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देशभर में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और डिजिटलीकरण परियोजनाओं पर जोर

जय राष्ट्र न्यूज़ पर ताजा धरोहर अपडेट दिनांक: 13 जून 2026 मुख्य समाचार नई दिल्ली: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने के लिए देशभर में संरक्षण और डिजिटलीकरण परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ विभिन्न सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक संस्थाएं ऐतिहासिक स्मारकों, प्राचीन मंदिरों, किलों, शिलालेखों और विरासत स्थलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दे रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक के उपयोग से न केवल धरोहरों को संरक्षित किया जा सकेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका डिजिटल रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखा जा सकेगा। डिजिटलीकरण से विरासत संरक्षण को नई दिशा नई दिल्ली: नई परियोजनाओं के तहत कई ऐतिहासिक स्थलों की 3D स्कैनिंग, डिजिटल मैपिंग और ऑनलाइन अभिलेखन का कार्य किया जा रहा है। इससे किसी प्राकृतिक आपदा या क्षति की स्थिति में भी महत्वपूर्ण जानकारी सुरक्षित रह सकेगी। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने से शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और इतिहासकारों को भी बड़ी सुविधा मिलेगी। ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण पर विशेष फोकस नई दिल्ली: देश के विभिन्न राज्यों में स्थित प्राचीन मंदिरों, किलों और पुरातात्विक स्थलों की मरम्मत और संरचनात्मक मजबूती के लिए विशेष परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। कई स्थानों पर संरक्षण कार्यों के लिए आधुनिक तकनीकों और विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। इन प्रयासों का उद्देश्य ऐतिहासिक धरोहरों को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखना है। पर्यटन को भी मिलेगा बढ़ावा वाराणसी: धरोहर संरक्षण और डिजिटलीकरण परियोजनाओं से पर्यटन क्षेत्र को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। बेहतर सुविधाओं और डिजिटल जानकारी की उपलब्धता से देशी और विदेशी पर्यटकों को ऐतिहासिक स्थलों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त हो सकेगी। पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिलेगा। युवाओं को जोड़ने की पहल नई दिल्ली: कई संस्थाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म और वर्चुअल टूर के माध्यम से युवाओं को भारत की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में भी विरासत संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं की भागीदारी से धरोहर संरक्षण अभियान को और मजबूती मिलेगी। सांस्कृतिक पहचान को मिलेगा संरक्षण नई दिल्ली: इतिहासकारों के अनुसार भारत की ऐतिहासिक धरोहरें केवल स्मारक नहीं बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक हैं। इनके संरक्षण से आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास और परंपराओं को समझने का अवसर मिलेगा। इसी उद्देश्य से विभिन्न संस्थाएं तकनीक और अनुसंधान के माध्यम से संरक्षण कार्यों को नई दिशा दे रही हैं। निष्कर्ष नई दिल्ली: देशभर में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और डिजिटलीकरण पर बढ़ता जोर भारत की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता के सहयोग से विरासत स्थलों को संरक्षित करने के साथ-साथ उन्हें वैश्विक स्तर पर अधिक सुलभ बनाने की कोशिश की जा रही है। आने वाले वर्षों में ये परियोजनाएं भारतीय संस्कृति और पर्यटन क्षेत्र को नई मजबूती प्रदान कर सकती हैं। जय राष्ट्र न्यूज़ के साथ जुड़े रहें धरोहर, संस्कृति और देश-दुनिया की हर बड़ी खबर के लिए।

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वाराणसी में BRICS देशों ने सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर बढ़ाया सहयोग

