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PM CARES Fund के पैसे से स्कूल बनाने की मांग! ₹8,452 करोड़ के फंड पर उठे सवाल

नई दिल्ली: PM CARES Fund में मौजूद ₹8,452 करोड़ की राशि को ग्रामीण सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने और नए आधुनिक स्कूल बनाने में इस्तेमाल करने की मांग उठी है। Cockroach Janta Party (CJP) के संस्थापक अभिजीत डिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि फंड की राशि का इस्तेमाल बच्चों के लिए बेहतर स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में किया जाए। ग्रामीण स्कूलों की बदहाली का मुद्दा डिपके ने अपनी ‘School Thik Karo’ मुहिम के तहत ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि कई स्कूलों में बच्चों को बेहतर सड़क, बैठने के लिए पर्याप्त बेंच और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि एक तरफ ग्रामीण स्कूलों में फंड की कमी बताई जाती है और दूसरी तरफ PM CARES Fund में हजारों करोड़ रुपये मौजूद हैं। ₹8,500 करोड़ से 1,000 से ज्यादा स्कूलों का दावा डिपके के मुताबिक अगर एक आधुनिक और सुविधायुक्त मॉडल स्कूल बनाने में करीब ₹8 करोड़ खर्च हों, तो ₹8,500 करोड़ की राशि से 1,000 से ज्यादा हाईटेक मॉडल स्कूल बनाए जा सकते हैं। उन्होंने सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की अपील की। हालांकि, यह आंकड़ा डिपके का अनुमान है और इसे सरकार की स्वीकृत स्कूल-निर्माण योजना नहीं माना जाना चाहिए। PM CARES Fund में कितनी रकम है? नवीनतम ऑडिट आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2025 को PM CARES Fund का बैलेंस ₹8,452.06 करोड़ था। यह राशि 2023-24 के करीब ₹7,173 करोड़ के बैलेंस से काफी अधिक है। फंड की करीब 93% राशि यानी ₹7,846.65 करोड़ फिक्स्ड डिपॉजिट में थी। वित्त वर्ष 2024-25 में फंड से कुल भुगतान करीब ₹87.85 लाख दर्ज हुआ, जिससे फंड के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज हुई है। क्या PM CARES का पैसा स्कूलों पर खर्च किया जा सकता है? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। PM CARES Fund का घोषित उद्देश्य मुख्य रूप से आपात स्थितियों, आपदाओं, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों और प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान करना है। इसके उद्देश्यों में इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य सहायता से जुड़े प्रावधान भी हैं, लेकिन सामान्य स्कूल निर्माण या नियमित शिक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर को अलग से मुख्य उद्देश्य के रूप में नहीं बताया गया है। इसलिए PM CARES की राशि से सामान्य स्कूल निर्माण किया जा सकता है या नहीं, यह फंड के घोषित उद्देश्यों और Board of Trustees की स्वीकृति पर निर्भर करेगा। BJP ने मांग पर जताई आपत्ति इस मांग के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। BJP ने कहा कि PM CARES Fund का उद्देश्य आपातकालीन और आपदा राहत है और इसे सामान्य स्कूल निर्माण के लिए इस्तेमाल करने की मांग फंड के मूल उद्देश्य को नहीं समझती। यानी फिलहाल यह सरकार की घोषित योजना नहीं, बल्कि अभिजीत डिपके की मांग है। PM CARES Fund फिर चर्चा में ₹8,452 करोड़ के बड़े कॉर्पस, FY25 में बेहद कम भुगतान और अब ग्रामीण स्कूलों के लिए इस राशि के इस्तेमाल की मांग ने PM CARES Fund को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। आगे यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार या PM CARES Fund का ट्रस्ट बोर्ड इस सुझाव पर कोई विचार करता है या स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मौजूदा सरकारी योजनाओं के जरिए ही फंड उपलब्ध कराया जाता है। स्रोत: PM CARES Fund Audit Report, PTI, Hindustan Times, New Indian Express, Times of India Jai Rashtra News

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PM CARES Fund: ₹8,452 करोड़ का फंड, FY25 में खर्च सिर्फ ₹87.85 लाख!

