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TMC के 20 बागी सांसदों की सदस्यता पर Supreme Court में आज सुनवाई; Abhishek Banerjee ने Speaker की देरी को दी चुनौती

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति से शुरू हुआ तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक संकट अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। TMC के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के 20 बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने से जुड़ी याचिकाओं पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से फैसला लेने में कथित देरी के खिलाफ Supreme Court का दरवाजा खटखटाया है। मामले की सुनवाई आज, 25 अगस्त 2026 को निर्धारित है। Supreme Court की सूची के मुताबिक मामले की सुनवाई Chief Justice of India Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi और Justice V Mohana की पीठ के सामने होनी है। खबर लिखे जाने तक मामले में आज का अंतिम आदेश सामने नहीं आया था। Abhishek Banerjee Supreme Court क्यों पहुंचे? अभिषेक बनर्जी का मुख्य आरोप है कि उन्होंने 20 सांसदों के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत disqualification petitions लोकसभा अध्यक्ष के सामने दाखिल की थीं, लेकिन इन पर अब तक अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। उन्होंने Supreme Court से मांग की है कि Speaker को इन याचिकाओं पर समयबद्ध और शीघ्र फैसला लेने का निर्देश दिया जाए। याचिका संविधान के Article 32 के तहत दाखिल की गई है और इसमें लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा के Secretary General तथा संबंधित 20 सांसदों को पक्षकार बनाया गया है। मामला आखिर शुरू कैसे हुआ? TMC के भीतर यह संकट जून 2026 में खुलकर सामने आया। रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी के 19 सांसदों ने 14 जून को लोकसभा अध्यक्ष को पत्र देकर अपने समूह के Nationalist Citizens Party of India यानी NCPI में merger को मान्यता देने की मांग की थी। इसके अगले दिन सांसद रचना बनर्जी ने भी इसी तरह का पत्र दिया, जिसके बाद संख्या 20 हो गई। इन सभी सांसदों ने 2024 का लोकसभा चुनाव TMC के चुनाव चिन्ह पर जीता था। TMC का तर्क क्या है? तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि ये सांसद पार्टी के टिकट पर निर्वाचित हुए थे और बाद में दूसरी राजनीतिक व्यवस्था के साथ जाने का उनका फैसला Tenth Schedule यानी anti-defection law के तहत अयोग्यता का मामला बनता है। TMC का कहना है कि केवल सांसदों के एक समूह का दूसरी पार्टी के साथ जाने का दावा अपने आप उन्हें दल-बदल कानून से संरक्षण नहीं देता और इस पर Speaker को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार फैसला करना चाहिए। हालांकि यह TMC का कानूनी पक्ष है। सांसदों की सदस्यता वास्तव में समाप्त होगी या नहीं, इसका फैसला सक्षम संवैधानिक प्राधिकारी और आवश्यकता पड़ने पर अदालत की न्यायिक समीक्षा के बाद ही तय होगा। बागी सांसद क्या कह रहे हैं? दूसरी तरफ बागी सांसदों का दावा है कि उनका कदम सामान्य defection नहीं बल्कि वैध merger है। उन्होंने Speaker से अपने नए राजनीतिक समूह को मान्यता देने की मांग की है और तर्क दिया है कि उनका कदम संविधान की Tenth Schedule में उपलब्ध merger-related protection के दायरे में आता है। यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद है—क्या सांसदों का कदम दल-बदल है या ऐसा merger जिसे कानून का संरक्षण मिल सकता है। Speaker Om Birla से मिल चुके हैं Abhishek Supreme Court जाने से पहले अभिषेक बनर्जी ने संसदीय स्तर पर भी मामला उठाया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने 27 जुलाई को लिखित reminder भेजा और इसके बाद 12 अगस्त को Lok Sabha Speaker Om Birla से मुलाकात कर disqualification petitions पर जल्द फैसला करने की मांग दोहराई। इसके बावजूद अंतिम निर्णय नहीं आने के बाद उन्होंने Supreme Court का रुख किया। Monsoon Session में अलग Seating Arrangement इस राजनीतिक विवाद का असर संसद के भीतर भी दिखाई दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार Monsoon Session के दौरान 20 बागी सांसदों के लिए अलग seating arrangement किया गया था। हालांकि अलग seating arrangement होना अपने आप में उनकी disqualification या merger की अंतिम कानूनी मान्यता नहीं है। Speaker के औपचारिक फैसले के बाद ही उनकी parliamentary status को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। कौन हैं ये 20 सांसद? Supreme Court में दाखिल मामले में जिन 20 सांसदों को respondent बनाया गया है, उनमें कई प्रमुख TMC चेहरे शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें Kakoli Ghosh Dastidar, Sudip Bandyopadhyay, Satabdi Roy, Prasun Banerjee, Rachana Banerjee, Jagadish Chandra Barma Basunia, Partha Bhowmick, Arup Chakraborty, Deepak Adhikari (Dev), Sayani Ghosh, Bapi Haldar, Abu Taher Khan, Kalipada Saren, Asit Kumar Mal, June Maliah, Mitali Bag, Khalilur Rahaman, Mala Roy, Sharmila Sarkar और Yusuf Pathan शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में सांसदों के अलग होने के कारण यह मामला सिर्फ party discipline तक सीमित नहीं है बल्कि Lok Sabha में TMC की संख्या और राजनीतिक शक्ति पर भी सीधा असर डाल सकता है। Anti-Defection Law क्या कहता है? भारत में दल-बदल विरोधी कानून संविधान की Tenth Schedule में मौजूद है। सामान्य तौर पर कोई निर्वाचित सांसद यदि स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या party whip के खिलाफ कुछ परिस्थितियों में मतदान करता है तो उसकी सदस्यता पर सवाल उठ सकता है। वहीं merger से जुड़े मामलों में अलग प्रावधान मौजूद हैं। किसी particular political split या merger पर ये provisions लागू होते हैं या नहीं, यह मामले के तथ्य और कानूनी व्याख्या पर निर्भर करता है। इसीलिए TMC और बागी सांसदों के दावों को अभी अंतिम कानूनी तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। Supreme Court से Abhishek की मांग क्या है? अभिषेक बनर्जी ने Supreme Court से यह नहीं कहा है कि अदालत सीधे सभी 20 सांसदों की सदस्यता तत्काल खत्म कर दे। उनकी मुख्य मांग है कि Lok Sabha Speaker pending disqualification petitions पर जल्द फैसला करें। यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि Tenth Schedule के तहत पहली instance में disqualification से जुड़े प्रश्नों का फैसला Speaker के पास जाता है, हालांकि उस फैसले पर judicial review संभव है। फैसले का Lok Sabha Numbers पर पड़ सकता है असर अगर Speaker भविष्य में TMC की disqualification petitions स्वीकार करते हैं और संबंधित सांसद अयोग्य घोषित होते हैं तो Lok Sabha की राजनीतिक संख्या पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर अगर उनके merger claim को वैध माना जाता है तो बागी सांसद अपनी सदस्यता बनाए रख सकते हैं। यही वजह है कि यह मामला West Bengal…

