Anjali Choudhary

Papmochani Ekadashi 2025 date

पापमोचनी एकादशी 2025: पुण्य प्राप्ति और पापों से मुक्ति का पावन अवसर

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और पापमोचनी एकादशी इनमें से एक अत्यंत पवित्र और फलदायी एकादशी मानी जाती है। यह व्रत चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) 25 मार्च को पड़ रही है। इस दिन मां तुलसी की विशेष पूजा करने से पापों से मुक्ति और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं कि पापमोचनी एकादशी पर कैसे करें मां तुलसी की पूजा और इस व्रत का क्या है महत्व। पापमोचनी एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त साल 2025 में पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) 25 मार्च को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 25 मार्च को  सुबह 05:05 बजे से शुरू होकर 26 मार्च को रात 03:45 बजे तक रहेगी। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने का विशेष महत्व है। पापमोचनी एकादशी के दिन सुबह 06:15 बजे से 08:45 बजे तक पूजा करने का शुभ मुहूर्त रहेगा। इस दौरान पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी का महत्व पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह व्रत पापों से मुक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। इस दिन मां तुलसी की पूजा करने से अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi)  के दिन व्रत रखने और मां तुलसी (Maa Tulsi)  की पूजा करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी होता है, जो अपने पापों से मुक्ति चाहते हैं। पापमोचनी एकादशी की पूजा विधि इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ तुलसी पूजा मंत्र (Tulsi Puja Mantra) 1. वृंदा देवी-अष्टक: गाङ्गेयचाम्पेयतडिद्विनिन्दिरोचिःप्रवाहस्नपितात्मवृन्दे । बन्धूकबन्धुद्युतिदिव्यवासोवृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम् ॥ 2. ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ॥ 3. समस्तवैकुण्ठशिरोमणौ श्रीकृष्णस्य वृन्दावनधन्यधामिन् । दत्ताधिकारे वृषभानुपुत्र्या वृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम् ॥ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Papmochani Ekadashi #PapmochaniEkadashi #EkadashiVrat #HinduFestivals #PapmochaniEkadashi2025 #LordVishnu #Spirituality #FastingBenefits #HinduReligion #PunyaKarma #VratKatha

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Sacred Abode of Lord Vitthal & PM Modi Visit

