Anjali Choudhary

Budhwar

बुधवार को भूलकर भी न करें ये 4 काम, वरना बर्बाद हो सकता है घर-परिवार

हिंदू धर्म में सप्ताह के हर दिन का अपना विशेष महत्व है और हर दिन से जुड़ी कुछ खास मान्यताएं तथा नियम भी हैं। बुधवार (Budhwar) को विशेष रूप से भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। इस दिन बुद्धि, व्यापार, संतान सुख और जीवन में स्थिरता बनाए रखने के लिए पूजा-अर्चना की जाती है।लेकिन शास्त्रों में कुछ ऐसे कार्य बताए गए हैं जिन्हें बुधवार के दिन विवाहित महिलाओं को भूलकर भी नहीं करना चाहिए। यदि इन नियमों का पालन न किया जाए, तो घर की सुख-शांति और समृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। यहां जानिए वे चार कार्य जिन्हें बुधवार के दिन करने से बचना चाहिए। 1. हरे रंग का अपमान या त्याग करना बुधवार का रंग हरा होता है, जो समृद्धि, शांति और उन्नति का प्रतीक है। ऐसे में इस दिन हरे रंग का तिरस्कार करना या जानबूझकर हरे रंग के वस्त्र या वस्तुएं त्यागना अशुभ फल देता है।विशेषकर विवाहित महिलाओं को बुधवार के दिन हरे रंग के वस्त्र पहनने की सलाह दी जाती है, ताकि दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहे।अगर इस दिन हरे रंग का अपमान किया जाए, तो घर में कलह, आर्थिक तंगी और वैवाहिक जीवन में दरार आ सकती है। 2. उधार देना या लेना बुधवार को उधार का लेन-देन करना वर्जित माना गया है। विशेषकर विवाहित महिलाओं को इस दिन न तो किसी को पैसा उधार देना चाहिए और न ही किसी से उधार लेना चाहिए।अगर बुधवार को उधार दिया या लिया जाए, तो पूरे सप्ताह या लंबे समय तक आर्थिक संकट बना रह सकता है। घर में पैसों की किल्लत हो सकती है और एक-एक पैसे के लिए तरसना पड़ सकता है।इसलिए इस दिन आर्थिक लेन-देन से बचना अत्यंत आवश्यक है। 3. झूठ बोलना और वाद-विवाद करना बुधवार का संबंध बुध ग्रह से है, जो वाणी और बुद्धि का कारक है। इस दिन वाणी में संयम रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।अगर विवाहित महिलाएं बुधवार को झूठ बोलती हैं या बेवजह वाद-विवाद करती हैं, तो उनके वैवाहिक जीवन में गलतफहमियां और तनाव बढ़ सकते हैं।यह गृह क्लेश का कारण बन सकता है और धीरे-धीरे बसा-बसाया घर भी बिखर सकता है।इसलिए इस दिन विशेष रूप से मधुर वाणी का प्रयोग करें और घर के वातावरण को शांत और सकारात्मक बनाए रखें। 4. घर की साफ-सफाई को नजरअंदाज करना बुधवार के दिन घर को साफ-सुथरा रखना अत्यंत आवश्यक है। गंदगी, बिखरा हुआ सामान या अव्यवस्था लक्ष्मी का अपमान माना जाता है, जिससे घर की समृद्धि धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।विशेष रूप से पूजा स्थल, रसोईघर और मुख्य द्वार को स्वच्छ रखना चाहिए।विवाहित महिलाओं को बुधवार के दिन विशेष ध्यान देना चाहिए कि घर में साफ-सफाई बनी रहे ताकि सकारात्मक ऊर्जा का वास हो और घर में खुशहाली बनी रहे। बुधवार को करें ये शुभ कार्य नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Budhwar #WednesdayTips #HinduBeliefs #VastuWednesday #SpiritualMistakes #WednesdayRituals #FamilyWellbeing #AvoidOnWednesday #IndianCulture #SuperstitionFacts #AstrologyTips

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Lord Rama

राम की अंतिम लीला: क्यों लिया भगवान श्रीराम ने सरयू में जल समाधि?

