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प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’ का अनावरण; VIDEO वायरल होते ही मचा बवाल, आयोजकों से अलग हुआ प्रेस क्लब

नई दिल्ली: दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में आयोजित एक कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। वायरल वीडियो में प्रधानमंत्री मोदी के कटआउट के सामने आरती और ‘मोदी चालीसा’ का पाठ करते लोग दिखाई दे रहे हैं। कार्यक्रम में ‘जय जय मोदी’ और ‘हर हर मोदी’ जैसे नारे भी लगाए गए। वीडियो में क्या दिखा? सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में नरेंद्र मोदी की तस्वीर/कटआउट को भगवान राम के स्वरूप में दिखाया गया है। मंच पर इसी तस्वीर के सामने आरती की गई और ‘भगवान श्री नरेंद्र मोदी चालीसा’ का पाठ किया गया। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने धार्मिक अंदाज में नारे भी लगाए। वीडियो वायरल होने के बाद इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं और प्रेस क्लब परिसर में हुए इस आयोजन को लेकर सवाल उठने लगे। बिहार किन्नर कल्याण बोर्ड से जुड़े पदाधिकारी रहे मौजूद रिपोर्टों के मुताबिक कार्यक्रम में बिहार किन्नर कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष राजन सिंह प्रमुख रूप से मौजूद थे। राजन सिंह इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर पटना में मंदिर बनाने की घोषणा को लेकर भी चर्चा में रहे हैं। आयोजन में ‘मोदी चालीसा’ को प्रस्तुत करने के साथ उसका पाठ भी किया गया। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को भगवान श्रीराम के स्वरूप में प्रदर्शित करने वाली तस्वीर भी दिखाई गई। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने किया किनारा विवाद बढ़ने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम उसकी ओर से आयोजित नहीं किया गया था। क्लब के अनुसार, एक संगठन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए हॉल किराये पर लिया था, लेकिन वहां आयोजित गतिविधि ने बुकिंग की शर्तों का उल्लंघन किया। जानकारी मिलते ही क्लब अधिकारियों ने हस्तक्षेप कर कार्यक्रम को रुकवा दिया। इस स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो गया कि वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा आयोजन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं था। VIDEO वायरल होने के बाद राजनीतिक बहस ‘मोदी चालीसा’ के वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस शुरू हो गई है। आलोचक इसे राजनीतिक व्यक्तिपूजा का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि समर्थकों की ओर से इसे प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान और समर्थन से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, प्रेस क्लब की ओर से कार्यक्रम से दूरी बनाए जाने के बाद विवाद का केंद्र अब आयोजकों द्वारा क्लब की बुकिंग की शर्तों के कथित उल्लंघन और कार्यक्रम की प्रकृति पर है। सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड कर रहा है मामला? प्रधानमंत्री की तस्वीर के सामने आरती, धार्मिक शैली में ‘मोदी चालीसा’ का पाठ और ‘जय जय मोदी’ जैसे नारों वाले वीडियो ने कुछ ही समय में सोशल मीडिया पर काफी ध्यान आकर्षित किया। इसी वजह से यह मामला आज की Trending Political News में शामिल हो गया है। फिलहाल प्रेस क्लब ने साफ कर दिया है कि उसने इस आयोजन का समर्थन या आयोजन नहीं किया था और नियमों के उल्लंघन के बाद कार्यक्रम को रोक दिया गया। स्रोत: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, लाइव हिन्दुस्तान, द लल्लनटॉप, अमर उजाला Jai Rashtra News

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PM CARES Fund: ₹8,452 करोड़ का फंड, FY25 में खर्च सिर्फ ₹87.85 लाख!

