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चिराग पासवान ने अपनी ही सरकार पर उठाए सवाल, बोले—‘शर्मिंदगी महसूस होती है’; जानिए वायरल बयान का पूरा सच

पटना: बिहार में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हाल में सामने आई घटनाओं के बीच केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने कानून-व्यवस्था पर चिंता जताई है। उन्होंने अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। इसी बीच उनका “ऐसी सरकार का समर्थन करने पर शर्मिंदगी महसूस होती है” वाला वीडियो भी वायरल हो रहा है, लेकिन यह वीडियो मौजूदा सम्राट चौधरी सरकार के समय का नहीं बल्कि 26 जुलाई 2025 का है। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता 24 सितंबर 2026 को पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान चिराग पासवान ने जमुई और समस्तीपुर में महिलाओं से जुड़ी घटनाओं को गंभीर चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि अपने ही प्रदेश की बेटियों को असुरक्षित देखकर उन्हें शर्म आती है और सरकार में शामिल कोई भी व्यक्ति जवाबदेही से नहीं भाग सकता। उन्होंने दोषियों के साथ उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग की, जिनकी लापरवाही सामने आती है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से की बात चिराग पासवान ने बताया कि उन्होंने इस मुद्दे को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से भी बातचीत की है। उन्होंने कहा कि केवल आरोपियों को गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी पता लगाना होगा कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों सामने आ रही हैं और स्थानीय प्रशासन इन्हें रोकने में कहां कमजोर पड़ रहा है। जमुई और समस्तीपुर की घटनाओं का किया जिक्र चिराग ने जमुई में हुई घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई की। उन्होंने समस्तीपुर मामले में भी सभी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। उनका कहना था कि बिहार की बेटियां कम से कम अपने ही राज्य में खुद को असुरक्षित महसूस न करें और इसके लिए पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। ‘सरकार का हिस्सा होने पर शर्म’ वाला वीडियो पुराना सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में चिराग पासवान यह कहते दिखाई देते हैं कि उन्हें ऐसी सरकार का समर्थन करने पर शर्म आती है, जहां अपराध नियंत्रण से बाहर हो रहा है। फैक्ट-चेक में सामने आया कि यह वीडियो 26 जुलाई 2025 का है। उस समय बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार थी। इसलिए इसे सितंबर 2026 में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार पर दिया गया नया बयान बताना सही नहीं है। जुलाई 2025 में क्या कहा था चिराग ने? 2025 में बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर चिराग पासवान ने तत्कालीन सरकार पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने हत्या, लूट, अपहरण और अन्य आपराधिक घटनाओं का जिक्र करते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने उस समय कहा था कि अपराधों पर नियंत्रण नहीं होने के कारण उन्हें ऐसी सरकार का समर्थन करने पर शर्म महसूस होती है और प्रशासन को समय रहते कदम उठाने चाहिए। 2026 में बयान के शब्द अलग सितंबर 2026 में दिए गए हालिया बयान में चिराग पासवान ने “सरकार का हिस्सा होने पर शर्मिंदगी” वाला पुराना वाक्य दोहराने के बजाय कहा कि उन्हें अपने प्रदेश की बेटियों को असुरक्षित देखकर शर्म आती है। इसलिए दोनों बयानों का संदर्भ अलग-अलग है। पुराना वीडियो कानून-व्यवस्था को लेकर 2025 में तत्कालीन सरकार पर की गई टिप्पणी है, जबकि मौजूदा प्रतिक्रिया महिलाओं की सुरक्षा और हालिया घटनाओं पर प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ी है। विपक्ष ने वायरल वीडियो को बनाया मुद्दा वीडियो दोबारा वायरल होने के बाद RJD और जन सुराज से जुड़े नेताओं ने इसे मौजूदा सरकार के खिलाफ राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया। हालांकि बाद में सामने आए फैक्ट-चेक में स्पष्ट हुआ कि जिस वीडियो को मौजूदा बयान के रूप में शेयर किया जा रहा था, वह एक साल से ज्यादा पुराना है। सरकार छोड़ने की कोई घोषणा नहीं चिराग पासवान NDA के सहयोगी हैं और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। उपलब्ध जानकारी में उन्होंने बिहार की मौजूदा सरकार से समर्थन वापस लेने या NDA छोड़ने की कोई घोषणा नहीं की है। उनकी हालिया टिप्पणी मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारियों की जवाबदेही पर केंद्रित रही है। वायरल दावे और मौजूदा बयान में अंतर पूरे मामले में दो बातें अलग-अलग समझना जरूरी हैं। चिराग पासवान ने सितंबर 2026 में बिहार की महिला सुरक्षा की स्थिति पर गंभीर चिंता जरूर जताई है, लेकिन सरकार का समर्थन करने पर “शर्मिंदगी” वाला वायरल वीडियो जुलाई 2025 का है। इसलिए पुराने वीडियो को मौजूदा सम्राट चौधरी सरकार के खिलाफ दिया गया नया बयान बताना भ्रामक होगा। source – ANI / ABP News / Navbharat Times / SouthCheck जय राष्ट्र न्यूज़

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आज की मांग: CEC ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न दिया जाए! दिल्ली में समर्थन में उतरे संगठन

