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Trump ने रूस पर प्रतिबंधों को लेकर 60 दिन के रिव्यू का संकेत दिया, रूसी तेल आयात पर भारत को फिलहाल राहत

वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 18 अक्टूबर 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूस से जुड़े प्रतिबंधों और टैरिफ पर अंतिम फैसला लेने से पहले उनके आर्थिक प्रभावों की समीक्षा करने का रुख अपनाया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के मुताबिक, इस प्रक्रिया में 60 दिन तक का समय लग सकता है। इस समीक्षा से भारत के रूसी तेल आयात पर संभावित अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ को लेकर फिलहाल राहत की उम्मीद बनी है। रुबियो बोले—अंतिम फैसले से पहले होगा असर का आकलन अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ट्रंप प्रशासन रूस से संबंधित प्रतिबंधों और टैरिफ पर निर्णय लेने से पहले उनके व्यापक प्रभावों का आकलन करना चाहता है। इसमें वैश्विक ऊर्जा कीमतों, घरेलू महंगाई और रणनीतिक साझेदार देशों पर पड़ने वाले असर जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, समीक्षा की प्रक्रिया में लगभग 60 दिन लग सकते हैं। भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला? भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ लगाए जाने की किसी भी योजना का असर भारतीय तेल रिफाइनरियों, आयात लागत और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। प्रस्तावित अमेरिकी उपायों को लेकर समीक्षा से फिलहाल अतिरिक्त शुल्क की आशंकाओं पर कुछ राहत मिली है। हालांकि, किसी विशेष छूट की कानूनी स्थिति और उसके लागू होने की शर्तों को संबंधित अमेरिकी आदेशों के आधार पर ही स्पष्ट किया जा सकता है। 100% तक टैरिफ की आशंका रिपोर्टों में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की संभावित व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। ऐसे कदम से भारत सहित अन्य आयातक देशों के साथ अमेरिका के व्यापारिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, संभावित टैरिफ की अधिकतम सीमा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर है। किसी शुल्क का लागू होना संबंधित कानून, कार्यकारी आदेश और प्रशासन के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा। वैश्विक तेल कीमतें भी अहम कारक रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में तनाव के बीच ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। रूस पर अतिरिक्त प्रतिबंधों से वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह अमेरिकी प्रशासन के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर ईंधन लागत, परिवहन और महंगाई पर पड़ सकता है। इसी वजह से प्रतिबंधों से जुड़े फैसलों में आर्थिक और रणनीतिक पहलुओं का आकलन महत्वपूर्ण है। भारत पर दबाव पूरी तरह खत्म नहीं समीक्षा की प्रक्रिया को भारत के रूसी तेल आयात को स्थायी मंजूरी मिलने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अमेरिका की आगे की नीति और संभावित टैरिफ संबंधी फैसले भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों तथा भारत की ऊर्जा खरीद रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। अगले 60 दिन रहेंगे महत्वपूर्ण अब नजर अमेरिकी प्रशासन की समीक्षा और उसके बाद होने वाले फैसले पर रहेगी। अंतिम निर्णय से भारत की कच्चे तेल की आयात लागत, घरेलू महंगाई, रुपये और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, प्रभाव की दिशा और सीमा अंतिम नीति तथा वैश्विक तेल बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। स्रोत: Reuters, The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये को संभालने के लिए RBI की रणनीति में बदलाव, डॉलर की बिक्री के साथ ब्याज दरों पर भी जोर

मुंबई, 17 अक्टूबर 2026: भारतीय रुपये पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब केवल डॉलर की बिक्री और विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप पर निर्भर नहीं दिख रहा है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक परिस्थितियों को सावधानीपूर्वक सख्त करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसमें ब्याज दरों में बढ़ोतरी, बाजार में उपलब्ध नकदी कम करना और बॉन्ड की बिक्री जैसे उपाय शामिल हैं। इसका उद्देश्य महंगाई पर नियंत्रण के साथ-साथ पूंजी के बाहर जाने और रुपये की कमजोरी को सीमित करना है। चार साल बाद बढ़ाई गई ब्याज दर अक्टूबर में RBI ने नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की। यह चार साल में पहली दर वृद्धि बताई गई है। इसके अलावा, बैंकिंग प्रणाली में उपलब्ध नकदी कम करने के लिए बॉन्ड बिक्री और रिजर्व से जुड़े उपाय भी अपनाए गए हैं। इन कदमों से वित्तीय परिस्थितियों को सख्त करने और रुपये को समर्थन देने की कोशिश की जा रही है। 2026 में करीब 6% कमजोर हुआ रुपया इस साल भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 6% कमजोर हुआ है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी और डॉलर की बढ़ती मांग ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि, RBI के हालिया कदमों के बाद रुपया अपने निचले स्तर से करीब 2% उबरने में कामयाब रहा है। केवल डॉलर बेचने से नहीं बनेगी बात? रुपये की गिरावट को थामने के लिए RBI विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाता रहा है। हालांकि, लगातार हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल विभिन्न विदेशी मुद्रा उपायों के तहत RBI करीब 150 अरब डॉलर तक का इस्तेमाल कर चुका है। ऐसे में ब्याज दरों और नकदी प्रबंधन से जुड़े उपाय रुपये को समर्थन देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। दिसंबर में फिर बढ़ सकती हैं ब्याज दरें? सितंबर में महंगाई दर 5.54% तक पहुंचने के बाद दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी को लेकर बाजार में चर्चा तेज हुई है। कुछ विश्लेषक 50 बेसिस पॉइंट तक की सख्ती की संभावना जता रहे हैं। हालांकि, RBI ने दिसंबर में ऐसी किसी बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से निकाले 33 अरब डॉलर रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 33 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। घरेलू ब्याज दरें और यील्ड बढ़ने से रुपये में निवेश की आकर्षकता बढ़ सकती है। इससे पूंजी की निकासी पर अंकुश लगाने में मदद मिलने की संभावना है, हालांकि निवेशकों के फैसले वैश्विक परिस्थितियों और बाजार की धारणा पर भी निर्भर करेंगे। ज्यादा सख्ती से अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी रुपये को सहारा दे सकती है, लेकिन इसके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। कर्ज महंगा होने से कारोबार, आवास ऋण लेने वालों और छोटे कर्जदारों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से RBI के सामने रुपये को स्थिर रखने, महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने और आर्थिक विकास को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक फिलहाल 2013 जैसी अचानक और तीखी आपातकालीन सख्ती के बजाय सावधानीपूर्वक कदम उठाने की रणनीति अपनाता दिख रहा है। स्रोत: Reuters जय राष्ट्र न्यूज़

