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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, कई प्रदर्शनकारी हिरासत में; CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और गिरफ्तारी की मांग को लेकर 25 सितंबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने AISA से जुड़े छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ राजनीतिक नेताओं समेत कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी। AISA और सिविल सोसाइटी समूहों ने किया प्रदर्शन प्रदर्शन का आयोजन All India Students’ Association (AISA) की दिल्ली इकाई और कुछ सिविल सोसाइटी समूहों ने किया था। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उन्हें पद से हटाने की मांग कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान “ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करो” जैसे नारे भी लगाए गए। कई प्रदर्शनकारी हिरासत में रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान कई लोगों को हिरासत में लिया। हिरासत में लिए गए या पुलिस द्वारा रोके गए प्रमुख लोगों में AISA अध्यक्ष नेहा बोरा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और CPI(ML) Liberation के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य शामिल थे। कुछ रिपोर्ट्स में करीब 40 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की बात कही गई है। मनोज झा और प्रशांत भूषण भी प्रदर्शन में शामिल आयोजकों के मुताबिक प्रदर्शन में RJD सांसद मनोज झा, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और कई अन्य लोग भी शामिल हुए। इसके अलावा SFI और Indian Youth Congress से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया के खिलाफ अलग-अलग विरोध कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। पुलिस ने क्यों रोका प्रदर्शन? दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए कोई आवेदन या अनुमति नहीं ली गई थी। पुलिस का कहना है कि इसी वजह से प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया गया और कई लोगों को हिरासत में लिया गया। जंतर-मंतर के आसपास बैरिकेडिंग भी की गई थी ताकि प्रदर्शनकारी आगे न बढ़ सकें। SIR विवाद बना प्रदर्शन की बड़ी वजह यह विरोध प्रदर्शन चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया और आयोग के भीतर मतभेदों से जुड़ी हालिया रिपोर्ट्स के बाद हुआ। The Indian Express की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और electoral roll data management से जुड़े कुछ मामलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। चुनाव आयोग ने बाद में कहा कि अलग-अलग राय किसी बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था की निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और SIR से जुड़े अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। युवा कांग्रेस ने भी किया विरोध इसी दिन भारतीय युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च करने निकले। पुलिस ने उन्हें जंतर-मंतर मार्ग पर रोक दिया और कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया। हिरासत को लेकर भी उठा विवाद कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई को लेकर आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि उन्हें जंतर-मंतर तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया। पुलिस की ओर से कहा गया कि कार्रवाई अनुमति न होने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के कारण की गई। हिरासत की परिस्थितियों को लेकर दोनों पक्षों के बयान अलग-अलग हैं। चुनाव आयोग पर जारी है राजनीतिक बहस CEC ज्ञानेश कुमार और SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को तय कानूनी और संस्थागत प्रक्रिया के अनुरूप बताया है। ऐसे में जंतर-मंतर का प्रदर्शन चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची संशोधन को लेकर जारी व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। source – Hindustan / ThePrint / The Tribune / Amar Ujala / ABP News जय राष्ट्र न्यूज़

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CEC ज्ञानेश कुमार को CJP का 48 घंटे का अल्टीमेटम, इस्तीफा नहीं तो देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी

नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग करते हुए उन्हें 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था। पार्टी ने चेतावनी दी कि मांग पूरी नहीं होने पर देशभर में आंदोलन शुरू किया जाएगा। यह अल्टीमेटम 24 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया था। 26 सितंबर को समयसीमा समाप्त होने के बाद CJP ने अब 2 अक्टूबर से मुंबई से देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की है। SIR विवाद को लेकर CJP ने खोला मोर्चा CJP ने यह कदम मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच उठाया है। पार्टी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दिपके, सह-संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। CJP का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया में मतदाता अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। ये CJP के आरोप हैं और इन्हें किसी स्वतंत्र जांच में स्थापित तथ्य नहीं माना गया है। 48 घंटे में इस्तीफा देने की रखी मांग 24 सितंबर को CJP ने कहा कि यदि ज्ञानेश कुमार 48 घंटे के भीतर पद नहीं छोड़ते हैं तो संगठन देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करेगा। अभिजीत दिपके ने दिल्ली में फिर से बड़े प्रदर्शन की चेतावनी देते हुए इसे ‘Jantar Mantar 2.0’ तक ले जाने की बात कही थी। आगामी चुनाव रोकने की भी मांग CJP ने केवल CEC के इस्तीफे की मांग नहीं की। संगठन ने आगामी राज्य विधानसभा चुनावों को फिलहाल रोकने, SIR प्रक्रिया को वापस लेने और मतदाता सूची को पहले की स्थिति में बहाल करने जैसी मांगें भी रखीं। India Today के मुताबिक संगठन ने SIR से जुड़े रिकॉर्ड को स्वतंत्र निगरानी में रखने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून में बदलाव की मांग भी की। चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट से बढ़ा विवाद यह अल्टीमेटम उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में विभिन्न मामलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। इन आपत्तियों में मतदाता सूची, Form 6, electoral database तक पहुंच और SIR प्रक्रिया से जुड़े विषय शामिल बताए गए। चुनाव आयोग ने क्या कहा? चुनाव आयोग ने इस विवाद पर कहा है कि एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय और लिखित टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। 26 सितंबर को जारी स्पष्टीकरण में आयोग ने कहा कि SIR से जुड़े अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने यह भी कहा कि कैबिनेट सचिव को भेजे गए कुछ पत्र किसी नीति विवाद से नहीं, बल्कि एक अधिकारी के कामकाज से जुड़े थे। SIR प्रक्रिया पर आयोग ने दी सफाई चुनाव आयोग के अनुसार 24 जून 2025 को पूरे देश में SIR कराने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था। बाद में अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए जारी चरणबद्ध कार्यक्रमों को भी आयोग ने सामूहिक रूप से मंजूरी दी। आयोग ने यह भी कहा कि SIR के दौरान नागरिकों को दस्तावेज जमा करने और मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं दी जा रही हैं। 48 घंटे की समयसीमा खत्म, अब 2 अक्टूबर से आंदोलन CJP का दिया 48 घंटे का अल्टीमेटम 26 सितंबर को खत्म हो गया। इसके बाद संगठन ने 2 अक्टूबर, गांधी जयंती से मुंबई में आंदोलन शुरू करने की घोषणा की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक मुंबई का आजाद मैदान संभावित स्थल है, हालांकि प्रदर्शन के लिए पुलिस अनुमति अभी अंतिम रूप से सुनिश्चित नहीं हुई है। CJP का कहना है कि मुंबई से शुरू होने वाला आंदोलन बाद में देश के अन्य शहरों तक ले जाया जाएगा। चुनाव आयोग विवाद पर राजनीतिक बहस तेज SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर CJP के अलावा कई विपक्षी दलों ने भी सवाल उठाए हैं। वहीं चुनाव आयोग ने प्रक्रिया में अनियमितता के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है और अपने फैसलों को कानून और तय प्रक्रिया के अनुरूप बताया है। फिलहाल CJP का आंदोलन 2 अक्टूबर से शुरू करने की घोषणा की गई है। आगे इस विवाद का असर चुनावी और राजनीतिक बहस में किस तरह दिखाई देता है, इस पर नजर रहेगी। source – India Today / Hindustan Times / The Economic Times / The Statesman जय राष्ट्र न्यूज़

