Uddhav Thackeray news

महाराष्ट्र में टूटेगा कांग्रेस-उद्धव ठाकरे का गठबंधन या रहेंगे साथ! बिहार चुनाव में क्या पड़ेगा असर?

बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) इस साल के अंत तक होनी है। जिसको लेकर राजनीतिक पार्टियां जोड़-तोड़ और गठजोड़ में जुटी हैं। इन सबके बीच एक घटना ने इंडिया गठबंधन (India Alliance) यानी (महाविकास आघाड़ी) में हलचल मचा दी है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) और राज ठाकरे (Raj Thackeray) फिर से एक साथ आ गए हैं। दोनों ठाकरे बंधु बीते शनिवार को वर्ली में एक साथ मंच साझा किया, लेकिन इस भरत मिलाप से कांग्रेस (Congress) ने दूरी बनाए रखी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या इंडिया गठबंधन (India Alliance) यानी (महाविकास आघाड़ी) में फूट पड़ गया है? क्या कांग्रेस (Congress) महाराष्ट्र में अब भी शिवसेना यूबीटी साथ रहेगी?  एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के नेतृत्व वाली शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय निरुपम ने ठाकरे बंधुओं के मिलन के बाद कटाक्ष करते हुए महाविकास आघाड़ी (एमवीए) को नए नाम से संबोधित किया। निरुपम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि, ”यह एमवीए गठबंधन नहीं, बल्कि टीवीए यानी ठाकरे विकास आघाड़ी गठबंधन है।” संजय निरुपम ने कहा कि, महाराष्ट्र में कांग्रेस (Congress) को गठबंधन से घटाकर एक नया राजनीतिक गठबंधन बना है। पहले इस गठबंधन को एमवीए कहा जाता था यानी महा विकास अघाड़ी, लेकिन अब इसका नया नाम टीवीए रख देना चाहिए, क्योंकि यह ‘ठाकरे विकास अघाड़ी’ बन चुका है।  बिहारियों पर अत्याचार करने वालों के साथ कांग्रेस- केसी त्यागी  बिहार चुनावों (Bihar Assembly Elections) से ठीक पहले महाराष्ट्र में हुए इस गठबंधन को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के साथ अभी भी गठबंधन में रहेगी या फर इनसे दूरी बना लेगी। इस नए गठबंधन पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेसी नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने निशाना साधा था। चव्हाण ने मीडिया से बातचीत में कहा था राज उद्धव अगर मराठी भाषा को लेकर सरकारी आदेश वापस लेने का श्रेय अकेले लेना चाहते हैं, तो हमें कोई परेशानी नहीं। लेकिन अगर वे राजनीतिक रूप से हमारे साथ आना चाहते हैं, तो इस पर सोचना पड़ेगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधायक हर्षवर्धन सपकाल ने भी कहा कि ठाकरे परिवार अगर साथ मिलकर सरकारी आदेश वापस लेने का जश्न मनाना चाहता हैं तो हमे कोई परेशानी नहीं, लेकिन भाइयों के बीच संभावित राजनीतिक गठबंधन पर अलग मत है। वहीं दूसरी तरफ जेडीयू नेता केसी त्यागी ने भी इंडिया गठबंधन पर हमला होगा। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता का सबसे ज्यादा उत्पीड़न मुंबई में होता है। वहां पर कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी गठबंधन में हैं, लेकिन बिहारियों के शोषण का विरोध नहीं कर रही है। जो बताता है कि कांग्रेस किस तरह से बिहारियों पर अत्याचार पर मौन सहमति दे रही है।   इसे भी पढ़ें:- महाराष्ट्र में हिंदी के विरोध में एकजुट दिखे उद्धव और राज ठाकरे, 20 साल बाद एक ही मंच पर आए साथ उद्धव और राज के साथ दिखने पर बिहार में कांग्रेस को हो सकता है नुकसान  राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में जल्द ही चुनाव होने हैं, ऐसे में उद्धव और राज ठाकरे के बिहार विरोधी स्वभाव को देखते हुए कांग्रेस अब उद्धव ठाकरे के साथ रहने से परहेज कर सकती है। अगर कांग्रेस अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश करती है तो उसे हिंदी भाषी बिहार के आगामी चुनाव (Bihar Assembly Elections) में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। बता दें कि राज ठाकरे (Raj Thackeray) की राजनीति ही उत्तर भारतीयों का विरोध करने पर टिकी है। इनकी पार्टी के कार्यकर्ता आए दिन उत्तर भारतीयों को पीटने को लेकर चर्चा में रहते हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी इस मामले में मनसे के पाले में ही खड़ी नजर आती है। महाराष्ट्र में इसी साल के अंत तक स्थानीय निकाय चुनाव होने की संभावना है, ऐसे में यहां पर उत्तर भारतीयों का खिलाफ जहर उगलने की राजनीति अपने चरम पर पहुंच चुकी है।  Latest News in Hindi Today Hindi news Uddhav Thackeray #congress #shivsenaupta #uddhavthackeray #maharashtrapolitics #biharelections2025 #politicalnews #alliancebreak #indianpolitics

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Nishikant Dubey Sparks Controversy Over Urdu

Nishikant Dubey Sparks Row Over Urdu Language Remark: भाषा विवाद पर भड़के बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे, कहा- “यदि हिम्मत है तो उर्दू भाषी लोगों को मार कर दिखाओ”

पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र में मराठी बनाम हिंदी विवाद जारी है। हिंदी भाषा थोपने के नाम पर जबरन परप्रांतियों को मारा जा रहा है। बढ़ते तनाव के बीच भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने ओपन चैलेंज किया है। महाराष्ट्र में हिंदी भाषी लोगों पर हमले करने वालों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा “यदि हिम्मत है तो उर्दू भाषी लोगों को मार कर (Nishikant Dubey Sparks Row Over Urdu Language Remark) दिखाओ।” ध्यान देने वाली बात यह कि निशिकांत दुबे का यह बयान ऐसे समय में आया जब हिंदी विरोध में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एकजुट हो गए हैं। उन्होंने हिंदी भाषियों को मारने वालों से कहा, अपने घर में तो कुत्ता भी शेर होता है? कौन कुत्ता कौन शेर खुद ही फैसला कर लो। अपनी इस बात को निशिकांत दुबे ने मराठी में भी पोस्ट किया है।” हालांकि यह पहली बार नहीं जब निशिकांत दुबे ने इस मुद्दे को न उठाया हो। आपको बता दें कि इससे पहले भी उन्होंने महाराष्ट्र की भाषा को लेकर राजनीति का मुद्दा उठाया था और उसे कश्मीरी पंडितों की स्थिति से जोड़ते हुए एक्स पर लिखा कि “मुंबई में शिवसेना, मनसे के राज ठाकरे और एनसीपी के पवार साहब और कश्मीर में कश्मीरी हिंदुओं को भगाने वाले सलाउद्दीन और मौलाना मसूद अजहर और मुंबई में हिंदुओं पर अत्याचार करने वाले दाऊद इब्राहिम इन सबमें क्या फर्क है? एक ने हिंदू न होने के कारण अत्याचार किया और दूसरे अब हिंदी बोलने के कारण अत्याचार कर रहे हैं?”  मंत्री नितेश राणे ने उर्दू बोलने वालों से हिंदी बुलवाने के लिए कहा (Nishikant Dubey Sparks Row Over Urdu Language Remark) था गौरतलब हो कि निशिकांत दुबे के अलावा भी इससे पहले भाजपा के दूसरे नेता भी हिंदी बोलने वालों पर हमला करने वालों को चुनौती दे चुके हैं। मंत्री नितेश राणे ने उर्दू बोलने वालों से हिंदी बुलवाने के लिए कहा (Nishikant Dubey Sparks Row Over Urdu Language Remark) था। यही नहीं उन्होंने ठाकरे ब्रदर्स पर हिंदू समाज को बांटने का भी आरोप लगाया था। गौरतलब हो कि “महाराष्ट्र सरकार ने अप्रैल महीने में हिंदी भाषा को लेकर एक फैसला लिया था, जिसमें उन्होंने कक्षा 1 से 5 तक के सभी छात्रों के लिए तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी को अनिवार्य कर दिया था। फडणवीस के इस फैसले का जमकर विरोध हुआ। अंत में उन्होंने अपना यह फैसला वापस लेते हुए कहा कि “हिंदी तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य नहीं है। अगर कोई छात्र दुसरी भाषा लेना चाहता है तो वह ले सकता है।” बता दें कि पिछले दिनों मनसे पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मराठी भाषा न बोलेने पर एक दुकानदार की पिटाई कर दी थी।  इसे भी पढ़ें:- महाराष्ट्र में हिंदी के विरोध में एकजुट दिखे उद्धव और राज ठाकरे, 20 साल बाद एक ही मंच पर आए साथ महाराष्ट्र में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं, तो तीसरी भाषा के रूप में हिंदी ही क्यों होनी चाहिए- आदित्य ठाकरे बढ़ते तनाव के बीच शिवसेना (यूबीटी) विधायक आदित्य ठाकरे का भी बयान सामने आया (Nishikant Dubey Sparks Row Over Urdu Language Remark) है। आदित्य ने कहा, कि महाराष्ट्र में हिंदी बनाम मराठी भाषा की कोई बात ही नहीं है। यह मुद्दा सिर्फ सोशल मीडिया पर ही चल रहा है, महाराष्ट्र की जमीन पर ऐसा कोई विवाद नहीं है। उन्होंने कहा कि “विवाद सिर्फ कक्षा 1 के छात्रों के तीन भाषाओं के बोझ को लेकर था और तीसरी भाषा हिंदी क्यों होनी चाहिए?” बता दें कि “आदित्य ठाकरे का कहना था कि “महाराष्ट्र में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं, तो तीसरी भाषा के रूप में हिंदी ही क्यों होनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि “हम अपनी मातृभाषा का अपमान नहीं सहेंगे।” बता दें कि आदित्य ठाकरे ने हिंदी भाषा विवाद को लेकर कहा कि “सोशल मीडिया और गोदी मीडिया मराठी बनाम हिंदी का मुद्दा फैला रहे हैं। महाराष्ट्र की जमीन पर तो ऐसा कोई मुद्दा है ही नहीं।” आदित्य ने स्पष्ट करते हुए कहा कि “विवाद सिर्फ कक्षा 1 के छात्रों के तीन भाषाओं के बोझ को लेकर था। तीसरी भाषा हिंदी ही क्यों होनी चाहिए? महाराष्ट्र में अनेक भाषाएं बोली जाती है, लेकिन हम अपने ही राज्य में अपनी मातृभाषा का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।” इस बीच ठाकरे ने कहा कि “हम किसी भी भाषा को अपने ऊपर थोपना बर्दाश्त नहीं करेंगे।” भाषा को लेकर आदित्य ठाकरे ने कहा था कि “हम नहीं चाहते कि महाराष्ट्र या मराठी भाषा का अपमान हो। उन्होंने अपने एक बयान में कहा था कि “हम चाहते हैं कि हमारी मातृभाषा मराठी का अपमान न हो। कोई भी भाषा जबरन थोपी न जाए। उन्होंने कहा कि “हम नहीं चाहते कि कोई कानून अपने हाथ में ले। लेकिन जब इसका उल्टा होता है और मराठी या महाराष्ट्र का अपमान होता है तो मामला बिगड़ सकता है।” Latest News in Hindi Today Hindi news Nishikant Dubey #NishikantDubey #UrduControversy #BJPMP #LanguageRow #BreakingNews #Politics #UrduSpeakers

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Uddhav and Raj Thackeray reunite after 20 years

Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha: महाराष्ट्र में हिंदी के विरोध में एकजुट दिखे उद्धव और राज ठाकरे, 20 साल बाद एक ही मंच पर आए साथ

