देवी छिन्नमस्तिका (Goddess Chhinnamasta) हिन्दू धर्म की एक अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली देवी हैं, जिन्हें छिन्नमस्ता, छिन्नमूर्ति और छिन्नमालिनी के नाम से भी जाना जाता है। वे शक्ति की प्रकटीकरण हैं और उनके रूप में दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। उनकी भव्य और रहस्यमय छवि अनेक लोगों को आकर्षित करती है। आज हम जानेंगे कि कैसे हुआ देवी छिन्नमस्तिका का अवतरण और उनकी पूजा का महत्व क्या है।
छिन्नमस्तिका पूजा का महत्व
देवी छिन्नमस्तिका (Goddess Chhinnamasta) की पूजा विशेष रूप से तंत्र साधना में महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनकी आराधना से भक्तों को भय, रोग, शत्रुता, मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, छिन्नमस्तिका देवी अपने भक्तों को आत्मविश्वास, साहस, और जीवन की अनिश्चितताओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करती हैं।
उनकी पूजा में मंत्र जाप, हवन और यंत्र स्थापना की जाती है। विशेषकर नवमी या चतुर्दशी तिथि को उनकी आराधना की जाती है, जिसे उनके अनुयायी बड़ी श्रद्धा और विधिपूर्वक करते हैं।
शिव जी से जुड़ा संबंध:
कई स्थानों पर यह माना जाता है कि माता छिन्नमस्तिका देवी काली का ही एक रूप हैं। अन्य प्रसिद्ध कथाओं के अनुसार, एक बार संसार में भारी संकट और अराजकता फैल गई थी। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने देवी पार्वती की तपस्या की। तब माता ने भक्तों के दुःख दूर करने हेतु छिन्नमस्ता का रूप धारण किया और विश्व में पुनः शांति स्थापित की।
हालांकि, मां का यह स्वरूप अत्यंत प्रचंड था, जिससे पृथ्वी पर विनाश फैल गया। इस स्थिति में सभी देवताओं ने एकजुट होकर भगवान शिव (Lord Shiva) से सहायता मांगी। उनकी प्रार्थना सुनकर भोलेनाथ मां छिन्नमस्ता के पास पहुँचे।
स्वयं को इस प्रकार किया संतुष्ट:
जब भगवान शिव (Lord Shiva) माता छिन्नमस्ता के पास पहुँचे, तब देवी ने उनसे कहा, “हे स्वामी, मुझे अत्यंत भूख लगी है, मैं अपनी इस भूख को कैसे शांत करूं?” इस पर शिवजी (Lord Shiva) ने उत्तर दिया, “आप ही समस्त ब्रह्मांड की धारक हैं, फिर आपको किसी और की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए?”
यह सुनकर देवी छिन्नमस्ता ने तुरंत अपने खड्ग से अपनी गर्दन काट ली और अपना सिर अपने बाएं हाथ में धारण कर लिया।
देवी के कटे हुए गले से तीन रक्त धाराएं निकलने लगीं — एक धारा को उन्होंने स्वयं ग्रहण किया, जबकि शेष दो धाराओं के माध्यम से उन्होंने अपनी दोनों सहचरी देवियों को संतुष्ट किया।
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देवी छिन्नमस्ता की पूजा क्यों मानी जाती है चुनौतीपूर्ण?
देवी छिन्नमस्ता (Goddess Chhinnamasta) को एक अत्यंत तीव्र, भयावह और उग्र रूप में जाना जाता है। वे तंत्र साधना की महत्वपूर्ण देवी हैं और उनकी आराधना जैन व बौद्ध परंपराओं में भी की जाती है। बौद्ध धर्म में उन्हें “छिन्नमुण्डा वज्रवराही” के रूप में पूजा जाता है।
छिन्नमस्ता देवी मृत्यु की प्रतीक मानी जाती हैं और वे योगशक्ति, कामनाओं पर नियंत्रण और यौन वासनाओं के दमन का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी का रूप अत्यंत विचित्र है — वे स्वयं अपने खड्ग से अपना सिर काटकर उसे हाथ में धारण करती हैं और अपनी गर्दन से निकलती रक्त की धाराओं में से एक को स्वयं पीती हैं।
उनका यह स्वरूप भयावह और उग्र माना जाता है। इसी कारण आम घरों में या पारंपरिक मंदिरों में उनकी पूजा नहीं की जाती। उनकी आराधना केवल विशेष तांत्रिक मंदिरों या साधना स्थलों पर की जाती है, जहां विशेष विधियों और सावधानियों के साथ पूजा सम्पन्न की जाती है।
नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें।
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