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महाराष्ट्र UCC समिति में विवाद के बीच जस्टिस आरसी चव्हाण का इस्तीफा, पब्लिक फीडबैक प्रक्रिया पर उठाए सवाल

मुंबई: महाराष्ट्र में Uniform Civil Code (UCC) के लिए नियम और सिफारिशें तैयार करने वाली समिति से बॉम्बे हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस आरसी चव्हाण ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने जनता की राय लेने के लिए तैयार की जा रही प्रश्नावली, समिति में पर्याप्त चर्चा न होने और 19 सितंबर की बैठक में एक गैर-सदस्य की मौजूदगी पर सवाल उठाए। चव्हाण ने 19 सितंबर को इस्तीफा भेजा, जिसे महाराष्ट्र सरकार ने 21 सितंबर को स्वीकार कर लिया। ‘हां या ना’ वाले सवालों पर जताई आपत्ति जस्टिस चव्हाण की प्रमुख आपत्ति UCC को लेकर जनता से फीडबैक लेने के तरीके पर थी। समिति की योजना कई जटिल सामाजिक और वैवाहिक मुद्दों पर लोगों से मुख्य रूप से ‘हां’ या ‘ना’ में जवाब लेने की थी। चव्हाण का मानना था कि विवाह, पारिवारिक संबंध और विवाद समाधान जैसे विषयों पर विस्तृत राय लेने की जरूरत है और केवल दो विकल्पों में जवाब सीमित करने से लोगों के विचार पूरी तरह सामने नहीं आ पाएंगे। प्रश्नावली पहले ही फाइनल होने का किया दावा 19 सितंबर को समिति की दूसरी ऑनलाइन बैठक हुई थी। चव्हाण ने अपने इस्तीफे में कहा कि कुछ सदस्यों ने प्रश्नावली में बदलाव और विशेषज्ञों से उसकी समीक्षा कराने का सुझाव दिया था। लेकिन उनके मुताबिक समिति की अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई पहले ही एक प्रश्नावली तैयार कर सदस्यों को भेज चुकी थीं और वेबसाइट तैयार होने के बाद उसे अपलोड करने की बात कही गई थी। यह चव्हाण द्वारा अपने इस्तीफे में व्यक्त किया गया पक्ष है। ‘गैर-सदस्य’ की मौजूदगी पर भी सवाल चव्हाण ने बैठक में सेवानिवृत्त IAS अधिकारी शत्रुघ्न सिंह की मौजूदगी और उनकी भूमिका पर भी सवाल उठाया था। उस समय सिंह मूल सात सदस्यीय समिति में शामिल नहीं थे। चव्हाण के अनुसार सिंह ने UCC की वेबसाइट में बदलाव को लेकर सुझाव दिए और उसके बाद समिति अध्यक्ष ने अधिकारियों को आवश्यक बदलाव करने के निर्देश दिए। चव्हाण ने सवाल किया कि जब वह औपचारिक सदस्य नहीं थे तो बैठक में उनकी भूमिका किस आधार पर तय हुई थी। दो दिन बाद शत्रुघ्न सिंह समिति में शामिल इस पूरे विवाद में एक नया घटनाक्रम 21 सितंबर को सामने आया। The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र सरकार ने शत्रुघ्न सिंह को UCC समिति में Member-cum-Senior Adviser नियुक्त कर दिया। यानी जिस अधिकारी की 19 सितंबर की बैठक में मौजूदगी पर जस्टिस चव्हाण ने सवाल उठाया था, उन्हें दो दिन बाद औपचारिक रूप से समिति से जोड़ दिया गया। सिंह इससे पहले उत्तराखंड की UCC समिति में भी जस्टिस रंजना देसाई के साथ काम कर चुके हैं। उत्तराखंड UCC में भी काम कर चुके हैं शत्रुघ्न सिंह शत्रुघ्न सिंह उत्तराखंड में UCC तैयार करने वाली पांच सदस्यीय समिति का हिस्सा थे। वह कानून का मसौदा तैयार करने और विभिन्न पक्षों से बातचीत करने वाली टीम में शामिल रहे। उत्तराखंड विधानसभा ने फरवरी 2024 में UCC विधेयक पारित किया था और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 27 जनवरी 2025 से वहां समान नागरिक संहिता लागू हुई। UCC के विरोधी नहीं हैं जस्टिस चव्हाण इस्तीफे के बाद जस्टिस चव्हाण ने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति UCC की अवधारणा से नहीं, बल्कि समिति में अपनाई जा रही प्रक्रिया से है। उन्होंने कहा कि वह करीब दस वर्षों से इस विषय पर काम कर रहे हैं और UCC लागू किया जा सकता है, लेकिन ऐसा करते समय अलग-अलग समुदायों के बीच टकराव नहीं होना चाहिए। उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, gender neutrality और न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप पर जोर दिया। जुलाई में बनाई गई थी सात सदस्यीय समिति महाराष्ट्र सरकार ने जुलाई 2026 में UCC का मसौदा और सिफारिशें तैयार करने के लिए सात सदस्यीय समिति बनाई थी। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं। समिति को विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और अन्य व्यक्तिगत कानूनों से संबंधित कानूनी, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहलुओं का अध्ययन कर छह महीने के भीतर रिपोर्ट देने का जिम्मा दिया गया है। सरकार ने आरोपों पर नहीं दी विस्तृत प्रतिक्रिया Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री ने कहा कि सरकार जस्टिस चव्हाण की ओर से उठाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया नहीं देगी और समिति अपना काम जारी रखेगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चव्हाण की जगह अलग से नया सदस्य नियुक्त नहीं किया जाएगा। हालांकि इसके साथ ही 21 सितंबर को शत्रुघ्न सिंह को Member-cum-Senior Adviser नियुक्त किए जाने की खबर भी सामने आई है। फिलहाल समिति UCC को लेकर जनता से राय लेने और आगे की सिफारिशें तैयार करने की प्रक्रिया में है। source – The Indian Express / Hindustan Times / Times of India / Bar & Bench जय राष्ट्र न्यूज़

