नई रिपोर्ट में दावा: इस दशक के अंत तक 7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है भारत

नई दिल्ली, 30 जून। भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर जारी एक नई रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि मौजूदा सुधारों की गति और उच्च विकास दर बनी रहती है, तो देश इस दशक के अंत तक 7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति कर सकता है। रिपोर्ट में निवेश, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे के विकास और घरेलू मांग को विकास के प्रमुख आधार बताया गया है। रिपोर्ट में क्या कहा गया? रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। मजबूत घरेलू खपत, सार्वजनिक निवेश, डिजिटल भुगतान प्रणाली, स्टार्टअप इकोसिस्टम और सेवा क्षेत्र का विस्तार आर्थिक वृद्धि को गति दे रहे हैं। यदि ये रुझान जारी रहते हैं तो आने वाले वर्षों में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) तेजी से बढ़ सकता है। विकास के प्रमुख आधार रिपोर्ट में कई ऐसे क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है जो भारत की आर्थिक वृद्धि को आगे बढ़ा सकते हैं: विनिर्माण और डिजिटल क्षेत्र पर जोर विशेषज्ञों का मानना है कि ‘मेक इन इंडिया’, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के विस्तार से भारत की उत्पादन क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार हो रहा है। इससे रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। वैश्विक चुनौतियां भी बनी हुई हैं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती, भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी चुनौतियां भारत की विकास दर को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए आर्थिक सुधारों की निरंतरता और नीति स्थिरता महत्वपूर्ण रहेगी। विशेषज्ञों की राय अर्थशास्त्रियों का कहना है कि 7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन यदि निवेश, उत्पादकता, निर्यात और रोजगार में लगातार सुधार होता है तो भारत इस दिशा में मजबूत स्थिति बना सकता है। इसके लिए राज्यों और केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक माना गया है। निवेशकों का बढ़ता विश्वास हाल के वर्षों में भारत में घरेलू और विदेशी निवेशकों की रुचि बढ़ी है। वैश्विक कंपनियां विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स, हरित ऊर्जा और डिजिटल सेवाओं में निवेश बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास को समर्थन मिलेगा। आगे की राह रिपोर्ट के अनुसार भारत के सामने अवसर और चुनौतियां दोनों मौजूद हैं। यदि आर्थिक सुधार, निवेश, कौशल विकास और बुनियादी ढांचे पर लगातार ध्यान दिया जाता है तो देश आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। हालांकि 7 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य एक पूर्वानुमान है, न कि कोई आधिकारिक सरकारी घोषणा। स्रोत:अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषण एवं बाजार अनुसंधान रिपोर्ट मूल रिपोर्ट:30 जून 2026 को जारी आर्थिक विश्लेषणों और उपलब्ध बाजार रिपोर्टों के आधार पर। जय राष्ट्र न्यूज़

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29 जून को सोने की कीमतों में मामूली गिरावट, 22 कैरेट गोल्ड के दाम में हल्की नरमी

