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Ravan and the Stairs to Heaven

रावण और स्वर्ग की सीढ़ियां: अधूरी रह गई अमरता की खोज

रावण केवल लंका का महाराज या धनुर्धर नहीं था, बल्कि वह एक गहन साधक और विद्वान भी था। उसकी कहानी में एक बेहद रहस्यमय पहलू जुड़ा है: उसने स्वयं स्वर्ग तक पहुंचने के लिए पाँच सीढ़ियों का निर्माण किया था, लेकिन चौथी तक ही सीमित रह गया। इसे ही रावण की गलती माना जाता है। इस लेख में जानिए उन पाँच सीढ़ियों की जगहें और कैसे हर एक ने उसकी नियति में निर्णायक भूमिका निभाई। स्वर्ग की सीढ़ी का रहस्य: रावण की अधूरी अमरता की कहानी रावण की स्वर्ग की सीढ़ी बनाने की कहानी उसकी अमरता पाने की महत्वाकांक्षा से शुरू होती है। रावण अत्यंत विद्वान और तपस्वी था, लेकिन उसे अपने बल और शक्ति पर अत्यधिक घमंड था। उसने अपनी शक्तियों को और अधिक बढ़ाने तथा अमरता प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे एक वरदान दिया, लेकिन इसके लिए एक कठिन शर्त रखी। शिवजी ने कहा कि यदि रावण एक ही दिन में स्वर्ग तक जाने वाली पांच सीढ़ियां बना लेता है, तो वह अमर हो जाएगा। रावण ने तुरंत कार्य शुरू कर दिया और बड़ी तत्परता से सीढ़ियां बनाने लगा। लेकिन वह सिर्फ चार सीढ़ियां ही बना पाया, क्योंकि काम के दौरान ही उसे नींद आ गई और वह पांचवीं सीढ़ी का निर्माण नहीं कर सका। इस प्रकार, रावण का स्वर्ग जाने और अमरता प्राप्त करने का सपना अधूरा रह गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण (Ravan) द्वारा बनाई गई पहली सीढ़ी आज के उत्तराखंड स्थित हरिद्वार में मानी जाती है। यही कारण है कि यहां के प्रमुख घाट का नाम हर की पौड़ी पड़ा, जिसमें “पौड़ी” शब्द का अर्थ ही “सीढ़ी” होता है। यह स्थान हिंदुओं के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। हर की पौड़ी पर प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु स्नान करते हैं और गंगा आरती में भाग लेते हैं। सावन मास के दौरान यहां शिव भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो इसे और भी आध्यात्मिक रूप से विशेष बनाती है। इस प्रकार, रावण की अधूरी स्वर्ग यात्रा की यह कथा हमें यह सिखाती है कि चाहे कोई कितना भी बलवान और विद्वान क्यों न हो, यदि उसमें संयम और जागरूकता की कमी हो, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह सकता है। पौड़ीवाला मंदिर, सिरमौर (सीढ़ी 2) पौराणिक मान्यता के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित पौड़ीवाला वह स्थान है जहां रावण ने स्वर्ग तक पहुंचने के लिए दूसरी सीढ़ी का निर्माण किया था। यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां भगवान शिव (Lord Shiva) का एक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर भी स्थित है, जिसे पौड़ीवाला शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर का संबंध रामायण काल से है और कुछ धार्मिक ग्रंथों में भी इस प्रकार के मंदिर का उल्लेख मिलता है। इसी कारण, इस स्थान को रावण (Ravan) द्वारा निर्मित दूसरी सीढ़ी के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है। इस मंदिर में हर वर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं, खासकर वे लोग जो पौराणिक स्थलों और शिव भक्ति में रुचि रखते हैं। स्थानीय निवासियों के साथ-साथ दूर-दराज से भी भक्त यहां नियमित रूप से आते हैं, जिससे यह स्थान धार्मिक पर्यटन का भी एक अहम केंद्र बन गया है। चूड़ेश्वर महादेव (सीढ़ी 3) पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण (Ravan) ने स्वर्ग तक पहुंचने के लिए जिस तीसरी सीढ़ी का निर्माण किया था, वह हिमाचल प्रदेश के चूड़ेश्वर महादेव मंदिर में किया गया था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है, जिसे हिंदू श्रद्धालुओं के बीच विशेष धार्मिक महत्ता प्राप्त है। चूड़ेश्वर महादेव मंदिर हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित है और इसे रावण की तपस्या तथा शिवभक्ति से जुड़ा पौराणिक स्थल माना जाता है। यह स्थान न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले भक्तों के लिए भी आस्था का केंद्र बना हुआ है। धार्मिक यात्रा और आध्यात्मिक शांति की खोज में लगे श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर एक आदर्श गंतव्य है, जहां लोग शिव के दर्शन के साथ रावण की अधूरी अमरता की कथा से भी रूबरू होते हैं। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? किन्नर कैलाश (सीढ़ी 4) ऐसी मान्यता है कि रावण (Ravan) ने स्वर्ग की ओर जाने वाली चौथी सीढ़ी का निर्माण हिमाचल प्रदेश के किन्नर कैलाश में किया था। यह स्थान भगवान शिव और माता पार्वती का निवास स्थल माना जाता है और हिंदू श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। किन्नर कैलाश श्रृंखला हिमाचल के किन्नौर जिले में स्थित है। यहां एक 79 फीट ऊंचा शिवलिंग स्थित है, जिसकी खास बात यह है कि यह दिनभर में कई बार अपना रंग बदलता है, जिसे चमत्कारी और दिव्य माना जाता है। यह विशाल शिवलिंग पार्वती कुंड के समीप स्थित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण माता पार्वती ने स्वयं किया था। यह स्थल न केवल प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है, बल्कि आध्यात्मिक शांति और शिवभक्ति के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां हर साल सैकड़ों श्रद्धालु कठिन चढ़ाई के बावजूद दर्शन के लिए आते हैं और रावण की अधूरी स्वर्ग-यात्रा से जुड़ी इस प्राचीन कथा को भी जानने का प्रयास करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Ravan #ravan #heavenlystairs #immortality #mythology #ancientindia

