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H-1B Visa पर बड़ा झटका? US में Cap-Subject Petitions पर $103,265 अतिरिक्त Fee का प्रस्ताव, भारतीय Professionals पर बड़ा असर संभव

वॉशिंगटन: अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे हजारों skilled foreign professionals, खासकर भारतीयों, के लिए H-1B Visa को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। Donald Trump administration के तहत U.S. Department of Homeland Security (DHS) ने cap-subject H-1B petitions पर $103,265 की नई अतिरिक्त fee लगाने का प्रस्ताव जारी किया है। अगर यह नियम अंतिम रूप में लागू होता है, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेश से skilled workers को H-1B के जरिए नियुक्त करना बेहद महंगा हो सकता है। यह प्रस्ताव 24 अगस्त को जारी हुआ और 25 अगस्त 2026 को Federal Register में publication के लिए निर्धारित है। फिलहाल यह final rule नहीं है और इसे public comments तथा regulatory process से गुजरना होगा। $103,265 की Fee आखिर है क्या? DHS के official proposed rule के मुताबिक हर H-1B cap-subject petition दाखिल करते समय employer को $103,265 की अलग additional fee देनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मौजूदा H-1B filing fees को replace नहीं करेगी। DHS ने स्पष्ट रूप से इसे additional fee के रूप में प्रस्तावित किया है, यानी applicable होने पर existing filing और statutory fees के ऊपर यह रकम जुड़ सकती है। DHS का अनुमान है कि इससे सालाना लगभग $8.8 billion का revenue जुटाया जा सकता है। Agency ने calculation के लिए 85,000 cap-subject petitions और $103,265 प्रति petition का अनुमान इस्तेमाल किया है। हर H-1B Visa पर नहीं लगेगी यह Fee इस खबर का सबसे जरूरी clarification यही है। प्रस्तावित $103,265 fee हर H-1B petition पर लागू करने का प्रस्ताव नहीं है। Official proposal के अनुसार इसका दायरा मुख्य रूप से: H-1B cap-subject petitions, जिसमें U.S. advanced-degree exemption यानी master’s cap के तहत आने वाली petitions भी शामिल हैं, तक सीमित होगा। Cap-exempt H-1B filings को इस specific proposed fee के दायरे में शामिल नहीं किया गया है। Reuters के मुताबिक मौजूदा H-1B renewals और अमेरिका में पहले से student status पर मौजूद कुछ applicants के cases पर भी इस fee का असर नहीं पड़ने की उम्मीद है। Indians पर इतना बड़ा असर क्यों? भारत H-1B programme का सबसे बड़ा beneficiary रहा है। USCIS के latest detailed congressional data के मुताबिक FY 2024 में approved H-1B petitions में लगभग 71% beneficiaries India-born थे। China करीब 12% के साथ दूसरे स्थान पर था। यही वजह है कि H-1B rules में कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय technology professionals, engineers, financial specialists, researchers और U.S. में hiring करने वाली Indian IT companies के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर भारतीय H-1B holder को personally $103,265 देना पड़ेगा। Fee कौन देगा—Employee या Company? H-1B system में petition U.S. employer दाखिल करता है। नई proposed fee भी petitioners यानी employers पर लगाई जाएगी। इसका सीधा अर्थ है कि Indian professional को सामान्य तौर पर अपने pocket से $103,265 USCIS को जमा करने की बात नहीं है। लेकिन अगर employer के लिए एक foreign employee को hire करने की upfront cost $100,000 से ज्यादा बढ़ जाती है, तो इसका असर hiring decisions पर पड़ सकता है। Companies कम H-1B employees hire कर सकती हैं, ज्यादा senior या high-paying positions को प्राथमिकता दे सकती हैं या jobs को दूसरे देशों में shift करने पर विचार कर सकती हैं। DHS ने खुद अपने regulatory analysis में माना है कि proposed rule का substantial number of small entities पर significant economic impact हो सकता है। छोटे Employers और Startups पर ज्यादा दबाव? इस proposal का सबसे बड़ा सवाल startups और small businesses को लेकर है। DHS के FY 2025 data analysis में cap-subject petitions दाखिल करने वाले 28,649 unique petitioners में 14,541 यानी लगभग 51% को small entities के रूप में पहचाना गया था। $103,265 per petition की additional cost एक large multinational company के लिए भी बड़ी रकम है, लेकिन छोटे startup या research-oriented company के लिए यह foreign talent hiring को लगभग असंभव बनाने जैसी स्थिति पैदा कर सकती है। DHS का प्रस्ताव फिलहाल company size या nonprofit status के आधार पर इस fee में सामान्य छूट देने की बात नहीं करता; proposed rule इसे cap-subject petitioners पर broadly लागू करने की बात कहता है। मौजूदा H-1B Fees कितनी हैं? अभी सामान्य Form I-129 H-1B filing fee employer category और filing method के अनुसार अलग होती है। USCIS fee schedule में standard H-1B filing के लिए लगभग $730-$780, जबकि qualifying small employers और nonprofits के लिए लगभग $460 base filing fee का प्रावधान दिखाया गया है। इसके अलावा circumstances के अनुसार Fraud Prevention Fee, Asylum Program Fee और दूसरी statutory fees लग सकती हैं। Reuters के मुताबिक नई policy से पहले typical H-1B application costs broadly $2,000 से $5,000 के range में रहती थीं, हालांकि employer और petition type के अनुसार total अलग हो सकता था। इसीलिए $103,265 का proposed additional charge एक बेहद बड़ा jump माना जा रहा है। पहले भी लगाया गया था $100,000 Payment नई proposal बिल्कुल शून्य से शुरू नहीं हुई है। Trump administration ने September 2025 में Presidential Proclamation के जरिए कुछ नए H-1B petitions से जुड़ा $100,000 payment requirement लागू किया था। लेकिन June 2026 में Massachusetts की federal court ने उस policy को unlawful मानते हुए implementing guidance को vacate कर दिया। Trump administration ने उस फैसले के खिलाफ appeal की है और मामला अभी appellate court में लंबित है। नई $103,265 proposal उस पुराने $100,000 payment से अलग legal mechanism पर आधारित है। क्या $100,000 + $103,265 दोनों देने पड़ सकते हैं? Official Federal Register proposal में एक बेहद महत्वपूर्ण provision है। DHS ने कहा है कि proposed $103,265 fee Presidential Proclamation के $100,000 payment से अलग है। अगर किसी समय petitioner दोनों requirements के दायरे में आता है, तो technically दोनों amounts लागू हो सकते हैं। हालांकि existing Presidential Proclamation का payment requirement 21 September 2026 के आसपास expire होने वाला है, अगर उसे extend या renew नहीं किया जाता। DHS ने भी कहा है कि मौजूदा schedule के अनुसार proclamation proposed rule के effective होने से पहले expire हो सकता है। इसलिए अभी यह नहीं कहा जा सकता कि companies को निश्चित रूप…