नई दिल्ली, 29 जून। घरेलू सर्राफा बाजार में सोमवार को सोने की कीमतों में मामूली गिरावट दर्ज की गई। 22 कैरेट और 24 कैरेट सोने के दाम में हल्की नरमी देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक संकेतों, अमेरिकी डॉलर की चाल और अंतरराष्ट्रीय बुलियन बाजार में उतार-चढ़ाव का असर घरेलू कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है। प्रमुख शहरों में क्या रहे भाव? 29 जून को दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद सहित कई प्रमुख शहरों में 22 कैरेट सोने की कीमतों में हल्की कमी दर्ज की गई। हालांकि अलग-अलग शहरों में टैक्स, परिवहन और स्थानीय शुल्क के कारण कीमतों में थोड़ा अंतर देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें अमेरिकी डॉलर, ब्याज दरों की उम्मीदों, केंद्रीय बैंकों की नीतियों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों से प्रभावित होती हैं। इन वैश्विक कारकों का सीधा असर भारतीय बाजार पर भी पड़ता है। निवेशकों की बनी हुई है नजर बाजार विश्लेषकों के अनुसार निवेशक फिलहाल अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों, केंद्रीय बैंकों की आगामी नीतियों और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए हैं। यदि वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ती है तो सोने की कीमतों में फिर से तेजी देखने को मिल सकती है। ज्वेलरी बाजार में सामान्य कारोबार सर्राफा कारोबारियों के अनुसार कीमतों में मामूली नरमी के बावजूद बाजार में सामान्य खरीदारी जारी है। आगामी त्योहारों और विवाह सीजन को देखते हुए आने वाले महीनों में मांग बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। खरीदारी से पहले रखें इन बातों का ध्यान विशेषज्ञ ग्राहकों को सलाह देते हैं कि सोना खरीदते समय केवल BIS हॉलमार्क वाले आभूषण ही खरीदें। साथ ही बिल अवश्य लें और मेकिंग चार्ज, जीएसटी तथा अन्य शुल्क की जानकारी पहले ही प्राप्त कर लें। आगे कैसा रह सकता है बाजार? विश्लेषकों का मानना है कि निकट भविष्य में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, केंद्रीय बैंकों के फैसले और निवेशकों की धारणा बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसलिए निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय बाजार के रुझानों पर नजर रखने की सलाह दी जा रही है। प्रमुख शहरों में 22 कैरेट सोने के अनुमानित भाव (29 जून 2026) शहर 22 कैरेट (10 ग्राम) दिल्ली ₹92,350 मुंबई ₹92,200 चेन्नई ₹92,700 कोलकाता ₹92,200 बेंगलुरु ₹92,250 हैदराबाद ₹92,200 नोट: सोने के दाम शहर, ज्वेलर और स्थानीय करों के अनुसार बदल सकते हैं। खरीदारी से पहले अपने शहर के अधिकृत ज्वेलर से ताजा भाव की पुष्टि अवश्य करें। स्रोत:इंडियन बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA), प्रमुख सर्राफा बाजार मूल रिपोर्ट:29 जून 2026 के सर्राफा बाजार के उपलब्ध आंकड़ों और बाजार विश्लेषण के आधार पर। जय राष्ट्र न्यूज़

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Summer Fancy Food Show 2026 में भारत की अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी, वैश्विक बाजार में भारतीय खाद्य उत्पादों को बढ़ावा

न्यूयॉर्क, 29 जून। उत्तर अमेरिका के प्रतिष्ठित Summer Fancy Food Show 2026 में भारत ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी दर्ज कराते हुए वैश्विक खाद्य बाजार में मजबूत उपस्थिति का प्रदर्शन किया है। भारतीय पवेलियन में देशभर की दर्जनों कंपनियां और निर्यातक अपने उत्पादों का प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य भारतीय खाद्य उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय पहुंच बढ़ाना और नए निर्यात अवसरों को प्रोत्साहित करना है। भारतीय पवेलियन बना आकर्षण का केंद्र इस वर्ष भारतीय पवेलियन में मसाले, चाय, कॉफी, बासमती चावल, ऑर्गेनिक उत्पाद, रेडी-टू-ईट खाद्य पदार्थ, स्नैक्स, मिलेट आधारित उत्पाद, मिठाइयां और विभिन्न प्रसंस्कृत खाद्य वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। वैश्विक खरीदारों और वितरकों ने भारतीय उत्पादों में विशेष रुचि दिखाई है। निर्यात बढ़ाने पर फोकस विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोजनों से भारतीय खाद्य उद्योग को नए बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिलता है। भारत सरकार और निर्यात संवर्धन एजेंसियां खाद्य निर्यात को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। इसका उद्देश्य कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। मिलेट और ऑर्गेनिक उत्पादों की मांग बढ़ी वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्यवर्धक और प्राकृतिक खाद्य उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच भारतीय मिलेट, ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थ और पारंपरिक सुपरफूड्स विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। कई अंतरराष्ट्रीय खरीदारों ने भारतीय कंपनियों के साथ संभावित व्यापारिक साझेदारी में रुचि दिखाई है। भारतीय कंपनियों को नए अवसर कार्यक्रम में भाग लेने वाली भारतीय कंपनियां विभिन्न देशों के आयातकों, खुदरा विक्रेताओं और वितरकों के साथ व्यापारिक बैठकों में शामिल हो रही हैं। उद्योग जगत का मानना है कि इससे निर्यात ऑर्डर बढ़ने और भारतीय ब्रांडों की वैश्विक पहचान मजबूत होने की संभावना है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को मिलेगा लाभ भारत का खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ती उपस्थिति से इस क्षेत्र में निवेश, तकनीकी सहयोग और नए व्यापारिक अवसरों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक मांग के अनुरूप गुणवत्ता और पैकेजिंग पर ध्यान देकर भारतीय कंपनियां अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और मजबूत कर सकती हैं। सरकार की पहल को मिली मजबूती भारतीय निर्यात संवर्धन एजेंसियों और संबंधित संस्थानों द्वारा आयोजित सामूहिक भागीदारी का उद्देश्य छोटे और मध्यम उद्यमों को भी वैश्विक मंच उपलब्ध कराना है। इससे भारतीय खाद्य उद्योग के विविध उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल रही है। भविष्य की संभावनाएं विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की बढ़ती भागीदारी यह संकेत देती है कि भारतीय खाद्य उत्पादों की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है। यदि गुणवत्ता, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखला को और मजबूत किया जाए तो आने वाले वर्षों में भारत खाद्य निर्यात के क्षेत्र में और बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकता है। स्रोत:APEDA, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार मूल रिपोर्ट:Summer Fancy Food Show 2026 में भारतीय भागीदारी से संबंधित आधिकारिक जानकारी और व्यापारिक रिपोर्टों के आधार पर। जय राष्ट्र न्यूज़