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India-US Trade Deal की पहली Phase Final Drafting में, Sergio Gor बोले—“Big Items Are Done”

नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते की पहली phase अब अंतिम कानूनी मसौदा तैयार करने के चरण में पहुंच गई है। भारत में अमेरिकी राजदूत Sergio Gor ने कहा कि बातचीत तेजी से आगे बढ़ी है और समझौते के बड़े मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। उन्होंने कहा, “Big items are done”, जबकि शेष तकनीकी बिंदुओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। Piyush Goyal ने भी कहा—पहला चरण लगभग फाइनल केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने 15 अक्टूबर को कहा था कि व्यापार समझौते का पहला चरण लगभग अंतिम रूप ले चुका है। फिलहाल कानूनी मसौदे और अंतिम समीक्षा पर काम चल रहा है। भारत की कोशिश है कि समझौता लागू होने के बाद उसके निर्यातकों को बांग्लादेश, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले टैरिफ के मामले में नुकसान न उठाना पड़े। “Big Items Are Done”: Sergio Gor Bloomberg New Economy Forum में Sergio Gor ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बातचीत असाधारण तेजी से आगे बढ़ी है। उनके अनुसार, समझौते के प्रमुख मुद्दों पर पर्याप्त सहमति बन चुकी है और अब बाकी बिंदुओं को सुलझाने पर ध्यान दिया जा रहा है। Tariffs और Market Access रहे अहम मुद्दे भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता में टैरिफ, बाजार तक पहुंच और नियामकीय मुद्दे लंबे समय से प्रमुख विषय रहे हैं। इससे पहले अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि Jamieson Greer ने कहा था कि बातचीत अंतिम चरण में है, लेकिन कुछ मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। इसी वजह से उस समय समझौते को तत्काल अंतिम रूप दिए जाने की संभावना नहीं मानी गई थी। भारतीय निर्यातकों के लिए क्या बदल सकता है? भारत का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी बाजार में अपने निर्यातकों के लिए अधिक अनुकूल और अनुमानित टैरिफ व्यवस्था हासिल करना है। अमेरिका भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में शामिल है। रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल से सितंबर की अवधि में अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात सालाना आधार पर बढ़ा है। व्यापार समझौते के पहले चरण से निर्यातकों को बेहतर बाजार पहुंच और व्यापारिक अनिश्चितताओं में कमी मिलने की उम्मीद है। हालांकि, वास्तविक लाभ समझौते की अंतिम शर्तों और उनके लागू होने पर निर्भर करेगा। Marco Rubio की भारत यात्रा भी अहम अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio की भारत यात्रा भी दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस दौरान आर्थिक सहयोग, ऊर्जा और व्यापक रणनीतिक साझेदारी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। यह बातचीत व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त गति प्रदान कर सकती है। व्यापक व्यापार समझौते पर बातचीत अभी बाकी पहले चरण का अंतिम कानूनी मसौदा तैयार होना महत्वपूर्ण प्रगति है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत-अमेरिका के व्यापक व्यापार समझौते से जुड़े सभी मुद्दे सुलझ गए हैं। दोनों देशों को टैरिफ, बाजार पहुंच और नियामकीय नियमों सहित कई व्यापक विषयों पर आगे भी बातचीत करनी होगी। समझौते की अंतिम शर्तें और लागू होने की समय-सीमा आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होंगी। स्रोत: Reuters, The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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Railway कर्मचारियों के लिए 78-day productivity-linked bonus मंजूर, 11.4 लाख non-gazetted staff को मिलेगा फायदा

नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026: Union Cabinet ने Indian Railways के करीब 11.4 लाख non-gazetted employees के लिए 78 दिनों के Productivity Linked Bonus (PLB) को मंजूरी दे दी है। Eligible कर्मचारियों को अधिकतम लगभग ₹17,951 तक bonus मिलने की उम्मीद है। किन कर्मचारियों को मिलेगा bonus? यह bonus Railway के eligible non-gazetted employees को दिया जाएगा। इसमें विभिन्न operational, technical और support categories के कर्मचारी शामिल होंगे। 78 दिनों का PLB Cabinet ने 78 days के productivity-linked bonus को मंजूरी दी है। PLB का उद्देश्य कर्मचारियों के contribution और Railway performance को reward करना है। अधिकतम कितना मिलेगा? Eligible employee को अधिकतम करीब ₹17,951 तक bonus मिल सकता है। Actual amount salary calculation और eligibility norms पर निर्भर करेगा। 11.4 लाख कर्मचारियों को फायदा सरकार के मुताबिक इस फैसले से लगभग 11.4 लाख Railway employees को benefit मिलेगा। Festival season से पहले यह घोषणा कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। क्यों दिया जाता है PLB? Indian Railways में productivity-linked bonus operational performance और workforce contribution से जुड़ा incentive है। इसे आमतौर पर eligible non-gazetted staff को annual basis पर दिया जाता है। source – Union Cabinet, Ministry of Railways जय राष्ट्र न्यूज़

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Jabil और Adani की AI डेटा सेंटर उपकरणों के लिए JV बनाने की तैयारी, 50:50 साझेदारी का प्रस्ताव

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2026: वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज कंपनी Jabil और Adani Enterprises ने भारत में AI और डेटा सेंटर उपकरणों के निर्माण तथा असेंबली के लिए प्रस्तावित 50:50 जॉइंट वेंचर (JV) बनाने को लेकर समझौता किया है। दोनों कंपनियों ने इस संबंध में गैर-बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ भारत में डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग बढ़ रही है। AI और डेटा सेंटर उपकरणों के निर्माण पर रहेगा फोकस प्रस्तावित जॉइंट वेंचर का मुख्य उद्देश्य भारत में AI और डेटा सेंटर इकोसिस्टम के लिए जरूरी उपकरणों का स्थानीय स्तर पर निर्माण और असेंबली करना है। इससे देश में उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने और AI इंफ्रास्ट्रक्चर की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, परियोजना के तहत किन उपकरणों का निर्माण किया जाएगा और उत्पादन कब शुरू होगा, इसकी विस्तृत जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है। 50:50 हिस्सेदारी वाला होगा प्रस्तावित जॉइंट वेंचर समझौते के तहत Adani Enterprises और Jabil प्रस्तावित संयुक्त उद्यम में 50-50 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने की योजना बना रहे हैं। इसका अर्थ है कि दोनों कंपनियां प्रस्तावित कारोबार में बराबर भागीदारी करना चाहती हैं। फिलहाल समझौता गैर-बाध्यकारी चरण में है। इसलिए अंतिम निवेश राशि, संचालन की शर्तें, उत्पादन क्षमता और अन्य व्यावसायिक विवरण आगे होने वाले निश्चित समझौतों तथा आवश्यक मंजूरियों पर निर्भर करेंगे। भारत में डेटा सेंटर की मांग बढ़ने के बीच समझौता भारत में AI सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल कारोबार के विस्तार से डेटा सेंटर की जरूरत बढ़ रही है। इन सुविधाओं को चलाने के लिए सर्वर, नेटवर्किंग सिस्टम, बिजली प्रबंधन और अन्य विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का डेटा सेंटर बाजार 2029 तक लगभग चार गुना होने का अनुमान जताया गया है। वैश्विक हाइपरस्केल कंपनियों ने भी भारत में 50 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की योजनाएं घोषित की हैं। हालांकि, बाजार के अनुमान और घोषित निवेश योजनाएं भविष्य की संभावनाओं को दर्शाती हैं; इन्हें पूरी हो चुकी परियोजनाओं या वास्तविक निवेश के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। Jabil की मैन्युफैक्चरिंग विशेषज्ञता और Adani का इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क Jabil इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, उत्पाद विकास और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी सेवाएं प्रदान करती है। वहीं, Adani Group ऊर्जा और बुनियादी ढांचे सहित विभिन्न क्षेत्रों में कारोबार करता है। प्रस्तावित साझेदारी के जरिए दोनों कंपनियां अपनी संबंधित क्षमताओं का इस्तेमाल भारत में AI और डेटा सेंटर उपकरणों के निर्माण का कारोबार विकसित करने के लिए करना चाहती हैं। यदि यह योजना आगे बढ़ती है, तो इससे देश में डेटा सेंटर हार्डवेयर की स्थानीय आपूर्ति और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण से जुड़े अवसर पैदा हो सकते हैं। भारत की AI मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मिल सकता है बढ़ावा स्थानीय स्तर पर डेटा सेंटर उपकरणों का उत्पादन बढ़ने से घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और कुछ आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे संबंधित विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी सेवाओं से जुड़े कारोबारों के लिए भी अवसर बन सकते हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब भारत में डेटा सेंटर क्षेत्र के विकास और उससे जुड़ी बिजली की खपत जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए नई नीतिगत व्यवस्थाओं पर भी चर्चा हो रही है। हालांकि, प्रस्तावित JV का वास्तविक प्रभाव निवेश, उत्पादन क्षमता, स्थानीय स्तर पर होने वाले निर्माण और परियोजना के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। आगे के समझौतों पर टिकी रहेंगी निगाहें Jabil और Adani Enterprises के बीच प्रस्तावित साझेदारी भारत के AI इंफ्रास्ट्रक्चर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में एक संभावित नई पहल है। लेकिन अभी यह समझौता शुरुआती गैर-बाध्यकारी चरण में है। अब निवेश, अंतिम समझौते, उत्पादन योजना और परियोजना की समयसीमा से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण होगी। इन विवरणों के सामने आने के बाद ही इस साझेदारी के संभावित व्यावसायिक और औद्योगिक प्रभाव का अधिक स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा। Source: Reuters / Adani Enterprises / Jabil / Yahoo Finance जय राष्ट्र न्यूज़