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Can We Eat Prasad Offered on Shivling

क्या शिवलिंग पर चढ़ा प्रसाद खा सकते हैं? जानें शास्त्रों की मान्यताएं और नियम

हिंदू धर्म में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। विशेषकर सावन माह, प्रदोष व्रत, सोमवार व महाशिवरात्रि के दिन श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल आदि अर्पित करते हैं। लेकिन एक सवाल अक्सर भक्तों के मन में आता है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद (विशेषकर दूध, जल, फल आदि) क्या खाया जा सकता है या नहीं? क्या यह शुभ होता है या फिर इससे बचना चाहिए? आइए जानें भगवान शिव को अर्पित की गई पूजा सामग्री का क्या होता है महत्व? जानिए अभिषेक में चढ़े दूध, जल, भांग और बेलपत्र को खाने से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और उनके पीछे का तात्त्विक कारण।  शिवलिंग की पूजा और उसकी विशेषता शिवलिंग, भगवान शिव का निराकार रूप है और इसे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार का प्रतीक माना जाता है। शिवलिंग (Shivling) पर जलाभिषेक या दुग्धाभिषेक करना अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। इस प्रक्रिया को ‘अभिषेक’ कहा जाता है, जो कि भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का मुख्य साधन है। परंतु, प्रसाद के रूप में जो वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं, उनके उपयोग के कुछ विशिष्ट नियम भी शास्त्रों में दिए गए हैं। पौराणिक संदर्भ शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव के मुख से चण्डेश्वर नामक गण उत्पन्न हुए थे, जिन्हें भूत-प्रेतों का अधिपति माना जाता है। मान्यता है कि शिवलिंग पर अर्पित किया गया भोग या प्रसाद चण्डेश्वर को समर्पित होता है। इसी कारण यह विश्वास प्रचलित है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद भोजन के रूप में ग्रहण करना ऐसा है, जैसे भूत-प्रेतों का भोजन करना। इसलिए धार्मिक दृष्टिकोण से शिवलिंग पर चढ़े प्रसाद को खाने की मनाही होती है। मूर्ति पर अर्पित प्रसाद को किया जा सकता है ग्रहण धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चांदी, पीतल और तांबे जैसे धातुओं से बने शिवलिंग (Shivling) पर चढ़ाए गए प्रसाद को ग्रहण करना दोषरहित होता है। ऐसे प्रसाद को खाने से किसी प्रकार की बाधा नहीं होती। इसके अलावा, भगवान शिव (Lord Shiva) की प्रतिमा पर चढ़ाया गया प्रसाद भी शुभ और ग्रहणीय माना गया है। मान्यता है कि शिव मूर्ति पर अर्पित प्रसाद को श्रद्धापूर्वक सेवन करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। प्रसाद से जुड़ी महत्वपूर्ण सावधानियां शिवलिंग (Shivling) पर कुछ विशेष सामग्री चढ़ाना निषेध माना गया है, जिनमें तुलसी के पत्ते और हल्दी प्रमुख हैं। ऐसे पदार्थों को भगवान शिव को अर्पित नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, शिवलिंग पर अर्पित किए जाने वाले भोग को पीतल या चांदी जैसे पवित्र धातुओं से बने पात्र में रखना चाहिए। ध्यान रखें कि भोग को कभी भी सीधे भूमि पर न रखें। जब पूजा विधिवत पूर्ण हो जाए, तब उस प्रसाद को श्रद्धापूर्वक शिवलिंग के निकट से हटाना चाहिए। इससे धार्मिक मर्यादा बनी रहती है और पूजा सफल मानी जाती है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? प्रसाद से जुड़े आवश्यक नियम शिवलिंग (Shivling) पर कुछ विशेष वस्तुएं अर्पित करना वर्जित माना गया है, जिनमें तुलसी के पत्ते और हल्दी प्रमुख हैं। शिवलिंग को प्रसाद अर्पित करते समय इसे पीतल या चांदी जैसे पवित्र धातु के पात्र में रखकर ही चढ़ाना चाहिए। कभी भी प्रसाद को सीधे भूमि पर नहीं रखना चाहिए। पूजा संपन्न होने के बाद प्रसाद को शिवलिंग के समीप से उठाकर विधिपूर्वक अलग स्थान पर रखना चाहिए। इससे पूजा में शुद्धता बनी रहती है और धार्मिक नियमों का पालन भी होता है। बेलपत्र और धतूरा क्यों नहीं खाते? बेलपत्र भगवान शिव (Lord Shiva) को अत्यंत प्रिय है, लेकिन यह औषधीय गुणों से युक्त होते हुए भी आमतौर पर सेवन के योग्य नहीं माना गया है। वहीं धतूरा विषैला होता है और स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है। इसलिए ये पूजन सामग्री केवल पूजा तक ही सीमित रखी जाती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Shivling #shivling #prasad #hindubeliefs #shivpuja #spiritualrules #scripturalbeliefs #shivalinga #prasadrituals