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Trump-Canada Trade War और तेज; Canadian Cars-Trucks पर 50% Tariff की धमकी, Canada भी जवाबी कार्रवाई की तैयारी में

वॉशिंगटन/ओटावा: अमेरिका और कनाडा के बीच trade war और गंभीर होता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने Canada में बने सभी cars, trucks और auto parts पर 50% tariff लगाने की धमकी दी है। Trump के मुताबिक नया tariff 1 January 2027 से लागू किया जा सकता है, अगर दोनों देशों के बीच trade dispute का समाधान नहीं निकलता। यह धमकी ऐसे समय आई है जब Washington और Ottawa के बीच कई दिनों से चल रही trade negotiations टूट चुकी हैं। दूसरी तरफ Canadian Prime Minister Mark Carney ने भी साफ संकेत दिया है कि Canada अमेरिकी दबाव के सामने पीछे नहीं हटेगा और जवाबी tariffs लगाएगा। Trump ने क्या कहा? Donald Trump ने Canada पर अमेरिका के साथ unfair trade practices अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि अगर Canadian automobile companies tariffs से बचना चाहती हैं तो उन्हें अपनी manufacturing United States में shift करनी चाहिए। Trump ने चेतावनी दी कि Canada में बने cars, trucks और auto parts पर tariff 50% तक किया जा सकता है। यह नया auto tariff January 2027 से लागू करने की धमकी दी गई है। हालांकि अभी इसे लागू करने वाला अंतिम tariff order प्रभावी नहीं हुआ है। इसलिए headline में इसे “50% tariff की धमकी” कहना ही सही होगा। पहले से 50% Tariff झेल रहे सैकड़ों Canadian Products Cars और trucks को लेकर Trump की नई धमकी से पहले ही अमेरिका ने Canadian products की एक लंबी सूची पर भारी tariffs लगा दिए हैं। AP की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 550 से ज्यादा Canadian products पर 50% tariff लगाया है, जिनकी कुल annual trade value लगभग $20 billion बताई गई है। इनमें honey, cosmetics, clothing, hockey sticks और कई दूसरे consumer products शामिल हैं। ये tariffs पिछले सप्ताह लागू हुए, जब आखिरी समय पर US-Canada negotiations किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकीं। Deal लगभग हो गई थी Final, फिर कैसे बिगड़ी बात? Trade tensions के बीच कुछ दिन पहले तक दोनों पक्ष किसी agreement के बेहद करीब बताए जा रहे थे। Reuters के मुताबिक proposed deal में Canadian-built vehicles पर अमेरिकी tariff को 25% से घटाकर 15% करने और steel तथा aluminum पर tariffs कम करने जैसे प्रावधानों पर बातचीत चल रही थी। लेकिन final negotiations में Canadian content, auto parts exemptions और medium तथा heavy-duty trucks जैसे मुद्दों पर मतभेद बने रहे। आखिरकार talks collapse हो गईं और दोनों देशों ने एक-दूसरे पर बातचीत विफल करने का आरोप लगाया। Canada भी लगाएगा जवाबी Tariffs Trump administration के फैसलों के बाद Canada ने भी retaliatory action की तैयारी कर ली है। Canadian government ने अमेरिकी products पर dollar-for-dollar retaliatory tariffs लगाने का ऐलान किया है। ये जवाबी tariffs 8 September 2026 से लागू होने हैं। Canada जिन अमेरिकी goods को निशाना बना सकता है उनमें steel, electronics, agricultural equipment और दूसरे products शामिल हैं। 25 August की ताजा development यह है कि Canada अपनी retaliatory tariff list और affected workers तथा industries के लिए support measures की विस्तृत घोषणा करने की तैयारी में है। PM Mark Carney का America पर बड़ा आरोप Canadian Prime Minister Mark Carney ने Trump administration पर Canada की economic sovereignty को कमजोर करने की कोशिश का आरोप लगाया है। Carney का कहना है कि Canada केवल ऐसी trade deal स्वीकार करेगा जो देश के workers और businesses के लिए fair हो। उन्होंने हाल की अमेरिकी trade proposal को economic और national interest के लिहाज से स्वीकार्य नहीं माना। Carney ने Canada की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने और Europe, Asia तथा दूसरे global markets के साथ trade relationships बढ़ाने की रणनीति पर भी जोर दिया है। Canada-US Auto Industry पर सबसे बड़ा खतरा Trump की 50% tariff धमकी का सबसे बड़ा असर North American automobile industry पर पड़ सकता है। Canada और United States की automobile supply chains बेहद closely integrated हैं। कई vehicles और their components manufacturing process के दौरान दोनों देशों की सीमा को एक से ज्यादा बार पार करते हैं। ऐसे में imports पर बड़ा tariff लगाने से केवल Canadian companies ही नहीं, बल्कि American manufacturers की production costs भी बढ़ सकती हैं। Industry representatives ने supply-chain disruption को लेकर चिंता जताई है। Ford, GM समेत Auto Companies पर असर नई tariff धमकी सामने आने के बाद global automobile companies के shares पर भी दबाव दिखाई दिया। Reuters के मुताबिक Ford, General Motors और Toyota समेत कुछ major automakers के stocks में गिरावट देखी गई क्योंकि investors को आशंका है कि Canada-US trade war vehicle production और costs को प्रभावित कर सकता है। अगर 50% tariff वास्तव में January 2027 से लागू होता है तो Canada में manufactured vehicles की American market में कीमत काफी बढ़ सकती है। Canada America के लिए कितना जरूरी? Canada और United States दुनिया के सबसे बड़े bilateral trading relationships में से एक साझा करते हैं। Canada की exports का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार में जाता है। वहीं United States भी Canada से oil, potash, metals, vehicles और कई critical raw materials खरीदता है। यही वजह है कि trade war लंबा खिंचने पर नुकसान केवल Canada तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी manufacturers और consumers पर भी higher costs का दबाव पड़ सकता है। Ontario ने दी Critical Minerals और Electricity की चेतावनी Canada के सबसे बड़े province Ontario के Premier Doug Ford ने भी अमेरिका को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि अगर trade dispute और बिगड़ता है तो Canada electricity और critical minerals जैसे strategic exports को भी leverage के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि अभी Canada ने इन exports को रोकने का अंतिम फैसला नहीं किया है। USMCA पर भी मंडराया संकट बढ़ता विवाद सिर्फ tariffs तक सीमित नहीं है। इससे US-Mexico-Canada Agreement (USMCA) के भविष्य पर भी सवाल उठ रहे हैं। दोनों देशों के बीच पिछले कई महीनों से trade pact, auto industry, steel-aluminum, dairy और अन्य sectors पर विवाद चलता रहा है। हाल की negotiations का टूटना इस economic relationship में और uncertainty जोड़ता है। USMCA ने North America में integrated manufacturing और tariff-free trade के बड़े हिस्से को आधार दिया था। क्या 50% Auto…