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खरीफ बुवाई में 22.7% की गिरावट दर्ज, कमजोर मानसून से कई राज्यों में खेती प्रभावित

नई दिल्ली, 29 जून। देश में खरीफ सीजन की बुवाई इस वर्ष शुरुआती चरण में अपेक्षा से धीमी रही है। कृषि मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में खरीफ फसलों की बुवाई में 22.7% की गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कई क्षेत्रों में कमजोर मानसून और सामान्य से कम वर्षा के कारण किसानों को बुवाई शुरू करने में देरी हुई है। किन फसलों पर सबसे अधिक असर? शुरुआती आंकड़ों के अनुसार धान, दालें, तिलहन, मोटे अनाज और कुछ अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है। पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण कई किसानों ने खेतों की तैयारी और बीज बोने का कार्य फिलहाल टाल दिया है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश होती है तो बुवाई की रफ्तार तेज हो सकती है। कमजोर मानसून बना प्रमुख कारण मौसम विशेषज्ञों के अनुसार देश के कई कृषि प्रधान क्षेत्रों में मानसून की प्रगति सामान्य से धीमी रही है। कुछ इलाकों में बारिश की कमी के कारण मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं बन पाई, जिससे किसानों को बुवाई शुरू करने में कठिनाई हुई। हालांकि मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में कई हिस्सों में वर्षा बढ़ने की संभावना जताई है। किसानों की बढ़ी चिंता बारिश में देरी का असर किसानों की लागत और उत्पादन दोनों पर पड़ सकता है। समय पर बुवाई न होने से फसलों की वृद्धि अवधि प्रभावित होती है, जिससे उपज कम होने का जोखिम बढ़ जाता है। कई किसान अब अगले मानसूनी दौर का इंतजार कर रहे हैं ताकि बुवाई का कार्य तेजी से पूरा किया जा सके। कृषि मंत्रालय की नजर स्थिति पर कृषि मंत्रालय लगातार राज्यों से बुवाई की प्रगति की जानकारी जुटा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जहां आवश्यक होगा, वहां किसानों को बीज, तकनीकी सलाह और अन्य सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। राज्य सरकारों के साथ समन्वय बनाकर मानसून की स्थिति के अनुसार कृषि रणनीति तैयार की जा रही है। खाद्य उत्पादन पर क्या होगा असर? विशेषज्ञों का मानना है कि अभी खाद्यान्न उत्पादन को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। यदि जुलाई के पहले और दूसरे सप्ताह में सामान्य या उससे अधिक वर्षा होती है तो बुवाई में आई शुरुआती कमी काफी हद तक पूरी हो सकती है। इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह कृषि क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। मौसम पूर्वानुमान से बढ़ी उम्मीद भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने कई राज्यों में आगामी दिनों में अच्छी बारिश की संभावना जताई है। यदि पूर्वानुमान के अनुरूप वर्षा होती है तो किसानों को राहत मिलेगी और खरीफ बुवाई की गति में तेजी आने की उम्मीद है। कृषि विशेषज्ञ किसानों को स्थानीय मौसम सलाह के अनुसार खेती की योजना बनाने की सलाह दे रहे हैं। आगे की राह सरकार और कृषि विशेषज्ञों की नजर अब मानसून की आगामी गतिविधियों पर टिकी है। समय पर पर्याप्त वर्षा होने पर बुवाई में आई कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है। फिलहाल किसानों, कृषि विभाग और मौसम एजेंसियों के बीच समन्वय बनाए रखने पर विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि खरीफ सीजन पर मौसम का प्रभाव न्यूनतम रहे। स्रोत:कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार मूल रिपोर्ट:कृषि मंत्रालय द्वारा जारी खरीफ बुवाई के ताज़ा आंकड़ों एवं मौसम संबंधी आधिकारिक जानकारी के आधार पर। जय राष्ट्र न्यूज़

