हम्पी के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए ₹70 लाख की परियोजना शुरू

हम्पी (कर्नाटक) यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हम्पी के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण और मरम्मत के लिए लगभग ₹70 लाख की विशेष परियोजना शुरू की गई है। इस पहल का उद्देश्य विजयनगर साम्राज्य की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखना, स्मारकों की संरचनात्मक मजबूती बढ़ाना और पर्यटकों के लिए बेहतर अनुभव सुनिश्चित करना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संचालित इस परियोजना के तहत कई महत्वपूर्ण स्मारकों में संरक्षण कार्य किए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ प्राकृतिक क्षरण, मौसम और पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण इन ऐतिहासिक संरचनाओं को नियमित संरक्षण की आवश्यकता है। विश्व धरोहर स्थल है हम्पी कर्नाटक के विजयनगर जिले में स्थित हम्पी भारत के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है। यह कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था और अपनी भव्य वास्तुकला, मंदिरों, बाजारों तथा पत्थर की विशाल संरचनाओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यूनेस्को ने वर्ष 1986 में हम्पी को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया था। यहां हर साल लाखों देशी और विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं। किन स्मारकों पर होगा काम? संरक्षण परियोजना के तहत हम्पी के कई महत्वपूर्ण स्मारकों और ऐतिहासिक संरचनाओं की मरम्मत और रखरखाव किया जाएगा। कार्य में शामिल प्रमुख गतिविधियां: विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण कार्यों में पारंपरिक निर्माण तकनीकों और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का संतुलित उपयोग किया जाएगा। पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण कार्यों से हम्पी आने वाले पर्यटकों का अनुभव बेहतर होगा। इससे न केवल पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि होगी बल्कि स्थानीय व्यवसायों, होटल उद्योग और गाइड सेवाओं को भी लाभ मिलेगा। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि बेहतर रखरखाव और सुविधाओं के कारण विदेशी पर्यटकों की संख्या भी बढ़ सकती है। सांस्कृतिक विरासत को बचाने की पहल इतिहासकारों के अनुसार हम्पी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां मौजूद मंदिर, मंडप, बाजार और अन्य संरचनाएं विजयनगर साम्राज्य की समृद्ध कला और स्थापत्य परंपरा को दर्शाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर संरक्षण कार्य न किए जाएं तो कई ऐतिहासिक संरचनाएं धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। इसलिए ऐसी परियोजनाएं धरोहर संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। स्थानीय लोगों की भूमिका संरक्षण अभियान के दौरान स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे स्मारकों की स्वच्छता बनाए रखें और ऐतिहासिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचें। जागरूक नागरिक और पर्यटक धरोहर संरक्षण के प्रयासों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। निष्कर्ष हम्पी के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए शुरू की गई ₹70 लाख की परियोजना भारत की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल विश्व धरोहर स्थल की ऐतिहासिक पहचान संरक्षित रहेगी, बल्कि पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलने की उम्मीद है। FAQs 1. हम्पी कहाँ स्थित है? हम्पी कर्नाटक के विजयनगर जिले में स्थित है। 2. हम्पी को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा कब मिला? वर्ष 1986 में। 3. संरक्षण परियोजना की लागत कितनी है? लगभग ₹70 लाख। 4. संरक्षण कार्य कौन कर रहा है? भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा कार्य कराया जा रहा है। 5. इस परियोजना से क्या लाभ होगा? ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित होगी, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचेगा।

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अरावली पहाड़ियां है खतरे में

अरावली पहाड़ियां: सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से पर्यावरण पर खतरा, विरोध प्रदर्शन तेज