नई दिल्ली: PM CARES Fund एक बार फिर चर्चा में है। ताजा ऑडिट स्टेटमेंट के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक फंड का कुल बैलेंस ₹8,452.06 करोड़ था, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में इससे सिर्फ ₹87.85 लाख के भुगतान दर्ज हुए। आंकड़े सामने आने के बाद फंड के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। 93% रकम फिक्स्ड डिपॉजिट में ऑडिट आंकड़ों के अनुसार फंड की करीब ₹7,846.65 करोड़ राशि फिक्स्ड डिपॉजिट में थी, जबकि लगभग ₹605.41 करोड़ सेविंग बैंक खातों में रखे गए थे। यानी कुल बैलेंस का लगभग 93% हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट में था। FY2024-25 में फिक्स्ड डिपॉजिट से करीब ₹469.38 करोड़ ब्याज भी मिला। ब्याज आय फंड की वित्तीय स्थिति मजबूत होने की प्रमुख वजहों में शामिल रही। ₹87.85 लाख में ज्यादातर रकम बच्चों की योजना पर वित्त वर्ष 2024-25 में PM CARES से कुल ₹87.85 लाख का भुगतान हुआ। इसमें लगभग पूरी राशि यानी ₹87.84 लाख PM CARES for Children Scheme के तहत खर्च हुई। पिछले वित्त वर्ष में कुल भुगतान करीब ₹15.6 करोड़ था। ₹8,452 करोड़ के क्लोजिंग बैलेंस की तुलना में FY25 का यह भुगतान करीब 0.01% है। हालांकि, यह सिर्फ एक वित्त वर्ष के भुगतान और उस वर्ष के अंत में मौजूद बैलेंस की तुलना है; इसे फंड की स्थापना से अब तक के कुल खर्च का प्रतिशत नहीं माना जाना चाहिए। फंड का बैलेंस एक साल में बढ़ा PM CARES का बैलेंस FY2023-24 में करीब ₹7,173 करोड़ था, जो मार्च 2025 तक बढ़कर ₹8,452 करोड़ से ज्यादा हो गया। इसी अवधि में घरेलू स्वैच्छिक योगदान करीब ₹479 करोड़ रहा, जबकि पिछले साल यह करीब ₹682 करोड़ था। बैलेंस बढ़ने में ब्याज आय और अन्य वित्तीय मदों की भी अहम भूमिका रही। खर्च को लेकर राजनीतिक बहस तेज ताजा आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद विपक्ष और अन्य आलोचकों ने सवाल उठाए हैं कि इतने बड़े फंड के मुकाबले FY25 में खर्च इतनी कम क्यों रही। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने भी ₹87.85 लाख के खर्च और फिक्स्ड डिपॉजिट में रखी बड़ी राशि को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं, फंड के समर्थक पक्ष से यह तर्क सामने आया है कि PM CARES का उद्देश्य आपात स्थितियों के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध रखना है और किसी एक वित्त वर्ष में कम खर्च होना अपने आप में वित्तीय अनियमितता साबित नहीं करता। PM CARES Fund क्या है? Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations (PM CARES) Fund की स्थापना मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान की गई थी। यह एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में काम करता है और इसका उद्देश्य आपातकालीन परिस्थितियों में सहायता प्रदान करना है। ताजा ऑडिट आंकड़ों ने एक बार फिर फंड के बड़े कॉर्पस, कम वार्षिक भुगतान और निवेश पैटर्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। स्रोत: PM CARES Fund Audit Statement, India Today, PTI, Tribune India Jai Rashtra News

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम! प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए हाई-पावर पैनल की तैयारी

नई दिल्ली: संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प तथा कथित पुलिस ज्यादती के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 19 अगस्त 2026 को मामले की जांच के लिए हाई-पावर कमेटी गठित करने की तैयारी की है। इस पैनल की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे। रिटायर्ड SC जज करेंगे कमेटी की अगुवाई प्रस्तावित कमेटी में एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज के अलावा पूर्व हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शामिल किया जाएगा। कोर्ट का उद्देश्य 20 जुलाई को हुए संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर सामने आए आरोपों और पुलिस की ओर से लगाए गए जवाबी आरोपों की निष्पक्ष जांच कराना है। पुलिस कार्रवाई पर उठे थे गंभीर सवाल 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर निकले प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए थे। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और अन्य कार्रवाई के आरोप लगाए थे। वहीं, दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपने जवाब में इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने “maximum restraint” बरता और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए केवल आवश्यक बल का इस्तेमाल किया। पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान उसके 240 से अधिक जवान घायल हुए। पैनल तय करेगा क्या हुआ था? सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित होने वाली कमेटी प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं की तथ्यात्मक जांच करेगी। उपलब्ध वीडियो फुटेज, CCTV रिकॉर्डिंग और अन्य सामग्री को भी जांच का हिस्सा बनाए जाने की संभावना है। अदालत ने पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हुए कथित हमलों को भी जांच के दायरे में रखने के संकेत दिए हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर कोर्ट का जोर सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन संविधान के तहत संरक्षित अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा है कि केवल प्रदर्शन होने के कारण पुलिस अत्यधिक बल का इस्तेमाल नहीं कर सकती और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संतुलित प्रक्रिया जरूरी है। FIR पर भी सुप्रीम कोर्ट की नजर मामले में प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR भी सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं। अदालत ने संकेत दिया है कि जिन मामलों में विवाद या गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है, उनमें FIR खत्म करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों के इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के औपचारिक आदेश और हाई-पावर कमेटी के गठन पर है। जांच के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों की ओर से क्या-क्या हुआ और क्या कहीं तय नियमों से अधिक बल का इस्तेमाल किया गया। स्रोत: Supreme Court proceedings, Times of India, Indian Express, PTI Jai Rashtra News

