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Mystery of the Split Shivling – Ancient Mythological Story

दो भागों में विभाजित शिवलिंग की बड़ी अद्भुत है पौराणिक कहानी

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव मंदिर अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग दुनिया में सबसे प्राचीन शिवलिंगों में से एक है। इस मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहां का शिवलिंग दो भागों में विभाजित है, जिसमें एक हिस्सा मां पार्वती का प्रतीक माना जाता है और दूसरा भगवान शिव (Lord Shiva) का। आइए, जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा। युद्ध की शुरुआत की पौराणिक कथा शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा (Lord Brahma) और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। दोनों स्वयं को सर्वोच्च मानते हुए एक-दूसरे का अपमान करने लगे। जब यह विवाद बढ़ने लगा और युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई, तब दोनों ने अपने दिव्यास्त्र निकाल लिए। यदि ये अस्त्र चलाए जाते, तो संपूर्ण सृष्टि प्रलय में समा जाती। इस संकट से जगत की रक्षा करने के लिए भगवान शिव (Lord Shiva) ने अपनी माया रची। अचानक दोनों देवताओं के बीच एक अग्निमय लिंग प्रकट हुआ, जिसकी ज्वालाएं आकाश तक फैल गईं। इस दृश्य को देखकर ब्रह्मा और विष्णु आश्चर्यचकित रह गए और उस लिंग के रहस्य को जानने का प्रयास करने लगे। भगवान ब्रह्मा (Lord Brahma) ने उस लिंग का ऊपरी सिरा खोजने के लिए आकाश की ओर उड़ान भरी, जबकि भगवान विष्णु (Lord Vishnu) ने उसका आधार खोजने के लिए धरती के नीचे जाना शुरू किया। लाखों वर्षों तक प्रयास करने के बाद भी दोनों देवता लिंग का आदि या अंत नहीं खोज पाए। थक-हारकर वे वापस उसी स्थान पर लौट आए, जहां उन्होंने इस दिव्य लिंग को देखा था। वहां उन्हें अचानक “ॐ” की पावन ध्वनि सुनाई देने लगी। इस दिव्य ध्वनि को सुनकर वे समझ गए कि यह कोई अलौकिक शक्ति है। तब दोनों ने इस शक्ति की आराधना करनी शुरू कर दी। भगवान शिव (Lord Shiva) उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर लिंग से प्रकट हुए और कहा कि वे दोनों ही समान रूप से पूज्यनीय हैं, इसलिए व्यर्थ में श्रेष्ठता का विवाद न करें। उन्होंने दोनों देवताओं को सद्बुद्धि का आशीर्वाद दिया और पुनः शिवलिंग के रूप में उसी स्थान पर स्थापित हो गए। इसी कारण शिवलिंग की पूजा का महत्व बढ़ गया। इसे भी पढ़ें:- 22 या 23 मार्च, कब है यह शुभ तिथि? जानें पूजा विधि और महत्व काठगढ़ महादेव शिवलिंग की अनोखी मान्यता कालांतर में यह दिव्य शिवलिंग काठगढ़ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसकी अनोखी विशेषता यह है कि इसके दो भागों के बीच की दूरी समय के साथ घटती-बढ़ती रहती है। गर्मियों के दौरान यह दो अलग भागों में विभक्त हो जाता है, जबकि सर्दियों में पुनः जुड़कर एकाकार रूप धारण कर लेता है। ईशान संहिता के अनुसार, यह शिवलिंग फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात प्रकट हुआ था। चूंकि भगवान शिव का यह दिव्य लिंग शिवरात्रि के दिन प्रकट हुआ था, इसलिए यह मान्यता प्रचलित है कि इसकी संरचना चंद्रमा की कलाओं के अनुसार प्रभावित होती है। जैसे-जैसे चंद्रमा घटता-बढ़ता है, वैसे ही शिवलिंग के दो भाग भी एक-दूसरे के करीब आते और दूर जाते हैं। शिवरात्रि के पावन दिन यह दोनों भाग एकाकार हो जाते हैं, जिसे शुभ संकेत माना जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #ShivlingMystery #ShivlingHistory #MythologicalStory #LordShiva #AncientLegends #HinduMythology #DivineMiracle #ShivaTemple #SacredStories #SpiritualHeritage