जय राष्ट्र न्यूज़, 24 दिसंबर 2025 – अरावली पहाड़ियां, जो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं, इन दिनों एक बड़े पर्यावरणीय और राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने अरावली की परिभाषा को बदल दिया है, जिससे खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय निवासी इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि अरावली की सुरक्षा में कोई ढील नहीं दी गई है। जय राष्ट्र न्यूज़ आपको इस मुद्दे की पूरी जानकारी दे रहा है। अरावली पहाड़ियों का महत्व और वर्तमान स्थिति अरावली पहाड़ियां राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में फैली हुई हैं, जो लगभग 692 किलोमीटर लंबी हैं। ये पहाड़ियां न केवल जैव विविधता का खजाना हैं, बल्कि उत्तरी भारत में रेगिस्तानी फैलाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करती हैं और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण को नियंत्रित रखती हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अवैध खनन और निर्माण ने इन पहाड़ियों को नुकसान पहुंचाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें अरावली की परिभाषा को एक समान बनाया गया। अब केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही ‘अरावली’ मानी जाएंगी और उन्हें कानूनी संरक्षण मिलेगा। इससे पहले, कोई स्पष्ट ऊंचाई सीमा नहीं थी, जिससे संरक्षण में असमंजस था। सुप्रीम कोर्ट का ‘100 मीटर नियम’ क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और रेंज की एकरूप परिभाषा तय की है। इस नियम के तहत: पर्यावरण मंत्री ने स्पष्ट किया है कि अरावली में खनन पर कोई छूट नहीं दी गई है, लेकिन एनसीआर के निकटवर्ती इलाकों में कुछ हिस्सों पर प्रभाव पड़ सकता है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने भी सफाई दी है कि कोई अध्ययन यह नहीं कहता कि केवल 9% अरावली 100 मीटर से ऊपर है। कुल 2,43,000 वर्ग किलोमीटर में से लगभग 1,23,000 वर्ग किलोमीटर स्थायी रूप से संरक्षित हैं, जिसमें शहर जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं इस फैसले के बाद उत्तरी भारत में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कार्यकर्ता और स्थानीय लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पर्यावरण के लिए खतरा मान रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह अरावली की परिभाषा बदलकर खनन को बढ़ावा दे रही है। वहीं, सरकार ने इन आरोपों को निराधार बताया है। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग इस मुद्दे पर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह फैसला खनन से परे भी प्रभाव डाल सकता है, जैसे कि निर्माण और रियल एस्टेट पर। फ्रंटलाइन मैगजीन ने इसे ‘पारिस्थितिक अंधापन’ करार दिया है, क्योंकि इससे जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है। पर्यावरणीय प्रभाव और भविष्य की चिंताएं पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि 100 मीटर नियम से अरावली के निचले हिस्सों में खनन बढ़ सकता है, जिससे मिट्टी का कटाव, जल संकट और वन्यजीवों का विनाश हो सकता है। दिल्ली-एनसीआर में पहले से ही प्रदूषण की समस्या है, और अरावली का क्षरण इसे और गंभीर बना सकता है। जय राष्ट्र न्यूज़ का मानना है कि अरावली को बचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार को संरक्षण नीतियों को मजबूत करने और अवैध गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। निष्कर्ष अरावली पहाड़ियां भारत की प्राकृतिक धरोहर हैं, और इनका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक ओर स्पष्टता लाता है, लेकिन दूसरी ओर पर्यावरणीय जोखिम बढ़ाता है। जय राष्ट्र न्यूज़ आपको ऐसी महत्वपूर्ण खबरों से अपडेट रखेगा। अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट पर विजिट करें।

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गुरु नानक जयंती और देव दीपावली का दिव्य संयोग, पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

गुरु नानक जयंती और देव दीपावली का दिव्य संयोग, पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