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ED का बड़ा एक्शन! आजम खान के ट्रस्ट और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े 10 ठिकानों पर छापेमारी

नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बुधवार, 19 अगस्त 2026 को समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ा एक्शन लिया। एजेंसी ने उत्तर प्रदेश के रामपुर और सहारनपुर के अलावा दिल्ली में करीब 10 ठिकानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया। कार्रवाई में आजम खान से जुड़े मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के परिसर भी शामिल हैं। PMLA के तहत चल रही जांच ED की यह कार्रवाई Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के तहत दर्ज मामले की जांच का हिस्सा है। अधिकारियों के अनुसार, जांच का मुख्य फोकस कथित तौर पर सरकारी ठेकों से जुड़े धन के डायवर्जन और उसके बाद उस रकम के इस्तेमाल पर है। एजेंसी वित्तीय रिकॉर्ड, दस्तावेज और डिजिटल सबूत जुटाने की कोशिश कर रही है। सरकारी ठेकों की रकम के इस्तेमाल की जांच जांच एजेंसी को कथित तौर पर कुछ ऐसे वित्तीय लेनदेन मिले हैं, जिनमें सरकारी ठेके हासिल करने वाले कुछ निजी ठेकेदारों से ट्रस्ट और यूनिवर्सिटी से जुड़े संस्थानों तक धन पहुंचने की आशंका जताई गई है। ED यह जांच कर रही है कि कथित तौर पर डायवर्ट किए गए सरकारी ठेकों के फंड का इस्तेमाल यूनिवर्सिटी और ट्रस्ट से जुड़ी संपत्तियों के निर्माण तथा अन्य गतिविधियों में किया गया या नहीं। हालांकि, इन आरोपों की जांच अभी जारी है और तलाशी से मिले दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। रामपुर की जौहर यूनिवर्सिटी भी जांच के घेरे में रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना आजम खान ने 2006 में की थी। यूनिवर्सिटी पहले से ही जमीन, निर्माण और वित्तीय मामलों से जुड़े विवादों के कारण चर्चा में रही है। ED की ताजा कार्रवाई ने इस संस्थान को लेकर चल रही कानूनी और राजनीतिक बहस को फिर तेज कर दिया है। यूनिवर्सिटी के कई भवनों को लेकर भी अलग विवाद चल रहा है। रामपुर विकास प्राधिकरण ने यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों पर आवश्यक मंजूरियों के बिना निर्माण का आरोप लगाया था। प्रस्तावित कार्रवाई पर फिलहाल न्यायिक प्रक्रिया के कारण रोक लगी हुई है। राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज ED की छापेमारी के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी ने कार्रवाई को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने ED की जांच का बचाव करते हुए कहा कि अगर किसी तरह की गड़बड़ी सामने आती है तो उसके आधार पर कार्रवाई होगी। फिलहाल ED की टीमें दस्तावेजों और अन्य डिजिटल एवं वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर रही हैं। छापेमारी में क्या-क्या बरामद हुआ और जांच आगे किस दिशा में बढ़ेगी, इसकी विस्तृत जानकारी एजेंसी की कार्रवाई पूरी होने के बाद सामने आने की उम्मीद है। स्रोत: Enforcement Directorate, Indian Express, The New Indian Express, Times of India Jai Rashtra News

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16 दिनों के लंबे संघर्ष के बाद देवेंद्र नाथ महतो ने तोड़ा अनशन, सदर अस्पताल में खत्म हुई भूख हड़ताल