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भारत-जापान की बड़ी रणनीतिक साझेदारी! समुद्री सुरक्षा और Indo-Pacific सहयोग पर हुआ अहम समझौता

नई दिल्ली: भारत और जापान ने अपनी रणनीतिक और रक्षा साझेदारी को नई मजबूती देते हुए समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए Memorandum of Arrangement (MoA) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता 20 अगस्त को नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी के बीच हुई वार्ता के दौरान हुआ। दोनों देशों ने स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित Indo-Pacific को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। भारतीय नौसेना और जापानी Maritime Force के बीच बढ़ेगा सहयोग नए समझौते के तहत Indian Navy और Japan Maritime Self-Defense Force (JMSDF) के बीच सहयोग को और मजबूत किया जाएगा। इसमें समुद्री क्षेत्र की जानकारी साझा करना, समुद्री गतिविधियों की निगरानी, खोज एवं बचाव और मानवीय सहायता तथा आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में सहयोग शामिल है। इससे दोनों देशों की समुद्री स्थितियों को समझने और संभावित खतरों पर तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है। Indo-Pacific में Freedom of Navigation पर जोर भारत और जापान ने Free and Open Indo-Pacific के अपने साझा दृष्टिकोण को दोहराया। दोनों देशों ने समुद्री मार्गों की सुरक्षा, स्वतंत्र नौवहन और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप वैध समुद्री व्यापार को बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। यह सहयोग ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब Indo-Pacific क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। Joint Naval Shipbuilding पर भी बातचीत रक्षा सहयोग सिर्फ समुद्री निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा। भारत और जापान ने नौसैनिक जहाजों के संयुक्त विकास और निर्माण की संभावनाओं पर भी चर्चा की है। जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की उत्पादन क्षमता को साथ लाकर Make in India के तहत रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। दोनों देशों ने जहाजों की मरम्मत और maintenance facilities के पारस्परिक इस्तेमाल पर भी आगे काम करने की बात कही है। Defence Technology में भी बढ़ेगा सहयोग भारत और जापान ने उन्नत रक्षा तकनीक में सहयोग तेज करने पर सहमति जताई है। दोनों पक्ष co-development और co-production के नए अवसर तलाशेंगे, जिससे भारत के defence manufacturing ecosystem और Japanese technology के बीच साझेदारी बढ़ सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जापानी कंपनियों को भारतीय defence companies और startups के साथ Make in India के तहत co-development और co-production में भागीदारी के अवसर तलाशने की बात कही है। Maritime Security में Piracy के खिलाफ भी सहयोग समुद्री सुरक्षा समझौते में piracy, armed robbery और अन्य transnational crimes से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने की दिशा भी शामिल है। इससे Indian Ocean और Indo-Pacific के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा में दोनों देशों के बीच coordination मजबूत हो सकता है। चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच समझौता अहम भारत-जापान का यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब Indo-Pacific में चीन की बढ़ती सैन्य और समुद्री गतिविधियां क्षेत्रीय सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं। हालांकि दोनों देशों ने समझौते को किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में पेश नहीं किया है, लेकिन freedom of navigation, rules-based order और maritime security पर उनका साझा जोर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत-जापान रिश्तों में नया अध्याय भारत और जापान के बीच पहले से ही Special Strategic and Global Partnership है। अब नए maritime security framework, defence technology cooperation और संभावित joint shipbuilding के जरिए यह साझेदारी अधिक operational और practical दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच नौसैनिक अभ्यास, information sharing, ship repair, defence manufacturing और Indo-Pacific security में सहयोग और बढ़ने की उम्मीद है। स्रोत: PIB, DD India, PTI, Economic Times, Prime Minister’s Office Jai Rashtra News