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HCLTech के मजबूत नतीजों से शेयर बाजार में जोरदार तेजी; Nifty 50 करीब 1.6% चढ़ा, Nifty IT में 5.2% का उछाल

मुंबई, 13 अक्टूबर 2026: भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को जोरदार तेजी देखने को मिली। HCLTech के मजबूत तिमाही नतीजों से IT stocks में भारी खरीदारी हुई, जिसके चलते Nifty 50 करीब 1.6% बढ़कर 22,721.95 पर बंद हुआ। वहीं Sensex 1,109.10 अंक यानी 1.54% चढ़कर 73,033.78 पर पहुंच गया। IT sector इस तेजी का सबसे बड़ा driver रहा। Nifty IT में 5.2% की तेजी Nifty IT index में लगभग 5.2% की बढ़त दर्ज की गई, जो पिछले 17 महीनों से ज्यादा समय की इसकी सबसे मजबूत एक दिन की तेजी रही। HCLTech के साथ TCS, Infosys और Wipro जैसे बड़े IT stocks में भी खरीदारी देखने को मिली। HCLTech का शेयर 8% से ज्यादा चढ़ा HCLTech का शेयर करीब 8.4% उछला, जो सितंबर 2020 के बाद कंपनी के शेयर की सबसे बड़ी single-day gain रही। कंपनी के बेहतर margins, मजबूत deal wins और AI business में बढ़ोतरी ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया। Q2 में मुनाफा 21% बढ़कर ₹5,132 करोड़ HCLTech ने FY27 की दूसरी तिमाही में ₹5,132 करोड़ का consolidated net profit दर्ज किया, जो सालाना आधार पर लगभग 21% ज्यादा है। कंपनी की revenue 11.5% बढ़कर ₹35,620 करोड़ रही, जबकि EBIT margin बढ़कर 18.2% पर पहुंच गया। TCS और दूसरे IT shares में भी तेजी HCLTech के अलावा TCS का शेयर करीब 6.8%, Infosys लगभग 4.4% और Wipro करीब 4.5% मजबूत हुआ। बेहतर-than-expected IT earnings ने पूरे sector में buying sentiment को मजबूत किया। Broader market में भी दिखी मजबूती IT stocks के अलावा financial services, auto, FMCG और metal shares में भी बढ़त देखने को मिली। Midcap index करीब 1.1% चढ़ा, जबकि smallcap index में हल्की तेजी रही। हालांकि Middle East tensions और ऊंचे crude oil prices अभी भी बाजार के लिए risk बने हुए हैं। source – Reuters, HCLTech जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपये को संभालने के लिए RBI का बड़ा कदम, सरकारी तेल कंपनियों के लिए स्पेशल डॉलर विंडो; फॉरेक्स सट्टेबाजी पर भी सख्ती