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Sawan 2025

सावन 2025 में लगाएं ये पौधे, मिलेगी भोलेनाथ की कृपा

हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति और कृपा प्राप्ति के लिए विशेष महत्व रखता है। यह माह पूरे वर्ष में सबसे पवित्र महीनों में एक माना जाता है, जिसमें शिव भक्त पूरे समर्पण और श्रद्धा से उपवास, पूजा, जलाभिषेक और व्रत करते हैं। सावन के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने, बेलपत्र अर्पित करने के साथ-साथ कुछ खास पौधे लगाने की भी परंपरा है, जिन्हें धर्म, आयुर्वेद और वास्तु तीनों दृष्टिकोण से बेहद शुभ और कल्याणकारी माना गया है। आइए जानते हैं सावन 2025 (Sawan) में कौन-कौन से पौधे लगाने से न केवल बिगड़े काम बन सकते हैं, बल्कि भगवान शिव की कृपा भी आप पर बनी रहती है। 1. बेल का पौधा (Bel Tree) भगवान शिव (Lord Shiva) को बेल के पत्ते (बिल्व पत्र) अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। तीन पत्तियों वाला बेल पत्र शिवलिंग पर अर्पित करने से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन माह (Sawan) में घर के आंगन या बगीचे में बेल का पौधा लगाना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इसे लगाने से घर से दरिद्रता दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। वास्तु शास्त्र भी इसे शुभ मानता है, क्योंकि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाता है। 2. तुलसी का पौधा (Tulsi Plant) हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। भले ही तुलसी के पत्ते सीधे भगवान शिव को अर्पित नहीं किए जाते, लेकिन घर में तुलसी का पौधा लगाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। सावन के महीने में तुलसी का पौधा लगाकर नियमित रूप से उसकी पूजा करने से घर में सुख-शांति और धन-समृद्धि का वास होता है। 3. धतूरे का पौधा धतूरा उन प्रिय पुष्पों में से एक है जिन्हें भगवान शिव को अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन के पावन महीने में शिवलिंग पर धतूरा चढ़ाने से भगवान भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं। यदि आप अपने घर में धतूरे का पौधा लगाते हैं, तो यह शिव कृपा का प्रतीक माना जाता है। यह पौधा न केवल आर्थिक समृद्धि लाता है, बल्कि शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में भी सहायक होता है। 4. आक का पौधा (मदार) भगवान शिव को आक का पौधा विशेष रूप से प्रिय है, विशेषकर इसके सफेद फूल। सावन के महीने में आक का पौधा रोपण करना शुभ माना जाता है। इसे घर में लगाने से महादेव की कृपा बनी रहती है, जिससे परिवार में धन-धान्य में वृद्धि होती है। आक के फूल और पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाने से शिवजी प्रसन्न होते हैं और भक्त की इच्छाएं पूर्ण करते हैं। 5. शमी का पौधा (Shami Tree) शमी का पौधा भगवान शिव (Lord Shiva) के साथ-साथ शनिदेव को भी अत्यंत प्रिय है। इसे घर में लगाने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और वातावरण में शांति बनी रहती है। सावन के पावन महीने में शमी का पौधा लगाने से शिवजी की कृपा तो मिलती ही है, साथ ही शनिदेव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। मान्यता है कि इससे धन से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? घर में सकारात्मकता लाने वाला पौधा भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय हैं। यदि आप महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो सावन के महीने में अपने घर में बेलपत्र का पौधा अवश्य लगाएं और नियमित रूप से उसकी पूजा करें। इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बेलपत्र का पौधा लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और शिवजी को अर्पित करने पर भक्त को उत्तम फल प्राप्त होते हैं। इस पौधे को घर की उत्तर या दक्षिण दिशा में लगाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। हर इच्छा होगी पूरी सनातन धर्म में शमी के पौधे को अत्यंत पावन और फलदायी माना गया है। सावन (Sawan) के पवित्र माह में यदि इस पौधे को घर में लगाया जाए, तो परिवार के सभी सदस्यों पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है और नकारात्मकता दूर होती है। पूजा के समय महादेव को शमी की पत्तियां अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Shiva #sawan2025 #lordshiva #sacredplants #shivbhakti #hindufestivals #plantforpositivity #shivpooja

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Shri Ram Mandir Ayodhya

Shri Ramayana Yatra Tour Package: IRCTC की ‘श्री रामायण यात्रा’

बारिश के मौसम में अगर आप कहीं घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन (IRCTC) आपके लिए एक बेस्ट ट्रेवल पैकेज लेकर आया है। IRCTC द्वारा इस वर्ष श्री रामायण यात्रा नाम की विशेष ट्रेन टूर पैकेज (Shri Ramayana Yatra Tour Package) का आयोजन किया जा रहा है, जो धार्मिक आस्था से जुड़े लोगों के लिए एक सुनहरा अवसर है। यह यात्रा 25 जुलाई 2025 से शुरू होगी और कुल 17 दिनों की होगी, जिसमें देशभर के 30 प्रमुख धार्मिक स्थलों की यात्रा कराई जाएगी। आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा  श्री राम मंदिर अयोध्या (Shri Ram Mandir Ayodhya) के उद्घाटन के बाद से ही धार्मिक पर्यटन को देशभर में जबरदस्त गति मिली है। IRCTC भी धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयासरत है और यह  श्री रामायण यात्रा नाम की विशेष ट्रेन टूर पैकेज (Shri Ramayana Yatra Tour Package) उसी का हिस्सा है। यह पांचवीं बार है जब यह विशेष यात्रा आयोजित की जा रही है। इसके माध्यम से रामभक्तों को भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) के जीवन से जुड़े विभिन्न स्थलों का दर्शन करने का अवसर मिलेगा। यात्रा का मार्ग और प्रमुख स्थल श्री रामायण यात्रा (Shri Ramayana Yatra) की शुरुआत दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन से होगी और यह भारत गौरव डीलक्स एसी पर्यटक ट्रेन से संचालित की जाएगी। ट्रेन अयोध्या से होकर नंदीग्राम, सीतामढ़ी, जनकपुर, बक्सर, वाराणसी, प्रयागराज, चित्रकूट, नासिक, हम्पी और रामेश्वरम होते हुए  फिर दिल्ली लौटेगी। ट्रेन में मिलने वाली सुविधाएं भारत गौरव डीलक्स एसी पर्यटक ट्रेन को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया गया है। इसमें दो रेस्टोरेंट, एक एडवांस  किचन, कोच में शॉवर क्यूबिकल, सेंसर आधारित वॉशरूम, फुट मसाजर, CCTV कैमरा, और सुरक्षा गार्ड की सुविधा उपलब्ध है। यात्रियों के आराम और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया है। पैकेज शुल्क और व्यवस्थाएं इस रामायण यात्रा टूर के लिए विभिन्न श्रेणियों के अनुसार किराया तय किया गया है: इस पैकेज में यात्रियों को 3-स्टार होटलों में ठहरने की व्यवस्था, शुद्ध शाकाहारी भोजन, दर्शनीय स्थलों पर ले जाने की सुविधा और यात्रा बीमा भी शामिल है। यह टूर पूरी तरह से सुविधाजनक है, जिसमें यात्रियों को किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं हो सकती है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? क्यों है यह यात्रा खास? श्री रामायण यात्रा (Shri Ram Mandir Ayodhya) न केवल धार्मिक आस्था को बल देती है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक विरासत को जानने का एक अद्भुत अवसर भी प्रदान करती है। यह यात्रा उन लोगों के लिए आदर्श है जो भगवान राम के जीवन से जुड़े स्थलों को स्वयं जाकर अनुभव करना चाहते हैं। इसके माध्यम से यात्रियों को यह समझने का मौका मिलता है कि रामायण केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक अहम हिस्सा है। अगर आप इस मानसून में कुछ अलग, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो IRCTC की श्री रामायण यात्रा (Shri Ramayana Yatra) आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है। यह यात्रा न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह एक यादगार और समृद्ध अनुभव भी है जो जीवन भर आपके साथ रहेगा। टिकट जल्दी भरने की संभावना है, इसलिए यदि आप इस यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो जल्द से जल्द अपनी सीट आरक्षित करा लेना बेहतर रहेगा। Latest News in Hindi Today Hindi news Shri Ram Mandir Ayodhya #ShriRamayanaYatra #IRCTCTourPackage #RamayanaCircuit #SpiritualTour #RamayanaTrain

