प्रमुख खबरें

दिल्ली के Race Course इलाके में बेदखली कार्रवाई पर विवाद, 700 से अधिक परिवारों पर असर; मस्जिद को भी 6 दिन में खाली करने का नोटिस

नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2026: दिल्ली के Race Course Road इलाके में चल रही eviction/demolition drive को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अधिकारियों के मुताबिक करीब 700 परिवारों को इलाके से हटाकर वैकल्पिक आवास में shift करने की प्रक्रिया चल रही है। इसी बीच 100 साल से अधिक पुरानी Race Course Masjid को भी Land & Development Office (L&DO) ने परिसर खाली करने का notice दिया है। 700 से ज्यादा परिवार क्यों प्रभावित हैं? Delhi High Court ने अगस्त में Race Course Road के पास स्थित तीन settlements के लगभग 700 परिवारों को छह सप्ताह में क्षेत्र खाली करने का निर्देश दिया था। Court ने rehabilitation process की निगरानी के लिए एक committee भी बनाई थी। प्रभावित लोगों को Savda Ghevra में alternative housing दिए जाने की बात कही गई है। मस्जिद को भी मिला eviction notice Race Course Masjid management को करीब 19 अक्टूबर को छह दिन में परिसर खाली करने का notice मिला। L&DO का कहना है कि जमीन केंद्र सरकार की है और यहां unauthorized occupation/construction हुआ है। दूसरी ओर mosque representatives इसे Waqf property और NDMC की Grade-II heritage listing का हिस्सा बताते हैं। बिजली-पानी पहले ही काटा गया NDMC officials के मुताबिक mosque की electricity और water supply 7 अक्टूबर को disconnect कर दी गई थी। आसपास की कुछ properties की utilities भी clearance drive के तहत काटी गई हैं। क्या मस्जिद पर बुलडोजर चल चुका है? इस बिंदु पर reports में अंतर है। कुछ local reports ने आसपास के houses के demolition का दावा किया है, लेकिन Delhi Police ने कहा कि mosque या nearby temple पर demolition नहीं हुआ। इसलिए यह कहना कि मस्जिद को already bulldoze कर दिया गया है, अभी verified नहीं है। Delhi High Court ने utilities restore करने से किया इनकार Delhi High Court ने 15 अक्टूबर को mosque की electricity और water connections restore करने की plea खारिज कर दी। Court ने कहा कि property rights पर factual disputes हैं और L&DO को petition में party भी नहीं बनाया गया था। मामला अब legal और political दोनों Jamiat Ulema-e-Hind और AIMIM ने मामले में intervention की मांग की है। Mosque पक्ष heritage और Waqf status का हवाला दे रहा है, जबकि authorities court-backed eviction और government land claim पर जोर दे रही हैं। जय राष्ट्र न्यूज़

आगे और पढ़ें

उमर खालिद और शरजील इमाम को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत नहीं, 2020 दिल्ली दंगा साजिश मामले में याचिका खारिज