नई दिल्ली: PM CARES Fund एक बार फिर चर्चा में है। ताजा ऑडिट स्टेटमेंट के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक फंड का कुल बैलेंस ₹8,452.06 करोड़ था, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में इससे सिर्फ ₹87.85 लाख के भुगतान दर्ज हुए। आंकड़े सामने आने के बाद फंड के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। 93% रकम फिक्स्ड डिपॉजिट में ऑडिट आंकड़ों के अनुसार फंड की करीब ₹7,846.65 करोड़ राशि फिक्स्ड डिपॉजिट में थी, जबकि लगभग ₹605.41 करोड़ सेविंग बैंक खातों में रखे गए थे। यानी कुल बैलेंस का लगभग 93% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट में था। FY2024-25 में फिक्स्ड डिपॉजिट से करीब ₹469.38 करोड़ ब्याज भी मिला। ब्याज आय फंड की वित्तीय स्थिति मजबूत होने की प्रमुख वजहों में शामिल रही। ₹87.85 लाख में ज्यादातर रकम बच्चों की योजना पर वित्त वर्ष 2024-25 में PM CARES से कुल ₹87.85 लाख का भुगतान हुआ। इसमें लगभग पूरी राशि यानी ₹87.84 लाख PM CARES for Children Scheme के तहत खर्च हुई। पिछले वित्त वर्ष में कुल भुगतान करीब ₹15.6 करोड़ था। ₹8,452 करोड़ के क्लोजिंग बैलेंस की तुलना में FY25 का यह भुगतान करीब 0.01% है। हालांकि, यह सिर्फ एक वित्त वर्ष के भुगतान और उस वर्ष के अंत में मौजूद बैलेंस की तुलना है; इसे फंड की स्थापना से अब तक के कुल खर्च का प्रतिशत नहीं माना जाना चाहिए। फंड का बैलेंस एक साल में बढ़ा PM CARES का बैलेंस FY2023-24 में करीब ₹7,173 करोड़ था, जो मार्च 2025 तक बढ़कर ₹8,452 करोड़ से ज्यादा हो गया। इसी अवधि में घरेलू स्वैच्छिक योगदान करीब ₹479 करोड़ रहा, जबकि पिछले साल यह करीब ₹682 करोड़ था। बैलेंस बढ़ने में ब्याज आय और अन्य वित्तीय मदों की भी अहम भूमिका रही। खर्च को लेकर राजनीतिक बहस तेज ताजा आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद विपक्ष और अन्य आलोचकों ने सवाल उठाए हैं कि इतने बड़े फंड के मुकाबले FY25 में खर्च इतनी कम क्यों रही। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने भी ₹87.85 लाख के खर्च और फिक्स्ड डिपॉजिट में रखी बड़ी राशि को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं, फंड के समर्थक पक्ष से यह तर्क सामने आया है कि PM CARES का उद्देश्य आपात स्थितियों के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध रखना है और किसी एक वित्त वर्ष में कम खर्च होना अपने आप में वित्तीय अनियमितता साबित नहीं करता। PM CARES Fund क्या है? Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations (PM CARES) Fund की स्थापना मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान की गई थी। यह एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में काम करता है और इसका उद्देश्य आपातकालीन परिस्थितियों में सहायता प्रदान करना है। ताजा ऑडिट आंकड़ों ने एक बार फिर फंड के बड़े कॉर्पस, कम वार्षिक भुगतान और निवेश पैटर्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। स्रोत: PM CARES Fund Audit Statement, India Today, PTI, Tribune India Jai Rashtra News

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अभिजीत दीपके की डिग्री और स्कॉलरशिप पर सवाल, बोले—“मैं अपनी डिग्री दिखाने को तैयार”

नई दिल्ली: CJP संस्थापक अभिजीत दीपके की विदेश में पढ़ाई और उसकी फंडिंग को लेकर उठे सवालों के बीच विवाद अब राजनीतिक रंग ले चुका है। दीपके ने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देते हुए कहा है कि वह अपनी डिग्री, स्कॉलरशिप लेटर और एजुकेशन लोन से जुड़े दस्तावेज दिखाने के लिए तैयार हैं। साथ ही उन्होंने BJP नेताओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी सवाल उठाए। Boston University की पढ़ाई पर उठे सवाल विवाद तब शुरू हुआ जब गुजरात के एक RTI कार्यकर्ता ने दीपके की विदेश में पढ़ाई के खर्च को लेकर सवाल उठाए। उनके पिता के वित्तीय मामलों की जांच की मांग भी की गई और यह सवाल उठाया गया कि अमेरिका में उनकी पढ़ाई का खर्च कैसे पूरा हुआ। दीपके ने इन सवालों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन का इस्तेमाल हुआ था। उन्होंने कहा कि उनके पास इससे संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें सार्वजनिक किया जा सकता है। “मैं अपनी डिग्री दिखाने को तैयार हूं” अभिजीत दीपके ने कहा कि अगर उनकी शिक्षा और डिग्री को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं तो वह अपनी Boston University की डिग्री दिखाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास स्कॉलरशिप लेटर और एजुकेशन लोन के दस्तावेज हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दीपके ने दावा किया है कि उन्हें Boston University से Dean’s Scholarship मिली थी और पढ़ाई के बाकी खर्च के लिए एजुकेशन लोन लिया गया था। PM मोदी की डिग्री पर भी उठाया सवाल दीपके ने अपने बचाव के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री को लेकर भी सवाल खड़ा किया। उनका कहना है कि यदि उनसे उनकी शैक्षणिक योग्यता के दस्तावेज मांगे जा रहे हैं तो राजनीतिक नेताओं को भी अपनी डिग्रियों को सार्वजनिक करने के लिए तैयार रहना चाहिए। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में बहस और तेज हो गई है। विरोधियों को भी दिया जवाब 17 अगस्त को सामने आए एक वीडियो में दीपके ने उन लोगों पर भी निशाना साधा, जो उनकी Boston University की डिग्री को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अपनी डिग्री दिखा देंगे और साथ ही अपने आलोचकों से भी अपनी शैक्षणिक योग्यता सार्वजनिक करने की मांग की। विवाद अब राजनीतिक मुद्दा बना यह मामला केवल दीपके की शिक्षा तक सीमित नहीं रहा है। उनके CJP आंदोलन और सरकार के खिलाफ उनके बयानों के कारण यह विवाद राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने भी दीपके की ओर से प्रधानमंत्री की डिग्री पर सवाल उठाने वाली टिप्पणी की आलोचना की और इसे अहंकार से जोड़कर देखा। निष्कर्ष अभिजीत दीपके की Boston University की डिग्री और विदेश में पढ़ाई की फंडिंग को लेकर उठे सवालों के बीच उन्होंने साफ कहा है कि वह अपनी डिग्री, स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन से जुड़े दस्तावेज दिखाने को तैयार हैं। वहीं प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर उनके सवालों ने इस विवाद को और राजनीतिक बना दिया है। फिलहाल दोनों पक्षों के बयानों के बीच यह मुद्दा सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चा में बना हुआ है। Source: PTI, India Today, ThePrint, ABP News, Navbharat Live जय राष्ट्र न्यूज़

