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Explore why Lord Jagannath's idol is incomplete

रहस्यपूर्ण मूर्ति और रथ यात्रा की आस्था: क्यों भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी है?

इस वर्ष रथ यात्रा शुक्रवार 27 जून 2025 को पुरी (ओड़िशा, भारत) में बड़े ही भव्य और पारंपरिक तरीके से आयोजित की जाएगी। नगरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से प्रभु जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन देवी शुभद्रा को विशाल, सजधज वाले रथों पर बैठाकर लगभग 3 किमी दूर गुँडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है। यह यात्रा श्रद्धा और भक्ति का ऐसा प्रतीक है, जिसमें हजारों भक्त रथ खींचने और प्रभु के दर्शन करने का सौभाग्य पाते हैं ।  क्यों अधूरी मूर्तियों की मानवरचना? पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुरी के राजा इंद्रद्युम्न को एक रात स्वप्न में भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) ने दर्शन दिए और कहा कि उन्हें समुद्र किनारे एक विशेष लकड़ी का लट्ठा मिलेगा, जिससे उन्हें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ बनवानी होंगी। इसके लिए देवताओं ने विश्वकर्मा से प्रार्थना की कि वे इन दिव्य मूर्तियों का निर्माण करें। विश्वकर्मा एक सामान्य कारीगर के रूप में राजा के दरबार में आए और मूर्तियों को गुप्त रूप से बनाने की एक शर्त रखी, जब तक मूर्तियाँ पूरी तरह से बनकर तैयार न हो जाएं, तब तक कोई भी व्यक्ति कमरे में प्रवेश नहीं करेगा। राजा ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया। जैसे ही राजा ने भीतर प्रवेश किया, विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं मूर्ति निर्माण का कार्य आरंभ हुआ। दिन बीतते गए, लेकिन मूर्तियाँ पूरी नहीं हुईं। करीब एक महीना बीत जाने के बाद, राजा की उत्सुकता और बेचैनी इतनी बढ़ गई कि उन्होंने शर्त को भुलाकर कमरे का द्वार खोल दिया। जैसे ही राजा ने भीतर प्रवेश किया, विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं, उनमें हाथ और पैर नहीं थे। राजा को अपने अधीर निर्णय पर गहरा पछतावा हुआ। उन्होंने कई कारीगरों से मूर्तियों को पूर्ण करवाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी उन्हें पूरा नहीं कर सका। अंततः राजा ने इन्हीं अधूरी मूर्तियों को मंदिर में प्रतिष्ठित करवा दिया। तब से लेकर आज तक, भगवान जगन्नाथ की वही अधूरी, लेकिन दिव्य मूर्तियाँ पूजित होती हैं। भगवान जगन्नाथ की बड़ी आंखों से जुड़ी मार्मिक कथा भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) की बड़ी-बड़ी गोल आंखों के पीछे एक गहन और भावनात्मक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, तब एक दिन माता रोहिणी वहां के लोगों को वृंदावन की रासलीलाओं की कथा सुना रही थीं। उस समय श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा जी चुपचाप दरवाजे के पास खड़े होकर उस कथा को सुन रहे थे। यह कथा इतनी भावपूर्ण और प्रेम से भरी हुई थी कि उसे सुनते-सुनते तीनों ही भाई-बहन भावनाओं में डूब गए और आश्चर्य तथा भक्ति से उनकी आंखें फैल गईं। उसी क्षण नारद मुनि वहां पहुंचे और जब उन्होंने भगवान का यह रूप देखा तो वे अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि यह अद्भुत और दिव्य रूप सभी भक्तों को भी देखने को मिले। भगवान ने नारद की प्रार्थना को स्वीकार किया और इस भावमय स्वरूप को स्थायी रूप में धारण कर लिया। तभी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां इसी रूप में बनाई जाती हैं—बड़ी गोल आंखों और साधारण, बिना अंगों के शरीर के साथ। यह स्वरूप केवल एक कथा नहीं, बल्कि भगवान की करुणा, प्रेम और भक्तों के प्रति उनकी गहराई से जुड़ी संवेदनशीलता का प्रतीक भी है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय भक्तों की श्रद्धा से निर्मित भगवान जगन्नाथ का दिव्य नेत्ररूप एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) राजा इंद्रद्युम्न के राज्य में प्रकट हुए, तब उनके स्वरूप को देखकर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्य और श्रद्धा से भर गए। उनकी आंखें भगवान के प्रति असीम भक्ति से इतनी फैल गईं कि भगवान ने भी भक्तों की इस भावना का सम्मान करते हुए अपनी आंखें उसी तरह बड़ी कर लीं। यह दर्शाता है कि भगवान अपने भक्तों की भावनाओं को आत्मसात कर लेते हैं और उसी अनुरूप अपना रूप भी बदल लेते हैं। भक्तों का यह भी विश्वास है कि भगवान की ये विशाल आंखें इस बात का संकेत हैं कि वे हर समय अपने भक्तों पर दृष्टि बनाए रखते हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार, मूर्तिकारों ने जानबूझकर भगवान की आंखें बड़ी बनाई थीं ताकि जैसे ही कोई भक्त उनकी मूर्ति देखे, उसके भीतर श्रद्धा जाग उठे। इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ की दृष्टि नेत्र रोगों से पीड़ित लोगों के लिए वरदान स्वरूप है और इससे उन्हें लाभ मिलता है। इस प्रकार, भगवान जगन्नाथ की आंखें केवल एक भौतिक अंग नहीं हैं, बल्कि वे भक्तों के प्रति प्रेम, समर्पण और चमत्कार की जीवंत प्रतीक हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Jagannath #jagannathrathyatra2025 #incompleteidol #lordjagannath #hindumystery #puriodisha

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Discover the 3 key mistakes that can stop Goddess Lakshmi's blessings.

