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एंटी-CEC प्रदर्शन के बाद नया विवाद: तीन पत्रकारों के खिलाफ SC/ST एक्ट में FIR, क्राइम ब्रांच करेगी जांच

नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 3 अक्टूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शन के बाद विवाद और गहरा गया है। प्रदर्शन के दौरान एक पुलिस अधिकारी पर यौन उत्पीड़न और कथित मारपीट के आरोप लगाने वाले तीन पत्रकारों के खिलाफ अब एफआईआर दर्ज की गई है। यह मामला एसीपी विवेक भगत की शिकायत पर दर्ज हुआ है। उन्होंने पत्रकारों पर जातिसूचक टिप्पणियां करने, मानहानि और सरकारी कामकाज में बाधा डालने के आरोप लगाए हैं। किन धाराओं में दर्ज हुई FIR? पुलिस के मुताबिक, तीनों पत्रकारों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST Act के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 221, 356(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया है। एसीपी विवेक भगत ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान उनकी नेमप्लेट और जातिगत पहचान का उल्लेख करते हुए अपमानजनक टिप्पणियां की गईं। इन आरोपों की सत्यता जांच के अधीन है। पत्रकारों ने पहले पुलिस अधिकारी पर लगाए थे आरोप इससे पहले एक महिला पत्रकार ने प्रदर्शन के दौरान एसीपी विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न और कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। अन्य पत्रकारों ने भी पुलिस की कार्रवाई को लेकर शिकायतें की थीं। इन शिकायतों में लगाए गए आरोपों की अभी अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों और पत्रकारों के विरुद्ध दर्ज एफआईआर को अलग-अलग शिकायतों के आधार पर जांचा जा रहा है। क्राइम ब्रांच को सौंपी गई जांच दिल्ली पुलिस ने यौन उत्पीड़न के आरोपों और संबंधित शिकायतों की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और प्रदर्शन के समय रिकॉर्ड किए गए वीडियो सहित अन्य साक्ष्यों की पड़ताल की जा रही है। जांच का उद्देश्य घटना के दौरान हुई गतिविधियों और दोनों पक्षों की शिकायतों से जुड़े तथ्यों को स्पष्ट करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी जताई चिंता महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता जताई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अदालत ने आरोपों पर जवाब के लिए दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी मांगी थी। दोनों पक्षों के आरोपों की जांच जारी इस मामले में अब दोनों पक्षों की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पत्रकारों ने पुलिस अधिकारी पर कथित यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं, जबकि एसीपी विवेक भगत ने जातिसूचक टिप्पणियों, मानहानि और सरकारी काम में बाधा डालने की शिकायत की है। फिलहाल, किसी भी पक्ष के आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध नहीं माना जा सकता। मामले में आगे की स्थिति जांच के निष्कर्षों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर स्पष्ट होगी। Source – The Indian Express, The New Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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दिल्ली पुलिस की हिरासत में NSUI महिला कार्यकर्ता से कथित मारपीट, राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर आरोप

नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026: दिल्ली में NSUI कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर हिरासत के दौरान मारपीट और कथित कस्टोडियल हिंसा के गंभीर आरोप लगाए हैं। बुधवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने घायल छात्र-कार्यकर्ताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मामले को उठाया। इस दौरान NSUI से जुड़ी छात्रा अथिरा (Athira) ने आरोप लगाया कि पुलिस कार्रवाई में उसे चोटें आईं और उसकी एक कान की सुनने की क्षमता प्रभावित हुई है। राहुल गांधी ने मामले में जवाबदेही तय करने की मांग करते हुए प्रदर्शनकारियों से वीडियो और अन्य सबूत सुरक्षित रखने की अपील की। हालांकि, घटना से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के अंतिम निष्कर्ष सामने आना बाकी है। महिला कार्यकर्ता अथिरा ने क्या आरोप लगाए? प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अथिरा ने दावा किया कि विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में उसके साथ मारपीट हुई और उसे गंभीर चोटें आईं। राहुल गांधी ने भी उसकी स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अब एक कान से ठीक से सुन नहीं पा रही है। यह मामला कथित हिरासत में हिंसा और प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल उठाता है। हालांकि, सुनने की क्षमता प्रभावित होने के दावे की चिकित्सकीय पुष्टि और घटना की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष सामने आना जरूरी है। महिला प्रदर्शनकारी को बालों से खींचने का वीडियो हुआ था वायरल इस घटना से एक दिन पहले दिल्ली के राजीव चौक के पास मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान एक महिला NSUI कार्यकर्ता को कथित तौर पर बालों से खींचे जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। NSUI ने आरोप लगाया था कि हिरासत के दौरान महिला कार्यकर्ताओं के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया गया। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, वायरल वीडियो पुलिस के सत्यापन के दायरे में था। वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों की जांच से घटना की परिस्थितियों और पुलिस कार्रवाई के बारे में अधिक स्पष्टता सामने आ सकती है। राहुल गांधी ने वीडियो और सबूत सुरक्षित रखने की अपील की राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारी छात्रों से पुलिस कार्रवाई से संबंधित वीडियो, तस्वीरें और अन्य साक्ष्य सुरक्षित रखने तथा साझा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि कथित हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और जवाबदेही तय करने के लिए सबूत महत्वपूर्ण होंगे। उन्होंने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की आवाज दबाने का आरोप भी लगाया। ये आरोप कांग्रेस नेता और प्रदर्शनकारियों की ओर से लगाए गए हैं; मामले में अंतिम जिम्मेदारी जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही तय की जा सकती है। घायल छात्रा को बताया ‘हमारी शेरनी’ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने घायल महिला कार्यकर्ता के साहस की सराहना करते हुए उसे “हमारी शेरनी” कहा। उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध जारी रखने और हिंसा के बजाय प्रेम तथा अहिंसक तरीकों से जवाब देने की बात कही। उनकी यह टिप्पणी छात्र प्रदर्शनकारियों के प्रति समर्थन जताने और कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा में लाने के संदर्भ में आई। किस मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे थे NSUI कार्यकर्ता? NSUI समेत कई छात्र और विपक्षी समूह मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तथा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। हाल के दिनों में दिल्ली में इन प्रदर्शनों को लेकर पुलिस प्रतिबंधों और हिरासत में लिए जाने की घटनाएं सामने आई हैं। प्रदर्शनकारी चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों से जुड़े मुद्दों पर अपनी आपत्तियां उठा रहे हैं। पुलिस पर लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच अहम NSUI कार्यकर्ताओं के आरोपों ने हिरासत के दौरान पुलिस के व्यवहार, महिला प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और जवाबदेही की आवश्यकता पर बहस को फिर तेज कर दिया है। हालांकि, आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था की अंतिम जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं होगा। घटना की निष्पक्ष जांच, संबंधित वीडियो और अन्य साक्ष्यों का सत्यापन, चिकित्सकीय दस्तावेजों की समीक्षा तथा संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना जरूरी है। मामले में जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित घटनाक्रम में क्या हुआ और जिम्मेदारी किसकी बनती है। Source – The New Indian Express, The Indian Express, The Times of India और Reuters जय राष्ट्र न्यूज़