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गरबा में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर उषा ठाकुर का बयान, 4.5 लाख लड़कियों को लेकर किया दावा

इंदौर: मध्य प्रदेश की पूर्व मंत्री और BJP विधायक उषा ठाकुर ने गरबा आयोजनों में गैर-हिंदुओं की एंट्री का विरोध करते हुए नया बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि पहले हर साल गरबा आयोजनों के दौरान करीब 4.5 लाख हिंदू लड़कियां गैर-हिंदू युवकों के साथ चली जाती थीं, जिससे जनसांख्यिकी में बदलाव हो रहा था। हालांकि ठाकुर ने इस आंकड़े के समर्थन में कोई आधिकारिक स्रोत या प्रमाण नहीं बताया है। उनके बयान के बाद कांग्रेस ने आपत्ति जताते हुए सार्वजनिक माफी की मांग की है। गैर-हिंदुओं की एंट्री पर रोक का किया समर्थन इंदौर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उषा ठाकुर से गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं की एंट्री रोकने की मांग को लेकर सवाल किया गया था। ठाकुर ने इस तरह की रोक का समर्थन करते हुए कहा कि जो लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, उन्हें गरबा आयोजनों में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की ओर से की जा रही ऐसी मांगों का भी समर्थन किया। 4.5 लाख लड़कियों को लेकर किया दावा उषा ठाकुर ने दावा किया कि पहले हर साल गरबा आयोजनों के दौरान करीब 4.5 लाख लड़कियां दूसरे समुदाय के युवकों के साथ चली जाती थीं। उन्होंने आगे इसे जनसांख्यिकीय बदलाव से भी जोड़ा। हालांकि उपलब्ध रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने इस संख्या के समर्थन में किसी सरकारी रिपोर्ट, पुलिस रिकॉर्ड या अन्य सत्यापित आंकड़े का हवाला नहीं दिया। इसलिए इसे फिलहाल उषा ठाकुर का राजनीतिक दावा ही माना जाना चाहिए। तिलक और कलावा को लेकर भी कही बात ठाकुर ने आरोप लगाया कि कुछ लोग गरबा में शामिल होने के लिए तिलक लगाने या कलावा बांधने जैसे तरीके अपनाते हैं और अपनी धार्मिक पहचान छिपाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के प्रवेश पर रोक लगनी चाहिए। यह उनका आरोप है और इसके समर्थन में उन्होंने कोई विशिष्ट मामला या आधिकारिक डेटा पेश नहीं किया। गरबा के कमर्शियल रूप पर भी जताई आपत्ति उषा ठाकुर ने केवल गैर-हिंदुओं की एंट्री ही नहीं, बल्कि गरबा के बढ़ते व्यावसायीकरण पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि गरबा मूल रूप से शक्ति की उपासना और धार्मिक साधना से जुड़ा पर्व है, लेकिन अब कई जगह इसे कपड़ों, गहनों और टैटू के प्रदर्शन तक सीमित किया जा रहा है। ठाकुर के अनुसार इससे गरबा का आध्यात्मिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है। कांग्रेस ने बयान पर मांगी माफी उषा ठाकुर के बयान पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता नीलाभ शुक्ला ने कहा कि बिना प्रमाण के लाखों हिंदू महिलाओं को लेकर इस तरह का दावा करना आपत्तिजनक है और ठाकुर को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी गरबा को लेकर दिए जा रहे बयानों की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे बयानों से सामाजिक माहौल खराब होता है। मध्य प्रदेश में गरबा को लेकर बढ़ी राजनीतिक बहस नवरात्रि से पहले मध्य प्रदेश में गरबा पंडालों में मुस्लिम और अन्य गैर-हिंदू लोगों की एंट्री को लेकर कई BJP नेताओं के बयान सामने आए हैं। भोपाल से BJP विधायक रामेश्वर शर्मा और मंत्री विश्वास सारंग ने भी इस मुद्दे पर सख्त शर्तों या प्रतिबंध का समर्थन किया है, जबकि कांग्रेस नेताओं ने इन बयानों का विरोध किया है। फिलहाल उषा ठाकुर के 4.5 लाख लड़कियों वाले दावे की कोई स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में यह मामला गरबा आयोजनों में प्रवेश के नियमों के साथ-साथ राजनीतिक बयानबाजी और सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। source – The New Indian Express / Aaj Tak / Amar Ujala / ThePrint जय राष्ट्र न्यूज़

