Disha Salian Case

दिशा सालियान के साथ नहीं हुआ यौन हिंसा, आदित्य ठाकरे भी निर्दोष… महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट से बताई सच्चाई? 

दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान केस (Disha Salian Case) में बड़ा मोड़ आ गया है। राज्य सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) को एक एफिडेविट दायर कर बताया है कि दिशा सालियान की मौत में किसी भी तरह के संदेह की संभावना नहीं है। क्योंकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मृतक के साथ यौन या शारीरिक हमले का कोई सबूत नहीं मिला है। मेडिकल जांच में प्राइवेट पार्ट में न तो सीमन मिला और न ही कोई जख्म पाया गया। जिससे पता चलता है कि मृतका के साथ आखिरी क्षणों में कोई जबरदस्ती नहीं की गई। बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) में यह एफिडेविट राज्य सरकार की तरफ से मालवणी पुलिस स्टेशन के सीनियर इंस्पेक्टर शैलेन्द्र नागरकर ने दाखिल किया है। इस एफिडेविट में यह भी कहा गया है कि मृतका के पिता द्वारा दायर किया गए याचिका में लगाए गए आरोप बेवुनियाद और आधारहीन हैं। क्योंकि वैज्ञानिक जांच और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में इन आरोपों को लेकर कोई सबूत नहीं मिले। इस एफिडेविट में आदित्य ठाकरे (Aditya Thackeray) का भी जिक्र करते हुए कहा गया है कि उन्हें बेवजह बदनाम करने के लिए इस याचिका को दायर किया गया है।  12वीं मंजिल से गिर कर हुई थर दिशा सालियान की मौत  बता दें कि दिशा सालियान (Disha Salian Case) की 9 जून, 2020 को मलाड की एक बड़ी इमारत की 12वीं मंजिल से गिर कर मौत हो गई थी। पुलिस का कहना है कि दिशा खुद वहां से कूदी, जबकि मृतका के पिता सतीश सालियान का दावा है कि उनकी बेटी का रेप करने के बाद उसकी हत्या की गई और इस पूरी मामले को राजनीतिक कारणों से दबाने की कोशिश की गई। इस मामले को लेकर दिशा के पिता ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर शिवसेना (UBT) के मुखिया उद्धव ठाकरे के बेटी आदित्य ठाकरे (Aditya Thackeray) पर गंभीर आरोप लगाए हैं और मांग की है कि इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के साथ आदित्य ठाकरे (Aditya Thackeray) के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया जाए।  दिशा सालियान की फ्रेंड्स और बॉयफ्रेंड ने क्या कहा दिशा के पिता के इस याचिका का जवाब पेश करते हुए राज्य सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) को बताया कि मृतका के पिता द्वारा जो आरोप लगाए हैं, वे आधारहीन हैं। क्योंकि पुलिस SIT की जांच में दिशा की फ्रेंड्स ने बताया कि वह अपने परिवारिक विवाद और बिजनेस डील नहीं पूरी होने के कारण काफी परेशान थी। दिशा सालियान (Disha Salian Case) के बॉयफ्रेंड रोहन रॉय ने भी पुलिस को दिशा के फ्लैट से गिरने की परिस्थितियों के बारे में विस्तार से बताया है। पुलिस के अनुसार, जिस दिन दिशा की मौत हुई, उस रात वह फ्लैट पर दोस्तों के साथ पार्टी कर रही थी। मौत से पहले दिशा बहुत ज्यादा नशे में थी। इन दावों की पुष्टि फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ने भी की है। राज्य सरकार के जवाब में कहा गया है कि उस रात मौजूद सभी गवाहों के बयान एक जैसे हैं। इन सबूतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि दिशा ने आत्महत्या करने के लिए खुद ही खिड़की से छलांग लगा दी थी।  इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  आदित्य ठाकरे ने खुद को बताया निर्दोष दिशा सालियान केस में एक तरफ जहां राज्य सरकार ने आदित्य ठाकरे को निर्दोष बताया है, तो वहीं आदित्य ठाकरे ने खुद हाई कोर्ट में एक हस्तक्षेप याचिका दायर कर मामले की जल्द से जल्द सुनवाई करने की मांग की है। आदित्य ठाकरने ने अपनी याचिका में कहा कि हाई कोर्ट के पूर्व के आदेशों से उन पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वे महाराष्ट्र के एक बहुत ही प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से संबंध रखते हैं। जिसकी वजह से उन्हें और उनके परिवार को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। इस केस से हमारा कोई लेना-देना नहीं है, जबरदन मुझ पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद इस केस की सुनवाई दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। Latest News in Hindi Today Hindi news Bombay High Court #DishaSalianCase #AadityaThackeray #BombayHighCourt #MaharashtraGovernment #BreakingNews