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CJP प्रदर्शन की आलोचना के बाद रणवीर शौरी को जान से मारने की धमकी, मुंबई पुलिस में शिकायत दर्ज

मुंबई, 14 अक्टूबर 2026: अभिनेता रणवीर शौरी ने दावा किया है कि दिल्ली में हुए कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन की आलोचना करने के बाद उन्हें ईमेल के जरिए जान से मारने की धमकियां मिलीं। अभिनेता ने कथित धमकी भरे संदेशों के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर साझा किए और बाद में मुंबई पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की जानकारी दी। CJP प्रदर्शन पर रणवीर शौरी ने क्या कहा था? रणवीर शौरी ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए CJP प्रदर्शन की आलोचना करते हुए कहा था कि राजनीतिक असहमति को सड़कों पर टकराव में बदलने के बजाय संसद, चुनाव और अदालतों जैसे लोकतांत्रिक संस्थानों के माध्यम से उठाया जाना चाहिए। उनकी टिप्पणियों के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। इसके बाद अभिनेता ने दावा किया कि उन्हें धमकी भरे ईमेल मिलने लगे। ईमेल में लोकेशन ट्रैक करने और हमले की धमकी का दावा अभिनेता द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट में कथित तौर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के साथ उनकी लोकेशन ट्रैक करने और उन पर हमला करने की धमकियां दिखाई गईं। शौरी ने सोशल मीडिया पर साइबर सुरक्षा से जुड़े आधिकारिक मंच साइबर दोस्त और महाराष्ट्र साइबर सेल को भी टैग करते हुए अधिकारियों से मदद मांगी। मुंबई पुलिस में दर्ज कराई औपचारिक शिकायत रणवीर शौरी ने बाद में बताया कि उन्होंने इस मामले में पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज करा दी है। इससे पहले मुंबई पुलिस ने उनके सोशल मीडिया पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए उनसे संपर्क संबंधी जानकारी सीधे संदेश के जरिए साझा करने को कहा था। फिलहाल, धमकी भरे ईमेल भेजने वाले व्यक्ति या समूह की पहचान की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। CJP प्रदर्शन को लेकर पहले से जारी है विवाद CJP हाल के दिनों में चुनाव आयोग और मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी राजनीतिक विवाद जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक, CJP के दो नेताओं को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। इसी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच रणवीर शौरी की टिप्पणियों और उन्हें कथित तौर पर मिली धमकियों का मामला सामने आया है। धमकी भरे ईमेल की जांच अहम मामले में अधिकारियों के सामने ईमेल भेजने वाले की पहचान, डिजिटल रिकॉर्ड और संदेशों की प्रामाणिकता की जांच अहम होगी। हालांकि, धमकियों के पीछे किसका हाथ है, इस बारे में अभी कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया, रॉयटर्स जय राष्ट्र न्यूज़

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दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप; महिला कार्यकर्ता से मारपीट का वीडियो वायरल, NSUI ने जांच की मांग की