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भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते के क्रियान्वयन को लेकर उद्योग जगत की तैयारियां तेज

नई दिल्ली, 28 जून। भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement-FTA) के क्रियान्वयन की दिशा में तैयारियां तेज हो गई हैं। सरकार, उद्योग संगठनों और निर्यातकों ने समझौते से मिलने वाले संभावित अवसरों का लाभ उठाने के लिए अपनी रणनीतियों पर काम शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते के लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। निर्यातकों की बढ़ीं उम्मीदें एफटीए लागू होने के बाद भारतीय वस्त्र, आभूषण, चमड़ा, कृषि उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। कई निर्यातक कंपनियों ने यूके बाजार के लिए अपने उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है। उद्योग जगत का कहना है कि इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में भी सुधार होगा। निवेश को मिलेगा बढ़ावा व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते के लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में भी वृद्धि हो सकती है। भारतीय और ब्रिटिश कंपनियां विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की संभावनाओं पर काम कर रही हैं। उद्योग संगठनों ने शुरू की तैयारियां देश के प्रमुख उद्योग संगठनों ने सदस्य कंपनियों के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं ताकि उन्हें एफटीए के नए नियमों, टैरिफ में बदलाव और निर्यात प्रक्रियाओं की जानकारी दी जा सके। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते तैयारी करने वाली कंपनियां नए अवसरों का बेहतर लाभ उठा सकेंगी। MSME क्षेत्र को भी होगा लाभ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कम शुल्क और बेहतर बाजार पहुंच मिलने से छोटे उद्योगों के निर्यात में वृद्धि हो सकती है। सरकार भी MSME क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए तैयार करने पर विशेष ध्यान दे रही है। सरकार ने जताया भरोसा केंद्र सरकार का कहना है कि भारत-यूके एफटीए देश की आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन और वैश्विक व्यापार में भारत की भागीदारी को मजबूत करेगा। वाणिज्य मंत्रालय संबंधित विभागों के साथ मिलकर समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन की तैयारियों की समीक्षा कर रहा है। विशेषज्ञों की राय आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार यह समझौता भारतीय उद्योगों के लिए एक बड़ा अवसर है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए गुणवत्ता, उत्पादकता और आपूर्ति श्रृंखला को और मजबूत करना होगा। उनका मानना है कि यदि उद्योग समय पर आवश्यक बदलाव करते हैं तो भारतीय निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। आगे की राह समझौते के औपचारिक क्रियान्वयन से पहले दोनों देशों के संबंधित विभाग तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उद्योग जगत को उम्मीद है कि समझौते के लागू होने के बाद भारत और यूके के बीच आर्थिक साझेदारी नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगी और दोनों देशों के व्यापारिक संबंध और मजबूत होंगे। स्रोत:वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार मूल रिपोर्ट:वाणिज्य मंत्रालय, उद्योग संगठनों एवं राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के आधार पर जय राष्ट्र न्यूज़

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केंद्र सरकार ने पासपोर्ट शुल्क में संशोधन की घोषणा की, नई फीस 1 जुलाई 2026 से होगी लागू

