Raj Thackeray news

राज ठाकरे की धमकी, ‘हिंदी को मराठी से बेहतर दिखाने की कोशिश कर रहे लोग ध्यान रखें चुनाव और गठबंधन होते रहते हैं, लेकिन…’

महाराष्ट्र में तीसरी भाषा पर छिड़ा विवाद (Maharashtra Three Language Policy) अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्य सरकार ने प्राथमिक स्कूलों में तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी को लागू करने का आदेश वापस ले लिया है, लेकिन विपक्ष अभी भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरने में जुटा है। मनसे (MNS) प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thackeray) ने एक बार फिर राज्य सरकार पर प्रहार करते हुए कहा, ‘मराठी भाषा (Marathi Language) के मुद्दे को राजनीति का नाम न दें। राज्य में राजनीतिक गठबंधन और चुनाव होते आए हैं और होते रहेंगे, लेकिन अगर एक बार मराठी भाषा (Marathi Language) खत्म हो गई तो समझ लीजिए सब कुछ खत्म हो जाएगा। इस मुद्दे को सभी राजनीतिक पार्टियों को एक चुनौती के रूप में देखना चाहिए।”  मनसे (MNS) अध्यक्ष राज ठाकरे (Raj Thackeray) मुंबई में मीडिया से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने इसी दौरान कहा कि, “मराठी भाषा को खत्म करने या इससे समझौता करने वाले किसी भी व्यक्ति का मैं खुलकर विरोध करूंगा। भले ही वह व्यक्ति किसी भी पार्टी का ही क्यों न हो, मैं उसके खिलाफ खड़ा होऊंगा और पूरी ताकत से लड़ंगा।” राज ठाकरे (Raj Thackeray) ने मराठी भाषा पर अपनी बात रखते हुए यह भी कहा, ”हिंदी भाषा देश में व्यापक रूप से बोली जाती है, लेकिन इसे अन्य राज्यों पर जबरन नहीं थोपा जाना चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्रीय भाषा नहीं है। इस भाषा को प्राचीन मराठी भाषा से ऊपर रखने का कोई भी प्रयास कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।  मराठी भाषा का इतिहास 3,000 साल पुराना  राजा ठाकरे ने कहा कि हम किसी भाषा का विरोध नहीं कर रहे हैं, हम सिर्फ मराठी भाषा की रक्षा कर रहे हैं। हिन्दी भाषा का इतिहास 150 से लेकर 200 साल पुराना है, लेकिन इसे उस भाषा से बेहतर दिखाने की कोशिश की जा रही है, जिसका इतिहास 3000 साल पुराना है। कुछ लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिए साजिश रच रहे हैं और हिन्दी भाषा को सर्वश्रेण दिखा रहे हैं। यह अस्वीकार्य है और महराष्ट्र की जनता यह नहीं होने देगी। सरकार अगर फिर से हिन्दी थोपने का प्रयास करेगी तो उसे इससे भी ज्यादा कड़ा जवाब मिलेगा।  हिंदी भाषा का विरोध बढ़ता देख सरकारी आदेश रद्द बता दें कि महाराष्ट्र सरकार ने प्राइमरी स्कूलों में पहली कक्षा से पांचवी कक्षा तक तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी (Maharashtra Three Language Policy) को शामिल किया था। सरकार के इस फैसले का राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की पार्टी ने जमकर विरोध किया। मनसे कार्यकर्ताओं ने कई जगह पर हिन्दी भाषी लोगों के साथ मारपीट भी की। हिन्दी के खिलाफ विरोध बढ़ता देख देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महायुती सरकार ने ‘त्रि-भाषा’ नीति पर रोक लगाने के साथ एक समिति का गठन कर दिया, जो हिन्दी भाषा को लागू करना है या नहीं, इस बात का फैसला करेगी। राज ठाकरे (Raj Thackeray) ने इस समिति को लेकर भी राज्य सरकार को धमकी दी है। उन्होंने कहा, ‘मैं फडणवीस सरकार को साफ शब्दों में कहना चाहता हूं, उनकी समिति की रिपोर्ट पक्ष में आए या विपक्ष में, लेकिन हिन्दी को दोबारा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह बात सरकार को हमेशा अपने दिमाग में रखनी चाहिए।”  इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  राज ठाकरे के कार्यकर्ताओं ने मराठी न बोलने पर बुजुर्ग दुकानदार को पीटा  महाराष्ट्र में हिंदी को लेकर जारी विवाद में राज ठाकरे के कार्यकर्ता अब सरेआम गुंडागर्दी करते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर इस समय एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें मनसे कार्यकर्ता मराठी न बोलने पर एक बुजुर्ग दुकानदार को पीटते नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिस दुकानदार को पीटा गया, वह मुंबई के मीरा रोड पर स्थित जोधपुर स्वीट्स का मालिक है। दुकानदार की सरेआम पिटाई के बाद पूरे इलाके में तनाव और दहशत पैदा हो गया है। पुलिस ने मामले की गंभीर को देखते मनसे कार्यकर्ताओं के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।  Latest News in Hindi Today Hindi news Raj Thackeray #RajThackeray #MarathiPride #MNS #MaharashtraPolitics #HindiVsMarathi #PoliticalWarning #LatestNews

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Priyank Kharge Vows RSS Ban if Govt