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हल्द्वानी के ‘शुद्धिकरण’ विवाद पर सियासी घमासान; खड़गे ने लगाया जातीय भेदभाव का आरोप

नई दिल्ली: उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद रामलीला मैदान के मंच पर कथित ‘शुद्धिकरण’ कराए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने इसे जातीय भेदभाव और दलितों के अपमान से जोड़ते हुए भाजपा और उससे जुड़े संगठनों पर निशाना साधा है। वहीं, जिस संगठन ने यह अनुष्ठान कराया, उसका कहना है कि इसका संबंध जाति से नहीं बल्कि धार्मिक और वैचारिक कारणों से था। क्या है पूरा मामला? मामला 8 अगस्त 2026 को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की रैली से जुड़ा है। इस रैली को मल्लिकार्जुन खड़गे ने संबोधित किया था। इसके बाद वहां श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास से जुड़े लोगों द्वारा हवन और गंगाजल के जरिए कथित शुद्धिकरण किए जाने की खबर सामने आई। घटना की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस ने इसे गंभीर मुद्दा बना दिया। खड़गे ने राज्यसभा में उठाया मुद्दा मल्लिकार्जुन खड़गे ने 13 अगस्त को राज्यसभा में इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह अनुसूचित जाति से आते हैं और इस घटना से उन्हें अपमानित महसूस हुआ। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया जा रहा है। खड़गे ने कहा कि उन्होंने अपनी रैली में किसी समाज या धर्म के खिलाफ बात नहीं की थी, फिर भी उनके भाषण के बाद मंच का शुद्धिकरण किया गया। कांग्रेस ने भाजपा पर लगाए गंभीर आरोप उत्तराखंड कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मंच का शुद्धिकरण भाजपा से जुड़े लोगों द्वारा कराया गया और इसे जातिगत भेदभाव तथा संकीर्ण मानसिकता का उदाहरण बताया। कांग्रेस नेताओं ने मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी खड़गे के समर्थन में प्रतिक्रिया दी और इस घटना को सामाजिक भेदभाव से जोड़ते हुए भाजपा पर निशाना साधा। भाजपा ने क्या कहा? भाजपा की ओर से इस घटना से पार्टी का सीधा संबंध होने से इनकार किया गया है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि अगर ऐसा कोई कृत्य हुआ है तो यह केवल खड़गे का नहीं, बल्कि सभी का अपमान है और मामले की जांच कराई जाएगी। यानी भाजपा ने कांग्रेस के इस आरोप को स्वीकार नहीं किया कि यह पार्टी की आधिकारिक कार्रवाई थी। शुद्धिकरण कराने वाले संगठन का अलग तर्क श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास से जुड़े लोगों ने कांग्रेस के जातिगत भेदभाव के आरोपों को खारिज किया है। संगठन का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी जाति या समुदाय का अपमान करना नहीं था। उनका दावा है कि खड़गे के कुछ पुराने बयानों को वे सनातन और हिंदू संगठनों के विरोध से जोड़कर देखते हैं और इसी कारण धार्मिक स्थल से जुड़े मैदान पर शुद्धिकरण अनुष्ठान किया गया। मायावती ने भी जताई आपत्ति इस विवाद पर मायावती ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने घटना को दलित विरोधी मानसिकता से जोड़ते हुए आपत्ति जताई और सामाजिक समानता के सवाल को उठाया। इस तरह मामला अब कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर देश में जाति, सामाजिक सम्मान और धार्मिक आस्था को लेकर बड़ी राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है। संसद से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा हल्द्वानी की घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस चल रही है। एक पक्ष इसे जातिगत भेदभाव का उदाहरण बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे धार्मिक आस्था और वैचारिक विरोध से जुड़ा मामला बता रहा है। फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शुद्धिकरण कराने वाले संगठन और कांग्रेस द्वारा बताए गए कारण अलग-अलग हैं। इसलिए घटना को लेकर लगाए जा रहे राजनीतिक आरोपों को उनके संबंधित पक्षों के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए। निष्कर्ष हल्द्वानी के रामलीला मैदान में खड़गे की रैली के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण’ ने उत्तराखंड से लेकर संसद तक राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। खड़गे ने इसे अपमान और जातीय भेदभाव से जोड़कर सवाल उठाया, जबकि शुद्धिकरण कराने वाले संगठन ने जातिगत मकसद से इनकार करते हुए इसे धार्मिक और वैचारिक कारणों से जुड़ा बताया है। भाजपा ने भी संगठन की कार्रवाई से अपना संबंध होने से इनकार किया है और जांच की बात कही है। Source: ThePrint, Aaj Tak, Dainik Tribune और अन्य ताजा रिपोर्ट्स जय राष्ट्र न्यूज़

