महाराजा हरि सिंह जयंती विशेष: शिक्षा, सामाजिक सुधार और जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय से जुड़ा ऐतिहासिक सफर
जम्मू: जम्मू-कश्मीर के अंतिम शासक महाराजा हरि सिंह का जन्म 23 सितंबर 1895 को जम्मू के अमर महल में हुआ था। महज 13 वर्ष की उम्र में उन्हें शिक्षा के लिए राजस्थान के अजमेर स्थित मयो कॉलेज भेजा गया। बाद में उन्होंने देहरादून के Imperial Cadet Corps में सैन्य प्रशिक्षण लिया। महाराजा हरि सिंह का जीवन सामाजिक सुधारों, शिक्षा के विस्तार और 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय से जुड़े ऐतिहासिक फैसलों के लिए याद किया जाता है। 13 साल की उम्र में मयो कॉलेज भेजे गए महाराजा हरि सिंह, राजा अमर सिंह के पुत्र थे और महाराजा प्रताप सिंह के भतीजे थे। 1908 में 13 वर्ष की आयु में उन्हें मयो कॉलेज, अजमेर भेजा गया। 1909 में पिता की मृत्यु के बाद उनकी शिक्षा पर ब्रिटिश प्रशासन ने विशेष ध्यान दिया। मयो कॉलेज के बाद उन्होंने देहरादून में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया और 1915 में जम्मू-कश्मीर की State Forces के Commander-in-Chief बनाए गए। 1925 में संभाली जम्मू-कश्मीर की सत्ता महाराजा प्रताप सिंह के निधन के बाद 1925 में हरि सिंह जम्मू-कश्मीर के महाराजा बने। उनके शासनकाल में प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था में कई बदलाव किए गए। उनके कार्यकाल को लेकर इतिहासकारों की अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं, लेकिन शिक्षा के विस्तार और कुछ सामाजिक भेदभाव कम करने के लिए उठाए गए कदम उनके शासन की प्रमुख विशेषताओं में गिने जाते हैं। शिक्षा के विस्तार पर दिया जोर महाराजा हरि सिंह के शासनकाल में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार पर जोर दिया गया। 1930 के आसपास राज्य में अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा लागू करने के प्रयास किए गए और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी अलग व्यवस्थाएं विकसित की गईं। उनके दौर में स्कूलों की संख्या बढ़ाने, छात्रवृत्ति देने और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को शिक्षा से जोड़ने के उपाय किए गए। छुआछूत के खिलाफ भी उठाए कदम महाराजा हरि सिंह के शासन में वंचित समुदायों के लिए सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों और अन्य सुविधाओं तक पहुंच बढ़ाने से जुड़े आदेश जारी किए गए। 31 अक्टूबर 1932 को राज्य के मंदिरों को वंचित जातियों के लोगों के दर्शन और पूजा के लिए खोलने की घोषणा भी की गई थी। इस फैसले का उस समय कुछ धार्मिक वर्गों ने विरोध किया था। लंदन में भारत के सम्मान और समानता की बात 1930 में हुए पहले Round Table Conference में महाराजा हरि सिंह ने भारतीय रियासतों के प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया। सम्मेलन में उन्होंने भारत को सम्मान और समानता का दर्जा मिलने की बात कही और भारतीय रियासतों को भावी संघीय व्यवस्था में बराबरी का स्थान दिए जाने का समर्थन किया। सम्मेलन के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनके समान अधिकारों और नागरिकता से जुड़े विचार दर्ज हैं। 1947 में लिया सबसे महत्वपूर्ण फैसला भारत की आजादी के समय जम्मू-कश्मीर एक रियासत था। अक्टूबर 1947 में कबायली हमलावरों के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश और तेजी से बिगड़ती सुरक्षा स्थिति के बीच महाराजा हरि सिंह ने भारत से सैन्य सहायता मांगी। उन्होंने Instrument of Accession पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ। भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में accession की प्रक्रिया अक्टूबर 1947 में पूरी होने का उल्लेख है। यह फैसला जम्मू-कश्मीर के आधुनिक राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बना। आज भी 23 सितंबर को मनाई जाती है जयंती जम्मू-कश्मीर सरकार ने 2022 में 23 सितंबर को महाराजा हरि सिंह की जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया था। आधिकारिक गजट के मुताबिक हर साल 23 सितंबर को यह अवकाश मनाया जाता है। 23 सितंबर 2026 को उनकी 131वीं जयंती पर जम्मू-कश्मीर में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। 1961 में हुआ निधन महाराजा हरि सिंह का निधन 26 अप्रैल 1961 को मुंबई में हुआ। वह जम्मू-कश्मीर के अंतिम शासक महाराजा थे। उनके पुत्र डॉ. कर्ण सिंह बाद में जम्मू-कश्मीर की राजनीति और भारतीय सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे। महाराजा हरि सिंह की विरासत पर राजनीतिक और ऐतिहासिक मतभेद मौजूद हैं, लेकिन शिक्षा सुधार, सामाजिक बदलाव और 1947 के Instrument of Accession में उनकी भूमिका जम्मू-कश्मीर के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। source – Ministry of External Affairs / Jammu & Kashmir Official Gazette / Round Table Conference Records / ThePrint जय राष्ट्र न्यूज़

