insulin plant

डायबिटीज के लिए इंसुलिन प्लांट; डायबिटीज को मैनेज करने का एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प

डायबिटीज को एक भयानक बीमारी माना गया है, जिसमे रोगी का शरीर या तो जरूरी इंसुलिन को बना नहीं पाता है या सही से उसका इस्तेमाल नहीं कर पाता। कई मामलों में इसका कोई भी लक्षण रोगी में नजर नहीं आता है। आजकल यह समस्या सामान्य होती जा रही है। गंभीर बात यह है यह रोग इंसान के कई अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। इस बीमारी को कुछ हद तक मैनेज किया जा सकता है। इसके लिए हेल्दी लाइफस्टाइल का पालन करना सबसे जरूरी है। कुछ हर्ब्स को भी इसके लिए फायदेमंद पाया गया है। इन्हीं में से एक है इंसुलिन प्लांट (Insulin plant)। आइए जानें इंसुलिन प्लांट (Insulin plant) यानी कोस्टस इग्नियस (Costas Costus Igneus) के बारे में विस्तार से। क्या है इंसुलिन प्लांट (Insulin plant)?  इंसुलिन प्लांट (Insulin plant) को कोस्टस इग्नियस (Costas Costus Igneus) के नाम से भी जाना जाता है। एक्सपर्ट्स की मानें तो यह बहुत फायदेमंद प्लांट है और डायबिटीज में इसे फायदेमंद पाया गया है। हालांकि, अन्य उपायों के साथ ही रोगी के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना भी जरूरी है। हेल्थलाइन (Healthline) के अनुसार यह पौधा कुछ डायबिटीज के रोगियों में ग्लूकोज लेवल को कम करने में लाभदायक हो सकता है और रोगी निम्नलिखित तरीकों से इसका इस्तेमाल कर सकते हैं: इंसुलिन प्लांट (Insulin plant) यानी कोस्टस इग्नियस (Costas Costus Igneus) एक एंटीऑक्सीडेंट है, जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है और बैक्टीरियल इंफेक्शन को ठीक करने में भी फायदेमंद है। आइए जानें क्या यह डायबिटीज के रोगियों के लिए सुरक्षित है? क्या सच में इंसुलिन प्लांट (Insulin plant) डायबिटीज के रोगियों के लिए सुरक्षित है? ऐसा माना गया है कि इंसुलिन प्लांट (Insulin plant) के पत्ते खाना डायबिटीज के रोगियों के लिए लाभदायक हो सकता है। स्टडी भी यह बताती हैं इसके सेवन से ब्लड ग्लूकोज लेवल में कमी आ सकती है। जो रोगी इंसुलिन लेते हैं, उनमे इसको लेने की आवश्यकता कम हो सकती है। लेकिन, इनका सेवन करना कुछ लोगों के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए जब भी इसका सेवन करना शुरू करें उससे पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें खासतौर पर अगर आप कोई और दवा ले रहे हैं या आपको कोई गंभीर बीमारी है। इंसुलिन प्लांट के साइड इफेक्ट्स (Insulin plant side effects) इस प्लांट का सेवन करना कुछ लोगों के लिए बुरा भी साबित हो सकता है। इंसुलिन प्लांट के साइड इफेक्ट्स (Insulin plant side effects) इस प्रकार हैं: इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक हाइपोग्लाइसीमिया का जोखिम बढ़ना इसलिए, किसी भी दवा या हर्ब्स का सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। इसके अलावा अधिक समय तक इसका सेवन भी इंसुलिन प्लांट के साइड इफेक्ट्स (Insulin plant side effects) का कारण बन सकता है। इसके बारे में और अधिक रिसर्च की जानी जरूरी है। नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi news Costas Costus Igneus #insulinplant #diabetesmanagement #naturaltreatment #bloodsugarcontrol #herbalremedy #costusigneus #healthylifestyle