आज गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा-देव दीपावली के दिव्य संयोग पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं. पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर गुरु नानक देव के जीवन और संदेश को ‘मानवता का मार्गदर्शन’ करने वाला बताया, जो करुणा, समानता और सेवा पर आधारित है. पीएम मोदी ने कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली को भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जुड़ा बताते हुए कामना की कि यह पवित्र परंपरा सबके जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और सौभाग्य लेकर आए. इसके साथ ही उन्होंने सोशल मीडियो पर एक प्यारा सा वीडियो पोस्ट किया है. प्रकाश पर्व प्रेरणास्रोत- पीएम मोदी गुरु नानक देव के प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा-देव दीपावली पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को शुभकामनाएं दी और उनकी शिक्षाओं को मानवता के लिए प्रेरणास्रोत बताया. प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट करते हुए लिखा, “गुरु नानक देव जी का जीवन और संदेश सदैव मानवता का मार्गदर्शन करते रहते हैं. करुणा, समानता, विनम्रता और सेवा पर आधारित उनकी शिक्षाएं अत्यंत प्रेरक हैं. प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं. ईश्वर करें कि उनका ब्रह्म प्रकाश हमेशा हमारी पृथ्वी को प्रकाशित करता रहे. कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की शुभकामनाएं प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की भी शुभकामनाएं दीं. पीएम मोदी एक अन्य ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा कि देश के अपने सभी परिवारजनों को कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली की कोटि-कोटि शुभकामनाएं. भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जुड़ा यह दिव्य अवसर हर किसी के लिए सुख, शांति, आरोग्य और सौभाग्य लेकर आए. पावन स्नान, दान-पुण्य, आरती और पूजन से जुड़ी हमारी यह पवित्र परंपरा सबके जीवन को प्रकाशित करे. मनोज सिन्हा ने भी किया पोस्ट जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं दी. उन्होंने आधिकारिक ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा, “गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं. उनका जीवन और समानता, करुणा और सत्य का संदेश समस्त मानवता के लिए प्रेरणा है. आइए, एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज के निर्माण के लिए स्वयं को पुनः समर्पित करें और अपने दैनिक जीवन में पूज्य गुरु जी की महान शिक्षाओं का पालन करें.

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कब मनाई जाएगी गोवर्धन पूजा? जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

कब मनाई जाएगी गोवर्धन पूजा? जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

दिवाली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा का पर्व इस बार 22 अक्टूबर को मनाया जाएगा. आमतौर पर लोग इसे दिवाली के अगले दिन ही मनाते हैं लेकिन इस बार पंचांग के अनुसार तिथि को लेकर थोड़ा भ्रम बना हुआ था. दरअसल, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 21 अक्टूबर की शाम 5:57 बजे शुरू हो रही है और 22 अक्टूबर की रात 8:18 बजे तक रहेगी. ऐसे में उदयातिथि की मान्यता के अनुसार गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर को मनाई जाएगी. किसकी पूजा की जाती है? इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है जिन्होंने ब्रजवासियों को देवराज इंद्र की भारी वर्षा से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था. तभी से इस पर्व को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है. इस दिन भगवान को 56 भोग लगाए जाते हैं और गायों की पूजा की जाती है. उन्हें चारा खिलाया जाता है और उनका विशेष ध्यान रखा जाता है. पूजा का पहला शुभ मुर्हूत गोवर्धन पूजा का पहला शुभ मुहूर्त सुबह 6:26 बजे से शुरू होकर 8:48 बजे तक रहेगा. इस दौरान पूजा की अवधि एक घंटे 16 मिनट की होगी. दूसरा मुहूर्त दोपहर 3:29 बजे से शुरू होकर शाम 5:44 बजे तक रहेगा, जिसमें 2 घंटे 16 मिनट तक पूजा की जा सकती है. गोवर्धन पर्वत को धरती का प्रतीक यह पर्व प्रकृति और मानव के बीच के रिश्ते को भी दर्शाता है. गोवर्धन पर्वत को धरती का प्रतीक माना जाता है और इसकी पूजा करने से व्यक्ति को प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है. इस दिन दान करना भी बहुत शुभ माना जाता है. गोवर्धन पूजा न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि यह हमें भगवान श्रीकृष्ण की करुणा और शक्ति की याद दिलाता है. इस दिन की पूजा से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है. इसलिए श्रद्धालु इस पर्व को पूरे उत्साह और भक्ति के साथ मनाते हैं

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करवा चौथ सबसे बड़ा पर्व आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, कथा और इसका धार्मिक महत्व

करवा चौथ सबसे बड़ा पर्व आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, कथा और इसका धार्मिक महत्व