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जमुई घटना के बाद सम्राट चौधरी का पुराना बयान वायरल, विपक्ष ने पूछा- क्या अब देंगे इस्तीफा?

पटना: बिहार के जमुई में नाबालिग छात्रा और उसके साथी के साथ कथित मारपीट और छेड़छाड़ की घटना के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिया गया एक पुराना बयान सोशल मीडिया पर फिर वायरल हो गया है। पुराने वीडियो में चौधरी को यह कहते सुना जा सकता है कि बिहार में कोई महिला रात में बाहर निकले और “किसी ने छू दिया” तो वह अगली सुबह इस्तीफा दे देंगे। विपक्ष अब इसी बयान का हवाला देकर मुख्यमंत्री से सवाल कर रहा है। जमुई में क्या हुआ? मामला 19 सितंबर 2026 का है। जमुई जिले में कोचिंग से लौट रहे एक नाबालिग लड़के और लड़की को कथित तौर पर युवकों के एक समूह ने रास्ते में रोका। पुलिस के मुताबिक दोनों के साथ मारपीट की गई और छात्रा के साथ कथित छेड़छाड़ हुई। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आया। पुलिस ने POCSO Act समेत संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया और शुरुआती कार्रवाई में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया। क्यों वायरल हुआ सम्राट चौधरी का पुराना बयान? जमुई की घटना सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स और विपक्षी नेताओं ने सम्राट चौधरी का पुराना वीडियो शेयर करना शुरू किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक 29 सितंबर 2025 के एक कार्यक्रम में चौधरी ने बिहार की कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा का जिक्र करते हुए कहा था कि अगर किसी व्यक्ति का कोई निजी दुश्मन नहीं है तो वह रात 12 बजे खाना खाने के बाद बाहर घूमकर आए और यदि कोई उसे छू दे तो “सम्राट चौधरी सुबह इस्तीफा दे देगा।” यह बयान उस समय कानून-व्यवस्था को लेकर किए गए उनके राजनीतिक दावे का हिस्सा था। अब जमुई की घटना के बाद विपक्ष इसी पुराने बयान को उनके खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। विपक्ष ने मांगा मुख्यमंत्री का इस्तीफा जमुई मामले के बाद RJD और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बिहार सरकार पर महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं। RJD नेता तेजस्वी यादव समेत विपक्ष के कई नेताओं ने सम्राट चौधरी के पुराने बयान का हवाला देते हुए उनसे जवाब मांगा। कुछ विपक्षी नेताओं ने मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग भी की है। यह विपक्ष की राजनीतिक मांग है। सम्राट चौधरी ने जमुई मामले पर क्या कहा? विवाद के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि उनकी प्राथमिकता सुशासन है और अपराधी की कोई जाति या धर्म नहीं होता। उन्होंने कहा कि सरकार अपराध करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। चौधरी ने सोशल मीडिया पर वीडियो और ‘रील’ बनाने की प्रवृत्ति का भी जिक्र करते हुए कहा कि अपराध का वीडियो बनने से आरोपियों की पहचान करने में पुलिस को मदद मिली। मुख्य आरोपी पुलिस कार्रवाई में घायल मामले में मुख्य आरोपी बताए जा रहे नंदन यादव को पकड़ने के दौरान पुलिस कार्रवाई में गोली लगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपी ने कथित रूप से पुलिस पर गोली चलाई, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी। पुलिस अन्य आरोपियों की भूमिका की भी जांच कर रही है और घटना की जांच के लिए विशेष टीम लगाई गई है। पुराने बयान ने बढ़ाया राजनीतिक दबाव सम्राट चौधरी का पुराना वीडियो वायरल होने से जमुई मामला केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि बिहार में राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया है। विपक्ष पुराने बयान को मुख्यमंत्री की जवाबदेही से जोड़ रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है। पुराने बयान में कही गई इस्तीफे की बात एक राजनीतिक वक्तव्य थी; यह अपने आप कोई कानूनी या संवैधानिक बाध्यता नहीं बनाती। फिलहाल पुलिस जांच जारी है और मामले में शामिल अन्य आरोपियों की भूमिका भी खंगाली जा रही है। source – The Indian Express / Aaj Tak / ABP News / Times of India जय राष्ट्र न्यूज़

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चिराग पासवान की निजी पहचान को लेकर बयान से विवाद, जीतन राम मांझी ने की कार्रवाई की मांग