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ChatGPT

ChatGPT से पूछने से पहले सोचें, 5 सवाल जो आपको मुश्किल में डाल सकते हैं

चैटजीपीटी (ChatGPT) एक ऐसा नाम है, जिसके बारे में आजकल हर कोई जानता है। इस टूल को लगभग तीन साल पहले लांच किया गया था और उसके बाद से यह सबकी पहली पसंद बन चुका है। चाहे कोई रेसिपी जाननी हो या कोई पढाई से संबंधित सवाल हर प्रश्न का उत्तर है इस टूल के पास। ऐसा भी माना जा रहा है कि इससे हर रोज लगभग 10 करोड़ सवाल पूछे जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसके इस्तेमाल से लोगों का जीवन आसान हुआ है। बस एक ही क्लिक कर आप किसी भी तरह की जानकारी पा सकते हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि कुछ ऐसे सवाल भी हैं जिन्हें आपको चैटजीपीटी (ChatGPT) से नहीं पूछना चाहिए? यह सवाल आपके लिए समस्या का कारण बन सकते हैं। आइए जानें कौन सी हैं वो बातें जो चैटजीपीटी से कभी नहीं पूछनी चाहिए (Never ask these things to ChatGPT)? बातें जो चैटजीपीटी से कभी नहीं पूछनी चाहिए (Never ask these things to ChatGPT): पाएं जानकारी चैटजीपीटी (ChatGPT) स्मार्ट है और यह किसी भी सवाल का उत्तर दे सकता है, लेकिन इसे भी कुछ खास प्रश्नों का उत्तर देने की अनुमति नहीं है। दरअसल यह बहुत सख्त नियमों का पालन करता है कि किन सवालों का उत्तर इसे देना और किसका नहीं। आइए जानें कौन सी हैं वो बातें जो चैटजीपीटी से कभी नहीं पूछनी चाहिए (Never ask these things to ChatGPT): हेल्थ प्रॉब्लम्स से संबंधित सवाल अगर आप बीमार हैं या आपको कोई हेल्थ प्रॉब्लम है, तो चैटजीपीटी (ChatGPT) से इसके बारे में पूछने से बचें। यह टूल आपकी हेल्थ समस्या से जुड़े सवालों के जवाब देने की कोशिश तो करेगा लेकिन यह समाधान आपके लिए समस्या का कारण बन सकता है। क्योंकि, न तो यह डॉक्टर की तरह आपको एग्जामिन कर सकता है और न ही आपकी समस्या का निदान कर सकता है। इसलिए, फिजिकल प्रॉब्लम्स, स्ट्रेस, एंग्जायटी आदि से जुड़े सवालों को इससे पूछने से बचें। फाइनेंस या टैक्स संबंधी सवाल चैटजीपीटी (ChatGPT) आपको केवल फाइनेंस की डेफिनेशन बता सकता है लेकिन इसे आपकी आय, खर्च और टेक्स स्थिति आदि के बारे में जानकारी नहीं है। ऐसे में चैटबोट (Chatbot) की सलाह बहुत ही पुरानी या नुकसानदायक हो सकती है। यह आपको गलत गाइड भी कर सकता है। यही नहीं, अगर आप इससे अपनी बैंक डिटेल्स या ऐसी अन्य डिटेल्स शेयर करते हैं तो यह आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसके लिए हमेशा स्पेशलिस्ट से ही सलाह लें। कानून से जुड़ी जानकारी  चैटजीपीटी (ChatGPT) आपको सिर्फ लीगल टर्म्स के बारे में बता सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल कभी भी कानून से जुड़ी जानकारी लेने और अपनी वसीयत या लीगल कॉन्ट्रैक्ट्स लिखने के लिए न करें। कानून राज्य और काउंटी के अनुसार अलग हो सकते हैं और छोटी गलतियां भी इसे इनवैलिड बना सकती हैं। आप इस टूल का इस्तेमाल बेसिक चीजों को समझने के लिए कर सकते हैं लेकिन लीगल प्रोटेक्शन के लिए किसी लाइसेंस प्राप्त वकील द्वारा दस्तावेज तैयार करवाएं। इसे भी पढ़ें:- Govt Warns Online Shoppers: सरकार की यह सलाह नहीं मानने पर अपना सबकुछ गँवा सकते हैं ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले हिंसक जानकारी  कभी भी चैटजीपीटी (ChatGPT) से किसी हिंसक चीज के बारे में जानकारी न लें। क्योंकि यह गंभीर हो सकता है। अगर आप कोई हिंसक सवाल पूछते हैं, तो यह टूल इसके लिए तुरंत मना कर देता है। चैटबोट (Chatbot) को सख्त सुरक्षा और नैतिक दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए प्रोग्राम किया गया है, इसलिए यदि आप कुछ अनुचित पूछ रहे हैं, तो यह मना कर सकता है। हैकिंग या किसी की प्राइवेट इंफॉर्मेशन  अगर आप चैटजीपीटी (ChatGPT) से हैकिंग या किसी की प्राइवेट इंफॉर्मेशन के बारे में पूछते हैं तो यह गलत है। हैकिंग के बारे में पूछना पूरी तरह से इलीगल है। इसके साथ ही किसी के फोन नंबर, एड्रेस या फाइनेंशियल डिटेल के बारे में भी पूछना भी सही नहीं है। चैटबोट (Chatbot) से यह सब पूछने पर वो इसका जवाब देने से मना कर देगा क्योंकि उसे ऐसे ही प्रोग्राम किया गया है।  नोट:- यहां दी गई जानकारी रिसर्च के आधार पर दी गई है। अधिक जानकारी के लिए आप आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं या गूगल सर्च करें। Latest News in Hindi Today Hindi  ChatGPT #ChatGPT #AIquestions #AvoidAsking #OpenAIRules #AIEthics #ChatGPTTips #MisuseOfAI #ChatGPTWarning

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viral fever symptoms

वायरल फीवर क्या है, इसके कारण, लक्षण और उपचार, जानिए किस तरह से करें इससे बचाव

वायरल फीवर (Viral fever) एक ऐसी हेल्थ कंडीशन है जो किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है। इसका कारण कई वायरल इंफेक्शंस को माना जाता है। इस समस्या में रोगी के शरीर का तापमान बढ़ जाता है, जो हानिकारक वायरस के प्रति हमारे इम्यून सिस्टम के रिस्पांस का संकेत है। इस समस्या के कई लक्षण हो सकते हैं जैसे शरीर में दर्द, थकावट आदि और गंभीर मामलों में इसके कारण रोगी को कई कॉम्प्लीकेशन्स का सामना भी करना पड़ सकता है। बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों के लिए वायरल फीवर (Viral fever) चिंता का विषय हो सकता है। आइए जानें वायरल फीवर के लक्षणों (Symptoms of Viral Fever) के बारे में। इसके उपचार और बचने के तरीकों के बारे में भी जानें। वायरल फीवर के लक्षण (Symptoms of Viral Fever) हेल्थलाइन (Healthline) के अनुसार वायरल फीवर (Viral fever) में रोगी को हाई टेम्प्रेचर की समस्या हो सकती है। उनके शरीर का तापमान 103°F से भी अधिक बढ़ सकता है। मनुष्यों को कई तरह के वायरल इंफेक्शंस प्रभावित करते हैं। इनमें से कई इंफेक्शंस में रोगी को कम बुखार होता है जबकि कई वायरल इंफेक्शंस जैसे डेंगू में रोगी को हाई फीवर होता है। वायरल फीवर के लक्षण (Symptoms of Viral Fever) इस प्रकार हो सकते हैं: यह लक्षण अधिकतर रोगी में कुछ दिनों तक ही दिखाई देते हैं।  अब जानिए वायरल फीवर (Viral fever) के कारण क्या हो सकते हैं? वायरल फीवर के कारण दूषित फ़ूड और ड्रिंक्स भी इस इंफेक्शन (Infection) का कारण बन सकती हैं।  वायरल फीवर का उपचार ज्यादातर वायरल फीवर (Viral fever) के मामलों में खास उपचार की जरूरत नहीं होती है है। इसके उपचार के तरीकों में लक्षणों से आराम पाने पर फोकस किया जाता है। इसके सामान्य उपचार के तरीके इस प्रकार हैं: बुखार कम करने के लिए ओवर-द-काउंटर दवाईयां लेना जैसे आइबूप्रोफेन और एसिटामिनोफेन आदि। इसे भी पढ़ें:- सिर और गर्दन के कैंसर के 5 शुरुआती संकेत जिन्हें कभी भी नहीं करना चाहिए नजरअंदाज वायरल फीवर से कैसे बचें? नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi news Viral fever #viralfever #feversymptoms #healthtips #viralprevention #fevertreatment

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90 करोड़ का कर्ज और 2000 करोड़ की संपत्ति: नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया-राहुल गांधी पर ED के गंभीर आरोप