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2026: दिल्ली में Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच Delhi Police पर एक महिला NSUI कार्यकर्ता से मारपीट और बदसलूकी के आरोप लगे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में हिरासत के दौरान एक महिला कार्यकर्ता और महिला पुलिसकर्मी के बीच थप्पड़ और बाल खींचने जैसी झड़प दिखाई देती है। हालांकि घटना की शुरुआत किसने की, इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। Rajiv Chowk के पास protest के दौरान हुआ विवाद मंगलवार, 13 अक्टूबर को NSUI कार्यकर्ता Rajiv Chowk Metro Station के पास CEC Gyanesh Kumar के इस्तीफे और कथित “vote chori” के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे थे। Police ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और इसी दौरान महिला कार्यकर्ता तथा महिला पुलिसकर्मी के बीच टकराव हुआ। वायरल वीडियो में थप्पड़ और बाल खींचने की घटना वायरल footage में दोनों पक्षों के बीच physical scuffle दिखाई देती है। कुछ reports में NSUI की national secretary Ritu Barala का नाम सामने आया है। वीडियो के आधार पर यह साफ है कि हाथापाई हुई, लेकिन किस पक्ष ने पहले violence शुरू किया, इसे लेकर अलग-अलग दावे हैं। NSUI ने Delhi Police पर लगाए गंभीर आरोप NSUI ने आरोप लगाया है कि detention के दौरान उसकी महिला कार्यकर्ताओं के साथ excessive force और बदसलूकी की गई। संगठन ने Connaught Place Police Station के बाहर प्रदर्शन कर मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की। Police side से भी सामने आए आरोप दूसरी ओर, reports में police side से यह दावा किया गया है कि महिला police personnel के साथ भी हाथापाई हुई। इसी वजह से वायरल clip को एकतरफा police assault मानने के बजाय पूरे video sequence और अन्य evidence की जांच जरूरी है। पहले भी protesters ने लगाए थे assault के आरोप हाल के CJP protests के दौरान कम से कम तीन detainees ने भी Delhi Police पर custody में मारपीट के आरोप लगाए थे। कुछ मामलों में medical records में injuries दर्ज होने की बात सामने आई, जबकि Police ने कहा था कि formal complaint मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। Viral videos की verification बनी बड़ी चुनौती हालिया protests से जुड़े कई पुराने और unrelated videos भी social media पर नए घटनाक्रम बताकर circulate किए गए हैं। इसलिए इस घटना समेत किसी भी viral footage के पूरे context, समय और location की स्वतंत्र verification जरूरी है। source – The Federal, NewsX, The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल, हिरासत में कथित दुर्व्यवहार की जांच की मांग

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। 10 और 11 अक्टूबर को मध्य दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के बाद सामने आए वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में महिला प्रदर्शनकारियों को पुलिस द्वारा पकड़कर वाहनों में ले जाते हुए देखा गया। विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं। हालांकि, सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित बदसलूकी के आरोप CPI(M) के नेताओं ने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस ने सख्ती से पेश आते हुए उन्हें लंबे समय तक पुलिस वाहनों में रखा। पार्टी के महासचिव एम.ए. बेबी ने यह भी दावा किया कि कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस वाहनों के भीतर मारपीट हुई। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है। हिरासत के दौरान सांसद जॉन ब्रिटास के घायल होने का दावा इसी प्रदर्शन के दौरान CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास के घायल होने की खबर भी सामने आई। पार्टी के अनुसार, हिरासत में लिए जाने के दौरान हुई धक्का-मुक्की में उन्हें चोट लगी, जिसके बाद उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चिकित्सकीय जांच के लिए ले जाया गया। बंगला साहिब के पास पुलिस कार्रवाई पर भी विवाद गुरुद्वारा बंगला साहिब के आसपास हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। नॉर्थ अमेरिकन पंजाबी एसोसिएशन (NAPA) ने दावा किया कि वहां महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ और मदद की अपील पर ध्यान नहीं दिया गया। संगठन ने मामले की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने की मांग की है। वायरल वीडियो पर दिल्ली पुलिस का स्पष्टीकरण बंगला साहिब से जुड़े वायरल वीडियो पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि पुलिसकर्मी उस सामान्य रास्ते से गुजर रहे थे, जिसका इस्तेमाल श्रद्धालु जूते उतारने वाले स्थान तक पहुंचने के लिए करते हैं। हालांकि, एसोसिएशन ने पूरे घटनाक्रम की स्पष्टता के लिए बिना संपादन वाले वीडियो और अन्य संबंधित साक्ष्यों की जांच कराने की मांग की है। आरोपों और पुलिस के स्पष्टीकरण की निष्पक्ष जांच से ही घटनाओं की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। पहले भी महिला प्रदर्शनकारी को लेकर उठा था विवाद 7 अक्टूबर को INDIA गठबंधन के विरोध प्रदर्शन के दौरान भी एक महिला पुलिस अधिकारी और प्रदर्शनकारियों के बीच कथित टकराव को लेकर विवाद हुआ था। उस घटना पर भाजपा ने राहुल गांधी पर महिला पुलिस अधिकारी को धक्का देने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। यह भाजपा का आरोप था, जिसे घटना के स्वतंत्र रूप से स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 3,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की रिपोर्ट 10 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने बड़े पैमाने पर एहतियाती हिरासत की कार्रवाई की। रिपोर्ट के अनुसार, 3,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग हिरासत केंद्रों में ले जाया गया था। हिरासत केंद्रों के भीतर भी जारी रहे नारे रिपोर्टों के अनुसार, हिरासत में लिए गए कई प्रदर्शनकारियों ने केंद्रों के भीतर भी नारेबाजी और विरोध जारी रखा। कुछ प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि उन्हें जंतर-मंतर तक नहीं पहुंचने दिया गया, तो वे हिरासत केंद्रों को ही विरोध स्थल बना देंगे। महिला सुरक्षा और पुलिस प्रक्रिया पर बहस महिला प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के तरीके, उन्हें पुलिस वाहनों में ले जाने और कथित सख्ती ने पुलिस की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं। महिला पुलिसकर्मियों की पर्याप्त मौजूदगी, बल का उचित इस्तेमाल और जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सहायता जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देने की मांग की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान को लेकर सवाल 12 अक्टूबर को प्रकाशित एक कानूनी विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया कि बड़े पैमाने पर हिरासत और पुलिस की कथित ज्यादती के आरोपों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया। विश्लेषण में पहले के मामलों का हवाला देते हुए अदालत के हस्तक्षेप की भूमिका पर चर्चा की गई। यह न्यायिक कार्रवाई को लेकर उठाया गया सवाल है, न कि अदालत की ओर से किसी उल्लंघन की पुष्टि। आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी विशिष्ट पुलिसकर्मी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। हालांकि, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और हिरासत के दौरान बल प्रयोग से जुड़े आरोप गंभीर हैं। इनकी निष्पक्ष जांच, संबंधित पक्षों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। विरोध प्रदर्शनों के बीच पुलिस की भूमिका पर बढ़ती चर्चा दिल्ली में लगातार विरोध प्रदर्शन, हिरासत और पुलिस-प्रदर्शनकारी टकराव की खबरों के बीच बहस अब केवल मुख्य चुनाव आयुक्त और SIR प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। प्रदर्शन करने के अधिकार, पुलिस की शक्तियों और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्रोत: द प्रिंट, PTI, द टाइम्स ऑफ इंडिया जय राष्ट्र न्यूज़