वाराणसी भारत की सांस्कृतिक राजधानी मानी जाने वाली वाराणसी में BRICS देशों के प्रतिनिधियों ने सांस्कृतिक विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत बनाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की। इस बैठक में सदस्य देशों ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण, डिजिटल दस्तावेजीकरण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विरासत स्थलों की सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। बैठक में भारत सहित BRICS समूह के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर विशेष जोर बैठक के दौरान प्रतिनिधियों ने कहा कि दुनिया भर में कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरें प्राकृतिक आपदाओं, शहरीकरण और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में इन धरोहरों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद आवश्यक हो गया है। विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर धरोहर स्थलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने और संरक्षण प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने पर भी चर्चा की। डिजिटल तकनीक बनेगी संरक्षण का आधार बैठक में 3D स्कैनिंग, डिजिटल आर्काइव, GIS मैपिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित संरक्षण तकनीकों के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक की मदद से ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक स्थलों की सटीक जानकारी सुरक्षित रखी जा सकती है, जिससे भविष्य में संरक्षण कार्यों को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सकेगा। वाराणसी क्यों है खास? वाराणसी दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित शहरों में से एक माना जाता है। इसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत भारत की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गंगा नदी के किनारे बसे इस शहर में अनेक प्राचीन मंदिर, घाट और सांस्कृतिक स्थल मौजूद हैं, जो देश-विदेश के लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। इसी वजह से BRICS बैठक के लिए वाराणसी को एक महत्वपूर्ण स्थल माना गया। सांस्कृतिक आदान-प्रदान को मिलेगा बढ़ावा बैठक में सदस्य देशों के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शोध परियोजनाओं और संग्रहालय सहयोग को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान से विभिन्न देशों के लोगों के बीच आपसी समझ और सहयोग मजबूत होगा। इससे वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिल सकती है। पर्यटन क्षेत्र को होगा लाभ BRICS देशों के बीच बढ़ते सांस्कृतिक सहयोग का सकारात्मक प्रभाव पर्यटन क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि विरासत स्थलों का संरक्षण बेहतर तरीके से किया जाए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रचार किया जाए, तो पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिलेगा। भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूती विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय बैठकों से भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूती मिलती है। भारत लंबे समय से अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करता रहा है। वाराणसी में आयोजित यह बैठक भारत की सांस्कृतिक नेतृत्व क्षमता को भी दर्शाती है। निष्कर्ष वाराणसी में आयोजित BRICS देशों की बैठक सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। डिजिटल तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से सदस्य देशों ने धरोहर संरक्षण को नई दिशा देने की प्रतिबद्धता जताई है। इससे न केवल ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक सहयोग को भी बढ़ावा मिलेगा। FAQs 1. BRICS क्या है? BRICS प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जिसमें कई सदस्य देश शामिल हैं। 2. बैठक कहाँ आयोजित हुई? यह बैठक उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में आयोजित की गई। 3. बैठक का मुख्य उद्देश्य क्या था? सांस्कृतिक विरासत संरक्षण और सदस्य देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना। 4. किन तकनीकों पर चर्चा हुई? 3D स्कैनिंग, डिजिटल आर्काइव, GIS मैपिंग और AI आधारित संरक्षण तकनीकों पर। 5. इससे भारत को क्या लाभ होगा? सांस्कृतिक कूटनीति, पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूती मिलेगी।

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ओडिशा में धरोहर संरक्षण के लिए IIT खड़गपुर और SPA भोपाल से समझौता, आधुनिक तकनीक से सहेजी जाएंगी ऐतिहासिक विरासतें