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healthy fruits for liver

लीवर और किडनी को साफ करने वाले 5 फल, रोजाना सेवन से दूर होंगी बीमारियाँ

हेल्दी रहना है तो हेल्दी आहार का सेवन करना बहुत जरूरी है। इसलिए, एक्सपर्ट्स और डॉक्टर यही सलाह देते हैं कि अपने आहार में फल (Fruit) सब्जियों, साबुत अनाज आदि को अवश्य शामिल करें। इसके साथ ही जंक फूड को जितना हो सके नजरअंदाज करना चाहिए। अगर बात की जाए फलों की, तो यह न केवल स्वादिष्ट होते हैं बल्कि विटामिन, मिनरल, एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइबर से भी भरपूर होते हैं। यानी, इनका सेवन हेल्दी रहने में मददगार साबित हो सकता है। यह भी माना गया है कि फलों का नियमित सेवन लिवर और किडनी से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मददगार है। आइए जानें लिवर और किडनी के लिए फायदेमंद फल (Fruits beneficial for liver and kidney) के बारे में।  लिवर और किडनी के लिए फायदेमंद फल (Fruits beneficial for liver and kidney): पाएं जानकारी हार्वर्ड हार्ट पब्लिशिंग (Harvard Heart Publishing) के अनुसार विभिन्न फलों की भी अलग-अलग न्यूट्रिएंट्स वैल्यू होती हैं यानी किसी फल (Fruit) में अधिक फाइबर होता है तो किसी में कम। जानिए फलों के बारे में जो लिवर और किडनी से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मददगार हैं।  अनार (Pomegranate) अनार (Pomegranate) में पुनीकलागिन (Punicalagin) नामक एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। ऐसा माना गया है कि यह एंटीऑक्सीडेंट किडनी स्टोन को बनने से रोक सकता है और इसके साथ ही सूजन को कम करने में भी फायदेमंद है। कुछ स्टडीज यह भी बताती हैं कि यह फल (Fruit) डायलिसिस से गुजरने वाले रोगियों में टॉक्सिन्स को कम करने में भी फायदेमंद है। ब्लड सर्कुलशन को बढ़ाने में भी अनार (Pomegranate) अच्छा माना गया है। तरबूज (Watermelon) लिवर और किडनी के लिए फायदेमंद फल (Fruits beneficial for liver and kidney) में तरबूज (Watermelon) का भी नाम है। यह फल (Fruit) माइल्ड ड्यूरेटिक की तरह काम करता है। इसको खाने से यूरिन फ्लो बढ़ता है और शरीर से खासतौर पर किडनी व लिवर से टॉक्सिन्स को बाहर निकलने में मदद मिलती है। इस फल में सिट्रूलाइन नामक एमिनो एसिड भी होता है जो ब्लड फ्लो को बढ़ाता है और अमोनिया लेवल को कम करता है। संक्षेप में कहा जाए तो तरबूज (Watermelon) किडनी और लिवर दोनों के लिए फायदेमंद है। पपीता (Papaya) पपीता (Papaya) में एक ऐसा एंजाइम होता है, जो प्रोटीन को ब्रेकडाउन करने में फायदेमंद है। इससे लिवर के मेटाबोलिक लोड को कम करने में मदद मिलती है। इसके साथ ही पपीता (Papaya) में फ्लवोनोइड्स और विटामिन सी भी होते हैं जो फैटी लिवर डिजीज का जोखिम को कम करने के लिए जरूरी है। इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक क्रैनबेरी (Cranberry) क्रैनबेरी (Cranberry) यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन को कम करने में फायदेमंद पाई गयी है। किडनी हेल्थ को सपोर्ट करने में भी इसे बेनेफिशियल पाया गया है। क्रैनबेरी( Cranberry) में मौजूद प्रोएंथोसाइनिडिन हानिकारक बैक्टीरिया को यूरिनरी ट्रैक्ट लायनिंग से रिमूव करने में मदद करते हैं जिससे किडनी को सही से काम करने में मदद मिलती है। यह भी पाया गया है कि इसके सेवन से गंभीर किडनी रोगों को बढ़ने से रोकने में भी सहायता मिल सकती है। एवोकाडो (Avocado) एवोकाडो (Avocado) को लिवर और किडनी से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मददगार पाया गया है। यह मोनोसेचुरेटेड फैट्स हानिकारक बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं। इस फल (Fruit) से अच्छा कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है और ब्लड हेल्थ में सुधार होता है। इनमें बहुत अधिक विटामिन और मिनरल्स होते हैं इसमें विटामिन इ, सी और के आदि। इसके साथ ही इसमें एंटीक्सिडेंट्स भी होते हैं। एवोकाडो (Avocado) से हार्मफुल फ्री रेडिकल्स कम होते हैं जिससे सूजन भी कम होती है। नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi Fruits beneficial for liver and kidney #liverdetox #kidneycleanse #naturalhealth #dailyhealthtips #healthylifestyle #detoxfruits #healthcare