नई दिल्ली: पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला करवा चौथ व्रत आज यानी 10 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है यह व्रत हर विवाहित महिला के लिए प्रेम, आस्था और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।  करवा चौथ 2025 की सटीक तिथि और शुभ मुहूर्त करवा चौथ व्रत तिथि: शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025 चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 9 अक्टूबर, रात 9:42 बजे चतुर्थी तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर, शाम 7:10 बजे पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 5:49 बजे से 7:05 बजे तक (नोएडा/दिल्ली NCR के अनुसार) चंद्रोदय (चांद निकलने का समय): रात 8:13 बजे इस दिन महिलाएं चांद निकलने तक जल-अन्न का त्याग कर निर्जला उपवास रखती हैं। पूजा का समय बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। पूजा विधि: कैसे करें करवा चौथ का व्रत 1. सुबह सर्गी:करवा चौथ की शुरुआत भोर में “सर्गी” से होती है, जो सास की ओर से दी जाती है। इसमें फल, मिठाई, सूखे मेवे और पूरी-सब्जी शामिल होते हैं। सर्गी ग्रहण करने के बाद महिलाएं सूर्योदय से पहले व्रत का संकल्प लेती हैं। 2. दिनभर का निर्जला व्रत:इस दिन महिलाएं पूरे दिन जल तक नहीं पीतीं। माना जाता है कि यह कठिन तपस्या पति के दीर्घायु और दांपत्य सुख के लिए की जाती है। 3. शाम की पूजा:सूर्यास्त के बाद महिलाएं सोलह श्रृंगार कर नई साड़ी पहनती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं। पूजा थाली में दीपक, करवा, रोली, चावल, मिठाई, चूड़ियां और जल रखा जाता है। 4. चांद की पूजा:चांद निकलने के बाद महिलाएं छलनी से पहले चांद और फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं। इसके बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत तोड़ा जाता है।  करवा चौथ व्रत कथापौराणिक कथा के अनुसार, वीरावती नामक एक रानी अपने भाइयों के आग्रह पर करवा चौथ का व्रत रखती है। जब वह भूख-प्यास से व्याकुल हो जाती है, तो उसके भाइयों ने छल करके दीपक की लौ को छलनी में दिखाकर कहा कि चांद निकल आया है। वीरावती ने व्रत तोड़ दिया, जिसके कारण उसके पति की तबीयत बिगड़ गई। तब देवी पार्वती ने प्रकट होकर उसे अगले वर्ष सच्चे मन से व्रत करने का उपदेश दिया। अगले साल वीरावती ने पूरे विधि-विधान से करवा चौथ का व्रत किया, जिससे उसके पति को दीर्घायु का आशीर्वाद मिला। तभी से यह व्रत सभी सुहागिनों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्वकरवा चौथ केवल एक व्रत नहीं बल्कि विश्वास, प्रेम और अटूट बंधन का प्रतीक है। यह व्रत विवाह में एक-दूसरे के प्रति समर्पण और त्याग की भावना को दर्शाता है। इस दिन की विशेषता यह भी है कि महिलाएं एक-दूसरे के साथ एकजुट होकर व्रत करती हैं, जिससे नारी एकता और सहयोग की भावना भी झलकती है।  मेहंदी, श्रृंगार और बाजारों की रौनकदेशभर में करवा चौथ की तैयारियाँ चरम पर हैं। बाजारों में पारंपरिक साड़ियाँ, गहने, थाली सजावट और मेहंदी की दुकानों पर महिलाओं की भीड़ देखी जा सकती है। दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, जयपुर और मुंबई जैसे शहरों के ब्यूटी पार्लरों में एडवांस बुकिंग फुल हो चुकी हैं।

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घर-घर सजी पान-सुपारी की थालियां, दशहरे पर निभाई जाती बुंदेलखंड की अनोखी परंपरा