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Astrology Remedies Simple Tips to Boost Your Luck

ज्योतिष उपाय: इन आसान तरीकों से चमकाएं अपनी किस्मत

ज्योतिष शास्त्र में कई ऐसे उपाय बताए गए हैं, जिन्हें अपनाकर व्यक्ति अपनी किस्मत को चमका सकता है और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकता है। ये उपाय न केवल आसान हैं, बल्कि इन्हें करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। आइए जानते हैं कि ज्योतिष के कौन-से उपाय हैं, जो आपकी किस्मत को चमका सकते हैं। जो लोग कर्ज के कारण दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी परेशान हैं, उन्हें उत्तर दिशा की ओर मुंह करके “अंगारक महाभाग भगवन् भक्तवत्सल त्वां नमामि ममाशेषम् ऋणमाशु विनाशय” मंत्र का जाप करना चाहिए। इसके साथ ही भगवान शिव पर शमी के पत्ते चढ़ाएं। यह उपाय कर्ज से मुक्ति दिलाने में मददगार साबित होता है। देह से जुड़ी गंभीर पीड़ा अक्सर राहु के कारण होती है। यदि कुंडली में राहु 6वें, 8वें या 12वें भाव में हो, तो जातक को बीमारियों से जल्दी छुटकारा नहीं मिलता। इस समस्या से निजात पाने के लिए भोले नाथ की पूजा करना बहुत ही सरल और प्रभावी उपाय है। राहु की पीड़ा दूर करने के लिए भगवान शिव की आराधना करें और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करें। जब शनि ग्रह अष्टम भाव में हो और जातक को धन या कुटुंब सुख से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो, तो महादेव के समीप घी का दीपक जलाएं और उन्हें राम नाम सुनाएं। इस उपाय से जीवन में नई ऊर्जा का संचार होगा और खुशियों का आगमन होगा। मंगल का संबंध भूमि और खून से होता है। यदि भूमि में कोई दोष हो, तो मंगल ग्रह इसके लिए जिम्मेदार होता है। मंगल दोष से बचने के लिए नित्य गुड़हल के फूल की माला हनुमान जी को अर्पित करें। इससे मंगल ग्रह शुभ फल देगा और अमंगल से बचाव होगा। वैवाहिक जीवन में विसंगतियों से बचने के लिए जातक को गाय को देखकर मन ही मन प्रणाम करना चाहिए। यदि गाय न मिले, तो ऐसा चित्र देखें जिसमें गाय अपने बच्चे के साथ हो। इससे वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। यदि कुंडली में शनि और राहु लग्न में पिशाच योग बना रहे हों, तो जातक को जन्म से ही परिवार में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों के जीवन में कई बार पिशाच बाधा होती है और हर क्षेत्र में संघर्ष होता है। इस समस्या से निजात पाने के लिए किसी ऐसे शिवालय में जाएं जहां प्रतिदिन रुद्राभिषेक होता हो। वहां उत्तर दिशा की ओर मुंह करके 10 माला महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। 150 दिनों तक इस उपाय को करने से लाभ मिलेगा। इसे भी पढ़ें:- 22 या 23 मार्च, कब है यह शुभ तिथि? जानें पूजा विधि और महत्व हर सुबह जागने के बाद अपनी हथेलियों को देखें और फिर उन्हें अपने चेहरे पर धीरे से स्पर्श करें। मान्यता है कि हथेली के अग्रभाग में मां लक्ष्मी, मध्य भाग में मां सरस्वती और कलाई के निकट भगवान विष्णु का वास होता है। इसलिए, सुबह हथेली देखने को शुभ माना जाता है। अपने घर के पास किसी तालाब, नदी या झील में प्रतिदिन मछलियों को आटे की गोलियां डालकर खिलाएं। यह एक सरल उपाय है जो मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने में सहायक माना जाता है। घर से बाहर जाते समय अपने माता-पिता और बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद अवश्य लें। ऐसा करने से नकारात्मक ग्रह दशा में सुधार होता है और परिस्थितियां आपके पक्ष में बनती हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news ज्योतिष शास्त्र #AstrologyTips #JyotishUpay #LuckBooster #VastuRemedies #SuccessMantra #SpiritualGuidance #KarmaHealing #FengShuiTips #PositiveEnergy #WealthAttraction

