नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। 10 और 11 अक्टूबर को मध्य दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के बाद सामने आए वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में महिला प्रदर्शनकारियों को पुलिस द्वारा पकड़कर वाहनों में ले जाते हुए देखा गया। विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं। हालांकि, सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित बदसलूकी के आरोप
CPI(M) के नेताओं ने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस ने सख्ती से पेश आते हुए उन्हें लंबे समय तक पुलिस वाहनों में रखा। पार्टी के महासचिव एम.ए. बेबी ने यह भी दावा किया कि कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस वाहनों के भीतर मारपीट हुई। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है।
हिरासत के दौरान सांसद जॉन ब्रिटास के घायल होने का दावा
इसी प्रदर्शन के दौरान CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास के घायल होने की खबर भी सामने आई। पार्टी के अनुसार, हिरासत में लिए जाने के दौरान हुई धक्का-मुक्की में उन्हें चोट लगी, जिसके बाद उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चिकित्सकीय जांच के लिए ले जाया गया।
बंगला साहिब के पास पुलिस कार्रवाई पर भी विवाद
गुरुद्वारा बंगला साहिब के आसपास हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। नॉर्थ अमेरिकन पंजाबी एसोसिएशन (NAPA) ने दावा किया कि वहां महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ और मदद की अपील पर ध्यान नहीं दिया गया। संगठन ने मामले की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने की मांग की है।
वायरल वीडियो पर दिल्ली पुलिस का स्पष्टीकरण
बंगला साहिब से जुड़े वायरल वीडियो पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि पुलिसकर्मी उस सामान्य रास्ते से गुजर रहे थे, जिसका इस्तेमाल श्रद्धालु जूते उतारने वाले स्थान तक पहुंचने के लिए करते हैं।
हालांकि, एसोसिएशन ने पूरे घटनाक्रम की स्पष्टता के लिए बिना संपादन वाले वीडियो और अन्य संबंधित साक्ष्यों की जांच कराने की मांग की है। आरोपों और पुलिस के स्पष्टीकरण की निष्पक्ष जांच से ही घटनाओं की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
पहले भी महिला प्रदर्शनकारी को लेकर उठा था विवाद
7 अक्टूबर को INDIA गठबंधन के विरोध प्रदर्शन के दौरान भी एक महिला पुलिस अधिकारी और प्रदर्शनकारियों के बीच कथित टकराव को लेकर विवाद हुआ था। उस घटना पर भाजपा ने राहुल गांधी पर महिला पुलिस अधिकारी को धक्का देने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। यह भाजपा का आरोप था, जिसे घटना के स्वतंत्र रूप से स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
3,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की रिपोर्ट
10 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने बड़े पैमाने पर एहतियाती हिरासत की कार्रवाई की। रिपोर्ट के अनुसार, 3,500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग हिरासत केंद्रों में ले जाया गया था।
हिरासत केंद्रों के भीतर भी जारी रहे नारे
रिपोर्टों के अनुसार, हिरासत में लिए गए कई प्रदर्शनकारियों ने केंद्रों के भीतर भी नारेबाजी और विरोध जारी रखा। कुछ प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि उन्हें जंतर-मंतर तक नहीं पहुंचने दिया गया, तो वे हिरासत केंद्रों को ही विरोध स्थल बना देंगे।
महिला सुरक्षा और पुलिस प्रक्रिया पर बहस
महिला प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के तरीके, उन्हें पुलिस वाहनों में ले जाने और कथित सख्ती ने पुलिस की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं। महिला पुलिसकर्मियों की पर्याप्त मौजूदगी, बल का उचित इस्तेमाल और जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सहायता जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देने की मांग की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान को लेकर सवाल
12 अक्टूबर को प्रकाशित एक कानूनी विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया कि बड़े पैमाने पर हिरासत और पुलिस की कथित ज्यादती के आरोपों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया। विश्लेषण में पहले के मामलों का हवाला देते हुए अदालत के हस्तक्षेप की भूमिका पर चर्चा की गई। यह न्यायिक कार्रवाई को लेकर उठाया गया सवाल है, न कि अदालत की ओर से किसी उल्लंघन की पुष्टि।
आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी
सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी विशिष्ट पुलिसकर्मी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। हालांकि, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और हिरासत के दौरान बल प्रयोग से जुड़े आरोप गंभीर हैं। इनकी निष्पक्ष जांच, संबंधित पक्षों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
विरोध प्रदर्शनों के बीच पुलिस की भूमिका पर बढ़ती चर्चा
दिल्ली में लगातार विरोध प्रदर्शन, हिरासत और पुलिस-प्रदर्शनकारी टकराव की खबरों के बीच बहस अब केवल मुख्य चुनाव आयुक्त और SIR प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। प्रदर्शन करने के अधिकार, पुलिस की शक्तियों और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्रोत: द प्रिंट, PTI, द टाइम्स ऑफ इंडिया
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