किसी ज़माने में एक दूसरे के धुर विरोधी रहे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे मराठी भाषा के मुद्दे पर शनिवार को एक साथ एक ही मंच पर नजर आए। दोनों चचेरे भाइयों को एक साथ देख दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं का उत्साह सातवें आसमान पर (Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha) है। गौरतलब हो कि दो दशक पहले ही राज ठाकरे ने अपनी अलग राह चुन ली थी। अब दोनों भाई एक ही मंच पर साथ आए तो उद्धव ने ऐलान कर दिया कि “दोनों के बीच दूरियां खत्म हो चुकी हैं और वह साथ रहने के लिए राज ठाकरे के साथ आए हैं।”उद्धव ने कहा, “कई वर्षों बाद मेरी और राज ठाकरे की मुलाकात मंच पर हुई है।” राज ने मुझे “सन्माननीय उद्धव ठाकरे” कहा, मैं भी कहता हूं, सन्माननीय राज ठाकरे। उनका कार्य भी बड़ा है। मेरे भाषण से ज्यादा अहम है हम दोनों का साथ आना। हम दोनों के बीच जो दूरियां थीं, वो अब खत्म हो चुकी हैं। हम एक साथ आए हैं, साथ में रहने के लिए।” भाजपा अफवाहों की फैक्ट्री है, हम असली मराठी बोलने वाले कट्टर हिंदू (Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha) हैं राज की तारीफ करते हुए उद्धव ने कहा कि “राज ठाकरे का काम सभी ने देखा (Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha) है। मराठी हिंदू भाइयों और बहनों, राज ठाकरे ने सारे मुद्दे बेहतर ढंग से रखे हैं और अब मुझे कुछ और कहने की जरूरत महसूस नहीं होती। हम साथ आए हैं, साथ रहने के लिए। भाजपा अफवाहों की फैक्ट्री है। हम असली मराठी बोलने वाले कट्टर हिंदू हैं। मराठी आदमी अगर आंदोलन कर रहा हो और आप उसे गुंडागिरी कह रहे हो, तो फिर हां, हम गुंडे हैं। संयुक्त महाराष्ट्र के आंदोलन में हमने मुंबई हासिल की है।” इस बीच एकनाथ शिंदे को आड़े हाथों लेते हुए उद्धव ने कहा, “आज कई तांत्रिक बिजी होंगे। नींबू काट रहे होंगे, भैंसा काट रहे होंगे। लेकिन इस काले जादू के खिलाफ हमारे बालासाहेब ठाकरे लड़े थे और हम उसी विरासत को आगे ले जाएंगे।”  आप (फडणवीस) सिर्फ नाम के मराठी हैं, आप असली मराठी हैं या नहीं, यह चेक करना (Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha) होगा वो यहीं नहीं रुके, फडणवीस को संबोधित करते हुए उद्धव ने कहा कि “आप सिर्फ नाम के मराठी हैं। आप असली मराठी हैं या नहीं, यह चेक करना होगा। हिंदुस्तान हमें मंजूर है, लेकिन हिंदी की जबरदस्ती हम सहन नहीं (Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha) करेंगे। जब मैं मुख्यमंत्री था, तब मैंने मराठी भाषा को अनिवार्य किया था। सत्ता आती है, जाती है, लेकिन हमारी असली ताकत हमारी एकजुटता में होनी चाहिए। संकट आता है, तो हम साथ आते हैं, लेकिन संकट के बाद दूर चले जाते हैं। अब हमें हमेशा साथ रहना चाहिए।”  बीजेपी को लेकर उद्धव ने कहा कि “इन्होंने हमारा इस्तेमाल किया और फिर छोड़ दिया, लेकिन अब हम दोनों मिलकर तुम्हें फेंक देंगे। फडणवीस ने कहा है कि भाषा के नाम पर गुंडागर्दी सहन नहीं करेंगे। हां, हम गुंडे हैं, लेकिन हम भाषा के लिए लड़ेंगे। अगर इंसाफ नहीं मिलेगा, तो गुंडागर्दी भी करेंगे।” इसे भी पढ़ें:-  क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी? अब तक हमने कुछ नहीं किया (Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha) है- राज ठाकरे  इस बीच राज ठाकरे ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि “आपके पास विधानभवन में सत्ता है, लेकिन हमारे पास सड़कों की सत्ता है। आज महाराष्ट्र जब एकसाथ खड़ा हुआ, तो सरकार को यह दिखाई दिया होगा कि जब यह राज्य एकजुट होता है, तब क्या (Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha) होता है। कार्यकर्ताओं को नसीहत देते हुए राज ठाकरे ने कहा “उस दिन मीरा रोड में एक व्यवसायी के साथ मारपीट हुई थी। क्या उसके माथे पर लिखा था कि वह गुजराती है? अब तक हमने कुछ नहीं किया है। उस आदमी को मराठी आनी चाहिए। बेवजह किसी को मत मारो, लेकिन अगर कोई ज्यादा नाटक करता है, तो उसके कान के नीचे जरूर बजाओ। और अगली बार जब किसी को पीटो, तो उसका वीडियो मत निकालो।” कहने की जरूरत नहीं, महाराष्ट्र की सियासत में आज का दिन बेहद अहम माना जा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह कि दोनों का साथ आना वोटो की मजबूरी है यह कुछ और? खैर, बीएमसी इलेक्शन नजदीक है। देखना दिलचस्प होगा कि दोनों एक ही पार्टी के झंडे के नीचे आते हैं या दोनों मिलकर अपनी अपनी पार्टी से चुनाव लड़ते हैं।  Latest News in Hindi Today Hindi news Uddhav & Raj Unite Against Hindi After 20 Years in Maha #UddhavThackeray #RajThackeray #HindiOpposition #MaharashtraPolitics #MarathiPride #ShivSena #MNS #PoliticalUnity

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Rahul Gandhi Slams Centre on US Tariff Policy Deadline

अमेरिकी टैरिफ नीति पर राहुल गांधी का केंद्र सरकार पर तीखा हमला: क्या भारत झुकेगा ट्रंप की डेडलाइन के आगे?

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी (Congress Leader Rahul Gandhi) ने एक बार फिर केंद्र सरकार पर सीधा हमला किया है। इस बार उनके निशाने पर है भारत और अमेरिका (India and America) के बीच चल रहा टैरिफ विवाद। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) और केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (Union Commerce Minister Piyush Goyal) पर आरोप लगाया कि वे अमेरिका के दबाव में आकर राष्ट्रीय हितों से समझौता कर सकते हैं। राहुल गांधी का ट्वीट और आरोप राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा है कि पीयूष गोयल (Piyush Goyal) चाहे जितना सीना ठोक लें, मेरी बात लिख लीजिए, मोदी ट्रंप की टैरिफ डेडलाइन (Tariff Deadline) के सामने चुपचाप झुक जाएंगे। यह बयान ऐसे समय पर आया है जब भारत और अमेरिका (India and America) के बीच व्यापार शुल्क (Tariff) को लेकर काफी तनाव बना हुआ है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि सरकार अमेरिकी दबाव के सामने आत्मसमर्पण कर सकती है। क्या है टैरिफ विवाद? इस पूरे विवाद की जड़ अमेरिका की वह नीति है जिसके तहत ट्रंप प्रशासन (Trump Government) ने लगभग 100 देशों पर जवाबी टैरिफ लगाए थे, जिनमें भारत पर 26% तक का शुल्क शामिल था। अमेरिका ने हालांकि इन टैरिफ को 90 दिनों के लिए टाल दिया था, लेकिन यह छूट अब 9 जुलाई को समाप्त होने जा रही है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच व्यापार डील को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी बाजार व्यवस्था को अधिक खुला करे और अमेरिकी उत्पादों (American Products) पर लगने वाले शुल्कों में कटौती करे। वहीं भारत की कोशिश है कि वह व्यापार संतुलन को बनाए रखते हुए अपने घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा करे। सरकार का पक्ष: भारत किसी दबाव में नहीं केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल (Union Commerce Minister Piyush Goyal) ने राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि भारत अपने व्यापार समझौते केवल अपनी शर्तों पर करता है। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका, यूरोपीय संघ, न्यूजीलैंड, चिली और ओमान जैसे कई देशों के साथ वार्ता जारी है, लेकिन भारत तभी समझौता करेगा जब वह राष्ट्रहित में हो। पीयूष गोयल ने यह भी कहा है कि हम किसी डेडलाइन के दबाव में आकर फैसले नहीं करते। जब कोई डील देश के लिए लाभदायक होती है, तभी उसे मंजूरी दी जाती है। विपक्ष क्यों उठा रहा है सवाल? राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ही नहीं, बल्कि विपक्ष के अन्य नेता भी लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि सरकार अमेरिकी दबाव में क्यों दिख रही है। विपक्ष का कहना है कि जब ट्रंप प्रशासन ने भारत पर टैरिफ लगाया, तब भारत ने पर्याप्त रूप से आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दी। राहुल गांधी ने इसे सरकार की कमजोरी बताते हुए कहा कि यह आत्मनिर्भरता के दावों के खिलाफ है। इसे भी पढ़ें:-  क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी? क्या होगा 9 जुलाई के बाद? अब जब टैरिफ में दी गई 90 दिनों की छूट 9 जुलाई को खत्म हो रही है, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत का अगला कदम क्या होगा। अगर अमेरिका दोबारा टैरिफ लागू करता है और भारत उसके सामने कोई रियायत देता है, तो विपक्ष को सरकार को घेरने का एक और मौका मिल जाएगा। वहीं, अगर भारत अमेरिकी दबाव को नकारता है, तो दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में तनाव और बढ़ सकता है। भारत की रणनीति क्या हो सकती है? भारत के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है। एक ओर उसे अमेरिका जैसे बड़े व्यापारिक साझेदार के साथ संबंध मजबूत रखने हैं, वहीं दूसरी ओर उसे घरेलू उद्योगों और किसान वर्ग के हितों की रक्षा भी करनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ऐसे समझौते करने चाहिए जो दीर्घकालिक रणनीति और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखते हुए किए जाएं। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के आरोपों ने एक बार फिर से टैरिफ नीति और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों (India-US trade relations) को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस दबाव से कैसे निपटती है। क्या वह अमेरिकी समयसीमा के आगे झुकती है या एक मजबूत और संतुलित निर्णय लेती है। आने वाले दिनों में इसका असर न सिर्फ भारत की विदेश नीति पर, बल्कि देश की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ सकता है।  Latest News in Hindi Today Hindi news Narendra Modi #RahulGandhi #USTariffPolicy #TrumpDeadline #IndiaUSRelations #ModiGovt #TradePolicy #RahulVsModi