न करें ये 3 गलती, नहीं मिलेगी मां लक्ष्मी की कृपा

हमारे शास्त्रों में मां लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना गया है। मां लक्ष्मी जहां भी निवास करती हैं, वहां दरिद्रता, दुःख और अशांति कभी ठहर नहीं सकते। लेकिन मां लक्ष्मी बहुत चंचला मानी जाती हैं, वो किसी भी स्थान पर अधिक समय तक नहीं रुकतीं, अगर उन्हें प्रसन्न रखने के नियमों का पालन न किया जाए। यही कारण है कि वास्तुशास्त्र और पुराणों में मां लक्ष्मी की कृपा को पाने के लिए कुछ विशेष कार्यों से बचने की सलाह दी गई है। अगर आप चाहते हैं कि आपके घर में लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करें, तो आपको कुछ गलत आदतों और व्यवहारों से बचना चाहिए। सुबह देर तक सोना, झूठ बोलना और गंदगी में रहना ये तीन आदतें कर सकती हैं लक्ष्मी माता को नाराज़। जानिए कौन-से काम तुरंत छोड़ना जरूरी है ताकि घर में बनी रहे समृद्धि और सुख-शांति। यहां हम बता रहे हैं ऐसे 3 काम जिन्हें करने से मां लक्ष्मी (maa lakshmi) रुष्ट हो सकती हैं, और इसके परिणामस्वरूप आपके जीवन में धन की कमी, आर्थिक तंगी और अशांति आ सकती है। 1. सुबह देर तक सोना धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्ममुहूर्त में उठना न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी शुभ होता है। मां लक्ष्मी को सुबह जल्दी उठने वाले व्यक्ति प्रिय होते हैं। यदि कोई व्यक्ति सूर्योदय के बाद भी सोता रहता है या आलस्यवश देर तक बिस्तर पर रहता है। या फिर सुबह उठने से कतराता है। तो ऐसा माना जाता है कि मां लक्ष्मी ऐसे शख्स के घर से रुष्ट होकर चली जाती हैं। और माँ लक्ष्मी के रूठने से उसे आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यदि उसे माँ लक्ष्मी को रुष्ट होने से बचाना है तो,  2. शुक्रवार को बाल और नाखून काटना माना जाता है अशुभ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्रवार को शरीर से जुड़ी कुछ क्रियाएं जैसे बाल कटवाना, शेविंग करना या नाखून काटना वर्जित मानी जाती हैं। यह दिन मां लक्ष्मी को समर्पित माना गया है, जो शुद्धता और सौम्यता की प्रतीक हैं। ऐसे में बाल या नाखून काटना देवी लक्ष्मी का अनादर माना जाता है, जिससे धन संबंधी समस्याएं और आय में रुकावट आने की संभावना बढ़ जाती है। यदि किसी वजह से यह कार्य करना अत्यंत आवश्यक हो, तो कोशिश करें कि पूजा-पाठ या संध्या के बाद यह न करें। थोड़ी सी सावधानी आपके जीवन में मां लक्ष्मी (maa lakshmi) की कृपा बनाए रखने में सहायक हो सकती है। संभव हो तो शुक्रवार के दिन बाल कटवाने, शेविंग करने अथवा नाखून काटने से बचें।  इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय 3. शुक्रवार को झाड़ू-पोंछा लगाने से पहले जान लें ये बात धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्रवार के दिन विशेष रूप से झाड़ू लगाने या घर की सफाई करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि शुक्रवार को विशेषकर शाम के समय झाड़ू लगाने से मां लक्ष्मी (maa lakshmi) का घर से वास समाप्त हो सकता है, क्योंकि झाड़ू को स्वयं लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। इस दिन झाड़ू को पैर से छूना या रात के समय उसका उपयोग करना भी अशुभ माना जाता है। अगर सफाई जरूरी हो, तो उसे सुबह के पहले पहर में कर लेना चाहिए और झाड़ू-पोंछा करने के बाद उसे ढककर किसी एकांत स्थान पर रखना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। Latest News in Hindi Today Hindi news maa lakshmi #goddesslakshmi #wealthtips #hindubeliefs #lakshmiblessings #spiritualmistakes