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Hepatitis A Kerala

केरल में हेपेटाइटिस ए का प्रकोप, जानिए इसके लक्षण और बचाव के बारे में

हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A) का कारण है हेपेटाइटिस ए वायरस, जो बहुत अधिक संक्रामक होता है। यह वो वायरस है जिसके कारण लिवर में समस्या हो सकती है और लिवर का कार्य प्रभावित होता है। ऐसा माना गया है कि यह बीमारी गंदे पानी या खाने से होती है। संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आ कर भी यह समस्या हो सकती है। केरल में हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A in Kerala) के केसेस लगातार बढ़ रहे हैं, जो एक चिंता का विषय है। अब तक इसके 3000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और 16 मौते भी हो चुकि हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार इससे बचाव के लिए साफ पानी पीने और सही आहार का सेवन करना जरूरी है। आइए जानें केरल में हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A in Kerala) के बारे में विस्तार से। केरल में हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A in Kerala): पाएं जानकारी जैसा की पहले ही बताया गया है कि केरल में हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A in Kerala) के मामले बढ़ते जा रहे हैं खासतौर पर केरल के एर्नाकुलम, मलप्पुरम, कोझिकोड और त्रिशूर जिलों में। इससे पब्लिक हेल्थ के लिए चिंता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। मानसून के आते ही बढ़ते इन मामलों में हेल्थ एक्सपर्ट्स ने भी और बढ़ोतरी की संभावना जताई है। अप्रैल तक इसके 3,227 मामले आये थे जबकि सिर्फ मई के महीने में 50 से अधिक केसेस आ चुके हैं। एक्सपर्ट्स ने इसका कारण दूषित पानी और खाने को माना है। हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A) से बचाव से पहले इसके लक्षणों के बारे में जान लेते हैं।  हेपेटाइटिस ए के लक्षण (Hepatitis A Symptoms) यू एस. सेंटर्स फॉर डिजीज (U.S. Centers for disease) के अनुसार इस रोग के लक्षण हर रोगी के लिए एक जैसे नहीं होती है। हेपेटाइटिस ए के लक्षण (Hepatitis A Symptoms) वायरस के संपर्क में आने के कुछ हफ्तों बाद नजर आ सकते हैं। हेपेटाइटिस ए के लक्षण (Hepatitis A Symptoms) इस प्रकार हैं: इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक हेपेटाइटिस ए से बचाव  हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A) से बचने का सबसे अच्छा तरीका है इसकी वैक्सीन। इनकी दो डोज लगवाना जरूरी है। अगर आप किसी ऐसी जगह पर ट्रैवल करने वाले हैं, जहां इसके फैलने की संभावना अधिक रहती है, तो ट्रेवल से दो हफ्ते पहले वैक्सीनेशन जरुरी है। हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A) से बचाव के कुछ तरीके इस प्रकार हैं: बाहर का खाना खाने से बचें। नोट:- यहां दी गई जानकारी रिसर्च के आधार पर दी गई है। अधिक जानकारी के लिए आप आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं या गूगल सर्च करें। Latest News in Hindi Today Hindi Hepatitis A #keralaoutbreak #hepatitisa #keralahealth #viralhepatitis #healthalert #hepatitissymptoms #diseaseprevention #keralanews #waterbornedisease

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heatwave advisory

हीटवेव से बचाव, स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी की एडवाइजरी, जानें क्या करें और क्या न करें

हीट वेव (Heat wave) यानी गर्मी की लहर उस पीरियड को कहा जाता है, जब किसी जगह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। हमारे देश में हीट वेव पीरियड को मार्च से लेकर जून तक माना जाता है। आमतौर पर हमारे देश में हीट वेव (Heat wave) की घोषणा तब की जाती है जब कुछ दिनों तक मैदानी स्थानों में टेम्प्रेचर 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है या पहाड़ी क्षेत्रों में यह तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो। हाल ही में हेल्थ डिपार्टमेंट (Health department) ने दिल्ली के लिए एक एडवाइजरी जारी की है। इसमें यह कहा गया है कि हीट वेव (Heat wave) के कारण लोग जितना हो सके घर के अंदर ही रहें। आइए जानें हेल्थ डिपार्टमेंट की हीट वेव से संबंधित एडवाइजरी (Health Department advisory regarding heat wave) के बारे में। हीट वेव से बचाव के तरीकों के बारे में भी जानें।  हेल्थ डिपार्टमेंट की हीट वेव से संबंधित एडवाइजरी (Health Department advisory regarding heat wave): पाएं जानकारी इंडियन मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट यानी भारतीय मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में दिल्ली में दिन के समय 45 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है। रात का तापमान 29 डिग्री सेल्सियस रहने की उम्मीद है। इसलिए हेल्थ डिपार्टमेंट (Health department) ने लोगों से आग्रह किया है कि वो उस समय घर पर रहें जब धूप बहुत तेज होती है। यही नहीं, अधिक पेय पदार्थों का सेवन करना भी न भूलें। हेल्थ डिपार्टमेंट की हीट वेव से संबंधित एडवाइजरी (Health Department advisory regarding heat wave) जारी करने के साथ ही उन्होने लोगों को यह सलाह भी दी है: इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक हीट वेव से बचने के लिए अपनाएं यह उपाय हीट वेव (Heat wave) से बचाव के लिए जरूरी है घर में ही रहना और धूप से बचना। इसके साथ ही इन चीजों का भी ध्यान रखें: नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi heat wave #heatwave #healthministry #summer2025 #heatstrokeprevention #staycool #healthtips #summeradvisory #doanddont #heatwavealert

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Millennials Face Rising Appendix Cancer Risk

मिलेनियल्स में बढ़ रहा है एपेंडिक्स कैंसर खतरा, जानिए कैसे बचें इस दुर्लभ बीमारी से