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कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों से मारपीट का आरोप, IYC ने तस्वीरें साझा कर मांगी संदिग्धों की पहचान

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 10 अक्टूबर को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के कनॉट प्लेस और आसपास के इलाकों में कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ कथित मारपीट के वीडियो सामने आए हैं। इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो साझा करते हुए आरोप लगाया कि युवाओं और महिलाओं को निशाना बनाया गया, जबकि मौके पर पुलिस की मौजूदगी थी। संगठन ने वीडियो में दिखाई दे रहे लोगों की पहचान से जुड़ी जानकारी मांगी है। (द टाइम्स ऑफ इंडिया) वीडियो में प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट के दृश्य मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सामने आए वीडियो में कुछ पुरुष प्रदर्शनकारियों को धक्का देते, थप्पड़ मारते और लात-घूंसे चलाते दिखाई दे रहे हैं। एक वीडियो में काली, फटी हुई टी-शर्ट पहने एक युवक को कई लोगों से घिरा हुआ देखा गया। वहीं, एक अन्य क्लिप में एक पुरुष और महिला के साथ कथित मारपीट के दृश्य सामने आए। इन वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। (द टाइम्स ऑफ इंडिया) महिला को जमीन पर गिराने का आरोप इंडियन यूथ कांग्रेस की ओर से साझा किए गए एक वीडियो में एक महिला को कथित तौर पर धक्का देकर जमीन पर गिराते और उसके साथ मारपीट करते हुए दिखाया गया है। IYC ने सवाल उठाया कि भारी पुलिस तैनाती के बावजूद ऐसी घटना कैसे हुई। हालांकि, घटना की पूरी परिस्थितियों और इसमें शामिल लोगों की भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। IYC ने तस्वीरें साझा कर मांगी पहचान इंडियन यूथ कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर कुछ संदिग्ध व्यक्तियों की तस्वीरें साझा करते हुए लोगों से उनकी पहचान के संबंध में जानकारी देने की अपील की। संगठन ने कथित हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की। (फ्री प्रेस जर्नल) दिल्ली पुलिस ने शुरू की जांच मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने कहा कि वह वीडियो में दिखाई दे रहे लोगों और कथित पीड़ितों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, पुलिस ने शिकायत मिलने पर आवश्यक कार्रवाई करने की बात कही थी। (द टाइम्स ऑफ इंडिया) वायरल वीडियो से जुड़े मामले में चार लोग पकड़े गए फ्री प्रेस जर्नल की एक बाद की रिपोर्ट के अनुसार, वायरल वीडियो से जुड़े कथित हमले के मामले में दिल्ली पुलिस ने चार लोगों को पकड़ा था। पुलिस ने घटनास्थल को डीडीयू मार्ग के उस हिस्से से जोड़ा, जो कमला मार्केट पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में आता है। शुरुआती रिपोर्टों में यह भी कहा गया था कि उस समय कथित पीड़ित या किसी संगठन की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। इसके बावजूद, वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। (फ्री प्रेस जर्नल) सुरक्षा के लिए 35 हजार से अधिक कर्मियों की तैनाती की रिपोर्ट 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस, अर्धसैनिक बलों और उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा पुलिस सहित 35,000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी। ऐसे में कथित मारपीट के वीडियो सामने आने के बाद यह सवाल उठाया गया कि सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद ऐसी घटनाएं कैसे हुईं। कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया 10 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को एहतियातन हिरासत में लिए जाने और जंतर-मंतर पर बड़ी सभा को रोकने की खबरें सामने आई थीं। अधिकारियों ने सुरक्षा प्रतिबंधों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उपाय बताया, जबकि विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने पुलिस कार्रवाई की आलोचना की। (रॉयटर्स) 12 अक्टूबर को भी दिल्ली में प्रदर्शन 12 अक्टूबर को इंडियन यूथ कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बाराखंभा रोड से मार्च निकाला। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, कनॉट प्लेस से मंडी हाउस जाने वाले मार्ग पर छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता बैठकर विरोध प्रदर्शन करते दिखाई दिए। (अमर उजाला) कथित मारपीट के मामले में जांच अहम IYC और कुछ प्रदर्शनकारियों ने इन घटनाओं को सुनियोजित हिंसा बताया है। हालांकि, इस व्यापक आरोप की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मारपीट से जुड़े वीडियो सामने आए और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। कुछ लोगों को पकड़े जाने की भी खबर है। घटना की वास्तविक परिस्थितियों, कथित पीड़ितों के बयानों और आरोपित व्यक्तियों की भूमिका के संबंध में जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। स्रोत: द टाइम्स ऑफ इंडिया, फ्री प्रेस जर्नल, रॉयटर्स, अमर उजाला जय राष्ट्र न्यूज़

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गुजरात में फिल्म सब्सिडी को लेकर उठे गंभीर सवाल! ₹4 करोड़ से ज्यादा भुगतान पर विवाद

