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पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान, यौन अपराध मामले में ‘आपत्तिजनक टिप्पणियों’ पर जताई चिंता

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लिया है, जिसमें एक महिला के कपड़े उतारने की कोशिश और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार से जुड़े कृत्यों को तथ्यों के आधार पर ‘बलात्कार के प्रयास’ के लिए पर्याप्त नहीं माना गया था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले में कुछ टिप्पणियों को “offending observations” बताते हुए आरोपी को नोटिस जारी किया है। 9 जुलाई के पटना हाई कोर्ट के फैसले का मामला मामला पटना हाई कोर्ट के 9 जुलाई 2026 के फैसले से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने आरोपी हिमांशु कुमार पाठक की उस दोषसिद्धि को रद्द कर दिया था, जो IPC की धारा 376 के साथ धारा 511 यानी बलात्कार के प्रयास से संबंधित थी। हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर कहा था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने जैसी हरकतें, बिना ऐसे स्पष्ट कृत्य के जो बलात्कार करने के इरादे को निर्णायक रूप से दिखाए, ‘attempt to rape’ के अपराध को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं थीं। हालांकि कोर्ट ने इन कृत्यों को महिला की गरिमा भंग करने से जुड़ा अपराध माना था। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणियों को बताया ‘आपत्तिजनक’ 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया। चीफ जस्टिस ने कहा कि फैसले में कुछ “आपत्तिजनक टिप्पणियां” हैं और उन्हें हटाने या फैसला रद्द करने से पहले संबंधित आरोपी का पक्ष सुनना आवश्यक है। आरोपी हिमांशु पाठक को जारी हुआ नोटिस सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी हिमांशु पाठक को नोटिस जारी किया है। पीठ ने बिहार के एडवोकेट जनरल से स्थानीय पुलिस के माध्यम से यह सुनिश्चित करने को कहा कि आरोपी तक नोटिस पहुंचाया जाए, ताकि अगली सुनवाई में उसका पक्ष भी कोर्ट के सामने आ सके। 2008 की घटना से जुड़ा है मामला यह मामला 19 जनवरी 2008 की घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार एक महिला अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने आरोपी के स्टूडियो गई थी। आरोप था कि आरोपी ने महिला के पिता को कंप्यूटर पर फोटो देखने के लिए कहा और इसके बाद स्टूडियो का दरवाजा बंद कर महिला के साथ कथित यौन दुर्व्यवहार किया। महिला द्वारा शोर मचाने पर उसके पिता पहुंचे, जिसके बाद आरोपी वहां से भाग गया। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा निचली अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी ठहराया था। उसे बलात्कार के प्रयास के मामले में तीन साल की कठोर कैद और गलत तरीके से बंद रखने के मामले में छह महीने की सजा सुनाई गई थी। बाद में पटना हाई कोर्ट ने बलात्कार के प्रयास वाली दोषसिद्धि को रद्द कर दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के मामले से भी जुड़ा संदर्भ इस मामले का जिक्र इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में उस समय भी हुआ था, जब अदालत इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अन्य यौन अपराध संबंधी फैसले पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। उस मामले में भी हाई कोर्ट की ओर से यौन अपराध के प्रयास को लेकर की गई व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई थी। शीर्ष अदालत ने बाद में वह फैसला रद्द करते हुए न्यायाधीशों के लिए यौन अपराध मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी दृष्टिकोण को लेकर दिशा-निर्देश दिए थे। अब आगे क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल पटना हाई कोर्ट के फैसले को अंतिम रूप से रद्द नहीं किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि संबंधित आरोपी को सुनने के बाद ही इस पर आगे फैसला लिया जाएगा। मामले को SMW (Crl) No. 5/2026 के रूप में दर्ज किया गया है। आने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि पटना हाई कोर्ट की टिप्पणियों और कानूनी निष्कर्षों में किस हद तक हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। source – Supreme Court Proceedings / LiveLaw / Bar & Bench / Hindustan Times / The Economic Times जय राष्ट्र न्यूज़

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