नेशनल हेराल्ड मामले में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में इस बहुचर्चित केस की सुनवाई बुधवार को शुरू हुई। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट में जो दलीलें रखीं, उन्होंने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर हलचल पैदा कर दी है। नेशनल हेराल्ड केस (National Herald case) में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और सांसद राहुल गांधी (Sonia Gandhi and Rahul Gandhi) समेत कई वरिष्ठ नेताओं को आरोपी बनाया गया है। क्या है नेशनल हेराल्ड मामला? नेशनल हेराल्ड अखबार (National Herald Newspaper) की स्थापना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1938 में की थी। इसका प्रकाशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) के जरिए होता था। समय के साथ अखबार का संचालन बंद हो गया, लेकिन AJL के पास देशभर में करीब 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियां थीं। आरोप है कि कांग्रेस पार्टी (Congress Party) ने AJL को 90 करोड़ रुपये का कर्ज दिया, जो बाद में वापस नहीं लिया गया। इसके बाद 2010 में यंग इंडिया (Young India) नाम की कंपनी बनाई गई, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी (Sonia Gandhi and Rahul Gandhi) की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसी यंग इंडिया को AJL के सारे शेयर ट्रांसफर कर दिए गए, जिससे संपत्ति का मालिकाना हक कांग्रेस नेताओं के पास चला गया। ईडी का आरोप: कर्ज के बहाने संपत्ति पर कब्जा ASG एसवी राजू ने कोर्ट में कहा कि यह पूरा मामला एक योजनाबद्ध साजिश का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि AJL घाटे में चल रही कंपनी थी, लेकिन संपत्ति थी। कांग्रेस पार्टी (Congress Party) ने उसे 90 करोड़ रुपये का कर्ज दिया और बाद में ‘यंग इंडिया’ कंपनी के जरिए इस कर्ज के नाम पर 2000 करोड़ की संपत्ति अपने नियंत्रण में ले ली। ईडी (ED) के अनुसार यह पूरा लेनदेन कागजों पर ही हुआ और असल में न कर्ज की वसूली हुई, न कोई वाणिज्यिक उद्देश्य था। सिर्फ राजनीतिक और निजी लाभ के लिए इसे अंजाम दिया गया। किराया और चंदे में फर्जीवाड़े के आरोप ED ने यह भी दावा किया कि AJL को कई सालों तक फर्जी किराया और चंदा मिलता रहा, जिसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के निर्देश पर ट्रांसफर किया गया। एजेंसी ने कहा कि ये पैसे भी एक प्रकार से अपराध की आय (Proceeds of crime) हैं। तफ्तीश के दौरान यह बात भी सामने आई कि कुछ नामी नेताओं जैसे डीके शिवकुमार, रेवंत रेड्डी और दिवंगत नेता ऑस्कर फर्नांडिस और मोतीलाल वोरा ने भी इस मामले में चंदा या शेयर ट्रांसफर के रूप में भूमिका निभाई थी। कोर्ट में क्या हुआ? सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने पूछा कि क्या यह मामला अभी केवल अपराध के संज्ञान तक सीमित है, तो ASG राजू ने कहा कि हां, इस चरण पर सिर्फ संज्ञान लिया जाना चाहिए। समन की प्रक्रिया बाद में डिस्चार्ज एप्लिकेशन पर निर्भर करेगी। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि वे जल्द ही अपनी बहस पूरी करेंगे, जिसके बाद अगली प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कांग्रेस का पक्ष कांग्रेस पार्टी (Congress Party) इन आरोपों को पहले से ही राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है। पार्टी का कहना है कि यह मामला 2012 से ही राजनीतिक प्रतिशोध का प्रतीक बन चुका है, और यह केवल विपक्षी नेताओं को दबाने की एक रणनीति है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Congress Leader Rahul Gandhi) ने पहले भी संसद और सार्वजनिक मंचों से यह बात कही है कि बीजेपी उनके और उनके परिवार के खिलाफ झूठे मामलों का सहारा ले रही है, ताकि वे जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटका सकें। इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  मामला कैसे शुरू हुआ? यह केस सबसे पहले बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी (BJP Leader Subramanian Swamy) की शिकायत पर 2012 में सामने आया था। उन्होंने आरोप लगाया कि यंग इंडिया के जरिए गांधी परिवार ने 2000 करोड़ रुपये की संपत्ति पर अवैध रूप से कब्जा किया है। इसके बाद मामला कोर्ट और ईडी (ED) के पास गया और अब सालों बाद इसकी सुनवाई एक निर्णायक मोड़ पर पहुंची है। आगे क्या हो सकता है? कोर्ट में अभी केवल प्रारंभिक बहस हो रही है, लेकिन अगर मामले में अपराध का संज्ञान लिया जाता है और समन जारी होता है, तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी (Sonia Gandhi and Rahul Gandhi) को अदालत में पेश होना पड़ सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अदालत इस पूरे प्रकरण को केवल वित्तीय लेनदेन मानेगी या इसके पीछे राजनीतिक साजिश की परतें भी खोलेगी? नेशनल हेराल्ड मामला (National Herald case) एक बार फिर सुर्खियों में है और यह देखना दिलचस्प होगा कि कानूनी प्रक्रिया आगे क्या मोड़ लेती है। क्या गांधी परिवार निर्दोष साबित होंगे या यह मामला उनके राजनीतिक करियर पर एक और बोझ बन जाएगा? इस केस की हर सुनवाई अब राजनीतिक और कानूनी दृष्टिकोण से अहम होती जा रही है। Latest News in Hindi Today Hindi news  Rahul Gandhi #SoniaGandhi #RahulGandhi #NationalHeraldCase #EDInvestigation #Congress #2000CroreAssets #90CroreDebt #BreakingNews #IndianPolitics

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Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute: जमीन और जेवर देख ललचाई बहु ने सास की करवाई हत्या, इस बात से थी नाराज