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Ashadha Purnima 2025

आषाढ़ पूर्णिमा 2025: पुण्य, व्रत और श्रद्धा का पावन अवसर

आषाढ़ पूर्णिमा हिंदू धर्म में धार्मिक एवं आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। इसे गुरु पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, सत्यनारायण पूजन का दिन और गोपद्म व्रत (गोपद्म उपवास) का अवसर भी कहा जाता है। आओ इस वर्ष की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजन-व्रत-कर्म की सम्पूर्ण जानकारी जानते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा कब है – तिथि एवं समापन दृक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2025 में आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का आरंभ 10 जुलाई को तड़के 1 बजकर 36 मिनट पर होगा और इसका समापन 11 जुलाई को सुबह 2 बजकर 06 मिनट पर होगा। चूंकि उदया तिथि और चंद्रोदय दोनों 10 जुलाई को ही पड़ रहे हैं, इसलिए इस दिन को ही आषाढ़ पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा के रूप में मान्यता दी गई है। 10 जुलाई को ही होंगे व्रत, स्नान और दान इस वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा का व्रत, पवित्र स्नान और दान—all धार्मिक कृत्य—10 जुलाई, गुरुवार को ही संपन्न किए जाएंगे। पंचांग के अनुसार, जब पूर्णिमा तिथि का सूर्योदय और चंद्रोदय एक ही दिन में होते हैं, तो व्रत और सभी पुण्य कार्य उसी दिन किए जाते हैं। ऐसे में 10 जुलाई को श्रद्धालुओं को व्रत रखने के साथ-साथ गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कर दान करने की परंपरा निभानी चाहिए। शुभ मुहूर्त – स्नान, दान और पूजा के लिए समय आषाढ़ पूर्णिमा (गोपद्म) के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:10 बजे से लेकर 4:50 बजे तक रहेगा। शास्त्रों में इस समय को स्नान और पूजा के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इस समय पवित्र नदियों में स्नान करना विशेष फलदायी होता है। यदि इस अवधि में स्नान करना संभव न हो तो सूर्योदय के बाद भी स्नान कर सकते हैं। इस दिन का अभिजीत मुहूर्त, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है, दोपहर 11:59 बजे से लेकर 12:54 बजे तक रहेगा। इस अवधि में आप पूजा, व्रत संकल्प, दान या अन्य पुण्य कार्य कर सकते हैं। रात्रि समय का निशिता मुहूर्त, जो रात्रि में पूजा-अर्चना के लिए उपयुक्त होता है, रात 12:06 बजे से 12:47 बजे तक रहेगा। इस समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। आषाढ़ पूर्णिमा 2025: चंद्रोदय का समय और भद्रा की स्थिति इस वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन, यानी 10 जुलाई 2025 को, चंद्रमा का उदय शाम 7 बजकर 20 मिनट पर होगा। जो श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, उन्हें चंद्रमा के पूर्ण रूप से आकाश में उदित होने के बाद चंद्र पूजन और अर्घ्य अर्पण करना चाहिए। माना जाता है कि चंद्रमा की रोशनी में अर्घ्य देने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। वहीं, भद्रा काल की बात करें तो आषाढ़ पूर्णिमा के दिन भद्रा सुबह 5:31 बजे से दोपहर 1:55 बजे तक रहेगी। हालांकि यह भद्रा पाताल लोक में रहेगी, इसलिए इसका कोई अशुभ प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस दौरान पूजा-पाठ, व्रत, स्नान और दान आदि सभी धार्मिक कार्य बिना किसी विघ्न के किए जा सकते हैं। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? आषाढ़ पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व आषाढ़ पूर्णिमा (गोपद्म) का दिन आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन करने से घर में सुख-शांति और सौहार्द बना रहता है। रात्रि के समय माता लक्ष्मी की विधिवत आराधना करने से घर में धन, वैभव और समृद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही, इस दिन चंद्रमा की पूजा करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और कुंडली में मौजूद चंद्र दोष का प्रभाव भी कम होता है। यह तिथि गुरु पूर्णिमा के रूप में भी जानी जाती है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसी कारण इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है और गुरुओं की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त, आषाढ़ पूर्णिमा पर कोकिला व्रत रखने की परंपरा है, जो विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। इस दिन गौरी व्रत का समापन भी होता है, जो विवाहित स्त्रियों द्वारा सौभाग्य और परिवार की मंगलकामना के लिए रखा जाता है। इस प्रकार, आषाढ़ पूर्णिमा धार्मिक अनुष्ठानों और अध्यात्म के लिए अत्यंत पुण्यदायी दिन माना जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi news गोपद्म #AshadhaPurnima2025 #GuruPurnima2025 #FullMoonVrat #SpiritualSignificance #HinduFestivals #AshadhaMonth #ReligiousRituals #PurnimaCelebration