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच अब उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की मांग उठी है। दिल्ली में अग्रवाल और वैश्य समाज से जुड़े संगठनों के साथ ग्लोबल वैश्य फेडरेशन, यूनाइटेड हिंदू फ्रंट और अन्य संगठनों ने प्रदर्शन कर ज्ञानेश कुमार के कामकाज का समर्थन किया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन देकर उन्हें भारत रत्न देने की मांग की। दिल्ली में ज्ञानेश कुमार के समर्थन में प्रदर्शन 27 सितंबर को दिल्ली में ज्ञानेश कुमार के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित किया गया। एक कार्यक्रम मंदिर मार्ग स्थित हिंदू महासभा भवन के सामने हुआ, जबकि जंतर-मंतर पर भी अग्रवाल और वैश्य समाज से जुड़े लोगों ने तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के समर्थन में नारे लगाए और विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग पर उठाए जा रहे सवालों का विरोध किया। भारत रत्न देने की रखी मांग प्रदर्शन में शामिल संगठनों ने ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग की। इस संबंध में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के नाम ज्ञापन देने की बात भी सामने आई है। संगठनों का कहना है कि मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR में ज्ञानेश कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है और इसी आधार पर वे उनके सम्मान की मांग कर रहे हैं। जय भगवान गोयल ने की CEC की तारीफ प्रदर्शन में शामिल जय भगवान गोयल ने ज्ञानेश कुमार के कामकाज की सराहना करते हुए कहा कि उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए। गोयल ने SIR के जरिए मतदाता सूची में कथित रूप से अयोग्य नाम हटाए जाने का दावा किया और इसे महत्वपूर्ण काम बताया। हालांकि मतदाता सूची से बांग्लादेशी या रोहिंग्या नागरिकों के नाम बड़े पैमाने पर हटाए जाने संबंधी उनके दावों की स्वतंत्र पुष्टि इन रिपोर्टों में नहीं की गई है। विपक्ष पर भी साधा निशाना प्रदर्शनकारियों ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं के खिलाफ भी नारे लगाए। संगठनों का आरोप है कि विपक्ष चुनावी हार के बाद चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को निशाना बना रहा है। यह प्रदर्शनकारी संगठनों का राजनीतिक आरोप है। अप्रैल में हिमंत बिस्वा सरमा भी कर चुके हैं ऐसी मांग यह पहली बार नहीं है जब ज्ञानेश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग उठी है। अप्रैल 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी कहा था कि SIR में योगदान के लिए ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न दिया जाना चाहिए। उनका बयान राजनीतिक प्रचार के दौरान दिया गया था। दूसरी ओर CEC के खिलाफ भी जारी है विरोध ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न देने की मांग ऐसे समय उठी है जब दूसरी ओर विपक्षी दल और कुछ नागरिक संगठन उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। SIR और चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर हाल के दिनों में राजनीतिक विवाद बढ़ा है। ज्ञानेश कुमार के समर्थन और विरोध में अलग-अलग प्रदर्शन भी हुए हैं। इसलिए भारत रत्न की मौजूदा मांग को भी इसी व्यापक राजनीतिक बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है। मांग से तेज हुई नई राजनीतिक बहस एक तरफ ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा मांगने वाले समूह प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके समर्थक अब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की मांग लेकर सामने आए हैं। फिलहाल यह कुछ संगठनों और राजनीतिक समर्थकों की मांग है। भारत रत्न देने को लेकर केंद्र सरकार की ओर से ज्ञानेश कुमार के नाम पर किसी आधिकारिक घोषणा की जानकारी सामने नहीं आई है। source – Dainik Jagran / Navbharat Times / ABP News / NDTV जय राष्ट्र न्यूज़

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शिवाजी पार्क में CJP के 2 अक्टूबर के प्रदर्शन को अनुमति नहीं, अभिजीत दीपके ने किया ‘जेल भरो आंदोलन’ का ऐलान

मुंबई: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को 2 अक्टूबर 2026 को मुंबई के शिवाजी पार्क में प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं मिली है। मुंबई पुलिस ने कहा कि मौजूदा अदालती आदेशों और महाराष्ट्र सरकार के दिशा-निर्देशों के तहत वह शिवाजी पार्क में इस तरह के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए अधिकृत नहीं है। CJP मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग से जुड़े सुधारों की मांग को लेकर यह प्रदर्शन आयोजित करना चाहती थी। 2 अक्टूबर को शिवाजी पार्क में होना था प्रदर्शन CJP ने गांधी जयंती के दिन मुंबई से अपने देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत करने की घोषणा की थी। संगठन की योजना शिवाजी पार्क में प्रदर्शन कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे समेत अपनी मांगें उठाने की थी। पुलिस के मुताबिक प्रदर्शन के लिए आवेदन 26 सितंबर को कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे की ओर से जमा किया गया था। इसके बाद शिवाजी पार्क पुलिस स्टेशन ने आयोजकों को लिखित जवाब भेजा। पुलिस ने 2013 के हाई कोर्ट आदेश का दिया हवाला मुंबई पुलिस ने अपनी प्रतिक्रिया में 4 जनवरी 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश और उसके बाद महाराष्ट्र सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। पुलिस का कहना है कि शिवाजी पार्क का इस्तेमाल मुख्य रूप से खेल गतिविधियों के लिए निर्धारित है और वहां सार्वजनिक कार्यक्रमों पर सीमाएं लागू हैं। आयोजकों ने मैदान के इस्तेमाल के लिए आवश्यक BMC अनुमति भी जमा नहीं की थी। ट्रैफिक और ‘साइलेंस जोन’ भी बना वजह पुलिस ने कहा कि शिवाजी पार्क एक आवासीय क्षेत्र और silence zone के अंतर्गत आता है। बड़े प्रदर्शन से ध्वनि प्रदूषण और यातायात जाम की स्थिति पैदा हो सकती है। पुलिस ने यह भी कहा कि भीड़ और ट्रैफिक के कारण आसपास के अस्पतालों तक मरीजों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका है। आयोजकों को मुंबई में किसी दूसरे स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन करने की सलाह दी गई है। अभिजीत दीपके ने जताई नाराजगी CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने पुलिस के फैसले की आलोचना करते हुए इसे नागरिकों की आवाज दबाने की कोशिश बताया। दीपके ने सोशल मीडिया पर कहा कि यदि संगठन को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं दिया जाता है तो CJP गांधी जयंती के दिन मुंबई में ‘जेल भरो आंदोलन’ करेगी। यह CJP का राजनीतिक आरोप और घोषित विरोध कार्यक्रम है। ‘2 अक्टूबर को आंदोलन होकर रहेगा’ अनुमति नहीं मिलने के बाद भी CJP ने प्रदर्शन का कार्यक्रम वापस लेने की घोषणा नहीं की है। दीपके ने कहा कि जरूरत पड़ी तो कार्यकर्ता गिरफ्तारी देंगे। 28 सितंबर को उन्होंने दोबारा पोस्ट कर “Jail Bharo Andolan in Mumbai, October 2, Shivaji Park” का ऐलान किया। क्या हैं CJP की प्रमुख मांगें? CJP मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रही है। इसके अलावा संगठन ने Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया रोकने और मतदाता सूची से जुड़ी पूर्व स्थिति बहाल करने की मांग भी रखी है। CJP ने 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून में बदलाव और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में संस्थागत सुधार की भी मांग की है। ये संगठन की राजनीतिक मांगें हैं। चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट के बाद बढ़ा विवाद इस पूरे आंदोलन की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रियाओं से जुड़ी एक जांच रिपोर्ट भी है। रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में विभिन्न प्रक्रियात्मक मुद्दों पर कई बार लिखित टिप्पणियां या आपत्तियां दर्ज की थीं। चुनाव आयोग का कहना है कि अलग-अलग विचार किसी बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और प्रमुख SIR फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। अब 2 अक्टूबर पर नजर मुंबई पुलिस ने आयोजकों को वैकल्पिक स्थान तलाशने की सलाह दी है, जबकि CJP ने शिवाजी पार्क से ही जेल भरो आंदोलन शुरू करने की घोषणा कर दी है। ऐसे में अब नजर इस बात पर रहेगी कि 2 अक्टूबर को CJP अपने घोषित कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ती है या प्रशासन और आयोजकों के बीच किसी वैकल्पिक स्थल पर सहमति बनती है। फिलहाल शिवाजी पार्क में प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए पुलिस की अनुमति उपलब्ध नहीं है। source – The Indian Express / Hindustan Times / Times of India / Mumbai Police जय राष्ट्र न्यूज़