मुखवा मंदिर: भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ

भारत एक ऐसा देश है जहां अनेक धार्मिक स्थल और मंदिर अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं में से एक है मुखवा मंदिर (Mukhwa Temple), जो हाल ही में चर्चा में आया है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi)  भी इस मंदिर के दर्शन कर चुके हैं। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता के लिए बल्कि अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। आइए जानते हैं कि मुखवा मंदिर कहां स्थित है, यह क्यों प्रसिद्ध है, इसका क्या महत्व है और यहां किसकी पूजा की जाती है। मुखवा मंदिर कहां स्थित है? मुखवा उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में हर्षिल वैली में स्थित एक खूबसूरत पहाड़ी गांव है। यह गांव गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है, जिससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है। इसे मुखीमठ भी कहा जाता है। यहां एक मंदिर है, जिसे माता गंगा का मायका माना जाता है। मुखवा मंदिर क्यों प्रसिद्ध है? मुखवा गांव को मां गंगा का शीतकालीन निवास कहा जाता है। सर्दियों में जब गंगोत्री धाम बर्फ से ढक जाता है, तब माता गंगा की मूर्ति वहां से मुखवा लाई जाती है। सर्दियों की शुरुआत से पहले भक्तों की शोभायात्रा के साथ माता गंगा गंगोत्री से इस गांव में आती हैं। इसे माता गंगा का मायका माना जाता है, इसलिए जब उनकी मूर्ति यहां लाई जाती है, तो स्थानीय लोगों में खास उत्साह देखने को मिलता है। मुखवा मंदिर का क्या है महत्व? मुखवा मंदिर (Mukhwa Temple) का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है। सर्दियों में गंगोत्री धाम के कपाट बंद होने के बाद भी भक्त मां गंगा की पूजा कर सकें, इसलिए उनकी प्रतिमा को मुखवा गांव लाया जाता है। यहां शीतकाल के दौरान मां गंगा की नियमित पूजा होती है। माना जाता है कि इस स्थान पर पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। प्रधानमंत्री ने भी शीतकालीन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मुखवा गांव की यात्रा की थी। इसके अलावा, मुखवा मंदिर का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां प्राकृतिक सौंदर्य और शांति का अनूठा संगम है। कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर भक्तों को आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव प्रदान करता है। मुखवा गांव मां गंगा के शीतकालीन गद्दी स्थल होने के कारण कई प्राचीन मंदिरों का घर है। इनमें मुखीमठ मंदिर खासतौर पर मां गंगा को समर्पित है। यह स्थान हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मुखीमठ मंदिर अपनी खूबसूरत वास्तुकला और बारीक नक्काशी के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसकी भव्यता देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है। इसे भी पढ़ें:- पृथ्वी पर सुरक्षित लौटेंगे सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर मुखवा मंदिर कैसे पहुंचे? मुखवा मंदिर (Mukhwa Temple) तक पहुंचने के लिए सबसे पहले आपको दिल्ली से ऋषिकेश जाना होगा। वहां से उत्तरकाशी होते हुए हर्षिल पहुंच सकते हैं। दिल्ली से मुखवा मंदिर की दूरी लगभग 480 किलोमीटर है और यह यात्रा 12 घंटे से कम समय में पूरी की जा सकती है। अगर आप हवाई मार्ग से यात्रा करना चाहते हैं, तो देहरादून के जॉली ग्रांट एयरपोर्ट तक पहुंचकर वहां से ऋषिकेश और फिर उत्तरकाशी के हर्षिल वैली जा सकते हैं। पीएम मोदी का मुखवा मंदिर दर्शन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने मुखवा मंदिर के दर्शन किए थे। पीएम मोदी (PM Modi) के मुखवा मंदिर दर्शन के बाद इस मंदिर की लोकप्रियता और बढ़ गई है। उन्होंने इस मंदिर के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया और लोगों से इस पवित्र  स्थल के दर्शन करने का आग्रह किया। Latest News in Hindi Today Hindi news Mukhwa Temple #MukhwaTemple #VitthalMandir #SacredTemple #PMModiVisit #SpiritualJourney #HinduTemple #DivinePlace #Bhakti #PilgrimageSite #ReligiousTourism

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Why Abhimanyu Died in Chakravyuh

महाभारत कथा: गर्भ में ही अभिमन्यु को मिला था चक्रव्यूह भेदन का ज्ञान, फिर क्यों युद्ध में गंवानी पड़ी जान?