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम! प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए हाई-पावर पैनल की तैयारी

नई दिल्ली: संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प तथा कथित पुलिस ज्यादती के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 19 अगस्त 2026 को मामले की जांच के लिए हाई-पावर कमेटी गठित करने की तैयारी की है। इस पैनल की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे। रिटायर्ड SC जज करेंगे कमेटी की अगुवाई प्रस्तावित कमेटी में एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज के अलावा पूर्व हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शामिल किया जाएगा। कोर्ट का उद्देश्य 20 जुलाई को हुए संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर सामने आए आरोपों और पुलिस की ओर से लगाए गए जवाबी आरोपों की निष्पक्ष जांच कराना है। पुलिस कार्रवाई पर उठे थे गंभीर सवाल 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर निकले प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए थे। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और अन्य कार्रवाई के आरोप लगाए थे। वहीं, दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपने जवाब में इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने “maximum restraint” बरता और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए केवल आवश्यक बल का इस्तेमाल किया। पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान उसके 240 से अधिक जवान घायल हुए। पैनल तय करेगा क्या हुआ था? सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित होने वाली कमेटी प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं की तथ्यात्मक जांच करेगी। उपलब्ध वीडियो फुटेज, CCTV रिकॉर्डिंग और अन्य सामग्री को भी जांच का हिस्सा बनाए जाने की संभावना है। अदालत ने पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हुए कथित हमलों को भी जांच के दायरे में रखने के संकेत दिए हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर कोर्ट का जोर सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन संविधान के तहत संरक्षित अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा है कि केवल प्रदर्शन होने के कारण पुलिस अत्यधिक बल का इस्तेमाल नहीं कर सकती और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संतुलित प्रक्रिया जरूरी है। FIR पर भी सुप्रीम कोर्ट की नजर मामले में प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR भी सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं। अदालत ने संकेत दिया है कि जिन मामलों में विवाद या गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है, उनमें FIR खत्म करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों के इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के औपचारिक आदेश और हाई-पावर कमेटी के गठन पर है। जांच के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों की ओर से क्या-क्या हुआ और क्या कहीं तय नियमों से अधिक बल का इस्तेमाल किया गया। स्रोत: Supreme Court proceedings, Times of India, Indian Express, PTI Jai Rashtra News