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22 भारतीयों वाले दो जहाज हाईजैक! यमन और सोमालिया के पास समुद्री डकैती से मचा हड़कंप

नई दिल्ली: अरब सागर और हिंद महासागर से जुड़ी समुद्री सुरक्षा को लेकर शुक्रवार को बड़ी चिंता सामने आई। यमन और सोमालिया के तट के पास दो अलग-अलग घटनाओं में दो कमर्शियल जहाजों को समुद्री डाकुओं ने हाईजैक कर लिया। दोनों जहाजों पर कुल 22 भारतीय नागरिक सवार थे। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल दोनों जहाजों के भारतीय क्रू सदस्य सुरक्षित बताए जा रहे हैं। Gulf of Aden में 16 भारतीयों वाला टैंकर हाईजैक पहली घटना 20 अगस्त को Gulf of Aden में हुई। Eritrea-flagged oil products tanker MT Sibu 1 को यमन के तट से करीब 30 nautical miles दूर हथियारबंद समुद्री डाकुओं ने अपने कब्जे में ले लिया। जहाज पर कुल 20 क्रू सदस्य थे, जिनमें 16 भारतीय नागरिक शामिल हैं। बाकी क्रू में एक-एक Syrian, Sudanese और Iraqi नागरिक थे, जबकि एक सदस्य की राष्ट्रीयता की पुष्टि नहीं हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार करीब छह हथियारबंद समुद्री डाकू जहाज पर चढ़े और उन्होंने उसका नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। Somalia के Puntland तट पर दूसरा जहाज कब्जे में दूसरी घटना 17 अगस्त को Somalia के Puntland तट के पास हुई। Cameroon-flagged cargo vessel M/V LUTUF को समुद्री डाकुओं ने हाईजैक किया। इस जहाज पर कुल 10 क्रू सदस्य थे, जिनमें 6 भारतीय नागरिक शामिल हैं। रिपोर्टों के मुताबिक हथियारबंद हमलावर दो छोटी नावों से जहाज तक पहुंचे और उस पर कब्जा कर लिया। इस तरह दोनों घटनाओं को मिलाकर 22 भारतीय नागरिक समुद्री डकैती की घटनाओं से प्रभावित जहाजों पर मौजूद थे। भारतीय क्रू की सुरक्षा पर क्या अपडेट? भारतीय अधिकारियों की शुक्रवार को उपलब्ध जानकारी के अनुसार दोनों जहाजों पर मौजूद भारतीय क्रू सदस्य सुरक्षित हैं। हालांकि, जहाजों की मौजूदा स्थिति और आगे की घटनाक्रम पर भारतीय अधिकारी लगातार नजर बनाए हुए हैं। MT Sibu 1 मामले में संबंधित Recruitment and Placement Service Licence एजेंसी को घटना की रिपोर्ट और आगे के अपडेट e-Navik online marine casualty reporting system के जरिए जमा करने को कहा गया है। समुद्री सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता लगातार दो अलग-अलग घटनाओं ने Horn of Africa और Gulf of Aden में commercial shipping की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यह क्षेत्र वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और यहां से Red Sea तथा Suez Canal की ओर जाने वाले प्रमुख समुद्री मार्ग जुड़े हैं। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में piracy के साथ-साथ क्षेत्रीय संघर्ष और जहाजों पर हमलों का खतरा भी बना हुआ है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला? भारत दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापारिक देशों में शामिल है और बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक international merchant vessels पर काम करते हैं। ऐसे में किसी भी समुद्री सुरक्षा संकट का सीधा असर भारतीय seafarers की सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारतीय नौसेना पहले भी Gulf of Aden और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में commercial shipping की सुरक्षा तथा संकट में फंसे भारतीयों की मदद के लिए अभियान चला चुकी है। दो घटनाओं ने बढ़ाई चिंता एक ही सप्ताह में Somalia और Yemen के पास दो जहाजों का हाईजैक होना इस बात का संकेत है कि क्षेत्र में piracy का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खासकर भारतीय क्रू सदस्यों की मौजूदगी ने इस घटनाक्रम को भारत के लिए और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। फिलहाल राहत की सबसे बड़ी बात यह है कि उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार सभी 22 भारतीय क्रू सदस्य सुरक्षित बताए जा रहे हैं। आगे भारतीय अधिकारियों और संबंधित अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर नजर रहेगी। स्रोत: PTI, Hindustan Times, Business Standard, The Statesman Jai Rashtra News