केंद्र की सत्ता में आने के बाद RSS को बैन किया जाएगा: प्रियांक खड़गे

कर्नाटक के कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे (Priyank Kharge) ने हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर जो टिप्पणी की है, उसने देश की सियासत में एक बार फिर तीखा मोड़ ला दिया है। प्रियांक ने RSS को राष्ट्रविरोधी मशीनरी बताते हुए कहा कि अगर उन्हें मौका मिला तो वे इस संगठन पर प्रतिबंध लगाएंगे और इसे खत्म करने के लिए हर तरीका अपनाएंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण तेजी से बढ़ रहा है और चुनावी माहौल में तमाम पार्टियां अपनी विचारधारा को मजबूती से जनता के सामने रखने की कोशिश कर रही हैं। प्रियांक खड़गे का बयान: राजनैतिक रणनीति या वैचारिक विरोध? प्रियांक खड़गे (Priyank Kharge) ने साफ तौर पर कहा कि RSS पर कभी कोई गंभीर जांच नहीं हुई है और अगर उन्हें सत्ता में आने का अवसर मिला, तो वे इसकी जांच कराएंगे और कार्रवाई भी करेंगे। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि यह संगठन भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ काम करता है और सांप्रदायिकता फैलाने का काम करता है। हालांकि कांग्रेस पार्टी की ओर से अभी तक इस बयान को लेकर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन प्रियांक का यह रुख कांग्रेस की लंबे समय से चली आ रही आरएसएस-विरोधी विचारधारा से मेल खाता है। विशेष रूप से इंदिरा गांधी के दौर में, जब RSS पर आपातकाल के दौरान प्रतिबंध लगाया गया था, तब कांग्रेस और संघ के रिश्ते और भी कटु हो गए थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलराम हेडगेवार ने की थी। दशहरे के दिन शुरू हुआ यह संगठन आज भारत के सबसे बड़े गैर-सरकारी संगठनों में शामिल है। इसका प्रमुख उद्देश्य हिंदू समाज में एकता और अनुशासन लाना रहा है। वर्तमान में मोहन भागवत इसके सरसंघचालक हैं, जो 2009 से इस पद पर कार्यरत हैं। संघ की कार्यप्रणाली पूरी तरह से स्वयंसेवकों पर आधारित है। इसके स्वयंसेवक शिक्षा, सेवा, समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं। हालांकि, आलोचकों का आरोप है कि आरएसएस एक सांप्रदायिक एजेंडा चलाता है और इसका अंतिम लक्ष्य “हिंदू राष्ट्र” की स्थापना है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के खिलाफ माना जाता है। पहले भी संघ पर लग चुका है प्रतिबंध RSS पर भारत सरकार ने अब तक तीन बार प्रतिबंध लगाया है: हालांकि हर बार संघ पर लगे प्रतिबंध को बाद में हटा लिया गया और संघ ने अपने संगठनात्मक ढांचे को और अधिक मजबूत कर लिया। कौन हैं प्रियांक खड़गे? प्रियांक खड़गे  (Priyank Kharge) का राजनीतिक करियर कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से शुरू हुआ। उन्होंने 1998 में राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे प्रदेश युवा कांग्रेस से होते हुए विधानसभा चुनावों (Assembly Elections) तक पहुंचे। वे कर्नाटक के कलबुर्गी जिले की चित्तपुर सीट से तीन बार विधायक रह चुके हैं और वर्तमान में सिद्धारमैया सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। उनके बयानों को न केवल एक युवा नेता की मुखरता के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि कांग्रेस (Congress) की उस पुरानी लाइन के तौर पर भी देखा जा रहा है जो संघ के विचारधारा से टकराव रखती है। इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  राजनीतिक नतीजे  प्रियांक खड़गे (Priyank Kharge) का बयान निश्चित रूप से कांग्रेस और भाजपा (Congress and BJP) समर्थकों के बीच एक नई बहस को जन्म देगा। जहां एक पक्ष इसे अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र की रक्षा के रूप में देखेगा, वहीं दूसरा पक्ष इसे ‘हिंदू विरोधी’ एजेंडा बताएगा। खासकर चुनावी मौसम में इस तरह के बयान मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। आरएसएस (RSS) का समर्थक वर्ग काफी बड़ा है और यह संगठन भाजपा (BJP) के लिए वैचारिक रीढ़ की हड्डी के समान है। ऐसे में किसी भी नेता द्वारा संघ को खत्म करने या उस पर प्रतिबंध लगाने की बात करना गंभीर राजनीतिक नतीजे ला सकता है। प्रियांक खड़गे  (Priyank Kharge) का RSS को लेकर बयान सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि भारत की राजनीति में विचारधारा की उस जंग का हिस्सा है जो दशकों से चली आ रही है। एक ओर जहां RSS खुद को राष्ट्र सेवा में समर्पित मानता है, वहीं विरोधी उसे सांप्रदायिक और विभाजनकारी ताकत बताते हैं। इस बहस का अंत फिलहाल कहीं नजर नहीं आता, लेकिन इससे देश की लोकतांत्रिक चर्चा और विचार विमर्श और भी गंभीर रूप लेता जा रहा है। Latest News in Hindi Today Hindi news  Priyank Kharge #PriyankKharge #RSSBan #CongressStatement #PoliticalNews #BreakingNews #IndianPolitics #BJPvsCongress

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Marathi vs Hindi Row Heats Up

भाषा पर राजनीति: महाराष्ट्र में मराठी बनाम हिंदी विवाद फिर गरमाया

महाराष्ट्र में भाषा को लेकर एक बार फिर सियासत गर्मा (Language controversy) गई है। बीती रात मुंबई के मीरा रोड इलाके में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर एक नॉर्थ इंडियन फेरीवाले की पिटाई कर दी वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वह मराठी बोलने से इनकार कर रहा था। यह घटना मीरा रोड (Mira Road) के बालाजी होटल के सामने हुई, जहां पीड़ित मसाला डोसा बेचने का काम करता है। इस घटना ने ना सिर्फ भाषा की अस्मिता पर बहस छेड़ दी है, बल्कि राज्य की राजनीति को भी एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। मनसे की सख्त प्रतिक्रिया मनसे प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thakre) ने इस मामले पर खुलकर बयान दिया और हिंदी के बढ़ते प्रभाव पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि हिंदी एक बड़ी भाषा ज़रूर है, लेकिन उसे राष्ट्रीय भाषा (National Language) के रूप में जबरन थोपना स्वीकार नहीं किया जाएगा। राज ठाकरे ने जोर देकर कहा कि मराठी का इतिहास 3,000 वर्षों से भी पुराना है, जबकि हिंदी एक अपेक्षाकृत नई भाषा है। उनका यह बयान स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि मनसे राज्य में मराठी (Marathi) को सर्वोपरि रखने की नीति पर अडिग है। राज ठाकरे (Raj Thakre) ने यह भी कहा कि कुछ लोग हिंदी को मराठी से श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। उनके अनुसार यह मराठी अस्मिता पर सीधा हमला है। हिंदी अनिवार्यता का फैसला रद्द भाषा विवाद (Language controversy) के इसी बढ़ते दबाव के बीच राज्य सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Chief Minister Devendra Fadnavis) ने रविवार को घोषणा की कि पहली कक्षा से हिंदी को अनिवार्य करने का जो निर्णय लिया गया था, उसे वापस लिया जा रहा है। इस फैसले का विरोध शिवसेना (UBT) और मनसे दोनों ने ही किया था। 5 जुलाई को इन दोनों दलों ने मिलकर “महामोर्चा” निकालने की घोषणा की थी, जिसे अब सरकार के फैसले के बाद रद्द किया जा सकता है। फडणवीस सरकार के इस कदम को विपक्ष ने सरकार की कमजोरी और दबाव में लिया गया फैसला बताया है। वहीं, मराठी समर्थकों का कहना है कि यह फैसला राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने की दिशा में सही कदम है। उद्धव ठाकरे का तीखा हमला शिवसेना (UBT) के प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने भी इस पूरे मसले पर सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार यह मानती है कि जो भी भाजपा या सरकार की नीतियों का विरोध करता है, वह देशद्रोही है। ठाकरे ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार को स्वतंत्रता संग्राम की भावना का कोई ज्ञान नहीं है। उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने दावा किया कि त्रिभाषा फार्मूले के तहत हिंदी (Hindi) को थोपने के विरोध में जो एकजुटता दिख रही थी, उसे देखते हुए ही सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। यह विपक्ष की एकजुटता और जन भावना की जीत है। इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  मराठी अस्मिता बनाम राष्ट्रीय एकता? यह पहला मौका नहीं है जब महाराष्ट्र में भाषा को लेकर विवाद हुआ है। मनसे और शिवसेना (UBT) (MNS and Shiv Sena UBT) वर्षों से राज्य में मराठी भाषा (Marathi Language) और संस्कृति को लेकर सख्त रुख अपनाते आए हैं। हालांकि, हर बार यह बहस इस सवाल पर खत्म होती है कि क्या किसी राज्य में एक विशेष भाषा को थोपना जायज़ है, और क्या ऐसा करना देश की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान के खिलाफ नहीं है? वहीं, दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि देश की राजभाषा के रूप में हिंदी का सम्मान किया जाए, लेकिन जबरदस्ती नहीं। संविधान के अनुच्छेद 343 और 351 के अनुसार, हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन अन्य भाषाओं के अधिकारों का उल्लंघन किए बिना। महाराष्ट्र में भाषा को लेकर चल रहा यह विवाद (Language controversy) सिर्फ शब्दों की लड़ाई नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी है राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता और राजनीतिक समीकरण। जहां एक ओर राजनीतिक दल अपने-अपने हितों को साधने में जुटे हैं, वहीं आम नागरिकों को ऐसी घटनाओं में नुकसान उठाना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि भाषा को विभाजन का नहीं, एकता का माध्यम बनाया जाए। सम्मान सभी भाषाओं को मिले और यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है। Latest News in Hindi Today Hindi news  Language #marathi #hindi #maharashtra #languagepolitics #marathivsHindi #marathipride #hindipolitics #maharashtranews