भुवनेश्वर ओडिशा सरकार ने राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर और स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर (SPA) भोपाल के साथ समझौता किया है, जिसके तहत आधुनिक तकनीक की मदद से ऐतिहासिक स्मारकों, मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना, ऐतिहासिक संरचनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करना और भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन धरोहरों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना है। आधुनिक तकनीक से होगा संरक्षण अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना के तहत अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। इनमें 3D स्कैनिंग, LiDAR मैपिंग, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, जीआईएस (GIS) आधारित सर्वेक्षण और संरचनात्मक विश्लेषण जैसी तकनीकें शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन तकनीकों की मदद से स्मारकों की वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन किया जा सकेगा और संरक्षण कार्य अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा। किन धरोहरों पर रहेगा फोकस? परियोजना के तहत राज्य के प्रमुख मंदिरों, प्राचीन स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों और सांस्कृतिक महत्व की इमारतों का अध्ययन किया जाएगा। ओडिशा अपने प्राचीन मंदिरों, कलिंग वास्तुकला और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। कोणार्क सूर्य मंदिर, लिंगराज मंदिर और कई अन्य ऐतिहासिक स्थल राज्य की पहचान माने जाते हैं। डिजिटल आर्काइव तैयार करने की योजना समझौते के तहत धरोहर स्थलों का विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इससे भविष्य में किसी भी प्रकार की क्षति होने पर मूल संरचना की जानकारी सुरक्षित रहेगी। विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल आर्काइव न केवल संरक्षण कार्यों में मदद करेगा, बल्कि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और इतिहासकारों के लिए भी महत्वपूर्ण संसाधन साबित होगा। पर्यटन क्षेत्र को मिलेगा लाभ धरोहर संरक्षण की इस पहल से राज्य के पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। बेहतर संरक्षण और डिजिटल प्रस्तुति से देश-विदेश के पर्यटकों को ऐतिहासिक स्थलों के बारे में अधिक जानकारी मिल सकेगी। पर्यटन विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक आधारित संरक्षण परियोजनाएं किसी भी राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों को भी गति देती हैं। विशेषज्ञों ने बताया महत्वपूर्ण कदम इतिहासकारों और संरक्षण विशेषज्ञों ने इस समझौते का स्वागत किया है। उनका कहना है कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक अध्ययन की मदद से धरोहर संरक्षण अधिक प्रभावी और दीर्घकालिक बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि देश के अन्य राज्यों को भी इसी प्रकार की पहल पर विचार करना चाहिए ताकि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सके। सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता ओडिशा की ऐतिहासिक धरोहरें केवल राज्य की पहचान नहीं हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समय, मौसम और अन्य प्राकृतिक कारणों से इन संरचनाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा बना रहता है। ऐसे में वैज्ञानिक संरक्षण और तकनीकी सहयोग से इन धरोहरों को सुरक्षित रखने की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। निष्कर्ष ओडिशा सरकार, IIT खड़गपुर और SPA भोपाल के बीच हुआ यह समझौता राज्य की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता के सहयोग से सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के प्रयासों को नई दिशा मिलेगी। इससे न केवल धरोहर संरक्षण मजबूत होगा, बल्कि पर्यटन और शोध गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। FAQs 1. ओडिशा सरकार ने किन संस्थानों के साथ समझौता किया है? IIT खड़गपुर और SPA भोपाल के साथ। 2. इस समझौते का उद्देश्य क्या है? राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का वैज्ञानिक एवं तकनीकी संरक्षण करना। 3. कौन-सी तकनीकों का उपयोग किया जाएगा? 3D स्कैनिंग, LiDAR मैपिंग, GIS सर्वेक्षण और डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन जैसी तकनीकों का। 4. इससे पर्यटन को क्या लाभ होगा? बेहतर संरक्षण और डिजिटल प्रस्तुति से पर्यटकों का अनुभव बेहतर होगा और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। 5. डिजिटल आर्काइव क्यों बनाया जाएगा? धरोहर स्थलों का स्थायी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और भविष्य के संरक्षण कार्यों में सहायता के लिए।

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हम्पी के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए ₹70 लाख की परियोजना शुरू