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UN में भारत का बड़ा बयान! Terror Listings में राजनीतिक दखल के खिलाफ उठाई आवाज

न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकवाद से जुड़े प्रतिबंधों और terror listings की प्रक्रिया को लेकर भारत ने बुधवार को बड़ा बयान दिया। भारत ने UNSC से अपील की कि आतंकवादियों की सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और नियमों पर आधारित होनी चाहिए और किसी भी देश को परिषद की सदस्यता का इस्तेमाल आतंकवादियों को राजनीतिक संरक्षण देने के लिए नहीं करना चाहिए। आतंकियों को राजनीतिक संरक्षण देने पर भारत की आपत्ति भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि UNSC की सदस्यता का इस्तेमाल किसी आतंकवादी को “legitimise” करने या उसे राजनीतिक कारणों से संरक्षण देने के लिए नहीं होना चाहिए। भारत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों और आतंकवाद से जुड़े निर्णयों में पारदर्शिता तथा राजनीतिक प्रभाव को लेकर बहस चल रही है। भारत ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक व्यवस्था में objectivity और transparency को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। Terror Listing प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग भारत का कहना है कि आतंकवादी संगठनों और व्यक्तियों को UNSC sanctions lists में शामिल करने की प्रक्रिया स्पष्ट और तथ्य आधारित होनी चाहिए। इसी तरह किसी नाम को सूची से हटाने का फैसला भी राजनीतिक हितों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। UN Security Council के तहत आतंकवाद और counter-terrorism से संबंधित कई sanctions regimes पहले से लागू हैं। पाकिस्तान पर परोक्ष निशाना? भारत के बयान को पाकिस्तान के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई न करने का आरोप लगाता रहा है। हालांकि, ताजा बयान में भारत ने किसी एक देश का नाम लेकर आरोप लगाने के बजाय UN sanctions mechanism को मजबूत करने और राजनीतिक हस्तक्षेप रोकने पर जोर दिया। भारत पहले भी उठा चुका है मुद्दा आतंकवादी संगठनों की listing और delisting में राजनीतिक या धार्मिक आधार पर दोहरे मानदंडों के खिलाफ भारत पहले भी आवाज उठाता रहा है। भारत ने UN में यह रुख रखा है कि ऐसी प्रक्रिया objective होनी चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई में किसी तरह का double standard नहीं होना चाहिए। भारत ने UNSC 1267 sanctions regime के तहत आतंकवादियों की listing को लेकर भी सक्रिय भूमिका निभाई है। संसद की विदेश मामलों की समिति के अनुसार, भारत ने कई आतंकवादियों को सूचीबद्ध कराने के लिए प्रस्ताव आगे बढ़ाए हैं। UNSC में सुधार की मांग भी तेज भारत का यह बयान व्यापक UN Security Council reforms की उसकी मांग से भी जुड़ा है। नई दिल्ली लंबे समय से UNSC को ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की मांग करती रही है। भारत का तर्क है कि वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए परिषद की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना जरूरी है। आतंकवाद के खिलाफ भारत का सख्त रुख भारत ने दोहराया है कि आतंकवाद को किसी भी राजनीतिक, वैचारिक या अन्य आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। नई दिल्ली का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई बिना भेदभाव और बिना राजनीतिक दबाव के होनी चाहिए। आज के बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल प्रमुख हो गया है कि UNSC की sanctions प्रक्रिया को कितना पारदर्शी बनाया जा सकता है और क्या सदस्य देश राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर आतंकवाद के खिलाफ एक समान नीति अपना पाएंगे। स्रोत: United Nations, Moneycontrol, Times of India, Indian diplomatic statements Jai Rashtra News

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ईरान के साथ कारोबार पर Trump की चेतावनी! भारत के एक्सपोर्ट और तेल कारोबार पर बढ़ सकती है मुश्किल