कहने की जुरूरत नहीं कि आजकल रिश्तों की कोई मर्यादा बची ही नहीं है। कभी अवैध संबंधों के चलते तो कभी प्रॉपर्टी के चलते अपने ही अपनों की जान के प्यासे बने हुए हैं। ताजा मामला यूपी के झांसी का है, जहाँ एक कलयुगी बहू ने अपने हिस्से की जमीन को हथियाने और घर पर रखे जेवरात पर हाथ साफ़ करने के इरादे से अपनी सास की हत्या करवा दी। घटना के 5 दिन बाद पुलिस ने इस पूरे मामले का खुलासा किया (Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute) है। जानकारी के मुताबिक घटना झाँसी स्थित टहरौली थाना क्षेत्र के कुम्हरिया गांव की है, जहाँ एक बहू ने अपनी बहन के प्रेमी के साथ मिलकर लाखों के जेवर और अपने हिस्से की जमीन को हथियाने चक्कर में अपनी सास की हत्या करवा दी। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए हत्यारोपी बहू और उसकी बहन को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है।  सास सुशीला जमीन बेचने से साफ इनकार कर रही (Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute) थी हत्या के पीछे संपत्ति का विवाद खुलकर आया। दरअसल, मृतका सुशीला के छोटे बेटे संतोष की पत्नी पूजा चाहती थी कि परिवार की 16 बीघे की जमीन में से उसे 8 बीघे का हिस्सा दे दिया जाए। इसे बेचकर वह पति के साथ ग्वालियर में बसना चाहती थी। इस बात पर पूजा के पति संतोष और ससुर अजय की सहमति तो थी, लेकिन सुशीला जमीन बेचने से साफ इनकार कर रही (Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute) थी। इसे लेकर पिछले एक साल से घर में विवाद चल रहा था। सास के रुख से नाराज पूजा ने खतरनाक योजना बनाई और ग्वालियर में रहने वाली अपनी बहन कमला को अपनी सास की हत्या के लिए राजी किया। सास की हत्या का शक न हो इसके लिए पूजा अपने मायके चली गई और अपने ससुर को भी मायके बुला लिया। ताकि सास घर में अकेली बचे। प्लान के मुताबिक 24 जून को अनिल और पूजा की छोटी बहन कमला रात के अंधेरे में घर में गए और घर में अकेली रह रही सास सुशीला को जहरीला इंजेक्शन लगाने के बाद गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। सुशीला की हत्या करने के बाद अनिल और कमला दोनों 8 लाख रुपये की कीमत के जेवरात लेकर मौके से फरार हो गए।  वह अपने हिस्से की 8 बीघा जमीन बेचकर ग्वालियर में रहना चाहती (Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute) थी इस हत्या से इलाके में हड़कंप मच गया। मृतका सुशीला के पति ने पूरे मामले की रिपोर्ट टहरौली थाने में दर्ज कराई। पुलिस ने जैसे ही पूरे मामले की जांच-पड़ताल शुरू की, सबसे पहले शक की सुई बहू पूजा पर ही गई। जांच के दौरान पुलिस को जब कुछ सबूत हाथ लगे, तो पूजा को हिरासत में ले लिया। शुरुआत में तो उसने पुलिस को छकाने की खूब कोशिश की, लेकिन पुलिसिया पूछताछ में टूट गई और उसने सास की हत्या करवाने का जुर्म कबूल कर लिया।  कहने की जरूरत नहीं, 55 साल की सुशीला देवी की हत्या के लिए उसकी अपनी ही बहू ने जो प्लान बनाया उसको सुनकर पुलिस भी सन्न रह गई। पूजा ने बताया कि जेठ और ससुर के पास 16 बीघा जमीन (Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute) है। वह अपने हिस्से की 8 बीघा जमीन बेचकर ग्वालियर में रहना चाहती थी। जेठ और ससुर तैयार थे, लेकिन सास सुशीला मना कर रही थी। इसीलिए उसकी हत्या करवा दी।  इसे भी पढ़ें:- आरजी कर कांड के बाद अब कोलकाता के लॉ कॉलेज में छात्रा के साथ हुआ सामूहिक दुष्कर्म पुलिस ने आरोपी के पास से जेवरात बरामद कर लिए (Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute) हैं हत्या के बाद से बहन का प्रेमी फरार चल रहा था। इस बीच पुलिस पिछले कई दिनों से उसकी छोटी बहन कमला के प्रेमी अनिल वर्मा की तलाश में जुटी थी कि देर रात पुलिस को गुप्त सूचना मिली की हत्यारोपी अनिल वर्मा लूट के जेवरात को लेकर अपने किसी परिचित के घर मोटरसाइकिल से बेचने जा रहा है। मुखबिर की सूचना के आधार पर पुलिस ने जैसे ही अनिल को रोकने की कोशिश की उसने पुलिस पर फायरिंग कर (Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute) दी। जवाबी फायरिंग में अनिल को पुलिस की गोली लग गई। इलाज के लिए आरोपी को मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवाया है। पुलिस ने उसके पास से जेवरात बरामद कर लिए हैं।  Latest News in Hindi Today Hindi Daughter-in-law Kills Over Property, Jewelry Dispute #daughterinlaw #murdercase #propertydispute #familycrime #crimealert #jewelrydispute #indianews #shockingcrime

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Health Ministry confirms no link between COVID-19

No Link Between COVID Vaccine and Heart Attacks: स्वास्थ्य मंत्रालय का बड़ा बयान, “कोरोना वैक्सीन का हार्ट अटैक से कोई संबंध नहीं” 