भगवान श्रीराम (Lord Rama) का जीवन भारतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों में आदर्श पुरुष के रूप में वर्णित है। रामायण की गाथा केवल उनके जीवन के वीरता और धर्मपालन के किस्सों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके जीवन के अंतिम चरणों में जल समाधि लेने की घटना भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस पौराणिक कथा के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं। आइए जानते हैं भगवान राम द्वारा जल समाधि लेने के पीछे की कथा और उसका महत्व। भगवान राम (Lord Rama) का राजतिलक और कालदूत का संदेश लंका विजय और अयोध्या वापसी के बाद भगवान राम का राजतिलक हुआ और अयोध्या में ‘रामराज्य’ की स्थापना हुई। यह कालखंड धर्म, न्याय और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। लेकिन समय का चक्र निरंतर चलता रहता है। जब भगवान राम का धरती पर मानव रूप में कार्यकाल पूरा होने का समय आया, तो स्वयं ब्रह्मा के आदेश पर कालदूत उनके पास आया। कालदूत ने भगवान राम को सूचित किया कि अब उनका पृथ्वी पर कार्य समाप्त हो गया है और उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप – विष्णु लोक में लौटना होगा। राम ने काल से एकांत में मिलने की बात कही थी। लेकिन उसी समय उनका प्रिय भाई लक्ष्मण कुछ विशेष परिस्थिति में उस गोपनीय सभा में प्रवेश कर गया। भगवान राम ने पहले ही शपथ ली थी कि यदि कोई इस वार्ता के दौरान आएगा, तो उसे त्यागना पड़ेगा। शपथ के पालन हेतु भगवान राम को अत्यंत दुख के साथ लक्ष्मण का त्याग करना पड़ा। लक्ष्मण का त्याग और भगवान राम का निर्णय एक विशेष घटना के दौरान लक्ष्मण जी (Lord Rama) उस कक्ष में प्रवेश कर गए जहाँ भगवान राम और कालदेव (यमराज) के बीच गुप्त वार्ता चल रही थी। इस अनजाने में हुए व्यवधान से उनकी बातचीत में विघ्न उत्पन्न हो गया। भगवान राम ने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि वार्ता में किसी के हस्तक्षेप पर उसे त्यागना होगा। अपनी इसी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए, भगवान राम ने भारी हृदय से लक्ष्मण का त्याग कर दिया।लक्ष्मण जी (Laxman Ji) ने अपने बड़े भाई की मर्यादा, प्रतिज्ञा और अयोध्या की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए इस निर्णय को सहर्ष स्वीकार किया। इसके बाद उन्होंने भगवान राम से विदा ली और सरयू नदी के तट पर जाकर जल समाधि लेकर अपने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया भगवान राम ने भी ली जल समाधि लक्ष्मण जी (Laxman Ji) के जल समाधि लेने के बाद भगवान राम गहरे शोक में डूब गए। साथ ही उन्हें यह भी भली-भांति ज्ञात हो गया था कि पृथ्वी पर उनके अवतार का उद्देश्य अब पूर्ण हो चुका है। इस बीच ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं ने भी उन्हें अपने दिव्य धाम, बैकुंठ, लौटने का आग्रह किया।अंततः भगवान राम (Lord Rama) ने सरयू नदी के तट पर पहुंचकर उसमें प्रवेश किया और जल समाधि के माध्यम से अपनी पृथ्वी पर लीला का समापन किया। इस प्रकार वे अपने मूल धाम, बैकुंठ, में लौट गए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Lord Rama #LordRam #JalSamadhi #Ramayana #Ayodhya #HinduMythology #RamFinalLeela #ShriRam #SaryuRiver #RamSamadhi #RamStory

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Story of Lord Parshuram’s Wrath

परशुराम जयंती 2025: धर्म की रक्षा के लिए उठाया था फरसा, जानिए क्यों किया क्षत्रियों का 21 बार संहार