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Narayan Rane reignites old feud by recalling Uddhav's

Narayan Rane Targets Uddhav Before Vijay Diwas: विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात 

बीते दिनों हिंदी भाषा को लेकर छिड़े विवाद और लंबी चली बहस के बाद आखिरकार महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार को अपना फैसला वापस लेना ही पड़ा। भाषा विवाद पर भले राज्य सरकार ने बीएमसी इलेक्शन और मराठी वोटो के छिटकने एक डर से पूर्व के अपने दोनों आदेश रद्द कर दिए हों, लेकिन ठाकरे बंधु इस मुद्दे को हाथ से जाने देना नहीं (Narayan Rane Targets Uddhav Before Vijay Diwas) चाहते। हालाँकि राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि एक नई समिति बनाई जाएगी जो हिंदी भाषा को प्राथमिक स्कूलों में कक्षा पहली से पांचवी तक तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जाना है या नहीं इसपर निर्णय लेगी। मजे की बात यह कि सूबे की भाजपा सरकार भले ही मुद्दे को भटकाने की कोशिश कर रही है, लेकिन ठाकरे बंधु 5 जुलाई को एक मंच पर साथ दिखेंगे। दरअसल, राज्य सरकार के इस फैसले को दोनों ठाकरे बंधू अपनी लड़ाई की जीत बता रहे हैं। दोनों का कहना है कि “महाराष्ट्र का मराठी मानुष साथ आया ये देख सरकार डर गई। ये मराठी मानुष की जीत है। इसका विजय दिवस जुलूस मनाया जाएगा।”  ठाकरे गुट और मनसे के वरिष्ठ नेताओं के बीच लगातार बैठकें हो (Narayan Rane Targets Uddhav Before Vijay Diwas) रही हैं मीडिया रिपोर्ट की माने तो 5 जुलाई को दोनों ठाकरे भाई एक साथ एक मंच पर कई वर्षों के बाद आएंगे। पहले इस विजय दिवस के लिए शिवाजी पार्क और गिरगांव चौपाटी पर विचार चल रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों नेताओं की आपसी सहमति से वर्ली डोम संभागृह को फाइनल किया गया है। ध्यान देने वाली बात यह कि 5 जुलाई को होने वाले विजय दिवस को लेकर ठाकरे गुट और मनसे के वरिष्ठ नेताओं के बीच लगातार बैठकें हो (Narayan Rane Targets Uddhav Before Vijay Diwas) रही हैं। शिवसेना की ओर से संजय राऊत, अनिल परब और मनसे की ओर से बाला नांदगावकर और अभिजीत पानसे के बीच हाल ही में करीब 40 मिनट तक की अहम बैठक हुई है। एक तरह से कारगर रणनीति पर मंथन हो रहा है। पार्टी से जुड़े करीबी सूत्रों की माने तो इस बैठक में विजय दिवस की संपूर्ण रूपरेखा, आयोजन स्थल, भीड़ प्रबंधन और भाषणों की रणनीति पर चर्चा हुई। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि यह सिर्फ मराठी भाषा, मराठी अस्मिता और सरकार के निर्णय वापसी का उत्सव होगा। इसमें कोई राजनीतिक झंडा या एजेंडा नहीं होगा। वरली डोम को आयोजन स्थल के रूप में चुना गया है। दोनों दलों में इसे लेकर सहमति बन चुकी है। आयोजकों का कहना है कि यह पूरी तरह से मराठी भाषा और संस्कृति की विजय के रूप में मनाया जाएगा।  इसे भी पढ़ें:- गुजरात और पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत और 2027 के तूफान की आहट? यही उद्धव ठाकरे थे, जिन्होंने राज ठाकरे को अपमानित किया, तंग किया और पार्टी से बाहर जाने के लिए (Narayan Rane Targets Uddhav Before Vijay Diwas) मजबूर किया इस पूरे मामले पर अब राजनीति भी शुरू हो गई है। बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर पोस्ट करते हुए (Narayan Rane Targets Uddhav Before Vijay Diwas) कहा कि “उद्धव ठाकरे आज राज ठाकरे को भाईचारे के नाते वापस आने की अपील कर रहे हैं। लेकिन मुझे याद है, यही उद्धव ठाकरे थे, जिन्होंने राज ठाकरे को अपमानित किया, तंग किया और पार्टी से बाहर जाने के लिए मजबूर किया। क्या उन्हें यह सब याद नहीं है? अब वे क्यों इतनी मिन्नतें कर रहे हैं? उद्धव को आड़े हाथों लेते हुए नारायण राणे ने कहा कि “राज ठाकरे, नारायण राणे, गणेश नाईक और एकनाथ शिंदे जैसे नेताओं ने शिवसेना को खड़ा करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया, लेकिन इन्हीं लोगों को उद्धव ने बाहर का रास्ता दिखाया। जिस शिवसेना को माननीय बालासाहेब ठाकरे ने सत्ता तक पहुंचाया, उसी सत्ता को उद्धव ठाकरे ने गंवा दिया। शिवसेना की इस गिरावट के लिए पूरी तरह से उद्धव ठाकरे जिम्मेदार हैं।” उन्होंने आगे कहा, मराठी जनता और हिंदू समाज ने इन्हें घर बिठा दिया है। जो चीज एक बार हाथ से निकल जाती है, वो फिर से वापस नहीं आती जो बूंद से गई, वो हौद से नहीं आती! उद्धव ठाकरे में न तो वह हिम्मत है और न ही वह क्षमता कि वो फिर से सब कुछ हासिल कर सकें। Latest News in Hindi Today Hindi news Narayan Rane #NarayanRane #UddhavThackeray #VijayDiwas #RajThackeray #MaharashtraPolitics #ShivSena