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आशुतोष रांका की हिरासत पर NCP-SP ने उठाए सवाल, अनीश गवांडे ने कार्रवाई को बताया ‘असंवैधानिक’

गुवाहाटी: असम में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक आशुतोष रांका और उनके साथ कई कार्यकर्ताओं को पुलिस हिरासत में लिए जाने पर अब NCP (शरदचंद्र पवार) ने भी सवाल उठाए हैं। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनीश गवांडे ने पुलिस कार्रवाई को “अवैध और असंवैधानिक” बताते हुए रांका और अन्य कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की मांग की थी। रांका और उनके साथ हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं को बाद में रविवार रात रिहा कर दिया गया। गुवाहाटी में बैठक से पहले हिरासत 27 सितंबर को CJP ने गुवाहाटी में अपनी पहली क्षेत्रीय स्वयंसेवक बैठक आयोजित करने की योजना बनाई थी। पार्टी के मुताबिक बैठक शांतिपूर्ण तरीके से एक निजी परिसर में होनी थी, लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से पहले आशुतोष रांका और कई कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। रिपोर्ट्स में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या अलग-अलग बताई गई है। कुछ रिपोर्ट्स में 30 से अधिक, जबकि अन्य में 40 से अधिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने की बात कही गई। NCP-SP प्रवक्ता अनीश गवांडे ने उठाए सवाल NCP-SP के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनीश गवांडे ने गुवाहाटी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिरासत का विरोध किया। उन्होंने आरोप लगाया कि रांका और अन्य CJP कार्यकर्ताओं को एक निजी आवास से बिना कानूनी नोटिस या स्पष्ट कारण बताए हिरासत में लिया गया। गवांडे ने इसे “illegal and unconstitutional” कार्रवाई बताते हुए सभी को तत्काल रिहा करने की मांग की। यह NCP-SP नेता का आरोप था; हिरासत को किसी अदालत ने अवैध घोषित नहीं किया है। ‘जंगल राज’ वाला आरोप भी लगाया गवांडे ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली असम सरकार की आलोचना करते हुए पुलिस कार्रवाई को लेकर कड़ी टिप्पणी की और इसे कथित तौर पर “जंगल राज” से जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि सरकार असहमति की आवाजों से डर रही है। ये NCP-SP प्रवक्ता के राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। CJP ने भी हिरासत को बताया गलत CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि रांका और उनकी टीम को हिरासत में लेते समय कोई स्पष्ट कानूनी कारण नहीं बताया गया। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि कार्यकर्ताओं को रिहा नहीं किया गया तो वह खुद अन्य CJP सदस्यों के साथ असम पहुंचेंगे। रांका ने भी पुलिस वाहन से जारी वीडियो में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर उन्हें असम के स्कूलों, काजीरंगा और अन्य स्थानीय मुद्दों को उठाने से रोकने का आरोप लगाया। बैठक की जगह भी बदलनी पड़ी CJP की बैठक पहले अथगांव के Assam Shree Parshuram Seva Sadan में होने वाली थी। बाद में आयोजकों ने आरोप लगाया कि दबाव के कारण आयोजन स्थल बदलकर असम सचिवालय के सामने Chowdhury Tilla करना पड़ा। वहीं दोपहर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अनीश गवांडे के साथ CJP नेता सैफुर रहमान और नागरिक संगठन Asom Nagarik Sanmilan के परेश मालाकार भी मौजूद रहे। पुलिस ने नहीं दिया विस्तृत सार्वजनिक कारण 27 सितंबर को घटना के समय उपलब्ध प्रमुख रिपोर्ट्स में गुवाहाटी पुलिस की ओर से हिरासत का विस्तृत सार्वजनिक आधार सामने नहीं आया था। The Week ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि पुलिस ने उस समय हिरासत की वजह पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं दिया था। 12 घंटे से ज्यादा बाद हुई रिहाई आशुतोष रांका और अन्य CJP कार्यकर्ताओं को 12 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखने के बाद रविवार रात रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद रांका ने पुलिस कार्रवाई को “illegal detention” बताते हुए कहा कि उन्हें उसी जगह वापस छोड़ा जाए जहां से हिरासत में लिया गया था। “अवैध हिरासत” उनका दावा है और इस पर किसी अदालत का निर्णय सामने नहीं आया है। हिरासत के दौरान भूख हड़ताल का दावा CJP ने दावा किया कि काहिलीपाड़ा स्थित पुलिस परिसर में रखे जाने के दौरान रांका और अन्य कार्यकर्ताओं ने हिरासत के विरोध में भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। पार्टी ने इस कार्रवाई को अपने राजनीतिक और सामाजिक अभियान को रोकने की कोशिश बताया। असम की राजनीति में बढ़ी हलचल रांका की हिरासत का विरोध केवल CJP तक सीमित नहीं रहा। NCP-SP के साथ कांग्रेस नेताओं ने भी इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। फिलहाल रांका और अन्य कार्यकर्ता रिहा हो चुके हैं, लेकिन यह घटनाक्रम असम में राजनीतिक बैठकों, विरोध के अधिकार और पुलिस की कार्रवाई की सीमाओं को लेकर नई बहस का विषय बन गया है। source – Hindustan / Northeast Now / The Week / Times of India / PTI जय राष्ट्र न्यूज़