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Patal Bhuvaneshwar

पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर: कलियुग के अंत का रहस्यमय संकेत और ब्रह्मांड की गुप्त शक्ति

भारत अपनी आध्यात्मिक विरासत और अनगिनत रहस्यमय स्थलों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर भी ऐसा ही एक अद्भुत धार्मिक स्थल है, जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसे कलियुग के अंत का संकेतक भी माना जाता है। यह मंदिर अपने अंदर ब्रह्मांड के गहरे रहस्यों को समेटे हुए है और भक्तों के लिए एक अनोखी आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम है।  पाताल भूवनेश्वर गुफा मंदिर का परिचय पाताल भुवनेश्वर मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है, जो गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक प्राचीन और रहस्यमयी भूमिगत गुफा मंदिर है। यह मंदिर अपनी रहस्यमयी बनावट और पौराणिक मान्यताओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। गुफा की लंबाई लगभग 160 मीटर और गहराई करीब 90 फीट है, जिसमें प्रवेश करने के लिए एक तंग और संकरा रास्ता पार करना होता है। कलियुग के अंत का संकेत पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पाताल भूवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) में छिपे प्रतीक और संरचनाएं कलियुग के अंत का संकेत देती हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही प्रवेश द्वार पर शेषनाग की विशाल आकृति नजर आती है, जिनके बारे में स्थानीय मान्यता है कि उनके फन पर ही पूरी पृथ्वी टिकी हुई है। यहाँ एक प्रचलित धारणा यह भी है कि यह स्थान स्वयं भगवान शिव का निवास स्थान रहा है। गुफा के अंदर प्राकृतिक रूप से निर्मित चट्टानी संरचनाएँ और रहस्यमय आकृतियाँ सनातन धर्म की प्राचीन मान्यताओं और पौराणिक कथाओं को साकार करती प्रतीत होती हैं, जो इस स्थान को और भी रहस्यमय बना देती हैं। गुफा के अंदर की अनोखी विशेषताएं गुफा के भीतर बनी प्राकृतिक आकृतियों को भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक रूप में माना जाता है। जनश्रुति है कि इसी स्थान पर भगवान शिव ने भगवान गणेश का सिर काटा था और यहीं सप्तऋषियों ने कठोर तपस्या की थी। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस गुफा में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है, जिनकी आकृतियाँ चट्टानों में स्पष्ट रूप से नजर आती हैं। गुफा के एक हिस्से को यमराज के न्याय दरबार के रूप में जाना जाता है, जहाँ आत्माओं के पाप और पुण्य का लेखा-जोखा किया जाता है। इसके अलावा, एक विशेष चट्टान पर कल्पवृक्ष की आकृति भी उकेरी हुई है, जिसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग का प्रतीक माना जाता है। रहस्यमय और अद्भुत कथाएं पाताल भुवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) से जुड़ी कुछ रहस्य ऐसी हैं, जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझा सका। मान्यता है कि इस गुफा में स्वर्ग, नरक, मोक्ष और पाप के चार द्वार स्थित हैं। यहां शेषनाग की एक विशाल प्राकृतिक आकृति भी दिखाई देती है, जिसके फनों पर पृथ्वी टिकी हुई मानी जाती है। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां एक साथ 33 देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं। गुफा के भीतर भगवान गणेश का सिर भी मौजूद है, जिस पर ब्रह्म कमल की पवित्र बूंदें टपकती रहती हैं। साथ ही यहां एक शिवलिंग भी स्थापित है, जो निरंतर आकार में बढ़ रहा है। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह शिवलिंग गुफा की छत से टकरा जाएगा, उस दिन दुनिया का अंत हो जाएगा। इसे भी पढ़ें:- शिव-शनि की पूजा से कटते हैं सारे ग्रहदोष कैसे पहुंचें पाताल भूवनेश्वर मंदिर? अगर आप पाताल भुवनेश्वर मंदिर (Patal Bhuvaneshwar Temple) के दर्शन करने की योजना बना रहे हैं तो जान लें कि वहां तक पहुंचने का रास्ता काफी कठिन है। गुफा में आसानी से प्रवेश करने के लिए दोनों ओर लोहे की चैन लगाई गई है। लेकिन श्रद्धालुओं का कहना है कि जिस तरह गुफा में प्रवेश करना चुनौतीपूर्ण है, उसी तरह बाहर निकलना भी उतना ही मुश्किल होता है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित यह मंदिर पर्वतीय क्षेत्र में है। नजदीकी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, जबकि हवाई मार्ग से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पिथौरागढ़ है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्तों से होकर जाना होता है, जो प्राकृतिक दृश्यों से भरे हुए हैं। Latest News in Hindi Today Hindi Patal Bhuvaneshwar Temple #patalbhuvaneshwar #kaliyugaend #mysterytemple #hindumythology #cosmicpower #hiddenindia #cavetemple #spiritualindia