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Old Delhi Station Renaming Proposal by CM Rekha Gupta

पुरानी दिल्ली स्टेशन का नाम बदलने के लिए सीएम रेखा गुप्ता ने रेलमंत्री को लिखा पत्र, जानिए कौन थे महाराज अग्रसेन?

दिल्ली की भाजपा सरकार (BJP Government) अब 160 साल पुराने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन (Old Delhi Railway Station) का नाम बदलने जा रही है। इस स्टेशन का नाम अब ‘महाराजा अग्रसेन रेलवे स्टेशन’ (Maharaja Agrasen Railway Station) रखने का विचार किया जा रहा है। इस संबंध में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) ने केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) को एक पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने पुरानी दिल्ली स्टेशन का नाम बदलने के लिए निवेदन किया है। भाजपा का कहना है कि सीएम रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) ने यह फैसला सामाजिक न्याय और अहिंसा के प्रतीक माने जाने वाले हमारे महान राजा महाराजा अग्रसेन के सम्मान में लिया है।  स्टेशन के नाम में बदलाव (Maharaja Agrasen Railway Station) होने से यहां आने वाले लाखों लोग महाराजा अग्रसेन के बारे में बेहतर तरीके से जान सकेंगे, यह उनके लिए उचित श्रद्धांजलि होगी। भाजपा नेताओं का कहना है कि स्टेशन के नाम को बदलने के लिए लंबे समय से विचार किया जा रहा था। सीएम चाहती हैं कि इस मामले में रेल मंत्री खुद हस्तक्षेप करें, इसलिए उन्हें पत्र लिखा है।  महाराजा अग्रसेन के सामाजिक-आर्थिक विकास का दिल्ली पर गहरा प्रभाव  सीएम रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) को लिखे पत्र में नाम बदलने की वजह का भी जिक्र किया है। सीएम लिखती हैं कि, ‘महाराजा अग्रसेन के सम्मान में और उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन (Old Delhi Railway Station) का नाम बदल कर उनके नाम पर रखना चाहते हैं। महाराजा अग्रसेन हमारे देश के एक सम्मानित और ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे। उनकी विरासत का देश के सामाजिक-आर्थिक विकास पर और खास कर दिल्ली में बेहद गहरा प्रभाव पड़ा है।’ सीएम रेखा गुप्ता ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि ‘महाराजा अग्रसेन को सामाजिक न्याय, सामुदायिक कल्याण और आर्थिक दूरदर्शिता के प्रतीक के तौर पर जाना जाता है। उनके वंशज और अनगिनत अनुयायी आज भी दिल्ली को आर्थिक और सांस्कृतिक तरक्की दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अगर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर उनके नाम पर रखा गया तो यह उनके योगदान के लिए उन्हें एक उचित श्रद्धांजलि होगी। मैं आपके मंत्रालय द्वारा स्टेशन का नाम बदलने के प्रस्ताव पर जल्द से जल्द विचार करने का निवदेन करती हूं।’ उत्तर भारत का पहला रेलवे स्टेशन है पुरानी दिल्ली  बता दें कि चांदनी चौक इलाके में मौजूद पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन (Old Delhi Railway Station) दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत का पहला रेलवे स्टेशन है। इस स्टेशन का निर्माण साल 1864 में किया गया था और 1 जनवरी 1867 को यहां पर पहली ट्रेन पहुंची थी। इस स्टेशन के मौजूदा भवन का निर्माण 1893 में शुरू किया गया था और यह 1903 में बन कर तैयार हुई। इस स्टेशन के बनने के बाद ही दिल्ली-कलकत्ता रेलवे लाइन की शुरुआत हुई थी। आज के समय में यहां पर 18 प्लेटफॉर्म्स बने हुए हैं और रोजाना यहां से होकर देश के विभिन्न हिस्सों में सैकड़ों ट्रेनें चलती हैं।  इसे भी पढ़ें:- गुजरात और पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत और 2027 के तूफान की आहट? भगवान राम के वंशज थे महाराजा अग्रसेन महाराजा अग्रसेन अग्रोहा रजवाड़े के राजा थे, जो हरियाणा में पड़ता है और आज के समय में हिसार जिले के तौर पर जाना जाता है। महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय वंश के थे और इन्हें शासन में समानता, न्याय और अहिंसा को प्राथमिकता देने वाले महान भारतीय राजा के तौर पर याद किया जाता है। कहा जाता है कि इनका वंश भगवान राम से जुड़ा है और वे राम पुत्र कुश की 34वीं पीढ़ी के वंशज थे। इन्हें अग्रवाल समुदाय का पितामह भी कहा जाता है। इन्होंने अपने राज्य में बसने वाले नए परिवार को मदद देने के लिए ‘एक ईंट, एक रुपया’ प्रथा शुरू की थी।   Latest News in Hindi Today Hindi news Rekha Gupta #OldDelhiStation #RekhaGupta #MaharajaAgrasen #IndianRailways #StationRenaming

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AIMIM- Asaduddin owaisi and Akhtarul Iman

Bihar Assembly Election 2025: क्या है AIMIM की नई रणनीति और तीसरे मोर्चे की तैयारी?