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Yogi govt revenue change,

Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP: योगी सरकार का बड़ा फैसला, लेखपाल नहीं बल्कि अब नायब तहसीलदार करेगा राजस्व संबंधी शिकायतों की जांच

अपने निडर और निर्भीक फैसलों के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश सरकार ने राजस्व मामलों की जांच को लेकर एक बड़ा फैसला किया है। फैसले के मुताबिक उत्तर प्रदेश में अब लेखपाल की रिपोर्ट ही अंतिम नहीं मानी (Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP) जाएगी। मुख्यमंत्री कार्यालय ने जनता दर्शन में आ रही शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए लेखपाल स्तर की जांच पर परिवर्तन किया है। इस फैंसले के बाद अब राजस्व संबंधी शिकायतों की जांच लेखपाल नहीं बल्कि नायब तहसीलदार करेंगे। जानकारी के मुताबिक अपर मुख्य सचिव एसपी गोयल ने सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि नायब तहसीलदार से नीचे कोई अधिकारी राजस्व मामलों की जांच नहीं करेगा। शिकायतकर्ता को सुनने के बाद ही नायब तहसीलदार अपनी रिपोर्ट देंगे। और नायब तहसीलदार की ही रिपोर्ट मानी जाएगी।  यूपी की जनता लेखपाल की मनमानी से (Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP) थी त्रस्त  दरअसल, बिगत कई महीनों से शिकायतें मिल रही थी कि लेखपाल स्तर की जांच में पारदर्शिता का अभाव है और कई बार पीड़ित पक्ष को सुना ही नहीं जाता। शिकायत यह भी थी (Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP) कि कई बार लेखपाल रसूखदारों और प्रधानों के झांसे में आकर शिकायतकर्ता को सुने बगैर मनमाने ढंग से रिपोर्ट बना देता था। कई बार शिकायत करने के बावजूद लेखपाल अपनी मनमानी से बाज नहीं आ रहे थे। ये हाल अमूमन यूपी के सभी जिलों में था। यूपी की जनता लेखपाल की मनमानी से त्रस्त थी। जनता इस कदर त्रस्त थी कि बार-बार मुख्यमंत्री कार्यालय में इस बाबत शिकायत की गई। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए सरकार ने यह निर्णय लिया है कि अब केवल रिपोर्ट नहीं, सुनवाई के बाद होगा न्याय। कहने की जरूरत नहीं, सीएम ऑफिस, जनता की समस्याओं के प्रति गंभीर हो गया है, इस वजह से अब किसी की रिपोर्ट से नहीं, सुनवाई से न्याय होगा। उपजिलाधिकारी (एसडीएम) स्तर पर अंतिम निर्णय और समाधान होगा।  अब लेखपाल (लेखपाल) के बजाय नायब तहसीलदार इन शिकायतों की जांच (Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP) करेंगे बता दें कि उत्तर प्रदेश में राजस्व संबंधी शिकायतों की जांच की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब लेखपाल (लेखपाल) के बजाय नायब तहसीलदार इन शिकायतों की जांच (Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP) करेंगे। यह निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा लिया गया है, ताकि राजस्व मामलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ाई जा सके। जानकारी के लिए बता दें कि पहले, राजस्व संबंधी शिकायतों मसलन: वारासत, आय प्रमाण पत्र, जमीन विवाद, निवास प्रमाण पत्र आदि की प्रारंभिक जांच लेखपाल किया करते थे। लेकिन अब यह जिम्मेदारी नायब तहसीलदार को सौंपी दी गई है। अपर मुख्य सचिव (राजस्व) एसपी गोयल ने सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि नायब तहसीलदार से नीचे का कोई अधिकारी राजस्व शिकायतों की जांच नहीं करेगा। इसे भी पढ़ें:-  क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी? लेखपालों पर अक्सर रिश्वतखोरी और पक्षपात के आरोप लगते रहे (Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP) हैं दरअसल, इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार को कम करना। न सिर्फ भ्रष्टाचार को कम करना है बल्कि शिकायतों के निपटारे में पारदर्शिता भी लाना है। बता दें कि लेखपालों पर अक्सर रिश्वतखोरी और पक्षपात के आरोप लगते रहे (Naib Tehsildar to Handle Revenue Complaints in UP) हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या इस फैसले से भ्रष्टाचार पर नकेल कस सकेगी? क्या समय रहते सभी शिकायतों का निपटारा हो पाएगा?  इसके अलावा साथ ही बड़ा सवाल यह भी क्या नायब तहसीलदार के स्तर पर जांच होने से जवाबदेही बढ़ेगी और शिकायतों का निपटारा अधिक विश्वसनीय हो सकेगा? देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय पर यह आदेश क्या रंग लाता है और जनता की शिकायतों का किस हद तक समाधान होता है। कहने की जरूरत नहीं, इस फैसले से लोगों में न्याय की उम्मीद जगी जरूर है। कम से कम लेखपालों की मनमानी से लोगों को निजात मिल जाएगी।  Latest News in Hindi Today Hindi news Tehsildar #UPGovernment #NaibTehsildar #RevenueComplaints #YogiAdityanath #LekhpalUpdate #UttarPradeshNews #GovtDecision