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यही है भाजपा का दलितों के प्रति असली चरित्र! — विपक्ष का तीखा हमला

नई दिल्ली: संसद और देश की राजनीति में दलित अधिकारों और सामाजिक न्याय को लेकर एक बार फिर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर दलितों के प्रति कथित भेदभावपूर्ण रवैये का आरोप लगाते हुए सवाल उठाए हैं। इसी क्रम में “यही है भाजपा का दलितों के प्रति असली चरित्र!” जैसी तीखी टिप्पणी सामने आई है। हालांकि, इस बयान के संदर्भ में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह विपक्ष की राजनीतिक टिप्पणी/आरोप है, भाजपा का आधिकारिक बयान नहीं। दलित मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार को घेरा विपक्ष लंबे समय से केंद्र सरकार पर दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों को लेकर सवाल उठाता रहा है। संसद में आरक्षण, प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को लेकर भी अलग-अलग मौकों पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली है। विपक्ष का आरोप है कि दलित समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को अधिक स्पष्ट जवाब देना चाहिए। भाजपा का क्या कहना है? भाजपा की ओर से कई मौकों पर विपक्ष के ऐसे आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताया गया है। पार्टी का कहना रहा है कि केंद्र सरकार ने दलित कल्याण, गरीबों के आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। भाजपा नेता यह भी दावा करते रहे हैं कि सरकार की योजनाओं का लाभ समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचा है। आरक्षण और सामाजिक न्याय फिर चर्चा में दलित राजनीति के संदर्भ में आरक्षण और सामाजिक न्याय हमेशा से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक संस्थाओं में भागीदारी को लेकर भी बहस होती रही है। विपक्ष का कहना है कि इन मुद्दों पर केवल राजनीतिक बयानबाजी के बजाय ठोस नीतिगत कदमों और उनके प्रभाव पर चर्चा होनी चाहिए। सोशल मीडिया पर भी बयान चर्चा में “यही है भाजपा का दलितों के प्रति असली चरित्र!” जैसी टिप्पणी सोशल मीडिया पर भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई है। समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। ऐसे बयानों के बीच किसी भी दावे को उसके मूल वीडियो, बयान और पूरे संदर्भ के साथ देखना जरूरी है। निष्कर्ष दलित अधिकारों और सामाजिक न्याय को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच भाजपा पर विपक्ष का यह हमला सियासी बयानबाजी को और तेज करता है। विपक्ष जहां भाजपा पर दलित हितों के खिलाफ रवैया अपनाने का आरोप लगा रहा है, वहीं भाजपा ऐसे आरोपों को खारिज करते हुए अपनी कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक न्याय से जुड़े कदमों को सामने रखती रही है। जय राष्ट्र न्यूज़

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संसद में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन! हाथों में सॉफ्ट टॉय लेकर किया विरोध

नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने विरोध का एक अनोखा तरीका अपनाया। विपक्षी सांसद हाथों में सॉफ्ट टॉय लेकर संसद परिसर में प्रदर्शन करते नजर आए। प्रदर्शन के दौरान सांसदों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और अपने मुद्दों को अलग अंदाज में सामने रखा। यह प्रदर्शन संसद में चल रहे राजनीतिक गतिरोध के बीच हुआ, जहां विपक्ष कई मुद्दों पर केंद्र सरकार को घेर रहा था। हाथों में सॉफ्ट टॉय लेकर पहुंचे सांसद प्रदर्शन के दौरान कुछ विपक्षी सांसदों के हाथों में सॉफ्ट टॉय दिखाई दिए। आमतौर पर संसद परिसर में होने वाले विरोध प्रदर्शनों में पोस्टर, बैनर और तख्तियों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इस बार सॉफ्ट टॉय ने प्रदर्शन को अलग बना दिया। तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद यह प्रदर्शन सोशल मीडिया पर भी चर्चा में आ गया। विपक्ष लगातार उठा रहा है कई मुद्दे मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने कई मुद्दों पर सरकार से जवाब की मांग की। इनमें छात्र आंदोलनों, मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया और विभिन्न नीतिगत मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल शामिल रहे। विपक्षी सांसदों का कहना है कि जिन मुद्दों को वे जनता से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल मानते हैं, उन पर संसद में पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए। संसद परिसर में लगातार प्रदर्शन मानसून सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों को लेकर टकराव देखने को मिला। विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में मार्च, नारेबाजी और अलग-अलग प्रतीकों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया। सॉफ्ट टॉय वाला प्रदर्शन भी इसी राजनीतिक विरोध का हिस्सा रहा। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरें सॉफ्ट टॉय हाथ में लेकर प्रदर्शन करते सांसदों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे रचनात्मक और शांतिपूर्ण विरोध बताया, जबकि कुछ ने प्रदर्शन के तरीके पर सवाल उठाए। इस तरह का दृश्य संसद के बाहर आम विरोध प्रदर्शनों की तुलना में काफी अलग नजर आया। सत्ता पक्ष और विपक्ष में जारी टकराव संसद के मानसून सत्र में कई मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। विपक्ष सरकार से जवाब और चर्चा की मांग करता रहा, जबकि सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर संसद की कार्यवाही बाधित करने के आरोप लगाए। ऐसे माहौल में विपक्ष की ओर से अपनाए जा रहे अलग-अलग प्रदर्शन के तरीके राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन रहे हैं। निष्कर्ष संसद परिसर में सॉफ्ट टॉय लेकर विपक्षी सांसदों का प्रदर्शन सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। विपक्ष ने इस अनोखे तरीके से सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से किया गया और इसकी तस्वीरें तेजी से सोशल मीडिया पर प्रसारित हुईं। Source: संसद से जुड़े मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक रूप से सामने आए वीडियो/तस्वीरें जय राष्ट्र न्यूज़