एपेंडिक्स कैंसर (Appendix cancer) एक दुर्लभ बीमारी है, जिसे एपेंडिसियल कैंसर के नाम से भी जाना जाता है। यह समस्या तब होती है जब हमारे एपेंडिक्स में मौजूद सेल्स में बदलाव होता है और इनकी ग्रोथ असामान्य हो जाती है। अगर बात की जाए एपेंडिक्स की, तो यह हमारे डायजेस्टिव सिस्टम का भाग है। यह अंग पेट के दाई तरफ होता है। हाल ही में हुई एक स्टडी के मुताबिक आजकल युवाओं यानी मिलेनियल्स में इस कैंसर (Cancer) के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। मिलेनियल्स उस जनरेशन को कहा जाता है जिनका जन्म 1981 से 1996 के बीच में हुआ हो। यही नहीं यह भी पाया है कि 1980 से 1985 के बीच पैदा हुए लोगों में यह मामले तीन गुना बढ़ गए हैं। आइए जानें मिलेनियल्स में एपेंडिक्स कैंसर (Appendix Cancer in Millennials) के बारे में। मिलेनियल्स में एपेंडिक्स कैंसर (Appendix Cancer in Millennials): क्या कहती है स्टडी? कैंसर काउंसिल (Cancer Council) के अनुसार इस कैंसर (Cancer) के कारणों के बारे में जानकारी नहीं है। यही नहीं, इसके रिस्क फैक्टर्स भी नहीं हैं लेकिन ऐसे माना गया है कि यह समस्या जेनेटिक हो सकती है। उम्र के बढ़ने से भी इसका जोखिम बढ़ सकता है। एक स्टडी के अनुसार मिलेनियल्स में एपेंडिक्स कैंसर ((Appendix Cancer in Millennials)) का रिस्क बढ़ता जा रहा है और इसका कारण खराब जीवनशैली, एनवायर्नमेंटल रिस्क और जेनेटिक को माना जा रहा है। चिंत्ता का विषय यह है कि एपेंडिक्स कैंसर (Appendix cancer) का शुरू में पता नहीं चलता, जिससे इलाज थोड़ा मुश्किल हो सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि युवाओं में इस कैंसर (Cancer) में बढ़ोतरी एक गंभीर हेल्थ रिस्क है। ऐसे में जरूरी है कि सभी अपनी जीवनशैली में सुधार करें। हेल्दी खाएं और जंक फ़ूड से बचें। यही नहीं, लक्षणों को पहचानें और नियमित चेकअप कराएं। आइए जानें कि एपेंडिक्स कैंसर के लक्षण (Appendix cancer symptoms) क्या हो सकते हैं? एपेंडिक्स कैंसर के लक्षण (Appendix cancer symptoms) जैसा की पहले ही बताया गया है कि इस एपेंडिक्स कैंसर के लक्षण  (Appendix cancer symptoms) अधिकतर रोगियों में नजर नहीं आते हैं। लेकिन, इसके सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं: कई बार एपेंडिक्स कैंसर (Appendix cancer) के साथ एक दुर्लभ स्थिति भी हो सकती है, जिसे स्यूडोमाइक्सोमा पेरिटोन कहा जाता है, जिसमें कैंसर सेल्स जैली जैसे पदार्थ को निकालते हैं, जो एपेंडिक्स परेशानी का कारण बन सकता है। इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक एपेंडिक्स कैंसर से बचाव हालांकि, एपेंडिक्स कैंसर (Appendix cancer) से पूरी तरह से बचाव संभव नहीं है, लेकिन कुछ चीजों का ध्यान रख कर इसकी संभावना को कम किया जा सकता है। एपेंडिक्स कैंसर (Appendix cancer) से बचाव के तरीके इस प्रकार हैं: इसके साथ ही नियमित चेकअप और जेनेटिक काउन्सलिंग व टेस्टिंग भी जरूरी है। एपेंडिक्स कैंसर (Appendix cancer) के बारे में पूरी जानकारी और जल्दी निदान से सही उपचार में मदद मिल सकती है।  नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi Appendix cancer #Appendixcancer #cancer #appendixcancersymptoms #appendixcancerprevention #appendixcancerinmillennials

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Central Bank of India recruitment 2025

सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निकाली एप्रेंटिस पोस्ट्स (Apprentice Posts by Central Bank of India): पाएं जानकारी