जैसे-जैसे बिहार में विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) का समय करीब आ रहा है, राज्य का सियासी पारा बढ़ता जा रहा है। सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी  तैयारी में जुट गए हैं और इसी कड़ी में अब असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने एक नई सियासी चाल चली है। AIMIM ने बिहार में फिर से राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिशें शुरू कर दी हैं और यह साफ कर दिया है कि पार्टी इस बार कोई बड़ा दांव खेलने को तैयार है। महागठबंधन को दिया प्रस्ताव AIMIM के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान (Akhtarul Iman) ने मीडिया से बातचीत की और बताया कि उन्होंने करीब 15 दिन पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस (Congress) और वाम दलों (Wam Dal) को एक प्रस्ताव भेजा था। इस प्रस्ताव में AIMIM ने महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा कि बिहार के हित में खासकर युवाओं और सामाजिक दृष्ट्रिकों से यह कदम उठाया गया है। अख्तरुल ईमान ने कहा है कि सीटों के बंटवारे को लेकर अभी कोई बातचीत नहीं हुई है, लेकिन 2020 के चुनाव में हासिल सीटों और प्रदर्शन के आधार पर कोई फॉर्मूला तय किया जा सकता है। गौरतलब है कि 2020 के विधानसभा चुनाव (2020 Assembly Election) में महागठबंधन ने कुल 112 सीटें जीती थीं, जबकि AIMIM ने 20 में से 5 सीटें अपने नाम की थीं। तीसरे मोर्चे की अटकलें तेज हालांकि AIMIM की ओर से महागठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव भेजा गया है, लेकिन पार्टी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर गठबंधन में उन्हें जगह नहीं मिली, तो वे तीसरे मोर्चे का विकल्प भी तलाश सकते हैं। अख्तरुल ईमान (Akhtarul Iman) ने बताया कि कुछ अन्य दलों से बातचीत चल रही है, हालांकि उन्होंने इन दलों के नामों का खुलासा नहीं किया। यह संकेत इशारा करता है कि बिहार की राजनीति में एक नया मोर्चा उभर सकता है जो न तो एनडीए (NDA) का हिस्सा होगा और न ही महागठबंधन (UPA) का। AIMIM का यह रुख संभावित सहयोगी दलों के साथ एक अलग सेक्युलर फ्रंट खड़ा करने की मंशा दर्शाता है। वोटर लिस्ट पर सवाल और NRC का डर AIMIM ने चुनाव आयोग (Election Commission) द्वारा की जा रही वोटर लिस्ट पुनरीक्षण प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं। अख्तरुल ईमान ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया NRC जैसी है, जिसके जरिए दलित, महादलित और अल्पसंख्यकों को सूची से हटाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि AIMIM का प्रतिनिधिमंडल जल्द ही चुनाव आयोग से मुलाकात करेगा और इस मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराएगा। AIMIM का बिहार में राजनीतिक दखल 2020 के विधानसभा चुनाव (2020 Assembly Election) से खासा बढ़ा है। उस चुनाव में पार्टी ने ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के तहत 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 5 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह सीटें बिहार के सीमांचल क्षेत्र से थीं, जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है। पार्टी को कुल 5.23 लाख वोट मिले थे और उसका वोट शेयर लगभग 1.3% रहा था। हालांकि चुनाव के बाद AIMIM के चार विधायक RJD में शामिल हो गए थे, जिससे पार्टी को झटका लगा था। लेकिन इस बार पार्टी फिर से सीमांचल को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति बना रही है। AIMIM और पुराने सहयोगी दल 2020 में AIMIM ने जिन दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, उनमें उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी जनता दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) शामिल थे। आज इनमें से कई दल एनडीए का हिस्सा बन चुके हैं, जबकि कुछ ने खुद को नए राजनीतिक स्वरूप में ढाल लिया है। उदाहरण के तौर पर उपेंद्र कुशवाहा अब राष्ट्रीय लोक मंच बनाकर एनडीए में शामिल हैं, जबकि ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी एनडीए के साथ है। इसे भी पढ़ें:- गुजरात और पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत और 2027 के तूफान की आहट? बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) में AIMIM की सक्रियता और उसकी रणनीतिक पहल यह दर्शाती है कि पार्टी इस बार निर्णायक भूमिका निभाने की मंशा रखती है। महागठबंधन से प्रस्ताव स्वीकार नहीं होने की स्थिति में तीसरा मोर्चा बनाना AIMIM के लिए एक बड़ा राजनीतिक कदम हो सकता है, जिससे बिहार की चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। जहां एक ओर AIMIM भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए विपक्षी दलों से हाथ मिलाने को तैयार है, वहीं दूसरी ओर वह अपने सीमांचल प्रभाव का इस्तेमाल कर एक स्वतंत्र शक्ति बनकर उभरना चाहती है। आने वाले हफ्ते और महीने यह तय करेंगे कि यह रणनीति AIMIM को चुनावी फायदे दिलाएगी या फिर सियासी नुकसान। लेकिन एक बात तो तय है कि इस बार बिहार की राजनीति में AIMIM एक बार फिर से सुर्खियों में है। Latest News in Hindi Today Hindi news AIMIM- Asaduddin owaisi and Akhtarul Iman #BiharAssemblyElection2025 #AssemblyElection #AIMIM #AsaduddinOwaisi #AkhtarulIman

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MP Chandrashekhar Azad Issues Warning

Bhim Army Protest: MP Chandrashekhar Azad Issues Threat: इस वजह से भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने मचाया उत्पात, नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने दी धमकी 