मुंबई: भारतीय रुपये पर लगातार बने दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 10 अक्टूबर 2026 को कई अहम कदमों की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम की दैनिक डॉलर जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष डॉलर विंडो शुरू करने का फैसला किया है। इसके साथ ही रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन के नियम भी सख्त किए गए हैं, ताकि डॉलर की सट्टा मांग और जरूरत से ज्यादा हेजिंग पर अंकुश लगाया जा सके। 12 अक्टूबर से शुरू होगी स्पेशल डॉलर विंडो RBI की नई सुविधा 12 अक्टूबर से प्रभावी होगी। इसके तहत तीनों सरकारी तेल विपणन कंपनियों की दैनिक डॉलर जरूरत नामित बैंकों के माध्यम से सीधे केंद्रीय बैंक पूरी करेगा। यह व्यवस्था बाजार की परिस्थितियों के आधार पर अगले आदेश तक जारी रहेगी। इस कदम का उद्देश्य तेल कंपनियों की डॉलर खरीद के कारण स्पॉट फॉरेक्स बाजार पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करना है। किन कंपनियों को मिलेगा फायदा? RBI की इस विशेष सुविधा का लाभ फिलहाल तीन सरकारी तेल कंपनियों को मिलेगा: इन कंपनियों को कच्चे तेल के आयात का भुगतान करने के लिए बड़ी मात्रा में अमेरिकी डॉलर की जरूरत होती है। डॉलर की मांग बढ़ने पर रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। स्पॉट फॉरेक्स बाजार पर कम हो सकता है दबाव आमतौर पर तेल कंपनियां अपनी डॉलर जरूरतों को विदेशी मुद्रा बाजार से पूरा करती हैं। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर आयात बिल बढ़ता है और कंपनियों को अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं। RBI की नई व्यवस्था से इन तीनों कंपनियों की डॉलर मांग का एक बड़ा हिस्सा सीधे केंद्रीय बैंक के जरिए पूरा होगा। इससे खुले बाजार में डॉलर की अतिरिक्त मांग कम करने और रुपये में उतार-चढ़ाव नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। डॉलर के मुकाबले रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव? 2026 में अब तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 7 प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है। इसके पीछे कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, विदेशी निवेशकों की निकासी और आयातकों की लगातार डॉलर मांग जैसे कारक बताए जा रहे हैं। हाल के दिनों में रुपया 97 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गया था। इससे आयात की लागत और विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ीं। फॉरेक्स डेरिवेटिव के नियम भी सख्त रुपये को सहारा देने के लिए RBI ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार के नियमों में भी बदलाव किए हैं। इन कदमों में रद्द किए गए कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक करने पर प्रतिबंध और बिना वास्तविक विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रमाण दिए जाने वाले डेरिवेटिव सौदों की सीमा घटाना शामिल है। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य वास्तविक कारोबारी जरूरतों के लिए हेजिंग की सुविधा बनाए रखते हुए सट्टेबाजी से पैदा होने वाले अतिरिक्त दबाव को सीमित करना है। 100 मिलियन डॉलर की सीमा घटाकर 5 मिलियन डॉलर रिपोर्टों के अनुसार, कंपनियां अब वास्तविक विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रमाण दिए बिना अधिकतम 5 मिलियन डॉलर तक की फॉरेक्स डेरिवेटिव पोजिशन ले सकेंगी। पहले यह सीमा 100 मिलियन डॉलर थी। इस बदलाव से बिना अंतर्निहित कारोबारी जरूरत के बड़े डेरिवेटिव सौदे करना अधिक सीमित होगा। RBI को उम्मीद है कि इससे रुपये के खिलाफ सट्टा पोजिशन बनाने की गुंजाइश कम होगी। बड़े विदेशी मुद्रा सौदों पर 20 प्रतिशत रिजर्व की शर्त RBI ने कुछ बड़े विदेशी मुद्रा लेनदेन के लिए 20 प्रतिशत नकद रिजर्व की आवश्यकता भी लागू की है। इस कदम का उद्देश्य आक्रामक डॉलर खरीद और सट्टा कारोबार की लागत बढ़ाना है। हालांकि, इस प्रावधान का वास्तविक असर संबंधित नियमों के दायरे और बाजार में कारोबार करने वाली संस्थाओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। आयातकों की हेजिंग में तेज बढ़ोतरी रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में भारतीय आयातकों ने करीब 77 अरब डॉलर की हेजिंग की, जो एक साल पहले की तुलना में 80 प्रतिशत से अधिक थी। वहीं, निर्यातकों की हेजिंग लगभग 41 अरब डॉलर रही। आयातकों और निर्यातकों की हेजिंग में इस अंतर को विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ने और रुपये पर दबाव के प्रमुख कारकों में से एक माना जा रहा है। कच्चे तेल की कीमतें बनीं बड़ी चिंता भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ जाता है और डॉलर की अधिक जरूरत पड़ती है। मध्य पूर्व में तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत हाल में 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थी। महंगा तेल भारत के व्यापार संतुलन और रुपये, दोनों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। RBI पहले भी कर चुका है डॉलर बाजार में हस्तक्षेप रुपये को समर्थन देने के लिए RBI पिछले कुछ हफ्तों में स्पॉट डॉलर बिक्री और विदेशी मुद्रा स्वैप जैसे उपायों का इस्तेमाल करता रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, सितंबर में अपने उच्च स्तर से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 50 अरब डॉलर घटकर 734.6 अरब डॉलर रह गया। विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप को इस गिरावट के संभावित कारणों में शामिल किया गया है। रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद भी दबाव बरकरार 7 अक्टूबर को RBI ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, यह लगभग चार वर्षों में पहली दर वृद्धि थी। हालांकि, ब्याज दर बढ़ाने के बावजूद रुपये पर दबाव पूरी तरह कम नहीं हुआ। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने डॉलर की मांग और विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव गतिविधियों को सीधे प्रभावित करने वाले उपायों की घोषणा की। क्या अब मजबूत होगा रुपया? विश्लेषकों के मुताबिक, RBI के नए कदम निकट अवधि में डॉलर की मांग को नियंत्रित करने और रुपये में तेज उतार-चढ़ाव कम करने में मदद कर सकते हैं। सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर जरूरतों को सीधे पूरा करने से स्पॉट बाजार पर दबाव भी घट सकता है। हालांकि, रुपये की दीर्घकालिक दिशा कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेश के प्रवाह, वैश्विक ब्याज दरों और भारत के व्यापार संतुलन जैसे कारकों पर निर्भर करेगी। इसलिए इन उपायों से रुपये में तत्काल और स्थायी मजबूती की…