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सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया—SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ लागू नहीं होगी, संसद और राजनीतिक गलियारों में बहस तेज़

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण पर ‘क्रीमी लेयर’ सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। सरकार ने अदालत से कहा कि SC/ST समुदायों को मिलने वाला आरक्षण केवल आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव की भरपाई के उद्देश्य से संविधान में दिया गया है। इसलिए आर्थिक रूप से सक्षम होने मात्र से इन वर्गों के लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। सरकार ने क्या कहा? केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत वर्तमान में केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) पर लागू होता है। SC/ST समुदायों की सामाजिक स्थिति और उनके साथ होने वाला ऐतिहासिक भेदभाव OBC से अलग प्रकृति का है। सरकार का तर्क है कि इन समुदायों के साथ होने वाला सामाजिक भेदभाव आर्थिक उन्नति के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, इसलिए केवल आय या आर्थिक स्थिति के आधार पर उन्हें आरक्षण से बाहर करना संविधान की भावना के विपरीत होगा। सुप्रीम कोर्ट में क्या मामला है? सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में मांग की गई है कि SC/ST आरक्षण के भीतर भी आर्थिक रूप से सक्षम वर्गों को अलग कर “क्रीमी लेयर” लागू की जाए ताकि आरक्षण का लाभ सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक पहुँचे। केंद्र सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि ऐसा कोई भी बड़ा बदलाव न्यायिक आदेश के बजाय विधायी और नीतिगत प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जाना चाहिए। राजनीतिक बहस तेज़ सरकार के इस रुख के बाद संसद और राजनीतिक दलों में बहस तेज़ हो गई है। कई दलों ने सरकार के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि SC/ST आरक्षण सामाजिक न्याय का संवैधानिक अधिकार है और इसे आर्थिक आधार से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। वहीं कुछ संगठनों और विशेषज्ञों का मत है कि आरक्षण का लाभ समुदाय के सबसे वंचित वर्गों तक पहुँचाने के लिए आंतरिक सुधारों पर चर्चा होनी चाहिए। संवैधानिक और सामाजिक महत्व विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल आरक्षण नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर की संवैधानिक अवधारणा से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई भविष्य में आरक्षण व्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। फिलहाल केंद्र सरकार ने अपना स्पष्ट रुख रखते हुए SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने से इनकार किया है। निष्कर्ष केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दोहराया है कि SC/ST आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव को ध्यान में रखकर दिया गया संवैधानिक प्रावधान है और इस पर क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू नहीं किया जाना चाहिए। अब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई और निर्णय पर देशभर की नज़र बनी हुई है। Source: Ministry of Social Justice & Empowerment | Supreme Court Proceedings जय राष्ट्र न्यूज़

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अरावली संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की समिति ने जनता से मांगे सुझाव, 21 दिन में भेज सकेंगे अपनी राय

नई दिल्ली: अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और उससे जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) ने आम जनता, पर्यावरण विशेषज्ञों, किसानों, स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। समिति ने इन सुझावों को भेजने के लिए 21 दिनों का समय दिया है। यह पहल अरावली क्षेत्र के संरक्षण और भविष्य की नीति तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष अरावली पर्वतमाला से जुड़े मामलों की समीक्षा के लिए इस उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। समिति को 31 अगस्त 2026 तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपनी है। इसके लिए अब आम नागरिकों और संबंधित पक्षों की राय भी शामिल की जाएगी। कौन दे सकता है सुझाव? समिति ने निम्नलिखित पक्षों से सुझाव आमंत्रित किए हैं— समिति ने कहा है कि सुझावों के साथ यदि संभव हो तो दस्तावेज़ी साक्ष्य या अन्य सत्यापन योग्य सामग्री भी भेजी जाए। अरावली संरक्षण क्यों है महत्वपूर्ण? अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है और उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों के अनुसार अरावली— समिति की रिपोर्ट पर रहेगी नजर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति सभी प्राप्त सुझावों और उपलब्ध वैज्ञानिक तथ्यों का अध्ययन करने के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगी। माना जा रहा है कि रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में अरावली क्षेत्र के संरक्षण, खनन गतिविधियों और पर्यावरणीय नियमों को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं। निष्कर्ष अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पहल को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 21 दिनों तक चलने वाली सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया के जरिए आम नागरिकों और विशेषज्ञों की राय को भी अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा बनाया जाएगा, जिससे भविष्य की नीतियों को अधिक प्रभावी और संतुलित बनाया जा सके। Source: Supreme Court of India | Ministry of Environment, Forest and Climate Change (PIB) | PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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CBSE की नई तीन-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, केंद्र ने किया बचाव; राजनीतिक बहस भी तेज

नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की नई तीन-भाषा नीति को लेकर आज देश में चर्चा और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार, CBSE और NCERT ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत लागू की जा रही व्यवस्था का बचाव किया। वहीं विभिन्न राजनीतिक दलों और शिक्षा से जुड़े संगठनों ने नीति के अलग-अलग पहलुओं पर अपनी राय रखी। सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई सुनवाई? सुप्रीम कोर्ट ने तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि क्या अंग्रेज़ी को “स्वदेशी भाषा” माना जा सकता है और इस पहलू पर आगे विचार की आवश्यकता हो सकती है। हालांकि अदालत ने फिलहाल नई नीति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और मामले की सुनवाई जारी रखने का फैसला किया। केंद्र और CBSE का पक्ष केंद्र सरकार, CBSE और NCERT ने अदालत में कहा कि नई व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है और इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में बहुभाषी क्षमता विकसित करना है। उनके अनुसार कक्षा 9 से तीन भाषाओं का अध्ययन विद्यार्थियों के समग्र विकास और भारतीय भाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा देगा। CBSE ने यह भी बताया कि उसके लगभग आधे संबद्ध विद्यालय पहले से ही दो या अधिक भारतीय भाषाएं पढ़ा रहे हैं, जिससे नीति का क्रियान्वयन व्यावहारिक है। क्या है नई व्यवस्था? CBSE के दिशा-निर्देशों के अनुसार कक्षा 9 से तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होंगी। तीसरी भाषा का मूल्यांकन बोर्ड परीक्षा के बजाय स्कूल स्तर पर आंतरिक मूल्यांकन के माध्यम से किया जाएगा। संक्रमण काल (Transition Phase) को ध्यान में रखते हुए कुछ बैचों को विशेष छूट भी दी गई है। राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तीन-भाषा नीति को लेकर कई राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी। कुछ दलों ने इसे भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने वाला कदम बताया, जबकि कुछ ने कहा कि राज्यों की भाषाई विविधता और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसे लागू किया जाना चाहिए। भाषा नीति को लेकर अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक बहस भी जारी है। छात्रों और अभिभावकों पर क्या असर? शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों पर अतिरिक्त परीक्षा का बोझ डालना नहीं है, क्योंकि तीसरी भाषा की बोर्ड परीक्षा नहीं होगी। हालांकि कई अभिभावकों और शिक्षकों ने पाठ्यपुस्तकों, प्रशिक्षित शिक्षकों और कार्यान्वयन की समय-सीमा को लेकर सवाल उठाए हैं। अदालत में भी इन मुद्दों का उल्लेख किया गया। आगे क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे भी सुनवाई करेगा। केंद्र, CBSE और NCERT से जुड़े दस्तावेजों और पक्षों पर विचार करने के बाद अदालत अगली कार्यवाही करेगी। तब तक CBSE की नई तीन-भाषा व्यवस्था लागू रहेगी। निष्कर्ष CBSE की नई तीन-भाषा नीति पर आज की सुनवाई के बाद यह स्पष्ट है कि मामला अभी न्यायिक विचाराधीन है। एक ओर केंद्र सरकार इसे बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने वाला सुधार बता रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ पक्ष इसके क्रियान्वयन और भाषा संबंधी प्रावधानों पर सवाल उठा रहे हैं। अब इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई और दिशा-निर्देशों पर सभी की नजर रहेगी। Source: सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही, CBSE, NCERT एवं केंद्र सरकार। Original Report: आज की न्यायालयी कार्यवाही और आधिकारिक प्रस्तुतियों के आधार पर तैयार। जय राष्ट्र न्यूज़

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