महाभारत (Mahabharata) एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें धर्म, नीति, वीरता और बलिदान की अद्भुत कहानियां समाहित हैं। इस महाकाव्य के नायकों में से एक अभिमन्यु, अपनी वीरता और अदम्य साहस के लिए जाने जाते हैं। अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु (Abhimanyu) को चक्रव्यूह भेदन की कला मां के गर्भ में ही सीखने का अवसर मिला था, लेकिन युद्धभूमि में जब उन्होंने चक्रव्यूह भेदने का प्रयास किया, तो वे उसमें फंस गए और वीरगति को प्राप्त हो गए। यह कहानी केवल एक योद्धा के बलिदान की नहीं है, बल्कि यह ज्ञान और अधूरे ज्ञान के प्रभाव की भी एक महत्वपूर्ण सीख देती है। आइए जानते हैं कि अभिमन्यु ने गर्भ में कैसे सीखा चक्रव्यूह भेदन, और क्यों यह उनकी मृत्यु का कारण बन गया। गर्भ में ही सीख लिया था चक्रव्यूह भेदन का रहस्य महाभारत (Mahabharata) के अनुसार, जब सुभद्रा गर्भवती थीं, तब एक दिन अर्जुन उन्हें युद्ध कौशल और विभिन्न युद्धनीतियों की जानकारी दे रहे थे। इसी दौरान उन्होंने चक्रव्यूह भेदन की जटिल प्रक्रिया बतानी शुरू की। गर्भ में पल रहे अभिमन्यु को भी यह शिक्षा सुनाई दी और उन्होंने इसे समझ लिया। लेकिन कथा के अनुसार, जब अर्जुन चक्रव्यूह (Chakravyuh) से बाहर निकलने का रहस्य बताने वाले थे, तब सुभद्रा को नींद आ गई और उन्होंने सुनना बंद कर दिया। इसी कारण अभिमन्यु केवल चक्रव्यूह में प्रवेश करने की कला सीख पाए, लेकिन बाहर निकलने का तरीका नहीं जान सके। यही अधूरी शिक्षा आगे चलकर उनकी मृत्यु का कारण बनी। क्या होता है चक्रव्यूह? चक्रव्यूह (Chakravyuh) एक विशेष प्रकार की सैन्य रचना होती थी, जिसे शत्रु को भ्रमित करने और उसे पराजित करने के लिए बनाया जाता था। यह कई घेरों में बना होता था और प्रत्येक घेरे में योद्धाओं की एक विशेष व्यवस्था होती थी। चक्रव्यूह (Chakravyuh) एक ऐसा रणनीतिक युद्ध विन्यास था, जिसमें प्रवेश करना आसान था, लेकिन बाहर निकलना बेहद कठिन। इसे भेदने की कला केवल कुछ महान योद्धाओं को ही आती थी, जिनमें श्रीकृष्ण (Shri Krishna), अर्जुन, द्रोणाचार्य और प्रद्युम्न शामिल थे। इनके अलावा, अभिमन्यु भी इस जटिल व्यूह के बारे में जानते थे। अभिमन्यु की वीरता और कुरुक्षेत्र युद्ध में उनका बलिदान महाभारत युद्ध के 13वें दिन, जब पांडवों के सामने चक्रव्यूह (Chakravyuh) को भेदने की चुनौती आई, तो अभिमन्यु (Abhimanyu) ने बिना किसी संकोच के इसमें प्रवेश करने का फैसला किया। अपनी अद्भुत वीरता और युद्ध कौशल के बल पर उन्होंने चक्रव्यूह के छह द्वार सफलतापूर्वक पार कर लिए, लेकिन सातवें द्वार पर आकर वे घिर गए और आगे बढ़ना कठिन हो गया। महाभारत (Mahabharata) के तेरहवें दिन, जब कौरवों ने चक्रव्यूह की रचना की, तब अर्जुन और श्रीकृष्ण (Shri Krishna) युद्ध में कहीं और व्यस्त थे। द्रोणाचार्य ने यह रणनीति बनाई थी ताकि पांडवों को भारी नुकसान पहुंचाया जा सके। जब पांडवों को पता चला कि कौरवों ने चक्रव्यूह बना लिया है, तब इस सैन्य संरचना को भेदने के लिए अर्जुन के अलावा कोई अन्य योग्य योद्धा नहीं था। तभी अभिमन्यु ने कहा कि वे इस चक्रव्यूह को तोड़ने में सक्षम हैं। हालांकि, उन्हें पता था कि उन्हें बाहर निकलने की विधि नहीं मालूम, लेकिन उन्होंने निडरता से इस चुनौती को स्वीकार किया। इसे भी पढ़ें:- कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? अभिमन्यु का चक्रव्यूह में प्रवेश और फंस जाना अभिमन्यु (Abhimanyu) ने अपने बल और साहस से चक्रव्यूह के पहले छह द्वार भेद दिए। उन्होंने कौरवों के कई महारथियों – जयद्रथ, दु:शासन, कर्ण और द्रोणाचार्य को चुनौती दी और कई योद्धाओं को पराजित किया। लेकिन जब वे सातवें द्वार पर पहुंचे, तब कौरवों ने नियमों को तोड़ते हुए उन पर एक साथ हमला कर दिया। अभिमन्यु के चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद, जयद्रथ ने पांडवों को भीतर जाने से रोक दिया, जिससे वे अकेले पड़ गए। इस स्थिति का लाभ उठाकर कौरवों के महारथी—द्रोणाचार्य, कर्ण, दु:शासन, कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा—ने उन पर एक साथ आक्रमण कर दिया। युद्ध के नियमों के विपरीत जाकर, कौरवों ने निहत्थे अभिमन्यु पर निर्ममता से हथियारों से प्रहार किया। अंततः, दु:शासन के पुत्र ने उनके सिर पर गदा से प्रहार किया, जिससे अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए। अभिमन्यु की कथा से क्या सीख मिलती है? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Abhimanyu Mahabharata #Mahabharat #Abhimanyu #Chakravyuh #KurukshetraWar #MahabharataStory #ArjunaSon #HinduMythology #EpicBattle #MahabharatKatha #AncientIndia