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September Quarter में Indian Companies की कमाई बढ़ने की उम्मीद, Nifty 50 का मुनाफा 20% तक उछल सकता है

मुंबई: भारतीय कंपनियों के जुलाई-सितंबर 2026 तिमाही के नतीजों में मुनाफे की वृद्धि तेज रहने की उम्मीद है। विभिन्न ब्रोकरेज अनुमानों के मुताबिक, Nifty 50 कंपनियों का संयुक्त शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर करीब 20 प्रतिशत बढ़ सकता है। कुछ अनुमानों में इससे भी अधिक वृद्धि की संभावना जताई गई है। घरेलू मांग, वित्तीय क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन और ऑटोमोबाइल कंपनियों की मजबूत बिक्री से कंपनियों की कमाई को सहारा मिलने की उम्मीद है। Nifty 50 के मुनाफे में करीब 20% वृद्धि का अनुमान विश्लेषकों के अनुसार, सितंबर तिमाही में Nifty 50 कंपनियों के राजस्व और शुद्ध मुनाफे में अच्छी वृद्धि देखने को मिल सकती है। करीब 20 प्रतिशत की अनुमानित सालाना वृद्धि से भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में कमाई की रफ्तार बेहतर होने के संकेत मिलते हैं। हालांकि, वास्तविक प्रदर्शन कंपनियों के नतीजों, लागत और मांग की स्थिति पर निर्भर करेगा। Motilal Oswal का अनुमान और ज्यादा मजबूत Motilal Oswal Financial Services ने अपने विश्लेषण के दायरे में आने वाली कंपनियों के लिए मजबूत आय वृद्धि का अनुमान जताया है। ब्रोकरेज के मुताबिक, Nifty 50 की कमाई सालाना आधार पर करीब 27 प्रतिशत बढ़ सकती है। यह अनुमान करीब 17 तिमाहियों में सबसे तेज वृद्धि की संभावना की ओर इशारा करता है। बैंक और वित्तीय कंपनियां बन सकती हैं प्रमुख वजह वित्तीय क्षेत्र से कंपनियों की कमाई को बड़ा समर्थन मिलने की उम्मीद है। कर्ज की अच्छी मांग और अपेक्षाकृत कम क्रेडिट लागत से बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों के प्रदर्शन को मजबूती मिल सकती है। ICICI Bank, State Bank of India और Bajaj Finance जैसी कंपनियों के नतीजे बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। इनके प्रदर्शन का व्यापक कॉरपोरेट आय वृद्धि पर भी असर पड़ सकता है। ऑटोमोबाइल सेक्टर से भी मजबूत संकेत ऑटोमोबाइल कंपनियों की बिक्री और वाहनों की मांग में सुधार से सितंबर तिमाही के नतीजों को समर्थन मिलने की संभावना है। बेहतर बिक्री से कंपनियों के राजस्व में वृद्धि हो सकती है। हालांकि, कच्चे माल और कमोडिटी की बढ़ती कीमतें कुछ कंपनियों के मार्जिन पर दबाव डाल सकती हैं। इसलिए बिक्री में बढ़ोतरी के बावजूद सभी कंपनियों के मुनाफे में समान वृद्धि होना जरूरी नहीं है। Oil and Gas सेक्टर का मिला-जुला असर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से तेल उत्पादन करने वाली कंपनियों को फायदा हो सकता है। इसके विपरीत, तेल विपणन कंपनियों के लिए बढ़ी हुई इनपुट लागत चुनौती बन सकती है। इस वजह से ऑयल एंड गैस सेक्टर में कंपनियों के नतीजे अलग-अलग रह सकते हैं और पूरे क्षेत्र के प्रदर्शन का आकलन करते समय इन अंतरों पर ध्यान देना होगा। IT सेक्टर की तस्वीर रह सकती है कमजोर भारतीय IT कंपनियों के लिए सितंबर तिमाही अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण रहने की आशंका है। वैश्विक ग्राहकों के खर्च में सावधानी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ा मूल्य निर्धारण का दबाव और आर्थिक अनिश्चितता इस क्षेत्र की वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में IT सेक्टर का प्रदर्शन बैंकिंग और कुछ घरेलू मांग पर निर्भर क्षेत्रों की तुलना में धीमा रह सकता है। TCS ने मजबूत नतीजों के साथ की शुरुआत Tata Consultancy Services (TCS) ने सितंबर तिमाही में सालाना आधार पर करीब 15 प्रतिशत की शुद्ध मुनाफा वृद्धि दर्ज की। कंपनी का मुनाफा 13,884 करोड़ रुपये रहा, जबकि राजस्व लगभग 11.8 प्रतिशत बढ़कर 74,525 करोड़ रुपये पहुंच गया। कंपनी का वार्षिकीकृत AI राजस्व भी 3 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया। TCS के नतीजे बाजार को IT क्षेत्र की मांग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कारोबार की संभावनाओं के बारे में अहम संकेत दे सकते हैं। घरेलू मांग बनी हुई है बड़ा सहारा वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की घरेलू मांग कंपनियों की कमाई के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनी हुई है। त्योहारी सीजन से पहले इन्वेंटरी बढ़ाने, उपभोक्ता मांग और कुछ कमोडिटी की अनुकूल कीमतों से विभिन्न कारोबारों को फायदा मिल सकता है। घरेलू खपत मजबूत रहने पर कंपनियों को बाहरी बाजारों की सुस्ती के असर से कुछ हद तक राहत मिल सकती है। वैश्विक जोखिम अब भी बरकरार मुनाफे में वृद्धि की उम्मीदों के बावजूद बाजार के सामने कई जोखिम बने हुए हैं। विदेशी निवेशकों की निकासी, कमजोर मानसून का ग्रामीण मांग पर असर, मध्य पूर्व में तनाव और महंगाई का दबाव निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। इन कारकों से कंपनियों की लागत, बिक्री और भविष्य की वृद्धि को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है। बाजार के वैल्यूएशन पर पड़ सकता है असर यदि Nifty 50 कंपनियां अनुमान के मुताबिक मजबूत मुनाफा दर्ज करती हैं, तो इससे भारतीय शेयर बाजार के वैल्यूएशन को समर्थन मिल सकता है। हालांकि, निवेशकों की नजर केवल मुनाफे की वृद्धि पर नहीं होगी। कंपनियों के मार्जिन, प्रबंधन की भविष्य संबंधी टिप्पणियों और वैश्विक मांग के अनुमान भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। आने वाले हफ्तों में नतीजों पर रहेगी नजर सितंबर तिमाही के नतीजों के दौरान बैंकिंग, ऑटोमोबाइल, ऑयल एंड गैस और टेलीकॉम सेक्टर के आंकड़े खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगे। अब बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि करीब 20 प्रतिशत मुनाफा वृद्धि के अनुमान वास्तविक नतीजों में कितने सही साबित होते हैं और कंपनियां आने वाली तिमाहियों के लिए कैसी संभावनाएं पेश करती हैं। स्रोत: Reuters, The Economic Times और Business Standard जय राष्ट्र न्यूज़