हम्पी (कर्नाटक) यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हम्पी के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण और मरम्मत के लिए लगभग ₹70 लाख की विशेष परियोजना शुरू की गई है। इस पहल का उद्देश्य विजयनगर साम्राज्य की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखना, स्मारकों की संरचनात्मक मजबूती बढ़ाना और पर्यटकों के लिए बेहतर अनुभव सुनिश्चित करना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संचालित इस परियोजना के तहत कई महत्वपूर्ण स्मारकों में संरक्षण कार्य किए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ प्राकृतिक क्षरण, मौसम और पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण इन ऐतिहासिक संरचनाओं को नियमित संरक्षण की आवश्यकता है। विश्व धरोहर स्थल है हम्पी कर्नाटक के विजयनगर जिले में स्थित हम्पी भारत के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है। यह कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था और अपनी भव्य वास्तुकला, मंदिरों, बाजारों तथा पत्थर की विशाल संरचनाओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यूनेस्को ने वर्ष 1986 में हम्पी को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया था। यहां हर साल लाखों देशी और विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं। किन स्मारकों पर होगा काम? संरक्षण परियोजना के तहत हम्पी के कई महत्वपूर्ण स्मारकों और ऐतिहासिक संरचनाओं की मरम्मत और रखरखाव किया जाएगा। कार्य में शामिल प्रमुख गतिविधियां: विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण कार्यों में पारंपरिक निर्माण तकनीकों और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का संतुलित उपयोग किया जाएगा। पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण कार्यों से हम्पी आने वाले पर्यटकों का अनुभव बेहतर होगा। इससे न केवल पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि होगी बल्कि स्थानीय व्यवसायों, होटल उद्योग और गाइड सेवाओं को भी लाभ मिलेगा। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि बेहतर रखरखाव और सुविधाओं के कारण विदेशी पर्यटकों की संख्या भी बढ़ सकती है। सांस्कृतिक विरासत को बचाने की पहल इतिहासकारों के अनुसार हम्पी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां मौजूद मंदिर, मंडप, बाजार और अन्य संरचनाएं विजयनगर साम्राज्य की समृद्ध कला और स्थापत्य परंपरा को दर्शाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर संरक्षण कार्य न किए जाएं तो कई ऐतिहासिक संरचनाएं धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। इसलिए ऐसी परियोजनाएं धरोहर संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। स्थानीय लोगों की भूमिका संरक्षण अभियान के दौरान स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे स्मारकों की स्वच्छता बनाए रखें और ऐतिहासिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचें। जागरूक नागरिक और पर्यटक धरोहर संरक्षण के प्रयासों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। निष्कर्ष हम्पी के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए शुरू की गई ₹70 लाख की परियोजना भारत की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल विश्व धरोहर स्थल की ऐतिहासिक पहचान संरक्षित रहेगी, बल्कि पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलने की उम्मीद है। FAQs 1. हम्पी कहाँ स्थित है? हम्पी कर्नाटक के विजयनगर जिले में स्थित है। 2. हम्पी को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा कब मिला? वर्ष 1986 में। 3. संरक्षण परियोजना की लागत कितनी है? लगभग ₹70 लाख। 4. संरक्षण कार्य कौन कर रहा है? भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा कार्य कराया जा रहा है। 5. इस परियोजना से क्या लाभ होगा? ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित होगी, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचेगा।

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अरावली पहाड़ियां है खतरे में

अरावली पहाड़ियां: सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से पर्यावरण पर खतरा, विरोध प्रदर्शन तेज

जय राष्ट्र न्यूज़, 24 दिसंबर 2025 – अरावली पहाड़ियां, जो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं, इन दिनों एक बड़े पर्यावरणीय और राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने अरावली की परिभाषा को बदल दिया है, जिससे खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय निवासी इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि अरावली की सुरक्षा में कोई ढील नहीं दी गई है। जय राष्ट्र न्यूज़ आपको इस मुद्दे की पूरी जानकारी दे रहा है। अरावली पहाड़ियों का महत्व और वर्तमान स्थिति अरावली पहाड़ियां राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में फैली हुई हैं, जो लगभग 692 किलोमीटर लंबी हैं। ये पहाड़ियां न केवल जैव विविधता का खजाना हैं, बल्कि उत्तरी भारत में रेगिस्तानी फैलाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करती हैं और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण को नियंत्रित रखती हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अवैध खनन और निर्माण ने इन पहाड़ियों को नुकसान पहुंचाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें अरावली की परिभाषा को एक समान बनाया गया। अब केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही ‘अरावली’ मानी जाएंगी और उन्हें कानूनी संरक्षण मिलेगा। इससे पहले, कोई स्पष्ट ऊंचाई सीमा नहीं थी, जिससे संरक्षण में असमंजस था। सुप्रीम कोर्ट का ‘100 मीटर नियम’ क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और रेंज की एकरूप परिभाषा तय की है। इस नियम के तहत: पर्यावरण मंत्री ने स्पष्ट किया है कि अरावली में खनन पर कोई छूट नहीं दी गई है, लेकिन एनसीआर के निकटवर्ती इलाकों में कुछ हिस्सों पर प्रभाव पड़ सकता है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने भी सफाई दी है कि कोई अध्ययन यह नहीं कहता कि केवल 9% अरावली 100 मीटर से ऊपर है। कुल 2,43,000 वर्ग किलोमीटर में से लगभग 1,23,000 वर्ग किलोमीटर स्थायी रूप से संरक्षित हैं, जिसमें शहर जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं इस फैसले के बाद उत्तरी भारत में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कार्यकर्ता और स्थानीय लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पर्यावरण के लिए खतरा मान रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह अरावली की परिभाषा बदलकर खनन को बढ़ावा दे रही है। वहीं, सरकार ने इन आरोपों को निराधार बताया है। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग इस मुद्दे पर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह फैसला खनन से परे भी प्रभाव डाल सकता है, जैसे कि निर्माण और रियल एस्टेट पर। फ्रंटलाइन मैगजीन ने इसे ‘पारिस्थितिक अंधापन’ करार दिया है, क्योंकि इससे जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है। पर्यावरणीय प्रभाव और भविष्य की चिंताएं पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि 100 मीटर नियम से अरावली के निचले हिस्सों में खनन बढ़ सकता है, जिससे मिट्टी का कटाव, जल संकट और वन्यजीवों का विनाश हो सकता है। दिल्ली-एनसीआर में पहले से ही प्रदूषण की समस्या है, और अरावली का क्षरण इसे और गंभीर बना सकता है। जय राष्ट्र न्यूज़ का मानना है कि अरावली को बचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार को संरक्षण नीतियों को मजबूत करने और अवैध गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। निष्कर्ष अरावली पहाड़ियां भारत की प्राकृतिक धरोहर हैं, और इनका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक ओर स्पष्टता लाता है, लेकिन दूसरी ओर पर्यावरणीय जोखिम बढ़ाता है। जय राष्ट्र न्यूज़ आपको ऐसी महत्वपूर्ण खबरों से अपडेट रखेगा। अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट पर विजिट करें।