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असम में CJP नेता आशुतोष रांका हिरासत में, कई कार्यकर्ता भी पकड़े गए; देर रात रिहाई

गुवाहाटी: असम पुलिस ने 27 सितंबर 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक आशुतोष रांका समेत करीब 35 नेताओं और कार्यकर्ताओं को गुवाहाटी में हिरासत में लिया। ये लोग पार्टी की पहली क्षेत्रीय स्वयंसेवक बैठक में शामिल होने वाले थे। हिरासत के बाद CJP नेताओं ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए और इसे शांतिपूर्ण बैठक रोकने की कोशिश बताया। सभी हिरासत में लिए गए लोगों को रविवार रात करीब 10 बजे रिहा कर दिया गया। क्षेत्रीय बैठक से पहले हुई कार्रवाई CJP ने रविवार को गुवाहाटी में अपनी पहली Regional Volunteers’ Meeting आयोजित करने की योजना बनाई थी। बैठक पहले अथगांव के खड़गा चौधरी रोड स्थित एक निजी स्थल पर निर्धारित थी, लेकिन आयोजकों के मुताबिक बाद में कार्यक्रम की जगह बदलकर असम सचिवालय के सामने चौधरी टीला कर दी गई। बैठक शुरू होने से पहले ही पुलिस ने कई CJP नेताओं और स्वयंसेवकों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया। आशुतोष रांका समेत करीब 35 लोग हिरासत में हिरासत में लिए गए लोगों में आशुतोष रांका के अलावा अंकित भारद्वाज, प्रेम आकाश और CJP के असम समन्वयक साहिल समेत कई कार्यकर्ता शामिल थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 35 लोगों को गुवाहाटी के काहिलीपाड़ा स्थित 10वीं असम पुलिस बटालियन परिसर में ले जाया गया। रांका ने हिमंत बिस्वा सरमा पर लगाया आरोप हिरासत के दौरान आशुतोष रांका ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर निशाना साधा। रांका ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार नहीं चाहती कि CJP असम के सरकारी स्कूलों, बाढ़, जमीन और काजीरंगा से जुड़े मुद्दों को उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी बैठक निजी स्थान पर शांतिपूर्ण तरीके से होने वाली थी। ये रांका और CJP के राजनीतिक आरोप हैं; इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। CJP ने पुलिस कार्रवाई को बताया गलत CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि रांका और अन्य नेताओं को शुरुआत में अज्ञात स्थान पर ले जाया जा रहा था और वकीलों को भी उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा था। दीपके ने चेतावनी दी थी कि यदि नेताओं को रिहा नहीं किया गया तो वह खुद असम पहुंचेंगे। यह पार्टी का आरोप था। हिरासत के दौरान शुरू की भूख हड़ताल CJP के मुताबिक काहिलीपाड़ा पुलिस परिसर में रखे जाने के बाद हिरासत में लिए गए नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। पार्टी ने इसे हिरासत के विरोध में उठाया गया कदम बताया। बाहर मौजूद समर्थकों ने भी रिहाई की मांग की। असम में किन मुद्दों को उठाने की थी तैयारी? CJP नेताओं के मुताबिक संगठन असम में सरकारी स्कूलों की स्थिति, बाढ़, जमीन से जुड़े मुद्दों और मतदाता सूची संशोधन पर चर्चा करना चाहता था। रिपोर्ट्स के अनुसार CJP नेताओं ने हाल में राज्य के कुछ विपक्षी नेताओं से भी मुलाकात की थी और असम में संगठन के विस्तार पर बातचीत की थी। पुलिस की विस्तृत आधिकारिक सफाई नहीं आई उपलब्ध प्रमुख रिपोर्ट्स में असम पुलिस की ओर से हिरासत के लिए कोई विस्तृत सार्वजनिक कानूनी कारण नहीं बताया गया है। CJP का दावा था कि बैठक निजी जगह पर शांतिपूर्ण तरीके से होनी थी, जबकि पुलिस ने कार्यक्रम स्थल तक पहुंच सीमित कर दी। इस कार्रवाई की कानूनी परिस्थितियों पर पुलिस की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने का इंतजार है। रविवार रात सभी को किया गया रिहा करीब दिनभर हिरासत में रहने के बाद रविवार रात आशुतोष रांका और अन्य CJP नेताओं को छोड़ दिया गया। रांका ने सोशल मीडिया पर रिहाई की जानकारी देते हुए अपनी हिरासत को “illegal detention” कहा और बताया कि उन्होंने पुलिस से उन्हें उसी स्थान पर वापस छोड़ने के लिए कहा, जहां से उन्हें हिरासत में लिया गया था। “Illegal” शब्द रांका का दावा है; किसी अदालत ने इस हिरासत को अवैध घोषित नहीं किया है। असम में बढ़ी राजनीतिक हलचल आशुतोष रांका और CJP कार्यकर्ताओं की हिरासत के बाद असम में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। CJP इसे अपने संगठन और मुद्दों को उठाने से रोकने की कार्रवाई बता रही है। दूसरी ओर इस घटना पर राज्य सरकार या असम पुलिस की विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही हिरासत के आधिकारिक आधार को पूरी तरह स्पष्ट किया जा सकेगा। source – The Indian Express / Times of India / Hindustan Times / India Today जय राष्ट्र न्यूज़

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बिहार में बाढ़ के बीच नीदरलैंड्स में मैथिली ठाकुर का कार्यक्रम, उठे सवाल