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Discover how Lord Ganesha got married and the crucial role of Narad Muni

कैसे हुई विघ्नहर्ता की शादी? जानिए नारद मुनि की महत्वपूर्ण भूमिका

भगवान गणेश (Lord Ganesha) को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता के रूप में पूजा जाता है। गणपति बप्पा की कृपा से भक्तों के सभी संकट दूर हो जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान गणेश का विवाह कैसे हुआ और इसमें देवर्षि नारद की क्या भूमिका थी? पौराणिक कथाओं में गणेश विवाह से जुड़ी कई रोचक बातें मिलती हैं, जो इस रहस्य को उजागर करती हैं। आइए जानते हैं कि भगवान गणेश की शादी कब और कैसे हुई। गणेश जी के विवाह में आई बाधा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह को लेकर एक रोचक कथा प्रचलित है। जब भगवान गणेश बड़े हुए, तो उनके विवाह को लेकर एक समस्या उत्पन्न हो गई। दरअसल, शिव-पार्वती के बड़े पुत्र होने के बावजूद गणेश जी का विवाह नहीं हो पा रहा था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि उनके छोटे भाई भगवान कार्तिकेय विवाह में सबसे आगे रहना चाहते थे। भगवान कार्तिकेय (Lord Kartikeya) का मानना था कि पहले उन्हीं का विवाह होना चाहिए, क्योंकि वे बड़े पराक्रमी और तेजस्वी थे। इधर, देवताओं को भी यह चिंता सताने लगी कि यदि गणेश जी विवाह कर लेते हैं, तो वे हर कार्य में पहले पूजे जाने वाले देवता बन जाएंगे, जिससे बाकी देवताओं की महत्ता कम हो सकती है। नारद मुनि की भूमिका जब भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह को लेकर माता पार्वती चिंतित हुईं, तब देवर्षि नारद (Sage Narada) ने एक योजना बनाई। नारद मुनि हमेशा किसी न किसी लीला के सूत्रधार रहे हैं, और इस बार भी उन्होंने ऐसी ही एक युक्ति निकाली जिससे भगवान गणेश का विवाह संभव हो सके। नारद मुनि (Sage Narada) ने गणेश जी के माता-पिता को बताया कि गणपति को शीघ्र विवाह करना चाहिए, अन्यथा यह देवताओं और संसार के लिए अच्छा नहीं होगा। लेकिन समस्या यह थी कि कार्तिकेय पहले विवाह करना चाहते थे। तब एक शर्त रखी गई कि जो भी संपूर्ण ब्रह्मांड की सबसे पहले परिक्रमा करेगा, उसका विवाह पहले होगा। गणेश जी की बुद्धिमानी और विवाह भगवान कार्तिकेय(Lord Kartikeya) ने तुरंत अपना वाहन मोर लिया और पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। लेकिन भगवान गणेश का वाहन मूषक (चूहा) था, जो तेज गति से ब्रह्मांड की परिक्रमा करने में असमर्थ था। ऐसे में गणेश जी ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए माता पार्वती और भगवान शिव की सात बार परिक्रमा कर ली। उन्होंने यह तर्क दिया कि माता-पिता ही संपूर्ण ब्रह्मांड हैं और उनकी परिक्रमा करने से ही संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा हो जाती है। उनकी इस बुद्धिमानी से देवगण और ऋषि-मुनि प्रसन्न हुए और निर्णय लिया कि गणेश जी का विवाह पहले होगा। गणेश जी की दो पत्नियां – ऋद्धि और सिद्धि भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह के लिए प्रजापति विश्वरथ की दो पुत्रियों ऋद्धि और सिद्धि को चुना गया। ऋद्धि और सिद्धि बुद्धि, समृद्धि और सफलता की प्रतीक मानी जाती हैं। विवाह के पश्चात भगवान गणेश को दो पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई – शुभ और लाभ। इसे भी पढ़ें:- कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? गणेश विवाह का महत्व भगवान गणेश (Lord Ganesha) के विवाह की कथा हमें यह सिखाती है कि केवल शारीरिक बल ही नहीं, बल्कि बुद्धि और विवेक से भी हर समस्या का समाधान किया जा सकता है। यही कारण है कि भगवान गणेश को बुद्धि, ज्ञान और विवेक का देवता माना जाता है। गणेश जी के विवाह के बाद से ही उनका पूजन सबसे पहले करने की परंपरा शुरू हुई। आज भी किसी भी शुभ कार्य या विवाह से पहले गणपति की पूजा की जाती है, ताकि सभी बाधाएं दूर हों और कार्य निर्विघ्न संपन्न हो। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Ganesha #GaneshMarriage #VighnahartaWedding #NaradMuniRole #GaneshKatha #HinduMythology #GanpatiStory #ShivaParvati #DivineMarriage #MythologicalTales #GaneshBhakti