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Rudraksha benefits

रुद्राक्ष पहनने पर भी नहीं मिल रहा लाभ? हो सकती हैं ये आम गलतियां

हिंदू धर्म में रुद्राक्ष को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली माना गया है। यह केवल एक बीज नहीं बल्कि भगवान शिव का आशीर्वाद माना जाता है। शास्त्रों में रुद्राक्ष को धारण करने से मानसिक शांति, आत्मबल, और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होने की बात कही गई है। रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं। यह न केवल मन की शांति प्रदान करता है, बल्कि एकाग्रता को भी बढ़ाता है। यदि इसे विधि-विधान और नियमों का पालन करते हुए पहना जाए, तो यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है और मन में बुरे विचार नहीं आने देता। रुद्राक्ष पहनने वाले व्यक्ति पर भगवान शिव (Lord Shiva) की विशेष कृपा बनी रहती है और उसे अशुभ ग्रहों के प्रभाव से भी राहत मिल सकती है। मान्यता है कि सही नियमों का पालन करते हुए रुद्राक्ष पहनने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। लेकिन बहुत से लोग यह शिकायत करते हैं कि रुद्राक्ष पहनने के बावजूद उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा। इसका मुख्य कारण है – पहनने में की गई छोटी लेकिन प्रभावशाली गलतियां। आइए जानते हैं वे कौन-सी गलतियां हैं जिनकी वजह से रुद्राक्ष का प्रभाव कम हो जाता है। 1. रुद्राक्ष को बिना शुद्ध किए पहन लेना रुद्राक्ष खरीदते ही उसे पहन लेना सबसे आम गलती है। शास्त्रों के अनुसार, रुद्राक्ष को धारण करने से पहले गंगाजल, गाय के दूध या शुद्ध जल से शुद्ध करना चाहिए। उसके बाद शिव (Lord Shiva) मंत्र “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ ह्रीं नमः” का जाप करके इसका अभिषेक करना चाहिए। 2. गलत माला का उपयोग करना रुद्राक्ष (Rudraksha) को हमेशा रेशम के धागे, चांदी, सोने या पंचधातु की माला में धारण करना चाहिए। कई लोग प्लास्टिक या लोहे की चैन में रुद्राक्ष पहनते हैं, जिससे इसकी ऊर्जा बाधित होती है। इसके अलावा, माला को शुद्ध और पवित्र रखना भी जरूरी है। 3. रुद्राक्ष की संख्या और मुख का चयन रुद्राक्ष कई प्रकार के होते हैं – 1 मुख से लेकर 21 मुख तक। हर मुख का अपना विशेष प्रभाव और फल होता है। कई बार लोग बिना ज्योतिषीय सलाह के किसी भी प्रकार का रुद्राक्ष पहन लेते हैं, जो लाभ के बजाय हानि भी पहुंचा सकता है। जैसे, 3 मुख रुद्राक्ष अग्नि तत्व का प्रतीक है, जबकि 5 मुख को सामान्य रूप से हर कोई पहन सकता है। 4. रुद्राक्ष पहनकर गलत आचरण करना रुद्राक्ष (Rudraksha) धारण करने के बाद मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही रुद्राक्ष पहनकर श्मशान या किसी ऐसे स्थान पर जाने से बचें जहां किसी की मृत्यु हुई हो। ऐसे स्थानों पर जाने से रुद्राक्ष की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है और इसके उल्टे प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं। 5. सोते समय या स्नान करते समय पहनना रात को सोते समय या शौचालय जाते वक्त रुद्राक्ष धारण नहीं करना चाहिए। इन समयों में इसे उतारकर किसी पवित्र और स्वच्छ स्थान, जैसे मंदिर में, रखना चाहिए। रुद्राक्ष को धारण करने से पहले स्नान करना जरूरी है और इसे पहनते समय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करना चाहिए। इन नियमों का पालन करने से रुद्राक्ष के सम्पूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय 6. टूटा या दरार वाला रुद्राक्ष पहनना यदि रुद्राक्ष (Rudraksha) टूट गया है, उस पर दरार आ गई है या उसका धागा खुल गया है, तो उसे तुरंत उतार देना चाहिए। टूटे हुए रुद्राक्ष को पहनना अपशकुन माना जाता है और यह नकारात्मक ऊर्जा का कारण बन सकता है। रुद्राक्ष धारण से जुड़ी महत्वपूर्ण सावधानियां रुद्राक्ष (Rudraksha) को हमेशा स्वच्छ हाथों से ही छूना चाहिए। इसे गंदे हाथों से छूने से इसकी पवित्रता प्रभावित हो सकती है। साथ ही, अपना पहना हुआ रुद्राक्ष किसी और को नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे इसकी ऊर्जा कमजोर हो सकती है। गर्भवती महिलाओं को रुद्राक्ष धारण करने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि इसमें अत्यधिक ऊर्जा होती है, जो गर्भस्थ शिशु के लिए हानिकारक हो सकती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Rudraksha #rudraksha #spiritualhealing #rudrakshabenefits #rudrakshamistakes #vedicremedies

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Gupt Navratri 2025

गुप्त नवरात्रि 2025: दस रहस्यमयी रूपों की होती है साधना, मिलती हैं अद्भुत सिद्धियां