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Gangaur Vrat 2025 Date, Puja Vidhi & Significance

गणगौर व्रत 2025: मार्च में कब है यह शुभ त्योहार? जानें पूजा विधि और महत्व

गणगौर व्रत हिंदू धर्म में महिलाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है, जो माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है। साल 2025 में गणगौर व्रत (Gangaur Vrat) मार्च महीने में मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि गणगौर व्रत 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि क्या है। गणगौर व्रत 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 31 मार्च को सुबह 9:11 बजे आरंभ होगी और 1 अप्रैल को सुबह 5:42 बजे समाप्त होगी। इस दौरान, गणगौर व्रत 31 मार्च को रखा जाएगा। गणगौर व्रत का महत्व गणगौर व्रत (Gangaur Vrat) का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है। इसके अलावा, कुंवारी लड़कियां भी इस व्रत को करती हैं ताकि उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो। गणगौर व्रत (Gangaur Vrat) माता पार्वती (Mata Parvati) और भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है। यह व्रत माता पार्वती के भगवान शिव (Lord Shiva) से विवाह की कथा को दर्शाता है और उनकी भक्ति और समर्पण को प्रदर्शित करता है। गणगौर व्रत की पूजा विधि गणगौर व्रत क्यों मनाया जाता है? गणगौर उत्सव महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह देवी गौरी या पार्वती (Devi Parvati) के प्रति सम्मान प्रकट करने और विवाह व प्रेम का उत्सव मनाने का प्रतीक है। खासतौर पर राजस्थान में, देवी पार्वती को वैवाहिक प्रेम और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व में विवाहित और अविवाहित महिलाएं श्रद्धा और उत्साह के साथ भाग लेती हैं। वे शिव और पार्वती की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाती हैं और विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं। वैवाहिक सुख की कामना के लिए महिलाएं पूरे दिन उपवास रखती हैं। इस दिन पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। मां पार्वती के मंत्र नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Gangaur Vrat #GangaurVrat2025 #GangaurFestival #GangaurPuja #HinduFestivals #GangaurMata #GangaurSignificance #IndianTraditions #VratFestival #MarchFestivals #GangaurPujaVidhi

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Kalashtami 2025 Date, Puja Vidhi & Spiritual Significance

कालाष्टमी 2025: 22 या 23 मार्च, कब है यह शुभ तिथि? जानें पूजा विधि और महत्व

हिंदू धर्म में कालाष्टमी (Kalashtami) का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान शिव के रुद्र रूप कालभैरव को समर्पित है और इसे हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में कालाष्टमी 22 और 23 मार्च को पड़ रही है, लेकिन इसकी सही तिथि और शुभ मुहूर्त को लेकर लोगों में उलझन है। आइए जानते हैं कि कालाष्टमी 2025 कब है, इसकी शुभ तिथि और पूजा के नियम क्या हैं। कालाष्टमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 22 मार्च को सुबह 4:23 बजे आरंभ होगी और 23 मार्च को सुबह 5:23 बजे समाप्त होगी। काल भैरव देव की पूजा निशा काल में की जाती है, इसलिए चैत्र माह की कालाष्टमी 22 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन निशा काल में पूजा का शुभ समय देर रात 12:04 बजे से 12:51 बजे तक रहेगा। शुभ योग ज्योतिषीय दृष्टि से फाल्गुन माह की कालाष्टमी (Kalashtami) पर वरीयान और शिववास योग का संयोग बन रहा है। शिववास योग में काल भैरव की पूजा करने से साधक को दोगुना फल प्राप्त होता है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। इसके अतिरिक्त, इस दिन बालव और कौलव करण का भी विशेष योग बन रहा है। कालाष्टमी का महत्व कालाष्टमी (Kalashtami) का व्रत भगवान शिव (Lord Shiva) के कालभैरव (Kaalbhairav) रूप को समर्पित है। कालभैरव को भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है, जो समय के स्वामी और काल के नियंत्रक हैं। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को समय और मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। कालाष्टमी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी होता है, जो शनि, राहु और केतु जैसे ग्रहों की अशुभ स्थिति से परेशान हैं। इस व्रत को रखने से ग्रहों की अशुभ स्थिति का प्रभाव कम होता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ कालाष्टमी पूजा के नियम नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Kalashtami #Kalashtami2025 #KaalBhairav #KalbhairavPuja #HinduFestivals #KalashtamiDate #ShubhMuhurat #PujaVidhi #SpiritualRituals #KalashtamiSignificance #Devotional