भगवान परशुराम की जयंती (Parshuram Jayanti) प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2025 में यह तिथि 29 अप्रैल को शाम 5 बजकर 31 मिनट से आरंभ होकर 30 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 12 मिनट तक रहेगी। हालांकि, अधिकांश हिन्दू त्योहार उदयातिथि के आधार पर मनाए जाते हैं, लेकिन चूंकि भगवान परशुराम का जन्म प्रदोष काल में हुआ था, इसलिए इस बार परशुराम जयंती (Parshuram Jayanti) 29 अप्रैल 2025, मंगलवार के दिन मनाई जाएगी। भगवान परशुराम को ‘दिव्य योद्धा’, ‘ब्रह्म क्षत्रिय’ और ‘अखंड तपस्वी’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का क्रोधी रूप माना जाता है, जिन्होंने अन्याय और अधर्म के विरुद्ध खड़े होकर अपने फरसे से क्षत्रियों का 21 बार विनाश किया। लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर परशुराम ने क्षत्रियों को 21 बार क्यों मारा था? इसके पीछे कौन सी कथा है? 21 बार क्षत्रियों का विनाश क्यों? एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान परशुराम (Lord Parshuram) और सहस्त्रार्जुन के बीच एक भीषण युद्ध हुआ। सहस्त्रार्जुन, जो महिष्मती का सम्राट था, अत्यंत अहंकारी हो गया था और धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चुका था। वह वेदों, पुराणों और ब्राह्मणों का अपमान करता था, साथ ही ऋषियों के आश्रमों को भी नष्ट कर रहा था। जब यह अन्याय पराकाष्ठा पर पहुंचा, तब परशुराम अपने फरसे (परशु) को लेकर महिष्मती पहुंचे और सहस्त्रार्जुन से युद्ध किया। इस संग्राम में उन्होंने अपने अद्भुत पराक्रम से सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और उसके धड़ को काट डाला। इस घटना के बाद, परशुराम ने अपने पिता के कहने पर इस वध का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा शुरू की। इसी बीच सहस्त्रार्जुन का पुत्र अपने अन्य क्षत्रिय साथियों के साथ परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा, जहां तपस्या कर रहे ऋषि की हत्या कर दी और आश्रम को भी आग के हवाले कर दिया। जब माता रेणुका ने इस भयावह दृश्य को देखा, तो उन्होंने दुख में डूबे स्वर में अपने पुत्र परशुराम को पुकारा। जब परशुराम लौटे, तो उन्होंने अपनी मां को विलाप करते देखा और पाया कि उनके पिता का सिर धड़ से अलग था, और शरीर पर 21 गंभीर घाव थे। यह दृश्य देखकर परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने उसी क्षण यह प्रतिज्ञा की कि वे हैहय वंश और उसके समर्थक क्षत्रियों का अंत करेंगे। उन्होंने शपथ ली कि वे 21 बार क्षत्रियों का संहार कर इस पाप का प्रतिशोध लेंगे। पुराणों के अनुसार परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा करते हुए 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया। उनका यह अभियान धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए था। परशुराम नाम कैसे पड़ा पुराणों के अनुसार, भगवान परशुराम (Lord Parshuram) का वास्तविक नाम ‘राम’ था। लेकिन जब भगवान शिव ने उन्हें एक दिव्य अस्त्र ‘परशु’ प्रदान किया, तो वे हमेशा उसी अस्त्र को अपने साथ रखने लगे। शिवजी द्वारा दिए गए इस परशु को धारण करने के कारण ही वे ‘परशु-राम’ कहलाए, जिसका अर्थ है – परशु धारण करने वाला राम। यही नाम कालांतर में प्रसिद्ध हुआ और वे ‘परशुराम’ के नाम से विख्यात हो गए। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया क्षत्रियों का संहार और धर्म की स्थापना कहा जाता है कि परशुराम ने प्रत्येक युद्ध में क्षत्रियों को पराजित करने के बाद उनकी भूमि को ब्राह्मणों को दान कर दिया। उन्होंने कुरुक्षेत्र के निकट ‘समंतपंचक’ नामक स्थान पर क्षत्रियों का रक्त बहाया और वहाँ पाँच सरोवर बनाए। इसके बाद उन्होंने तपस्या की और हिंसा का मार्ग त्याग दिया। परशुराम अमर माने जाते हैं और आज भी कई मान्यताओं के अनुसार वे हिमालय में तपस्या कर रहे हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Lord Parshuram #ParshuramJayanti2025 #LordParshuram #HinduFestival #ParshuramHistory #DharmaProtector #VishnuAvatar #ParshuramWrath #KshatriyaAnnihilation #ParshuramLegend #ParshuramStory

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Friday Lakshmi Puja

शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन से बरसेगी धनवर्षा: जानिए सही विधि, नियम और फायदे

शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) को समर्पित माना जाता है। देवी लक्ष्मी को धन, वैभव, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा और विधिपूर्वक मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं, उनके जीवन में कभी धन की कमी नहीं होती और घर में सुख-शांति बनी रहती है। खासकर शुक्रवार (Friday) को लक्ष्मी पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन का सही तरीका, आवश्यक सामग्री, पूजन विधि और इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बातें। शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन का महत्व शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा करने का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन उनकी उपासना करने से धन-संपदा की प्राप्ति होती है। यदि आपके घर में भी धन की कमी बनी रहती है या मां लक्ष्मी का वास नहीं टिक पा रहा है, तो शुक्रवार (Friday) को विधिपूर्वक लक्ष्मी जी का पूजन करें और व्रत रखें। मां लक्ष्मी समृद्धि और वैभव की देवी हैं, इसीलिए इनकी पूजा अत्यंत पुण्यफलदायी मानी गई है। माता को प्रसन्न करने हेतु अनेक पूजा-विधियाँ, उपाय, आराधना के तरीके और मंत्र बताए गए हैं, जिनसे उनकी अनुकंपा प्राप्त होती है। शुक्रवार को मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए करें ये आसान और प्रभावी उपाय इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया व्रत रखने का नियम इस दिन श्रद्धालु व्रत भी रखते हैं। व्रती केवल फलाहार करते हैं या एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। दिनभर मां लक्ष्मी का नामजप और ध्यान करते हैं। सूरज ढलने के बाद पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Maa Lakshmi #LakshmiPujan #Dhanteras #WealthAttraction #LakshmiBlessings #FestiveVibes #FridayPuja #LakshmiPujaVidhi #PujaRules #Diwali2025 #ProsperityRituals