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RBI ने repo rate 25 basis points बढ़ाकर 5.50% किया, करीब चार साल में पहली बढ़ोतरी

मुंबई: Reserve Bank of India की Monetary Policy Committee ने बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को repo rate में 25 basis points की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर दिया। यह करीब चार साल में RBI की पहली rate hike है। छह सदस्यीय MPC ने इस फैसले को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। करीब चार साल बाद बढ़ा repo rate RBI ने आखिरी बार फरवरी 2023 में policy rate बढ़ाया था। इसके बाद लंबे समय तक monetary policy का focus inflation control और growth balance पर रहा। अक्टूबर 2026 की policy में RBI ने फिर tightening की दिशा में कदम बढ़ाया है। Repo rate अब 5.50% नई बढ़ोतरी के बाद policy repo rate 5.50% हो गई है। Repo rate वह दर है जिस पर RBI commercial banks को short-term funds देता है। इसमें बढ़ोतरी का असर आगे home loan, auto loan और personal loan जैसी lending rates पर पड़ सकता है। MPC का फैसला सर्वसम्मति से RBI की छह सदस्यीय Monetary Policy Committee ने 25 basis points की बढ़ोतरी के पक्ष में unanimously vote किया। यह decision 5 से 7 अक्टूबर तक चली MPC meeting के बाद लिया गया। Inflation बना सबसे बड़ा कारण RBI के सामने सबसे बड़ी चिंता बढ़ती inflation रही। August में consumer inflation 4.82% तक पहुंच गई थी और लगातार तीसरे महीने RBI के 4% medium-term target से ऊपर रही। Crude oil की तेजी ने बढ़ाया दबाव Middle East tensions के कारण crude oil prices में तेज बढ़ोतरी हुई है। भारत अपनी crude oil जरूरत का बड़ा हिस्सा imports से पूरा करता है, इसलिए महंगा तेल fuel prices, transport costs और imported inflation को बढ़ा सकता है। El Niño और कमजोर monsoon भी चिंता RBI ने food inflation पर भी नजर रखी है। Poor monsoon conditions और El Niño से agricultural output प्रभावित होने की आशंका ने food prices को लेकर inflation risks बढ़ाए हैं। Policy stance में भी बदलाव RBI ने monetary policy stance को “neutral” से बदलकर “calibrated tightening” कर दिया है। इसका मतलब है कि central bank inflation को नियंत्रित करने के लिए जरूरत पड़ने पर आगे भी policy tightening कर सकता है। EMI पर पड़ सकता है असर Repo rate बढ़ने के बाद banks अपने external benchmark-linked lending rates बढ़ा सकते हैं। ऐसी स्थिति में floating-rate home loan, auto loan और अन्य loans की EMI या repayment tenure बढ़ सकती है। FD investors को मिल सकता है फायदा जहां borrowers के लिए loan महंगे हो सकते हैं, वहीं depositors को कुछ फायदा मिल सकता है। अगर banks deposit rates बढ़ाते हैं तो fixed deposits और कुछ अन्य savings instruments पर बेहतर returns मिल सकते हैं। Growth अभी भी मजबूत RBI ने rate hike ऐसे समय की है जब Indian economy की growth relatively मजबूत बनी हुई है। April-June quarter में GDP growth 7.8% रही, जो RBI के पहले के 7% forecast से ज्यादा थी। इससे central bank को inflation control के लिए rates बढ़ाने की गुंजाइश मिली। Share market में दिखा दबाव RBI decision से पहले ही Indian equity markets पर pressure दिखाई दिया था। Rate-sensitive sectors जैसे banks, financials, auto और realty में selling देखने को मिली, क्योंकि investors पहले से 25 bps hike की उम्मीद कर रहे थे। Rupee पर भी नजर Policy announcement से पहले रुपया करीब ₹96.36 प्रति dollar के स्तर पर कारोबार कर रहा था। Higher interest rates theoretically rupee को support कर सकती हैं, लेकिन crude oil prices, foreign investor outflows और global dollar strength अभी भी pressure बनाए हुए हैं। आगे और rate hikes संभव? RBI ने फिलहाल केवल 25 basis points की बढ़ोतरी की है, लेकिन policy stance से संकेत मिला है कि inflation ऊंची बनी रही तो आगे भी tightening हो सकती है। अब markets की नजर आने वाले inflation data, crude oil prices और RBI Governor Sanjay Malhotra के guidance पर रहेगी। source – Reuters / Reserve Bank of India / Business Standard जय राष्ट्र न्यूज़