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Spring Equinox 2025 Mystery Behind Equal Day & Night

21 मार्च को दिन और रात होंगे बराबर, जानें क्या है वसंत विषुव का रहस्य

21 मार्च का दिन खगोलीय घटनाओं के लिए एक विशेष महत्व रखता है। इस दिन दिन और रात की अवधि लगभग बराबर होती है, जिसे विषुव (Equinox) कहा जाता है। यह घटना साल में दो बार होती है, एक 21 मार्च को और दूसरी 23 सितंबर को। 21 मार्च को होने वाले विषुव को वसंत विषुव (Spring Equinox) कहा जाता है, जो उत्तरी गोलार्ध में वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन सूर्य की किरणें सीधे भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं, जिसके कारण दिन और रात की अवधि लगभग समान हो जाती है। विषुव क्या है? विषुव एक खगोलीय घटना है, जो तब होती है जब सूर्य की किरणें सीधे भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं। इस समय पृथ्वी के दोनों गोलार्धों (उत्तरी और दक्षिणी) पर दिन और रात की अवधि लगभग बराबर होती है। विषुव शब्द लैटिन भाषा के शब्द “एक्वस” (Equus) और “नॉक्स” (Nox) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “बराबर रात”। यह घटना साल में दो बार होती है, एक वसंत ऋतु में और दूसरी शरद ऋतु में। 21 मार्च को दिन और रात क्यों बराबर होते हैं? 21 मार्च को दिन और रात की अवधि बराबर होने का कारण पृथ्वी की गति और सूर्य की स्थिति है। पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। जब पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, तो सूर्य की किरणें अलग-अलग समय पर अलग-अलग गोलार्धों पर पड़ती हैं। 21 मार्च को सूर्य की किरणें सीधे भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं, जिसके कारण दोनों गोलार्धों पर दिन और रात की अवधि लगभग समान हो जाती है। वसंत विषुव का महत्व वसंत विषुव का दिन न केवल खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व रखता है। उत्तरी गोलार्ध में यह दिन वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है। वसंत ऋतु को नई शुरुआत, नवजीवन और उत्साह का प्रतीक माना जाता है। इस दिन कई संस्कृतियों और धर्मों में त्योहार और उत्सव मनाए जाते हैं। वसंत विषुव और प्रकृति वसंत विषुव के बाद उत्तरी गोलार्ध में दिन की अवधि धीरे-धीरे बढ़ने लगती है और रात की अवधि कम होने लगती है। इस समय प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है। पेड़-पौधों में नई पत्तियां आने लगती हैं और फूल खिलने लगते हैं। यह समय किसानों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस समय फसलों की बुवाई की तैयारी की जाती है। विषुव और मानव जीवन विषुव का मानव जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। इस दिन दिन और रात की अवधि बराबर होने के कारण मनुष्य के शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह समय नई योजनाएं बनाने और नई शुरुआत करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। कई लोग इस दिन को नए लक्ष्य निर्धारित करने और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए उपयोग करते हैं। इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ विषुव और विज्ञान विषुव की घटना को समझने के लिए विज्ञान की मदद लेना आवश्यक है। पृथ्वी की गति और सूर्य की स्थिति के कारण ही यह घटना संभव होती है। पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी हुई है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। जब सूर्य की किरणें सीधे भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं, तो दोनों गोलार्धों पर दिन और रात की अवधि लगभग समान हो जाती है। यह घटना हमें पृथ्वी की गति और सौर मंडल के रहस्यों को समझने में मदद करती है। कहां से गुजरती है भूमध्य रेखा भूमध्य रेखा पृथ्वी पर 14 देशों से होकर गुजरती है। पृथ्वी की सतह पर भूमध्य रेखीय क्षेत्र अधिकांशतः समुद्री हैं। भूमध्य रेखा के आसपास के स्थान अंतरिक्ष केंद्रों की स्थापना के लिए आदर्श माने जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, गुयाना अंतरिक्ष केंद्र, कौरोऊ और फ्रेंच गुयाना का अंतरिक्ष केंद्र भी भूमध्य रेखा पर स्थित है। Latest News in Hindi Today Hindi news Spring Equinox #SpringEquinox #VasantVishuva #Equinox2025 #EqualDayNight #MarchEquinox #SeasonChange #AstronomyFacts #SpringBegins #SunEarthAlignment #HinduAstronomy