बुंदेलखंड में दशहरा पर घर-घर सजती पान की दुकानें छतरपुर सहित ग्रामीण अंचलों में कायम है दशहरे की अनूठी परंपरा, मेल-मिलाप और भाईचारे का पर्व छतरपुर (मध्यप्रदेश)। बुंदेलखंड की धरती अपनी परंपराओं, लोक संस्कृति और अनोखे रीति-रिवाजों के लिए जानी जाती है। यहां दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व सामाजिक एकता, मेल-मिलाप और लोकनृत्य का अनोखा संगम भी है। छतरपुर और आसपास के ग्रामीण अंचलों में आज भी दशहरे पर घर-घर पान की थाल सजाने और लौंग भेंट करने की सदियों पुरानी परंपरा उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है “वीरा” दशहरे की शुरुआत गांव के मंदिरों और घरों में देवी-देवताओं की पूजा से होती है। ग्रामीण अपने घरों में विशेष थालियां सजाते हैं, जिनमें पान, सुपारी और पूजन सामग्री रखी जाती है। इसे “वीरा” कहा जाता है। मान्यता है कि देवी-देवताओं को यह अर्पण करने से गांव में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। स्थानीय ग्रामीण रामसिंह बताते हैं, “हमारे पुरखे भी यही परंपरा निभाते आए हैं। पहले तो पूरा गांव मिलकर देवताओं के सामने वीरा सजाता था। आज भी वही तरीका चल रहा है।” घर-घर सजी थालियां, पान-सुपारी से होता है स्वागत पूजन-अर्चना के बाद गांव की महिलाएं और बच्चे थालियां लेकर घर-घर जाते हैं। हर घर में पान और सुपारी से सजी थाल रखी होती है। महिलाएं घर के सदस्यों को तिलक लगाती हैं, गले मिलती हैं और पान खिलाकर शुभकामनाएं देती हैं। गांव की महिला ममता कुशवाहा बताती हैं, “बुंदेलखंड की यह सबसे प्यारी परंपरा है। हम जब एक-दूसरे के घर जाते हैं तो लगता है जैसे पूरा गांव एक परिवार है।” महिलाओं को “लौंग” देने का रिवाज इस दिन महिलाओं को लौंग भेंट करने की परंपरा भी खास मायने रखती है। इसे सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है। घर-घर जाकर महिलाएं लौंग ग्रहण करती हैं और इसे पूजा में भी इस्तेमाल करती हैं। स्थानीय बुजुर्ग सावित्री देवी कहती हैं, “लौंग देना और लेना केवल रस्म नहीं है, यह अपनत्व और आशीर्वाद का प्रतीक है। दशहरा का महत्व इसी से और बढ़ जाता है।” गांव के बीचों-बीच गूंजता है “बुंदेली दीवाली नृत्य” शाम होते ही गांव के बीचों-बीच बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। डीजे और ढोल-नगाड़ों की थाप पर “बुंदेली दीवाली नृत्य” शुरू होता है। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग मिलकर झूमते-गाते हैं। यह नृत्य दशहरे की रात गांव को उत्सव के रंग में डूबो देता है। युवक रवि अहिरवार बताते हैं, “हम हर साल इस दिन का इंतजार करते हैं। यहां सिर्फ नृत्य नहीं होता, बल्कि पूरा गांव एक साथ जश्न मनाता है। यही हमारी असली दीवाली है।” सामाजिक एकता और भाईचारे की मिसाल यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इसमें मेल-जोल, भाईचारा और सामाजिक एकता की झलक साफ दिखाई देती है। दशहरे का यह अनूठा रूप गांव में रिश्तों को मजबूत करता है और लोगों को जोड़ता है।

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दुर्गा पूजा में 'काबा-मदीना' की गूंज, बंगाल में सनातन पर चोट