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2026 को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। दोनों 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश मामले में आरोपी हैं और उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA समेत अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज है। अदालत ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले तय की गई शर्तों से बंधी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने नहीं दी राहत जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की पीठ ने दोनों की अपीलें खारिज करते हुए निचली अदालत के 4 जुलाई 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। उमर खालिद और शरजील इमाम ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत से इनकार किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के आदेश का दिया हवाला हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को जमानत से इनकार करते हुए दोनों को कुछ निर्धारित परिस्थितियों में दोबारा जमानत मांगने की स्वतंत्रता दी थी। इन परिस्थितियों में संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होना या सुप्रीम कोर्ट के आदेश से एक वर्ष का समय पूरा होना शामिल था, जो भी पहले हो। हाईकोर्ट ने कहा कि वह इन शर्तों में बदलाव नहीं कर सकता। ‘Judicial Discipline’ का किया उल्लेख अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को देखते हुए हाईकोर्ट न्यायिक अनुशासन से बंधा हुआ है। पीठ ने माना कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई स्वतंत्रता स्पष्ट और शर्तों से जुड़ी हुई थी, इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में हाईकोर्ट उन शर्तों को संशोधित नहीं कर सकता। सह-आरोपियों से समानता का दावा भी खारिज उमर खालिद और शरजील इमाम की ओर से सह-आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को मिली राहत के आधार पर समानता का दावा किया गया था। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों सह-आरोपियों की कथित भूमिका उमर खालिद और शरजील इमाम की कथित भूमिका से अलग है, इसलिए केवल समान मामले में आरोपी होने के आधार पर जमानत का दावा नहीं किया जा सकता। जुलाई में ट्रायल कोर्ट ने भी खारिज की थी जमानत इससे पहले 4 जुलाई 2026 को कड़कड़डूमा कोर्ट ने भी दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। ट्रायल कोर्ट ने उस समय सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा था कि वह शीर्ष अदालत द्वारा तय शर्तों से अलग जाकर राहत नहीं दे सकता। लंबे समय से जेल में हैं दोनों आरोपी शरजील इमाम को जनवरी 2020 में गिरफ्तार किया गया था, जबकि उमर खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया। दोनों पर दिल्ली पुलिस ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश का हिस्सा होने का आरोप लगाया है। दोनों ने आरोपों का विरोध किया है और लंबे समय से चल रही हिरासत तथा मुकदमे में देरी को जमानत के आधार के रूप में अदालतों के सामने रखा है। दिल्ली दंगों में 53 लोगों की हुई थी मौत फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विरोध और समर्थन प्रदर्शनों के बीच हिंसा भड़क गई थी। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने कथित बड़ी साजिश को लेकर अलग मामला दर्ज किया था, जिसमें कई लोगों को आरोपी बनाया गया। फिलहाल जेल में ही रहेंगे उमर खालिद और शरजील इमाम दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद दोनों को फिलहाल जमानत नहीं मिली है। अदालत का यह आदेश केवल जमानत के मुद्दे से संबंधित है। मामले में लगाए गए आरोपों पर अंतिम फैसला ट्रायल की प्रक्रिया और अदालत में पेश साक्ष्यों के आधार पर होगा। source – Delhi High Court / Hindustan Times / The Indian Express / NDTV जय राष्ट्र न्यूज़

आगे और पढ़ें

स्वतंत्र भारद्वाज को Delhi High Court से राहत नहीं, गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका खारिज; Trial Court जाने को कहा

नई दिल्ली, 8 सितंबर 2026: जंतर-मंतर पर एक छात्र कार्यकर्ता के पिता से कथित मारपीट के मामले में गिरफ्तार सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज को Delhi High Court से राहत नहीं मिली है। High Court ने उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली habeas corpus petition खारिज करते हुए कहा कि वह इस समय judicial orders के तहत custody में हैं और अपनी गिरफ्तारी या remand को appropriate trial court के सामने चुनौती दे सकते हैं। 7 सितंबर को High Court ने खारिज की Plea Justice Navin Chawla और Justice Ravinder Dudeja की division bench ने 7 सितंबर को भारद्वाज की याचिका पर सुनवाई की। Petition में दावा किया गया था कि Delhi Police द्वारा की गई गिरफ्तारी illegal थी और उन्हें custody से release किया जाना चाहिए। हालांकि High Court ने habeas corpus के जरिए राहत देने से इनकार कर दिया। Court ने क्यों नहीं दी राहत? Delhi Police की ओर से court को बताया गया कि भारद्वाज को पहले एक दिन की police custody मिली थी, उसके बाद magistrate ने judicial custody का आदेश दिया। Court ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की custody सक्षम अदालत के judicial order के तहत जारी है, तो उसे habeas corpus के जरिए सीधे चुनौती देने के बजाय उस remand order के खिलाफ उपलब्ध कानूनी remedy अपनानी होगी। अब Trial Court में Challenge कर सकते हैं Arrest High Court ने भारद्वाज को यह liberty दी कि वह अपनी गिरफ्तारी या judicial remand को appropriate trial court में challenge कर सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि High Court ने गिरफ्तारी को merits पर पूरी तरह सही ठहरा दिया है; court ने मुख्य रूप से habeas corpus petition को इस stage पर maintainable relief नहीं माना। 14 दिन की Judicial Custody मामले की सुनवाई के दौरान prosecution ने High Court को बताया कि संबंधित अदालत ने भारद्वाज को 14 दिन की judicial custody में भेज दिया है। इसलिए फिलहाल वह judicial custody में रहेंगे, जब तक lower court से कोई अलग relief नहीं मिलती। Bulandshahr से हुई थी गिरफ्तारी Delhi Police ने स्वतंत्र भारद्वाज को Uttar Pradesh के Bulandshahr से हिरासत में लिया था। इसके बाद उन्हें Delhi लाया गया और court के सामने पेश किया गया। उनकी गिरफ्तारी जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े उस मामले में हुई जिसमें उन पर एक छात्र कार्यकर्ता के पिता के साथ कथित मारपीट का आरोप है। Podcast Video के बाद बढ़ा था मामला मामला उस समय फिर सुर्खियों में आया जब भारद्वाज का एक podcast clip वायरल हुआ। उसमें उन्होंने कथित हमले को लेकर विवादित दावे किए थे। इसके बाद CJP नेताओं और समर्थकों ने Parliament Street Police Station के बाहर प्रदर्शन कर गिरफ्तारी और कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। SC/ST Act की धाराएं भी जोड़ी गईं Delhi Police ने संबंधित FIR में SC/ST (Prevention of Atrocities) Act और criminal intimidation से जुड़े provisions भी जोड़े हैं। इसके अलावा छात्र कार्यकर्ता की ओर से कथित धमकियों और morphed images से जुड़े आरोपों पर अलग POCSO case भी दर्ज किया गया है। ये सभी आरोप अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। अब Lower Court की प्रक्रिया अहम High Court से habeas corpus relief नहीं मिलने के बाद स्वतंत्र भारद्वाज की legal strategy अब trial court पर केंद्रित होगी। वह arrest, remand या bail से जुड़ी appropriate applications वहां दाखिल कर सकते हैं। फिलहाल मामले में आरोपों की अंतिम सत्यता तय नहीं हुई है और आगे की स्थिति judicial proceedings पर निर्भर करेगी। source – Delhi High Court / LiveLaw / India Todayजय राष्ट्र न्यूज़