अहमदाबाद: गुजरात में गुजराती फिल्मों को दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी एक बार फिर चर्चा में है। फिल्म निर्माता मनोज पटेल की ओर से गुजरात हाई कोर्ट में उठाए गए सवालों में आरोप लगाया गया है कि कई फिल्मों को उस समय लागू नीति के बजाय बाद में आई अधिक लाभकारी 2019 की subsidy policy के तहत सहायता दी गई। RTI से प्राप्त जानकारी के आधार पर अतिरिक्त भुगतान की राशि ₹4 करोड़ से अधिक होने का दावा किया गया है। हालांकि ये आरोप अभी न्यायिक जांच और विवाद का विषय हैं, इन्हें अंतिम रूप से साबित तथ्य नहीं माना गया है। 2016 और 2019 की Policy को लेकर विवाद गुजरात सरकार ने 2016 में गुजराती फिल्मों के लिए performance-based subsidy system लागू किया था। इसके तहत फिल्मों को उनकी quality, technical standards और अन्य तय मानकों के आधार पर अलग-अलग grades दिए जाते थे। Grade के अनुसार ही निर्माताओं को आर्थिक सहायता मिलती थी। बाद में 2019 में नई नीति लागू की गई, जिसमें कुछ श्रेणियों में मिलने वाली सहायता बढ़ा दी गई। पुरानी फिल्मों को नई Policy का लाभ देने का आरोप विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि कुछ ऐसी फिल्मों को भी 2019 की नई subsidy policy का लाभ देने का आरोप है, जो नई नीति लागू होने से पहले ही रिलीज हो चुकी थीं। याचिकाकर्ता का दावा है कि इन फिल्मों का मूल्यांकन उस नीति के तहत किया जाना चाहिए था जो उनकी रिलीज के समय लागू थी। अगर पुराने मामलों में नई नीति लागू की गई, तो इससे कुछ निर्माताओं को पहले की तुलना में अधिक आर्थिक सहायता मिली हो सकती है। ₹4 करोड़ से ज्यादा अतिरिक्त भुगतान का दावा RTI से मिली जानकारी के आधार पर याचिका में दावा किया गया कि subsidy distribution में कथित अनियमितताओं के कारण ₹4 करोड़ से अधिक का अतिरिक्त भुगतान हुआ। याचिकाकर्ता ने मांग की कि जिन फिल्मों को सहायता दी गई, उनके eligibility और grading process की दोबारा जांच की जाए। यह राशि याचिकाकर्ता का अनुमान है और किसी अंतिम सरकारी audit या अदालत के फैसले से इसे अभी प्रमाणित नहीं किया गया है। फिल्म की Grading पर भी उठे सवाल Gujarati film subsidy system में फिल्मों की grading बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी से तय होता है कि किसी फिल्म को कितनी आर्थिक सहायता मिलेगी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ फिल्मों के मूल्यांकन में निर्धारित criteria का समान रूप से पालन नहीं किया गया और कुछ projects को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिला। इस विवाद का प्रमुख मुद्दा यह है कि सभी फिल्मों के लिए एक समान grading standards लागू किए गए या नहीं। Eligibility Rules को लेकर भी आपत्ति कुछ फिल्मों की eligibility को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि Gujarati language के इस्तेमाल, cultural content, remake status और आवेदन की समयसीमा जैसे नियमों के अनुपालन में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं रही। इन दावों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत या संबंधित सरकारी जांच के बाद ही निकाला जा सकता है। आवेदन की समयसीमा भी विवाद में पुरानी subsidy policy में फिल्म की रिलीज के बाद तय समय के भीतर आर्थिक सहायता के लिए आवेदन करना जरूरी था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि कुछ मामलों में निर्धारित समयसीमा पूरी नहीं होने के बावजूद फिल्मों को बाद की नीति के तहत लाभ दिया गया। इसी आधार पर subsidy approval process में समानता और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए गए हैं। Screening Committee की प्रक्रिया पर सवाल फिल्मों को subsidy देने से पहले screening committee उनका मूल्यांकन करती है। लेकिन विवाद में committee की बैठकों, grading decisions और evaluation records की transparency को लेकर भी सवाल सामने आए हैं। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि subsidy देने के कारण और grading के पूरे रिकॉर्ड को ज्यादा स्पष्ट और सार्वजनिक बनाया जाए। सितंबर में Industry ने फिर उठाया Subsidy Implementation का मुद्दा इस बीच सितंबर 2026 में Gujarat Chamber of Commerce & Industry ने Films Taskforce 2026-27 का गठन किया और National Award-winning filmmaker अभिषेक जैन को इसका chairman बनाया। 26 सितंबर को हुई taskforce की पहली बैठक में Gujarati film industry से जुड़ी कई समस्याओं पर चर्चा हुई। इसमें राज्य की film subsidy व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। Shooting Permission और Theatre Screens भी बने मुद्दा बैठक में केवल subsidy ही नहीं, बल्कि shooting permissions को आसान बनाने, single-window system को मजबूत करने, production पर लगने वाले service charges और theatre infrastructure जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। Gujarati filmmakers लंबे समय से राज्य में regional cinema के लिए बेहतर distribution और पर्याप्त screens उपलब्ध कराने की मांग करते रहे हैं। Court से जांच और Re-evaluation की मांग फिल्म निर्माता की याचिका में subsidy allocation की जांच, संबंधित फिल्मों के दोबारा मूल्यांकन और गलत तरीके से भुगतान साबित होने पर रकम वापस लेने जैसी मांगें उठाई गई हैं। मामले का मुख्य सवाल यह है कि क्या अलग-अलग वर्षों में लागू subsidy policies को सभी निर्माताओं पर समान तरीके से लागू किया गया था। आरोप साबित होना अभी बाकी फिल्म सब्सिडी मामले में उठाए गए ₹4 करोड़ से अधिक के कथित अतिरिक्त भुगतान सहित कई दावे याचिकाकर्ता के आरोपों पर आधारित हैं। अभी इन्हें किसी अंतिम न्यायिक फैसले में साबित अनियमितता या घोटाला घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में पूरे मामले में सरकारी रिकॉर्ड, अदालत की कार्यवाही और भविष्य में होने वाली जांच महत्वपूर्ण रहेगी। Gujarati Film Industry में Transparency की मांग Gujarati cinema हाल के वर्षों में तेजी से आगे बढ़ा है और कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की है। ऐसे समय में filmmakers और industry representatives चाहते हैं कि सरकारी subsidy, certification, shooting permission और distribution से जुड़ी प्रक्रियाएं ज्यादा पारदर्शी और समयबद्ध हों। फिलहाल film subsidy को लेकर उठे सवालों ने सरकार की incentive policy की implementation और monitoring को फिर चर्चा में ला दिया है। source – Gujarat High Court proceedings / The Indian Express / Times of India / Vibes of India / GCCI Vibes of India जय राष्ट्र न्यूज़