दुर्गा पूजा में ‘काबा-मदीना’ की गूंज, बंगाल में सनातन पर चोट

दुर्गा पूजा में ‘काबा-मदीना’ की गूंज, बंगाल में सनातन पर चोट कोलकाता के भवानीपुर 75 पल्ली दुर्गा पूजा पंडाल में इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसने लाखों हिंदू समाज के लोगों को भीतर तक झकझोर दिया. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पंडाल का उद्घाटन किया, तालियां बजाईं. वहीं उनके करीबी नेता मदन मित्रा मंच पर गाते हुए कहा कि मेरे दिल में काबा है और आँखों में मदीना है. मुद्दे की बातअब सवाल ये उठता है कि दुर्गा पूजा जैसे सनातन पर्व पर इस तरह के गीतों का क्या काम? क्या ये जानबूझकर सनातन भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश नहीं है? क्या ये एक सांस्कृतिक अतिक्रमण नहीं है जहां देवी दुर्गा की आराधना के बीच इस्लामी प्रतीकों की बात की जा रही है? वोट के लिए आस्था से खिलवाड़ममता बनर्जी का ये कदम कोई पहली बार नहीं है. इससे पहले भी उन्होंने पितृ पक्ष के दौरान दुर्गा पूजा पंडालों का उद्घाटन कर हिंदू परंपराओं को नजरअंदाज किया था. जबकि शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में कोई नया कार्य या उत्सव शुरू करना अशुभ माना जाता है लेकिन बंगाल की राजनीति में वोट बैंक की मजबूरी शायद आस्था से बड़ी हो गई है. सबसे बड़ी चिंता की बात तो ये है कि इस सबके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती है. न कोई बड़ा संत बोलता है, न कोई संगठन सड़कों पर उतरता है. सोशल मीडिया पर कुछ लोग जरूर नाराजगी जताते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर विरोध न के बराबर है. पश्चिम बंगाल में सनातन धर्म ना के बराबरक्या बंगाल में सनातन धर्म अब सिर्फ एक मौन दर्शक बनकर रह गया है? क्या दुर्गा पूजा जैसे पर्व अब राजनीतिक मंच बनते जा रहे हैं जहां देवी की आराधना से ज़्यादा नेताओं की पीआर चलती है? इसे भी पढ़ें-अगर अब भी हम चुप रहे, तो आने वाले वर्षों में दुर्गा पूजा में देवी के स्थान पर कोई और प्रतीक खड़ा मिलेगा। ये समय है जागने का, बोलने का और अपनी आस्था की रक्षा करने का वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा.

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नवरात्रि 2025 भक्ति, उत्साह और परंपराओं का पर्व

नवरात्रि 2025 : भक्ति, उत्साह और परंपराओं का पर्व

आज से शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है। सुबह से ही देशभर के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। देवी मां की जयकारों से वातावरण गूंज उठा और जगह-जगह कलश स्थापना, दुर्गा पाठ और भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मान्यता है कि वे हिमालय की पुत्री हैं और शक्ति के आरंभिक स्वरूप के रूप में पूजित होती हैं। शुभ मुहूर्त में भक्तों ने घरों और मंदिरों में घटस्थापना की, वहीं व्रत रखने वाले श्रद्धालु उपवास और पूजा-अर्चना में लीन रहे। इस दिन का रंग सफेद माना गया है, जो निर्मलता और शांति का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को नवरात्रि की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह पर्व श्रद्धा, साहस और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। उन्होंने आशा जताई कि यह नवरात्रि देश को नई शक्ति और उमंग प्रदान करेगी। खास बात यह है कि इस बार नवरात्रि का आगाज जीएसटी सुधारों की घोषणा के साथ हुआ है। केंद्र सरकार ने “जीएसटी बचत उत्सव” की शुरुआत की है, जिससे आम जनता को रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों पर राहत मिलने की उम्मीद है। भक्ति और उत्साह के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने उपवास रखने वालों के लिए सावधानियाँ बरतने की सलाह दी है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार केवल पानी ही नहीं, बल्कि नारियल पानी, नींबू पानी, स्मूदी और मौसमी फलों के रस जैसे पेय पदार्थों का सेवन भी करना चाहिए ताकि शरीर में ऊर्जा बनी रहे और डिहाइड्रेशन की समस्या न हो। कई जगह पर “सात्विक आहार” के मेले और स्टॉल भी लगाए गए हैं ताकि व्रतधारी आसानी से उपयुक्त भोजन पा सकें। सोशल मीडिया पर नवरात्रि का क्रेज भी चरम पर है। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर गारबा और डांडिया की रिहर्सल के वीडियो वायरल हो रहे हैं। गूगल जेमिनी एआई से बने पारंपरिक परिधानों और नवरात्रि-थीम वाले सेल्फी ट्रेंड में हैं। युवा पीढ़ी उत्सव को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ रही है। वहीं, ज्योतिषाचार्यों और धार्मिक आचार्यों ने नौ दिनों के अनुष्ठान, देवी के स्वरूपों और उनसे जुड़ी मान्यताओं की जानकारी साझा की है। विभिन्न राज्यों में प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात के कड़े इंतज़ाम किए हैं। गुजरात और महाराष्ट्र में बड़े स्तर पर गारबा और डांडिया महोत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के मैहर में नवरात्रि के दौरान मांसाहार और शराब की बिक्री पर रोक लगाई गई है। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रमुख देवी स्थलों पर भीड़ नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है। नवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व भक्ति, अनुशासन और सकारात्मकता का संदेश देता है। लोगों की आस्था है कि मां दुर्गा की उपासना से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।