रांची: झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ लंबे समय से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने अपना 16 दिनों का अनशन समाप्त कर दिया है। उन्होंने रांची के सदर अस्पताल में सोमवार रात भूख हड़ताल खत्म की। सरकार के फैसले के बाद खत्म हुआ अनशन देवेंद्र नाथ महतो का अनशन उस समय समाप्त हुआ जब झारखंड सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा और TDPL के जरिए आयोजित परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा की। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 17 अगस्त को घोषणा की कि TDPL द्वारा आयोजित परीक्षाओं और उनसे जुड़े परिणामों एवं नियुक्ति प्रक्रियाओं को रद्द किया जाएगा। साथ ही 2014 से TDPL के जरिए हुई परीक्षाओं की जांच का फैसला भी लिया गया। सदर अस्पताल में जूस पिलाकर अनशन खत्म अनशन खत्म कराने के दौरान झारखंड सरकार के मंत्री दीपिका पांडे सिंह और इरफान अंसारी सदर अस्पताल पहुंचे। रिपोर्टों के अनुसार, देवेंद्र नाथ महतो ने जूस पीकर अपना अनशन समाप्त किया। इस दौरान उनके साथ मौजूद अन्य प्रदर्शनकारियों ने भी भूख हड़ताल समाप्त की। महतो ने सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए इसे छात्रों के संघर्ष की बड़ी उपलब्धि बताया। 16 दिनों तक जारी रहा संघर्ष देवेंद्र नाथ महतो ने भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और पारदर्शिता की मांग को लेकर 16 दिनों तक भूख हड़ताल की। लंबे समय तक भोजन नहीं लेने के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई थी और उन्हें इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने उनके स्वास्थ्य में इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन जैसी समस्याओं को लेकर चिंता जताई थी। अस्पताल में भर्ती रहने के बावजूद महतो लगातार अपनी मांगों को लेकर आंदोलन जारी रखने पर जोर देते रहे। JSSC-CGL रद्द होने से छात्रों में खुशी सरकार के फैसले के बाद आंदोलनकारी छात्रों में खुशी देखी गई। JSSC-CGL समेत TDPL से जुड़ी भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने को छात्र नेताओं ने अपनी बड़ी जीत बताया है। हालांकि, आंदोलन पूरी तरह खत्म हुआ है या नहीं, इस पर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। CBI जांच की मांग अभी बाकी छात्र आंदोलन से जुड़े संगठनों की एक प्रमुख मांग CBI जांच की भी रही है। सरकार द्वारा परीक्षाएं रद्द किए जाने के बावजूद छात्र संगठनों के एक धड़े ने कहा है कि जब तक भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच नहीं होती, तब तक उनका संघर्ष जारी रह सकता है। इसलिए परीक्षा रद्द होने के बाद भी झारखंड में भर्ती व्यवस्था और जांच को लेकर राजनीतिक एवं छात्र आंदोलन जारी रहने की संभावना है। अब आगे क्या होगा? अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि रद्द की गई परीक्षाओं को दोबारा कब कराया जाएगा और नई परीक्षा व्यवस्था कैसी होगी। साथ ही, सरकार को उन अभ्यर्थियों के भविष्य को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था करनी होगी, जो पहले की चयन प्रक्रिया में सफल हुए थे। निष्कर्ष 16 दिनों के लंबे संघर्ष के बाद देवेंद्र नाथ महतो ने रांची के सदर अस्पताल में अपना अनशन समाप्त कर दिया। यह फैसला झारखंड सरकार द्वारा JSSC-CGL और TDPL से जुड़ी परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा के बाद आया। हालांकि, CBI जांच और भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता की मांग को लेकर छात्र आंदोलन का अगला रुख महत्वपूर्ण रहेगा। Source: Hindustan Times, Indian Express, Navbharat Times, Amar Ujala जय राष्ट्र न्यूज़

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अभिजीत दीपके की डिग्री और स्कॉलरशिप पर सवाल, बोले—“मैं अपनी डिग्री दिखाने को तैयार”