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Guru Gobind Singh Ji

Guru Gobind Singh Ji: पांच ककार, जो सिखों की पहचान और गौरव के प्रतीक बने

गुरु गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) न केवल एक महान आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि वे एक वीर योद्धा, कवि और दार्शनिक भी थे। उन्होंने सिख धर्म को एक नई दिशा दी और ‘खालसा पंथ’ की स्थापना कर सिखों को संगठित किया। गुरु गोबिंद सिंह ने सिखों के लिए पांच महत्वपूर्ण प्रतीकों को अपनाने की परंपरा शुरू की, जिन्हें ‘पांच ककार’ (Five Kakaars) कहा जाता है। इन पांच ककारों को धारण करना हर सिख के लिए अनिवार्य माना जाता है। आइए जानते हैं कि ये पांच ककार क्या हैं और इनका सिख धर्म में क्या महत्व है। खालसा पंथ (Khalsa Panth) और पांच ककार की शुरुआत गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने 1699 में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ (Khalsa Panth)  की स्थापना की थी। इस दिन उन्होंने अपने अनुयायियों को एक विशेष पहचान दी और उन्हें ‘पांच ककार’ धारण करने का आदेश दिया। ये पांच ककार न केवल उनकी धार्मिक पहचान का प्रतीक बने बल्कि इनका गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व भी है। क्या हैं पांच ककार? सिख धर्म में पांच ककार (Five Kakaars) निम्नलिखित हैं: 1. केश (अवढ़िक बाल) केश, यानी बिना कटे बाल, सिख धर्म का सबसे महत्वपूर्ण ककार है। गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने अपने अनुयायियों को आदेश दिया कि वे अपने बालों को न काटें और उन्हें प्राकृतिक रूप में बनाए रखें। इसका उद्देश्य ईश्वर की दी गई प्राकृतिक देह को सम्मान देना और सिखों की अलग पहचान बनाए रखना था। इसके अलावा, लंबे बाल धैर्य, आत्म-नियंत्रण और सादगी का प्रतीक माने जाते हैं। 2. कंघा (कंघी) कंघा लकड़ी से बना एक छोटा कंघा होता है, जिसे सिख अपने केशों को साफ-सुथरा और व्यवस्थित रखने के लिए प्रयोग करते हैं। यह सफाई और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुसार, शरीर और आत्मा दोनों की पवित्रता आवश्यक है, और कंघा इस बात का प्रतीक है कि सिखों को अपने बालों के साथ-साथ अपने विचारों को भी स्वच्छ और व्यवस्थित रखना चाहिए। 3. कड़ा (लोहे का ब्रेसलेट) कड़ा एक लोहे का ब्रेसलेट होता है, जिसे सिख अपनी कलाई में पहनते हैं। यह गुरु के प्रति अटूट आस्था और आज्ञाकारिता का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, यह बुरे कर्मों से बचने की भी याद दिलाता है। जब भी कोई व्यक्ति कुछ गलत करने के लिए हाथ उठाता है, तो यह कड़ा उसे याद दिलाता है कि उसे धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। 4. कृपाण (छोटी तलवार) कृपाण एक छोटी तलवार होती है, जिसे हर सिख धारण करता है। यह साहस, आत्मरक्षा और न्याय के लिए खड़े होने का प्रतीक है। कृपाण यह दर्शाता है कि सिख धर्म केवल आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ने की भी शिक्षा दी गई है। हालांकि, कृपाण का उपयोग केवल आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए किया जाता है। 5. कच्छा (विशेष प्रकार का अंडरवियर) कच्छा एक विशेष प्रकार का अंडरवियर या निकर होता है, जिसे सिख पहनते हैं। यह संयम, पवित्रता और नैतिकता का प्रतीक है। यह एक योद्धा की पोशाक का हिस्सा भी है, जिससे सिखों को हमेशा सतर्क और अनुशासित रहने की प्रेरणा मिलती है। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व पांच ककार (Five Kakaars) का महत्व गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने जब खालसा पंथ (Khalsa Panth)  की स्थापना की, तब उन्होंने सिखों को इन पांच प्रतीकों को अपनाने के लिए कहा। इनका मुख्य उद्देश्य सिखों को धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक रूप से मजबूत बनाना था। पांच ककार सिखों की पहचान को बनाए रखने के साथ-साथ उन्हें अनुशासन, साहस और सेवा की भावना से जोड़ते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News  Guru Gobind Singh #GuruGobindSinghJi #FiveKs #SikhIdentity #PanjKakaar #KhalsaTradition #SikhPride #Sikhism #SikhSymbols #SikhHeritage #SpiritualStrength