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गुरु नानक जयंती और देव दीपावली का दिव्य संयोग, पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

गुरु नानक जयंती और देव दीपावली का दिव्य संयोग, पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

आज गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा-देव दीपावली के दिव्य संयोग पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं. पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर गुरु नानक देव के जीवन और संदेश को ‘मानवता का मार्गदर्शन’ करने वाला बताया, जो करुणा, समानता और सेवा पर आधारित है. पीएम मोदी ने कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली को भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जुड़ा बताते हुए कामना की कि यह पवित्र परंपरा सबके जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और सौभाग्य लेकर आए. इसके साथ ही उन्होंने सोशल मीडियो पर एक प्यारा सा वीडियो पोस्ट किया है. प्रकाश पर्व प्रेरणास्रोत- पीएम मोदी गुरु नानक देव के प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा-देव दीपावली पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को शुभकामनाएं दी और उनकी शिक्षाओं को मानवता के लिए प्रेरणास्रोत बताया. प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट करते हुए लिखा, “गुरु नानक देव जी का जीवन और संदेश सदैव मानवता का मार्गदर्शन करते रहते हैं. करुणा, समानता, विनम्रता और सेवा पर आधारित उनकी शिक्षाएं अत्यंत प्रेरक हैं. प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं. ईश्वर करें कि उनका ब्रह्म प्रकाश हमेशा हमारी पृथ्वी को प्रकाशित करता रहे. कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की शुभकामनाएं प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की भी शुभकामनाएं दीं. पीएम मोदी एक अन्य ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा कि देश के अपने सभी परिवारजनों को कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की कोटि-कोटि शुभकामनाएं. भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जुड़ा यह दिव्य अवसर हर किसी के लिए सुख, शांति, आरोग्य और सौभाग्य लेकर आए. पावन स्नान, दान-पुण्य, आरती और पूजन से जुड़ी हमारी यह पवित्र परंपरा सबके जीवन को प्रकाशित करे. मनोज सिन्हा ने भी किया पोस्ट जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं दी. उन्होंने आधिकारिक ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा, “गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं. उनका जीवन और समानता, करुणा और सत्य का संदेश समस्त मानवता के लिए प्रेरणा है. आइए, एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज के निर्माण के लिए स्वयं को पुनः समर्पित करें और अपने दैनिक जीवन में पूज्य गुरु जी की महान शिक्षाओं का पालन करें.