नई दिल्ली: CJP संस्थापक अभिजीत दीपके की विदेश में पढ़ाई और उसकी फंडिंग को लेकर उठे सवालों के बीच विवाद अब राजनीतिक रंग ले चुका है। दीपके ने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देते हुए कहा है कि वह अपनी डिग्री, स्कॉलरशिप लेटर और एजुकेशन लोन से जुड़े दस्तावेज दिखाने के लिए तैयार हैं। साथ ही उन्होंने BJP नेताओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी सवाल उठाए। Boston University की पढ़ाई पर उठे सवाल विवाद तब शुरू हुआ जब गुजरात के एक RTI कार्यकर्ता ने दीपके की विदेश में पढ़ाई के खर्च को लेकर सवाल उठाए। उनके पिता के वित्तीय मामलों की जांच की मांग भी की गई और यह सवाल उठाया गया कि अमेरिका में उनकी पढ़ाई का खर्च कैसे पूरा हुआ। दीपके ने इन सवालों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन का इस्तेमाल हुआ था। उन्होंने कहा कि उनके पास इससे संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें सार्वजनिक किया जा सकता है। “मैं अपनी डिग्री दिखाने को तैयार हूं” अभिजीत दीपके ने कहा कि अगर उनकी शिक्षा और डिग्री को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं तो वह अपनी Boston University की डिग्री दिखाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास स्कॉलरशिप लेटर और एजुकेशन लोन के दस्तावेज हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दीपके ने दावा किया है कि उन्हें Boston University से Dean’s Scholarship मिली थी और पढ़ाई के बाकी खर्च के लिए एजुकेशन लोन लिया गया था। PM मोदी की डिग्री पर भी उठाया सवाल दीपके ने अपने बचाव के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री को लेकर भी सवाल खड़ा किया। उनका कहना है कि यदि उनसे उनकी शैक्षणिक योग्यता के दस्तावेज मांगे जा रहे हैं तो राजनीतिक नेताओं को भी अपनी डिग्रियों को सार्वजनिक करने के लिए तैयार रहना चाहिए। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में बहस और तेज हो गई है। विरोधियों को भी दिया जवाब 17 अगस्त को सामने आए एक वीडियो में दीपके ने उन लोगों पर भी निशाना साधा, जो उनकी Boston University की डिग्री को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अपनी डिग्री दिखा देंगे और साथ ही अपने आलोचकों से भी अपनी शैक्षणिक योग्यता सार्वजनिक करने की मांग की। विवाद अब राजनीतिक मुद्दा बना यह मामला केवल दीपके की शिक्षा तक सीमित नहीं रहा है। उनके CJP आंदोलन और सरकार के खिलाफ उनके बयानों के कारण यह विवाद राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने भी दीपके की ओर से प्रधानमंत्री की डिग्री पर सवाल उठाने वाली टिप्पणी की आलोचना की और इसे अहंकार से जोड़कर देखा। निष्कर्ष अभिजीत दीपके की Boston University की डिग्री और विदेश में पढ़ाई की फंडिंग को लेकर उठे सवालों के बीच उन्होंने साफ कहा है कि वह अपनी डिग्री, स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन से जुड़े दस्तावेज दिखाने को तैयार हैं। वहीं प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर उनके सवालों ने इस विवाद को और राजनीतिक बना दिया है। फिलहाल दोनों पक्षों के बयानों के बीच यह मुद्दा सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चा में बना हुआ है। Source: PTI, India Today, ThePrint, ABP News, Navbharat Live जय राष्ट्र न्यूज़

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दिमागी नक्सल’ बयान पर सियासी घमासान, पी. चिदंबरम के पलटवार पर किरेन रिजिजू का जवाब