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Mamleshwar Temple Pahalgam

ममलेश्वर मंदिर: पहलगाम का ऐतिहासिक शिव मंदिर जहां भगवान शिव ने काटा था गणेश का शीश

कश्मीर घाटी के सुरम्य नगर पहलगाम में स्थित ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) न केवल अपनी प्राचीनता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह हिन्दू धर्म के एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में भी जाना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यह वह पवित्र स्थल है जहाँ कथानुसार भगवान शिव (Lord Shiva) ने अपने पुत्र गणेश का शीश काटा था।​ ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) की स्थापना लगभग चौथी शताब्दी में हुई थी, जो इसे कश्मीर घाटी के प्राचीनतम मंदिरों में से एक बनाती है। यह मंदिर ममलाका गांव में स्थित है, जो पहलगाम से लगभग एक मील की दूरी पर है। मंदिर का नाम ‘ममलेश्वर’ या ‘ममल’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘जाओ मत’, जो इस स्थान की पवित्रता और महत्व को दर्शाता है।​ पौराणिक कथा ममलेश्वर मंदिर (Mamaleshwar Temple) से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है, जिसके अनुसार एक बार देवी पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी (Ganesh Ji) को द्वार पर बैठा दिया और निर्देश दिया कि जब तक वे न लौटें, तब तक किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दिया जाए। माता की आज्ञा का पालन करते हुए गणेश जी (Ganesh Ji) बाहर पहरा देने लगे। उसी समय भगवान शिव (Lord Shiva) वहां पहुंचे और पार्वती जी से मिलने के लिए भीतर जाने लगे। लेकिन द्वार पर विराजमान गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। शिव जी ने कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन गणेश जी माता की आज्ञा का पालन करते हुए डटे रहे। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती बाहर आईं और ये दृश्य देखा, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हो गईं। उन्होंने शिव जी को सारी बात समझाई और अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। शिव जी को अपनी गलती का अहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने एक हाथी का सिर लाकर गणेश जी के शरीर से जोड़ा और उन्हें नया जीवन प्रदान किया। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया वास्तुकला और संरचना पहलगाम, जो कश्मीर घाटी का एक बेहद मनमोहक स्थल है, अक्सर ‘धरती का स्वर्ग’ कहा जाता है। लेकिन यह स्थान केवल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव (Lord Shiva) और उनके परिवार से जुड़े कई पूजनीय मंदिर और तीर्थस्थल स्थित हैं। इन्हीं में एक प्रमुख मंदिर है ममलेश्वर मंदिर, जिसे स्थानीय लोग ‘मम्मल मंदिर’ के नाम से भी जानते हैं। यह मंदिर पहलगाम गांव में स्थित है और कश्मीर घाटी के प्राचीनतम और प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में लोहरा वंश के राजा जयसिंह द्वारा कराया गया था। उन्होंने मंदिर की छत को एक स्वर्ण कलश से सुशोभित करवाया था। भगवान शिव को समर्पित यह पवित्र स्थल हर वर्ष हजारों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है, जो यहां आकर शिवजी के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इस प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में दो सुंदर नंदी की प्रतिमाएं स्थित हैं, और इनके समीप एक शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग के पास ही एक प्राकृतिक जल स्रोत से पानी निकलता है, जो एक छोटे से कुंड में एकत्र होता है, जिससे यह स्थान और भी पवित्र हो जाता है। यह मंदिर ‘मम्मल मंदिर’ नाम से भी प्रसिद्ध है। इस नाम के पीछे एक रोचक पौराणिक कथा है। ‘मम’ का अर्थ होता है ‘मत’ और ‘मल’ का अर्थ होता है ‘जाना’, यानी ‘मत जाओ’। यह नाम प्रतीक है सुरक्षा और संरक्षण का। Latest News in Hindi Today Hindi News Mamaleshwar Temple #MamleshwarTemple #Pahalgam #ShivaTemple #LordShiva #GaneshStory #AncientTemples #PilgrimageIndia #SpiritualTravel #HinduMythology #HistoricTemples