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ आर्थिक संबंध रखने वाले देशों, कंपनियों और वित्तीय संस्थानों को कड़ी चेतावनी दी है। Trump ने ईरान के खिलाफ नए अभियान को “Economic D-Day” बताते हुए कहा कि जो भी देश Tehran को आर्थिक मदद या किसी तरह की “lifeline” देगा, उसे गंभीर आर्थिक परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। भारत के लिए क्यों अहम है Trump की चेतावनी? भारत और ईरान के बीच व्यापार पिछले कुछ वर्षों में काफी कम हुआ है, लेकिन दोनों देशों के बीच अभी भी महत्वपूर्ण कारोबारी संबंध हैं। 2025-26 में भारत का ईरान को निर्यात करीब $1.25 बिलियन रहा, जबकि भारत ने ईरान से करीब $370 मिलियन का आयात किया। यानी भारत का ईरान के साथ लगभग $880 मिलियन का व्यापार अधिशेष रहा। Trump की नई चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिका ईरान की अर्थव्यवस्था और तेल कारोबार पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यदि भविष्य में secondary sanctions या अन्य प्रतिबंधों का दायरा बढ़ता है, तो ईरान के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों के लिए भुगतान और लॉजिस्टिक्स मुश्किल हो सकते हैं। भारत ईरान को क्या-क्या भेजता है? भारत का ईरान को निर्यात केवल तेल से जुड़ा नहीं है। भारतीय कंपनियां ईरान को बासमती चावल, चाय, चीनी, फल, मसाले, अनाज और दवाइयां समेत कई उत्पाद भेजती हैं। ऐसे में अमेरिकी दबाव बढ़ने पर कृषि उत्पादों और फार्मास्यूटिकल्स से जुड़े निर्यातकों पर भी असर पड़ने की आशंका है। सबसे बड़ी चिंता भुगतान व्यवस्था और शिपिंग को लेकर है। यदि अमेरिकी प्रतिबंधों का enforcement और कड़ा होता है, तो भारतीय कारोबारियों को ईरानी खरीदारों से भुगतान प्राप्त करने और माल भेजने में अतिरिक्त मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। तेल कारोबार पर भी नजर ईरान से जुड़ा संकट भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि Strait of Hormuz वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। वहां जारी तनाव और समुद्री यातायात में व्यवधान के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। 19 अगस्त को Brent crude करीब $92 प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया था। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है। इसलिए लंबे समय तक ऊंची crude prices रहने पर देश के import bill, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। भारत के लिए एक राहत भी हालांकि, भारतीय निर्यातकों के लिए पूरी तस्वीर नकारात्मक नहीं है। वैश्विक सप्लाई में व्यवधान के बीच भारतीय रिफाइनरियां और ईंधन निर्यातक बढ़ी हुई मांग का फायदा भी उठा रहे हैं। Reuters के अनुसार भारतीय रिफाइनरियां वैश्विक तेल आपूर्ति में व्यवधान के बीच उच्च क्षमता पर काम कर रही हैं और एशियाई बाजारों में ईंधन की आपूर्ति बढ़ा रही हैं। इसके अलावा, भारत का ईरान के साथ मौजूदा व्यापार आकार देश की कुल अर्थव्यवस्था की तुलना में सीमित है। इसलिए तत्काल बड़ा झटका तय नहीं है, लेकिन तेल कीमतों और शिपिंग लागत में लगातार बढ़ोतरी भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण जोखिम बन सकती है। Trump ने क्या कहा? Trump ने कहा है कि जो देश या संस्थाएं ईरान को वित्तीय या कारोबारी मदद उपलब्ध कराती हैं, उन्हें “TREMENDOUS Economic Consequences” का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने ईरानी तेल की कथित तस्करी, cash transfers, currency swaps, exchange houses, ship registries और front companies पर भी कार्रवाई की बात कही है। अभी Trump ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि भारत समेत किन देशों पर किस तरह की नई कार्रवाई होगी। इसलिए फिलहाल भारत के लिए संभावित जोखिम को लेकर चिंता है, लेकिन किसी तत्काल भारतीय व्यापार पर नए अमेरिकी प्रतिबंध की घोषणा नहीं हुई है। आगे क्या होगा? अमेरिका के अगले कदम और Strait of Hormuz की स्थिति भारत के लिए सबसे अहम फैक्टर होंगे। अगर तनाव लंबा चलता है और crude oil लगातार महंगा रहता है, तो भारत के आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ने पर ईरान के साथ व्यापार करने वाले भारतीय निर्यातकों को भी नई compliance और payment चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती तेल की कीमत, शिपिंग सुरक्षा और ईरान के साथ व्यापार को अमेरिकी प्रतिबंधों से अलग बनाए रखना होगी। स्रोत: Reuters, NDTV, Times of India, AP Jai Rashtra News

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कश्मीर पर अमेरिकी राजदूत का बड़ा बयान! J&K को बताया ‘भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा’, पाकिस्तान ने जताई कड़ी आपत्ति