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Eknath Shinde controversy

एकनाथ शिंदे के ‘जय गुजरात’ के नारे पर विपक्ष ने मचाया बवाल, मांगा इस्तीफा, बचाव में उतरे सीएम फडणवीस, शिंदे ने भी दी सफाई

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) द्वारा जय महाराष्ट्र के साथ जय गुजरात का नारा देने से राज्य में एक नया राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। विपक्षी दलों ने शिंदे के इस नारे को मराठी अस्मिता पर हमला बताते हुए माफी की है। विपक्ष के इस हमले के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) भी एकनाथ शिंदे के बचाव में उतर आए और सफाई देते हुए कहा कि मराठी अस्मिता इतनी कमजोर नहीं है कि वह ‘जय गुजरात’ बोलने मात्रा से कमजोर पड़ जाएगी।  बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने बीते शुक्रवार को पुणे में जयराज स्पोर्ट्स एंड कन्वेंशन सेंटर का उद्घाटन करने पहुंचे थे। इस कार्यक्रम में सीएम देवेंद्र फडणवीस के साथ उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) और अजित पवार भी मौजूद थे। कार्यक्रम में भाषण के दौरान डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने मंच से ही ‘जय हिंद, जय महाराष्ट्र, जय गुजरात’ का नारा लगाया। शिंदे के इसी नारे का विपक्षी दलों ने विरोध किया है।  हर्षवर्धन सपकाल ने एकनाथ शिंद से मांगा इस्तीफा  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हर्षवर्धन सपकाल (Harshvardhan Sapkal) ने एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के इस बयान पर निशाना साधते हुए कहा कि जय गुजरात’ का नारा सिर्फ चाटुकारिता नहीं है, बल्कि हर गौरवान्वित महाराष्ट्रवासी का अपमान है। मराठी मानुष के साथ इस ‘विश्वासघात’ के लिए शिंदे को इस्तीफा देना चाहिए। सपकाल ने यह भी कहा कि यह बहुत शर्म की बात है कि उपमुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठा व्यक्ति ‘जय महाराष्ट्र’ की जगह ‘जय गुजरात’ का नारा लगा रहा है। यह चाटुकारिता और सियासी गुलामी का प्रतीक है।  मराठी अस्मिता इतनी कमजोर नहीं है कि ‘जय गुजरात’ बोलने से कमजोर पड़ जाए  विपक्ष के इस आलोचना के बाद एकनाथ शिंदे के समर्थन में उतरते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने कहा, ” विपक्ष शायद भूल गया कि चिकोड़ी में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण करते हुए शरद पवार ने भी ‘जय महाराष्ट्र, जय कर्नाटक’ का नारा लगाया था, तो क्या उन्हें कर्नाटक ज्यादा पसंद है?” फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने विपक्ष की सोच को संकुचित बताते हुए कहा कि हमारी मराठी अस्मिता इतनी कमजोर नहीं है कि वह ‘जय गुजरात’ बोलने मात्रा से कमजोर पड़ जाएगी। मराठी मानुष की सोच बहुत विशाल है, विपक्ष उसे सीमित नहीं कर सकता है। सबसे पहले हम सभी भारतीय हैं और हमें महाराष्ट्र पर गर्व है। इसका यह मतलब नहीं होना चाहिए कि हम दूसरे राज्यों का अपमान करें। ‘एक भारत’ का विचार ही हमारी एकता और संस्कृति की मजबूती है और इस विभाजित करने की हर कोशिश को नाकाम किया जाएगा। सीएम फडणवीस ने इस दौरान भाषा विवाद पर सख्त लहजे में कहा, “मराठी भाषा पर हर किसी को  गर्व करना चाहिए, लेकिन भाषा के नाम पर हिंसा करना स्वीकार्य नहीं है। मराठी न बोलने पर लोगों से मारपीट कर कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इन दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।  इसे भी पढ़ें:-  क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी? गुजराती समुदाय के सम्मान में लगाया नारा- शिंदे एकनाथ शिंदे ने भी अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि, ”उन्होंने यह नारा कार्यक्रम में मौजूद गुजराती समुदाय के सम्मान में लगाया था। जिस भव्य खेल परिसर का उद्घाटना हुआ उसके  निर्माण में गुजराती लोगों का भी योगदार है। हमारे राज्य में मराठी और गुजराती लोग मिलकर एकजुटता के साथ रहते हैं। इसीलिए मैंने भाषण के दौरान ‘जय हिंद’, ‘जय महाराष्ट्र’ और ‘जय गुजरात’ का नारा लगाया। ‘जय हिंद’ जहां हमारे देश की शान है, तो वहीं ‘जय महाराष्ट्र’ हमारे राज्य का गर्व है।  ‘जय गुजरात’ का नारा इसलिए लगाया क्योंकि गुजराती समाज को उनके योगदान के लिए सम्मान देना चाहता था।  Latest News in Hindi Today Hindi news Devendra Fadnavis #EknathShinde #JaiGujarat #PoliticalControversy #MaharashtraPolitics #DevendraFadnavis #OppositionDemand #ShindeClarification

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BJP and Terrorists Alike

भाजपा और आतंकवादी एक, दोनों धर्म पूछकर हमला करते हैं…कांवड़ यात्रा पर सपा नेता के बयाद से यूपी के सियासत में उबाल 