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संसद का मानसून सत्र समाप्त, FCRA संशोधन विधेयक JPC के पास भेजा गया; हंगामे के बीच कई अहम फैसले

नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त 2026 को समाप्त हो गया। पूरे सत्र के दौरान कई मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक और हंगामा देखने को मिला। सत्र के दौरान कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा हुई, जबकि विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक, 2026 को विस्तृत जांच और विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया। FCRA संशोधन विधेयक JPC के पास भेजा गया सत्र के अंतिम चरण में FCRA संशोधन विधेयक सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले मुद्दों में शामिल रहा। लोकसभा ने विधेयक को दोनों सदनों की संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य विदेशी योगदान से जुड़े नियमों को मजबूत करना और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। वहीं विपक्ष और कुछ नागरिक संगठनों ने विधेयक के कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई है। विधेयक को लेकर विपक्ष ने जताई आपत्ति विपक्षी दलों ने FCRA संशोधन विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उनका कहना है कि प्रस्तावित बदलावों से विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के कामकाज पर सरकार की निगरानी और नियंत्रण बढ़ सकता है। कुछ संगठनों ने विशेष रूप से उन प्रावधानों पर चिंता जताई है जिनके तहत FCRA पंजीकरण रद्द या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी योगदान से खरीदी गई संपत्तियों को लेकर सरकार को अधिक अधिकार मिल सकते हैं। सरकार ने सुरक्षा और पारदर्शिता को बताया आधार सरकार की ओर से विपक्ष की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा गया कि विधेयक का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय या संगठन को निशाना बनाना नहीं है। सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है तथा यदि विदेशी योगदान का इस्तेमाल नियमों के विपरीत होता है तो उसके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। JPC में अब होगी विस्तृत जांच विधेयक को JPC के पास भेजे जाने के बाद अब समिति इसके विभिन्न प्रावधानों की विस्तार से जांच करेगी। समिति संबंधित मंत्रालयों, विशेषज्ञों, संगठनों और अन्य हितधारकों से सुझाव ले सकती है। इसके बाद समिति अपनी रिपोर्ट संसद के सामने रखेगी। रिपोर्ट में विधेयक को मौजूदा रूप में आगे बढ़ाने या उसमें बदलाव करने की सिफारिशें की जा सकती हैं। मानसून सत्र में कई विधेयक आगे बढ़े मानसून सत्र के दौरान संसद में कई विधायी कार्य हुए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सत्र में 10 महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए, जबकि कुछ प्रस्तावित कानूनों को आगे की जांच के लिए संसदीय समितियों के पास भेजा गया। सत्र के दौरान FCRA के अलावा खनन, सहकारी क्षेत्र और अन्य प्रशासनिक विषयों से जुड़े विधेयकों पर भी महत्वपूर्ण कार्रवाई हुई। सत्र में हंगामा भी रहा प्रमुख मुद्दा मानसून सत्र के दौरान कई दिनों तक विपक्ष और सरकार के बीच अलग-अलग मुद्दों को लेकर टकराव देखने को मिला। विपक्ष ने कई विषयों पर चर्चा की मांग की, जबकि कई मौकों पर सदन की कार्यवाही बाधित भी हुई। इसके बावजूद सरकार ने अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी रखी और सत्र के अंतिम दिनों में कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर कार्रवाई हुई। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयक भी चर्चा में रहे सत्र के दौरान संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, केंद्रशासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक भी लोकसभा में पेश किए गए। इन प्रस्तावों का संबंध लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन से जुड़ी व्यवस्था से था। हालांकि संविधान संशोधन विधेयक को आवश्यक बहुमत नहीं मिल सका और उससे जुड़े अन्य विधेयकों पर भी आगे कार्रवाई नहीं हुई। अब आगे क्या होगा? संसद का सत्र समाप्त होने के बाद अब सबसे ज्यादा नजर FCRA संशोधन विधेयक की JPC जांच पर रहेगी। समिति की रिपोर्ट आने के बाद सरकार विधेयक को दोबारा संसद में आगे बढ़ा सकती है। इस दौरान विपक्ष और संबंधित संगठनों की ओर से दिए जाने वाले सुझावों और आपत्तियों का भी महत्व रहेगा। निष्कर्ष 13 अगस्त 2026 को संसद का मानसून सत्र समाप्त हो गया, लेकिन सत्र के दौरान उठे कई मुद्दों पर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है। इनमें FCRA संशोधन विधेयक सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल है, जिसे अब संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया है। अब JPC की जांच और उसकी रिपोर्ट यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि FCRA संशोधन विधेयक किस रूप में आगे बढ़ता है। वहीं संसद के अगले सत्र में इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच फिर से तीखी बहस देखने को मिल सकती है। Source: संसद/संसदीय कार्य मंत्रालय से संबंधित जानकारी, PTI, Indian Express और अन्य ताजा रिपोर्ट्स जय राष्ट्र न्यूज़