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर BJP और विपक्ष के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने पीएम मोदी के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। इसके बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा था। लाल किले से पीएम मोदी ने क्या कहा? 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि देश ने हथियारबंद नक्सलवाद को काफी हद तक खत्म किया है, लेकिन ऐसी विचारधाराओं से जुड़े लोग अब भी अवसर तलाश रहे हैं। उन्होंने देश को ऐसे ‘दिमागी नक्सलियों’ से सावधान रहने की बात कही। पीएम के इस बयान के बाद विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या यह टिप्पणी सरकार की आलोचना करने वाले विपक्षी नेताओं और असहमति की आवाजों को निशाना बनाने के लिए की गई थी। चिदंबरम का तीखा पलटवार कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के बयान का जवाब देते हुए कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। उनके बयान के बाद कांग्रेस और BJP के बीच राजनीतिक बहस और तेज हो गई। कांग्रेस नेताओं ने इस शब्दावली को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल किया कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने वालों को इस तरह के लेबल से जोड़ना कितना उचित है। रिजिजू ने दी सफाई केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा था। रिजिजू के मुताबिक, इस शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया गया जो माओवादियों का समर्थन करते हैं, संविधान को नहीं मानते या अलगाववादी विचारों तथा अनुच्छेद 370 जैसी पुरानी व्यवस्था के समर्थन में खड़े होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री का निशाना राजनीतिक विरोधी नहीं, बल्कि ऐसी विचारधाराएं हैं जिन्हें सरकार देश की संवैधानिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती मानती है। विवाद सोशल मीडिया तक पहुंचा चिदंबरम के बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर बहस तेज हो गई। BJP समर्थकों ने चिदंबरम के बयान को पीएम मोदी की बात को अपने ऊपर लेने के रूप में पेश किया, जबकि विपक्षी नेताओं ने इसे सरकार की आलोचना और असहमति को दबाने वाली भाषा बताया। इसी बीच PDP प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी रिजिजू की सफाई पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह अनुच्छेद 370 का समर्थन करती हैं और इसी संदर्भ में उन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहा। BJP बनाम कांग्रेस: बढ़ा राजनीतिक तापमान इस पूरे विवाद ने स्वतंत्रता दिवस के बाद BJP और कांग्रेस के बीच पहले से जारी राजनीतिक टकराव को और बढ़ा दिया है। एक ओर BJP प्रधानमंत्री के बयान को नक्सलवाद और अलगाववाद के खिलाफ वैचारिक लड़ाई के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक असहमति को निशाना बनाने वाली भाषा बता रहा है। निष्कर्ष ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर शुरू हुआ विवाद अब पी. चिदंबरम के पलटवार और किरेन रिजिजू की सफाई के बाद और तेज हो गया है। फिलहाल राजनीतिक बहस का मुख्य सवाल यही है कि पीएम मोदी की टिप्पणी का वास्तविक निशाना कौन था और इस शब्द की राजनीतिक व्याख्या किस तरह की जाए। Source: India Today, NDTV, ABP News, PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और BJP में फिर सियासी टकराव, स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का वीडियो बना विवाद का केंद्र

नई दिल्ली: देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। विवाद कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के गायन से जुड़ी एक वीडियो क्लिप के सामने आने के बाद शुरू हुआ। वीडियो में क्या दिखा? कांग्रेस के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान पार्टी की संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बीच बातचीत और इशारों का एक वीडियो सामने आया। BJP ने इस वीडियो को आधार बनाकर आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के गायन पर आपत्ति जताई। वीडियो में राहुल गांधी भी नजर आते हैं। इसी दृश्य को लेकर BJP नेताओं ने सोशल मीडिया पर कांग्रेस पर सवाल उठाए और राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान को लेकर राजनीतिक हमला बोला। कांग्रेस ने BJP के आरोप को किया खारिज कांग्रेस ने BJP के आरोपों को गलत बताया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि सोनिया गांधी ‘वंदे मातरम्’ को रोकने या उसका विरोध करने के लिए नहीं कह रही थीं। कांग्रेस के मुताबिक, सोनिया गांधी केवल यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही थीं कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था हो, क्योंकि वह काफी देर से खड़े थे। इस तरह एक ही वीडियो को लेकर दोनों दलों की व्याख्या पूरी तरह अलग सामने आई है। BJP ने लगाया राष्ट्रीय गीत के अपमान का आरोप BJP ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा महत्वपूर्ण गीत है और इसके गायन के दौरान किसी तरह की आपत्ति या व्यवधान स्वीकार नहीं किया जा सकता। BJP प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने भी वीडियो साझा करते हुए कांग्रेस पर सवाल उठाए। क्यों महत्वपूर्ण है ‘वंदे मातरम्’? ‘वंदे मातरम्’ लंबे समय से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा राष्ट्रीय गीत है। इस वर्ष इसके 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे लेकर देशभर में विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं। 15 अगस्त 2026 को लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी ‘वंदे मातरम्’ को विशेष महत्व दिया गया और इसके पूर्ण संस्करण के गायन को लेकर पहले से चर्चा थी। पहले से चल रहा है राजनीतिक विवाद यह विवाद अचानक नहीं उठा है। पिछले कुछ दिनों से ही ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण, इसके गायन और सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसके इस्तेमाल को लेकर BJP और कांग्रेस नेताओं के बीच बयानबाजी चल रही है। कांग्रेस नेता शशि थरूर की टिप्पणी को लेकर भी BJP ने हाल में निशाना साधा था, जिसके बाद दोनों दलों के बीच बहस और तेज हो गई थी। इसके अलावा, संसद में राष्ट्रीय गीत से जुड़े कानून में संशोधन को लेकर भी राजनीतिक बहस हुई है। राजस्थान BJP कार्यक्रम में भी विवाद इसी स्वतंत्रता दिवस पर राजस्थान BJP के कार्यक्रम में भी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर अलग विवाद सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के कार्यक्रम में राष्ट्रीय गीत का गलत संगीत संस्करण बज गया, जिसके बाद राजस्थान BJP अध्यक्ष मदन राठौड़ ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। इससे स्वतंत्रता दिवस के दिन ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े विवाद और भी चर्चा में आ गए। सोशल मीडिया पर भी तेज हुई बहस वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर BJP और कांग्रेस समर्थकों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गीत के सम्मान से जोड़ रहा है, जबकि दूसरा पक्ष BJP पर वीडियो को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रहा है। हालांकि, वीडियो में दिखाई देने वाले इशारों की वास्तविक मंशा का स्वतंत्र रूप से निर्धारण करना संभव नहीं है। इसलिए दोनों पक्षों के दावों को आरोप और जवाब के रूप में ही देखा जाना चाहिए। निष्कर्ष स्वतंत्रता दिवस के कांग्रेस कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के दौरान सामने आए वीडियो ने BJP और कांग्रेस के बीच नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। BJP ने सोनिया गांधी पर राष्ट्रीय गीत को लेकर आपत्ति जताने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस ने साफ किया कि वह केवल मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था को लेकर बात कर रही थीं। मामला अब सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक बयानबाजी तक पहुंच गया है और आने वाले दिनों में इस पर दोनों दलों के बीच और प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं। Source: PTI, The Federal, Times of India, NDTV जय राष्ट्र न्यूज़