पटना: बिहार के कई जिलों में बाढ़ और भारी बारिश का खतरा बने रहने के बीच अलीनगर से BJP विधायक और लोकगायिका मैथिली ठाकुर के नीदरलैंड्स दौरे को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं। मैथिली ठाकुर नीदरलैंड्स में आयोजित Eindeloos India Festival में सांस्कृतिक प्रस्तुति देने पहुंची हैं। आलोचक एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी प्राथमिकताओं पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि मैथिली पहले ही कह चुकी हैं कि उनके विधानसभा क्षेत्र अलीनगर में बाढ़ जैसी स्थिति नहीं है और वह अपने क्षेत्र के लोगों के संपर्क में हैं। नीदरलैंड्स में सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल हुईं मैथिली मैथिली ठाकुर इन दिनों नीदरलैंड्स के दौरे पर हैं, जहां वह Eindeloos India Festival में बिहार की लोकसंस्कृति और संगीत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। नीदरलैंड्स स्थित इंडिया हाउस में भारत के राजदूत कुमार तुहिन ने मैथिली ठाकुर और बिहार से पहुंचे प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। इस दौरान मैथिली ने पारंपरिक ‘चैती’ लोकगीत भी प्रस्तुत किया। बिहार में बाढ़ और भारी बारिश का खतरा जारी दूसरी ओर बिहार सितंबर में गंभीर बाढ़ की स्थिति से गुजर चुका है। 11 सितंबर तक राज्य के 15 जिलों में करीब 46.88 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए गए थे। गंगा और उसकी सहायक नदियां कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीं। 26 सितंबर को नेपाल के तराई क्षेत्र में भारी बारिश की आशंका को देखते हुए बिहार प्रशासन ने फिर 17 संवेदनशील जिलों के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की और NDRF-SDRF को अलर्ट मोड पर रखा। सोशल मीडिया पर क्यों उठ रहे सवाल? मैथिली ठाकुर के नीदरलैंड्स दौरे की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि राज्य में बाढ़ और बारिश से जुड़ी चुनौतियों के बीच एक विधायक का विदेश में सांस्कृतिक कार्यक्रम करना कितना उचित है। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में इसे जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारियों से जोड़कर आलोचना की गई, जबकि दूसरे यूजर्स ने कहा कि मैथिली कलाकार भी हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेना उनकी पेशेवर भूमिका का हिस्सा है। ये सोशल मीडिया प्रतिक्रियाएं हैं और इन्हें व्यापक जनमत का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। पहले भी बाढ़ को लेकर ट्रोल हुई थीं मैथिली नीदरलैंड्स दौरे से पहले भी मैथिली ठाकुर को बिहार में बाढ़ के दौरान मुंबई में Rolls-Royce में नजर आने को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसके जवाब में मैथिली ठाकुर ने कहा था कि “भगवान की कृपा से मेरे क्षेत्र में बाढ़ जैसी कोई स्थिति नहीं है।” उन्होंने बताया था कि 17 सितंबर को वह अपने क्षेत्र में गई थीं और लोगों से मुलाकात कर स्थानीय स्थिति की जानकारी ली थी। अलीनगर की विधायक हैं मैथिली ठाकुर मैथिली ठाकुर दरभंगा जिले की अलीनगर विधानसभा सीट से विधायक हैं। दरभंगा जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर उन्हें अलीनगर की मौजूदा विधायक के रूप में दर्ज किया गया है। इसी वजह से उनकी गायिका और विधायक—दोनों भूमिकाओं को लेकर अक्सर सार्वजनिक चर्चा होती रही है। उन्होंने इससे पहले भी कहा है कि उनके लिए अपने क्षेत्र के लोगों से मिलना और उनकी समस्याएं समझना उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। मैथिली ने विदेश में बिहार की संस्कृति को किया प्रस्तुत नीदरलैंड्स के कार्यक्रम में मैथिली ठाकुर ने बिहार की पारंपरिक लोकसंगीत शैली को पेश किया। उन्होंने चैती गीत के जरिए बिहार के ग्रामीण जीवन, पारिवारिक रिश्तों और लोक परंपराओं के बारे में भी दर्शकों को बताया। आयोजित कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने उनकी प्रस्तुति की सराहना की। विवाद का केंद्र- कलाकार और जनप्रतिनिधि की दोहरी भूमिका मैथिली ठाकुर को लेकर चल रही बहस का मुख्य मुद्दा उनकी दोहरी भूमिका है। वह एक स्थापित लोकगायिका होने के साथ-साथ निर्वाचित विधायक भी हैं। आलोचक चाहते हैं कि प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में जनप्रतिनिधि की सार्वजनिक मौजूदगी अधिक दिखे, जबकि मैथिली का पक्ष है कि उनके विधानसभा क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति नहीं है और वह क्षेत्र के लोगों से संपर्क में हैं। उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि नीदरलैंड्स दौरे के कारण उनके क्षेत्र में राहत या प्रशासनिक कार्य प्रभावित हुए। फिलहाल मैथिली ठाकुर का नीदरलैंड्स दौरा सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ-साथ राजनीतिक जिम्मेदारियों और कलाकार के पेशेवर जीवन के बीच संतुलन को लेकर नई बहस का विषय बना हुआ है। source – Dainik Jagran / Navbharat Times / India Today / Darbhanga District Administration जय राष्ट्र न्यूज़

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‘सुगम परिवहन’ पर विवाद, पुरानी बसों को लेकर उठे सवाल! नई रंगत में पुरानी बसें चलाने का आरोप