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Sawan Saturday

सावन का शनिवार: शिव-शनि की पूजा से कटते हैं सारे ग्रहदोष

हिंदू धर्म में सावन माह को अत्यंत पवित्र और शुभ माना गया है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है और पूरे भारत में विशेष रूप से उत्तर भारत में सावन के सोमवार को व्रत, पूजा और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व होता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सावन (Sawan) के शनिवार भी उतने ही फलदायी माने गए हैं, विशेषकर शनि दोष, साढ़ेसाती और कालसर्प दोष जैसे प्रभावों को शांत करने के लिए। स्कन्द पुराण में वर्णित है कि सावन महीने के शनिवार को भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त पूजा करने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और अन्य दोष शांत होते हैं। श्रद्धा और विधिपूर्वक की गई यह पूजा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है। इस परंपरा का उल्लेख स्कन्द पुराण में मिलता है, जिसमें भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त पूजा से संबंधित रहस्य और लाभ बताए गए हैं। स्कन्द पुराण का संदर्भ प्राचीन हिंदू ग्रंथ स्कन्द पुराण, जो कि सबसे बड़े पुराणों में गिना जाता है, उसमें यह बताया गया है कि सावन के महीने में शनिवार के दिन भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त आराधना करने से जन्मपत्रिका में मौजूद कई दोष दूर होते हैं। शनि ग्रह को न्याय का देवता कहा गया है, जो मनुष्य को उसके कर्मों के आधार पर फल देते हैं। वहीं भगवान शिव, (Lord Shiva) त्रिपुरांतक और संहारकर्ता होने के साथ-साथ करुणा और क्षमा के भी प्रतीक हैं। सावन में शनि और शिव की संयुक्त पूजा का महत्व हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव (Lord Shiva) को शनिदेव का गुरु माना गया है। यही कारण है कि शिवजी ने शनिदेव को कर्मों के आधार पर न्याय देने का दायित्व सौंपा था। ऐसे में श्रावण मास (Sawan) के दौरान जो भी भक्त शिव के साथ-साथ शनिदेव की आराधना करता है, उसे विशेष शुभ फलों की प्राप्ति होती है। यह भी मान्यता है कि भगवान शिव के अवतार—पिप्पलाद, भैरव और रुद्र रूप में हनुमान जी की पूजा करने से शनिदेव के अशुभ प्रभाव से सुरक्षा मिलती है। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल के वृक्ष के शीर्ष भाग में भगवान शिव (Lord Shiva) का निवास होता है, और इसी वृक्ष में शनिदेव भी वास करते हैं। इसलिए सावन के महीने में दोनों देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पीपल के पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है। लिंग पुराण के अनुसार, शनिवार के दिन पीपल को स्पर्श करने से आयु में वृद्धि होती है। इस दिन भक्तों को प्रातःकाल स्नान करके पीपल के वृक्ष को नमस्कार करना चाहिए, फिर दोनों हाथों से वृक्ष को छूकर 108 बार “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करना चाहिए। ऐसा करने से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसे भी पढ़ें:- Govt Warns Online Shoppers: सरकार की यह सलाह नहीं मानने पर अपना सबकुछ गँवा सकते हैं ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले श्रावण शनिवार को शनि देव की पूजा और दान का महत्व श्रावण मास (Sawan) के किसी भी शनिवार को जब भक्त शनिदेव की विशेष पूजा करते हैं, तो जीवन में शनि से जुड़ी बाधाएं और कष्टों का निवारण होता है। इस दिन किसी शनि मंदिर में जाकर शनिदेव की प्रतिमा का तिल के तेल से अभिषेक करना शुभ माना जाता है। इसके पश्चात उन्हें नीले रंग के पुष्प और शमी के पत्ते अर्पित करें। पूजा के दौरान शनिदेव को तेल का दीपक और धूप दिखाकर श्रद्धा से प्रणाम करें। भक्त शनिदेव को उड़द की दाल और चावल से बनी खिचड़ी का भोग भी अर्पित करते हैं। पूजा पूर्ण होने के बाद एक काले कपड़े में उड़द की दाल, काले तिल, खाने का तेल और कुछ धन राशि रखकर किसी योग्य ब्राह्मण को दान देना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसके अतिरिक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जूते-चप्पल, पलंग अथवा बिछावन जैसे वस्त्र या सामग्री भी दान की जा सकती है। शिवपुराण की शतरुद्र संहिता में वर्णित है कि शनिदेव की पूजा के पश्चात विश्वामित्र, पिप्पलाद मुनि तथा उनके पिता गाधि ऋषि का ध्यान कर उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करना चाहिए। ऐसा करने से शनिदेव की कृपा बनी रहती है और जीवन में शनि दोष का प्रभाव कम हो जाता है। Latest News in Hindi Today Hindi Sawan #sawansaturday #shivshanipuja #grahdoshremedy #shanidevblessings #lordshivapuja

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Devshayani Ekadashi 2025

देवशयनी एकादशी 2025: किस्मत को जगाने वाला पर्व, जानिए कब, कहां और क्यों जलाएं दीपक