श्रद्धा और साधना के पर्व गुप्त नवरात्रि का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। यह नवरात्रि वर्ष में दो बार माघ और आषाढ़ मास में पड़ती है। इस विशेष अवधि में देवी दुर्गा के दस गुप्त स्वरूपों की आराधना की जाती है, जिन्हें दश महाविद्याएं कहा जाता है। इस साल गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 26 जून से हो रही है। इसी दिन सुबह 5:25 से 6:58 बजे के बीच घटस्थापना के लिए शुभ समय माना गया है। इस विशेष अवसर पर देशभर में मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने हेतु विधिवत पूजा-पाठ और अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। गुप्त नवरात्रि की पूजा विधियां शारदीय नवरात्रि जैसी ही होती हैं, लेकिन इनका महत्व गुप्त साधना और विशेष अनुष्ठानों में होता है। आपको बता दें कि साल में कुल चार नवरात्रि होती हैं, चैत्र, शारदीय और दो गुप्त नवरात्रि। जहां चैत्र और शारदीय नवरात्रि बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रूप से मनाई जाती हैं, वहीं गुप्त नवरात्रियां विशेष रूप से तांत्रिक साधकों और आध्यात्मिक अनुयायियों द्वारा गुप्त रूप से मनाई जाती हैं। गुप्त नवरात्रि का महत्व गुप्त नवरात्रि साधकों के लिए वह समय होता है जब वे आंतरिक ऊर्जा जागरण, आत्मबल वृद्धि और सिद्धियों की प्राप्ति के लिए देवी के विशेष रूपों की साधना करते हैं। इन दिनों तांत्रिक क्रियाएं, यंत्र-साधना और बीज मंत्रों का जाप प्रमुख होता है। धार्मिक मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि में साधना करने से मां दुर्गा शीघ्र प्रसन्न होती हैं और भक्त को भौतिक व आध्यात्मिक लाभ दोनों देती हैं। माना जाता है कि इस दौरान साधक को अलौकिक शक्तियां प्राप्त हो सकती हैं। कौन-सी हैं दस महाविद्याएं? दस महाविद्याएं मां दुर्गा के दस शक्तिशाली रूप हैं, जो अलग-अलग गुणों, शक्तियों और तांत्रिक रहस्यों की प्रतीक मानी जाती हैं। आइए जानते हैं इन दस महाविद्याओं के नाम और उनका महत्व 1. मां काली – यह मां पार्वती का उग्र और शक्तिशाली रूप हैं, जो संसार से बुराई और नकारात्मकता का अंत करती हैं। 2. मां तारा – ज्ञान, मुक्ति और करुणा की देवी हैं। यह अपने भक्तों के सभी दुखों को हर लेती हैं। 3. त्रिपुर सुंदरी – सौंदर्य, प्रेम और शक्ति की देवी मानी जाती हैं। यह सुख, समृद्धि और सौंदर्य की प्रतीक हैं। 4. मां भुवनेश्वरी – सम्पूर्ण सृष्टि की संचालिका हैं। यह संसार को संभालती और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। 5. मां छिन्नमस्ता – आत्म-बलिदान और आत्मज्ञान की देवी हैं। यह भक्तों को ज्ञान, शक्ति और मुक्ति प्रदान करती हैं। 6. त्रिपुर भैरवी – यह देवी शक्ति और विनाश की अधिष्ठात्री हैं, जो भय से मुक्ति दिलाकर साहस प्रदान करती हैं। 7. मां धूमावती – ज्ञान और रहस्य की देवी हैं। कथा है कि भूख लगने पर उन्होंने भगवान शिव का भक्षण कर लिया, जिससे उन्हें विधवा स्वरूप में रहना पड़ा। इसलिए इनकी पूजा विवाहित स्त्रियां नहीं करतीं। 8. बगलामुखी देवी – शत्रुनाशिनी देवी हैं। यह अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें बाहरी खतरों से बचाती हैं। 9. मातंगी देवी – यह देवी विद्या, संगीत, कला और वाणी की अधिपति हैं। विद्यार्थी और कलाकार इनकी उपासना करते हैं। 10. कमलात्मिका (कमला) देवी – लक्ष्मी स्वरूपा देवी हैं, जो अपने भक्तों को धन, वैभव और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय इन बातों का रखें विशेष ख्याल Latest News in Hindi Today Hindi news  गुप्त नवरात्रि #guptnavratri2025 #secretnavratri #navratrisadhana #raresiddhis #goddessworship

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Ramcharitmanas chaupai benefits

रामचरितमानस की इस दिव्य चौपाई का जाप हर संकट से दिलाता है मुक्ति, सफलता का द्वार खोलता है 