भोपाल: मध्य प्रदेश में करीब 21 साल बाद शुरू हुई मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा लॉन्च होने के एक दिन बाद ही विवादों में आ गई है। 25 सितंबर को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोपाल से 351 बसों को हरी झंडी दिखाई थी। इनमें 180 इलेक्ट्रिक बसें हैं, जबकि 171 ऐसी बसें हैं जो पहले से अलग-अलग शहरों में सिटी बस सेवा के तहत चल रही थीं। इन्हीं पुरानी बसों को नए रंग-रूप में शामिल किए जाने को लेकर कांग्रेस ने सरकार पर सवाल उठाए हैं। वीडियो वायरल होने के बाद शुरू हुआ विवाद सेवा शुरू होने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ बसों के वीडियो सामने आए। इनमें बसों पर लगाई गई नई रंगीन रेडियम स्ट्रिप उखड़ती दिखाई दे रही है, जबकि कुछ वीडियो में बसों के अंदरूनी हिस्सों की स्थिति पर भी सवाल उठाए गए। इसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या पहले से चल रही पुरानी सिटी बसों को केवल रंग-रोगन कर नई योजना के तहत पेश किया गया है। 351 में से 171 बसें पहले से थीं संचालन में रिपोर्ट्स के अनुसार लॉन्च की गई 351 बसों में 180 वातानुकूलित इलेक्ट्रिक बसें पीएम ई-बस सेवा से जुड़ी हैं, जबकि बाकी 171 बसें पहले से शहरी क्षेत्रों में संचालित सिटी बसें हैं। नई व्यवस्था में इन बसों को एमपी यात्री परिवहन कंपनी के तहत लाकर एक समान branding और रंग देने का काम किया गया है। कांग्रेस ने बसों की हालत पर उठाए सवाल मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया पर बस की बाहरी परत उखड़ने का वीडियो शेयर करते हुए सरकार पर निशाना साधा। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि पुरानी बसों को नया रंग देकर योजना के तहत उतारा गया है और उनकी वास्तविक स्थिति, फिटनेस तथा यात्रियों की सुरक्षा की जांच होनी चाहिए। ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं; उपलब्ध रिपोर्ट्स में ऐसा कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है कि सभी पुरानी बसें असुरक्षित या अनफिट हैं। बसों की उम्र और मेंटेनेंस भी चर्चा में कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि योजना में शामिल पुरानी डीजल बसों में कई लगभग 7 से 8 वर्ष पुरानी हैं और पहले भी उनके खराब होने या रखरखाव से जुड़ी शिकायतें सामने आती रही हैं। कुछ बसों की सीट, हैंडल, ड्राइवर एरिया, CCTV और पैनिक बटन जैसी सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि प्रत्येक बस की तकनीकी फिटनेस से जुड़ा विस्तृत सरकारी ऑडिट सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। सरकार का उद्देश्य क्या है? राज्य सरकार का कहना है कि मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का उद्देश्य गांवों और शहरों के बीच सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना है। पहले चरण में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, रीवा, देवास, कटनी और भिंड को इंटरसिटी और इंट्रासिटी बस सेवाओं से जोड़ा गया है। सरकार का लक्ष्य पहले साल करीब 1,500 और 2031 तक 15 हजार बसों का नेटवर्क तैयार करना है। बसों में GPS और पैनिक बटन की भी योजना सरकार के अनुसार नई व्यवस्था में बसों की निगरानी के लिए GPS, लाइव लोकेशन ट्रैकिंग, CCTV और पैनिक बटन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। एक Command and Control Centre के जरिए बसों की लोकेशन और समय पर भी निगरानी रखने की योजना है। पुरानी बसों को नया रंग क्यों दिया गया? रिपोर्ट्स के मुताबिक पुरानी सिटी बसें पहले अलग-अलग रंग और स्थानीय व्यवस्थाओं के तहत संचालित होती थीं। नई सेवा में उन्हें एक समान पहचान देने के लिए नया रंग और branding दी गई। भोपाल स्मार्ट सिटी से जुड़ी अधिकारी अंजू अरुण कुमार के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया कि बसों को एकरूपता देने के लिए संबंधित कंपनी ने रंग और branding का काम किया है। अब फिटनेस और सुरक्षा पर जवाब का इंतजार विवाद का मुख्य सवाल यह नहीं है कि कुछ बसें पहले से चल रही थीं, बल्कि यह है कि नई व्यवस्था में शामिल करने से पहले उनकी fitness, maintenance और safety standards की जांच किस स्तर पर की गई। फिलहाल वायरल वीडियो और कांग्रेस के आरोपों के बाद यह मुद्दा चर्चा में है। सरकार की ओर से पुरानी बसों की तकनीकी स्थिति पर विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने आने के बाद ही तस्वीर और साफ होगी। source – Akashvani News / Dainik Jagran / Free Press Journal / Hindusthan Samachar जय राष्ट्र न्यूज़

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प्रशांत किशोर का चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप, बोले- ‘पक्षपात से BJP को मिला अनुचित फायदा’