सावन महीने में होने वाली कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) अभी शुरू नहीं हुआ है, लेकिन इस यात्रा को लेकर उत्तर प्रदेश में में सियासी पारा अभी से हाई हो गया है। कांवड़ मार्ग पर पड़ने वाली दुकान मालिकों के नाम और उनकी पहचान सार्वजनिक करने संबंधी राज्य सरकार के आदेश जारी होने के बाद से वार-पलटवार का दौर शुरू हो गया है। इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी (SP) और भाजपा (BJP) आमने-सामने हैं और एक दूसरे पर धर्म की राजनीति करने का आरोप लगा रही है। समाजवादी पार्टी (SP) के विधायक रविदास मेहरोत्रा (Ravidas Mehrotra) ने तो भाजपा (BJP) पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए भाजपा (BJP) नेताओं की तुलना आतंकवादियों से कर दी। जिसके बाद विवाद और बढ़ गया है।   सपा (SP) के वरिष्ठ विधायक रविदास मेहरोत्रा (Ravidas Mehrotra) ने राज्य की योगी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) के रास्ते में आने वाले दुकानदारों से उनकी जाति और धर्म पूछना नजायज है। यह सरकार जिस तरह से कार्य कर रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भाजपा और आतंकवादियों में कोई अंतर नहीं है। ये दोनों धर्म पूछकर आम जनता पर हमला करते हैं। सपा विधायक के इस विवादित बयान ने राज्य की सियासत में उबाल ला दिया है। सपा विधायक के बयान पर भाजपा ने भी आक्रामक जवाब दिया है।  भाजपा ने राक्षस से की सपा की तुलना   भाजपा के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी (Rakesh Tripathi) ने कहा कि सपा के नेता मजहबी तुष्टीकरण से खास वर्ग को साधने के लिए जानबूझकर इस तरह के बयान दे रहे हैं। अखिलेश यादव ने अपने नेताओं को सनातन विरोधी बयान देने का निर्देश दे रखा है कि वो हिन्दुओं की आस्था पर हमला करें। जिससे पवित्र कांवड़ यात्रा में विघ्न डाला जा सके। यह उसी तरह का कार्य है, जैसे सतयुग में राक्षस् हमारे संतों के हवन-यज्ञ में विघ्न डालते थे। सपा को सनातन विरोधी यह प्रयास महंगा पड़ेगा। सरकार ने बताया क्यों नेम प्लेट जरूरी  विवाद बढ़ता देख राज्य सरकार ने भी पूरे मामले पर स्थिति साफ की है। राज्य सरकार ने बयान जारी कर बताया कि दुकानों पर उनके मालिक का नेम प्लेट लगाने का निर्देश सिर्फ कांवड़ यात्रा के लिए ही नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने, ग्राहकों को धोखाधड़ी से बचाने और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दिए गया है। इस मामले में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी सफाई दी है। उन्होंने कहा कि हर धर्म के त्योहार को शांतिपूर्वक संपन्न कराना हमारी सरकार का लक्ष्य है। जो व्यवस्था बनाई गई है वह किसी खास धर्म के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए है। विपक्ष इसका  अनावश्यक विरोध कर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रही है।  इसे भी पढ़ें:-  क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी? कांग्रेस भी भाजपा पर हुई हमलावर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह (Ravidas Mehrotra) ने इस मुद्दे पर भाजपा सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि क्या दुकानदारों द्वारा लाइसेंस नंबर दिखाना पर्याप्त नहीं है? क्या नेम प्लेट लगाने की अनिवार्यता होनी चाहिए? यह भाजपा द्वारा एक खास धर्म के लोगों पर निशाना साधने का प्रयास है। वहीं कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इसे राज्य की साझी विरासत पर हमला बताते हुए कहा कि भाजपा सरकार राज्य की शांति को भंग करना चाहती है, इसीलिए इस तरह के नियम लागू किए जा रहे हैं। भाजपा के इन हरकतों को राज्य की जनता अच्छी तरह से पहचानती है। इसी तरह मौलाना तौकीर रजा ने भी कहा कि जब श्रद्धालु बड़ी संख्या में यात्रा करते हैं, तब खुले में मांस बिक्री का मैं भी विरोध करता हूं, लेकिन नेम प्लेट का उद्देश्य क्या है? यह राज्य सरकार को स्पष्ट करना चाहिए।  Latest News in Hindi Today Hindi news Ravidas Mehrotra #BJP #SPLeader #KanwarYatra #UPPolitics #ReligiousPolitics #Controversy #BreakingNews #IndiaNews

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Congress Sanitary Pad Scheme Sparks Controversy in Bihar Polls

बिहार चुनाव में महिलाओं को साधने की कोशिश: कांग्रेस की ‘सैनिटरी पैड स्कीम’ पर उठा विवाद

बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) से पहले राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने चुनावी वादों और अभियानों के ज़रिए जनता को लुभाने की कोशिश में लगे हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस पार्टी (Congress Party) ने राज्य की महिलाओं को साधने के लिए एक नई पहल की शुरुआत की है। पार्टी ने माई बहिन मान योजना (Maai Bahin Maan Yojana) के तहत महिलाओं के बीच 5 लाख सैनिटरी पैड (Sanitary Pads) बांटने की योजना बनाई है। हालांकि यह स्कीम अब राजनीतिक विवाद का कारण बन गई है और विपक्ष खासतौर से बीजेपी (BJP) ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। महिलाओं को जागरूक करने का दावा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार (Rajesh Kumar, State Congress President) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस योजना की घोषणा करते हुए कहा कि महिलाओं के स्वास्थ्य, स्वच्छता और सम्मान को ध्यान में रखते हुए यह विशेष अभियान चलाया जा रहा है। उनका कहना है कि प्रदेश की 5 लाख महिलाओं तक मुफ्त सैनिटरी नैपकिन (Sanitary Pads) पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, जो कि महिला कांग्रेस की अगुवाई में वितरित किए जाएंगे। इस अभियान का उद्देश्य ग्रामीण और पिछड़े इलाकों की महिलाओं को मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना है, जो आज भी एक बड़ा सामाजिक मुद्दा बना हुआ है। विवाद की वजह: पैकेट पर राहुल गांधी की तस्वीर इस सामाजिक अभियान पर विवाद तब शुरू हुआ जब वितरित किए जाने वाले सैनिटरी पैड (Sanitary Pads) के पैकेट पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तस्वीर छपी हुई पाई (Rahul Gandhi photo on Sanitary Pads) गई। इससे इस योजना की राजनीतिक मंशा पर सवाल उठने लगे। बीजेपी (BJP) ने इसे प्रचार का एक तरीका बताया है और कांग्रेस (Congress) पर चुनावी लाभ के लिए महिलाओं की समस्याओं का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है। बीजेपी प्रवक्ता कुंतल कृष्णा ने मीडिया से कहा कि यह कांग्रेस की चापलूसी की पराकाष्ठा और मानसिक दिवालियापन का प्रमाण है। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की तस्वीर सैनिटरी पैड (Sanitary Pads) के पैकेट पर लगाकर कांग्रेस ने यह साबित कर दिया है कि वह अपने नेताओं को कहां स्थापित करना चाहती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर कांग्रेस केवल चुनावी स्टंट कर रही है। ‘माई बहिन मान योजना’ क्या है? कांग्रेस पार्टी की ‘माई बहिन मान योजना (Maai Bahin Maan Yojana) एक ऐसी सामाजिक और चुनावी पहल है, जिसके तहत पार्टी ने महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये देने का वादा किया है। यह राशि विशेष रूप से वंचित, ग्रामीण और कामकाजी महिलाओं को दी जाएगी। इस योजना को पार्टी ने महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बताया है और कहा है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो इस योजना को लागू किया जाएगा। स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी सामाजिक आवश्यकता भारत जैसे विकासशील देश में विशेषकर बिहार जैसे राज्य में मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता अब भी एक वर्जित विषय बना हुआ है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार बिहार में केवल 30% महिलाएं ही सैनिटरी नैपकिन का नियमित इस्तेमाल करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा और भी कम है। ऐसे में यदि कोई राजनीतिक पार्टी महिलाओं तक मुफ्त सैनिटरी नैपकिन पहुंचाने का कार्य करती है, तो वह निश्चित रूप से एक ज़रूरी सामाजिक कदम कहा जा सकता है, बशर्ते इसमें राजनीतिक लाभ की मंशा हावी न हो। क्या है विशेषज्ञों की राय? स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यों से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता और शिक्षा को बढ़ावा देना आवश्यक है, लेकिन इसे राजनीतिक प्रचार के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करना निंदनीय है।  कांग्रेस की 5 लाख सैनिटरी पैड (Sanitary Pads) बांटने की योजना एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल हो सकती थी, यदि इसे केवल महिलाओं की मदद और जागरूकता तक सीमित रखा जाता। लेकिन राजनीतिक छवि निर्माण के प्रयासों ने इस योजना को विवादों में ला खड़ा किया है। यह स्पष्ट है कि बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) में महिलाएं एक बड़ा वोट बैंक बनकर उभरी हैं और सभी पार्टियां उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं। सवाल यह नहीं है कि सैनिटरी पैड (Sanitary Pads) बांटे जाएं या नहीं, सवाल यह है कि क्या महिलाओं की गरिमा को बनाए रखते हुए, उन्हें राजनीति से ऊपर रखकर सहायता प्रदान की जाएगी? चुनावी लाभ से परे जाकर महिलाओं के लिए सोचने का वक्त अब आ गया है। Latest News in Hindi Today Hindi Rahul Gandhi Sanitary Pads #BiharElections2025 #CongressScheme #SanitaryPadControversy #WomenVoters #PoliticalDebate