सनातन धर्म में “रामचरितमानस” (Ramcharitmanas) को एक पवित्र ग्रंथ माना गया है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने 16वीं शताब्दी में अवधी भाषा में रचा। यह ग्रंथ भगवान श्रीराम (Lord Rama) के आदर्श जीवन, चरित्र, भक्ति, मर्यादा और धर्म की गहराइयों को छूता है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह चौपाई न सिर्फ आध्यात्मिक शांति देती है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की कुंजी भी मानी जाती है। रामचरितमानस की चौपाइयों को न केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन माना गया है, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी है। ऐसी ही एक प्रसिद्ध चौपाई है— “प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, हृदय राखि कौशलपुर राजा” – का आशय यह है कि जब भी आप किसी कार्य के लिए कहीं जाएं या कोई नया कार्य आरंभ करें, तो मन में भगवान श्रीराम (Lord Rama) को स्मरण करें। अगर श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रभु श्रीराम को हृदय में रखकर काम करेंगे, तो वह कार्य अवश्य सफल होगा। “रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई” –  अगर आप लगातार मेहनत करने के बावजूद भी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और कर्ज का भार कम नहीं हो रहा है, तो रोज सुबह स्नान के बाद श्रीरामचरितमानस (Ramcharitmanas) की इस चौपाई का जितनी बार संभव हो सके, श्रद्धा से पाठ करें। माना जाता है कि इस चौपाई का नियमित जप आर्थिक परेशानियों को दूर करने में सहायक होता है और इससे भगवान श्रीराम (Lord Rama) की कृपा भी प्राप्त होती है। “जिमि सरिता सागर मंहु जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।। तिमि सुख संपत्ति बिनहि बोलाएं। धर्मशील पहिं जहि सुभाएं।।” यदि आप चाहते हैं कि मां लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहे और जीवन में धन, सुख-समृद्धि का वास हो, तो रामचरितमानस (Ramcharitmanas) की इस चौपाई का नियमित जाप करें। माना जाता है कि इस चौपाई का पाठ करने से व्यक्ति के घर में कभी धन की कमी नहीं होती और तिजोरी हमेशा भरी रहती है। कहु तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥  दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी ॥ यह चौपाई संकट और कठिन समय में पढ़ने के लिए अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। इसका भावार्थ यह है – “हे प्रभु! मैं आपको नमन करता हूँ। आप तो सभी प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। दीन-दुखियों पर कृपा करना आपकी स्वभाविक प्रवृत्ति है, अतः मेरी इस भारी परेशानी को भी दूर कर दीजिए।” यदि आप किसी मानसिक परेशानी या जीवन की कठिनाइयों से गुजर रहे हैं, तो इस चौपाई का नित्य पाठ करने से आपको मानसिक शांति प्राप्त होगी और प्रभु श्रीराम की कृपा आप पर बनी रहेगी। इन आसान उपायों से मिलेगी सफलता की राह इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय कैसे करें स्मरण? प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शांत मन से इस चौपाई का 11 बार जाप करें। इसे पूजा स्थान पर बैठकर, धूप-दीप जलाकर स्मरण करें। यात्रा पर निकलते समय या कोई नया काम शुरू करते वक्त इसका उच्चारण करें। इस चौपाई को कंठस्थ करना लाभकारी रहेगा। Latest News in Hindi Today Hindi news Ramcharitmanas #ramcharitmanas #chaupai #hindumantra #successmantra #spiritualhealing #sankatmochan #ramayan #divinechant

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Surya Dev remedies

रविवार के 5 अचूक उपाय: सूर्य देव को प्रसन्न कर पाएं धन, सुख और सफलता

सप्ताह का पहला दिन सूर्य भगवान को समर्पित होता है। हिंदू धर्म में सप्ताह के प्रत्येक दिन को किसी विशेष देवता को समर्पित किया गया है। रविवार का दिन भगवान सूर्य नारायण के पूजन के लिए विशेष माना जाता है। उन्हें जीवन, प्रकाश, ऊर्जा और अच्छे स्वास्थ्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि यदि सूर्य देव प्रसन्न हो जाएं तो व्यक्ति के जीवन में धन, समृद्धि, प्रतिष्ठा और आत्मबल का संचार होता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा, पिता, उच्च पद और सम्मान का कारक बताया गया है। जिन लोगों की कुंडली में सूर्य कमजोर होता है, उन्हें आत्मविश्वास की कमी, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, सरकारी क्षेत्र में बाधाएं और धन की कमी का सामना करना पड़ता है। अगर आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं या तरक्की की राह तलाश रहे हैं, तो रविवार को करें ये 5 आसान उपाय और पाएं सूर्य देव की विशेष कृपा। अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन में सूर्य देव की कृपा बरसे और आप आर्थिक रूप से संपन्न बनें, तो रविवार के दिन ये 5 आसान और प्रभावी उपाय जरूर करें। 1. तांबे के लोटे से सूर्य को जल अर्पित करें रविवार को सूर्य नमस्कार करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य नमस्कार से सूर्य देव (Lord Surya) प्रसन्न होते हैं और साधक को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही, यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) को बढ़ाता है और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है। 2. जलाएं दीपक: रविवार के दिन घर के मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर दीपक जलाना बेहद शुभ माना जाता है। यह उपाय न केवल सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने में सहायक होता है, बल्कि इससे मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं। इस उपाय से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। 3. रविवार को करें दान, दूर होगी दरिद्रता हिंदू धर्म में दान का विशेष महत्व है और रविवार का दिन भी दान-पुण्य के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन गुड़, चावल, तांबे के बर्तन या लाल रंग के वस्त्र का दान करने से सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ये उपाय न केवल आर्थिक संकट को दूर करते हैं, बल्कि सौभाग्य और समृद्धि भी बढ़ाते हैं। 4. सूर्य मंत्र का जाप और आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ करें रविवार के दिन सूर्य देव (Lord Surya) के मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। खासकर “ॐ आदित्याय नमः” और “ॐ सूर्याय नमः” मंत्रों का 108 बार जाप करें। इसके अलावा, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से शत्रु बाधा दूर होती है और आय के स्रोत खुलते हैं। यह स्तोत्र रामायण का अंश है, जिसे भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले पढ़ा था। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय 5. पहनें शुभ रंग के वस्त्र: रविवार को सूर्य देव (Lord Surya) की कृपा पाने के लिए लाल रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि लाल रंग सूर्य देव का प्रिय रंग होता है, इसलिए इस दिन यह रंग पहनने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। सुबह स्नान करके लाल वस्त्र धारण करें और इसी रंग का वस्त्र किसी जरूरतमंद को दान करें। इससे सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। क्यों जरूरी है सूर्य की कृपा? सूर्य ग्रह अगर आपकी कुंडली में मजबूत स्थिति में होता है तो आप अपने जीवन में समाज में मान-सम्मान, सरकारी नौकरी, प्रशासनिक क्षेत्र में सफलता और आर्थिक रूप से उन्नति पा सकते हैं। वहीं अगर यह ग्रह अशुभ स्थिति में हो, तो व्यक्ति को बार-बार धन हानि, अपमान और स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Surya #suryaDev #sundayRemedies #hinduRituals #spiritualTips #wealthAttraction #successRituals #vedicUpay #sunWorship