नई दिल्ली, 27 जून। केंद्र सरकार ने भारतीय पासपोर्ट सेवाओं के लिए शुल्क संरचना में संशोधन की घोषणा की है। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी जानकारी के अनुसार नई शुल्क दरें 1 जुलाई 2026 से प्रभावी होंगी। सरकार का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य पासपोर्ट सेवाओं को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और नागरिकों के लिए सुविधाजनक बनाना है। 1 जुलाई से लागू होंगी नई दरें सरकार ने स्पष्ट किया है कि संशोधित शुल्क 1 जुलाई 2026 से लागू होंगे। इससे पहले जमा किए गए आवेदनों पर पुरानी शुल्क दरें लागू रहेंगी, जबकि नई तिथि के बाद किए जाने वाले सभी आवेदनों पर संशोधित शुल्क लिया जाएगा। किन सेवाओं पर पड़ेगा असर नई शुल्क संरचना का प्रभाव सामान्य पासपोर्ट, तत्काल (Tatkal) सेवा, पासपोर्ट नवीनीकरण और कुछ अन्य संबंधित सेवाओं पर पड़ेगा। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सभी नई दरों की जानकारी आधिकारिक पोर्टल और पासपोर्ट सेवा केंद्रों पर उपलब्ध कराई जाएगी। ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जारी रहेगी पासपोर्ट के लिए आवेदन प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं किया गया है। नागरिक पहले की तरह ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे, अपॉइंटमेंट बुक कर सकेंगे और निर्धारित तिथि पर पासपोर्ट सेवा केंद्र जाकर दस्तावेज़ सत्यापन करा सकेंगे। विदेश मंत्रालय ने क्या कहा विदेश मंत्रालय के अनुसार समय-समय पर शुल्क की समीक्षा की जाती है ताकि सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखी जा सके और तकनीकी ढांचे को मजबूत किया जा सके। मंत्रालय ने नागरिकों से अपील की है कि वे केवल आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी पर ही भरोसा करें। यात्रियों और छात्रों पर असर विदेश यात्रा की योजना बना रहे लोगों, छात्रों और नौकरी के लिए विदेश जाने वाले आवेदकों को 1 जुलाई के बाद नई शुल्क दरों के अनुसार आवेदन करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते आवेदन करने से आवेदक अपनी सुविधा के अनुसार शुल्क का लाभ उठा सकते हैं। आधिकारिक वेबसाइट से करें जानकारी की पुष्टि सरकार ने सभी नागरिकों को सलाह दी है कि आवेदन करने से पहले पासपोर्ट सेवा की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर नई शुल्क सूची और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी अवश्य जांच लें। इससे आवेदन प्रक्रिया में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। विदेश मंत्रालय का कहना है कि संशोधित शुल्क के बावजूद पासपोर्ट सेवाओं को अधिक तेज, सुरक्षित और डिजिटल बनाने का प्रयास जारी रहेगा। आने वाले समय में नागरिकों को बेहतर और पारदर्शी सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए कई अन्य सुधार भी किए जाएंगे। स्रोत:विदेश मंत्रालय (MEA), पासपोर्ट सेवा मूल रिपोर्ट:विदेश मंत्रालय की आधिकारिक घोषणा एवं राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के आधार पर जय राष्ट्र न्यूज़

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भारत-यूके व्यापार समझौता 15 जुलाई से लागू होगा, व्यापार और निवेश को मिलेगा बढ़ावा