बीते दिनों दिल का दौरा पड़ने से मौतों के मद्देनजर स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि कोरोना वैक्सीन का हार्ट अटैक से कोई संबंध नहीं है। दरअसल, कर्नाटक में पिछले महीने में दिल का दौरा पड़ने से 20 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इसके लिए कनार्टक की सरकार ने कोरोना वैकसीन को जिम्मेदार ठहराया गया था। इसके बाद कोरोना वैक्सीन को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई थी। अचानक दिल का दौरा पड़ने से होने वाली मौतों की वजह वैक्सीन को बताते हुए सवाल उठाए जा रहे थे। इस बीच मंत्रालय ने इन सवालों का जवाब एक मेडिकल रिसर्च के आधार पर दे दिया है। इस मुद्दे पर देश की दो सबसे बड़ी मेडिकल संस्थाओं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने बड़ी और गहरी जांच की है, जिसमें साफ कहा गया है कि “कोविड वैक्सीन और अचानक मौतों का कोई सीधा संबंध नहीं (No Link Between COVID Vaccine and Heart Attacks) है।”  अचानक हुई मौतें कोरोना वैक्सीन का दुष्प्रभाव नहीं हैं, बल्कि जीवनशैली और पुरानी बीमारी मौत होने का प्रमुख कारण (No Link Between COVID Vaccine and Heart Attacks) है बता दें कि आईसीएमआर और एम्स की रिसर्च में स्पष्ट हो गया है कि कोरोना वैक्सीन और कर्नाटक में हो रही अचानक मौतों का कोई संबंध (No Link Between COVID Vaccine and Heart Attacks) नहीं है। दरअसल, यह रिसर्च कोरोना काल के बाद अचानक हुई मौतों को लेकर की गई थी। रिसर्च में निष्कर्ष निकला कि अचानक हुई मौतें कोरोना वैक्सीन का दुष्प्रभाव नहीं हैं, बल्कि जीवनशैली और पुरानी बीमारी मौत होने का प्रमुख कारण है। इस रिपोर्ट को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि “देश में कई एजेंसियों के माध्यम से अचानक होने वाली मौतों के मामलों की जांच की गई है, जिनसे यह साबित हो गया है कि कोविड-19 टीकाकरण और देश में अचानक होने वाली मौतों की खबरों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। हालांकि इस रिपोर्ट से पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी कहा था कि “अचानक मौत की वजह कोविड वैक्सीन नहीं है। उस दौरान नड्डा ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था कि वैक्सीनेशन से जोखिम बढ़ा नहीं बल्कि कम हुआ है।  इसे भी पढ़ें:- सिर और गर्दन के कैंसर के 5 शुरुआती संकेत जिन्हें कभी भी नहीं करना चाहिए नजरअंदाज कर्नाटक के हासन जिले में दिल का दौरा पड़ने से 20 से जयादा लोगों की हो (No Link Between COVID Vaccine and Heart Attacks) चुकी है मौत  गौरतलब हो कि मई-जून 2025 के बीच कर्नाटक के हासन जिले में दिल का दौरा पड़ने से 20 से जयादा लोगों की मौत हो चुकी है। अचानक हुई इन मौतों का कारण कोरोना वैक्सीन का साइड इफेक्ट बताया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कोविड वैक्सीन के संभावित दुष्प्रभावों की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की। इस समिति का नेतृत्व जयदेव इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोवैस्कुलर साइंसेज एंड रिसर्च के निदेशक डॉ. केएस रविंद्रनाथ करेंगे। जांच 10 दिन में पूरी करके रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया गया है। कर्नाटक के CM सिद्धारमैया ने भी सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर एक पोस्ट लिखी, जिसमें उन्होंने कहा कि “दुनियाभर में हुई रिसर्च में साबित हुआ है कि कोरोना वैक्सीन के दुष्प्रभाव होते हैं। जल्दबाजी में वैक्सीन को परमिशन दी गई, जो अचानक हो रही मौतों का कारण हो सकती है।” कनार्टक के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2 साल में हासन जिले में 507 हार्ट अटैक के मरीज रिकॉर्ड हुए। इनमें से 190 लोगों की मौत हुई है। कहने की जरूरत नहीं, कोरोना महामारी के बाद हार्ट अटैक के मामले तेजी से बढ़े हैं। कई लोगों ने कोविड वैक्सीन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था लेकिन,आईसीएमआर और एम्स की ताजा रिपोर्ट से पता चला है कि वैक्सीन और हार्ट अटैक के बीच कोई सीधा संबंध नहीं (No Link Between COVID Vaccine and Heart Attacks) है।  Latest News in Hindi Today Hindi news COVID Vaccine #covidvaccine #heartattack #healthministry #vaccinesafety #covid19update #govtstatement #coronavirusnews #vaccinefacts #healthnews #covidtruth

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app-based cab services

App-based Cab Services अब होगी महंगी: क्या है केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन्स? 

आज के डिजिटल दौर में ओला (Ola), उबर (Uber) और रैपिडो (Rapido) जैसी ऐप-आधारित कैब सेवाएं (App-based Cab Services) आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। ऑफिस जाना हो, स्टेशन पहुंचना हो या किसी भी जगह जाने के लिए कैब चाहिए तो इन अलग-अलग कैब सेवाओं (Cab Service) की मदद से कहीं भी आना-जानाआसान बना दिया है। लेकिन अब इन सेवाओं का उपयोग आपकी जेब पर पहले से ज्यादा बोझ डाल सकता है। हाल ही में केंद्र सरकार (Central Government)  द्वारा जारी की गई नई गाइडलाइन्स से यह साफ होता है कि आने वाले दिनों में कैब और बाइक, टैक्सी की सवारी महंगी हो सकती है। App-based Cab Services: क्या हैं नई गाइडलाइन्स? सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे आगामी तीन महीनों में नई कैब एग्रीगेटर पॉलिसी (Cab Aggregator Policy) को लागू करें। इसके तहत ऐप-आधारित टैक्सी कंपनियों (App-based Cab Services) को पीक ऑवर्स (Peak Hours) के दौरान बेस फेयर का दो गुना तक किराया वसूलने की अनुमति दी गई है। इसे सर्ज प्राइजिंग कहा जाता है। अब तक यह सीमा 1.5 थी यानी अगर किसी शहर में बेस फेयर 100 रुपये है, तो कंपनियां 150 रुपये तक चार्ज कर सकती थीं। लेकिन अब यह सीमा 200 रुपये तक बढ़ सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को अधिक भुगतान करना पड़ सकता है। क्यों लिया गया यह फैसला? सरकार का कहना है कि यह फैसला कैब एग्रीगेटर्स को पीक ऑवर्स में ज्यादा ड्राइवर उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहित करेगा, जिससे यात्रियों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। साथ ही कंपनियों को अधिक लचीलापन (Flexibility) मिलेगा ताकि वे मांग के अनुसार सेवाएं दे सकें। बाइक टैक्सी सेवा को मिली मंजूरी नई गाइडलाइन में एक और अहम फैसला लिया गया है। अब नॉन-ट्रांसपोर्ट व्हीकल्स (Non-Transport Vehicle) यानी सफेद नंबर प्लेट वाली निजी बाइक्स को भी शेयर्ड मोबिलिटी सर्विस देने की अनुमति दे दी गई है। पहले केवल येलो नंबर प्लेट वाली कमर्शियल बाइक्स (Commercial bike) ही टैक्सी सेवा (Taxi Service) दे सकती थीं, जिसके लिए भारी-भरकम टैक्स और रजिस्ट्रेशन की जरूरत होती थी। इस फैसले के तहत कोई भी आम नागरिक, जिसके पास निजी बाइक है अब वे ओला (Ola), उबर (Uber) या रैपिडो (Rapido) जैसे प्लेटफॉर्म पर ट्रेवलर्स को लिफ्ट दे सकते हैं जिससे उनकी अर्निंग भी हो सकती है। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। राज्य सरकारें अब इन सेवाओं पर रोजाना, एक सप्ताह या फिर 15 दिनों पर फीस लगा सकती है, जिससे राजस्व भी बढ़ेगा। राइड कैंसिलेशन पर कड़ा जुर्माना नई गाइडलाइन में एक और बड़ा बदलाव यह है कि बिना वजह राइड कैंसिल (Ride Cancellation) करने पर ड्राइवर या यूज़र, दोनों पर 10% या ज्यादा से ज्यादा 100 रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इससे यात्रियों और ड्राइवरों दोनों की जिम्मेदारी तय होगी और सेवा की गुणवत्ता में सुधार आएगा। ड्राइवरों के लिए इंश्योरेंस और ट्रेनिंग जरूरी ड्राइवरों की सुरक्षा और कल्याण को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सभी कैब ड्राइवरों के लिए अनिवार्य कर दिया है कि: उन्हें 5 रुपये लाख का हेल्थ इंश्योरेंस (Health Insurance) और 10 लाख रुपये का टर्म लाइफ इंश्योरेंस (Term Life Insurance) मिलेगा। इसके साथ ही उन्हें हर साल ट्रेनिंग लेना भी अनिवार्य होगा, जिससे न सिर्फ ड्राइवरों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि सर्विस भी बेहतर होगी। क्या कहना है सर्विस प्रोवाइडर का?  मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रैपिडो (Rapido) ने इन गाइडलाइन्स को विकसित भारत की दिशा में मील का पत्थर कहा है और दावा किया है कि इससे कनेक्टिविटी बेहतर होगी। वहीं उबर ने भी इस फैसले का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि सभी राज्य समय पर इस गाइडलाइन को लागू करेंगे। इसे भी पढ़ें:- कौन सा रिचार्ज प्लान आपके लिए हो सकता है बेस्ट? क्या होगा आम जनता पर असर? इन गाइडलाइन्स का मिला-जुला असर देखा जा सकता है: सरकार द्वारा लागू की गई यह नई कैब पॉलिसी उपभोक्ताओं, ड्राइवरों और कंपनियों के लिए कई तरह के बदलाव लेकर आई है। हालांकि इससे तत्काल प्रभाव में यात्रा महंगी हो सकती है, लेकिन क्या यह नीतियां स्मार्ट मोबिलिटी, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती हैं या नहीं ये तो आने वाले समय में पता चलेगा।  Latest News in Hindi Today Hindi Rapido #cabfarehike2025 #appbasedcabs #govtrules #cabservicesindia #ridenews #taxihike #centralgovt #cabguidelines