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CJP की बैठक के लिए दिल्ली में हॉल नहीं मिला? अभिजीत दीपके का गंभीर आरोप, BJP पर लगाया दबाव बनाने का दावा

नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने दिल्ली में पार्टी की प्रस्तावित बैठक के लिए हॉल नहीं मिलने को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। दीपके का दावा है कि पार्टी ने कई जगहों पर हॉल की तलाश की, लेकिन कई संचालकों ने कथित तौर पर “ऊपर से दबाव” होने की बात कहते हुए जगह देने से इनकार कर दिया। उनका आरोप है कि आखिरकार जिस हॉल को बुक किया गया था, उसके मालिक को भी कथित तौर पर धमकी दी गई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। करीब 10 जगहों पर तलाशने का दावा अभिजीत दीपके के अनुसार, CJP को 12 अगस्त को दिल्ली में अपने वॉलंटियर्स की बैठक करनी थी। इसके लिए पार्टी की ओर से कई स्थानों पर हॉल तलाशे गए। दीपके का कहना है कि करीब 10 जगहों पर संपर्क करने के बावजूद उन्हें हॉल नहीं मिला। उनके मुताबिक, कुछ हॉल मालिकों ने कथित तौर पर कहा कि उन पर “ऊपर से दबाव” है। बुकिंग के बाद भी रद्द हुई बैठक दीपके ने दावा किया कि काफी कोशिशों के बाद आखिरकार एक हॉल बुक किया गया और उसके लिए भुगतान भी किया गया। उनके पास बुकिंग की रसीद होने की बात भी उन्होंने कही। हालांकि, उनका आरोप है कि बैठक से ठीक पहले हॉल मालिक को कथित तौर पर धमकी भरे फोन आए और इसके बाद बैठक आयोजित करने में परेशानी खड़ी हो गई। “उल्टा लटका दिया जाएगा” का लगाया आरोप CJP संस्थापक ने आरोप लगाया कि हॉल मालिक को धमकी दी गई कि अगर वहां CJP की बैठक होने दी गई तो उसे “उल्टा लटका दिया जाएगा।” दीपके ने इन कथित धमकियों के पीछे भाजपा का हाथ होने का आरोप लगाया है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में भाजपा की ओर से इस आरोप का कोई आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। दीपके बोले—धमकियों से नहीं डरेंगे अभिजीत दीपके ने कहा कि इस तरह की कथित धमकियों से CJP के कार्यकर्ता पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर किसी राजनीतिक संगठन की सामान्य बैठक के लिए निजी स्थान उपलब्ध कराने वालों पर दबाव बनाया जा रहा है, तो यह लोकतांत्रिक माहौल को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पार्टी की गतिविधियों को रोकने की कोशिशों के बावजूद CJP अपने कार्यक्रम जारी रखेगी। CJP ने दिल्ली पुलिस पर भी उठाए सवाल CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी मामले को लेकर दिल्ली पुलिस पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि यदि हॉल मालिकों को धमकियां दी गईं, तो पुलिस इस मामले में क्या कार्रवाई कर रही है। रांका ने दिल्ली की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए यह भी पूछा कि क्या दिल्ली पुलिस केवल भाजपा के लिए काम कर रही है। फिलहाल दिल्ली पुलिस की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। “जंतर-मंतर सीजन-2” का ऐलान हॉल विवाद के बीच अभिजीत दीपके ने CJP के आंदोलन को लेकर भी बड़ा संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर लोग लगातार पूछ रहे हैं कि “जंतर-मंतर सीजन-2” कब शुरू होगा। दीपके ने दावा किया कि इसका दूसरा चरण जल्द शुरू किया जाएगा। इससे संकेत मिलता है कि CJP आने वाले दिनों में दिल्ली में फिर से सार्वजनिक आंदोलन शुरू करने की तैयारी कर रही है। देशभर में ‘लिसनिंग टूर’ की भी तैयारी CJP के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने बताया कि पार्टी अब देशभर में ‘लिसनिंग टूर’ शुरू करने की तैयारी कर रही है। इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर लोगों की समस्याओं और सुझावों को सुनना बताया गया है। पार्टी ने शिक्षा को प्रमुख मुद्दा बताते हुए सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सोशल ऑडिट और स्थानीय समस्याओं को रिकॉर्ड करने की अपील भी की है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हॉल मालिकों को धमकी देने और भाजपा की ओर से दबाव बनाए जाने के आरोप फिलहाल CJP और अभिजीत दीपके की ओर से लगाए गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। भाजपा और दिल्ली पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी। निष्कर्ष दिल्ली में CJP की प्रस्तावित बैठक के लिए हॉल बुकिंग को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया है कि कई हॉल मालिकों पर दबाव बनाया गया और बुक किए गए हॉल के मालिक को भी कथित तौर पर धमकी दी गई। मामले ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। जहां CJP ने इसे दबाव और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाए हैं, वहीं भाजपा और दिल्ली पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। इसी बीच CJP ने “जंतर-मंतर सीजन-2” और देशव्यापी ‘लिसनिंग टूर’ की तैयारी का संकेत दिया है। Source: अमर उजाला / जनसत्ता / NDTV / आजतक रिपोर्ट्स जय राष्ट्र न्यूज़