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Heatwave Days & Surya Dev Worship Tips

नौतपा 2025: 25 मई से शुरू होंगे भीषण गर्मी के नौ दिन, जानें धार्मिक महत्व और सूर्य देव को प्रसन्न करने के उपाय

भारत में जब मई-जून की चिलचिलाती गर्मी अपने चरम पर होती है, तब एक विशेष समय को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है, जिसे ‘नौतपा‘ कहा जाता है। नौतपा यानी वह नौ दिन, जब सूर्य की तपिश सबसे तीव्र मानी जाती है और पृथ्वी पर उसका सीधा प्रभाव महसूस किया जाता है। लेकिन ज्योतिष और धार्मिक दृष्टि से यह केवल गर्मी नहीं, बल्कि सूर्य देव की विशेष कृपा पाने का अवसर भी है। नौतपा 2025 कब से शुरू होगा? नौतपा वह समय होता है जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं। इस दौरान सूर्य पृथ्वी के नजदीक होते हैं, जिससे गर्मी की तीव्रता में वृद्धि हो जाती है। नौतपा की अवधि 9 दिनों की होती है, जो हर साल मई या जून में आती है और जब सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तब यह समाप्त हो जाता है। पंचांग के अनुसार, 2025 में नौतपा 25 मई से शुरू होकर 8 जून तक चलेगा। यह समय सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने से शुरू होता है। इस वर्ष सूर्य 25 मई को दोपहर के समय रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेगा, और उसके साथ ही नौतपा की शुरुआत मानी जाएगी। इस दौरान सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अत्यधिक तीव्रता से पड़ती हैं, जिससे मौसम में जबरदस्त गर्मी देखने को मिलती है। नौतपा का ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नौतपा में सूर्य की ऊर्जा सबसे अधिक प्रभावशाली होती है। सूर्य आत्मा और आत्मबल का प्रतीक माने जाते हैं। इस समय सूर्य देव की आराधना, आदित्य ह्रदय स्तोत्र, सूर्य नमस्कार और ध्यान करने से शरीर और मन दोनों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। नौतपा के नौ दिन मौसम विज्ञान के लिहाज से भी अहम माने जाते हैं। इस दौरान अधिक गर्मी से समुद्र का जल वाष्पित होता है, जो आगे चलकर मानसून में वर्षा का कारण बनता है। इसीलिए नौतपा को ‘वर्षा की तैयारी का समय’ भी कहा जाता है। नौतपा में कौन-से कार्य करने चाहिए? नौतपा के दौरान सूर्य देव की विधिपूर्वक उपासना करना चाहिए, जिससे जातक की कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत हो सकती है। प्रत्येक सुबह सूर्य देव को जल अर्पित करना भी लाभकारी है। इसके लिए एक तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें लाल फूल और रोली डालें, फिर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। यह प्रक्रिया करने से जातक को सूर्य देव की कृपा मिलती है और उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया क्यों होती है नौतपा के दौरान इतनी गर्मी? नौतपा के दौरान इतनी अधिक गर्मी होने का कारण यह है कि इस समय सूर्य देव पृथ्वी के बहुत करीब होते हैं, जिससे उनकी किरणें सीधे और तीव्र रूप से पृथ्वी पर पड़ती हैं। जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में होते हैं, तो इसका गर्मी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र शुक्र देव का नक्षत्र होता है, जो सूर्य का शत्रु माना जाता है। इस मिलन के कारण गर्मी में वृद्धि होती है। नौतपा और मानसून संबंध ज्योतिषियों के अनुसार, सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में 15 दिनों तक रहते हैं। जबकि नौतपा की अवधि 9 दिनों की होती है और इस दौरान भयंकर गर्मी का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसका प्रभाव 15 दिनों तक जारी रहता है। इस तेज गर्मी के कारण समुद्रों के ऊपर वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे पानी से भरे बादल बनते हैं, जो मानसून को सक्रिय करने में मदद करते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News नौतपा #Nautapa2025 #SuryaDev #Heatwave2025 #HinduTraditions #SpiritualRemedies #IndianSummer #SuryaWorship #NautapaHeat #VedicRituals #May2025Weather

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Ganga Saptami 2025

गंगा सप्तमी 2025: गंगा अवतरण का पावन पर्व कब और कैसे मनाएं?