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Chaitra Navratri 2025 Why Maa Durga Chose Lion as Vehicle

चैत्र नवरात्रि 2025: मां दुर्गा ने शेर को क्यों चुना अपना वाहन? जानें पौराणिक कथा

चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो देवी दुर्गा की आराधना के लिए मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों तक देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। देवी दुर्गा को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है, और उनका वाहन शेर है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मां दुर्गा ने शेर को ही अपना वाहन क्यों चुना? इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जो देवी दुर्गा की शक्ति और उनके वाहन के महत्व को दर्शाती है। मां दुर्गा और शेर की पौराणिक कथा मां दुर्गा का शेर उनकी शक्ति और साहस का प्रतीक है। धार्मिक ग्रंथों, जैसे स्कंद पुराण और शिव पुराण में मां दुर्गा की शेर पर सवारी का वर्णन मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, मां पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की, जिससे उनका रंग सांवला पड़ गया। एक बार भगवान शिव ने हंसी-मजाक में मां पार्वती को “काली” कह दिया। यह बात मां पार्वती को अच्छी नहीं लगी, और वह कैलाश पर्वत छोड़कर तपस्या करने चली गईं। तपस्या के दौरान एक शेर शिकार करने के लिए मां पार्वती के पास पहुंचा। लेकिन, मां पार्वती गहरी तपस्या में लीन थीं। शेर ने सोचा कि जब उनकी तपस्या पूरी होगी, तो वह उन्हें शिकार बना लेगा। हालांकि, मां पार्वती की तपस्या कई वर्षों तक चलती रही, और शेर वहीं उनके पास बैठा रहा। जब मां पार्वती की तपस्या पूरी हुई, तो भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें “महागौरी” होने का वरदान दिया। मां पार्वती ने देखा कि शेर उनकी तपस्या के दौरान भूखा-प्यासा बैठा रहा। उन्होंने सोचा कि शेर को भी तपस्या का फल मिलना चाहिए। इसलिए, मां पार्वती ने शेर को अपना वाहन बना लिया। इस तरह, शेर मां दुर्गा की सवारी बन गया। शेर का महत्व शेर को जंगल का राजा माना जाता है, और यह शक्ति, साहस और निडरता का प्रतीक है। देवी दुर्गा ने शेर को अपना वाहन चुनकर यह संदेश दिया कि वह शक्ति और साहस की देवी हैं और वह बुराई का अंत करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। शेर का वाहन होने के कारण देवी दुर्गा को “सिंहवाहिनी” भी कहा जाता है। इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ चैत्र नवरात्रि 2025 की तिथि और समय साल 2025 में चैत्र नवरात्रि 30 मार्च से शुरू होगी और 7 अप्रैल तक चलेगी। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाएगी, जो 30 मार्च को होगी।  चैत्र नवरात्रि का धार्मिक महत्व चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो देवी दुर्गा की आराधना के लिए मनाया जाता है। यह नवरात्रि वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है और नई शुरुआत, नवजीवन और उत्साह का प्रतीक मानी जाती है। नवरात्रि के नौ दिनों तक देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  चैत्र नवरात्रि #ChaitraNavratri2025 #MaaDurga #NavratriFestival #DurgaMaa #Shakti #NavratriStory #HinduMythology #DurgaVehicle #NavratriSignificance #FestivalsOfIndia

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Sheetala Ashtami 2025 Date, Puja Muhurat & Rituals