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 5 जुलाई 2025 को शाम 6 बजकर 58 मिनट पर होगा, जबकि इसका समापन 6 जुलाई की रात 9 बजकर 14 मिनट पर होगा। चूंकि हिन्दू धर्म में तिथि की गणना सूर्योदय से होती है, इसलिए देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) 6 जुलाई को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखेंगे और भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करेंगे। व्रत का पारण 7 जुलाई की सुबह 5:29 से 8:16 बजे के बीच किया जाएगा। पारण से पूर्व स्नान-ध्यान कर विधिवत पूजन करें और अन्न, वस्त्र या धन का दान करके व्रत का समापन करें। देवशयनी एकादशी: शुभ योग ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन अनेक शुभ योगों का संयोग बन रहा है। इस तिथि पर साध्य योग रात 9 बजकर 27 मिनट तक प्रभावी रहेगा, जिसके बाद शुभ योग आरंभ होगा। इन पावन योगों में लक्ष्मी-नारायण की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त इस दिन त्रिपुष्कर योग और रवि योग का संयोग भी बन रहा है, जो इसे और अधिक फलदायी बनाते हैं। इन योगों में किया गया व्रत और पूजन साधक को विशेष आध्यात्मिक लाभ एवं कार्यों में सफलता प्रदान करता है। घर में दीपक जलाने के 5 प्रमुख स्थान तुलसी के समीप दीपदान तुलसी का पौधा भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को अत्यंत प्रिय है। देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi)की संध्या के समय तुलसी के पास गाय के शुद्ध घी से दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में समृद्धि व धन-संपत्ति का वास होता है। मुख्य द्वार पर दीप जलाना इस दिन घर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह उपाय घर की नकारात्मकता को दूर करता है और वातावरण को शुद्ध करता है, जिससे घर में सुख और शांति बनी रहती है। पूजा स्थल में अखंड दीप भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और मां लक्ष्मी की मूर्तियों या चित्रों के समक्ष अखंड दीपक जलाने का विधान है। यह दीपक पूरी रात जलना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है और परिवार को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पीपल के नीचे दीपदान पीपल के वृक्ष में देवताओं और पितरों का वास माना जाता है। इस पवित्र दिन सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना श्रेयस्कर होता है। इससे पितृदोष शांत होता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। रसोई में दीपक जलाएं  रसोई को देवी अन्नपूर्णा का स्थान माना गया है। इसलिए रसोई में भी दीपक जलाना शुभ होता है। मान्यता है कि इससे घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती और गृह लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। इसे भी पढ़ें:- Govt Warns Online Shoppers: सरकार की यह सलाह नहीं मानने पर अपना सबकुछ गँवा सकते हैं ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले पूजा-विधि  देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) के दिन भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है और इस व्रत की पूजा विधि बेहद सरल है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर में पूजा स्थल को साफ-सुथरा कर लें और वहां भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद देसी घी या गाय के घी का दीपक जलाएं। पूजा में तुलसी पत्र, हरे पुष्प, पंचामृत, फल और मीठी वस्तुएं अर्पित करें।  व्रत के दौरान पुण्य लाभ की दृष्टि से अन्न, वस्त्र, दीपक या अन्य आवश्यक वस्तुएं जरूरतमंदों को दान करें। चूंकि इस दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है, अतः इस अवधि में मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि वर्जित माने जाते हैं। इसलिए संयमित जीवनशैली अपनाना और नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। रात्रि में विशेष पूजा विधान के तहत भगवान विष्णु को पीले वस्त्र और पीली चीजें जैसे चने की दाल या केले अर्पित करें। फिर मंत्रों का जाप करें और आरती करें। पूजा के अंत में यह विशेष मंत्र बोलना चाहिए “सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्, विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम्।” इस मंत्र का भाव यह है कि जब भगवान जगन्नाथ विश्राम करते हैं तो पूरा जगत विश्राम करता है, और जब वे जागते हैं तो सृष्टि भी जागृत हो जाती है। Latest News in Hindi Today Hindi Devshayani Ekadashi #devshayaniekadashi2025 #ekadashirituals #hindufestival #diwalighting #vishnu #auspiciousday #spiritualawakening

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miraculous Shakambhari Mata Temple

राजस्थान में स्थित शाकंभरी माता का चमत्कारी मंदिर: जहां आस्था बनती है शक्ति का प्रतीक

राजस्थान के सीकर जिले में स्थित शाकंभरी देवी का मंदिर न केवल धार्मिक विश्वास का केंद्र है, बल्कि चमत्कारिक अनुभवों और रहस्यमयी घटनाओं का भी साक्षी है। कहते हैं, यहां जो भी भक्त सच्चे दिल से अपनी इच्छा प्रकट करता है, उसकी हर मुराद अवश्य पूरी होती है। राजस्थान की रेतीली धरती पर जहां एक ओर वीरता और इतिहास की कहानियां बिखरी पड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर श्रद्धा और आस्था के केंद्र भी उतने ही शक्तिशाली हैं। इन्हीं में से एक है, शाकंभरी माता का मंदिर, जो न केवल अपनी आध्यात्मिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपने रहस्यमयी इतिहास और चमत्कारी अनुभवों के लिए भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। कहां स्थित है यह मंदिर? शाकंभरी माता (Shakambhari Mata) का यह अद्भुत और चमत्कारी मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले के उदयपुरवाटी क्षेत्र में स्थित है, जो प्रसिद्ध खाटू श्याम जी मंदिर के पास और लोहार्गल तीर्थ क्षेत्र के नजदीक पड़ता है। शाकंभरी माता का यह दिव्य मंदिर 2500 वर्षों से भी अधिक प्राचीन माना जाता है। इसका ऐतिहासिक संबंध चौहान वंश के शासकों से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना चौहान राजाओं ने ही करवाई थी। प्राचीन काल में सांभर झील के आसपास का इलाका चौहान वंश की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है, जहां तक पहुंचने के लिए भक्तों को कई सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। कहा जाता है कि जैसे-जैसे कोई श्रद्धालु सीढ़ियां चढ़ता है, उसकी सभी चिंताएं पीछे छूटती जाती हैं और मन मां के चरणों में रम जाता है। कौन हैं शाकंभरी माता? शाकंभरी माता (Shakambhari Mata) को मां दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। संस्कृत शब्द ‘शाक’ का अर्थ होता है सब्जियां या शाकाहारी भोजन और ‘भरणी’ का अर्थ है भरण-पोषण करने वाली। शाकंभरी देवी वही हैं जिन्होंने अपने भक्तों को भयंकर अकाल के समय में शाक, फल, कंद-मूल और वनस्पतियों से जीवनदान दिया था। इसलिए उन्हें “वन की देवी” और “भोजन दायिनी” भी कहा जाता है। सांभर झील से जुड़ा चमत्कार  मान्यता है कि मां शाकंभरी ने कभी सांभर क्षेत्र के जंगलों को चांदी के खेतों में बदल दिया था। इससे लोगों में लोभ और संघर्ष बढ़ने लगा, और आपसी कलह उत्पन्न हो गई। जब यह वरदान लोगों के लिए संकट का कारण बन गया, तो सभी ने देवी से प्रार्थना की। तब माता ने कृपा कर चांदी को नमक में परिवर्तित कर दिया, जिससे आज की सांभर झील अस्तित्व में आई।  इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? यहां अन्न-जल की कभी नहीं होती कमी शाकंभरी माता (Shakambhari Mata) मंदिर को लेकर क्षेत्र में कई मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहां मां के दर्शन करता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। विशेष मान्यता है कि यदि कोई श्रद्धालु मां के दरबार में सात परिक्रमा करता है, तो उसके घर में कभी भी अन्न और जल की कमी नहीं होती। नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन हेतु उमड़ते हैं। मां शाकंभरी देती हैं बिना मांगे वरदान देशभर के कोने-कोने से पहुंचे भक्तों का मानना है कि वे वर्षों से मां शाकंभरी (Shakambhari Mata) के दर्शन के लिए आते रहे हैं। कुछ श्रद्धालुओं का कहना है कि मां की कृपा से उन्हें बिना मांगे ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है, और जब मनोकामना पूरी हो जाती है तो वे आकर प्रसाद अर्पित करते हैं। कई भक्त बताते हैं कि बचपन से ही उनका मां शाकंभरी के प्रति अटूट विश्वास रहा है और मां की कृपा से उनके सभी कार्य सफल होते हैं। हर वर्ष नवरात्रि के अवसर पर मां की विधिवत पूजा के साथ विशाल भंडारा आयोजित किया जाता है। वहीं, कुछ श्रद्धालु यहां से अखंड ज्योत लेकर अपने घरों में जगराता करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Shakambhari Mata #shakambharimata #rajasthantemple #miraculoustemple #shakambharidevi #divinepower #indiantemples #spiritualindia #templeofmiracles