दिन रात संविधान की दुहाई देने वाले नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद को पुलिस ने इटौसी गांव जाने से क्या रोका, उनके कार्यकर्ताओं ने संविधान और कानून को हाथ में लेते हुए जमकर तोड़फोड़ की। दरअसल, इटौसी गांव के देवीशंकर नामक व्यक्ति की 13 अप्रैल को आग से झुलसकर मृत्यु हो गई थी। परिजनों का आरोप है कि देवीशंकर की जलाकर हत्या की गई (Bhim Army Protest: MP Chandrashekhar Azad Issues Threat) है। जानकारी के मुताबिक नगीना से सांसद चंद्रशेखर पीड़ित परिवार से मिलने आ रहे थे और वह सर्किट हाउस पहुंचे थे। पुलिस ने सुरक्षा कारणों से उन्हें इटौसी गांव जाने से रोक दिया। इसके अलावा कौशांबी में रेप पीड़ित मासूम बच्ची के घर भी जाने नहीं दिया। फिर क्या था गांव जाने से पुलिस प्रशासन द्वारा रोके जाने पर उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जमकर उत्पाद मचाया। और पुलिस के दो वाहनों में तोड़फोड़ की।  सभी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जा रहा है, कठोर कार्रवाई की जाएगी- डीसीपी यमुना नगर विवेक चंद्र यादव  इस पूरे मामले पर डीसीपी यमुना नगर विवेक चंद्र यादव ने बताया कि “करछना तहसील के इटौसी गांव में सांसद चंद्रशेखर के आने की सूचना थी, जिसको लेकर पार्टी के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में इकट्ठा (Bhim Army Protest: MP Chandrashekhar Azad Issues Threat) थे तथा कार्यकर्ताओं को अपने नेता के नहीं आने की जानकारी मिलने पर कार्यकर्ताओं ने पथराव शुरू कर दिया। डीसीपी ने बताया कि “भीड़ द्वारा डायल 112 नंबर की गाड़ी और एक अन्य गाड़ी को क्षतिग्रस्त किया गया।” डीसीपी ने आगे कहा कि “उपद्रवियों ने पुलिस पर पथराव किया। स्थिति को काबू में करने के लिए कई थानों की फोर्स को तैनात किया गया। स्थानीय लोगों की मदद से भी स्थिति को कंट्रोल किया गया। उपद्रव करने वालों की पुलिस पहचान कर रही है। सीसीटीवी, वीडियो और फोटो के जरीए उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। सभी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। कठोर कार्रवाई की जाएगी।  मैं नहीं जानता कि पुलिस ने वहां क्यों नहीं जाने (Bhim Army Protest: MP Chandrashekhar Azad Issues Threat) दिया- नगीना सांसद आजाद ने कहा कि “मैं कल प्रयागराज गया था। मैं वहां हमारी पाल समुदाय की बेटी के लिए न्याय मांगने गया था, लेकिन पुलिस ने मुझे इलाहाबाद सर्किट हाउस में रखा। मैं नहीं जानता कि पुलिस ने वहां क्यों नहीं जाने (Bhim Army Protest: MP Chandrashekhar Azad Issues Threat) दिया। मैंने कहा कि अगर आप मुझे वहां नहीं जाने दे रहे हैं तो कम से कम उनके परिजनों से बात करने दें। मेरा मानना है कि पुलिस और प्रशासन ने ऐसे अपराध किए और उनको छिपाने के लिए मुझे वहां जाने के लिए रोका। प्रयागराज में भड़की हिंसा के मामले में सांसद ने कहा कि “हमारे कार्यकर्ता, संविधान में विश्वास रखते हैं और वह हिंसा में शामिल नहीं होते। आज लोगों के लिए यह सामान्य बात हो गई है कि वह नीला पटका पहन कर घूमते हैं। मैं इस मामले में सीबीआई की जांच की मांग करता हूं। अगर सरकार, पुलिस या प्रशासन किसी को जानबूझकर निशाना बनाएगा, तो हम शांत नहीं बैठेंगे और लखनऊ में बड़ा आंदोलन करेंगे।”  इसे भी पढ़ें:-  महाराष्ट्र में तीन भाषा नीति पर सरकार का बड़ा फैसला: पुरानी नीतियां रद्द, नई समिति का गठन जब तक प्रशासन पीड़ित परिवार से मिलने नहीं देगा तब तक प्रयागराज छोड़कर नहीं (Bhim Army Protest: MP Chandrashekhar Azad Issues Threat) जाऊंगा नगीना के सांसद चंद्रशेखर आजाद का कहना है कि “जब तक प्रशासन उनको पीड़ित परिवार से मिलने नहीं देगा और गिरफ्तार किए हुए पार्टी कार्यकर्ताओं को छोड़ा नहीं जाएगा तब तक वो प्रयागराज छोड़कर नहीं (Bhim Army Protest: MP Chandrashekhar Azad Issues Threat) जाएंगे।” पार्टी के मुताबिक आज बवाल शुरू होने की बड़ी वजह चंद्रशेखर आजाद को प्रशासन ने कानून व्यवस्था का हवाला देकर कौशांबी में रेप पीड़ित मासूम बच्ची के घर जाने नहीं दिया। इसके बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जबरदस्त हंगामा किया। वहीं प्रयागराज में भीम आर्मी के बवाल पर कांग्रेस नेता अजय राय ने टिप्पणी की। मीडिया से बातचीत में अजय राय ने कहा कि “यह सरकार की मिली भगत है। चंद्रशेखर आजाद को जाने देना चाहिए। हम भी अपने सांसद के साथ वहां पर गए थे। पूरा सहयोग किया गया। सरकार ने जानबूझकर प्रवोग किया है।” Latest News in Hindi Today Hindi news  MP Chandrashekhar Azad #bhimarmy #chandrashekharazad #dalitrights #naginaprotest #azadthreat #bhimprotest

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BJP leader Sudhanshu Trivedi asserts