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत, अमेरिका और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने बुधवार को श्रीनगर दौरे के दौरान जम्मू-कश्मीर को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” बताया। उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। पहली बार जम्मू-कश्मीर पहुंचे अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने जम्मू-कश्मीर के अपने पहले दौरे के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की। बैठक के बाद उन्होंने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति में सुधार की सराहना की और कहा कि केंद्र तथा जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने सुरक्षा बेहतर करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। गोर ने जम्मू-कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता की भी तारीफ की और संकेत दिया कि अमेरिका क्षेत्र को लेकर अपनी मौजूदा ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है, ताकि अधिक अमेरिकी पर्यटक यहां आ सकें। पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को किया तलब अमेरिकी राजदूत के बयान पर पाकिस्तान ने कड़ा रुख अपनाया। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद में अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स नताली बेकर को तलब कर विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बताए जाने वाली टिप्पणी को खारिज करते हुए इसे “तथ्यात्मक रूप से गलत” बताया। इस्लामाबाद ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की अंतिम स्थिति को लेकर उसका अपना दावा है और उसने अमेरिकी राजदूत की टिप्पणी को स्वीकार करने से इनकार किया है। भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्यों अहम है बयान? सर्जियो गोर का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह ऐसे समय आया है जब अमेरिका भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ संवेदनशील कूटनीतिक संबंधों को संभाल रहा है। जम्मू-कश्मीर लंबे समय से दोनों देशों के बीच विवाद का प्रमुख मुद्दा रहा है। हालांकि, एक राजदूत की टिप्पणी को पूरी अमेरिकी विदेश नीति में औपचारिक बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में गोर के बयान और ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा की बात सामने आई है। कश्मीर में पर्यटन को लेकर भी बड़ा संकेत गोर ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा स्थिति में सुधार का उल्लेख करते हुए अमेरिकी यात्रा चेतावनी को कम करने की संभावना जताई। यदि भविष्य में एडवाइजरी का स्तर बदला जाता है, तो इससे जम्मू-कश्मीर में विदेशी पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद की जा सकती है। पाकिस्तान की आपत्ति से बढ़ी कूटनीतिक हलचल अमेरिकी राजदूत की टिप्पणी और पाकिस्तान के विरोध ने जम्मू-कश्मीर को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा बताया जाता रहा है, जबकि पाकिस्तान इस स्थिति को स्वीकार नहीं करता। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी राजदूत ने श्रीनगर में J&K को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” बताया और इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को तलब कर विरोध दर्ज कराया। स्रोत: Indian Express, Hindustan Times, Reuters/BDNews24, Anadolu, Economic Times Jai Rashtra News

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ईरान-अमेरिका तनाव फिर बढ़ा! शांति वार्ता अटकने के बीच ईरान के ‘पूरी तरह आक्रामक’ रुख की रिपोर्ट

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौते को लेकर चल रही बातचीत के अटकने के बीच ईरान ने अपना सैन्य रुख और ज्यादा आक्रामक करने के संकेत दिए हैं। एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने Reuters को बताया कि बातचीत रुकने के बाद ईरान ‘पूरी तरह आक्रामक’ सैन्य स्थिति अपना सकता है। सबसे ज्यादा चिंता रणनीतिक हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और यहां तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर सीधा असर पड़ सकता है। अमेरिका-ईरान वार्ता में इस जलमार्ग को दोबारा सामान्य रूप से खोलने का मुद्दा भी प्रमुख बना हुआ है। तनाव के बीच अमेरिका की ओर से भी सख्त रुख सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मौजूदा समझौते को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई है। वहीं, ईरान ने संकेत दिया है कि अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं तो वह सैन्य कार्रवाई को और तेज कर सकता है। इस घटनाक्रम का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड करीब 91.22 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि WTI भी 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार करता नजर आया। हॉर्मुज में संभावित आपूर्ति बाधित होने की आशंका तेल की कीमतों में तेजी की बड़ी वजह बनी हुई है। तनाव के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य में एक जहाज को अज्ञात प्रोजेक्टाइल से नुकसान पहुंचने की भी रिपोर्ट सामने आई है। घटना में चालक दल का एक सदस्य घायल हुआ, जिससे क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जल्द पटरी पर नहीं लौटती है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी, वैश्विक महंगाई और शेयर बाजारों में बढ़ी अस्थिरता देखने को मिल सकती है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर है। कूटनीतिक समाधान निकलता है या तनाव सैन्य टकराव की ओर बढ़ता है, आने वाले दिनों में यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। स्रोत: Reuters Jai Rashtra News

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इंडोनेशिया में फिर कांपी धरती, 5.7 तीव्रता के भूकंप से दहशत; कुछ दिन पहले आए 7.7 के झटकों के बाद फिर आफ्टरशॉक