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CM Yogi Adityanath approves 'UPCOS'

उत्तर प्रदेश में आउटसोर्स भर्ती के लिए नया नियम: मुख्यमंत्री योगी ने दिया ‘UPCOS’ को मंजूरी

उत्तर प्रदेश सरकार ने आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्तियों और उनके हितों की रक्षा को लेकर एक बड़ा कदम उठाते हुए एक अहम फैसला लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक (Cabinet Meeting) में उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (Universal Pharma-Coding System {UPCOS}) के गठन को मंजूरी दे दी गई है। यह निगम कंपनी एक्ट के तहत गठित किया जाएगा और इसका उद्देश्य न केवल आउटसोर्स भर्ती में पारदर्शिता लाना है, बल्कि कर्मचारियों के अधिकारों और सुरक्षा को भी सुनिश्चित करना है। क्या है यूपीकॉस (UPCOS)? UPCOS यानी Uttar Pradesh Corporation for Outsourced Services राज्य का एक नया सरकारी निकाय होगा, जो अब राज्य में होने वाली सभी आउटसोर्स भर्तियों की निगरानी और काम-काज की देखभाल करेगा। यह निगम कंपनी एक्ट के अंतर्गत रजिस्टरकिया जाएगा और एक स्वतंत्र नियामक संस्था (Independent Regulatory Body) की तरह काम करेगा। इसकी स्थापना से पहले आउटसोर्स भर्तियाँ निजी एजेंसियों के माध्यम से की जाती थीं, जिन पर कई बार पारदर्शिता और शोषण के आरोप लगे हैं। भर्ती प्रक्रिया में आएगा बदलाव अब यूपी में आउटसोर्स के ज़रिए की जाने वाली सभी नियुक्तियाँ UPCOS के माध्यम से ही होंगी। इसमें खास बात यह है कि भर्ती में SC, ST, OBC, EWS, महिलाओं, दिव्यांगजनों और पूर्व सैनिकों को आरक्षण का लाभ मिलेगा। इतना ही नहीं तलाकशुदा महिलाओं को भी प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे सामाजिक रूप से पिछड़े और हाशिए पर खड़े वर्गों को समान अवसर मिल सके। मुख्य सचिव होंगे अध्यक्ष UPCOS की प्रशासनिक संरचना भी काफी स्पष्ट है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार निगम के अध्यक्ष उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव होंगे। इसके साथ ही एक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और एक डायरेक्टर की नियुक्ति की जाएगी। राज्य स्तर पर ही नहीं, मंडल और जिला स्तर पर भी भर्ती समितियों का गठन किया जाएगा, ताकि स्थानीय स्तर पर भर्ती की प्रक्रिया सुचारु रूप से हो सके। भर्ती के लिए निजी एजेंसियों का चयन GeM (Government e-Marketplace) पोर्टल के जरिए किया जाएगा और ये एजेंसियाँ 3 साल की अवधि के लिए नियुक्त की जाएंगी। भर्ती में अनुभव को भी प्राथमिकता दी जाएगी। UPCOS की एक खास भूमिका यह भी होगी कि यह रेगुलेटरी बॉडी की तरह काम करेगा। इसका मतलब है कि यह निगम केवल भर्ती ही नहीं करेगा, बल्कि भर्ती एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी नजर रखेगा। यदि कोई एजेंसी नियमों का उल्लंघन करती है, तो निगम उन्हें ब्लैकलिस्ट, डिबार या दंडित कर सकेगा। इस कदम से एजेंसियों की जवाबदेही सुनिश्चित होगी और कर्मचारियों के साथ शोषण या भेदभाव की घटनाओं पर अंकुश लगेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया है कि नियमित पदों पर आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं की जाएगी, ताकि सरकारी ढांचे की स्थिरता बनी रहे और नियमित नियुक्तियाँ बाधित न हों। इसे भी पढ़ें:-  क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी? क्यों जरूरी था UPCOS का गठन? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) ने बताया कि पिछले काफी समय से आउटसोर्स कर्मियों की शिकायतें सामने आ रही थीं। वेतन कटौती, EPF/ESI का लाभ न मिलना, ओवरटाइम के बावजूद भुगतान न होना और अनुचित कार्य-घंटों जैसी समस्याएं आम थीं। इन समस्याओं के पीछे मुख्य रूप से भर्ती एजेंसियों की लापरवाही और मनमानी थी। इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह निर्णय लिया कि एक केंद्रीकृत और पारदर्शी प्रणाली बनाई जाए जो कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा कर सके।  सामाजिक न्याय की दिशा में कदम UPCOS सामाजिक न्याय की दिशा में एक बेहतर निर्णय माना जा रहा है । इसमें वंचित वर्गों को न केवल भागीदारी दी गई है, बल्कि उन्हें प्राथमिकता भी दी गई है। इस तरह राज्य सरकार यह संदेश देना चाहती है कि विकास और अवसर सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होने चाहिए। उत्तर प्रदेश में UPCOS का गठन आउटसोर्स भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इससे न केवल आउटसोर्स कर्मियों को अधिकार मिलेगा, बल्कि भर्ती प्रणाली में अनुशासन और स्थिरता भी आएगी। यह योजना सामाजिक समानताऔर श्रमिक हितों की रक्षा का एक संतुलित मॉडल पेश करती है, जो अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।  Latest News in Hindi Today Hindi news Yogi Adityanath #UPCOS #YogiAdityanath #UttarPradeshJobs #OutsourcingRecruitment #UPJobs #UPNews #GovernmentJobs

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Owaisi's Absence

Will Owaisi’s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?: क्या बिहार चुनाव में ओवैसी को गठंबंधन का हिस्सा न बनाना लालू को पड़ सकता है भारी?

