सकता। Shinde Faction ने उठाया Party Constitution का मुद्दा Eknath Shinde faction ने Supreme Court में तर्क दिया है कि Uddhav Thackeray के नेतृत्व में 2018 में Shiv Sena के organisational structure में बड़े बदलाव किए गए और party chief के हाथ में ज्यादा powers केंद्रित कर दी गईं। Supreme Court ने पिछली hearings में party constitution और internal democracy से जुड़े सवालों पर भी दोनों पक्षों से जवाब मांगे थे। Symbol Freeze करने की भी मांग Uddhav faction ने हाल में Supreme Court से मांग की है कि अगर dispute पर तत्काल final decision नहीं होता है तो Shiv Sena का नाम और Bow-and-Arrow symbol freeze करने पर विचार किया जाए। Faction का कहना है कि prolonged legal dispute के दौरान एक पक्ष को original party name और symbol का लाभ मिलना fairness के सवाल खड़े करता है। Maharashtra Politics पर पड़ सकता है बड़ा असर Supreme Court का eventual फैसला केवल Shiv Sena के नाम और symbol तक सीमित नहीं रहेगा। यह political parties में splits, legislative majority, party organisation और Election Commission की powers से जुड़े महत्वपूर्ण constitutional questions पर भी असर डाल सकता है। आज की hearing में arguments आगे बढ़ने की उम्मीद है; final verdict अभी नहीं आया है। source – Supreme Court of India / The Indian Express / India Today / PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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Packaged Food Warning Labels पर Supreme Court सख्त, सरकार से 10 दिन में Implementation Timeline मांगी

नई दिल्ली, 11 सितंबर 2026: Supreme Court ने packaged food products पर front-of-pack warning labels लागू करने में हो रही देरी पर सख्त रुख अपनाया है। Court ने Centre और Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) से 10 दिनों के भीतर स्पष्ट implementation timeline पेश करने को कहा है। Sugar, Salt और Fat पर होंगे Warning Labels FSSAI ने ऐसे packaged food products पर red hexagonal warning labels लगाने का प्रस्ताव दिया है जिनमें added sugar, salt या saturated fat तय सीमा से ज्यादा हो। इसका उद्देश्य consumers को packet के front पर ही यह जानकारी देना है कि product में unhealthy nutrients की मात्रा ज्यादा है। Two-Phase Plan पर Court ने जताई चिंता FSSAI ने warning labels को दो phases में लागू करने का proposal दिया था। शुरुआती phase में दो या उससे अधिक specified nutrients की अधिक मात्रा वाले products पर warning लगाने की योजना थी। Supreme Court ने चिंता जताई कि अगर implementation की निश्चित timeline नहीं दी गई तो दूसरा phase अनिश्चित समय तक टल सकता है। Industry की आपत्तियों से Court सहमत नहीं Food industry ने नए labels लागू करने के लिए additional transition time और products reformulate करने का मौका देने की मांग की है। हालांकि Court ने consumer acceptability और reformulation से जुड़ी चिंताओं को public health measure में लंबी देरी का पर्याप्त आधार नहीं माना। बच्चों की Health को लेकर Court चिंतित Bench ने कहा कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा लोगों और खासकर growing children की health है। Court ने इसे national interest से जुड़ा विषय बताते हुए regulators से प्रभावी और समयबद्ध व्यवस्था तैयार करने को कहा है। 28 September को अगली सुनवाई मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को तय की गई है। इससे पहले सरकार और FSSAI को warning label system लागू करने की timeline और आगे की प्रक्रिया Court के सामने रखनी होगी। source – Reuters / Supreme Court Proceedings / FSSAI जय राष्ट्र न्यूज़

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NEET PG 2026 की Answer Key पहली बार जारी करेगा NBEMS, Supreme Court के आदेश के बाद बड़ा बदलाव

नई दिल्ली, 6 सितंबर 2026: NEET PG परीक्षा की प्रक्रिया में पहली बार बड़ा बदलाव होने जा रहा है। National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) NEET PG 2026 की provisional answer key जारी करेगा। इसके साथ candidates को उनके marked responses और question IDs भी देखने को मिलेंगे। यह कदम Supreme Court के transparency से जुड़े निर्देशों के अनुपालन में उठाया गया है। पहली बार जारी होगी NEET PG Answer Key अब तक NBEMS NEET PG परीक्षा के बाद candidates के लिए provisional answer key जारी नहीं करता था। NEET PG 2026 से पहली बार उम्मीदवार अपने applicant login के जरिए question IDs, correct answers और अपने marked responses देख सकेंगे। Supreme Court के आदेश के बाद बदलाव इस बदलाव के पीछे Supreme Court का transparency को लेकर दिया गया निर्देश है। Court ने examination process में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए raw scores, answer keys और normalisation से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर दिया था। Candidates को क्या-क्या मिलेगा? NBEMS के information bulletin के मुताबिक applicant login में उम्मीदवारों को Question ID number, उस प्रश्न का सही उत्तर, candidate द्वारा चुना गया response और marking scheme के अनुसार उस प्रश्न के लिए allotted score दिखाई देगा। Answer Key अभी नहीं हुई जारी Candidates के लिए जरूरी है कि वे किसी unofficial answer key को NBEMS की official key न समझें। 6 सितंबर तक official provisional answer key जारी नहीं की गई है। Board इसे जल्द अपनी official website पर उपलब्ध कराएगा। Exact release date की घोषणा अभी नहीं हुई है। 2.65 लाख से ज्यादा Candidates हुए थे शामिल NEET PG 2026 की मुख्य परीक्षा 30 अगस्त को देशभर में आयोजित की गई थी। कुल 2,73,096 candidates registered थे और 2,65,980 candidates परीक्षा में शामिल हुए। परीक्षा 1,111 centres पर आयोजित की गई थी। Jaipur के Candidates का हुआ Re-Exam Jaipur के Sitapura centres पर power failure के कारण करीब 2,445 candidates अपनी परीक्षा पूरी नहीं कर पाए थे। NBEMS ने इन candidates के लिए 5 सितंबर को दोबारा परीक्षा आयोजित की। कैसे Download कर सकेंगे Answer Key? Answer key जारी होने के बाद candidates को NBEMS की official website पर NEET PG 2026 section में जाकर अपने login credentials से sign in करना होगा। इसके बाद answer key और response sheet का active link उपलब्ध होगा, जहां से इसे देखा और download किया जा सकेगा। Result 30 सितंबर तक आने की संभावना NBEMS के NEET PG 2026 schedule के मुताबिक परीक्षा का result 30 सितंबर 2026 तक घोषित किया जाना है। Answer key और response details उपलब्ध होने से candidates को result से पहले अपने performance का बेहतर आकलन करने में मदद मिलेगी। source – NBEMS / The Indian Expressजय राष्ट्र न्यूज़

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