पटना: केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान की निजी लैंगिक पहचान को लेकर डॉ. राजन सिंह के एक बयान से राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। राजन सिंह ने चिराग पासवान की पहचान को लेकर एक अपुष्ट दावा किया, जिस पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कड़ी आपत्ति जताते हुए बिहार सरकार से कार्रवाई की मांग की है। हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है और चिराग पासवान की ओर से इसकी पुष्टि नहीं की गई है। वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड से जुड़े रहे डॉ. राजन सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया। इसमें उन्होंने चिराग पासवान की लैंगिक पहचान को लेकर दावा किया और कहा कि वह अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करते। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान से जुड़ी जानकारी को केवल सोशल मीडिया टिप्पणियों या अटकलों के आधार पर तथ्य नहीं माना जा सकता। जीतन राम मांझी ने जताई नाराजगी केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेता जीतन राम मांझी ने राजन सिंह की टिप्पणी पर आपत्ति जताई। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि किसी केंद्रीय मंत्री की निजी पहचान को लेकर इस तरह की टिप्पणी करना उचित नहीं है। मांझी ने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को टैग करते हुए राज्य सरकार से संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। राजन सिंह ने दी सफाई विवाद बढ़ने के बाद 23 सितंबर को राजन सिंह ने अपनी टिप्पणी पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि ‘ट्रांसजेंडर’ कोई अपमानजनक शब्द नहीं, बल्कि एक सम्मानित पहचान है। राजन सिंह ने कहा कि उन्हें स्वयं अपनी ट्रांसजेंडर पहचान पर गर्व है और उनका उद्देश्य इस शब्द को अपमान के तौर पर इस्तेमाल करना नहीं था। उन्होंने चुनावी दस्तावेजों में उम्मीदवारों की लैंगिक पहचान को लेकर भी सवाल उठाए। चिराग पासवान की ओर से क्या आया जवाब? 21 सितंबर तक प्रकाशित प्रमुख रिपोर्ट्स में चिराग पासवान या उनकी पार्टी की ओर से राजन सिंह के इस दावे पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। ऐसे में उनकी निजी पहचान को लेकर किया गया दावा अपुष्ट ही है और इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। निजी पहचान पर सियासी बयान से बढ़ी बहस पूरे विवाद ने राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ किसी सार्वजनिक व्यक्ति की निजी पहचान को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों पर भी सवाल खड़े किए हैं। एक ओर जीतन राम मांझी ने टिप्पणी को आपत्तिजनक बताते हुए कार्रवाई की मांग की है, वहीं राजन सिंह का कहना है कि ट्रांसजेंडर पहचान को अपमान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिलहाल विवाद का केंद्र चिराग पासवान की वास्तविक पहचान से अधिक एक अपुष्ट व्यक्तिगत दावे को सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाए जाने पर है। source – Amar Ujala / Live Hindustan / IANS जय राष्ट्र न्यूज़

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इंदौर में राहुल गांधी का स्वागत, समर्थकों ने लगाए नारे; ‘छात्रों की गूंज’ में युवाओं से किया संवाद