शीतला अष्टमी 2025: 22 मार्च को मनाई जाएगी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) का विशेष महत्व है। यह त्योहार देवी शीतला की आराधना के लिए मनाया जाता है। देवी शीतला को स्वास्थ्य और स्वच्छता की देवी माना जाता है। शीतला अष्टमी के दिन देवी की पूजा करने से भक्तों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है और संक्रामक रोगों से सुरक्षा प्राप्त होती है। इस दिन देवी शीतला की पूजा करने से उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है। शीतला अष्टमी का महत्व शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) का त्योहार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन देवी शीतला की पूजा करने से भक्तों के सभी रोग दूर हो जाते हैं और उन्हें स्वास्थ्य लाभ मिलता है। देवी शीतला की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इस दिन बासी भोजन का प्रसाद बनाकर देवी को अर्पित किया जाता है। शीतला अष्टमी 2025 की तिथि और मुहूर्त साल 2025 में शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) 22 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 22 मार्च 2025 को सुबह 4:23 बजे शुरू होगी और 23 मार्च 2025 को सुबह 5:23 बजे समाप्त होगी।  मान्यता है कि इस दिन माता शीतला की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वे चेचक जैसी बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं। शीतला अष्टमी पूजा विधि शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद देवी शीतला की मूर्ति या चित्र को स्थापित करके उनकी पूजा की जाती है। पूजा में देवी शीतला को जल, दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें फूल, धूप, दीप और प्रसाद अर्पित किया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का प्रसाद बनाकर देवी को अर्पित किया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन क्या करें? इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ शीतला अष्टमी के दिन क्या न करें? शीतला अष्टमी पर विशेष आयोजन शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) के दिन देश के प्रसिद्ध शीतला मंदिरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख मंदिर हैं: Latest News in Hindi Today Hindi news Sheetala Ashtami #SheetalaAshtami2025 #SheetalaAshtami #HinduFestivals #ShubhMuhurat #PujaVidhi #SheetalaMata #VratKatha #Festival2025 #IndianTradition #Spirituality

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Papmochani Ekadashi 2025 date

पापमोचनी एकादशी 2025: पुण्य प्राप्ति और पापों से मुक्ति का पावन अवसर

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और पापमोचनी एकादशी इनमें से एक अत्यंत पवित्र और फलदायी एकादशी मानी जाती है। यह व्रत चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) 25 मार्च को पड़ रही है। इस दिन मां तुलसी की विशेष पूजा करने से पापों से मुक्ति और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं कि पापमोचनी एकादशी पर कैसे करें मां तुलसी की पूजा और इस व्रत का क्या है महत्व। पापमोचनी एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त साल 2025 में पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) 25 मार्च को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 25 मार्च को  सुबह 05:05 बजे से शुरू होकर 26 मार्च को रात 03:45 बजे तक रहेगी। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने का विशेष महत्व है। पापमोचनी एकादशी के दिन सुबह 06:15 बजे से 08:45 बजे तक पूजा करने का शुभ मुहूर्त रहेगा। इस दौरान पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी का महत्व पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह व्रत पापों से मुक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। इस दिन मां तुलसी की पूजा करने से अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi)  के दिन व्रत रखने और मां तुलसी (Maa Tulsi)  की पूजा करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी होता है, जो अपने पापों से मुक्ति चाहते हैं। पापमोचनी एकादशी की पूजा विधि इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ तुलसी पूजा मंत्र (Tulsi Puja Mantra) 1. वृंदा देवी-अष्टक: गाङ्गेयचाम्पेयतडिद्विनिन्दिरोचिःप्रवाहस्नपितात्मवृन्दे । बन्धूकबन्धुद्युतिदिव्यवासोवृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम् ॥ 2. ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ॥ 3. समस्तवैकुण्ठशिरोमणौ श्रीकृष्णस्य वृन्दावनधन्यधामिन् । दत्ताधिकारे वृषभानुपुत्र्या वृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम् ॥ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Papmochani Ekadashi #PapmochaniEkadashi #EkadashiVrat #HinduFestivals #PapmochaniEkadashi2025 #LordVishnu #Spirituality #FastingBenefits #HinduReligion #PunyaKarma #VratKatha

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Sacred Abode of Lord Vitthal & PM Modi Visit

