नई दिल्ली/अयोध्या, 2 नवंबर 2026: अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे और दान की रकम में कथित हेराफेरी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई से स्वतंत्र जांच कराने की मांग वाली याचिकाओं का निपटारा कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत को बताया कि विशेष जांच टीम (एसआईटी) इस मामले में आठ आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की आगे की न्यायिक कार्यवाही अयोध्या की संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत को सौंप दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की स्थिति रिपोर्ट पर विचार किया।
अदालत ने कहा कि चूंकि मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए सीबीआई जांच की मांग वाली याचिकाओं का निपटारा किया जाता है।
साथ ही संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया गया कि आगे की कार्यवाही कानून के अनुसार की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने आरोपों की सत्यता या मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।
आठ आरोपियों के खिलाफ दाखिल हुआ आरोपपत्र
उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष जांच टीम ने 23 सितंबर 2026 को अयोध्या की अदालत में आठ आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था।
इससे पहले 21 सितंबर को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है और जल्द आरोपपत्र दाखिल कर दिया जाएगा।
अब इस आरोपपत्र के आधार पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया चलेगी।
चढ़ावे की गिनती के दौरान कथित हेराफेरी
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जांच में दान की रकम की गिनती के दौरान कथित हेराफेरी सामने आई है।
उनके अनुसार, कुछ लोगों पर गिनती के समय नकदी निकालने और बाद में उसका निजी उपयोग करने का आरोप है।
जांच एजेंसी का दावा है कि कथित रूप से निकाली गई रकम का इस्तेमाल बैंक खातों में जमा करने तथा संपत्ति खरीदने में किया गया।
SIT को मिलीं कथित अनियमितताओं की 105 घटनाएं
विशेष जांच टीम की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार मंदिर परिसर के तीर्थयात्री सुविधा केंद्र में स्थित दान-गणना कक्ष से नकदी बिना अनुमति निकालने या छिपाने की 105 संदिग्ध घटनाओं की पहचान हुई।
जांच में सीसीटीवी फुटेज, बैंक खातों, वित्तीय लेनदेन, संपत्ति संबंधी दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों की पड़ताल की गई।
इन घटनाओं की कानूनी जिम्मेदारी तय करने का काम अब संबंधित अदालत में साक्ष्यों के आधार पर होगा।
बैंक खातों और संपत्ति निवेश की जांच
सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जांच के दौरान आरोपियों के बैंक खातों और संपत्ति खरीद से संबंधित रिकॉर्ड खंगाले गए।
उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि किसी संपत्ति के बिक्री विलेख में कीमत ₹15 लाख दिखाई गई, जबकि उसकी अनुमानित कीमत करीब ₹50 लाख थी।
जांच एजेंसी को संदेह है कि शेष रकम का भुगतान नकद किया गया होगा। हालांकि यह जांच पक्ष की दलील है और इसकी अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होगी।
मंदिर की मूर्तियां और अन्य चढ़ावे सुरक्षित बताए गए
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से बताया गया कि मामले में लेखापरीक्षा भी कराई गई थी।
सॉलिसिटर जनरल के अनुसार मंदिर की मूर्तियां, धार्मिक वस्तुएं और अन्य चढ़ावे सुरक्षित पाए गए हैं।
इस जानकारी के आधार पर जांच का मुख्य केंद्र दान में प्राप्त नकदी की गिनती और कथित अनधिकृत निकासी रही।
CBI जांच की मांग क्यों उठी थी?
इस मामले में कई याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
उनकी मांग थी कि श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित वित्तीय अनियमितताओं की स्वतंत्र और अदालत की निगरानी में जांच कराई जाए।
याचिकाओं में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड की व्यापक लेखापरीक्षा कराने की मांग भी शामिल थी।
याचिकाकर्ताओं में अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी, अजय कुमार राय, राष्ट्रीय जनता दल के सांसद सुधाकर सिंह और हिंदू धर्म परिषद शामिल थे।
25 जून को दर्ज हुआ था मामला
अदालत के सामने रखी गई जांच संबंधी जानकारी के अनुसार 25 जून 2026 को अयोध्या के राम जन्मभूमि थाने में आठ व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।
शुरुआती जांच अयोध्या पुलिस ने की। इस दौरान सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान, तलाशी से प्राप्त सामग्री, बैंक रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटाए गए।
बाद में मामले की जांच विशेष जांच टीम को सौंपी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने फोरेंसिक लेखापरीक्षक जोड़ने को कहा था
27 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच टीम के साथ एक फोरेंसिक लेखापरीक्षक को जोड़ने का निर्देश दिया था।
इसका उद्देश्य वित्तीय रिकॉर्ड, नकदी के लेनदेन और कथित हेराफेरी से जुड़े साक्ष्यों की अधिक विस्तृत जांच सुनिश्चित करना था।
सितंबर में जांच की स्थिति रिपोर्ट पेश किए जाने के बाद अदालत ने आरोपपत्र दाखिल होने की प्रक्रिया पर भी ध्यान दिया।
याचिकाकर्ता भी कर सकेंगे मुकदमे में सहयोग
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जनहित का पहलू शामिल है।
इसी कारण याचिकाकर्ताओं को संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत में कानूनी प्रावधानों के अनुसार कार्यवाही में सहयोग करने की अनुमति दी गई है।
इसका अर्थ है कि वे कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर अपना पक्ष रख सकते हैं और आवश्यक सहायता दे सकते हैं।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को दोषी माना?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने इस मामले में आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है।
आरोपपत्र दाखिल होना दोष सिद्ध होना नहीं है।
आगे अदालत में साक्ष्यों और कानूनी दलीलों के आधार पर तय होगा कि आरोप साबित होते हैं या नहीं।
भविष्य में चोरी रोकने के उपायों पर सवाल
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाया।
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि संबंधित अधिकारियों ने सुरक्षा और निगरानी से जुड़े कुछ अतिरिक्त उपाय किए हैं।
हालांकि इन उपायों का पूरा विवरण सुनवाई की उपलब्ध रिपोर्टों में सामने नहीं आया है।
क्या अब CBI जांच होगी?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच कराने का आदेश नहीं दिया है।
एसआईटी द्वारा आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बाद अदालत ने इस संबंध में लंबित याचिकाओं का निपटारा कर दिया है।
अब मामला स्थानीय न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे बढ़ेगा।
आगे क्या होगा?
अयोध्या की संबंधित अदालत आरोपपत्र और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अगली कानूनी प्रक्रिया तय करेगी।
आरोपियों को अपना बचाव रखने का अवसर मिलेगा और अभियोजन पक्ष अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करेगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सीबीआई जांच की मांग वाली कार्यवाही समाप्त हुई है, लेकिन कथित चढ़ावा हेराफेरी का आपराधिक मामला समाप्त नहीं हुआ है।
स्रोत – सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही, उत्तर प्रदेश विशेष जांच टीम की स्थिति रिपोर्ट, लाइव लॉ, बार एंड बेंच, इंडियन एक्सप्रेस, पीटीआई।
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