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के इंदौर पहुंचने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने उनका स्वागत किया। एयरपोर्ट से लेकर कार्यक्रम स्थल तक कई स्थानों पर समर्थक जुटे और ‘राहुल गांधी जिंदाबाद’ तथा ‘घर-घर गांधी, राहुल गांधी जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए। राहुल गांधी 19 सितंबर को ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल होने इंदौर पहुंचे थे, जहां उन्होंने छात्रों से शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर बातचीत की। इंदौर एयरपोर्ट पर जुटे कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता राहुल गांधी के इंदौर पहुंचने से पहले ही देवी अहिल्याबाई होलकर एयरपोर्ट पर बड़ी संख्या में कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता जुटने लगे थे। स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट से होटल तक कई स्थानों पर व्यवस्थाएं की थीं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार राहुल गांधी के एयरपोर्ट पहुंचने पर वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने उनकी अगवानी की। एयरपोर्ट से रेडिसन होटल जाने वाले रास्ते में लवकुश चौराहा, एमआर-10 और विजय नगर समेत कई स्थानों पर स्वागत की तैयारियां की गई थीं। समर्थकों ने लगाए राहुल गांधी के समर्थन में नारे राहुल गांधी के काफिले के रास्ते और ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम स्थल पर बड़ी संख्या में समर्थक मौजूद रहे। स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने— “राहुल गांधी जिंदाबाद” और “घर-घर गांधी, राहुल गांधी जिंदाबाद” जैसे नारे लगाए। कुछ युवा ‘RAGA’ लिखा चश्मा पहनकर भी कार्यक्रम में पहुंचे। कार्यक्रम में ग्वालियर से पहुंची एक युवती अपने साथ “आपसे प्यार है इसलिए इंदौर आए हैं” लिखा पोस्टर लेकर आई थी। इस तरह के पोस्टर और नारे कार्यक्रम स्थल पर मौजूद समर्थकों के उत्साह का हिस्सा रहे। स्वागत के लिए बनाए गए थे कई मंच राहुल गांधी के दौरे से पहले कांग्रेस नेताओं ने एयरपोर्ट से होटल तक कई जगह स्वागत मंच तैयार किए थे। हालांकि राहुल गांधी का कार्यक्रम निर्धारित होने के कारण वे इन सभी मंचों पर नहीं रुके और उनका काफिला सीधे आगे बढ़ा। एयरपोर्ट और एमआर-10 इलाके में समर्थकों की भीड़ देखने को मिली। शहर में यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने विशेष ट्रैफिक प्लान भी लागू किया था। 13 मार्गों पर भारी वाहनों के प्रवेश को नियंत्रित किया गया और कुछ हिस्सों को नो-व्हीकल जोन बनाया गया था। ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल हुए राहुल गांधी इंदौर दौरे का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस द्वारा आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल होना था। कार्यक्रम इंदौर के रीजनल पार्क के पास IDA मैदान में आयोजित किया गया। इसमें बड़ी संख्या में छात्र और युवा पहुंचे। राहुल गांधी ने मंच से छात्रों से सीधे संवाद किया और उनकी समस्याएं सुनीं। यह ‘छात्रों की गूंज’ अभियान का पांचवां आयोजन था। इससे पहले इस अभियान के कार्यक्रम कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे में आयोजित किए जा चुके थे। छात्रों ने उठाए रोजगार और परीक्षा से जुड़े मुद्दे कार्यक्रम में युवाओं ने बेरोजगारी, सरकारी भर्तियों में देरी, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और लंबित भर्ती प्रक्रियाओं जैसे विषय उठाए। राहुल गांधी ने इन मुद्दों को लेकर केंद्र और राज्य की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए और कहा कि छात्रों को प्रश्न पूछने का अधिकार होना चाहिए। उनके ये बयान कांग्रेस नेता के राजनीतिक आरोप और दृष्टिकोण थे। राहुल गांधी ने कार्यक्रम की शुरुआत में इंदौर में मिले स्वागत के लिए मौजूद लोगों का धन्यवाद भी किया। कार्यक्रम के बाहर राजनीतिक विरोध भी राहुल गांधी के स्वागत के साथ-साथ उनके दौरे को लेकर राजनीतिक विरोध भी देखने को मिला। कार्यक्रम से पहले इंदौर में कई जगह ‘झूठ की गूंज’ लिखे पोस्टर और होर्डिंग लगाए गए थे। कांग्रेस ने इसके पीछे भाजपा का हाथ होने का आरोप लगाया, जबकि भाजपा की ओर से इसे छात्रों की प्रतिक्रिया बताया गया। इन दावों की जिम्मेदारी संबंधित राजनीतिक पक्षों की है। इस तरह राहुल गांधी का इंदौर दौरा एक तरफ कांग्रेस समर्थकों के स्वागत और नारेबाजी के कारण चर्चा में रहा, वहीं दूसरी ओर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी जारी रही। राहुल गांधी ने स्वागत के लिए जताया आभार कार्यक्रम में राहुल गांधी ने इंदौर के लोगों और युवाओं को संबोधित करते हुए स्वागत के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद उन्होंने छात्रों के साथ शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। कार्यक्रम में पोस्टर, नारे, संगीत और छात्रों की प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिलीं। Times of India ने कार्यक्रम स्थल पर बड़ी संख्या में युवाओं, पोस्टरों और नारेबाजी का उल्लेख किया है। इंदौर कार्यक्रम के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को राज्य के दूसरे जिलों तक ले जाने की घोषणा भी की।

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राहुल गांधी पर महिला की तीखी टिप्पणी, बोलीं- ‘राहुल गांधी का दिमाग खराब हो गया है’

कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर एक महिला की तीखी टिप्पणी चर्चा में है। सोशल मीडिया पर प्रसारित प्रतिक्रिया में महिला को यह कहते हुए बताया जा रहा है कि “राहुल गांधी का दिमाग खराब हो गया है।” यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब इंदौर में कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। हालांकि महिला की उक्त टिप्पणी एक व्यक्तिगत राजनीतिक प्रतिक्रिया है और इसे राहुल गांधी की मानसिक स्थिति के बारे में किसी चिकित्सकीय तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। राहुल गांधी के हालिया ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब अलग-अलग राज्यों तक पहुंच गया है। कार्यक्रम में स्टैंड-अप कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बोलने की शैली की मिमिक्री की थी और राहुल गांधी भी उस दौरान मंच पर मौजूद थे। इस प्रस्तुति के कुछ हिस्सों को लेकर भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई, जबकि कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक व्यंग्य के रूप में बचाव किया। महिला की टिप्पणी क्यों हुई चर्चा में? इस पूरे विवाद के बीच राहुल गांधी को लेकर आम लोगों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक प्रतिक्रिया में उत्तर प्रदेश की एक महिला को राहुल गांधी की आलोचना करते हुए “राहुल गांधी का दिमाग खराब हो गया है” कहते हुए बताया जा रहा है। महिला की यह टिप्पणी राजनीतिक नाराजगी की अभिव्यक्ति है। इस तरह की भाषा किसी व्यक्ति की वास्तविक मानसिक या चिकित्सकीय स्थिति साबित नहीं करती। उपलब्ध विश्वसनीय मीडिया रिपोर्ट्स में इस exact टिप्पणी करने वाली महिला की पहचान और वीडियो के मूल स्रोत की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली है। हालांकि राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम को लेकर महिलाओं की ओर से आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं आने की रिपोर्ट जरूर सामने आई है। Times Now Navbharat की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली, देहरादून और बरेली समेत अलग-अलग जगहों पर महिलाओं ने कार्यक्रम की आलोचना की और राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता पर सवाल उठाए। किस घटना को लेकर शुरू हुआ विवाद? 19 सितंबर को मध्य प्रदेश के इंदौर में कांग्रेस का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य पेपर लीक, परीक्षा में कथित अनियमितताओं, फीस और युवाओं से जुड़े दूसरे मुद्दों को उठाना था। राहुल गांधी कार्यक्रम में मौजूद थे। इसी दौरान कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री की। प्रस्तुति में प्रधानमंत्री द्वारा एक बुजुर्ग महिला को कुर्सी दिए जाने से जुड़े प्रसंग का भी संदर्भ आया। इसके बाद भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रस्तुति के जरिये प्रधानमंत्री और उनकी दिवंगत मां का अपमान किया गया। कांग्रेस और उसके समर्थकों ने इस व्याख्या से असहमति जताई है और कहा कि इसे राजनीतिक व्यंग्य तथा हास्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी साधा निशाना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इंदौर कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं और बुजुर्गों का सम्मान भारतीय संस्कृति का हिस्सा है और कांग्रेस नेता के व्यवहार की आलोचना की। यह भाजपा का राजनीतिक पक्ष है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत अन्य भाजपा नेताओं ने भी राहुल गांधी और कांग्रेस की आलोचना की। भाजपा ने पूरे विवाद को महिला सम्मान से जोड़ते हुए कांग्रेस से जवाब मांगा। कांग्रेस ने क्या कहा? दूसरी ओर कांग्रेस ने भाजपा की आलोचना का विरोध किया है। कर्नाटक सरकार में मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने सवाल किया कि राजनीतिक व्यंग्य और हास्य को लेकर भाजपा इतनी आपत्ति क्यों जता रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा नेताओं ने अतीत में कांग्रेस नेताओं को लेकर तीखी टिप्पणियां की हैं। हालांकि Hindustan Times की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस के अंदर भी कुछ नेताओं ने माना कि मिमिक्री का यह हिस्सा टाला जा सकता था, क्योंकि इससे छात्रों के मूल मुद्दों से ध्यान हट गया। रिपोर्ट में तीन कांग्रेस नेताओं के हवाले से ऐसी राय सामने आई। महिलाओं की प्रतिक्रियाएं भी आईं सामने विवाद के बाद कई महिलाओं की प्रतिक्रियाओं में यह कहा गया कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन किसी नेता की मां या परिवार को राजनीतिक मजाक में शामिल करने से बचना चाहिए। Times Now Navbharat की रिपोर्ट के अनुसार कुछ महिलाओं ने राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता पर सवाल उठाए और कहा कि सार्वजनिक मंच पर भाषा तथा व्यवहार की मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी माहौल में राहुल गांधी के खिलाफ कथित तौर पर उत्तर प्रदेश की महिला की तीखी टिप्पणी सोशल मीडिया पर चर्चा में आई है। वायरल बयान को लेकर क्या सावधानी जरूरी? सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति का छोटा वीडियो तेजी से वायरल होने पर उसका पूरा संदर्भ कई बार सामने नहीं आता। इसलिए महिला के कथित “राहुल गांधी का दिमाग खराब हो गया है” बयान को एक व्यक्तिगत राजनीतिक टिप्पणी के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इस बयान के आधार पर राहुल गांधी की मानसिक स्थिति के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। साथ ही वीडियो के मूल स्रोत, महिला की पहचान और पूरी बातचीत की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे व्यापक जनमत का प्रतिनिधित्व मानना भी सही नहीं होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इंदौर के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में हुई मिमिक्री ने भाजपा और कांग्रेस के बीच नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। भाजपा इसे महिला सम्मान और राजनीतिक मर्यादा से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस पक्ष इसे राजनीतिक व्यंग्य और छात्रों के वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश के रूप में पेश कर रहा है।

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आया। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि UGC Equity Regulations 2026 पर पुनर्विचार किया जा रहा है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार नियमों की समीक्षा कर रही है, हालांकि उस समय यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अंतिम निर्णय क्या होगा। सुप्रीम कोर्ट ने UGC को इस मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया था। ऐसे में शेर सिंह राणा और अन्य संगठनों की ओर से नियमों को पूरी तरह वापस लेने की मांग ऐसे समय सामने आई है जब मामला न्यायिक समीक्षा और सरकारी पुनर्विचार—दोनों प्रक्रियाओं से गुजर रहा है। कई जगह जारी है UGC नियमों का विरोध UGC Equity Regulations को लेकर विरोध केवल बिजनौर तक सीमित नहीं रहा है। सितंबर 2026 में दिल्ली में भी करणी सेना ने इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी। इसको लेकर मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा। वहीं 20 सितंबर को आगरा में भी बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी UGC नियमों को वापस लेने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे। पुलिस के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने यमुना एक्सप्रेसवे की ओर बढ़ने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरिकेडिंग की। अब आगे क्या? UGC के 2026 Equity Regulations फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण लागू नहीं हैं और 2012 के नियम प्रभावी बने हुए हैं। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने अदालत में कहा है कि 2026 के नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है। ऐसे में अब ध्यान केंद्र सरकार, UGC और सुप्रीम कोर्ट में जारी प्रक्रिया पर रहेगा। शेर सिंह राणा और विरोध कर रहे अन्य संगठनों ने जहां नियमों को वापस लेने की मांग की है, वहीं 2026 के नियमों का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों के समाधान और समानता की व्यवस्था को मजबूत करना बताया गया है।

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बंगाल उपचुनाव में बड़ा ट्विस्ट! नंदीग्राम से रेजीनगर तक बदले समीकरण

पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है। उम्मीदवारों के नाम वापस लेने, फैसले पलटने और गिरफ्तारियों ने दोनों सीटों के मुकाबले को नया रूप दे दिया है। नंदीग्राम में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल खेमे ने कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन दिया है, जबकि रेजीनगर में उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने चुनाव से हटने की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद अपना फैसला बदल दिया। पश्चिम बंगाल की दो चर्चित विधानसभा सीटों नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर 2026 को मतदान होना है, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। मतदान से पहले ही दोनों सीटों पर ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीति को प्रभावित किया है। नंदीग्राम में उम्मीदवार हटा, कांग्रेस को मिला समर्थन नंदीग्राम में सबसे बड़ा बदलाव उस समय आया जब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल खेमे की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की। इस फैसले के कारण नंदीग्राम में चुनावी मुकाबले की संरचना बदल गई और कांग्रेस उम्मीदवार पर राजनीतिक ध्यान बढ़ गया। लेकिन इसके तुरंत बाद एक और घटनाक्रम सामने आया। कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण आंदोलन से जुड़े पुराने मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। कांग्रेस नेताओं ने गिरफ्तारी के समय को लेकर राजनीतिक दबाव के आरोप लगाए, जबकि राज्य सरकार ने अदालत में मामलों और लंबित वारंट से जुड़ी जानकारी दी। ये आरोप राजनीतिक पक्षों के दावे हैं और इन पर कानूनी प्रक्रिया जारी है। 22 सितंबर को पश्चिम बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट को बताया कि मिलन प्रधान से संबंधित पांच मामलों को वापस लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रधान फिलहाल अन्य मामलों में न्यायिक हिरासत में हैं। अदालत ने मामले पर आगे सुनवाई के लिए तारीख तय की है। BJP ने हसीरानी रथ को उतारा मैदान में भारतीय जनता पार्टी ने नंदीग्राम उपचुनाव के लिए हसीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है। हसीरानी रथ चंद्रनाथ रथ की मां हैं। वहीं वाम मोर्चे की ओर से CPI उम्मीदवार शांतिगोपाल गिरि मैदान में हैं। इस तरह नंदीग्राम में उम्मीदवारों और दलों के बीच मुकाबले की तस्वीर पिछले कुछ दिनों में लगातार बदली है। नंदीग्राम पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले से ही महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र रहा है। मौजूदा उपचुनाव मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के यह सीट छोड़कर भवानीपुर सीट बरकरार रखने के बाद आवश्यक हुआ। रेजीनगर में कुछ घंटों में पलटा फैसला नंदीग्राम के बाद रेजीनगर में भी नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल खेमे के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने पहले उपचुनाव से हटने की घोषणा कर दी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रबीउल ने चुनाव चिह्न और प्रचार से जुड़ी समस्याओं सहित कई कारण बताए थे। हालांकि कुछ ही घंटों बाद उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया और कहा कि वे रेजीनगर से चुनाव लड़ेंगे। ममता बनर्जी और पार्टी नेतृत्व से बातचीत के बाद उनका यह फैसला सामने आया। इस यू-टर्न के बाद रेजीनगर में मुकाबले की तस्वीर फिर बदल गई और रबीउल आलम चौधरी चुनावी मैदान में बने हुए हैं। रेजीनगर में उम्मीदवार की गिरफ्तारी से बढ़ी राजनीतिक हलचल रेजीनगर में एक अन्य घटनाक्रम में निर्दलीय उम्मीदवार सैफुल इस्लाम को पुलिस ने गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार गिरफ्तारी 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान दो समूहों के बीच हुई झड़प से जुड़े एक पुराने मामले में की गई। सैफुल इस्लाम का संबंध हुमायूं कबीर के नेतृत्व वाली आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) से बताया गया है। AJUP प्रमुख हुमायूं कबीर ने भी चुनाव से पहले पुलिस कार्रवाई को लेकर आरोप लगाए हैं और निर्वाचन आयोग में शिकायत की है। उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी से जुड़े लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। ये हुमायूं कबीर के आरोप हैं; पुलिस और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की ओर से घटनाओं की अलग-अलग व्याख्याएं सामने आई हैं। रेजीनगर सीट हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। BJP ने यहां शाखरव सरकार को उम्मीदवार बनाया है, जबकि वाम मोर्चे की ओर से CPI(M) के सैयद असद अली चुनाव मैदान में हैं। नंदीग्राम से रेजीनगर तक क्यों बदले समीकरण? पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को देखें तो नंदीग्राम में तृणमूल खेमे के उम्मीदवार के हटने और कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन मिलने से पहले से घोषित मुकाबले की संरचना बदली है। दूसरी ओर कांग्रेस उम्मीदवार की गिरफ्तारी और उससे जुड़ी कानूनी प्रक्रिया भी चुनाव प्रचार का प्रमुख मुद्दा बन गई है। रेजीनगर में रबीउल आलम चौधरी के पहले पीछे हटने और फिर चुनाव लड़ने के फैसले ने वहां उम्मीदवारों की स्थिति को बदल दिया। इसके साथ निर्दलीय उम्मीदवार की गिरफ्तारी तथा हुमायूं कबीर के पुलिस कार्रवाई संबंधी आरोपों ने चुनावी बहस को और व्यापक बनाया है। इन घटनाओं का मतदाताओं पर क्या असर पड़ेगा, इसका स्पष्ट जवाब मतदान और मतगणना के बाद ही मिलेगा। फिलहाल दोनों सीटों पर राजनीतिक दल प्रचार, उम्मीदवारों और कानूनी घटनाक्रम के बीच अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं। मुख्य बातें: नंदीग्राम और रेजीनगर में मतदान 6 अक्टूबर 2026 को होगा और नतीजे 9 अक्टूबर को आएंगे। नंदीग्राम में संचिता प्रधान डे की उम्मीदवारी वापस होने के बाद कांग्रेस के मिलन प्रधान को ममता बनर्जी खेमे का समर्थन मिला है। रेजीनगर में रबीउल आलम चौधरी ने चुनाव से हटने की घोषणा के कुछ घंटे बाद चुनाव लड़ने का फैसला बरकरार रखा। दोनों सीटों पर गिरफ्तारियों और पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी जारी हैं।

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