मुजफ्फरपुर: जन सुराज पार्टी के संस्थापक और बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग के कथित “पक्षपातपूर्ण रवैये” से भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में अनुचित लाभ मिला है। किशोर ने चुनावी खर्च, प्रशासनिक मशीनरी के इस्तेमाल और मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों को लेकर भी सवाल उठाए। ये प्रशांत किशोर के राजनीतिक आरोप हैं; चुनाव आयोग ने SIR से जुड़े फैसलों को संस्थागत प्रक्रिया और सर्वसम्मति से लिया गया बताया है। SIR विवाद के बीच आया प्रशांत किशोर का बयान प्रशांत किशोर ने 25 सितंबर 2026 को मुजफ्फरपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान चुनाव आयोग पर ये आरोप लगाए। उनसे हाल में सामने आई उस रिपोर्ट को लेकर सवाल किया गया था, जिसमें Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग टिप्पणियों और आपत्तियों का दावा किया गया था। ‘2021 में ही उठाया था आयोग की निष्पक्षता का सवाल’ प्रशांत किशोर ने कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका पर पहली बार सवाल अब नहीं उठाया है। उन्होंने 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए दावा किया कि उस समय भी BJP को चुनाव आयोग के कथित पक्षपात का फायदा मिला था। किशोर उस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार के रूप में काम कर रहे थे। उन्होंने दावा किया कि यदि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष होते तो पश्चिम बंगाल में BJP का प्रदर्शन अलग हो सकता था। यह किशोर का राजनीतिक आकलन है और इसे किसी आधिकारिक जांच ने स्थापित नहीं किया है। बांकीपुर उपचुनाव का भी दिया उदाहरण किशोर ने हाल के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का उदाहरण भी दिया, जहां उन्होंने जीत दर्ज की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान प्रशासनिक मशीनरी के कथित दुरुपयोग और BJP द्वारा बड़े पैमाने पर चुनावी खर्च की अनदेखी की गई। किशोर ने दावा किया कि ऐसी परिस्थितियां न होतीं तो उनकी जीत का अंतर और बड़ा होता। इससे पहले उन्होंने पटना के SSP की कथित “पक्षपातपूर्ण भूमिका” को लेकर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के सामने शिकायत भी दर्ज कराई थी। पैसे, नौकरशाही और वोटर लिस्ट पर उठाए सवाल प्रशांत किशोर ने कहा कि उनके अनुसार चुनाव प्रक्रिया केवल एक स्तर पर नहीं, बल्कि कई मोर्चों पर प्रभावित हो रही है। उन्होंने चुनाव में धन के इस्तेमाल, सरकारी अधिकारियों की भूमिका और मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि करीबी मुकाबलों में आयोग का कथित पक्षपात परिणाम पर असर डाल सकता है। इन आरोपों को चुनाव आयोग या किसी अदालत ने प्रमाणित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया है। ज्ञानेश कुमार को लेकर भी दिया बयान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद पर प्रशांत किशोर ने कहा कि चुनाव आयोग में कथित समस्याएं केवल मौजूदा CEC के कार्यकाल से शुरू नहीं हुई हैं। उन्होंने पूर्व चुनाव अधिकारियों की नियुक्तियों और पद छोड़ने के बाद मिली जिम्मेदारियों पर भी सवाल उठाए। हालांकि किसी व्यक्ति के खिलाफ quid pro quo का उनका आरोप प्रमाणित तथ्य नहीं है। चुनाव आयोग में कथित मतभेद की रिपोर्ट क्या है? The Indian Express की जांच में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में SIR समेत विभिन्न प्रक्रियाओं को लेकर कई लिखित टिप्पणियां या आपत्तियां दर्ज की थीं। इस रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों और कुछ NDA सहयोगियों ने भी चुनाव आयोग से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी? चुनाव आयोग ने कहा कि किसी बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग विचार, सुझाव और लिखित टिप्पणियां निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार SIR से संबंधित अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे। आयोग ने कहा कि सदस्यों द्वारा दिए गए सुझाव चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने के उद्देश्य से थे। SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी पूछ चुका है सवाल दिल्ली में SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं को “logical discrepancy” से जुड़े नोटिस जारी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने कुछ नोटिसों के लगभग “mechanical” तरीके से जारी होने पर चिंता जताते हुए आयोग से उनकी प्रक्रिया और आधार समझाने को कहा। चुनाव आयोग पर राजनीतिक बहस तेज प्रशांत किशोर का बयान ऐसे समय आया है जब SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज है। एक ओर प्रशांत किशोर और विपक्ष के कई नेता आयोग पर निष्पक्षता से जुड़े सवाल उठा रहे हैं, वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि उसकी प्रक्रियाएं कानून और संस्थागत नियमों के तहत संचालित हो रही हैं। फिलहाल किशोर के आरोप राजनीतिक दावे हैं और उनकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। source – PTI / The Indian Express / Times of India / The Federal जय राष्ट्र न्यूज़

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SIR के खिलाफ प्रकाश राज ने जताया विरोध, बोले- ‘हर योग्य मतदाता का नाम सूची में रहना चाहिए’

बेंगलुरु: अभिनेता प्रकाश राज ने कर्नाटक में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) का विरोध करते हुए प्रक्रिया को वापस लेने की मांग की है। 1 सितंबर 2026 को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में आयोजित ‘Election Commission Chalo’ मार्च में प्रकाश राज समेत कई नागरिक संगठनों के सदस्य शामिल हुए। मार्च के दौरान बेंगलुरु पुलिस ने प्रकाश राज और कुछ अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया। ‘SIR वापस लिया जाए’- प्रकाश राज प्रदर्शन के दौरान प्रकाश राज ने कहा कि SIR प्रक्रिया को समाप्त किया जाना चाहिए और इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़ी जाएगी। उन्होंने कहा कि नागरिक संगठनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी योग्य मतदाता का मतदान का अधिकार प्रभावित न हो। अभिनेता किशोर भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए और उन्होंने मतदाता सूची की प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की। ‘Election Commission Chalo’ अभियान का किया था ऐलान प्रकाश राज ने 25 अगस्त को ही घोषणा कर दी थी कि नागरिक संगठनों के साथ 1 सितंबर को बेंगलुरु में Election Commission Chalo अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया था कि जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव में अभी समय है तो इतनी बड़ी मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया को कम समय में पूरा करने की जरूरत क्यों है। उन्होंने दावा किया कि इससे आम मतदाताओं को दस्तावेज और सत्यापन के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है। प्रकाश राज का नाम भी ‘Shifted’ कैटेगरी में आया था इस विवाद से पहले प्रकाश राज ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि SIR के दौरान उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है। हालांकि कर्नाटक चुनाव अधिकारियों ने इस दावे का खंडन किया। अधिकारियों के अनुसार उनका नाम ‘permanently shifted’ कैटेगरी में इसलिए रखा गया क्योंकि Booth Level Officer की जांच में वह पिछले चार वर्षों से अपने पुराने पंजीकृत पते पर नहीं रह रहे थे। चुनाव अधिकारी ने कहा कि प्रकाश राज का नाम पहले शांतिनगर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में सक्रिय था और वह अपने वर्तमान पते पर Form 6 के जरिए पंजीकरण करा सकते हैं। एक करोड़ से ज्यादा नाम ASDDO कैटेगरी में कर्नाटक में SIR के दौरान चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार करीब 1.08 करोड़ मतदाता ASDDO यानी Absent, Shifted, Dead, Duplicate and Others श्रेणी में चिन्हित किए गए थे। SIR के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 4.46 करोड़ मतदाता शामिल रहे। आयोग के अनुसार जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगतियां हैं, उन्हें नोटिस और दावा-आपत्ति प्रक्रिया के जरिए अपनी पात्रता साबित करने का अवसर दिया जा रहा है। चुनाव आयोग ने प्रक्रिया का किया बचाव मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने SIR का बचाव करते हुए कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसी प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग के साथ मतदाताओं का सहयोग भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि देश में चुनाव संविधान, कानून और चुनाव आयोग के निर्देशों के तहत आयोजित किए जाते हैं और राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों के प्रतिनिधि विभिन्न चरणों में प्रक्रिया की निगरानी करते हैं। BJP और JD(S) भी उठा चुके हैं सवाल कर्नाटक में SIR को लेकर केवल प्रकाश राज या कांग्रेस से जुड़े नेताओं ने ही सवाल नहीं उठाए हैं। BJP और JD(S) ने भी जुलाई में चुनाव आयोग के सामने प्रक्रिया से संबंधित कथित अनियमितताओं की शिकायत की थी। दोनों दलों ने कुछ क्षेत्रों में घर-घर सत्यापन की प्रक्रिया के पालन को लेकर सवाल उठाए थे। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब में कहा था कि SIR चुनाव आयोग के निर्देशों और कानून के अनुसार किया जा रहा है। SIR को लेकर जारी है राजनीतिक और कानूनी बहस कर्नाटक में SIR को लेकर मतदाता सूची से संभावित नाम हटने, दस्तावेज सत्यापन और प्रक्रिया की समयसीमा जैसे विषयों पर लगातार बहस चल रही है। प्रकाश राज और प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि किसी भी योग्य नागरिक को मताधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को सटीक बनाने के लिए तय कानूनी प्रक्रिया के तहत सत्यापन किया जा रहा है। source – The Indian Express / Hindustan Times / Times of India जय राष्ट्र न्यूज़