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Masik Shivratri 2025

Masik Shivratri: भगवान शिव-पार्वती की कृपा पाने का खास दिन है ‘मसिकशिवरात्रि’

हिंदू धर्म में शिवरात्रि का विशेष महत्व है। यह पर्व भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। शिवरात्रि दो प्रकार की होती है – एक महाशिवरात्रि और दूसरी मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri) । महाशिवरात्रि साल में एक बार मनाई जाती है, जबकि मासिक शिवरात्रि हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। आइए जानते हैं कि मासिक शिवरात्रि का क्या महत्व है, इसकी पूजा विधि क्या है और इससे जुड़ी कथा क्या है। मासिक शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त (Masik Shivratri Puja Muhurat) पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 27 मार्च को रात 11:03 बजे से आरंभ होकर 28 मार्च को शाम 07:55 बजे समाप्त होगी। इस आधार पर, चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri) का व्रत गुरुवार, 27 मार्च 2025 को रखा जाएगा। मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव (Lord Shiva) की पूजा मध्य रात्रि में की जाती है।  मासिक शिवरात्रि का महत्व मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri) का हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह व्रत भगवान शिव (Lord Shiva) और माता पार्वती की पूजा के लिए किया जाता है। मासिक शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है और उनकी कृपा प्राप्त की जाती है। इस व्रत को करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। मासिक शिवरात्रि का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह व्रत भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस व्रत को करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। मासिक शिवरात्रि की पूजा विधि इसे भी पढ़ें:- कब और कहां लेंगे भगवान विष्णु कल्कि का अवतार? मासिक शिवरात्रि के लाभ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Masik Shivratri #MasikShivratri #ShivParvati #LordShiva #ShivratriVrat #ShivPuja #Spirituality #Devotion #HinduFestivals #ShivaBlessings #ShivaBhakti

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Bedroom Vastu Tips

Bedroom Vastu Tips: बेडरूम में नेगेटिव एनर्जी से बचने के लिए अपनाएं ये वास्तु टिप्स

