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क्या बिहार में बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा? हर साल तबाही के पीछे नेपाल की नदियां, गाद और अधूरी परियोजनियां

पटना: बिहार में बाढ़ दशकों से बड़ी चुनौती बनी हुई है। खासकर उत्तर बिहार में कोसी, गंडक, बागमती, कमला और महानंदा जैसी नदियां हर मानसून में लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित करती हैं। सरकारें तटबंध, बैराज, जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण परियोजनियों पर काम करती रही हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई एक उपाय सामने नहीं आया है जिससे राज्य को बाढ़ से पूरी तरह मुक्त किया जा सके।

नेपाल में भारी बारिश से बढ़ता है बिहार की नदियों का जलस्तर

उत्तर बिहार की कई प्रमुख नदियों का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र नेपाल में स्थित है। वहां भारी बारिश होने पर इन नदियों में अचानक पानी बढ़ जाता है और इसका असर बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंचता है।

केंद्रीय जल आयोग ने भी संसद में बताया है कि उत्तर बिहार में बाढ़ का एक प्रमुख कारण नेपाल में स्थित ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश के बाद गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानंदा में बढ़ने वाला जलप्रवाह है।

केवल तटबंध बनाना क्यों नहीं है पर्याप्त?

बिहार में लंबे समय से बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों का इस्तेमाल किया जा रहा है। तटबंध कई क्षेत्रों को सामान्य बाढ़ से सुरक्षा देते हैं, लेकिन अत्यधिक जलप्रवाह, कटाव या संरचनात्मक नुकसान की स्थिति में समस्या गंभीर हो सकती है।

इसके अलावा नदियों में लगातार गाद जमा होने से नदी तल ऊंचा होने और जल निकासी क्षमता प्रभावित होने की चुनौती भी बनी रहती है। इसलिए विशेषज्ञ लंबे समय से केवल तटबंधों के बजाय नदी बेसिन, ड्रेनेज और जल प्रबंधन को एक साथ देखने की जरूरत बताते रहे हैं।

नेपाल में बड़े बांधों की योजना लंबे समय से चर्चा में

भारत और नेपाल के बीच सप्तकोसी बहुउद्देशीय परियोजना और सुनकोसी-कमला डायवर्जन जैसी परियोजनियों पर वर्षों से अध्ययन चल रहा है।

सितंबर 2026 से पहले उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार इन परियोजनाओं से जुड़े टोपोग्राफिकल, हाइड्रोलॉजिकल, भूकंपीय और अन्य कई तकनीकी अध्ययन पूरे किए जा चुके हैं, लेकिन परियोजनियां अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची हैं जहां उन्हें बिहार की बाढ़ समस्या का तत्काल समाधान माना जा सके।

भारत-नेपाल समन्वय क्यों है जरूरी?

बिहार की बाढ़ केवल राज्य की सीमा के भीतर पैदा होने वाली समस्या नहीं है। कई नदियों का प्रवाह नेपाल से आता है, इसलिए दीर्घकालिक समाधान के लिए दोनों देशों के बीच जल प्रबंधन, बांध, बाढ़ पूर्वानुमान और नदी नियंत्रण पर सहयोग जरूरी है।

भारत और नेपाल के बीच बाढ़ पूर्वानुमान, कोसी-गंडक परियोजनियों और जल संसाधन प्रबंधन के लिए कई द्विपक्षीय समितियां मौजूद हैं। जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि इन व्यवस्थाओं के माध्यम से दोनों देशों के बीच नदी और बाढ़ प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाती है।

2025-26 में संयुक्त समिति की बैठक नहीं हुई

हालांकि बाढ़ प्रबंधन में भारत-नेपाल सहयोग को महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन सरकारी जानकारी के अनुसार वर्ष 2025-26 में संबंधित भारत-नेपाल संयुक्त समिति की कोई बैठक नहीं हुई।

इसी जवाब में केंद्र सरकार ने यह भी कहा था कि स्थायी कोसी-गंडक बेसिन प्राधिकरण बनाने का कोई प्रस्ताव फिलहाल विचाराधीन नहीं है। पिछले तीन वर्षों में बाढ़ प्रबंधन और सीमावर्ती क्षेत्र कार्यक्रम के तहत बिहार को 206.77 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की गई।

बैराज और नदी परियोजनियों पर भी चल रहा काम

बिहार में बाढ़ नियंत्रण के लिए केवल तटबंध ही नहीं, बल्कि बैराज, नदी लिंक और सिंचाई परियोजनियों पर भी काम करने की योजना है।

2024 के केंद्रीय बजट में कोसी-मेची इंट्रा-स्टेट लिंक सहित कई सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के लिए वित्तीय सहायता की घोषणा की गई थी। इसके साथ कोसी से जुड़ी बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई परियोजनियों के सर्वेक्षण और जांच का भी प्रस्ताव रखा गया था।

क्या नदियों की सफाई और गाद हटाना समाधान है?

नदियों में गाद जमा होना बिहार की बाढ़ समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन केवल बड़े पैमाने पर ड्रेजिंग करना हर नदी के लिए स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।

नदी की प्रकृति, पानी का प्रवाह, गाद की मात्रा, पर्यावरण और लागत का अध्ययन करने के बाद ही अलग-अलग क्षेत्रों के लिए उपयुक्त कदम तय करने पड़ते हैं। साथ ही गांवों के तालाब, प्राकृतिक जल निकासी मार्ग और जलभराव वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखना भी जरूरी माना जाता है।

बाढ़ को पूरी तरह रोकना मुश्किल, नुकसान कम करना संभव

विशेषज्ञ दृष्टिकोण से बिहार में बाढ़ को पूरी तरह समाप्त करना व्यावहारिक रूप से कठिन है क्योंकि यह राज्य प्राकृतिक रूप से गंगा और उसकी हिमालयी सहायक नदियों के विशाल मैदानी क्षेत्र में स्थित है।

लेकिन बेहतर बांध और बैराज प्रबंधन, मजबूत तटबंध, ड्रेनेज सुधार, बाढ़ पूर्वानुमान, जलाशय प्रबंधन, गाद पर वैज्ञानिक अध्ययन और भारत-नेपाल सहयोग के जरिए नुकसान को काफी कम किया जा सकता है।

स्थायी समाधान के लिए एकीकृत रणनीति की जरूरत

बिहार की बाढ़ समस्या का समाधान किसी एक बांध, तटबंध या नदी की सफाई से संभव नहीं दिखता। इसके लिए पूरे नदी बेसिन को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है।

इस रणनीति में नेपाल के साथ जल प्रबंधन समझौते, आधुनिक बाढ़ पूर्वानुमान व्यवस्था, नदी और ड्रेनेज नेटवर्क का वैज्ञानिक प्रबंधन, संवेदनशील तटबंधों की निगरानी और बाढ़ प्रभावित आबादी के लिए बेहतर पुनर्वास व्यवस्था शामिल करनी होगी।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि बिहार में बाढ़ को हमेशा के लिए पूरी तरह खत्म किया जा सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि हर साल होने वाली तबाही और जान-माल के नुकसान को कितना कम किया जा सकता है।

source – केंद्रीय जल आयोग / जल शक्ति मंत्रालय / गृह मंत्रालय / भारत सरकार

जय राष्ट्र न्यूज़

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