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जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जोरदार हंगामा, BJP विधायक विक्रम रंधावा को बाहर निकाला गया

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर विधानसभा के शरद सत्र में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने से जुड़ा प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद जोरदार हंगामा हुआ। प्रस्ताव में वर्ष 2000 और नवंबर 2024 में विधानसभा से पारित पुराने प्रस्तावों का संदर्भ दिए जाने पर BJP विधायकों ने विरोध किया। हंगामे के दौरान BJP विधायक विक्रम रंधावा को मार्शलों की मदद से सदन से बाहर निकाल दिया गया। उमर अब्दुल्ला ने पेश किया राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव 25 सितंबर को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में प्रस्ताव पेश करते हुए केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग की। प्रस्ताव में कहा गया कि यह मांग 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को विधानसभा से पारित प्रस्तावों के अतिरिक्त है और इसे केंद्र सरकार को भेजा जाए। उमर अब्दुल्ला ने सभी दलों से इसका समर्थन करने की अपील करते हुए कहा कि राज्य का दर्जा पूरे जम्मू-कश्मीर से जुड़ा मुद्दा है। 2000 के प्रस्ताव के जिक्र पर भड़की BJP BJP विधायकों की मुख्य आपत्ति प्रस्ताव में 26 जून 2000 के autonomy resolution का संदर्भ दिए जाने पर थी। उस समय फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार ने जम्मू-कश्मीर को 1953 से पहले जैसी अधिक स्वायत्त संवैधानिक स्थिति देने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया था। बाद में तत्कालीन केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था। सदन के वेल में पहुंचे BJP विधायक जैसे ही प्रस्ताव पेश किया गया, BJP विधायकों ने नारेबाजी शुरू कर दी और कई सदस्य सदन के वेल में पहुंच गए। कुछ विधायकों ने प्रस्ताव की प्रतियां भी फाड़ दीं। विरोध के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच तीखी बहस हुई। स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने विधायकों से अपनी सीटों पर लौटने को कहा, लेकिन हंगामा जारी रहने के बाद सदन की कार्यवाही करीब 30 मिनट के लिए स्थगित करनी पड़ी। विक्रम रंधावा को मार्शलों ने बाहर निकाला हंगामे के बीच BJP विधायक विक्रम रंधावा को सदन से बाहर निकालने का निर्देश दिया गया। इसके बाद विधानसभा के मार्शलों ने उन्हें सदन से बाहर कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक रंधावा और अन्य BJP विधायक प्रस्ताव के खिलाफ लगातार विरोध और नारेबाजी कर रहे थे। BJP ने लगाया ‘autonomy agenda’ वापस लाने का आरोप जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने आरोप लगाया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव की आड़ में वर्ष 2000 के autonomy resolution को दोबारा राजनीतिक बहस में लाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि BJP राज्य के दर्जे की बहाली के मुद्दे पर अपनी स्थिति रख सकती है, लेकिन पुराने autonomy resolution का संदर्भ स्वीकार नहीं करेगी। यह BJP का राजनीतिक पक्ष है। उमर अब्दुल्ला ने कहा- राज्य का दर्जा सभी का मुद्दा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा किसी एक पार्टी का मुद्दा नहीं है। उन्होंने केंद्र की ओर से पहले बताई गई delimitation, elections और statehood की प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि परिसीमन और चुनाव हो चुके हैं और अब राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि विधानसभा के जरिए केंद्र सरकार को उसके पूर्व आश्वासनों की याद दिलाई जा रही है। PDP और सज्जाद लोन ने भी रखा अपना पक्ष PDP विधायक वहीद पारा ने राज्य के दर्जे वाले प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन कहा कि इसमें Article 370 और Article 35A का भी स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए था। पीपुल्स कॉन्फ्रेंस प्रमुख सज्जाद लोन ने भी राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग का समर्थन किया और BJP के विरोध की आलोचना की। ये संबंधित दलों और नेताओं के राजनीतिक रुख हैं। नवंबर 2024 के प्रस्ताव का भी जिक्र मौजूदा प्रस्ताव में 6 नवंबर 2024 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पारित प्रस्ताव का भी संदर्भ है। उस प्रस्ताव में विशेष दर्जे और संवैधानिक गारंटी की बहाली पर केंद्र और जम्मू-कश्मीर के निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की मांग की गई थी। 25 सितंबर की घटना के बाद राज्य के दर्जे और पुराने autonomy resolution को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस और BJP के बीच राजनीतिक टकराव और तेज हो गया है। फिलहाल प्रस्ताव को लेकर दोनों पक्षों की स्थिति अलग-अलग बनी हुई है। source – The Indian Express / The Tribune / Daily Excelsior / Times of India जय राष्ट्र न्यूज़

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