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जय की ‘पसंदीदा’ तृषा को डिप्टी CM कब बनाएंगे? AIADMK नेता का तंज, सियासत गरम

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता से नेता बने विजय को लेकर AIADMK नेता आरबी उदयकुमार की एक टिप्पणी चर्चा में है। उन्होंने तंज कसते हुए सवाल किया कि आखिर विजय की कथित “पसंदीदा” अभिनेत्री तृषा कृष्णन को डिप्टी मुख्यमंत्री कब बनाया जाएगा। यह बयान तमिलनाडु की मौजूदा राजनीतिक बयानबाजी के बीच सामने आया है। AIADMK नेता ने विजय पर साधा निशाना AIADMK नेता आरबी उदयकुमार ने पार्टी कार्यक्रम के दौरान विजय पर निशाना साधते हुए तृषा का नाम लिया। उन्होंने कटाक्ष करते हुए पूछा कि तमिलनाडु को यह देखना बाकी है कि विजय की “प्रिय” तृषा को डिप्टी मुख्यमंत्री कब बनाया जाएगा। उनकी टिप्पणी को विजय की राजनीति और उनके निजी जीवन से जुड़े सार्वजनिक चर्चाओं पर राजनीतिक हमला माना जा रहा है। तृषा का नाम लेकर क्यों किया गया तंज? तृषा कृष्णन और विजय दोनों तमिल फिल्म इंडस्ट्री के जाने-माने चेहरे हैं और दोनों कई फिल्मों में साथ नजर आ चुके हैं। इसी सार्वजनिक पहचान का इस्तेमाल करते हुए AIADMK नेता ने विजय पर राजनीतिक कटाक्ष किया। हालांकि, तृषा को डिप्टी मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात किसी आधिकारिक नियुक्ति या प्रस्ताव के रूप में सामने नहीं आई है। यह टिप्पणी राजनीतिक तंज के तौर पर की गई थी। विजय अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री हैं 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद विजय के नेतृत्व वाली Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) सत्ता में आई और विजय ने 10 मई 2026 को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। विजय के सत्ता में आने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में नई राजनीतिक परिस्थितियां बनी हैं। AIADMK और DMK जैसे पुराने राजनीतिक दल अब TVK सरकार को लेकर लगातार प्रतिक्रिया दे रहे हैं। डिप्टी CM का पद अभी खाली मौजूदा विधानसभा व्यवस्था के अनुसार तमिलनाडु में डिप्टी मुख्यमंत्री का पद फिलहाल खाली है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक विजय सरकार में इस पद पर अभी किसी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हुई है। इसी राजनीतिक स्थिति के बीच AIADMK नेता की तृषा को लेकर की गई टिप्पणी ने सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा बढ़ा दी है। तमिलनाडु की राजनीति में बढ़ी बयानबाजी विजय के मुख्यमंत्री बनने के बाद AIADMK और TVK के बीच राजनीतिक दूरी और बयानबाजी लगातार चर्चा में है। हाल ही में AIADMK ने विजय द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय सांसद बैठक से भी दूरी बनाई थी। बैठक का मुद्दा लोकसभा सीटों के परिसीमन से जुड़ा था। ऐसे माहौल में AIADMK नेताओं की ओर से विजय पर किए जा रहे राजनीतिक हमले राज्य की बदलती सियासत को दर्शाते हैं। विजय सरकार के सामने कई राजनीतिक चुनौतियां मुख्यमंत्री के तौर पर विजय के सामने सरकार चलाने के साथ-साथ विधानसभा में राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है। 2026 के चुनाव के बाद TVK सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी और बाद में सहयोगी दलों के समर्थन से सरकार बनी। अब सरकार के सामने प्रशासन, परिसीमन और विपक्ष के साथ राजनीतिक टकराव जैसे कई मुद्दे हैं। निष्कर्ष तमिलनाडु की राजनीति में AIADMK नेता आरबी उदयकुमार का विजय और तृषा को लेकर किया गया तंज चर्चा में आ गया है। उन्होंने सवाल किया कि विजय की “पसंदीदा” तृषा को डिप्टी मुख्यमंत्री कब बनाया जाएगा। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि तृषा को डिप्टी मुख्यमंत्री बनाने का कोई आधिकारिक प्रस्ताव सामने नहीं आया है और यह बयान राजनीतिक कटाक्ष के रूप में दिया गया है। Source: NDTV / Navbharat Times / Latest political reports जय राष्ट्र न्यूज़