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Mahakal Ujjain

उज्जैन में क्यों निकलती है महाकाल की सवारी? जानिए सदियों पुरानी परंपरा और उसका धार्मिक रहस्य

धार्मिक नगरी उज्जैन को प्राचीन काल से ही शिव की नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग को बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। सावन के पावन महीने में जब पूरी धरती शिवमय हो जाती है, तब उज्जैन में महाकाल की सवारी एक ऐसा अद्भुत आयोजन होता है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से उमड़ पड़ते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि इस महाकाल की सवारी का धार्मिक महत्व क्या है? क्यों भगवान स्वयं नगर भ्रमण पर निकलते हैं? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक परंपरा और उसकी आस्था से जुड़ी गहराई को। महाकाल की सवारी क्या है? महाकाल की सवारी उज्जैन (Mahakal Ujjain) में सावन और भाद्रपद के विशेष सोमवारों को निकलने वाली एक पवित्र धार्मिक शोभायात्रा है। इस सवारी में भगवान महाकाल अपने विविध स्वरूपों—मनमहेश, चंद्रमौलेश्वर, भूतनाथ आदि—में नगर भ्रमण करते हैं। यह सवारी महाकाल मंदिर से निकलकर नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए रामघाट तक जाती है, जहां शिप्रा नदी में भगवान का अभिषेक किया जाता है। महाकाल की सवारी 2025: जानिए कब-कब निकलेंगी भव्य शोभायात्राएं  सावन मास में भगवान महाकाल की सवारी हर सोमवार को निकाली जाती है। वर्ष 2025 में यह सवारियां निम्नलिखित तिथियों को उज्जैन (Ujjain) नगर में श्रद्धा और भव्यता के साथ निकाली जाएंगी: महाकाल की सवारी का ऐतिहासिक महत्व (Mahakal Ki Sawari History) सावन और भाद्रपद के पावन महीनों में निकलने वाली महाकाल की यह विशेष सवारी एक प्राचीन धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जो आज भी पूरे श्रद्धा और विधि-विधान से निभाई जाती है। इतिहास के अनुसार, इस सवारी को भव्य रूप देने का श्रेय राजा भोज को जाता है। उनके शासनकाल में महाकाल की सवारी में नए रथों और हाथियों को सम्मिलित कर इसे एक राजसी शोभायात्रा का रूप दिया गया था। तब से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है और प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु इस दिव्य आयोजन में भाग लेते हैं। महाकाल की सवारी का आध्यात्मिक महत्व (Mahakal Sawari Significance) महाकाल की सवारी को अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन माना जाता है। इस अवसर पर भगवान महाकाल को रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता है। सवारी के दौरान भक्तगण ऊँचे स्वर में “जय महाकाल” के नारे लगाते हैं और ढोल-नगाड़ों की गूंज से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। इस भव्य यात्रा में तलवारबाज, घुड़सवार और अखाड़ों के साधु-संत भी भाग लेते हैं। यह सवारी महाकाल की शक्ति, साकार स्वरूप और नगर पर उनकी कृपा का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है, जो इसकी प्राचीनता और महत्व को प्रमाणित करता है। इसे भी पढ़ें:- सावन 2025: क्यों प्रिय है महादेव को बेलपत्र? जानिए इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा और महत्व सावन में क्यों होती है सवारी? सावन का महीना भगवान शिव (Lord Shiva) को अत्यंत प्रिय है। इस मास में की गई शिव उपासना, व्रत, अभिषेक और पूजन का फल अत्यधिक होता है। सावन के सोमवार और महाकाल की सवारी का संयोग भक्तों के लिए एक दुर्लभ अवसर होता है, जब वे स्वयं महाकाल के नगर भ्रमण और दर्शन का पुण्य प्राप्त करते हैं। यह विश्वास है कि महाकाल की सवारी में सम्मिलित होने से कष्टों का नाश, पापों से मुक्ति और कुल की उन्नति होती है। यही कारण है कि यह सवारी हर वर्ष भव्य रूप से श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली जाती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  #MahakalKiSawari #UjjainMahakal #LordShivaProcession #Sawan2025 #MahakalDarshan #SpiritualIndia