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उज्जैन में शाही मस्जिद के हिस्से को हटाने के दौरान तनाव, पुलिस से झड़प; पथराव के बाद छोड़े आंसू गैस के गोले

उज्जैन: मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत सड़क चौड़ीकरण के लिए शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की प्रक्रिया के दौरान तनाव हो गया। 28 सितंबर को बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए और पुलिस के साथ झड़प हुई। पुलिस के मुताबिक भीड़ की ओर से पथराव किया गया, जिसके बाद स्थिति नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए और हल्का बल प्रयोग किया गया। मामले में पुलिस ने कई FIR दर्ज की हैं और अब तक 20 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सिंहस्थ 2028 के लिए हो रहा सड़क चौड़ीकरण उज्जैन में कंथल चौराहा से गोपाल मंदिर तक करीब 900 मीटर लंबी सड़क को 15 मीटर चौड़ा करने का काम चल रहा है। यह परियोजना 2028 में होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ की तैयारियों का हिस्सा है। सड़क चौड़ीकरण की जद में कई मकान, दुकानें और धार्मिक स्थल आए हैं। शाही मस्जिद का हिस्सा भी आया दायरे में सड़क चौड़ीकरण के निर्धारित alignment में शाही मस्जिद का कुछ हिस्सा भी आ रहा था। मस्जिद कमेटी ने नगर निगम की कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी थी। इस मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने पहले नगर निगम की प्रक्रिया को कानून के अनुरूप माना था। तीन फीट हिस्सा हटाने पर बनी सहमति बाद में प्रशासन और मस्जिद कमेटी के बीच बातचीत के बाद समझौता हुआ। समझौते के मुताबिक सड़क की ओर से मस्जिद का करीब तीन फीट हिस्सा हटाया जाना है। इससे पहले प्रशासन की मांग इससे अधिक हिस्से को खाली कराने की थी। मस्जिद कमेटी से जुड़े लोगों ने प्रभावित हिस्से को स्वयं हटाने पर सहमति जताई। रविवार रात से जमा होने लगी थी भीड़ कार्रवाई से पहले रविवार रात बड़ी संख्या में लोग शाही मस्जिद के आसपास जमा हो गए थे। लोगों के बीच यह आशंका फैल गई थी कि पूरी मस्जिद को गिराया जा सकता है। इसके बाद रातभर इलाके में लोगों की मौजूदगी बनी रही और प्रशासन ने भारी पुलिस बल तैनात कर दिया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों में हुई झड़प सोमवार सुबह सड़क चौड़ीकरण से जुड़ी कार्रवाई शुरू होने के दौरान कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम किया। पुलिस के अनुसार भीड़ को समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन बाद में कुछ लोगों ने सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंके। इसके जवाब में पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। करीब 2,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी रहे तैनात तनाव को देखते हुए शाही मस्जिद और आसपास के इलाके में भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई। पुलिस ने बैरिकेडिंग की और करीब 500 मीटर के क्षेत्र में आवाजाही पर भी पाबंदियां लगाई गईं। CCTV और ड्रोन कैमरों के जरिए इलाके की निगरानी की गई। ‘पूरी मस्जिद गिराने’ की अफवाह पर पुलिस का दावा पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर शाही मस्जिद को पूरी तरह गिराए जाने से जुड़ी गलत सूचनाएं और भ्रामक सामग्री फैलाई गई थी। अधिकारियों के मुताबिक कुछ AI-generated पोस्ट और वीडियो ने लोगों के बीच भ्रम पैदा किया। पुलिस अब सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री की भी जांच कर रही है। शहर काजी ने की थी शांति की अपील उज्जैन के शहर काजी ने लोगों से किसी भी तरह की अफवाह पर ध्यान नहीं देने और मौके पर भीड़ नहीं लगाने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि मस्जिद से जुड़ा मामला प्रशासन और कमेटी के बीच बातचीत से सुलझा लिया गया है और प्रभावित हिस्से को सहमति के अनुसार हटाया जाएगा। हाई कोर्ट में भी हुआ समझौता मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने समझौते की जानकारी दी। इसके बाद अदालत ने संबंधित याचिकाओं का निपटारा कर दिया। समझौते में मस्जिद के सीमित हिस्से को हटाने, कुछ दुकानों को स्थानांतरित करने और सड़क चौड़ीकरण का काम जारी रखने पर सहमति बनी। 8 FIR, 20 लोगों की गिरफ्तारी पथराव और उपद्रव के मामले में पुलिस ने अब तक 8 FIR दर्ज की हैं। 30 से अधिक लोगों को मामलों में नामजद किया गया है और 20 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें से नौ आरोपियों को 30 सितंबर को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। फिलहाल शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा काम तनाव के बाद प्रशासन और पुलिस की निगरानी में शाही मस्जिद के प्रभावित हिस्से को हटाने की प्रक्रिया जारी है। मस्जिद कमेटी से जुड़े लोग स्वयं निर्माण का प्रभावित हिस्सा हटा रहे हैं। इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात है और फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है। दूसरे धार्मिक स्थल और मकान भी आए दायरे में प्रशासन का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण का असर केवल शाही मस्जिद पर नहीं पड़ा है। परियोजना की जद में कई अन्य धार्मिक स्थल, दुकानें और मकान भी आए हैं। प्रशासन का दावा है कि सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई सभी प्रभावित निर्माणों पर तय प्रक्रिया के अनुसार की जा रही है। source – The Indian Express / DW / PTI / Navbharat Times / Ujjain Police The Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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SRFTI कैंपस में तोड़फोड़ और ‘Anti-National’ नारे लगाने के आरोपों पर विवाद तेज