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सोनम वांगचुक का सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप, बोले—“तस्वीरें सार्वजनिक न करने का वादा तोड़ा”

नई दिल्ली: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों पर वादा तोड़ने और उनका भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया है। वांगचुक के मुताबिक, 26 दिन के अनशन को खत्म करने के दौरान हुई बातचीत में यह सहमति बनी थी कि उनके अनशन समाप्त करने की तस्वीरें तब तक सार्वजनिक नहीं की जाएंगी, जब तक पूरे घटनाक्रम में विपक्ष और छात्र प्रतिनिधियों की भागीदारी को भी शामिल नहीं किया जाता। उनका आरोप है कि इसके बावजूद तस्वीरें सार्वजनिक कर दी गईं। 26 दिन के अनशन के बाद खत्म हुआ आंदोलन सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक चले अनशन के बाद अपना अनशन समाप्त किया था। रिपोर्टों के मुताबिक, यह घटनाक्रम गुरुग्राम के एक अस्पताल में हुआ, जहां केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ उनकी बातचीत हुई थी। वांगचुक का कहना है कि अनशन खत्म करने का फैसला बातचीत और सरकार की ओर से दिए गए आश्वासनों के बाद लिया गया था। तस्वीरें सार्वजनिक करने को लेकर विवाद वांगचुक ने दावा किया कि बैठक के दौरान इस बात पर स्पष्ट सहमति बनी थी कि उनके अनशन खत्म करने या मंत्रियों के साथ हुई बैठक की तस्वीरें तुरंत सार्वजनिक नहीं की जाएंगी। उनके अनुसार, तस्वीरें तभी जारी की जानी थीं जब इस पूरे घटनाक्रम को केवल सरकार की उपलब्धि के तौर पर पेश करने के बजाय विपक्षी नेताओं और छात्र प्रतिनिधियों की भागीदारी भी दिखाई जाए। लेकिन वांगचुक का आरोप है कि तस्वीरें इससे पहले ही जारी कर दी गईं। “भरोसा टूट गया” वांगचुक ने इस घटनाक्रम पर निराशा जताते हुए कहा कि इस तरह तस्वीरें जारी किए जाने से उनका सरकार और राजनीतिक नेतृत्व पर भरोसा प्रभावित हुआ है। उन्होंने इसे सिर्फ तस्वीरों का मामला नहीं, बल्कि आपसी सहमति और विश्वास का सवाल बताया। उनके मुताबिक, यदि किसी बातचीत में कोई शर्त तय होती है तो दोनों पक्षों को उसका सम्मान करना चाहिए। सरकार, विपक्ष और छात्रों की भागीदारी चाहते थे वांगचुक वांगचुक के अनुसार, लद्दाख में जब सरकार प्रदर्शनकारियों की मांगों को स्वीकार करती है, तो आमतौर पर सरकारी प्रतिनिधि प्रदर्शनकारी को जूस या सूप पिलाकर अनशन समाप्त करवाते हैं। उनका कहना है कि इस बार भी प्रक्रिया ऐसी हो सकती थी, लेकिन इसे केवल सत्तारूढ़ पक्ष की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय सभी पक्षों की भागीदारी दिखाई जानी चाहिए थी। सरकार से लिखित आश्वासन पूरा करने की मांग वांगचुक इससे पहले भी सरकार से उन लिखित आश्वासनों को पूरा करने की मांग कर चुके हैं, जिनके बाद उन्होंने अपना आंदोलन समाप्त किया था। उन्होंने प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करने के आश्वासन को भी पूरा करने की अपील की है। साथ ही उन्होंने प्रदर्शन के दौरान जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों के लिए मुआवजे की मांग भी उठाई थी। मुद्दा अब राजनीतिक बहस में भी पहुंचा तस्वीरों को लेकर वांगचुक के आरोप के बाद यह मामला राजनीतिक चर्चा में आ गया है। जहां वांगचुक इसे भरोसे और वादे का मुद्दा बता रहे हैं, वहीं पूरे घटनाक्रम को लेकर सरकार की ओर से सामने आने वाली आधिकारिक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में तस्वीरें जारी किए जाने और वांगचुक के आरोप का विवरण सामने आया है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत की पूरी रिकॉर्डिंग या लिखित सहमति का विस्तृत सार्वजनिक विवरण सामने नहीं आया है। निष्कर्ष सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के मंत्रियों पर वादाखिलाफी और भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि 26 दिन का अनशन खत्म करने के दौरान तस्वीरें सार्वजनिक न करने पर सहमति बनी थी, लेकिन इसके बावजूद तस्वीरें जारी कर दी गईं। अब नजर इस बात पर है कि सरकार इस आरोप पर क्या आधिकारिक जवाब देती है और वांगचुक द्वारा उठाए गए अन्य आश्वासनों पर आगे क्या कार्रवाई होती है। Source: India Today / The Lallantop / Prabhat Khabar / ANI reports जय राष्ट्र न्यूज़

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