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इटावा कांड के बाद ब्राह्मण विरोधी सियासत कहीं अखिलेश पर पड़ न जाए भारी! यूपी की राजनीति में ब्राह्मणों का कितना वर्चास्व?

उत्तर प्रदेश की राजनीति को इन दिनों जातीय रंग में रंगी जा रही है। इटावा जिले के दांदरपुर इलाके में यादव कथावाचकों का सिर मुंडवा कर पिटाई करने और चुटिया काट के मूत्र का छिड़काव किए जाने की घटना के बाद से यहां कि सियासत यादव बनाम ब्राह्मण की हो चुकी है। जाति के इस सियायत में सबसे आगे समाजवादी पार्टी (SP) नजर आ रही है। सपा के मुखिया अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) अभी तक पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए (PDA) की राजनीति करते नजर आ रहे थे, लेकिन इस घटना से वे पीडीए को भुला यादव समाज की राजनीति करते नजर आ रहे हैं।  यादव कथावाचकों के पक्ष में उतरे सपा (SP) प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने तो ब्राह्मण समाज को चेतावनी देते हुए यहां तक कह दिया कि कृष्ण भक्तों को अगर कथा कहने से रोका गया तो यह अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने ब्राह्मणों पर तंज कसते हुए कहा कि प्रभुत्ववादी और वर्चस्ववादी लोग घोषित करें कि वो पीडीए समाज द्वारा दिया गए दान और चढ़ावा को नहीं लेंगे। अखिलेश (Akhilesh Yadav) के इस बयानबाजी के बाद अहीर रेजिमेंट समेत कई यादव संगठनों ने अब ब्राह्मणों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इटावा की इस घटना के बाद सपा पार्टी जिस तरह से इसे जातीय रंग देने में जुटी है, उससे सियासी जानकार कहने लगे हैं कि, कहीं अखिलेश यादव का यह एंटी ब्राह्मण कार्ड उन पर ही बैकफायर ना कर जाए? आइये जानते हैं कि यूपी की राजनीति में ब्राह्मण समाज किस तरह की भूमिका निभाती है।    यूपी में ब्राह्मण वोटर 10 फीसदी, लेकिन सियासत में वर्चस्व उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या (Brahmin Voters In UP) करीब 10 फीसदी है, लेकिन इसके बाद भी राज्य (Akhilesh Yadav) की सियासत में ब्राह्मणों का वर्चस्व हमेशा से रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यूपी की करीब सभी विधानसभा सीटों पर कम से कम पांच से 10 हजार ब्राह्मण वोटर हैं, जो जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि, राज्य के करीब 30 जिलों की 100 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मणों (Brahmin Voters In UP) का दबदबा है, जो सूबे की सत्ता तक पहुंचने के लिए जरूरी 202 के जादुई आंकड़े का लगभग आधा है। राज्य के वाराणसी, जौनपुर, गोरखपुर, बलिया, महराजगंज, गोंडा, बस्ती, अयोध्या, सुल्तानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, प्रयागराज, कानपुर, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई और झांसी जैसे जिले ब्राह्मणों के गढ़ माने जाते हैं।  जिसके साथ गए ब्राह्मण, उसकी बनी सरकार यूपी में ब्राह्मण वोटर संख्या (Brahmin Voters In UP) में भले ही कम नजर आते हों, लेकिन राज्य की सत्ता तक वही पहुंचता है, जिसके साथ ये रहते हैं। ब्राह्मण समाज शुरुआती दिनों में कांग्रेस के साथ रही, जिसकी वजह से यह पार्टी लंबे समय तक यूपी की सत्ता में रही। लेकिन 1989 में भाजपा ने जब राम मंदिर आंदोलन शुरू किया और मंडल-कमंडल की राजनीति शुरू हुई तो ब्राह्मण भाजपा के साथ आ गए, जिससे इसने भी राज्य में सत्ता का स्वाद चखा। लेकिन साल 2002 में ठाकुर-ब्राह्मण राजनीति शुरू होने के कारण यह समाज भाजपा से नाराज हो गया। इसी दौरान मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने ब्राह्मण सम्मेलनों के जरिये इस समाज को अपने साथ लाने की कोशिश की। मायावती की 2007 के विधानसभा चुनाव में 56 ब्राह्मणों को अपनी पार्टी का टिकट दिया और इसमें से 41 ब्राह्मण उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। साथ ही बसपा ने भी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ राज्य में सरकार बनाई। इसके बाद सपा ने भी ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश की और साल 2012 में इस समाज के बदौलत बड़ी जीत के साथ सत्ता में आई। हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव से ब्राह्मण समाज का एक बड़ा वर्ग भाजपा के पास चला गया और अभी तक इस पार्टी के साथ बना हुआ है।  इसे भी पढ़ें:- विजय दिवस के पहले नारायण राणे ने राज को याद दिलाया उद्धव का किया अपमान, कही यह बात  अखिलेश के 5 विधायक और एक सांसद ब्राह्मण  यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में 52 ब्राह्मण जीत हासिल कर विधानसभा पहुंचे, इसमें से भाजपा के 46 विधायकों के बाद सबसे ज्यादा (5) ब्राह्मण विधायक सपा के पास हैं। इसके अलावा सपा के पास एक ब्राह्मण सांसद भी है। अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav)बीते कुछ माह से ब्राह्मणों को पीडीए (PDA) के साथ जोड़कर नया गणित गढ़ने में जुटे थे, लेकिन इटावा की इस घटना के बाद अखिलेश यादव ब्राह्मणों के खिलाफ नजर आने लगे हैं। ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि इस घटना को जातीयता के रंग में रंगने से अखिलेश यादव को नफा होगा या नुकसान?  Latest News in Hindi Today Hindi news  Akhilesh Yadav #AkhileshYadav #EtawahCase #BrahminPolitics #UPElections #SamajwadiParty #BrahminVoteBank #UttarPradesh