हिंदू धर्म में गंगा नदी को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि एक दिव्य माता और मोक्ष का मार्ग माना गया है। जिस तरह जीवन में माता का स्थान सर्वोपरि होता है, ठीक उसी प्रकार गंगा माता (Maa Ganga) को भी समस्त पापों का नाश करने वाली और जीवन में पवित्रता लाने वाली देवी माना गया है। हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रद्धा और भक्ति के साथ गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व मनाया जाता है। यह दिन मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने की स्मृति में समर्पित होता है। गंगा सप्तमी का महत्व गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे गंगा जयंती भी कहा जाता है। यह दिन मां गंगा (Maa Ganga) के धरती पर आगमन की याद दिलाता है। राजा भगीरथ की कठिन तपस्या के फलस्वरूप मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। उन्होंने अपने पूर्वजों के पापों को धोकर उन्हें मोक्ष प्रदान किया। इस दिन ही मां गंगा (Maa Ganga) का पवित्र जल धरती पर आया, जिससे न केवल धार्मिक शुद्धता मिली, बल्कि यह दिन आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक भी बन गया। गंगा सप्तमी के दिन गंगा नदी में स्नान, पूजा और ध्यान करने का विशेष महत्व है। ऐसा करने से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है। साथ ही, इस दिन किए गए दान से अत्यधिक पुण्य मिलता है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है।इसे भी पढ़ें:-   गंगा सप्तमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त: वैदिक पंचांग के अनुसार, 03 मई 2025 को सुबह 07:51 बजे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि आरंभ होगी और 04 मई 2025 को सुबह 04:18 बजे समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदया तिथि को महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए 03 मई 2025 को ही गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन गंगा स्नान के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 10:58 बजे से दोपहर 01:38 बजे तक रहेगा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया गंगा सप्तमी शुभ योग (Ganga Saptami Shubh Yoga) ज्योतिषियों के अनुसार, इस वर्ष गंगा सप्तमी पर त्रिपुष्कर योग का निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही रवि योग और शिववास योग का भी संयोग है। रवि योग में गंगा स्नान करने से सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, जबकि शिववास योग में गंगा स्नान कर महादेव की पूजा करने से सुख, समृद्धि और सौभाग्य में वृद्धि होती है। गंगा सप्तमी पर इन गलतियों से बचें नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Ganga Saptami #GangaSaptami2025 #GangaAvataran #HinduFestival #GangaPuja #SpiritualIndia #VratRituals #HinduTradition #RiverGanga #GangaJayanti #PiousFestival

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Kailash Mansarovar Yatra 2025

कैलाश मानसरोवर यात्रा 2025: शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया