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तमिलनाडु में विदेशी निवेशकों का बड़ा दांव, 16 परियोजनाओं के लिए ₹15,050 करोड़ के समझौते

चेन्नई: तमिलनाडु में विदेशी निवेश को लेकर बड़ा कदम सामने आया है। राज्य सरकार ने विदेशी निवेशकों के साथ 16 नई परियोजनाओं के लिए करीब ₹15,050 करोड़ के निवेश समझौते किए हैं। इन परियोजनाओं में फ्रांस की Saint-Gobain, अमेरिका की Super Micro Computer और जर्मनी की Daimler India Commercial Vehicles जैसी कंपनियां शामिल हैं। विदेशी कंपनियों से हुए 16 समझौते राज्य सरकार के अनुसार, विदेशी निवेशकों के साथ हुए 16 समझौतों की कुल अनुमानित राशि ₹150.5 अरब यानी करीब ₹15,050 करोड़ है। ये निवेश तमिलनाडु में औद्योगिक उत्पादन और मौजूदा इकाइयों के विस्तार को बढ़ावा देने के लिए किए जाएंगे। यह घोषणा राज्य में आयोजित बड़े निवेश सम्मेलन के दौरान हुई, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों की कंपनियों ने निवेश की प्रतिबद्धता जताई। Saint-Gobain और Daimler का बड़ा निवेश फ्रांस की निर्माण क्षेत्र की कंपनी Saint-Gobain करीब ₹2,000 करोड़ का निवेश करेगी। इसमें नई फैक्ट्री स्थापित करने के साथ कांचीपुरम स्थित मौजूदा सुविधा के विस्तार की योजना शामिल है। वहीं जर्मनी की Daimler India Commercial Vehicles चेन्नई स्थित अपने कारखाने के विस्तार पर करीब ₹4,000 करोड़ खर्च करेगी। Super Micro Computer भी करेगी निवेश अमेरिका की सर्वर निर्माण कंपनी Super Micro Computer भी तमिलनाडु में निवेश करने वाली प्रमुख विदेशी कंपनियों में शामिल है। इससे राज्य के इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती मिलने की उम्मीद है। कुल 97 समझौते, ₹67,452 करोड़ से ज्यादा के निवेश विदेशी निवेश के अलावा सम्मेलन में भारतीय कंपनियों के साथ भी समझौते किए गए। राज्य सरकार ने कुल 97 निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनकी अनुमानित कुल राशि ₹67,452 करोड़ से ज्यादा बताई गई है। इन परियोजनाओं से एक लाख से ज्यादा रोजगार पैदा होने का अनुमान है। इनमें Titan, MAS Holdings, Hinduja Group, Agnikul Cosmos और Ultraviolette जैसी कंपनियों के निवेश भी शामिल हैं। स्पेस, EV और क्वांटम टेक्नोलॉजी पर भी फोकस तमिलनाडु का निवेश अभियान केवल पारंपरिक उद्योगों तक सीमित नहीं है। राज्य में स्पेस टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, क्वांटम कंप्यूटिंग, लाइफ साइंसेज, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में भी निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया जा रहा है। चेन्नई बना बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब चेन्नई को लंबे समय से भारत के प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों में गिना जाता है। यहां Hyundai, Renault, TVS Motor और Apple के सप्लायर्स Foxconn तथा Tata Electronics जैसी कंपनियों की गतिविधियां हैं। नए निवेश से तमिलनाडु की औद्योगिक स्थिति और मजबूत होने की उम्मीद है। निष्कर्ष तमिलनाडु में विदेशी कंपनियों के ₹15,050 करोड़ के 16 निवेश समझौते राज्य के औद्योगिक क्षेत्र के लिए बड़ा घटनाक्रम हैं। Saint-Gobain, Daimler और Super Micro Computer जैसी कंपनियों की भागीदारी से मैन्युफैक्चरिंग और हाई-टेक सेक्टर को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि, ध्यान रहे कि ये निवेश समझौते/प्रतिबद्धताएं हैं; वास्तविक निवेश का क्रियान्वयन परियोजनाओं के आगे बढ़ने पर निर्भर करेगा। Source: Reuters, Tamil Nadu Government-related reports जय राष्ट्र न्यूज़