वास्तु शास्त्र के अनुसार बेडरूम (Bedroom) घर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, क्योंकि यहां हम अपना अधिकांश समय आराम और नींद में बिताते हैं। लेकिन कई बार बेडरूम डिजाइन करते समय लोग कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो नेगेटिव एनर्जी को आकर्षित करती हैं। इससे न केवल नींद प्रभावित होती है, बल्कि जीवन में तनाव और समस्याएं भी बढ़ने लगती हैं। आइए जानते हैं कि बेडरूम बनाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कैसे नेगेटिव एनर्जी से बचा जा सकता है। बेडरूम के लिए जरूरी चीजें शास्त्रों के अनुसार बेडरूम का आरामदायक और स्वस्थ वातावरण बनाए रखना आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले एक अच्छी क्वालिटी का गद्दा होना चाहिए, जो पीठ दर्द और शरीर के दर्द से बचाव करता है। इसके अलावा, कमरे में पर्याप्त रोशनी होनी चाहिए, लेकिन बहुत तेज रोशनी से परहेज करना चाहिए, क्योंकि यह नींद को प्रभावित कर सकती है। नाइट लैंप का उपयोग करने से कमरे में शांति बनी रहती है। बेडरूम के रंग (Bedroom Color) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हल्के और सौम्य रंग मानसिक शांति प्रदान करते हैं, जबकि अधिक गहरे रंग तनाव बढ़ा सकते हैं। साथ ही, कमरे में अच्छी सुगंध का होना भी आवश्यक है, जिसके लिए सुगंधित मोमबत्तियां या एसेंशियल ऑयल डिफ्यूज़र का उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा, अच्छी क्वालिटी के परदे भी जरूरी हैं, जो कमरे में पर्याप्त अंधेरा बनाए रखते हैं और गोपनीयता सुनिश्चित करते हैं। बेडरूम के लिए वास्तु टिप्स (Bedroom Vastu Tips) 1. बेडरूम की दिशा और स्थान वास्तु शास्त्र के अनुसार बेडरूम हमेशा घर के दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना चाहिए। यह दिशा स्थिरता और शांति का प्रतीक मानी जाती है। अगर बेडरूम उत्तर-पूर्व दिशा में बनाया जाता है, तो यह नेगेटिव एनर्जी को आकर्षित करता है और जीवन में अशांति लाता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार बेडरूम कभी भी घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने नहीं होना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और व्यक्ति की मानसिक शांति प्रभावित होती है। 2. बेड की सही पोजिशनिंग बेडरूम में बेड की सही पोजिशनिंग बेहद जरूरी है। वास्तु के अनुसार, बेड हमेशा दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर सिर करके लगाना चाहिए। इससे नींद अच्छी आती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अगर बेड उत्तर दिशा की ओर सिर करके लगाया जाता है, तो यह नेगेटिव एनर्जी (Negative Energy) को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, बेड कभी भी खिड़की या दरवाजे के ठीक सामने नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे ऊर्जा का रिसाव होता है। 3. दर्पण का गलत प्लेसमेंट बेडरूम (Bedroom) में दर्पण का गलत प्लेसमेंट भी नेगेटिव एनर्जी को आकर्षित करता है। वास्तु के अनुसार, दर्पण कभी भी बेड के सामने नहीं लगाना चाहिए। इससे व्यक्ति की ऊर्जा प्रभावित होती है और नींद में बाधा आती है। अगर बेडरूम में दर्पण लगाना जरूरी हो, तो इसे बेड के साइड में लगाएं और सोते समय इसे कपड़े से ढक दें। इससे नेगेटिव एनर्जी (Negative Energy) से बचा जा सकता है। 4. बेडरूम की सफाई और वेंटिलेशन है जरूरी राजाराम के अनुसार, बेडरूम को अधिक आरामदायक बनाने के लिए उसमें पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी और हवा का प्रवाह होना आवश्यक है। यदि कमरे में खिड़की नहीं है या वेंटिलेशन सही नहीं है, तो यह सेहत पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए, ताजी हवा के लिए उचित वेंटिलेशन की व्यवस्था करना जरूरी है। साथ ही, बेडरूम में अनावश्यक सामान और गंदगी इकट्ठा करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy) बढ़ सकती है। एक साफ-सुथरा और व्यवस्थित कमरा सकारात्मक माहौल बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा, ताजगी बनाए रखने के लिए कमरे में एक छोटा इनडोर प्लांट लगाना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इसे भी पढ़ें:- दो बार बन रहा है यह दुर्लभ योग, जानें किनके लिए है विशेष शुभ 5. पौधों का चयन बेडरूम (Bedroom) में पौधे लगाना अच्छा माना जाता है, लेकिन कुछ पौधे नेगेटिव एनर्जी को बढ़ावा देते हैं। वास्तु के अनुसार, बेडरूम में कांटेदार पौधे या सूखे हुए पौधे नहीं रखने चाहिए। बेडरूम में तुलसी, मनी प्लांट या लकी बांस जैसे पौधे रख सकते हैं, जो सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार करते हैं। 6. प्रकाश का सही उपयोग बेडरूम (Bedroom) में प्रकाश का सही उपयोग भी बेहद जरूरी है। वास्तु के अनुसार, बेडरूम में तेज रोशनी वाले बल्ब या ट्यूब लाइट नहीं लगाने चाहिए। इससे मन अशांत होता है और नींद प्रभावित होती है। बेडरूम में हल्की और मध्यम रोशनी का उपयोग करना चाहिए। इससे मन को शांति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news #BedroomVastu #VastuTips #PositiveEnergy #VastuForHome #BedroomDecor #VastuShastra #HomeEnergy #VastuRemedies #HealthyLiving #VastuForPeace