हम संविधान को कुड़ेदान में फेंकने नहीं देंगे: सुधांशु त्रिवेदी

जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) नजदीक आ रहे हैं, राज्य की सियासत भी गरमाती जा रही है। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में हाल ही में आयोजित एक बड़ी रैली ने इस राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया है। यह रैली वक्फ संशोधन कानून (Wakf Amendment Act) के खिलाफ आयोजित की गई थी, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि यदि उनकी सरकार बनती है, तो वे इस कानून को प्रदेश में लागू नहीं होने देंगे और उसे कूड़ेदान में फेंक देंगे। उनके इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पलटवार किया है। तेजस्वी का एलान और सियासी संदेश RJD नेता तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) ने वक्फ संशोधन कानून (Wakf Amendment Act) को मुस्लिम समुदाय की जमीन और अधिकारों पर हमला बताते हुए इसे अस्वीकार्य बताया। उन्होंने मंच से कहा कि यह कानून प्रदेश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ है और उनकी पार्टी इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। तेजस्वी ने इसे धर्मनिरपेक्षता और संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ बताया और आरोप लगाया कि केंद्र सरकार धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है। तेजस्वी यादव के इस बयान को न सिर्फ उनके मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश माना जा रहा है, बल्कि इसे एक बड़े राजनीतिक दांव के तौर पर भी देखा जा रहा है, जिससे वे NDA के खिलाफ एक मज़बूत सेकुलर गठबंधन का नेतृत्व करना चाहते हैं। भाजपा का पलटवार: संविधान और संसद का अपमान? भाजपा ने इस बयान पर सख्त प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी (Dr. Sudhanshu Trivedi) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी के बयान को संविधान और संसद का अपमान बताया। उन्होंने कहा कि जिस गांधी मैदान में कभी लोकतंत्र की रक्षा के लिए लाखों लोगों ने आंदोलन किया था, उसी जगह अब संविधान के विरुद्ध बयानबाजी हो रही है। सुधांशु त्रिवेदी (Sudhanshu Trivedi) ने कहा है कि तेजस्वी यादव ने संसद से पारित एक कानून को कूड़ेदान में फेंकने की बात कहकर न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला किया है, बल्कि न्यायपालिका और संविधान का भी अनादर किया है। उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ शब्द कुरान में नहीं है और यह एक बाद की व्याख्या है, जिसे मौलवियों और मुल्लाओं द्वारा गढ़ा गया है। उनके अनुसार इस्लाम देने और ज़कात की बात करता है, न कि संपत्ति इकट्ठा करने की। वक्फ कानून का संदर्भ वक्फ एक इस्लामिक व्यवस्था है, जिसके तहत मुसलमान अपनी संपत्ति को धार्मिक या सामाजिक उद्देश्य के लिए दान करते हैं। भारत में वक्फ संपत्तियों की देखरेख के लिए वक्फ बोर्ड (Wakf Amendment Act)  बनाए गए हैं और समय-समय पर इनसे संबंधित कानूनों में संशोधन होते रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वक्फ संशोधन कानून का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना बताया जा रहा है, लेकिन विरोधी दलों का आरोप है कि इससे मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों पर राज्य का नियंत्रण बढ़ेगा और अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन होगा। नमाजवाद बनाम समाजवाद भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी (BJP Spokesperson Sudhanshu Trivedi) ने तेजस्वी यादव पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे समाजवाद की बात नहीं कर रहे, बल्कि नमाजवाद का प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या तेजस्वी बिहार में शरिया कानून लागू करना चाहते हैं? उन्होंने वक्फ प्रणाली को समाजवाद के विरोध में बताते हुए कहा कि यह कुछ लोगों को सारी संपत्तियों पर कब्जा करने का अधिकार देता है, जो सामाजिक न्याय की अवधारणा के खिलाफ है। इसे भी पढ़ें:-  महाराष्ट्र में तीन भाषा नीति पर सरकार का बड़ा फैसला: पुरानी नीतियां रद्द, नई समिति का गठन चुनावी रणनीति या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण? इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक विश्लेषक आगामी बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) से जोड़कर देख रहे हैं। तेजस्वी यादव का यह बयान उन्हें मुस्लिम मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बना सकता है, लेकिन साथ ही यह भाजपा को भी मौका देता है कि वह धर्म और संविधान के मुद्दे को केंद्र में रखकर अपने कोर वोट बैंक को सक्रिय करे। यह पूरा विवाद आने वाले चुनाव में ध्रुवीकरण की राजनीति को और तेज कर सकता है। वक्फ संशोधन कानून (Wakf Amendment Act) पर तेजस्वी यादव और भाजपा के बीच टकराव ने बिहार की सियासत में नया मोड़ ला दिया है। जहां एक तरफ तेजस्वी इसे अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, वहीं भाजपा इसे लोकतंत्र और संविधान पर हमला मान रही है। यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा न केवल कानूनी बल्कि चुनावी बहस का भी केंद्र बनेगा। बिहार का मतदाता अब देखेगा कि सियासी दल धार्मिक भावनाओं से ऊपर उठकर सामाजिक और विकास संबंधी मुद्दों पर कितना ध्यान देते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Wakf Amendment Act #SudhanshuTrivedi #Constitution #BJP #IndianPolitics #ParliamentDebate #PoliticalNews

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Maharashtra Govt Scraps Old Language Policies

3-Language Policy: महाराष्ट्र में तीन भाषा नीति पर सरकार का बड़ा फैसला: पुरानी नीतियां रद्द, नई समिति का गठन

महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) ने तीन भाषा नीति (3-Language policy) को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। राज्य में पहले जारी किए गए दोनों सरकारी आदेश (GR) 16 अप्रैल 2025 और 17 जून 2025 के फैसले को अब औपचारिक रूप से रद्द कर दिया गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Chief Minister Devendra Fadnavis) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस फैसले की जानकारी दी। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Dy. CM Eknath Shinde) और अजित पवार (Ajit Pawar) भी मौजूद थे। यह फैसला राज्य में तीन भाषा नीति (3-Language policy) को लेकर बढ़ते विरोध और भ्रम की स्थिति के बाद लिया गया है। तीन भाषा नीति (3-Language policy) पर बढ़ता विवाद दरअसल, महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) ने 16 अप्रैल 2025 को एक सरकारी आदेश जारी किया था, जिसके अंतर्गत अंग्रेजी और मराठी माध्यम के स्कूलों (English and Marathi Medium School) में कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों के लिए हिंदी भाषा को तीसरी अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाना अनिवार्य किया गया था। इस निर्णय के खिलाफ विभिन्न शिक्षाविदों, सामाजिक संगठनों और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने विरोध दर्ज किया था। उनका तर्क था कि इससे मराठी भाषा (Marathi Language) और स्थानीय संस्कृति पीछे छूट सकती है। शिवसेना यूबीटी (Shivsena-UBT), एमएनएस (MNS), एनसीपी-एसपी (NCP-SP) और अन्य राजनीतिक पार्टियां एकजुट होकर विरोध कर रही हैं। वहीं राजनीतिक पार्टियों द्वारा किये जा रहे विरोध को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 17 जून को दूसरा सरकारी आदेश जारी कर हिंदी को वैकल्पिक भाषा बना दिया, लेकिन इससे स्थिति साफ होने के बजाय और अधिक जटिल हो गई। कई स्कूलों और अभिभावकों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई कि कौन-सी भाषा अनिवार्य है और कौन-सी वैकल्पिक। मुख्यमंत्री फडणवीस का बयान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Chief Minister Devendra Fadnavis) ने कहा है कि हम मराठी केंद्रित और मराठी छात्रों की जरूरतों को प्राथमिकता देने वाली भाषा नीति बनाएंगे। इस मुद्दे को लेकर किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं की जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री रहते हुए डॉ. रघुनाथ माशेलकर समिति की सिफारिशों के आधार पर तीन भाषा नीति लागू करने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, वर्तमान सरकार का मानना है कि भाषा नीति पर ऐसा कोई भी फैसला व्यापक संवाद और विचार-विमर्श के बिना लागू नहीं किया जा सकता। इसे भी पढ़ें:- गुजरात और पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत और 2027 के तूफान की आहट? नई समिति का गठन राज्य सरकार ने इस विषय पर समीक्षा की और भविष्य की दिशा तय करने के लिए एक्सपर्ट डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में एक नई समिति के गठन की घोषणा की है। यह समिति त्रिभाषा सूत्र पर अध्ययन करेगी, राज्य के सभी वर्गों के विचारों को ध्यान में रखेगी और सरकार को एक सर्वमान्य रिपोर्ट सौंपेगी। डॉ. नरेंद्र जाधव इस क्षेत्र में अनुभव रखते हैं और नीति विशेषज्ञ हैं। वे पहले भी शिक्षा और सामाजिक विकास से संबंधित कई महत्वपूर्ण नीतिगत सलाह दे चुके हैं। उनके नेतृत्व में बनी यह समिति यह सुनिश्चित करेगी कि भाषा नीति (Language policy) बच्चों की शिक्षा में सहायक हो, न कि बाधा। मराठी भाषा को प्राथमिकता महाराष्ट्र की नई नीति का फोकस मराठी भाषा (Marathi Language) को सुदृढ़ करना है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि मराठी भाषा राज्य की आत्मा है और इसे शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक स्थान दिया जाएगा। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि छात्रों को अन्य भाषाओं के ज्ञान से भी वंचित न किया जाए। त्रिभाषा नीति (3-Language policy )का उद्देश्य विद्यार्थियों को भाषाई दृष्टि से समृद्ध बनाना है, लेकिन यह तभी संभव है जब नीति क्षेत्रीय आवश्यकताओं और सामाजिक संवेदनशीलता के अनुरूप बनाई जाए। महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) का यह फैसला भाषा नीति पर एक संतुलित और सोच-समझकर उठाया गया कदम माना जा सकता है। जहां एक ओर इससे मराठी भाषा और संस्कृति की सुरक्षा होती है, वहीं दूसरी ओर नई समिति के गठन से यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि भाषा नीति विद्यार्थियों के हित में हो। यह निर्णय राजनीति से ऊपर उठकर लिया गया है और इसका उद्देश्य राज्य की शैक्षिक नींव को मजबूत बनाना है। अब सबकी निगाहें डॉ. नरेंद्र जाधव समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो भविष्य की भाषा नीति (Language policy) का खाका तैयार करेगी। उम्मीद की जा सकती है कि यह नीति राज्य के बहुभाषिक समाज के लिए लाभकारी सिद्ध होगी और शिक्षा के क्षेत्र में एक सकारात्मक बदलाव लाएगी। Latest News in Hindi Today Hindi news Devendra Fadnavis #educationnews #3languagepolicy #governmentdecision #marathi #hindipolicy #englishpolicy