कोलकाता: सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI) में एक कार्यक्रम के दौरान छात्रों और अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत (ABGP) के सदस्यों के बीच हुई झड़प के बाद विवाद बढ़ गया है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमला, तोड़फोड़ और अभद्रता के आरोप लगा रहे हैं। हालांकि वायरल दावों के उलट, उपलब्ध पुलिस शिकायत में छात्रों पर “anti-religious slogans” लगाने का आरोप है, जबकि छात्रों का कहना है कि कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने उन्हें “anti-national”, “urban Naxal” और “terrorist” कहा। इन आरोपों की पुलिस जांच जारी है। ABGP के कार्यक्रम को लेकर शुरू हुआ विवाद 27 सितंबर को SRFTI के मुख्य ऑडिटोरियम में ABGP का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। संगठन ने दावा किया कि उसने कार्यक्रम स्थल के लिए करीब ₹32,700 का भुगतान किया था और कार्यक्रम में लगभग 250 लोग मौजूद थे। छात्रों के एक समूह ने कैंपस में लगाए गए पोस्टर और बैनरों पर आपत्ति जताई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच बहस शुरू हुई और मामला हाथापाई तक पहुंच गया। छात्रों पर कार्यक्रम बाधित करने का आरोप ABGP ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि कार्यक्रम शुरू होने के करीब 10 मिनट बाद 30 से 40 लोग छात्र संघ के बैनर लेकर हॉल में पहुंचे और कार्यक्रम बाधित किया। शिकायत में दावा किया गया कि प्रदर्शनकारियों ने “Resist Hindutva Fascism” लिखा बैनर लगाया और नारेबाजी की। Bharat Mata और Vivekananda की तस्वीरों को नुकसान पहुंचाने का दावा ABGP ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान भारत माता, स्वामी विवेकानंद और मां दुर्गा से जुड़ी तस्वीरों, वस्तुओं और स्मृति चिह्नों को नुकसान पहुंचाया गया। संगठन का दावा है कि उसके बैनर को भी फाड़ा गया और कार्यक्रम में मौजूद लोगों के साथ मारपीट हुई। ये आरोप जांच के अधीन हैं और पुलिस CCTV फुटेज की पड़ताल कर रही है। छात्रों ने लगाया बाहरी लोगों के हमले का आरोप दूसरी ओर SRFTI Students’ Union ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण विरोध के दौरान छात्रों पर हमला किया गया। छात्रों का दावा है कि उन पर पत्थर और ईंटें फेंकी गईं, उन्हें कैंपस में दौड़ाया गया और महिला छात्रों के साथ भी बदसलूकी हुई। कुछ faculty members और staff के साथ मारपीट के आरोप भी लगाए गए हैं। ‘Anti-National’ शब्द को लेकर क्या है सच? इस पूरे विवाद में “anti-national slogans” को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। उपलब्ध शिकायत के अनुसार ABGP ने छात्रों पर anti-religious slogans लगाने का आरोप लगाया है। वहीं छात्र संघ का दावा है कि कार्यक्रम से जुड़े लोगों ने प्रदर्शनकारी छात्रों को “anti-national”, “urban Naxal” और “terrorist” कहकर संबोधित किया। इसलिए “छात्रों ने anti-national नारे लगाए” को अभी स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। पुलिस ने दर्ज की कई FIR घटना के बाद पुलिस ने अलग-अलग शिकायतों के आधार पर कई FIR दर्ज की हैं। एक मामले में अज्ञात छात्रों पर पुलिसकर्मियों को रोकने, सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिस वाहन को नुकसान पहुंचाने के आरोप हैं। दूसरी शिकायत ABGP की ओर से की गई है, जबकि SRFTI प्रशासन की शिकायत में छात्रों और faculty members पर कथित हमले का मामला शामिल है। अलग-अलग रिपोर्टों में FIR की संख्या तीन से चार बताई गई है। CCTV फुटेज खंगाल रही पुलिस पुलिस ने कैंपस और आसपास के CCTV फुटेज जुटाए हैं और हिंसा में शामिल लोगों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है। अब तक सामने आए आरोपों में किसी एक पक्ष के पूरे दावे को पुलिस ने अंतिम रूप से सही घोषित नहीं किया है। कैंपस में छात्रों का Silent Protest घटना के बाद छात्रों ने कैंपस में silent protest भी किया। छात्रों ने हिंसा की निष्पक्ष जांच और कैंपस में बाहरी संगठनों के कार्यक्रमों को लेकर स्पष्ट नियम बनाने की मांग की। SRFTI Alumni Association के कुछ सदस्यों ने भी छात्रों के समर्थन में बयान जारी कर घटना की स्वतंत्र जांच की मांग की है। ABVP ने घटना से बनाई दूरी घटना के बाद ABVP का नाम भी सोशल मीडिया पर चर्चा में आया, लेकिन संगठन की राज्य इकाई ने कहा कि उसका इस कार्यक्रम या झड़प से कोई संबंध नहीं है। विवाद का मुख्य केंद्र ABGP का कार्यक्रम और उसका विरोध करने वाले SRFTI छात्र रहे। जांच के बाद साफ होगी पूरी तस्वीर फिलहाल दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए हैं। एक तरफ ABGP कार्यक्रम में तोड़फोड़ और धार्मिक-राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान का दावा कर रहा है, जबकि दूसरी ओर छात्र अपने ऊपर बाहरी लोगों के हमले और अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगा रहे हैं। पुलिस की जांच, CCTV फुटेज और दर्ज शिकायतों के आधार पर ही यह स्पष्ट होगा कि हिंसा की शुरुआत कैसे हुई और किन लोगों की भूमिका रही। source – The Indian Express / Times of India / India Today / ANI जय राष्ट्र न्यूज़