अगर आप इसके लिए आवेदन भेजना चाहते हैं, तो आपके लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि यह प्रोसेस 7 जून 2025 से शुरू हो चुकी है और इसके लिए अंतिम तिथि 23 जून 2025 है। इसके बाद आप इसके लिए अप्लाई नहीं कर पाएंगे। एप्रेंटिस पोस्ट्स (Apprentice Posts) के लिए ऑनलाइन आसानी से अप्लाई किया जा सकता है।  एजुकेशनल क्वालिफिकेशन सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निकाली एप्रेंटिस पोस्ट्स (Apprentice Posts by Central Bank of India) के लिए वैकेंसीज निकाली हैं, जिसके लिए कैंडिडेट्स के पास किसी भी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी या इंस्टिट्यूट से बैचलर डिग्री या इसके समान डिग्री होना जरूरी है। इसके साथ ही इसके लिए कैंडिडेट का एनएटीएस पोर्टल पर रजिस्टर होना भी अनिवार्य है। आयु सीमा एप्रेंटिस पोस्ट्स (Apprentice Posts) के लिए आवेदन भेजने से पहले यह जान लें कि इसके लिए मिनिमन एजलिमिट 20 साल और मैक्सिमम एजलिमिट 28 साल निर्धारित की गई है। आरक्षित श्रेणी के लोगों के लिए इसमें कुछ छूट दी गई है, जिसके बारे में आपको पूरी जानकारी ऑफिशियल वेबसाइट पर मिल जाएगी। वेकेंसीज एप्रेंटिस पोस्ट्स (Apprentice Posts) के लिए हर राज्य और यूटी से भर्ती की जाएगी। इसके लिए सबसे अधिक भर्तियां महाराष्ट में की जाएगी, जिनकी संख्या 586 है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश से 580, मध्य प्रदेश से 459, बिहार से 433 और गुजरात से 305 पदों को भरा जाएगा। आप अपने राज्य या यूटी में इससे सम्बन्धित पूरी जानकारी इसकी ऑफिशियल वेबसाइट से पा सकते हैं। ध्यान रहे कि चयन के लिए सबसे पहले लिखित परीक्षा होगी जो ऑनलाइन ली जाएगी। इसके बाद कैंडिडेट्स की स्थानीय भाषा की परीक्षा ली जाएगी। फीस  अगर आप सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की एप्रेंटिस पोस्ट्स (Apprentice Posts) के लिए आवेदन भरना चाहते हैं, तो इसकी फीस के बारे में भी थोड़ा जान लें, जो इस प्रकार है: इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक कैसे करें अप्लाई नोट:- यहां दी गई जानकारी रिसर्च के आधार पर दी गई है। अधिक जानकारी के लिए आप आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं या गूगल सर्च करें। Latest News in Hindi Today Hindi #centralbankofindia #apprenticeposts #bankjobs #governmentjobs #jobnotification #recruitment2025 #careers #cbijobs #indiagovernmentjobs #latestvacancy

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COVID variant update

कोविड-19 के नए वेरिएंट ने बढ़ाई चिंता, जानें कोविड-19 वेरिएंट्स और म्यूटेशन के बारे में

कोविड-19 (Covid-19) यानी कोरोना वायरस (Coronavirus) एक संक्रामक बीमारी है, जिसे 2019 में चाइना में पहचाना गया था। इसके बाद यह पूरी दुनिया में फैल गया था और इसके कारण करोड़ों लोग प्रभावित हुए थे। यह वायरस रेस्पिरेटरी ड्रॉप्लेट्स और दूषित सरफेस से फैल सकता है। यही नहीं, यह वायरस एयरबोर्न ट्रांसमिशन यानी वायुजनित संक्रमण के माध्यम से भी स्प्रेड हो सकता है, विशेष रूप से बंद स्थानों में। अब तक इसके कई अलग-अलग कोविड-19 वेरिएंट्स (Covid-19 variants) सामने आ चुके हैं जैसे अल्फा, बीटा, डेल्टा, ओमिक्रॉन आदि। इसका कारण हैं म्यूटेशन। आइए जानें कि कोविड-19 वेरिएंट्स (Covid-19 variants) कौन-कौन से हैं? कोरोना वायरस कैसे म्यूटेट करता है (How does Coronavirus mutate) यह भी जानें?   इस प्रकार है कोविड-19 (Covid-19) के वेरिएंट्स की लिस्ट अल्फा: यह वो वेरिएंट है, जो यूनाइटेड किंगडम में सबसे पहले पहचाना गया था। असली वायरस की तुलना में यह वेरिएंट 40-80% अधिक संक्रामक है।  इनके अलावा ऐसे कई कोविड-19 वेरिएंट्स (Covid-19 variants) हैं, जिन्हें अभी मॉनिटर किया जा रहा है जैसे  JN.1,KP.3, KP.3.1.1, JN.1.18, LB.1, LP.8.1, NB.1.8.1 और XEC। आजकल कई देशों में एक नया वेरिएंट फैला हुआ है जिसका नाम है NB.1.8.1। भारत के साथ ही ऑस्ट्रेलिया, हांगकांग, थाईलैंड, चीन आदि में इसके कई मामले सामने आ रहे हैं। हमारे देश में इस समय इसके लगभग 6500 एक्टिव मामले हैं। अब जानते हैं कि कोरोना वायरस कैसे म्यूटेट करता है (How does Coronavirus mutate)? इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक कोरोना वायरस कैसे म्यूटेट करता है (How does Coronavirus mutate)? एक्सपर्ट्स का मानना है कि वायरस हमारे शरीर में पहले से ही मौजूद हैं और बी हम इन्हें नष्ट करने की कोशिश करते हैं तो यह वायरस अपने रूप को बदलते हैं ताकि वो नष्ट न हो बल्कि सर्वाइव कर सकें। इस प्रोसेस में यह वायरस अधिक स्प्रेड होने और कम खतरनाक वेरिएंट्स में बदल सकता है।  एक्सपर्ट्स के अनुसार कोरोना वायरस (Coronavirus) के सभी वेरिएंट्स में ओमिक्रॉन वेरिएंट अधिक स्प्रेड हुआ था लेकिन इसके लक्षण सीरियस नहीं थे। संक्षेप में कहा जाए तो म्यूटेशन के बाद वायरस अधिक फैलता तो है लेकिन इसका प्रभाव पहले से कम हो सकता है। यही कारण है कि हाल ही में फैले कोरोना वायरस (Coronavirus) के वेरिएंट्स को इतना खतरनाक नहीं माना जा रहा। एक्सपर्ट्स भी यह मान रहे हैं कि कोविड-19 वेरिएंट्स (Covid-19 variants) में यह वेरिएंट कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों, बुजुर्गों और बच्चों को अधिक प्रभावित कर सकता है। लेकिन, लोग सावधानियां अवश्य बरतें, ताकि किसी भी तरह की समस्या से बचाव हो सके। नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi Covid-19 variants #covid19 #newvariant #coronavirusupdate #mutation #covidmutation #covidnews #healthalert #covidindia #virusupdate #publichealth