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कब मनाई जाएगी गोवर्धन पूजा? जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

कब मनाई जाएगी गोवर्धन पूजा? जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

दिवाली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा का पर्व इस बार 22 अक्टूबर को मनाया जाएगा. आमतौर पर लोग इसे दिवाली के अगले दिन ही मनाते हैं लेकिन इस बार पंचांग के अनुसार तिथि को लेकर थोड़ा भ्रम बना हुआ था. दरअसल, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 21 अक्टूबर की शाम 5:57 बजे शुरू हो रही है और 22 अक्टूबर की रात 8:18 बजे तक रहेगी. ऐसे में उदयातिथि की मान्यता के अनुसार गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर को मनाई जाएगी. किसकी पूजा की जाती है? इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है जिन्होंने ब्रजवासियों को देवराज इंद्र की भारी वर्षा से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था. तभी से इस पर्व को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है. इस दिन भगवान को 56 भोग लगाए जाते हैं और गायों की पूजा की जाती है. उन्हें चारा खिलाया जाता है और उनका विशेष ध्यान रखा जाता है. पूजा का पहला शुभ मुर्हूत गोवर्धन पूजा का पहला शुभ मुहूर्त सुबह 6:26 बजे से शुरू होकर 8:48 बजे तक रहेगा. इस दौरान पूजा की अवधि एक घंटे 16 मिनट की होगी. दूसरा मुहूर्त दोपहर 3:29 बजे से शुरू होकर शाम 5:44 बजे तक रहेगा, जिसमें 2 घंटे 16 मिनट तक पूजा की जा सकती है. गोवर्धन पर्वत को धरती का प्रतीक यह पर्व प्रकृति और मानव के बीच के रिश्ते को भी दर्शाता है. गोवर्धन पर्वत को धरती का प्रतीक माना जाता है और इसकी पूजा करने से व्यक्ति को प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है. इस दिन दान करना भी बहुत शुभ माना जाता है. गोवर्धन पूजा न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि यह हमें भगवान श्रीकृष्ण की करुणा और शक्ति की याद दिलाता है. इस दिन की पूजा से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है. इसलिए श्रद्धालु इस पर्व को पूरे उत्साह और भक्ति के साथ मनाते हैं

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करवा चौथ सबसे बड़ा पर्व आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, कथा और इसका धार्मिक महत्व

करवा चौथ सबसे बड़ा पर्व आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, कथा और इसका धार्मिक महत्व