आगे और पढ़ें

सोनम वांगचुक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने तत्काल राहत देने से इनकार किया, अस्पताल में भर्ती को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस तेज

नई दिल्ली: पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक से जुड़े मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने रविवार को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने उनकी पत्नी द्वारा दायर उस याचिका पर अंतरिम आदेश देने से मना कर दिया, जिसमें वांगचुक को सरकारी सफदरजंग अस्पताल से निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने और तत्काल छुट्टी देने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार द्वारा उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना मनमाना नहीं माना जा सकता। क्या है पूरा मामला? सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे। उनकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने के बाद दिल्ली पुलिस और चिकित्सा अधिकारियों ने उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था। इसके बाद उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दावा किया कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध सरकारी अस्पताल में रखा गया है और निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की अनुमति दी जाए। दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा? सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने फिलहाल किसी भी अंतरिम राहत से इनकार करते हुए कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें अस्पताल ले जाने का निर्णय उचित प्रतीत होता है। अदालत ने यह भी माना कि उन्हें जबरन उपचार दिए जाने का कोई स्पष्ट आधार फिलहाल रिकॉर्ड पर नहीं है। मामले की आगे सुनवाई जारी रहेगी और सरकार से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट भी मांगी गई है। सरकार का पक्ष सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि वांगचुक की तबीयत लंबे अनशन के कारण लगातार बिगड़ रही थी। चिकित्सकों की सलाह पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया ताकि उनकी नियमित निगरानी और आवश्यक चिकित्सा देखभाल की जा सके। अस्पताल प्रशासन ने भी बताया कि उनकी हालत फिलहाल स्थिर है, लेकिन उन्हें लगातार मेडिकल मॉनिटरिंग की जरूरत है। परिवार और समर्थकों की आपत्ति वांगचुक के परिवार और समर्थकों ने अदालत में कहा कि वे निजी अस्पताल में इलाज कराना चाहते हैं और सरकारी अस्पताल के माहौल को लेकर उन्हें आपत्ति है। उनके वकीलों ने अस्पताल परिसर में भारी पुलिस बल की मौजूदगी पर भी सवाल उठाए और इसे चिंता का विषय बताया। राजनीतिक बहस तेज हाई कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाए, जबकि सरकार का कहना है कि प्राथमिकता वांगचुक का जीवन और स्वास्थ्य सुरक्षित रखना है। इस पूरे घटनाक्रम पर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा जारी है। आगे क्या होगा? मामले की अगली सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट सरकार की स्थिति रिपोर्ट और अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करेगा। अदालत के अंतिम निर्णय तक वांगचुक सफदरजंग अस्पताल में ही रहेंगे। दूसरी ओर, उनके समर्थकों ने आंदोलन जारी रखने और आगे की रणनीति पर विचार करने की बात कही है। निष्कर्ष दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा तत्काल राहत से इनकार किए जाने के बाद सोनम वांगचुक का मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अब सभी की नजर अदालत की अगली सुनवाई, मेडिकल रिपोर्ट और सरकार के आगे के कदमों पर रहेगी। Source: Reuters, PTI एवं अन्य विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट। जय राष्ट्र न्यूज़

आगे और पढ़ें

Telegram ने भारत सरकार के अस्थायी प्रतिबंध को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी, डिजिटल अधिकारों और परीक्षा सुरक्षा पर बहस तेज