मुखवा मंदिर: भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ

भारत एक ऐसा देश है जहां अनेक धार्मिक स्थल और मंदिर अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं में से एक है मुखवा मंदिर (Mukhwa Temple), जो हाल ही में चर्चा में आया है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi)  भी इस मंदिर के दर्शन कर चुके हैं। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता के लिए बल्कि अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। आइए जानते हैं कि मुखवा मंदिर कहां स्थित है, यह क्यों प्रसिद्ध है, इसका क्या महत्व है और यहां किसकी पूजा की जाती है। मुखवा मंदिर कहां स्थित है? मुखवा उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में हर्षिल वैली में स्थित एक खूबसूरत पहाड़ी गांव है। यह गांव गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है, जिससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है। इसे मुखीमठ भी कहा जाता है। यहां एक मंदिर है, जिसे माता गंगा का मायका माना जाता है। मुखवा मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? मुखवा गांव को मां गंगा का शीतकालीन निवास कहा जाता है। सर्दियों में जब गंगोत्री धाम बर्फ से ढक जाता है, तब माता गंगा की मूर्ति वहां से मुखवा लाई जाती है। सर्दियों की शुरुआत से पहले भक्तों की शोभायात्रा के साथ माता गंगा गंगोत्री से इस गांव में आती हैं। इसे माता गंगा का मायका माना जाता है, इसलिए जब उनकी मूर्ति यहां लाई जाती है, तो स्थानीय लोगों में खास उत्साह देखने को मिलता है। मुखवा मंदिर का क्या है महत्व? मुखवा मंदिर (Mukhwa Temple) का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है। सर्दियों में गंगोत्री धाम के कपाट बंद होने के बाद भी भक्त मां गंगा की पूजा कर सकें, इसलिए उनकी प्रतिमा को मुखवा गांव लाया जाता है। यहां शीतकाल के दौरान मां गंगा की नियमित पूजा होती है। माना जाता है कि इस स्थान पर पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। प्रधानमंत्री ने भी शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मुखवा गांव की यात्रा की थी। इसके अलावा, मुखवा मंदिर का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां प्राकृतिक सौंदर्य और शांति का अनूठा संगम है। कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर भक्तों को आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव प्रदान करता है। मुखवा गांव मां गंगा के शीतकालीन गद्दी स्थल होने के कारण कई प्राचीन मंदिरों का घर है। इनमें मुखीमठ मंदिर खासतौर पर मां गंगा को समर्पित है। यह स्थान हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मुखीमठ मंदिर अपनी खूबसूरत वास्तुकला और बारीक नक्काशी के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसकी भव्यता देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है। इसे भी पढ़ें:- पृथ्वी पर सुरक्षित लौटेंगे सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर मुखवा मंदिर कैसे पहुंचे? मुखवा मंदिर (Mukhwa Temple) तक पहुंचने के लिए सबसे पहले आपको दिल्ली से ऋषिकेश जाना होगा। वहां से उत्तरकाशी होते हुए हर्षिल पहुंच सकते हैं। दिल्ली से मुखवा मंदिर की दूरी लगभग 480 किलोमीटर है और यह यात्रा 12 घंटे से कम समय में पूरी की जा सकती है। अगर आप हवाई मार्ग से यात्रा करना चाहते हैं, तो देहरादून के जॉली ग्रांट एयरपोर्ट तक पहुंचकर वहां से ऋषिकेश और फिर उत्तरकाशी के हर्षिल वैली जा सकते हैं। पीएम मोदी का मुखवा मंदिर दर्शन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने मुखवा मंदिर के दर्शन किए थे। पीएम मोदी (PM Modi) के मुखवा मंदिर दर्शन के बाद इस मंदिर की लोकप्रियता और बढ़ गई है। उन्होंने इस मंदिर के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया और लोगों से इस पवित्र  स्थल के दर्शन करने का आग्रह किया। Latest News in Hindi Today Hindi news Mukhwa Temple #MukhwaTemple #VitthalMandir #SacredTemple #PMModiVisit #SpiritualJourney #HinduTemple #DivinePlace #Bhakti #PilgrimageSite #ReligiousTourism