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रुपया ₹96.39 प्रति डॉलर तक गिरा, crude oil और FII selling का बढ़ा दबाव

मुंबई: भारतीय रुपया मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को शुरुआती कारोबार में कमजोर होकर ₹96.39 प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। घरेलू मुद्रा पर ऊंची crude oil prices, foreign institutional investors (FII) की बिकवाली और मजबूत dollar का दबाव देखने को मिला। शुरुआती सत्र में रुपया अपने पिछले बंद स्तर के मुकाबले कमजोर खुला और डॉलर के मुकाबले और नीचे फिसल गया। शुरुआती कारोबार में ₹96.39 तक पहुंचा रुपया Interbank foreign exchange market में रुपया कमजोरी के साथ खुला। कारोबार के शुरुआती हिस्से में भारतीय मुद्रा गिरकर ₹96.39 प्रति डॉलर तक पहुंच गई, जो हाल के महीनों में रुपये के सबसे कमजोर स्तरों में से एक है। Crude oil की तेजी बनी बड़ी वजह भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा crude oil imports के जरिए पूरा करता है। जब international crude prices बढ़ती हैं तो तेल कंपनियों की dollar demand भी बढ़ती है। इससे foreign exchange market में रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। FII selling ने भी बढ़ाया दबाव Foreign institutional investors की भारतीय equities से निकासी भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह मानी जा रही है। FII selling बढ़ने पर विदेशी निवेशक भारतीय assets बेचकर dollars में funds convert करते हैं, जिससे dollar demand बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव आता है। मजबूत Dollar का असर Global markets में अमेरिकी dollar की मजबूती ने भी emerging-market currencies को प्रभावित किया। US Treasury yields ऊंचे रहने और Federal Reserve की आगे की monetary policy को लेकर uncertainty से dollar को support मिला है। RBI की intervention पर भी नजर Forex traders की नजर Reserve Bank of India की गतिविधियों पर भी बनी हुई है। आमतौर पर रुपये में तेज volatility होने पर RBI state-run banks के जरिए dollar selling करके बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव सीमित करने की कोशिश कर सकता है। Importers के लिए बढ़ सकती है लागत रुपये की कमजोरी का सीधा असर import-dependent sectors पर पड़ सकता है। Crude oil, electronics, machinery और अन्य dollar-denominated imports महंगे होने से कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। महंगाई पर भी पड़ सकता है असर अगर रुपया लंबे समय तक कमजोर रहता है और crude oil prices भी ऊंची बनी रहती हैं, तो imported inflation का खतरा बढ़ सकता है। Fuel और transportation costs में बढ़ोतरी का असर दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है। Exporters को मिल सकता है कुछ फायदा कमजोर रुपया exporters के लिए कुछ हद तक फायदेमंद हो सकता है। IT services, pharmaceuticals और अन्य export-oriented businesses को dollar में होने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर ज्यादा revenue मिल सकता है, हालांकि इसका प्रभाव sector और hedging strategy पर निर्भर करता है। RBI policy पर बाजार की नजर Currency market की नजर RBI की Monetary Policy Committee की बैठक पर भी है। बाजार यह देख रहा है कि inflation, rupee weakness और crude oil prices को देखते हुए RBI interest rates पर क्या रुख अपनाता है। आगे भी volatility की आशंका आने वाले दिनों में रुपये की दिशा crude oil prices, FII flows, dollar index, US bond yields और RBI policy संकेतों पर निर्भर करेगी। Global uncertainty बनी रहने पर forex market में volatility जारी रह सकती है। source – The Times of India / Reuters / PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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