मुंबई/रायगढ़: महाराष्ट्र के कर्जत-भीमाशंकर क्षेत्र में प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना को लेकर पर्यावरणीय विवाद लगातार तेज होता जा रहा है। परियोजना के लिए 32,490 पेड़ों की कटाई की मंजूरी दिए जाने की खबरों के बाद पर्यावरण कार्यकर्ता, स्थानीय लोग और विपक्षी नेता इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि बिजली उत्पादन के नाम पर सह्याद्री के संवेदनशील जंगलों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।
किस परियोजना को लेकर विवाद?
यह विवाद रायगढ़ जिले के कर्जत तालुका में प्रस्तावित सैदोंगर-1 पंप्ड स्टोरेज जलविद्युत परियोजना को लेकर है। परियोजना की क्षमता लगभग 3,000 मेगावाट है और इसकी अनुमानित लागत करीब ₹13,505 करोड़ बताई गई है। परियोजना टॉरेंट पावर से जुड़ी है।
32 हजार से ज्यादा पेड़ों की कटाई की मंजूरी
रिपोर्टों के मुताबिक परियोजना के लिए करीब 233 हेक्टेयर वन भूमि के इस्तेमाल और 32,490 पेड़ों को हटाने की अनुमति दी गई है। इसमें आरक्षित, निजी और संरक्षित वन क्षेत्र शामिल होने की बात सामने आई है।
पर्यावरण प्रेमियों का विरोध क्यों?
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि सह्याद्री और पश्चिमी घाट जैव विविधता की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र हैं। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों का आवास टूट सकता है, जल स्रोतों पर असर पड़ सकता है और मिट्टी के कटाव तथा भूस्खलन का जोखिम बढ़ सकता है।
स्थानीय संगठनों ने परियोजना को किसी कम संवेदनशील क्षेत्र में स्थानांतरित करने की मांग की है।
शेखरू समेत कई वन्यजीवों को लेकर चिंता
भीमाशंकर क्षेत्र महाराष्ट्र के राज्य पशु शेखरू यानी भारतीय विशाल गिलहरी के लिए जाना जाता है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने तेंदुए, हिरण, जंगली सूअर, गौर और कई पक्षी प्रजातियों के प्राकृतिक आवास पर भी संभावित असर की आशंका जताई है।
पनवेल में भी हुआ विरोध प्रदर्शन
29 अक्टूबर को पनवेल में प्रकृति प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने इस परियोजना के विरोध में प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर होने वाला विकास स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वन विभाग ने क्या कहा?
महाराष्ट्र वन विभाग ने उन दावों को खारिज किया है जिनमें कहा जा रहा था कि भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य के भीतर अवैध कटाई हो रही है। विभाग के अनुसार परियोजना अभयारण्य से करीब 16 किलोमीटर और भीमाशंकर मंदिर से लगभग 20 किलोमीटर दूर है तथा परियोजना क्षेत्र अभयारण्य और उसके पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के बाहर है।
सरकार का दावा—सभी प्रक्रियाओं का पालन
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि परियोजना के लिए करीब 18 महीने तक सुनवाई और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई। सरकार का दावा है कि यह परियोजना स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, बिजली ग्रिड की स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा में मदद करेगी।
90 हजार पेड़ लगाने का दावा
वन विभाग के मुताबिक परियोजना के बदले टॉरेंट पावर द्वारा करीब 60 हजार और वन विभाग द्वारा लगभग 30 हजार पेड़ लगाए जाने की योजना है। सरकार का यह भी दावा है कि परियोजना से कोयले पर निर्भरता और पानी की खपत कम होगी।
सवाल सिर्फ पेड़ों की संख्या का नहीं
पर्यावरण विशेषज्ञों का तर्क है कि एक पुराने प्राकृतिक जंगल की जगह केवल नए पौधे लगा देना समान पारिस्थितिकी तंत्र तैयार नहीं करता। पुराने जंगलों में मिट्टी, जल स्रोत, पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीव और वन्यजीव मिलकर एक जटिल प्राकृतिक व्यवस्था बनाते हैं जिसे दोबारा विकसित होने में दशकों लग सकते हैं।
विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी
इस विवाद का मूल सवाल यही है कि क्या ऊर्जा और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाकों को नुकसान पहुंचाना जरूरी है। विरोध करने वाले संगठनों की मांग है कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का दोबारा मूल्यांकन किया जाए और ऐसा विकल्प खोजा जाए जिसमें ऊर्जा जरूरतें भी पूरी हों और जंगल भी सुरक्षित रहें।
स्रोत – महाराष्ट्र वन विभाग, टाइम्स ऑफ इंडिया, पीटीआई, लोकसत्ता, फ्री प्रेस जर्नल, पर्यावरण संगठनों की रिपोर्ट
जय राष्ट्र न्यूज़