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मंत्री कार्यालय परिसर में BJP का झंडा? वीडियो सामने आने के बाद उठे सवाल

नई दिल्ली: एक वीडियो सामने आने के बाद मंत्री कार्यालय के परिसर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का झंडा दिखाई देने को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे हैं। वीडियो को लेकर यह चर्चा तेज है कि क्या किसी सरकारी मंत्री कार्यालय के परिसर में राजनीतिक दल का झंडा लगाया जाना उचित है। हालांकि, मुझे उपलब्ध विश्वसनीय ताजा रिपोर्टों में इस खास वीडियो, उसके स्थान और संबंधित मंत्री की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इसे फिलहाल एक वायरल दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। वीडियो में क्या दिखाई दे रहा है? सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि एक मंत्री कार्यालय के परिसर में BJP का झंडा लगा हुआ दिखाई दे रहा है। इसी दृश्य को लेकर लोगों ने सरकारी कार्यालय और राजनीतिक पार्टी के प्रतीक के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि के बिना यह कहना मुश्किल है कि फुटेज किस कार्यालय, किस तारीख और किस परिस्थिति का है। सरकारी कार्यालय में राजनीतिक झंडे को लेकर क्यों उठे सवाल? सरकारी कार्यालय संवैधानिक और प्रशासनिक कामकाज के लिए होते हैं। ऐसे स्थानों पर किसी राजनीतिक दल का प्रतीक या झंडा दिखाई देने पर स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ सकता है कि क्या सरकारी परिसर और राजनीतिक गतिविधियों के बीच उचित दूरी बनाए रखी गई है। हालांकि, किसी वीडियो के आधार पर नियमों के उल्लंघन का निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित विभाग या प्रशासन का पक्ष जानना जरूरी है। सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस तेज वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सरकारी कार्यालय के राजनीतिकरण का मुद्दा बता रहे हैं, जबकि अन्य लोग वीडियो के संदर्भ और वास्तविक स्थान की पुष्टि की मांग कर रहे हैं। इस तरह के मामलों में वीडियो की तारीख, स्थान और मूल स्रोत की पुष्टि बेहद महत्वपूर्ण होती है। आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार फिलहाल इस मामले में संबंधित मंत्री कार्यालय या प्रशासन की ओर से ऐसा कोई स्पष्ट आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं है, जिससे यह पुष्टि हो सके कि वीडियो वास्तव में किस कार्यालय का है और वहां BJP का झंडा किस कारण मौजूद था। इसलिए इस खबर को प्रकाशित करते समय “वीडियो में दावा” और “स्वतंत्र रूप से पुष्टि” के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। निष्कर्ष मंत्री कार्यालय के परिसर में BJP का झंडा दिखाई देने वाले कथित वीडियो ने सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस छेड़ दी है। हालांकि, वीडियो की जगह, समय और संदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है। आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर साफ हो सकेगी। Source: सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो; स्वतंत्र पुष्टि/आधिकारिक बयान उपलब्ध नहीं जय राष्ट्र न्यूज़

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