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solar eclipse 2025

Solar Eclipse: क्या भारत में भी दिखेगा 21 सितंबर को लगने वाला साल का दूसरा सूर्य ग्रहण?

साल 2025 का दूसरा सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) 21 सितंबर को लगने जा रहा है। इससे पहले इस वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण 29 मार्च को चैत्र अमावस्या के दिन पड़ा था, लेकिन वह भारत में दिखाई नहीं दिया था, इसलिए उस ग्रहण का सूतक काल भी प्रभावी नहीं था। अब जो आगामी सूर्य ग्रहण होगा, वह खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण तो है, लेकिन इसका भारतवासियों की धार्मिक और दैनिक गतिविधियों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होगा। 21 सितंबर की रात लगभग 11 बजे यह सूर्य ग्रहण प्रारंभ होगा और 22 सितंबर की सुबह 4 बजे तक चलेगा। चूंकि यह ग्रहण पूरी तरह रात्रिकालीन होगा और भारत में कहीं से भी दृश्य नहीं होगा, इसलिए इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा। भारतीय पंचांग और शास्त्रों के अनुसार, जब कोई ग्रहण किसी देश या स्थान पर दृश्य नहीं होता, तो उस ग्रहण का सूतक काल और धार्मिक प्रभाव उस स्थान पर मान्य नहीं माना जाता। सूतक काल, ग्रहण की शुरुआत से कुछ घंटे पहले का वह समय होता है जब धार्मिक कार्य, मंदिर में पूजा-पाठ, भोजन आदि पर कुछ रोक लगाई जाती है। लेकिन चूंकि यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका कोई धार्मिक प्रतिबंध या सावधानी आवश्यक नहीं मानी गई है। आम लोग अपने दैनिक कार्य बिना किसी व्यवधान के कर सकते हैं। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी यह ग्रहण भारतवासियों के लिए विशेष प्रभाव नहीं रखता। ग्रहण का प्रभाव मुख्यतः उन क्षेत्रों पर पड़ता है जहां से वह प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। 21 सितंबर को लगने वाला यह सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध के कुछ क्षेत्रों में, जैसे अंटार्कटिका, दक्षिण अमेरिका और अटलांटिक महासागर के कुछ हिस्सों में ही दिखाई देगा। ऐसे में यह सूर्य ग्रहण भारत के धार्मिक और ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में कोई विशेष महत्व नहीं रखता। फिर भी, खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से यह एक अहम खगोलीय घटना होगी, जिसे दुनिया के अन्य हिस्सों में वैज्ञानिक और शोधकर्ता अध्ययन हेतु महत्व देंगे। संक्षेप में, 21 सितंबर की रात लगने वाला यह सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) भारत में न तो दृश्य होगा, न ही इसका सूतक काल मान्य होगा और न ही यह किसी धार्मिक क्रिया पर प्रभाव डालेगा। अतः भारतवासी इस दिन अपने धार्मिक और पारंपरिक कार्य सामान्य रूप से कर सकते हैं। फिर भी अगर कोई व्यक्ति व्यक्तिगत आस्था या सतर्कता के चलते सामान्य सावधानियां रखना चाहता है, तो वह अपनी श्रद्धा अनुसार कर सकता है। कहां-कहां दिखाई देगा यह ग्रहण? यह सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, न्यूजीलैंड और प्रशांत एवं अटलांटिक महासागर के कुछ भागों में देखा जा सकेगा। विशेष रूप से अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड के कुछ इलाकों में यह ग्रहण स्पष्ट रूप से दृश्य रहेगा। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय ग्रहण के समय इन सावधानियों का रखें विशेष ध्यान  Latest News in Hindi Today Hindi news Solar Eclipse #SolarEclipse2025 #SeptemberEclipse #EclipseInIndia #SkyEvents2025 #AstronomyNews