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सोनम वांगचुक का गंभीर आरोप, अमित शाह के इस्तीफे की मांग

लेह: पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसा और पुलिस फायरिंग को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस्तीफे की मांग की है। घटना की पहली बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में वांगचुक ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों पर बिना उचित आदेश के गोली चलाई गई थी। उन्होंने इस मामले की न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की भी मांग की। ये आरोप वांगचुक के हैं; पुलिस ने कार्यक्रम से जुड़े कुछ आरोपों को “झूठा और भ्रामक” बताया है। 24 सितंबर की बरसी पर उठाई इस्तीफे की मांग वांगचुक ने 24 सितंबर 2026 को लेह में आयोजित स्मृति कार्यक्रम में कहा कि पिछले साल हुई हिंसा में चार लोगों की मौत के लिए राजनीतिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह को इस घटना की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ना चाहिए। यह उनकी राजनीतिक मांग है; किसी न्यायिक संस्था ने शाह की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की है। पुलिस फायरिंग को लेकर लगाए गंभीर आरोप सोनम वांगचुक ने आरोप लगाया कि 2025 की हिंसा के दौरान सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया और गोलियां लोगों के शरीर के ऊपरी हिस्सों में लगीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि फायरिंग के लिए स्पष्ट आदेश नहीं था। इन दावों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, क्योंकि जांच रिपोर्ट अब तक जारी नहीं की गई है। न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग 24 सितंबर 2025 की घटना के बाद केंद्र सरकार ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस बीएस चौहान की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग गठित किया था। लद्दाख प्रशासन के आधिकारिक नोटिस के मुताबिक आयोग को हिंसा की परिस्थितियों, पुलिस कार्रवाई और चार लोगों की मौत की जांच का जिम्मा दिया गया था। आयोग ने अक्टूबर 2025 में कार्यवाही शुरू की थी। वांगचुक का कहना है कि एक साल बाद भी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होने से लोगों में अविश्वास बढ़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रिपोर्ट जारी नहीं की गई तो स्वतंत्र “People’s Tribunal” बनाने पर विचार किया जाएगा। अपनी सुरक्षा को लेकर भी जताई आशंका वांगचुक ने कार्यक्रम में अपनी सुरक्षा को लेकर भी गंभीर आशंका जताई। उन्होंने दावा किया कि उन्हें ऐसे संदेश मिल रहे हैं कि उनका “एनकाउंटर” हो सकता है। इस आशंका के समर्थन में कोई स्वतंत्र प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसे वांगचुक द्वारा व्यक्त की गई चिंता के रूप में ही देखा जाना चाहिए। पिछले साल चार लोगों की हुई थी मौत 24 सितंबर 2025 को लद्दाख में राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग को लेकर चल रहा प्रदर्शन हिंसक हो गया था। पुलिस कार्रवाई में चार लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। इसके बाद 26 सितंबर 2025 को सोनम वांगचुक को National Security Act के तहत हिरासत में लिया गया था। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में उनकी हिरासत समाप्त कर दी थी। लद्दाख पुलिस ने कुछ आरोप किए खारिज स्मृति कार्यक्रम के दौरान वांगचुक ने आरोप लगाया कि भारी सुरक्षा और बैरिकेडिंग के कारण लोग कार्यक्रम में नहीं पहुंच सके। लद्दाख पुलिस ने इन आरोपों को “false, baseless and misleading” बताया। पुलिस का कहना था कि किसी व्यक्ति को कार्यक्रम में शामिल होने से नहीं रोका गया और बैरिकेडिंग केवल यातायात तथा भीड़ प्रबंधन के लिए की गई थी। लद्दाख की मांगों को लेकर जारी है गतिरोध लद्दाख के कई संगठन लंबे समय से पूर्ण राज्य का दर्जा, स्थानीय भूमि और रोजगार की सुरक्षा तथा संवैधानिक संरक्षण की मांग कर रहे हैं। केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन प्रमुख मांगों पर अंतिम समाधान अभी सामने नहीं आया है। वांगचुक का ताजा बयान इसी व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक विवाद के बीच आया है। source – India Today / Moneycontrol / Ladakh Administration / PIB / PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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