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Garuda Purana Warning

गरुड़ पुराण की चेतावनी: मृतक की इन वस्तुओं का न करें उपयोग, वरना जीवन भर भुगतना पड़ सकता है पितृ दोष

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद की प्रक्रिया को अत्यंत पवित्र और संवेदनशील माना गया है। अंतिम संस्कार से लेकर श्राद्धकर्म तक की सभी विधियाँ न केवल धार्मिक, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसी विषय पर विस्तार से जानकारी मिलती है गरुड़ पुराण (Garud Puran) में, जो कि हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह पुराण न केवल मृत्यु के बाद की यात्रा, नरक-स्वर्ग के वर्णन और कर्मफल की व्याख्या करता है, बल्कि यह भी बताता है कि मृत व्यक्ति की किन वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए। गरुड़ पुराण (Garud Puran) में स्पष्ट कहा गया है कि यदि किसी मृत व्यक्ति की कुछ विशेष वस्तुओं को जीवित लोग उपयोग में लाते हैं, तो उन्हें पितृ दोष का सामना करना पड़ सकता है। हिंदू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में बताया गया है कि मृत्यु के बाद किन वस्तुओं का उपयोग वर्जित है। इन नियमों का पालन न करने पर घर में अशांति, आर्थिक तंगी और रोगों का डेरा बन सकता है। आइए विस्तार से जानें कि वो कौन-सी वस्तुएं हैं जिन्हें भूलकर भी मृत व्यक्ति के बाद इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 1. मृतक के वस्त्र (कपड़े) धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत व्यक्ति के कपड़ों में उसकी ऊर्जा शेष रहती है, इसलिए इन्हें पहनना अशुभ माना जाता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से ऐसे वस्त्रों के प्रयोग से बचने की सलाह दी गई है। ऐसे में सबसे उचित यह होता है कि इन कपड़ों को किसी जरूरतमंद या गरीब व्यक्ति को दान कर दिया जाए, जिससे न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि मृतात्मा को भी शांति मिलती है। 2. मृतक की चप्पल और जूते गरुड़ पुराण (Garud Puran) के अनुसार, मृत व्यक्ति के जूतों का इस्तेमाल करने से जीवन में पितृ दोष उत्पन्न हो सकता है। यह माना जाता है कि ऐसी वस्तुएं मृतात्मा से जुड़ी ऊर्जा को संजोए रखती हैं, और उनका उपयोग करने से व्यक्ति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए मृतक के जूते या चप्पलों को पहनने से पूरी तरह बचना चाहिए। 3. बिछावन और तकिए मृत व्यक्ति का सोने का स्थान, जैसे उसका बिस्तर या तकिया, उसकी अंतिम ऊर्जा और इच्छाओं को अपने भीतर समेट लेता है। ऐसे स्थान पर सोना मानसिक अस्थिरता, भय और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है। इसलिए इन वस्तुओं का त्याग करना ही उचित और सुरक्षित माना जाता है। 4. मृत व्यक्ति की तस्वीरों का अत्यधिक प्रदर्शन कई लोग अपने घरों में मृतक की तस्वीर को बड़े फ्रेम में लगाकर पूजा स्थल या बेडरूम में रखते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत व्यक्ति की तस्वीर को पूजा घर में रखना उचित नहीं होता क्योंकि इससे पितरों की आत्मा मोह में फंस सकती है और मुक्ति में बाधा आती है। उनकी तस्वीर को एक शांत स्थान पर सम्मानपूर्वक रखें, लेकिन उसकी पूजा न करें। 5. मृतक की अंगूठी या आभूषण यदि किसी मृत व्यक्ति ने अपने जीवन में कोई अंगूठी, हार या अन्य आभूषण धारण किए थे, तो उनका उपयोग बिना शुद्धिकरण के नहीं किया जाना चाहिए। चश्मा, घड़ी, अंगूठी जैसी धातु की वस्तुएं ऊर्जा को संचित करने की क्षमता रखती हैं। यदि ये वस्तुएं मृतक द्वारा पहनी गई हों, तो उनमें उसकी अधूरी इच्छाओं और जीवन ऊर्जा का प्रभाव बना रह सकता है। इन्हें पहनने से व्यक्ति के जीवन में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं, साथ ही मानसिक भय और प्रगति में रुकावट का अनुभव हो सकता है। इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? पितृ दोष के लक्षण Latest News in Hindi Today Hindi news Garud Puran #garudapurana #pitrudosha #hinduism #afterdeathrituals #spiritualwarnings #hindureligion #ancestralcurse #ritualsinindia #dharma #hindubeliefs

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