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आषाढ़ अमावस्या

आषाढ़ अमावस्या 2025: पितृ तर्पण और लक्ष्मी कृपा पाने का दुर्लभ संयोग

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर माह की अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। यह दिन पितृ तर्पण, दान-पुण्य और देवी-देवताओं की आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। साल 2025 में आषाढ़ अमावस्या 25 जून, बुधवार को मनाई जाएगी। यह दिन न केवल पितरों की शांति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि मां लक्ष्मी की कृपा पाने का भी उत्तम अवसर है। मान्यता है कि यदि इस दिन कुछ विशेष कार्य कर लिए जाएं, तो घर में सुख-समृद्धि और धन की वर्षा होती है। यही नहीं, इस दिन विशेष उपाय करने से पितृ भी खुश होते हैं और पितृ दोष से राहत मिलती है।  आषाढ़ अमावस्या 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास की अमावस्या तिथि की शुरुआत 24 जून की शाम 7:00 बजे से हो रही है, जो 25 जून को शाम 4:02 बजे तक रहेगी। चूंकि अमावस्या की तिथि का निर्धारण उदयातिथि के आधार पर होता है, इसलिए 25 जून को ही आषाढ़ अमावस्या मनाई जाएगी। बन रहे हैं शुभ योग इस वर्ष आषाढ़ अमावस्या पर तीन शुभ योगों का संयोग बन रहा है: इन शुभ योगों में किया गया दान, पूजा और जप कई गुना फल प्रदान करता है। अतः यह दिन आध्यात्मिक साधना और पितृ तर्पण के लिए अत्यंत शुभ है। क्यों खास है आषाढ़ अमावस्या? आषाढ़ अमावस्या का संबंध विशेष रूप से पितरों की शांति से जुड़ा होता है। इस दिन जल में तिल, पुष्प और जल अर्पित कर पितरों का तर्पण करने से उनके आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। साथ ही, घर में दरिद्रता, क्लेश और रोग जैसे दोषों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान विष्णु, पीपल के वृक्ष और मां लक्ष्मी की पूजा से घर में धन, वैभव और सौभाग्य का वास होता है। आषाढ़ अमावस्या पर करें ये कार्य: 1. पीपल वृक्ष की पूजा करें सुबह स्नान करके पीपल वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं, दीपक जलाएं और परिक्रमा करें। मान्यता है कि पीपल में विष्णु और पितरों का वास होता है। इससे पितृ दोष और दरिद्रता दूर होती है। आषाढ़ अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करने से पितरों का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।  2. तिल और जल से पितृ तर्पण करें पवित्र जल में तिल, पुष्प डालकर पितरों को अर्पित करें। यह उन्हें शांति और मोक्ष प्रदान करता है। साथ ही पितरों का आशीर्वाद सुख-समृद्धि लेकर आता है। आषाढ़ अमावस्या के दिन तिल और जल से पितृ तर्पण करने से पितृ खुश होते हैं।  3. गरीबों और ब्राह्मणों को दान करें इस दिन अन्न, वस्त्र, तांबा, तिल, घी, धन और जरूरत की चीजें दान करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि आषाढ़ अमावस्या के गरीबों और ब्राह्मणों को दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।  4. मां लक्ष्मी की विशेष आराधना करें गाय के घी का दीपक जलाकर मां लक्ष्मी का पूजन करें। घर के उत्तर-पूर्व कोण को स्वच्छ करके वहां लाल वस्त्र बिछाएं, लक्ष्मी यंत्र या चित्र स्थापित करें, फिर कमलगट्टे की माला से “श्रीं” बीज मंत्र का जाप करें। इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना करने से घर में माँ लक्ष्मी का वास होता है।  5. शंख और झाड़ू खरीदना शुभ आषाढ़ अमावस्या के दिन शंख और झाड़ू खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। इसे घर में रखने से लक्ष्मी जी का स्थायी वास होता है और आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं।  इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय क्या न करें इस दिन? Latest News in Hindi Today Hindi news लक्ष्मी #AshadhaAmavasya2025 #PitrTarpan #LakshmiBlessings #AmavasyaRituals #SpiritualIndia #VedicTraditions