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smoking impact on reproduction

एल्कोहॉल व तंबाकू महिलाओं और पुरुषों की फर्टिलिटी के लिए है सबसे बड़ा खतरा 

एल्कोहॉल (Alcohol) का सेवन न केवल हमारे लिवर बल्कि शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है जैसे ब्रेन, गट, फेफड़े, इम्यून सिस्टम आदि। मायोक्लिनिक (Mayoclinic) के अनुसार किसी भी मात्रा में इसका सेवन कई सेहत सम्बन्धी समस्याओं का कारण बन सकता है। डॉक्टरों का यह मानना है कि तंबाकू और एल्कोहॉल (Alcohol) जैसी आदतों से महिलाओं और पुरुषों की फर्टिलिटी (Fertility) भी प्रभावित होती है। यही नहीं, इससे गर्भपात और बर्थ डिफेक्ट्स की संभावना बढ़ सकती है। डॉक्टर्स का यह भी कहना है कि इन आदतों से बच कर इस परेशानियों के रिस्क को कम किया जा सकता है। आइए जानें कि एल्कोहॉल और इनफर्टिलिटी में कनेक्शन (Connection between alcohol and infertility) के बारे में एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं? एल्कोहॉल और इनफर्टिलिटी में कनेक्शन (Connection between alcohol and infertility) यह तो हम सभी जानते हैं कि एल्कोहॉल (Alcohol), तंबाकू और वेप जैसी चीजें हमारी हेल्थ के लिए नुकसानदायक हैं। महिलाओं में बढ़ती इनफर्टिलिटी (Infertility) प्रॉब्लम्स के लिए भी डॉक्टर तंबाकू, एल्कोहॉल (Alcohol) आदि को जिम्मेदार मानते हैं। आइए जानें इस बारे में और अधिक: महिलाओं में एल्कोहॉल और तंबाकू का प्रभाव एक्सपर्ट्स का मानना है कि महिलाएं अगर अधिक एल्कोहॉल (Alcohol) का सेवन करती हैं या स्मोकिंग (Smoking) करती हैं , तो इससे एबॉर्शन की संभावना भी बढ़ती है। यही नहीं, इससे एक्टोपिक प्रेग्नेंसी और स्पर्म में डीएनए डैमेज का रिस्क भी बढ़ जाता है। इससे एबोरशन और बर्थ डिफेक्ट हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर प्रेग्नेंसी प्लान कर रहे हैं, तो इन आदतों से बचना बहुत आवश्यक है। एल्कोहॉल और इनफर्टिलिटी में कनेक्शन (Connection between alcohol and infertility) के बारे में एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि स्मोकिंग (Smoking) करने से महिलाओं में एग्स को नुकसान होता और यूट्रस प्रभावित होता है। यही नहीं इससे फर्टिलाइज एग को इम्प्लांट करने में मुश्किल होती है। यह हार्मोन इंबैलेंस, एग की क्वालिटी का कम होना और पीरियड्स में समस्या जैसी परेशानियां का कारण भी बन सकते हैं।  इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक पुरुषों में एल्कोहॉल और तंबाकू का प्रभाव एक्सपर्ट्स की मानें तो स्मोकिंग (Smoking) से पुरुषों में स्पर्म की संख्या कम होती है और इससे स्पर्म में डीएनए को नुकसान होता है। वहीं अगर पुरुष वेपिंग करते हैं तो इससे भी स्पर्म की क्वालिटी कम होती है, हॉर्मोन इंबैलेंस होता है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस में बढ़ोतरी होती है। पुरुषों को एल्कोहॉल (Alcohol) का सेवन करने से भी बहुत नुकसान होता है। इससे उनमें टेस्टोस्टेरोन लेवल में कमी हो सकती है और स्पर्म और उसकी क्वालिटी में कमी आ सकती है। अगर संक्षेप में कहा जाए तो एल्कोहॉल (Alcohol), तंबाकू और वेपिंग आदि से न केवल महिलाओं और पुरुषों की फर्टिलिटी (Fertility) पर बुरा प्रभाव पड़ता है बल्कि कई अन्य समस्यांए भी हो सकती हैं। इससे कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है। इनके उपयोग से इम्युनिटी कमजोर होती है और क्रोनिक इन्फ्लेमेशन जैसी समस्याएं होने की संभावना भी बढ़ जाती है। इसलिए, फर्टिलिटी (Fertility) संबंधी समस्याओं से बचाव का एक ही प्रभावी तरीका है इनका सेवन करने से बचें और हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं।  नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें। Latest News in Hindi Today Hindi  #fertility #alcoholrisk #tobaccodangers #infertility #healthtips #malehealth #femalehealth #reproductivehealth