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Dalai Lama Successor Selection Process

How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death: मौत के बाद चुना जाएगा दलाई लामा का उत्तराधिकारी, इस तरह होता है चुनाव

छह जुलाई 2025 को तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा 90 साल के हो जाएंगे। दलाई लामा का यह जन्मदिन कई मायनों में बेहद अलग और खास है, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि वह इस मौके पर अपने उत्तराधिकारी (Dalai Lama’s Successor) की घोषणा कर सकते हैं। इस मौके पर दुनियाभर के तिब्बती धर्मगुरु हिमाचल में उनके मठ एकजुट हो रहे हैं। तिब्बती मान्यताओं के अनुसार दलाई लामा का कोई चुनाव नहीं होता, बल्कि उन्हें खोजा जाता (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) है। यह प्रक्रिया इतनी रहस्यमयी है कि इसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। बता दें कि तिब्बती बौद्ध धर्म के मुताबिक जब वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु होती है, इसके बाद उनका पुनर्जन्म होता है। दलाई लामा की मृत्यु से पहले कुछ वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं को यह बताकर जाते हैं कि उनका पुनर्जन्म कहां होने वाला है। इसलिए जब वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु होती है, इसके बाद भिक्षु उनकी तलाश शुरू कर देते हैं। तिब्बती बौद्धों का मानना ​​है कि दलाई लामा का पुनर्जन्म उनकी आध्यात्मिक विरासत को जारी रखने के लिए होता है। गौरतलब हो कि मौजूदा दलाई लामा (तेनजिन ग्यात्सो) 14वें दलाई लामा हैं। छह जुलाई को 90 वर्ष के हो जाएंगे।  दलाई लामा की मृत्यु के 9 महीने बाद जन्में बच्चे को ढूंढा (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) जाता है बता दें कि दलाई लामा की मृत्यु के 9 महीने बाद जन्में बच्चे को ढूंढा (Dalai Lama’s Successor) जाता है। तिब्बती मान्यता के अनुसार दलाई लामा अपनी मृत्यु से पहले कुछ संकेत देते हैं। नए दलाई लामा की खोज के दौरान वरिष्ठ लामा अपने ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से प्राप्त संकेतों को समझने की कोशिश करते हैं। वे ल्हामो लात्सो नामक पवित्र झील के किनारे ध्यान करते हैं। जहाँ उन्हें किसी गांव का नाम, दिशा या कोई विशिष्ट दृश्य जैसे संकेतों की अनुभूति होती है। इन दिव्य संकेतों के आधार पर पुनर्जन्म लेने वाले बालक की तलाश शुरू की जाती (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) है। यह खोज कई वर्षों तक चल सकती है। इस बीच जब किसी बच्चे पर नए दलाई लामा होने का शक जाता है, उसे सीधे सर्वोच्च पद पर नहीं बैठा दिया जाता। बल्कि उसकी कठिन परीक्षा ली जाती है। सबसे पहले वरिष्ठ लामा उसके व्यवहार पर कड़ी नजर रखते हैं। इसके बाद उसे पुराने लामा की चीजों जैसे माला, छड़ी और कपड़ों की पहचान करने के लिए दिया जाता है। अगर बच्चा सही चुनाव करता है, तो फिर उसे बौद्ध लाकर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद सालों तक उसे बौद्ध धर्म, संस्कृत, तिब्बती संस्कृति और दर्शन की शिक्षा दी जाती है। दलाई लामा ने इस साल प्रकाशित अपनी किताब ‘वॉइस फॉर द वॉइसलेस’ में बताया था कि “उनका उत्तराधिकारी चीन से बाहर स्वतंत्र दुनिया में जन्म लेगा।  मैं तिब्बती बौद्ध परंपराओं के उच्च लामाओं, तिब्बती जनता और तिब्बती बौद्ध धर्म का पालन करने वाले अन्य संबंधित लोगों से परामर्श (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) करूंगा खैर, इस बीच तिब्बती बौद्धों के आध्यात्मिक प्रमुख दलाई लामा ने बुधवार, 2 जुलाई को इस बात की पुष्टि कर दी कि दुनिया को अगला दलाई लामा मिलेगा। दरअसल, बुधवार को दलाई लामा ने वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं से मुलाकात की और उसके बाद उन्होंने अपना बयान (Dalai Lama’s Successor) जारी किया। बयान में उन्होंने यह भी बताया कि अगले दलाई लामा का चुनाव कैसे होगा। उनके बयान के मुताबिक “24 सितंबर 2011 को, तिब्बती आध्यात्मिक परंपराओं के प्रमुखों की एक बैठक में, मैंने तिब्बत के भीतर और बाहर साथी तिब्बतियों, तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायियों और तिब्बत- तिब्बतियों के साथ संबंध रखने वाले लोगों के सामने एक बयान दिया था कि क्या दलाई लामा की संस्था जारी रहनी चाहिए। मैंने कहा कि “1969 में ही, मैंने स्पष्ट कर दिया था कि संबंधित लोगों को यह निर्णय लेना चाहिए कि क्या दलाई लामा का पुनर्जन्म भविष्य में भी जारी रहना चाहिए?” मैंने यह भी कहा कि “जब मैं लगभग नब्बे वर्ष का हो जाऊंगा तो मैं तिब्बती बौद्ध परंपराओं के उच्च लामाओं, तिब्बती जनता और तिब्बती बौद्ध धर्म का पालन करने वाले अन्य संबंधित लोगों से परामर्श (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) करूंगा, ताकि यह फिर से मूल्यांकन किया जा सके कि दलाई लामा की संस्था जारी रहनी चाहिए या नहीं?”  इसे भी पढ़ें:- मुखाग्नि से पहले क्यों किया जाता है सुहागिन स्त्री का सोलह श्रृंगार? मैं इस बात को दोहराता हूं कि गैडेन फोडरंग ट्रस्ट के पास भविष्य के पुनर्जन्म को मान्यता देने का एकमात्र अधिकार है- दलाई लामा उन्होंने आगे कहा कि “भले इस मुद्दे पर मेरी कोई सार्वजनिक चर्चा नहीं हुई है, लेकिन पिछले 14 वर्षों में तिब्बत की आध्यात्मिक परंपराओं के नेताओं, निर्वासित तिब्बती संसद के सदस्यों, विशेष आम सभा की बैठक में भाग लेने वालों, केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के सदस्यों, गैर सरकारी संगठनों, हिमालयी क्षेत्र के बौद्धों, मेनलैंड चीन, मंगोलिया, रूसी संघ के बौद्ध गणराज्यों और सहित एशिया में बौद्धों ने मुझे वजह बताते हुए पत्र लिखा है और आग्रह किया है कि दलाई लामा की संस्था जारी (Dalai Lama’s Successor) रहे। विशेष रूप से, मुझे तिब्बत में तिब्बतियों से विभिन्न चैनलों के माध्यम से यही अपील करने वाले मैसेज हुए हैं। इन सभी अनुरोधों के अनुसार, मैं पुष्टि कर रहा हूं कि दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी। वह प्रक्रिया जिसके द्वारा आने वाले दलाई लामा को खोजा जाएगा, 24 सितंबर 2011 के मेरे बयान में स्पष्ट रूप से स्थापित की गई है। इसमें कहा गया है कि ऐसा करने की जिम्मेदारी विशेष रूप से परमपावन दलाई लामा के ऑफिस, गैडेन फोडरंग ट्रस्ट के सदस्यों की (How Dalai Lama’s Successor Is Chosen After His Death) होगी। उन्हें तिब्बती बौद्ध परंपराओं के विभिन्न प्रमुखों और विश्वसनीय शपथ-बद्ध धर्म रक्षकों से परामर्श लेना चाहिए जो दलाई लामाओं की वंशावली से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं। उन्हें पिछली परंपरा के अनुसार खोज और पहचान की प्रक्रियाओं को पूरा करना चाहिए। चयन की बात पर उन्होंने कहा कि “मैं इस बात को दोहराता हूं कि गैडेन फोडरंग ट्रस्ट के पास भविष्य के पुनर्जन्म को मान्यता… Read More