जकार्ता: इंडोनेशिया में सोमवार को एक बार फिर भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए। 5.7 तीव्रता का भूकंप देश के पूर्वी हिस्से में एंडे के उत्तर-उत्तर-पश्चिम में दर्ज किया गया। यह झटका उस शक्तिशाली 7.7 तीव्रता के भूकंप के कुछ ही दिन बाद आया है, जिसने पूर्वी इंडोनेशिया में भारी तबाही मचाई थी। लगातार महसूस हो रहे हैं भूकंप के झटके 15 अगस्त को पूर्वी इंडोनेशिया में आए 7.7 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप के बाद क्षेत्र में लगातार आफ्टरशॉक्स दर्ज किए जा रहे हैं। Reuters के अनुसार सोमवार तक करीब 1,600 आफ्टरशॉक्स रिकॉर्ड किए जा चुके थे, जिनमें से एक झटका 5.6 तीव्रता का भी था। ऐसे में सोमवार का 5.7 तीव्रता का नया भूकंप प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ाने वाला है। फिलहाल नई बड़ी तबाही की सूचना नहीं ताजा 5.7 तीव्रता के भूकंप के बाद तत्काल किसी नई बड़ी क्षति या अतिरिक्त मौत की रिपोर्ट सामने नहीं आई है। हालांकि, पहले से प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान जारी होने के कारण प्रशासन और स्थानीय लोग अतिरिक्त झटकों को लेकर सतर्क हैं। 7.7 तीव्रता के भूकंप में भारी नुकसान 15 अगस्त को आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने पूर्वी इंडोनेशिया के East Nusa Tenggara क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया था। भूकंप के कारण घरों और अन्य इमारतों को नुकसान पहुंचा, भूस्खलन हुए और कई सड़कें बाधित हो गईं। Reuters के मुताबिक, इस आपदा में कम से कम 53 लोगों की मौत और 130 से अधिक लोग घायल हुए हैं। हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। हजारों लोग अब भी राहत शिविरों में भूकंप प्रभावित इलाकों में हजारों लोग अपने घरों से बाहर रहने को मजबूर हैं। कई परिवार स्कूलों, सरकारी इमारतों और अस्थायी शिविरों में शरण लिए हुए हैं। लगातार आफ्टरशॉक्स के कारण लोग क्षतिग्रस्त घरों में वापस जाने से भी डर रहे हैं। राहत एजेंसियां प्रभावित क्षेत्रों तक जरूरी सामान और चिकित्सा सहायता पहुंचाने में जुटी हैं। भूकंप के बाद भी खतरा बरकरार इंडोनेशिया Pacific Ring of Fire पर स्थित है, जिसके कारण यहां भूकंप और ज्वालामुखीय गतिविधियां सामान्य हैं। मौजूदा स्थिति में लगातार आफ्टरशॉक्स ने प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्य को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। निष्कर्ष इंडोनेशिया में 5.7 तीव्रता का नया भूकंप ऐसे समय आया है जब देश अभी 7.7 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप से उबर रहा है। फिलहाल नए झटके से किसी बड़ी अतिरिक्त क्षति की सूचना नहीं है, लेकिन लगातार आफ्टरशॉक्स के कारण प्रभावित इलाकों में दहशत और सावधानी दोनों बनी हुई हैं। Source: Reuters, The Times of India, LiveMint जय राष्ट्र न्यूज़

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तारिक रहमान की भारत यात्रा पर बांग्लादेश की शर्त, शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर ढाका का दबाव

नई दिल्ली/ढाका: भारत और बांग्लादेश के बीच प्रस्तावित उच्चस्तरीय बैठक से पहले दोनों देशों के रिश्तों में नया तनाव सामने आया है। बांग्लादेश ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा के लिए अनुकूल राजनीतिक माहौल बनाने की जरूरत बताई है और इसी संदर्भ में भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग दोहराई है। ढाका ने क्या कहा? बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता AKM शाहिदुल करीम ने कहा कि भारत और बांग्लादेश के अधिकारी पिछले कई सप्ताह से तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा को लेकर संपर्क में हैं। हालांकि, ढाका का कहना है कि यात्रा के लिए एक “अनुकूल माहौल” तैयार किया जाना जरूरी है। बांग्लादेश ने भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण संबंधी अपने अनुरोध पर जल्द कार्रवाई करने को कहा है। इसके अलावा ढाका ने भारत में मौजूद अन्य कथित फरार आरोपियों को भी सौंपने की मांग की है। शेख हसीना का मुद्दा क्यों बना अहम? शेख हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए बड़े राजनीतिक उथल-पुथल के बाद भारत आ गई थीं। इसके बाद बांग्लादेश की नई सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की और भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग की। भारत को बांग्लादेश की ओर से प्रत्यर्पण अनुरोध मिल चुका है और भारतीय पक्ष ने कहा है कि मामले की कानूनी प्रक्रियाओं के तहत समीक्षा की जा रही है। तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा तारिक रहमान की भारत यात्रा अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुई है। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच संभावित दौरे को लेकर बातचीत चल रही है और यह यात्रा भारत-बांग्लादेश संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है। इस दौरे में शेख हसीना के प्रत्यर्पण के अलावा द्विपक्षीय व्यापार, सीमा प्रबंधन और जल बंटवारे जैसे मुद्दे भी चर्चा में आ सकते हैं। भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर असर शेख हसीना का मुद्दा दोनों देशों के संबंधों में सबसे संवेदनशील विषयों में से एक बन चुका है। ढाका लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है, जबकि भारत इस मामले को अपनी कानूनी प्रक्रिया के अनुसार देख रहा है। तारिक रहमान की संभावित यात्रा को दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन प्रत्यर्पण की मांग ने इस यात्रा को राजनयिक रूप से और संवेदनशील बना दिया है। निष्कर्ष बांग्लादेश ने तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा से पहले शेख हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे को प्रमुखता से उठा दिया है। ढाका चाहता है कि नई दिल्ली उसके प्रत्यर्पण अनुरोध पर तेजी से कार्रवाई करे और यात्रा के लिए अनुकूल माहौल तैयार हो। अब नजर भारत की प्रतिक्रिया और दोनों देशों के बीच आगामी राजनयिक बातचीत पर है। Source: Reuters, NDTV, Hindustan Times, Indian Express जय राष्ट्र न्यूज़

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