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doctor’s take on tumor cases

इस वजह से ब्रेन ट्यूमर के मामलों में वृद्धि के बावजूद डॉक्टर इसे मान रहे हैं एक सकारात्मक संकेत

ब्रेन ट्यूमर (Brain Tumor) की शुरुआत दिमाग में असामान्य सेल्स की ग्रोथ के साथ होती है। यह ट्यूमर दिमाग या खोपड़ी के किस भी भाग में हो सकता है। आपको यह जान कर हैरानी होगी कि दिमाग में 120 विभिन्न तरह के ट्यूमर विकसित हो सकते हैं। यही नहीं, यह कैंसर कैंसरस और नॉनकैंसरस किसी भी तरह का हो सकता है और बच्चे व वयस्क दोनों को यह प्रभावित कर सकता है। डॉक्टरों का यह कहना है कि पिछले कुछ सालों में बेंगलुरु में ब्रेन ट्यूमर (Brain Tumor) के मामलों में लगभग 30 परसेंट वृद्धि हुई है। लेकिन, डॉक्टरों का यह मानना है कि ब्रेन ट्यूमर के मामलों में वृद्धि के बावजूद, यह एक सकारात्मक संकेत है जो दर्शाता है कि लोग अधिक जागरूक हो रहे हैं और समय पर चिकित्सा सहायता ले रहे हैं। आइए जानें बेंगलुरु में ब्रेन ट्यूमर के बढ़ते मामले (Increasing cases of brain tumors in Bengaluru) के बारे में विस्तार से। बेंगलुरु में ब्रेन ट्यूमर के बढ़ते मामले (Increasing cases of brain tumors in Bengaluru): पाएं जानकारी ऐसा माना गया है कि बेंगलुरु में ब्रेन ट्यूमर (Brain Tumor) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यह बढ़ोतरी  30% तक हो सकती है। लेकिन डॉक्टरों का यह भी मानना है कि बेंगलुरु में ब्रेन ट्यूमर के बढ़ते मामले (Increasing cases of brain tumors in Bengaluru) चिंता नहीं बल्कि एक सकारात्मक संकेत है। क्योंकि, लोग इससे लोग अधिक अवेयर हो रहे हैं, जिससे समय पर इस गंभीर समस्या का निदान और उपचार संभव हैं। दरअसल लोग अब इस रोग को लेकर अधिक अवेयर हैं तो समय पर डॉक्टर की सलाह ले रहे हैं और अपना उपचार करा रहे हैं। यानी, बढ़ते मामलों के बाद भी ट्रीटमेंट रेट में भी इम्प्रूवमेंट हो रही है। डॉक्टरों ने लोगों से यह भी कहा है कि वो ब्रेन ट्यूमर (Brain Tumor) के लक्षणों को जानें और समय पर एक्सपर्ट की सलाह लें। इससे इन मामलों में सुधार किया जा सकता है। आइए जानें ब्रेन ट्यूमर के लक्षण (Symptoms of Brain Tumor) क्या हो सकते हैं? इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक ब्रेन ट्यूमर के लक्षण (Symptoms of Brain Tumor) क्लेवलैंडक्लिनिक (clevelandclinic) के अनुसार ब्रेन ट्यूमर (Brain Tumor) चाहे कैंसरस हो या नहीं, लेकिन अगर यह इतने बड़े हो जाएं कि आसपास के टिशूज पर दवाब पड़े तो इससे ब्रेन फंक्शन प्रभावित हो सकता है। इस रोग से पीड़ित कुछ लोग कोई भी लक्षण का अनुभव नहीं करते हैं, खासतौर पर जब यह बहुत छोटे हों। इसके लक्षण ट्यूमर के स्थान, आकार आदि पर निर्भर करते हैं। ब्रेन ट्यूमर के लक्षण ब्रेन ट्यूमर के लक्षण (Symptoms of Brain Tumor) इस प्रकार हैं:  अगर रोगी कोई भी लक्षण का अनुभव करता है, तो उसे तुरंत मेडिकल हेल्प लेनी चाहिए, ताकि समय पर निदान और उपचार हो सके। कई मामलों में इन लक्षणों को हलके में लेना किसी बड़ी हेल्थ प्रॉब्लम का कारण बन सकता है। नोट:- यहां दी गई जानकारी केवल रिसर्च के आधार पर दी गई है। लेकिन अगर आप किसी भी शारीरिक समस्या से परेशान हैं, तो अपने हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेना न भूलें Latest News in Hindi Today Hindi Symptoms of Brain Tumor #brainhealth #braintumor #medicalnews #healthupdate #neuroscience #positivesign #healthawareness