नई दिल्ली: पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला करवा चौथ व्रत आज यानी 10 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है यह व्रत हर विवाहित महिला के लिए प्रेम, आस्था और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।  करवा चौथ 2025 की सटीक तिथि और शुभ मुहूर्त करवा चौथ व्रत तिथि: शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025 चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 9 अक्टूबर, रात 9:42 बजे चतुर्थी तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर, शाम 7:10 बजे पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 5:49 बजे से 7:05 बजे तक (नोएडा/दिल्ली NCR के अनुसार) चंद्रोदय (चांद निकलने का समय): रात 8:13 बजे इस दिन महिलाएं चांद निकलने तक जल-अन्न का त्याग कर निर्जला उपवास रखती हैं। पूजा का समय बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। पूजा विधि: कैसे करें करवा चौथ का व्रत 1. सुबह सर्गी:करवा चौथ की शुरुआत भोर में “सर्गी” से होती है, जो सास की ओर से दी जाती है। इसमें फल, मिठाई, सूखे मेवे और पूरी-सब्जी शामिल होते हैं। सर्गी ग्रहण करने के बाद महिलाएं सूर्योदय से पहले व्रत का संकल्प लेती हैं। 2. दिनभर का निर्जला व्रत:इस दिन महिलाएं पूरे दिन जल तक नहीं पीतीं। माना जाता है कि यह कठिन तपस्या पति के दीर्घायु और दांपत्य सुख के लिए की जाती है। 3. शाम की पूजा:सूर्यास्त के बाद महिलाएं सोलह श्रृंगार कर नई साड़ी पहनती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं। पूजा थाली में दीपक, करवा, रोली, चावल, मिठाई, चूड़ियां और जल रखा जाता है। 4. चांद की पूजा:चांद निकलने के बाद महिलाएं छलनी से पहले चांद और फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं। इसके बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत तोड़ा जाता है।  करवा चौथ व्रत कथापौराणिक कथा के अनुसार, वीरावती नामक एक रानी अपने भाइयों के आग्रह पर करवा चौथ का व्रत रखती है। जब वह भूख-प्यास से व्याकुल हो जाती है, तो उसके भाइयों ने छल करके दीपक की लौ को छलनी में दिखाकर कहा कि चांद निकल आया है। वीरावती ने व्रत तोड़ दिया, जिसके कारण उसके पति की तबीयत बिगड़ गई। तब देवी पार्वती ने प्रकट होकर उसे अगले वर्ष सच्चे मन से व्रत करने का उपदेश दिया। अगले साल वीरावती ने पूरे विधि-विधान से करवा चौथ का व्रत किया, जिससे उसके पति को दीर्घायु का आशीर्वाद मिला। तभी से यह व्रत सभी सुहागिनों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्वकरवा चौथ केवल एक व्रत नहीं बल्कि विश्वास, प्रेम और अटूट बंधन का प्रतीक है। यह व्रत विवाह में एक-दूसरे के प्रति समर्पण और त्याग की भावना को दर्शाता है। इस दिन की विशेषता यह भी है कि महिलाएं एक-दूसरे के साथ एकजुट होकर व्रत करती हैं, जिससे नारी एकता और सहयोग की भावना भी झलकती है।  मेहंदी, श्रृंगार और बाजारों की रौनकदेशभर में करवा चौथ की तैयारियाँ चरम पर हैं। बाजारों में पारंपरिक साड़ियाँ, गहने, थाली सजावट और मेहंदी की दुकानों पर महिलाओं की भीड़ देखी जा सकती है। दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, जयपुर और मुंबई जैसे शहरों के ब्यूटी पार्लरों में एडवांस बुकिंग फुल हो चुकी हैं।

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घर-घर सजी पान-सुपारी की थालियां, दशहरे पर निभाई जाती बुंदेलखंड की अनोखी परंपरा

बुंदेलखंड में दशहरा पर घर-घर सजती पान की दुकानें छतरपुर सहित ग्रामीण अंचलों में कायम है दशहरे की अनूठी परंपरा, मेल-मिलाप और भाईचारे का पर्व छतरपुर (मध्यप्रदेश)। बुंदेलखंड की धरती अपनी परंपराओं, लोक संस्कृति और अनोखे रीति-रिवाजों के लिए जानी जाती है। यहां दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व सामाजिक एकता, मेल-मिलाप और लोकनृत्य का अनोखा संगम भी है। छतरपुर और आसपास के ग्रामीण अंचलों में आज भी दशहरे पर घर-घर पान की थाल सजाने और लौंग भेंट करने की सदियों पुरानी परंपरा उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है “वीरा” दशहरे की शुरुआत गांव के मंदिरों और घरों में देवी-देवताओं की पूजा से होती है। ग्रामीण अपने घरों में विशेष थालियां सजाते हैं, जिनमें पान, सुपारी और पूजन सामग्री रखी जाती है। इसे “वीरा” कहा जाता है। मान्यता है कि देवी-देवताओं को यह अर्पण करने से गांव में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। स्थानीय ग्रामीण रामसिंह बताते हैं, “हमारे पुरखे भी यही परंपरा निभाते आए हैं। पहले तो पूरा गांव मिलकर देवताओं के सामने वीरा सजाता था। आज भी वही तरीका चल रहा है।” घर-घर सजी थालियां, पान-सुपारी से होता है स्वागत पूजन-अर्चना के बाद गांव की महिलाएं और बच्चे थालियां लेकर घर-घर जाते हैं। हर घर में पान और सुपारी से सजी थाल रखी होती है। महिलाएं घर के सदस्यों को तिलक लगाती हैं, गले मिलती हैं और पान खिलाकर शुभकामनाएं देती हैं। गांव की महिला ममता कुशवाहा बताती हैं, “बुंदेलखंड की यह सबसे प्यारी परंपरा है। हम जब एक-दूसरे के घर जाते हैं तो लगता है जैसे पूरा गांव एक परिवार है।” महिलाओं को “लौंग” देने का रिवाज इस दिन महिलाओं को लौंग भेंट करने की परंपरा भी खास मायने रखती है। इसे सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है। घर-घर जाकर महिलाएं लौंग ग्रहण करती हैं और इसे पूजा में भी इस्तेमाल करती हैं। स्थानीय बुजुर्ग सावित्री देवी कहती हैं, “लौंग देना और लेना केवल रस्म नहीं है, यह अपनत्व और आशीर्वाद का प्रतीक है। दशहरा का महत्व इसी से और बढ़ जाता है।” गांव के बीचों-बीच गूंजता है “बुंदेली दीवाली नृत्य” शाम होते ही गांव के बीचों-बीच बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। डीजे और ढोल-नगाड़ों की थाप पर “बुंदेली दीवाली नृत्य” शुरू होता है। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग मिलकर झूमते-गाते हैं। यह नृत्य दशहरे की रात गांव को उत्सव के रंग में डूबो देता है। युवक रवि अहिरवार बताते हैं, “हम हर साल इस दिन का इंतजार करते हैं। यहां सिर्फ नृत्य नहीं होता, बल्कि पूरा गांव एक साथ जश्न मनाता है। यही हमारी असली दीवाली है।” सामाजिक एकता और भाईचारे की मिसाल यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इसमें मेल-जोल, भाईचारा और सामाजिक एकता की झलक साफ दिखाई देती है। दशहरे का यह अनूठा रूप गांव में रिश्तों को मजबूत करता है और लोगों को जोड़ता है।

