पालघर, महाराष्ट्र: महाराष्ट्र के पालघर जिले में प्रस्तावित वाढवण बंदरगाह परियोजना के खिलाफ स्थानीय ग्रामीणों और मछुआरा समुदाय का विरोध तेज हो गया है। सोमवार, 2 नवंबर 2026 को सैकड़ों ग्रामीणों ने समुद्र में उतरकर जलसमाधि आंदोलन किया। इस प्रदर्शन में महिलाओं, युवाओं और बच्चों ने भी भाग लिया। आंदोलनकारियों ने सरकार और बंदरगाह प्रशासन से निर्माण कार्य तत्काल बंद करने तथा परियोजना रद्द करने की मांग की। समुद्र में उतरकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन पालघर के वाढवण समुद्र तट पर बड़ी संख्या में ग्रामीण पानी में उतर गए। प्रदर्शनकारियों ने समुद्र में मानव शृंखला बनाकर बंदरगाह परियोजना के खिलाफ नारे लगाए। कुछ प्रदर्शनकारी छाती तक पानी में खड़े दिखाई दिए। महिलाओं और बच्चों की मौजूदगी के कारण स्थिति संवेदनशील हो गई। आंदोलनकारियों का कहना था कि स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद परियोजना से संबंधित निर्माण कार्य जारी रखा जा रहा है। निर्माण कार्य दोबारा शुरू होने से बढ़ा आक्रोश रिपोर्टों के अनुसार वाढवण बंदरगाह से जुड़े सड़क और तटीय निर्माण कार्यों को रोकने की मांग पहले से की जा रही थी। 30 अक्टूबर को वरोर क्षेत्र में आयोजित जनआक्रोश सभा में स्थानीय संगठनों ने प्रशासन को निर्माण गतिविधियां बंद करने की चेतावनी दी थी। इसके बाद कुछ समय तक काम बंद रहा, लेकिन 2 नवंबर को पुलिस सुरक्षा के बीच सड़क निर्माण कार्य दोबारा शुरू होने की खबर से ग्रामीण नाराज हो गए। प्रदर्शनकारियों ने निर्माण सामग्री लेकर पहुंचे ट्रकों को भी रोकने का प्रयास किया। पुलिस कार्रवाई को लेकर लगाए आरोप आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि निर्माण कार्य का विरोध करने पर पुलिस ने कुछ ग्रामीणों को हिरासत में लिया और उनके खिलाफ मामले दर्ज करने की कोशिश की। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन स्थानीय लोगों की आपत्तियों को पर्याप्त महत्व दिए बिना निर्माण कार्य आगे बढ़ा रहा है। हालांकि इन आरोपों पर पुलिस और प्रशासन का विस्तृत आधिकारिक पक्ष उपलब्ध रिपोर्टों में स्पष्ट नहीं है। महिलाओं और बच्चों ने भी लिया हिस्सा जलसमाधि आंदोलन में स्थानीय मछुआरा परिवारों की महिलाएं, युवतियां और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल हुए। ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित बंदरगाह से केवल उनकी वर्तमान आजीविका ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी प्रभावित हो सकता है। प्रदर्शनकारियों ने समुद्र में खड़े होकर परियोजना वापस लेने और स्थानीय समुदायों की मांगें सुनने की अपील की। विधायक विनोद निकोले पहुंचे प्रदर्शन स्थल डहाणू विधानसभा क्षेत्र के विधायक विनोद निकोले भी आंदोलन स्थल पर पहुंचे। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की और प्रशासन के साथ निर्माण कार्य रोकने को लेकर चर्चा की। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार प्रशासन की ओर से काम बंद करने का आश्वासन मिलने के बाद प्रदर्शनकारियों से समुद्र से बाहर आने की अपील की गई। आश्वासन मिलने पर जलसमाधि आंदोलन वापस 2 नवंबर की रात सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक प्रशासन द्वारा निर्माण कार्य रोकने का आश्वासन दिए जाने के बाद ग्रामीणों ने जलसमाधि आंदोलन वापस ले लिया। हालांकि यह केवल तत्काल प्रदर्शन की समाप्ति थी। स्थानीय संगठनों ने बंदरगाह परियोजना का विरोध जारी रखने की बात कही है। परियोजना को स्थायी रूप से रद्द करने का कोई सरकारी फैसला सामने नहीं आया है। वाढवण बंदरगाह परियोजना क्या है? वाढवण बंदरगाह महाराष्ट्र के पालघर जिले के डहाणू क्षेत्र में विकसित की जा रही एक प्रमुख समुद्री बंदरगाह परियोजना है। केंद्र सरकार ने 19 जून 2024 को इस परियोजना को मंजूरी दी थी। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग ₹76,220 करोड़ है। इसे जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह प्राधिकरण और महाराष्ट्र समुद्री बोर्ड की संयुक्त कंपनी के माध्यम से विकसित किया जा रहा है। इसमें जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह प्राधिकरण की 74 प्रतिशत और महाराष्ट्र समुद्री बोर्ड की 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है। सरकार क्यों बनाना चाहती है यह बंदरगाह? केंद्र सरकार के अनुसार वाढवण बंदरगाह का उद्देश्य भारत की समुद्री माल ढुलाई क्षमता बढ़ाना और बड़े अंतरराष्ट्रीय मालवाहक जहाजों के लिए आधुनिक सुविधाएं विकसित करना है। सरकार का दावा है कि इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, औद्योगिक विकास, परिवहन संपर्क और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। परियोजना में सड़क और रेलवे संपर्क विकसित करने की भी योजना शामिल है। स्थानीय मछुआरे क्यों कर रहे विरोध? स्थानीय मछुआरा समुदाय और ग्रामीण संगठनों का आरोप है कि बंदरगाह निर्माण के कारण पारंपरिक मछली पकड़ने के क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। उनकी प्रमुख चिंताएं हैं: ये आंदोलनकारियों की आशंकाएं हैं। वास्तविक पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभाव का आकलन संबंधित अध्ययनों तथा परियोजना के क्रियान्वयन के आधार पर किया जाना होगा। 30 अक्टूबर को हुई थी बड़ी जनआक्रोश सभा वाढवण बंदरगाह विरोधी संघर्ष समिति और अन्य संगठनों ने 30 अक्टूबर को वरोर में जनआक्रोश सभा आयोजित की थी। सभा में मछुआरों, किसानों, आदिवासी समुदायों और विभिन्न सामाजिक तथा राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। आयोजकों ने परियोजना से संबंधित निर्माण कार्य बंद करने और स्थानीय समुदायों की मांगों पर विचार करने की अपील की थी। पर्यावरण और विकास को लेकर दो अलग-अलग पक्ष वाढवण बंदरगाह परियोजना को लेकर सरकार और स्थानीय आंदोलनकारियों के दृष्टिकोण अलग हैं। सरकार इसे समुद्री व्यापार और परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजना मानती है। दूसरी ओर, आंदोलनकारी समुद्री पर्यावरण, पारंपरिक मछली पकड़ने के अधिकार, जमीन और आजीविका को लेकर चिंता जता रहे हैं। आगे क्या होगा? जलसमाधि आंदोलन वापस लिए जाने के बाद भी वाढवण बंदरगाह परियोजना का विवाद समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन निर्माण गतिविधियों को लेकर क्या निर्णय लेता है, स्थानीय संगठनों के साथ बातचीत कितनी आगे बढ़ती है और परियोजना से प्रभावित समुदायों की मांगों पर क्या कार्रवाई होती है। फिलहाल ग्रामीणों का कहना है कि बंदरगाह परियोजना के खिलाफ उनका आंदोलन जारी रहेगा। स्रोत – आज तक, लोकसत्ता, एबीपी माझा, फ्री प्रेस जर्नल, जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह प्राधिकरण, भारत सरकार। जय राष्ट्र न्यूज़