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History of idli

Idli Origin Story: दक्षिण भारत से नहीं बल्कि इस देश जुड़ा है आपकी फेवरेट डिश ‘इडली’ का इतिहास

इडली को न सिर्फ दक्षिण भारत बल्कि समूचा भारत बड़े चाव से खाता है। यह फ़ूड इतना टेस्टी है कि गरमा-गरम इडली सांभर और नारियल की चटनी का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। दक्षिण भारत में तो यह वहां का पारंपरिक फ़ूड है। सुबह का नास्ता इससे बेहतर क्या ही हो सकता है। खाते तो हम सभी हैं इसे, लेकिन क्या अपने कभी सोचा है कि इडली कहाँ का व्यंजन है? अगर आपको ऐसा लगता है कि इसका संबंध दक्षिण भारत से है तो आप गलत (Idli Origin Story) हैं। जी, हाँ आपने सही पढ़ा। इडली दक्षिण भारत का व्यंजन नहीं है। हम सभी को यही लगता था कि इडली साउथ की देन है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि आपकी पसंदीदा, नरम-मुलायम इडली दक्षिण भारत से है ही नहीं। ऐसे में बड़ा सवाल यह कि इडली यदि दक्षिण भारत की नहीं तो फिर कहाँ की है? इस पर इतिहासकारों का मानना है कि इडली की शुरुआत इंडोनेशिया में हुई थी।  इंडोनेशिया में केडली नामका एक डिश बड़ी मशहूर (Idli Origin Story) थी दरअसल, ऐसा माना जाता है कि 800 से 1200 ईस्वी के दौरान, इंडोनेशिया में केडली नामका एक डिश बड़ी मशहूर (Idli Origin Story) थी। जो काफी हद तक इडली की ही तरह थी। उस दौर में इंडोनेशिया में चावल और फर्मेंटेशन के प्रोसेस का इस्तेमाल खाने में काफी होता था। कुछका तो यह भी मानना है कि इडली अरब देशों से आई है। और दौर में अरब व्यापारी भारत आया-जाया करते थे। और वो वहां से अपने साथ खमीर उठाने की विधि लाए थे, जो कालांतर में चलकर इडली के रूप में परिवर्तित हुई। ऐसे में बड़ा सवाल यह कि जब इडली इंडोनेशिया में मश्हूर थी तो भारत कैसे पहुंची? और भारत में पहुंची भी तो दक्षिण भारत में ही क्यों और कैसे मशहूर हुई? इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक इडली का जिक्र 920 ईस्वी में कन्नड़ साहित्य में (Idli Origin Story) मिलता है इतिहासकारों का मानना है कि इंडोनेशिया से जो लोग भारत आए, वे अपने साथ इस डिश को बनाने की विधि भी लेकर आये। भारत आकर इसमें थोड़े बहुत बदलाव किये और इसे स्थानीय मसालों और तरीकों के जरिये बनाना शुरू किया। आपको जानकर बड़ी हैरानी होगी कि सबसे पहले इडली का जिक्र 920 ईस्वी में कन्नड़ साहित्य (Idli Origin Story) में मिलता है। वहां इसे इड्डलिगे कहकर संबोधित किया गया था। ध्यान देने वाली बात यह कि उस दौरान उड़द दाल को छाछ में भिगोकर और कुछ मसालों के साथ बनाया जाता था। उस समय इसमें खमीर नहीं उठाया जाता था और न ही चावल का ही इस्तेमाल होता था। इस बीच समय बीतता गया और 17वीं शताब्दी तक इडली ने अपने आपको पूरी तरह बदल लिया। आज के दौर में इसमें चावल को शामिल किया गया और खमीर उठाने की प्रक्रिया भी जोड़ी गई। इसके चलते इडली और भी मुलायम और स्वादिष्ट बन गई। दक्षिण भारत की गर्म और नम जलवायु खमीर उठाने के लिए एकदम सही थी। कारण यही जो यह यहां बड़ी तेजी से मशहुर हुई। Latest News in Hindi Today Hindi  Idli Origin Story #IdliOrigin #SouthIndianFood #IndianCuisine #FoodHistory #SurprisingFacts #Idli #BreakfastLove

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