पुरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से पहले, गुंडिचा मंदिर की सफाई के लिए लाया जाएगा इंद्रद्युम्न सरोवर का जल। यह परंपरा चैतन्य महाप्रभु की गुंडिचा मरजना लीला से जुड़ी है, जो भक्तों को आत्मशुद्धि और सेवा का संदेश देती है। हर वर्ष पुरी में भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), बलभद्र एवं देवी सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा आयोजित की जाती है। इसके पहले, यात्रा की पवित्रता शुभारंभ सुनिश्चित करने के लिए गुंडिचा मंदिर की सफाई के समय इंद्रद्युम्न सरोवर से जल लाया जाता है। यह केवल एक पवित्र अनुष्ठान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राजा इंद्रद्युम्न द्वारा मूर्तियों की स्थापना
प्राचीन काल में मलवा क्षेत्र के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के गहरे भक्त थे। एक रात उन्हें स्वप्न में भगवान विष्णु के दर्शन हुए और भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की स्थापना का आदेश मिला। इसके पश्चात, राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी में भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की स्थापना करवाई। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर देह त्यागा, तब उनका अंतिम संस्कार किया गया, लेकिन उनका हृदय अग्नि में भी नहीं जला। इसे पांडवों ने एक नदी में प्रवाहित कर दिया। बाद में यह दिव्य ब्रह्म पदार्थ एक लकड़ी के लठ्ठे के रूप में राजा इंद्रद्युम्न को प्राप्त हुआ। उन्होंने इसी ब्रह्म तत्व को भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों में प्रतिष्ठित किया। यह ब्रह्म तत्व आज भी परंपरा के अनुसार पुरानी मूर्तियों से निकालकर नई मूर्तियों में प्रतिष्ठापित किया जाता है जब मूर्तियों का नवीनीकरण होता है।
भगवान विष्णु ने दिया था राजा इंद्रद्युम्न को विशेष वरदान
ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने राजा इंद्रद्युम्न को एक दिव्य वरदान दिया था। उन्होंने कहा था कि, “मैं हर वर्ष तुम्हारे द्वारा स्थापित इस तीर्थ के समीप निवास करूंगा। जो भी श्रद्धालु विधिपूर्वक इस तीर्थ में स्नान करेगा और सात दिनों तक भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), बलभद्र और माता सुभद्रा के दर्शन करेगा, उसे मेरी विशेष कृपा प्राप्त होगी।”
यह वरदान न केवल इस तीर्थ की महत्ता को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि आज तक यहां की धार्मिक परंपराएं क्यों इतनी जीवंत और महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।
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इंद्रद्युम्न सरोवर का पौराणिक महत्व
इंद्रद्युम्न सरोवर की पवित्रता के पीछे एक ऐतिहासिक और धार्मिक कथा जुड़ी है। मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने हजारों गायें ब्राह्मणों को दान में दीं। इन गायों को जिस स्थान पर बांधा गया था, वहां उनके खुरों से ज़मीन में गहरे गड्ढे बन गए। समय के साथ ये गड्ढे जल से भर गए और एक सरोवर का रूप ले लिया। इस सरोवर में जमा हुआ जल और गोमूत्र इतना पवित्र माना गया कि राजा इंद्रद्युम्न ने अपने अश्वमेध यज्ञ में इसी जल का उपयोग किया। तभी से यह सरोवर एक तीर्थ की तरह पूज्य माना जाने लगा। इतना ही नहीं, एक बार रथ यात्रा से पूर्व जब गुंडिचा मंदिर को शुद्ध करना था, तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसी सरोवर से जल मंगवाकर मंदिर की पवित्रता का कार्य करवाया। तब से यह परंपरा चलती आ रही है और आज भी हर वर्ष रथ यात्रा से पहले गुंडिचा मंदिर की शुद्धि के लिए इसी सरोवर का जल प्रयोग में लाया जाता है।
गुंडिचा मंदिर की सफाई
गुंडिचा मंदिर, जहां रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) परमपूज्य रूप से विराजमान रहते हैं, की सफाई रथ यात्रा से एक दिन पहले की जाती है। इसे ‘गुंडिचा मरजना’ कहा जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान इंद्रद्युम्न सरोवर से जल लेकर मंदिर की सफाई की जाती है। चैतन्य महाप्रभु स्वयं यह कार्य करते थे, वे कई पात्रों में जल लेकर मंदिर को धोते, भजन, कीर्तन करते और मंदिर परिसर को पूरी भक्ति से शुद्ध करते थे। उनके काल में यह जल भक्तों को भी शेयर किया जाता था—कहीं छपते धूल से, कहीं चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-आँसुओं से ।
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