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Lalu Yadav land

‘लालू परिवार की जमीन पर होगा सरकार का कब्जा, बनेगा भूमिहीन गरीबों का घर’, JDU नेता के बयान से सियासी हलचल तेज

बिहार में इस साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। चुनाव में उतर रही राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे को घेरने के साथ अपनी सियासी जमीन तैयार करने में जुटी है। इस बीच जदयू (JDU) ने घोषणा की है कि अगर राज्य में सरकार बनती है तो राजद (RJD) अध्यक्ष लालू प्रसाद (Lalu Prasad) की पटना के फुलवारीशरीफ में मौजूद जमीन को जब्त किया जाएगा। इस जमीन पर सरकारी खर्च पर घर बनाए जाएंगे और वो घर राज्य के भूमिहीन गरीब लोगों को दिया जाएगा।  यह घोषणा जदयू (JDU) के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने फुलवारीशरीफ में आयोजित पार्टी के एक कार्यक्रम में कही। नीरज कुमार ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि लालू परिवार जब भी सत्ता में आई, जनता को सिर्फ लूटने का कार्य किया। इस परिवार ने राज्य के गरीब लोगों को लूटकर पटना और इसके आसपास के इलाकों में करीब 40 एकड़ जमीन बनाई है। इनमें से 6 एकड़ जमीन तो सिर्फ फुलवारशरीफ में ही मौजूद है। नीरज कुमार ने कहा कि लालू प्रसाद (Lalu Prasad) और उनका परिवार जनता को लूटकर पटना का सबसे बड़े शहरी जमींदार बन चुका है। लालू परिवार ने अपने पूरे शासनकाल में भ्रष्टाचार का केवल धन का ही अर्जन किया। इनकी सरकार के एजेंडे में जन कल्याण कभी नहीं रहा। बता दें कि नीरज कुमार राज्य कैबिनेट में सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री भी रह चुके हैं। अभी वो विधान परिषद के सदस्य हैं।  कानून बनाकर ली जाएगी लालू परिवार की जमीन- नीरज  लालू प्रसाद (Lalu Prasad) की जमीन को सरकार के अधीन कर उस पर गरीबों के लिए घर बनावाने की घोषणा जदयू की तरफ से किसी नेता ने पहली बार की है। नीरज के इस घोषणा ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। नीरज ने अपनी घोषणा में यह भी कहा कि लालू की जमीन का गरीबों को देने के लिए राज्य सरकार द्वारा बकायदा कानून लाया जाएगा। राजद (RJD) ने अपने 15 साल के शासन में गरीबों को खूब लूटा है। केंद्र सरकार में मंत्री रहते भी लालू यादव ने नौकरी के बदले लोगों की जमीन हड़पी। अब समय आ गया है कि गरीब जनता को उनका हक वापस दिया जाए और यह काम हमारी सरकार करेगी।  राजद प्रवक्ता ने भी किया नीरज पर तीखा पलटवार   जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार के इस बयान पर राजद (RJD) ने तीखा पलटवार किया है। राजद के मुख्य प्रवक्ता चितरंजन गगन ने कहा कि इस साल के अंत में होने जा रहे विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) में जीत कर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद नई सरकार बनाने जा रही है। जिसके बाद एनडीए शासनकाल के दौरान इनके सभी नेताओं का भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति की जांच होगी। जिन्होंने भी जनता और राज्य को लूटा है उन्हें माफ नहीं किया जाएगा। चितरंजन गगन ने यह भी कहा कि नीरज कुमार जागते हुए सपना देख रहे हैं कि फिर से उनकी सरकार (Bihar Assembly Elections) बनने जा रही है। लेकिन सच यह है कि बिहार की जनता ने नीतीश सरकार को इस बार जड़ से उखाड़ फेकने का मन बना लिया है। इस सरकार में भ्रष्टाचार और अपराध जिस स्तर तक पहुंचा है, वह अपने आप में एक शर्मनाक रिकॉर्ड है। यह सरकार आम जनता का शोषण कर रही है और यह हमारी जनता भी अब समझ चुकी है। इनके सपने सिर्फ सपने ही रह जाएंगे।  इसे भी पढ़ें:- गुजरात और पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत और 2027 के तूफान की आहट? वोटर लिस्ट को लेकर बिहार का सियासी घमासान तेज  चुनाव आयोग बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान चला रहा है। इसको लेकर भी यहां खूब हंगामा मचा हुआ है। विपक्ष  दल इसे भाजपा का षडयंत्र बता इसके खिलाफ राजनीतिक लड़ाई के साथ कानून लड़ाई लड़ने की बात कह रही हैं। महागठबंधन में शामिल पार्टियों का कहना है कि चुनाव आयोग के इस अभियान का मकसद विपक्ष के वोट को काटना है। इसके खिलाफ जल्द ही राजनीतिक अभियान शुरू किया जाएगा।  Latest News in Hindi Today Hindi news Lalu Prasad #LaluYadav #JDULeader #BiharPolitics #LandDispute #PoorHousingScheme #LaluFamily #PoliticalControversy

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