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Rang Panchami

Rang Panchami 2025: हिंदू धर्म में होली के बाद मनाया जाने वाला विशेष पर्व

हिंदू धर्म में फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होली का पर्व अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व रंगों, खुशियों और उल्लास का प्रतीक होता है, जिसमें लोग आपस में रंग खेलते हैं और एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। होली का उत्सव (Holi Festival) मनाने के चार दिन बाद, अर्थात् पांचवे दिन रंग पंचमी का पर्व मनाया जाता है। रंग पंचमी विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण (Shri Krishna) और राधा रानी (Radha Rani) से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण पर्व है। रंग पंचमी (Rang Panchami) पर देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण को गुलाल अर्पित किया जाता है। रंग पंचमी का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रंग पंचमी (Rang Panchami) का धार्मिक महत्व बहुत गहरा है। मान्यता है कि यह दिन उस समय का प्रतीक है जब भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी ने मिलकर होली खेली थी। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण (Lord Sri Krishna) ने अपनी यशोदा माता से रंगों की मस्ती और खेल की परंपरा सीखी थी और राधा रानी के साथ उन्होंने इस खुशी को फैलाया था। इसके बाद इस दिन देवी-देवता भी पृथ्वी पर आए थे और उन्होंने इस पर्व का उत्सव मनाया। इसके अलावा रंग पंचमी (Rang Panchami) का यह भी मान्यता है कि इस दिन देवी-देवताओं को गुलाल और अबीर अर्पित करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। यह माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से व्यक्ति की कुंडली के दोष समाप्त हो जाते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। रंग पंचमी की तिथि और समय हिंदू पंचांग के अनुसार रंग पंचमी की तिथि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को होती है। इस वर्ष 2025 में रंग पंचमी 18 मार्च की रात 10 बजकर 12 मिनट से प्रारंभ होगी और 20 मार्च की सुबह 12 बजकर 40 मिनट पर समाप्त होगी। हालांकि यह पर्व उदयातिथि के अनुसार 19 मार्च को मनाया जाएगा, क्योंकि धार्मिक परंपराओं में तिथि के आधार पर त्योहार मनाए जाते हैं। रंग पंचमी का शुभ मुहूर्त रंग पंचमी के दिन देवी-देवताओं की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन विशेष मुहूर्त के दौरान पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है। ब्रह्म मुहूर्त में पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। इस वर्ष ब्रह्म मुहूर्त सुबह लगभग 4 बजकर 52 मिनट से 5 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। इस समय देवी-देवताओं की पूजा करने से पुण्य प्राप्ति होती है। इसके अलावा, विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 54 मिनट तक रहेगा, जो पूजा के लिए शुभ समय माना जाता है। शाम के समय पूजा करने के लिए 6 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक का समय भी शुभ रहेगा। इसे भी पढ़ें: कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? रंग पंचमी का उत्सव और पूजा विधि रंग पंचमी (Rang Panchami) का उत्सव विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन (Mathura and Vrindavan) जैसे स्थानों पर बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यहां पर होली के बाद रंग पंचमी के दिन विशेष पूजा होती है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की मूर्तियों को गुलाल और अबीर से स्नान कराया जाता है और उनके साथ रंग खेलने की परंपरा का पालन किया जाता है। लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और इस दिन को खुशी और उल्लास के साथ मनाते हैं। इसके अतिरिक्त रंग पंचमी के दिन लोग घरों में देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और रंगों से संबंधित पूजा सामग्री जैसे गुलाल, अबीर, फूल आदि अर्पित करते हैं। इस दिन का एक और प्रमुख पक्ष यह है कि लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर जीवन के हर दुख और संकट को रंगों में डुबोकर समाप्त करने का प्रतीक मानते हैं। रंग पंचमी और समाज में भाईचारे का संदेश रंग पंचमी (Rang Panchami) का पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह समाज में भाईचारे, एकता और प्यार का संदेश भी देता है। रंगों के खेल के माध्यम से लोग अपने पुराने मतभेद भूलकर एक-दूसरे से मिलते हैं और खुशी साझा करते हैं। यह पर्व यह भी बताता है कि जीवन में रंगीन पल लाने के लिए हमें प्यार और भाईचारे को फैलाना चाहिए। रंग पंचमी (Rang Panchami) एक खास पर्व है जो न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द और खुशियों का प्रतीक भी है। यह पर्व भगवान श्री कृष्ण (Shri Krishna) और राधा रानी (Radha Rani) की होली खेलने की याद दिलाता है और साथ ही यह जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मकता लाने का एक अवसर प्रदान करता है। इस दिन देवी-देवताओं की पूजा करने से कुंडली के दोष समाप्त होते हैं और जीवन में शांति और समृद्धि आती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Rang Panchami 2025 #RangPanchami #RangiPanchami2025 #ShriKrishna #RadhaKrishna

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