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Saturday Shani remedies

शनिदेव की कृपा पाना चाहते हैं? शनिवार को करें ये विशेष पूजा और उपाय

हिंदू धर्म में शनिदेव (Shani Dev) को न्याय के देवता माना जाता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। शनिदेव की कृपा जहां जीवन में खुशहाली और तरक्की लाती है, वहीं उनकी नाराजगी जीवन में दुख, बाधा और आर्थिक तंगी का कारण भी बन सकती है। यही कारण है कि शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से शनिवार के दिन पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है। अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन से दुखों का अंत हो, नौकरी-धंधे में तरक्की हो और शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का प्रभाव कम हो जाए, तो शनिवार को शनिदेव की विशेष पूजा विधि को अपनाना चाहिए। आइए जानते हैं शनिदेव (Shani Dev) की पूजा की सही और प्रभावशाली विधि, जिससे वे जल्दी प्रसन्न होते हैं। शनिदेव पूजा की विधि (Shani Dev Puja Vidhi) शनिवार के दिन सुबह जल्दी उठकर पूरे घर की अच्छे से सफाई करें। फिर स्नान कर साफ और स्वच्छ वस्त्र पहनें, विशेष रूप से काले या गहरे नीले रंग के कपड़े धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर में किसी शांत और साफ स्थान या मंदिर में एक चौकी स्थापित करें, जिस पर काले रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर शनिदेव की मूर्ति रखें। यदि लोहे की मूर्ति है, तो उसे पंचामृत से स्नान कराकर, चावलों से बने चौबीस पंखुड़ी वाले कमल पर स्थापित करें। साथ में भगवान शिव और हनुमान जी की मूर्तियों को भी स्थान दे सकते हैं, क्योंकि शनिवार को इनकी पूजा का भी महत्व है। पूजा से पहले व्रत और पूजन का संकल्प लें। फिर शनिदेव के सामने सरसों के तेल का दीपक, अगरबत्ती और धूप जलाएं। इसके बाद उन्हें सरसों का तेल अर्पित करें और काले तिल, काली उड़द दाल, नीले फूल, शमी और पीपल के पत्ते तथा काले वस्त्र अर्पित करें। पूजा पूर्ण होने पर शनिदेव की आरती करें और उनसे अपने द्वारा अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें। इसके पश्चात गरीबों और जरूरतमंदों को काले वस्त्र, तिल, उड़द की दाल या भोजन का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, चींटियों को आटा डालना भी लाभकारी होता है। यदि आप व्रत रख रहे हैं, तो दिनभर फलाहार करें और शाम को उड़द की दाल की खिचड़ी खा सकते हैं। इस विधि से पूजा करने पर शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आ रही बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं। व्रत कब शुरू करें? हिंदू धर्म में शनि देव (Shani Dev) को कर्मों का न्यायकर्ता माना गया है। मान्यता है कि वे किसी के साथ न तो अन्याय करते हैं और न ही पक्षपात, बल्कि हर व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुरूप फल प्रदान करते हैं। शनिवार का व्रत किसी भी समय शुरू किया जा सकता है, लेकिन यदि इसे श्रावण मास के शनिवार से आरंभ किया जाए, तो इसका विशेष महत्व होता है। इसके अलावा, यह व्रत किसी भी शुक्ल पक्ष के शनिवार से भी शुरू किया जा सकता है। माना जाता है कि शनिवार का व्रत करने से व्यक्ति को स्वास्थ्य, करियर और जीवन की अन्य समस्याओं में सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।  शनि मंत्रों का जाप करें:शनि देव (Shani Dev) को प्रसन्न करने के लिए निम्न मंत्रों का जाप करें: कम से कम 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है। इससे शनि देव की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय क्या करें दान? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Shani Dev #ShaniDev #SaturdayPuja #ShaniRemedies #ShaniBlessings #HinduRituals #SpiritualTips #ShaniDosh

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Yogini Ekadashi 2025

Yogini Ekadashi 2025: योगिनी एकादशी पर विशेष पूजा से दूर होगी सभी परेशानी

हिंदू धर्म में वर्षभर में 24 एकादशी तिथियां आती हैं, जिनमें से प्रत्येक का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व होता है। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से पापों से मुक्ति दिलाने वाला और पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है। योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) का पालन करने से रोग, दोष और दरिद्रता का नाश होता है तथा मनुष्य मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा व नियमपूर्वक करने से व्रती को 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। योगिनी एकादशी 2025 तिथि और समय (Yogini Ekadashi 2025 Date & Time) हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। यह तिथि हर साल अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। वर्ष 2025 में योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) व्रत 21 जून (शनिवार) को रखा जाएगा, क्योंकि तीज-त्योहारों का निर्धारण उदया तिथि (सूर्योदय के समय की तिथि) के आधार पर होता है। तिथि और समय योगिनी एकादशी का महत्व (Significance of Yogini Ekadashi) योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यकारी और प्रभावशाली व्रतों में से एक माना गया है। यह व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2025 में यह व्रत 21 जून को मनाया जाएगा। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है, और योगिनी एकादशी विशेष रूप से आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली मानी जाती है। पद्म पुराण और भविष्य पुराण जैसे ग्रंथों में योगिनी एकादशी का महत्व विस्तार से बताया गया है। पद्म पुराण के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत करने से मनुष्य को 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन के सभी दोषों और पापों को दूर करता है, और उसे अध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है। इस व्रत को लेकर ऐसी मान्यता भी है कि यह स्वर्ग प्राप्ति के साथ-साथ व्यक्ति को धरती पर भी सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय योगिनी एकादशी व्रत और पूजा विधि (Yogini Ekadashi Vrat Puja Vidhi) योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और श्री हरि के समक्ष व्रत का संकल्प लें। घर के पूजा स्थल को स्वच्छ करें और गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक पवित्र चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। उन्हें हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाएं और पीले फूल, फल, पंचामृत, पंजीरी, मिठाई तथा तुलसी दल अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं, धूप दिखाएं और पूरी श्रद्धा से पूजा करें। इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें। योगिनी एकादशी व्रत की कथा का पाठ करें या उसे सुनें। अंत में भावपूर्ण आरती करें। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। योगिनी एकादशी व्रत  (Yogini Ekadashi vrat) रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन संयम और श्रद्धा के साथ उपवास करना चाहिए। यदि स्वास्थ्य कारणों से निर्जल व्रत संभव न हो, तो फलाहार या दूध-फल का सेवन किया जा सकता है। व्रत के दौरान तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा और नकारात्मक व्यवहार जैसे क्रोध या विवाद से बचना चाहिए। इस दिन मन, वाणी और कर्म से शुद्धता बनाए रखना आवश्यक है। भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा, मंत्र जाप और कथा श्रवण करने से व्रत का पुण्य बढ़ता है। अगले दिन द्वादशी को प्रातः स्नान करके पूजा करें और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का प्रसाद ग्रहण कर व्रत का विधिवत पारण करें। व्रत का पारण ब्राह्मण या जरूरतमंदों को दान देकर भी किया जा सकता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Vishnu #YoginiEkadashi2025 #EkadashiVrat #HinduFestivals2025 #SpiritualRituals #EkadashiPuja

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