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Lord Shiva Puja Vidhi

सावन सोमवार 2025: शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय इन गलतियों से रहें सावधान, जानें सही विधि और शुभ मुहूर्त

सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत पावन और फलदायी माना जाता है। विशेष रूप से सावन के सोमवार को व्रत और जलाभिषेक करने से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं। भक्तगण इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, भस्म आदि अर्पित कर पूजन करते हैं। लेकिन कई बार श्रद्धा के साथ की गई पूजा भी अशुद्धियों और अनजाने में हुई गलतियों के कारण पूर्ण फल नहीं देती। इसलिए जरूरी है कि सावन सोमवार (Savan Somwar) के दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाए। शिवलिंग पर जल अर्पण की विधि (Lord Shiva Puja Vidhi) जब आप शिव मंदिर या घर में शिवलिंग की पूजा करने जाएं, तो पूजन स्थल पर उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों। पूजा में तांबे, पीतल या चांदी के लोटे में जल लेकर विधिपूर्वक अर्पण करें। सबसे पहले शिवलिंग के दाहिने भाग पर जल चढ़ाएं, जो गणेश जी का प्रतीक स्थान माना जाता है।इसके बाद बाएं भाग पर जल अर्पित करें, जो भगवान कार्तिकेय से संबंधित माना जाता है।फिर शिवलिंग के मध्य भाग में जल चढ़ाएं, जिसे अशोक सुंदरी (शिव-पार्वती की पुत्री) का स्थान कहा गया है।इसके बाद शिवलिंग के गोलाकार आधार पर जल चढ़ाएं, जिसे माता पार्वती के कर-स्पर्श जैसा माना जाता है।अंत में शिवलिंग के मुख्य ऊपरी भाग पर जल अर्पित करें, जो स्वयं भगवान शिव का प्रतीक होता है। मंत्र जाप का महत्व: पूरे जलाभिषेक के दौरान श्रद्धा भाव से “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते रहें। यह न केवल पूजा को पूर्ण बनाता है, बल्कि मन को भी एकाग्र और शुद्ध करता है, जिससे भगवान शिव की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। सावन में जलाभिषेक का शुभ समय (Sawan Somvar Puja Vidhi 2025) 1. ब्रह्म मुहूर्त:शिवलिंग पर जल अर्पण करने का सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त होता है, जो सूर्योदय से करीब डेढ़-दो घंटे पहले माना जाता है। यह समय आत्मिक शुद्धि, ध्यान और ईश्वर की साधना के लिए अत्यंत शुभ और प्रभावकारी माना गया है। 2. प्रातःकाल (सुबह 4 से 6 बजे):यदि ब्रह्म मुहूर्त में पूजा संभव न हो, तो सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच शिवलिंग पर जलाभिषेक करना भी अत्यंत लाभकारी होता है। इस समय शरीर, मन और वातावरण तीनों शुद्ध रहते हैं, जिससे पूजा में एक विशेष ऊर्जा और पवित्रता बनी रहती है। 3. सुबह 7:00 से 11:00 बजे तक:जो लोग बहुत जल्दी नहीं उठ पाते, उनके लिए सुबह 7 बजे से 11 बजे के बीच भी शिव पूजन करना शुभ माना जाता है। इस समय की गई पूजा यदि पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक की जाए, तो भगवान शिव अवश्य प्रसन्न होते हैं और भक्त को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इसे भी पढ़ें:- सावन 2025: क्यों प्रिय है महादेव को बेलपत्र? जानिए इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा और महत्व जल चढ़ाते समय न करें ये गलतियां नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें।Latest News in Hindi Today Hindi news  #SawanSomvar2025 #LordShivaBlessings #SawanVrat #ShivBhakti #MiraculousRemedie

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