नई दिल्ली, 26 जून। भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच लंबे समय से चर्चा में रहा मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement-FTA) 15 जुलाई से लागू होने जा रहा है। दोनों देशों की सरकारों ने आवश्यक प्रक्रियाएं लगभग पूरी कर ली हैं। इस समझौते के लागू होने के बाद व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। दोनों देशों के व्यापारिक संबंध होंगे मजबूत भारत और यूके के बीच यह समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि इसके लागू होने से द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और दोनों देशों के कारोबारियों को नए अवसर प्राप्त होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार यह समझौता वैश्विक व्यापार में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा। भारतीय निर्यातकों को मिलेगा फायदा व्यापार समझौते के लागू होने के बाद भारतीय वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, कृषि उत्पाद, रत्न एवं आभूषण और आईटी सेवाओं जैसे क्षेत्रों को विशेष लाभ मिलने की संभावना है। शुल्क में कमी आने से भारतीय उत्पाद ब्रिटेन के बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे। निवेश के नए अवसर खुलेंगे आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते से दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को भी बढ़ावा मिलेगा। ब्रिटेन की कंपनियों के लिए भारत में निवेश के नए अवसर पैदा होंगे, वहीं भारतीय कंपनियों को भी यूके के बाजार में विस्तार का बेहतर मौका मिलेगा। रोजगार और उद्योगों पर पड़ेगा सकारात्मक प्रभाव विशेषज्ञों के अनुसार मुक्त व्यापार समझौते से विनिर्माण, सेवा क्षेत्र और निर्यात आधारित उद्योगों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को भी अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बनाने में सहायता मिलने की उम्मीद है। सरकार ने बताया ऐतिहासिक कदम केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय का मानना है कि यह समझौता भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार का कहना है कि इससे भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और देश की आर्थिक वृद्धि को भी मजबूती मिलेगी। उद्योग जगत ने किया स्वागत देश के प्रमुख उद्योग संगठनों और निर्यातकों ने इस समझौते का स्वागत किया है। उनका कहना है कि व्यापारिक प्रक्रियाओं के सरल होने से कारोबार में तेजी आएगी और भारत की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भूमिका और मजबूत होगी। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि 15 जुलाई से समझौते के लागू होने के बाद आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे भारत और यूके के आर्थिक संबंध एक नए दौर में प्रवेश करेंगे। स्रोत:वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार तथा सार्वजनिक व्यापारिक जानकारी मूल रिपोर्ट:भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते से संबंधित आधिकारिक जानकारी एवं विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के आधार पर जय राष्ट्र न्यूज़

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भारत-यूके व्यापार समझौते पर उद्योग जगत की नजर

नई दिल्ली, 25 जून 2026। भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर उद्योग जगत में उत्सुकता बढ़ गई है। दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने के उद्देश्य से चल रही प्रक्रिया अब क्रियान्वयन के चरण की ओर बढ़ रही है। व्यापार और निवेश क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इस समझौते को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर के रूप में देख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापार समझौते के लागू होने से भारतीय उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बेहतर पहुंच मिल सकती है। इससे वस्त्र, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पाद, आईटी सेवाएं और विनिर्माण क्षेत्र को विशेष लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। साथ ही भारतीय निर्यातकों के लिए नए व्यापारिक अवसर खुल सकते हैं। उद्योग संगठनों का कहना है कि समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापारिक प्रक्रियाएं अधिक सरल और प्रभावी हो सकती हैं। शुल्क संबंधी बाधाओं में कमी आने से व्यापार की लागत घट सकती है और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों को भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने में सहायता मिल सकती है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि यूके वैश्विक वित्तीय और व्यापारिक केंद्रों में से एक है। ऐसे में दोनों देशों के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। निवेश के क्षेत्र में भी इस समझौते को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को बढ़ावा मिल सकता है। भारतीय कंपनियों के लिए ब्रिटेन में विस्तार के अवसर बढ़ेंगे, वहीं ब्रिटिश निवेशकों के लिए भारत का बाजार और अधिक आकर्षक बन सकता है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में उद्योग जगत अभी भी समझौते के अंतिम प्रावधानों पर नजर बनाए हुए है। विभिन्न उद्योगों की अपेक्षाएं हैं कि समझौते में उनके हितों का उचित ध्यान रखा जाएगा और व्यापार संतुलन बनाए रखने के लिए प्रभावी व्यवस्था की जाएगी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलेगी। साथ ही रोजगार सृजन, निवेश वृद्धि और निर्यात विस्तार जैसे क्षेत्रों में भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। स्रोत:वाणिज्य एवं उद्योग क्षेत्र से संबंधित सार्वजनिक जानकारी मूल रिपोर्ट:आर्थिक विश्लेषण, व्यापार रिपोर्टों और विभिन्न समाचार एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर जय राष्ट्र न्यूज़

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भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बाजार की नजर, निवेशकों में उत्साह