साल के अंत में बिहार में चुनाव होने हैं। चुनाव भले ही साल के अंत में होने हैं लेकिन सरगर्मियां अभी से गई हैं। सभी राजनीतिक दल अभी से अपना-अपना नफा नुकसान देखने लगे हैं। इसी कड़ी में हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम असदुद्दीन ओवैसी भी अपनी पैठ जमाने के लिए इंडिया गठबंधन में शामिल होना चाहते (Will Owaisi’s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?) हैं। इसके चलते एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने बाकायदा लालू यादव को पत्र लिखा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो ओवैसी लालू के साथ हाथ मिलाना चाहते हैं? ओवैसी इंडिया गठबंधन में इसलिए भी शामिल होना हैं क्योंकि उनकी नजर मुस्लिम वोटों पर है। वैसे तो बिहार में हर बार की तरह इस बार भी सभी की नजर मुस्लिम वोटो पर है। हो भी क्यों न, बिहार में 50 से अधिक सीटों पर मुस्लिम वोटर्स काबिज जो हैं। बता दें कि मुस्लिम बिहार की कुल आबादी का 17 प्रतिशत है। ध्यान देने वाली बात यह कि बिहार में कभी भी मुस्लिम वोटर एकतरफा वोट कास्ट नहीं करते हैं। बिहार में मुस्लिम जेडीयू, आरजेडी को वोट करते रहे हैं। 2020 के विधानसभा में 76 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स इंडिया गठबंधन के साथ (Will Owaisi’s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?) थे आंकड़ों पर गौर करें तो अब तक इंडिया गठबंधन को मुस्लिम वोट सबसे ज्यादा मिलता रहा है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन को 87 प्रतिशत मुस्लिमों ने वोट किया था। जबकि 2020 के विधानसभा में 76 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स इंडिया गठबंधन के साथ (Will Owaisi’‘s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?) थे। बात करें साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव की तो इस चुनाव में आरजेडी को ओवैसी की पार्टी ने काफी नुकसान पहुंचाया था। जिसका सीधा फायदा जेडीयू को हुआ था। जेडीयू पिछले चुनाव में मात्र 43 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। जिसके लिए वे चिराग पासवान की पार्टी को जिम्मेदार मानते हैं। हालांकि उनको जो सीटें मिली हैं उसमें सीमांचल का योगदान अधिक है। इसकी सबसे बड़ी वजह ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम थी। वैसे भी जिस राज्य में मुस्लिम आबादी अधिक होती है, वहां पर ओवैसी पहुंच जाते हैं और विपक्षी पार्टियों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाते हैं। कारण यही जो विरोधी दल उन्हें बीजेपी की बी भी कहते हैं। हालांकि ओवैसी और बीजेपी दोनों इसे सिरे से ख़ारिज करते हैं।  चुनाव के कुछ समय बाद ही ओवैसी के 5 में से 4 विधायक आरजेडी में शामिल हो गए (Will Owaisi’s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?) थे कहने की जरूरत नहीं, साल 2020 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों के बिखरने से एनडीए को फायदा हुआ था। हालांकि ये बात आरजेडी ख़ारिज करती है। ऐसा इसलिए कि आरजेडी के मुखिया लालू यादव को लगता है कि बिहार में अमूमन अधिकतर मुस्लिम वोटर्स उन्हीं की पार्टी को वोट करता है। दरअसल, लंबे समय से लालू यादव बिहार में एमवाई समीकरण को साधे हुए (Will Owaisi’‘s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?) हैं। बड़ा कारण यही जो बिहार में उन्हें मुस्लिम वोटर्स के लिए किसी अन्य पार्टी से गठबंधन की जरूरत नहीं है। वो बात और है कि पिछली बार उन्हें कुछ सीटों का नुकसान हुआ था, लेकिन चुनाव के कुछ समय बाद ही ओवैसी के 5 में से 4 विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे। एक बड़ी वजह यह भी जो लालू यादव ओवैसी को बिहार में बड़ी चुनौती नहीं मानते।  इसे भी पढ़ें:-  मीरा रोड थप्पड़ कांड पर संजय निरुपम ने सरकार से की कार्रवाई की मांग, आखिर पुलिस क्यों नहीं ले रही है कोई एक्शन? ओवैसी यदि इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनते हैं तो मुस्लिम वोटर एक मुस्त होकर इंडिया गठबंधन को वोट (Will Owaisi’s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?) करेंगे वैसे भी बीजेपी कभी नहीं चाहेगी कि ओवैसी कभी इंडिया गठबंधन में शामिल हों। क्योंकि ओवैसी यदि इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनते हैं तो मुस्लिम वोटर एक मुस्त होकर इंडिया गठबंधन को वोट करेंगे। इसमें नुकसान बीजेपी का (Will Owaisi’s Absence Hurt Lalu in Bihar Elections 2025?) होगा। इसके अलावा बीजेपी के सहयोगी दल जेडीयू ने वक्फ बिल का सपोर्ट किया था। ऐसे में इस बार उससे मुस्लिम वोटर्स के छिटकने का भी डर है। इसके बावजूद दोनों पार्टियों ने मुस्लिम वोटर्स को रिझाने की रणनीति बना ली है। दरअसल, बिहार की 17 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स की आबादी में से 10 प्रतिशत पसमांदा यानी अति पिछड़े मुस्लिम हैं। जेडीयू का मानना है कि नए वक्फ कानून से पसमांदा मुस्लिमों को फायदा होगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि जेडीयू और बीजेपी का यह पैंतरा इंडिया गठबंधन के खिलाफ कितना कारगर सिद्ध होगा। Latest News in Hindi Today Hindi news Owaisi’ #Owaisi #LaluYadav #BiharElections2025 #AIMIM #BiharPolitics #Mahagathbandhan #MuslimVotes #PoliticalAnalysis

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