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Cancer

सिर और गर्दन के कैंसर के 5 शुरुआती संकेत जिन्हें कभी भी नहीं करना चाहिए नजरअंदाज

हेड एंड नेक कैंसर (Head and Neck Cancer) यानी सिर और गले के कैंसर की शुरुआत सिर और गले के एरिया में होती है। ऐसे कई तरह के कैंसर (Cancer) हैं जो सिर और गले में हो सकते हैं। इनमे से हर एक ही शुरुआत कोशिकाओं की वृद्धि के रूप में शुरू होती है, जो हेल्दी टिश्यूज पर हमला कर उन्हें नष्ट कर सकती है। यह कैंसर को मुंह,गले, साइनस और स्लाइवरी ग्लेंड्स से शुरू होने वाले कैंसरस के रूप में जाना जाता है। हेड और नेक कैंसर का उपचार कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है। इनमे कैंसर (Cancer) की लोकेशन, इसका साइज और सेल्स के प्रकार आदि शामिल हैं। इसके साथ ही उपचार के लिए डॉक्टर रोगी की सम्पूर्ण हेल्थ को भी कंसीडर करते हैं। इस समस्या के निदान और सही उपचार के लिए इसके लक्षणों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। आइए जानें हेड एंड नेक कैंसर के लक्षण (Symptoms of Head and Neck Cancer) के बारे में।  हेड एंड नेक कैंसर के लक्षण (Symptoms of Head and Neck Cancer) क्या हो सकते हैं? क्लेवलैंडक्लिनिक (Clevelandclinic) के अनुसार दुनिया भर में पाए जाने वाले लगभग 4.5% हेड एंड नेक के कैंसर होते हैं। यह कैंसर (Cancer) अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है। हेड एंड नेक कैंसर के लक्षण (Symptoms of Head and Neck Cancer) क्या इस प्रकार हो सकते हैं: गले, जबड़े या मुंह में गांठ हेड एंड नेक कैंसर (Head and Neck Cancer) यानी सिर और गले के कैंसर का सबसे सामान्य लक्षण है जबड़ों और मुंह में गांठ का होना। यह लम्पस रोगी के होंठों पर भी हो सकते हैं। हालांकि, गले में गांठ थायरॉइड कैंसर का लक्षण भी हो सकता है या ऐसा भी हो सकता है की ऐसा लिम्फ नोड के बढ़ने के कारण हो रहा हो। इस कैंसर (Cancer) का सबसे सामान्य लक्षण है एक या अधिक लिम्फ नोड्स में सूजन होना, इनमें माउथ कैंसर और स्लाइवरी ग्लेंड कैंसर भी शामिल है। अगर यह लम्पस बार-बार हो रहे हों और ठीक हो रहे हों तो यह कैंसर की वजह से नहीं हैं। क्योंकि, कैंसर में यह गांठ बनती है और फिर बढ़ती रहती है। जबड़ा हिलाने में समस्या होना हेड एंड नेक कैंसर (Head and Neck Cancer) में जबड़ों की मसल्स, हड्डियां या नर्वज में समस्या भी शामिल हैं। इसके कारण रोगी को मुंह खोलने में समस्या हो सकती है। इसमें अधिकतर रोगी मुंह खोलने में असमर्थ होते हैं। अगर किसी को यह परेशानी होती है तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। चबाने में परेशानी सिर और गले के कैंसर के कारण रोगी को खाना चबाने व निगलने में दर्द व बर्निंग सेंसेशन हो सकती है। इसमें रोगी को ऐसा भी महसूस हो सकता है जैसे फ़ूड गले में फंस गया है। इसके साथ ही रोगी की आवाज भी प्रभावित हो सकती है। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि जैसे उन्हें- हुआ हो। मुंह में सफेद पैच इस कैंसर (Cancer) में रोगी को मुंह में सफेद पैच हो सकता है जिसे ल्यूकोप्लाकिया कहा जाता है। यह समस्या आमतौर पर जबड़ों में, गालों या जीभ के अंदर होती है। यह परेशानी स्मोकिंग और तंबाकू से हो सकती है जो कैंसर का कारण बनती है। इसे भी पढ़ें:-  महाराष्ट्र में तीन भाषा नीति पर सरकार का बड़ा फैसला: पुरानी नीतियां रद्द, नई समिति का गठन गले में दर्द गले में दर्द जो ठीक न हो रही हो ,वो भी इस कैंसर का एक लक्षण है। हेड एंड नेक कैंसर (Head and Neck Cancer) में रोगी के चेहरे पर भी दर्द होती है और उसमे कमजोरी आ सकती है। यही नहीं, यह कैंसर (Cancer) ब्रीदिंग को भी प्रभावित कर सकता है। नेजल कंजेशन इस समस्या का एक लक्षण हो सकता है। इसमें कुछ लोग नाक से खून आना जैसे समस्याओं का भी अनुभव कर सकते हैं। नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi news Clevelandclinic #headandneckcancer #cancersymptoms #earlycancersigns #healthawareness #cancerprevention

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