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दुर्गा पूजा में 'काबा-मदीना' की गूंज, बंगाल में सनातन पर चोट

दुर्गा पूजा में ‘काबा-मदीना’ की गूंज, बंगाल में सनातन पर चोट

दुर्गा पूजा में ‘काबा-मदीना’ की गूंज, बंगाल में सनातन पर चोट कोलकाता के भवानीपुर 75 पल्ली दुर्गा पूजा पंडाल में इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसने लाखों हिंदू समाज के लोगों को भीतर तक झकझोर दिया. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पंडाल का उद्घाटन किया, तालियां बजाईं. वहीं उनके करीबी नेता मदन मित्रा मंच पर गाते हुए कहा कि मेरे दिल में काबा है और आँखों में मदीना है. मुद्दे की बातअब सवाल ये उठता है कि दुर्गा पूजा जैसे सनातन पर्व पर इस तरह के गीतों का क्या काम? क्या ये जानबूझकर सनातन भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश नहीं है? क्या ये एक सांस्कृतिक अतिक्रमण नहीं है जहां देवी दुर्गा की आराधना के बीच इस्लामी प्रतीकों की बात की जा रही है? वोट के लिए आस्था से खिलवाड़ममता बनर्जी का ये कदम कोई पहली बार नहीं है. इससे पहले भी उन्होंने पितृ पक्ष के दौरान दुर्गा पूजा पंडालों का उद्घाटन कर हिंदू परंपराओं को नजरअंदाज किया था. जबकि शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में कोई नया कार्य या उत्सव शुरू करना अशुभ माना जाता है लेकिन बंगाल की राजनीति में वोट बैंक की मजबूरी शायद आस्था से बड़ी हो गई है. सबसे बड़ी चिंता की बात तो ये है कि इस सबके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती है. न कोई बड़ा संत बोलता है, न कोई संगठन सड़कों पर उतरता है. सोशल मीडिया पर कुछ लोग जरूर नाराजगी जताते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर विरोध न के बराबर है. पश्चिम बंगाल में सनातन धर्म ना के बराबरक्या बंगाल में सनातन धर्म अब सिर्फ एक मौन दर्शक बनकर रह गया है? क्या दुर्गा पूजा जैसे पर्व अब राजनीतिक मंच बनते जा रहे हैं जहां देवी की आराधना से ज़्यादा नेताओं की पीआर चलती है? इसे भी पढ़ें-अगर अब भी हम चुप रहे, तो आने वाले वर्षों में दुर्गा पूजा में देवी के स्थान पर कोई और प्रतीक खड़ा मिलेगा। ये समय है जागने का, बोलने का और अपनी आस्था की रक्षा करने का वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा.

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