हिंदू धर्म, बौद्ध, जैन और तिब्बती बोन धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र माने जाने वाले कैलाश मानसरोवर की यात्रा  (Kailash Mansarovar Yatra) आध्यात्मिकता, आस्था और साहस का संगम मानी जाती है। हर साल हजारों श्रद्धालु इस कठिन लेकिन दिव्य यात्रा में भाग लेते हैं। कैलाश पर्वत को भगवान शिव (Lord Shiva) का निवास स्थल माना जाता है और मानसरोवर झील को अमृत समान पवित्र जलधारा। 2025 में भी यह यात्रा एक बार फिर भारतीय श्रद्धालुओं के लिए खुल रही है, और इसके लिए पंजीकरण प्रक्रिया जल्द ही शुरू हो जाएगी। कब से कब तक होगी यात्रा? इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) की शुरुआत 30 जून 2025 से होगी। यात्रा पांच चरणों में 50-50 लोगों के दल के साथ आयोजित की जाएगी। यात्रा का पहला दल 10 जुलाई को लिपुलेख पास के रास्ते चीन में प्रवेश करेगा, जबकि अंतिम दल की वापसी 22 अगस्त 2025 को भारत में होगी। यानी इस बार कैलाश मानसरोवर यात्रा का संपूर्ण आयोजन 30 जून से 22 अगस्त 2025 तक निर्धारित है। हर दल की यात्रा दिल्ली से आरंभ होगी। प्रारंभिक पड़ाव टनकपुर होगा, जहां एक रात विश्राम होगा। इसके बाद धारचुला में दो रातें, गुंजी में दो और नाभीढांग में दो रात ठहरने के बाद यात्रा दल कैलाश मानसरोवर क्षेत्र की ओर आगे बढ़ेगा। वापसी के समय यात्री बूंदी, चौकोड़ी और अल्मोड़ा जैसे स्थानों से होते हुए दिल्ली लौटेंगे। इस पूरी यात्रा की अवधि कुल 22 दिन की होगी। रजिस्ट्रेशन कैसे करें? कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) में शामिल होने के लिए इच्छुक श्रद्धालुओं को भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन पंजीकरण करना होगा। आवेदन के समय आवेदक के पास वैध पासपोर्ट, पैन कार्ड और तीन पासपोर्ट साइज फोटो होना अनिवार्य है। पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करने के बाद निर्धारित शुल्क जमा करना होगा। यदि आवेदन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाती है, तो आवेदक को इसकी पुष्टि SMS या ईमेल के माध्यम से भेज दी जाती है। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) की अवधि सामान्यतः 22 से 25 दिनों की होती है। इस आध्यात्मिक और कठिन यात्रा पर जाने के लिए एक श्रद्धालु को लगभग 1.5 लाख से 3 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है, जो यात्रा के माध्यम, सुविधाओं और मार्ग के अनुसार बदल सकता है। इस यात्रा में शामिल होने के लिए शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ और फिट होना अनिवार्य है, क्योंकि इसमें ऊंचाई पर ट्रेकिंग और कठिन रास्तों से गुजरना होता है। इसके अलावा, यात्री के पास एक वैध पासपोर्ट होना आवश्यक है, क्योंकि यात्रा का कुछ हिस्सा चीन (तिब्बत) के क्षेत्र में आता है, जहां प्रवेश के लिए पासपोर्ट अनिवार्य होता है। कितने श्रद्धालु करेंगे यात्रा? भारत सरकार के निर्देशानुसार, इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा में कुल 5 दलों को भेजा जाएगा, जिनमें प्रत्येक दल में 50-50 यात्री शामिल होंगे। इस प्रकार कुल 250 श्रद्धालु इस पवित्र यात्रा का हिस्सा बन सकेंगे। इसके अलावा, कुछ निजी टूर ऑपरेटर भी कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra) की व्यवस्था करते हैं। हालांकि इनके माध्यम से यात्रा करने पर भी पंजीकरण प्रक्रिया भारत सरकार की विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के जरिए ही पूरी करनी होती है। यदि कोई यात्री प्राइवेट टूर ऑपरेटर के माध्यम से यात्रा करना चाहता है, तो वे आवेदन प्रक्रिया में भी पूरी सहायता प्रदान करते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Kailash Mansarovar Yatra #KailashMansarovarYatra2025 #ShivDham #SpiritualJourney #MansarovarYatra #MountKailash #KailashYatra #Pilgrimage2025 #KailashDarshan #HolyYatra #HimalayanPilgrimage

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Kalashtami

कलााष्टमी 2025: भगवान शिव की पूजा से पाएं जीवन में सुख और शांति

प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को कालाष्टमी (Kalashtami) का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन खासकर भगवान शिव (Lord Shiv) और उनके रौद्र रूप की पूजा अर्चना के लिए समर्पित होता है। इस दिन विशेष रूप से रात्रि को उपवास और शिव पूजा (Shiv Puja) की जाती है, क्योंकि इसे भगवान शिव (Lord Shiv) के नाथ रूप से जोड़कर देखा जाता है।  कालाष्टमी पूजा का शुभ समय  वैदिक पंचांग के अनुसार 20 अप्रैल को शाम 7 बजे से वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत होगी, जो 21 अप्रैल को शाम 06:58 बजे समाप्त होगी। काल भैरव देव की पूजा विशेष रूप से रात के समय की जाती है, जिसे निशा काल कहा जाता है। इस वर्ष वैशाख माह की कालाष्टमी (Kalashtami) 20 अप्रैल को मनाई जाएगी, और निशा काल में पूजा का समय रात 11:58 बजे से 12:42 बजे तक रहेगा। कालाष्टमी (Kalashtami) का महत्व कालाष्टमी (Kalashtami) का पर्व विशेष रूप से भगवान शिव के रौद्र रूप की पूजा के लिए जाना जाता है। यह तिथि उन भक्तों के लिए बेहद शुभ मानी जाती है, जो अपने जीवन में हर तरह के दुखों और परेशानियों से मुक्ति चाहते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से सारे नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाते हैं और वह भगवान शिव की विशेष कृपा का पात्र बनता है। साथ ही, इस दिन भगवान शिव के साथ ही उनके वाहन नंदी और उनके पार्थिव रूप, कालभैरव की भी पूजा की जाती है। इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व कालाष्टमी पूजा विधि नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Kalashtami #Kalashtami2025 #LordShiva #Kalabhairav #ShivaWorship #HinduFestival #SpiritualPeace #PujaBenefits #KalashtamiPuja #Bhakti #IndianTradition

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