जय राष्ट्र न्यूज़ | नई दिल्ली | 17 जून 2026 मुख्य समाचार लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Telegram ने भारत सरकार द्वारा लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कानूनी लड़ाई शुरू कर दी है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब NEET Re-Exam 2026 की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने कई सख्त कदम लागू किए हैं। सरकार का कहना है कि परीक्षा से जुड़ी कथित अनियमितताओं, फर्जी पेपर लीक नेटवर्क और गलत सूचनाओं के प्रसार को रोकने के लिए यह अस्थायी प्रतिबंध लगाया गया था। वहीं Telegram का दावा है कि यह कदम लाखों वैध उपयोगकर्ताओं के अधिकारों और डिजिटल संचार की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। क्या है पूरा मामला? हाल के दिनों में विभिन्न जांच एजेंसियों को ऐसे इनपुट मिले थे कि कुछ समूह और चैनल परीक्षा से जुड़ी भ्रामक जानकारी, फर्जी प्रश्नपत्र और अवैध सामग्री प्रसारित करने का प्रयास कर रहे थे। इसके बाद केंद्र सरकार ने एहतियाती कदम के रूप में Telegram की सेवाओं पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली महत्वपूर्ण परीक्षा की निष्पक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया था। दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा Telegram Telegram ने दिल्ली हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा है कि किसी प्लेटफॉर्म का पूर्ण या व्यापक प्रतिबंध समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। कंपनी का तर्क है कि यदि कुछ चैनल या समूह नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं तो उनके खिलाफ लक्षित कार्रवाई की जा सकती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रतिबंध से करोड़ों संदेशों का आदान-प्रदान प्रभावित हुआ है और लाखों उपयोगकर्ताओं को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। सरकार का पक्ष केंद्र सरकार का कहना है कि परीक्षा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। अधिकारियों के अनुसार हाल के वर्षों में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का उपयोग परीक्षा संबंधी धोखाधड़ी और गलत सूचनाओं के प्रसार के लिए बढ़ा है। सरकार ने अदालत में यह भी स्पष्ट किया है कि प्रतिबंध स्थायी नहीं बल्कि परिस्थितियों के आधार पर लागू किया गया अस्थायी कदम है। विपक्ष ने उठाए सवाल मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। विपक्षी दलों ने सरकार से सवाल किया है कि क्या पूरे प्लेटफॉर्म को प्रतिबंधित करना उचित है या केवल गलत गतिविधियों में शामिल नेटवर्क पर कार्रवाई की जानी चाहिए। विपक्ष का कहना है कि परीक्षा सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन डिजिटल अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संतुलन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। छात्रों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया NEET Re-Exam की तैयारी कर रहे कई छात्रों और अभिभावकों ने परीक्षा सुरक्षा के लिए कड़े कदमों का समर्थन किया है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि संचार प्लेटफॉर्म्स पर व्यापक प्रतिबंध से पढ़ाई और सूचना साझा करने में भी बाधा उत्पन्न हो सकती है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन तकनीकी समाधान और लक्षित निगरानी अधिक प्रभावी विकल्प हो सकते हैं। टेक उद्योग में चर्चा Telegram और भारत सरकार के बीच यह विवाद डिजिटल प्लेटफॉर्म रेगुलेशन, डेटा प्रबंधन और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ सकता है। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में सरकारों और डिजिटल कंपनियों के बीच सहयोग की स्पष्ट रूपरेखा बनाना आवश्यक होगा। इस मामले पर दुनिया भर की टेक कंपनियों और डिजिटल अधिकार समूहों की भी नजर बनी हुई है। आगे क्या? अब दिल्ली हाई कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। अदालत के फैसले का असर केवल Telegram तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सरकारी कार्रवाई और ऑनलाइन रेगुलेशन की दिशा भी तय कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला परीक्षा सुरक्षा, डिजिटल अधिकारों और तकनीकी प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। निष्कर्ष Telegram द्वारा भारत सरकार के अस्थायी प्रतिबंध को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद यह मामला राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर परीक्षा सुरक्षा को लेकर सरकार का सख्त रुख है, तो दूसरी ओर डिजिटल अधिकारों और संचार की स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज हो गई है। अब सभी की निगाहें अदालत की आगामी सुनवाई और उसके फैसले पर टिकी हैं। जय राष्ट्र न्यूज़ के साथ जुड़े रहें देश, तकनीक और शिक्षा जगत की हर बड़ी खबर के लिए।

आगे और पढ़ें
Translate »