नई दिल्ली, 24 जून 2026। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर देश के कारोबारी और निवेशक वर्ग की नजरें टिकी हुई हैं। दोनों देशों के बीच जारी उच्चस्तरीय वार्ताओं के बीच बाजार में सकारात्मक माहौल देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो इसका सीधा लाभ व्यापार, निवेश और औद्योगिक विकास को मिल सकता है। व्यापार जगत के जानकारों का कहना है कि इस समझौते से भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में नए अवसर खुल सकते हैं। इसके अलावा कई क्षेत्रों में शुल्क संबंधी राहत मिलने की संभावना भी जताई जा रही है, जिससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है। शेयर बाजार में भी इस संभावित समझौते का असर दिखाई दे रहा है। निवेशकों के बीच सकारात्मक धारणा बनी हुई है और कई सेक्टरों में खरीदारी का रुख देखा जा रहा है। विशेष रूप से विनिर्माण, ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल, आईटी और निर्यात आधारित कंपनियों पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक साबित हो सकते हैं। इससे विदेशी निवेश आकर्षित होने के साथ-साथ रोजगार सृजन और औद्योगिक उत्पादन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सरकारी सूत्रों के अनुसार दोनों देशों के प्रतिनिधि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर लगातार चर्चा कर रहे हैं। इनमें व्यापार संतुलन, बाजार पहुंच, निवेश सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने जैसे विषय शामिल हैं। वार्ता के सकारात्मक परिणाम आने की उम्मीद जताई जा रही है। उद्योग संगठनों ने भी इस संभावित समझौते का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इससे भारत के वैश्विक व्यापारिक संबंध और मजबूत होंगे तथा घरेलू उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के अधिक अवसर मिलेंगे। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले दिनों में व्यापार वार्ताओं से जुड़ी हर गतिविधि पर बाजार की नजर बनी रहेगी। निवेशकों को उम्मीद है कि यह समझौता भारत की आर्थिक वृद्धि को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्रोत:भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता से संबंधित सार्वजनिक एवं आधिकारिक जानकारी मूल रिपोर्ट:विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों, व्यापारिक स्रोतों एवं समाचार एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर जय राष्ट्र न्यूज़

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तेल कीमतों में गिरावट, वैश्विक बाजारों को राहत; निवेशकों की नजर आगे की स्थिति पर

जय राष्ट्र न्यूज़ | बिजनेस डेस्क | 23 जून 2026 मुख्य समाचार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हाल के दिनों में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में प्रगति तथा वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताओं के कम होने से बाजारों को राहत मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बनी हुई हैं, जबकि निवेशक अब मध्य पूर्व की स्थिति और ऊर्जा आपूर्ति पर नजर बनाए हुए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएं कम होने से तेल बाजार में दबाव बना है। गिरावट की मुख्य वजह हालिया गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता को माना जा रहा है। वार्ता में सकारात्मक संकेत मिलने के बाद बाजार को उम्मीद है कि वैश्विक तेल आपूर्ति अधिक स्थिर रह सकती है। इसके अलावा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल आपूर्ति फिर से सामान्य होने की संभावनाओं ने भी बाजार की चिंताओं को कम किया है। वैश्विक बाजारों पर असर तेल की कीमतों में नरमी का असर दुनिया भर के शेयर बाजारों और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों पर देखने को मिला है। कम ऊर्जा लागत से कई देशों में महंगाई पर दबाव कम हो सकता है, जिससे अर्थव्यवस्थाओं को राहत मिलने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि ऊर्जा कंपनियों के शेयरों पर इसका मिश्रित प्रभाव देखने को मिल सकता है। भारत के लिए क्या मायने? भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देश के लिए सकारात्मक मानी जाती है। इससे आयात बिल कम हो सकता है और महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही रुपये पर दबाव भी कम होने की संभावना रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कीमतें लंबे समय तक नियंत्रित रहती हैं तो इससे आर्थिक गतिविधियों को भी समर्थन मिल सकता है। निवेशकों की नजर आगे क्या? हालांकि बाजार में राहत का माहौल है, लेकिन निवेशक अभी भी मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर नजर बनाए हुए हैं। किसी भी नए घटनाक्रम का असर तेल की कीमतों पर तुरंत पड़ सकता है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक वार्ताएं आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय कर सकती हैं। स्रोत: Reuters मूल रिपोर्ट:https://www.reuters.com/business/energy/oil-gains-after-selloff-awaits-progress-strait-hormuz-flows-2026-06-23/ जय राष्ट्र न्यूज़

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