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Dwipushkar Yoga 2024

Dwipushkar Yoga: दो बार बन रहा है यह दुर्लभ योग, जानें किनके लिए है विशेष शुभ

हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने में इस साल दो बार द्विपुष्कर योग बन रहा है, जो एक दुर्लभ और अत्यंत शुभ योग माना जाता है। सनातन धर्म में चैत्र मास का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह महीना पूरी तरह से मां दुर्गा को समर्पित होता है। इस दौरान भक्त प्रतिदिन मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और उपासना करते हैं। विशेष रूप से, चैत्र नवरात्र के दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, साथ ही श्रद्धालु नवरात्रि व्रत का पालन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से साधक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि एवं सौभाग्य की वृद्धि होती है। ज्योतिषीय दृष्टि से, इस वर्ष चैत्र मास में दो बार दुर्लभ द्विपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। मान्यता है कि इस योग के दौरान मां दुर्गा की भक्ति और साधना करने से साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। साथ ही, इस शुभ योग में किए गए कार्यों में सफलता और सिद्धि प्राप्त होती है। आइए जानते हैं कि द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) क्या है, यह कब बन रहा है और किन लोगों के लिए यह विशेष रूप से शुभ होगा। द्विपुष्कर योग क्या है? द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) एक अत्यंत शुभ और दुर्लभ योग है, जो तब बनता है जब एक ही दिन में दो पुष्कर योग होते हैं। पुष्कर योग को हिंदू ज्योतिष में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह धन, समृद्धि और सौभाग्य लाने वाला होता है। जब एक दिन में दो बार पुष्कर योग बनता है, तो इसे द्विपुष्कर योग कहा जाता है। पुष्कर योग तब बनता है जब बृहस्पति और चंद्रमा की स्थिति विशेष रूप से अनुकूल होती है। यह योग व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद करता है। चैत्र महीने में द्विपुष्कर योग का समय ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि, यानी 16 मार्च को द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) बन रहा है। यह योग दिन में 11:44 बजे से प्रारंभ होकर शाम 04:58 बजे तक रहेगा। इसके अलावा, वैष्णव जनों को समर्पित पापमोचनी एकादशी के अवसर पर, 26 मार्च को भी द्विपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। 26 मार्च को यह शुभ योग ब्रह्म मुहूर्त में 03:49 बजे से सुबह 06:18 बजे तक रहेगा। मान्यता है कि इस योग के दौरान भगवान विष्णु और मां दुर्गा की पूजा करने से साधक को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह योग वृषभ, तुला, धनु और मीन राशि के जातकों के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है, जिससे उन्हें देवी दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होगी। इसे भी पढ़ें:- होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों से करें ये चमत्कारिक टोटके! द्विपुष्कर योग का महत्व द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga) का हिंदू ज्योतिष में विशेष महत्व है। यह योग व्यक्ति के जीवन में धन, समृद्धि और सौभाग्य लाने वाला होता है। इस दिन किए गए शुभ कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है और व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त होती है। द्विपुष्कर योग के दिन दान-पुण्य, पूजा-पाठ और मंत्र जाप करने से विशेष लाभ मिलता है। इस दिन किए गए कार्यों से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और उसे मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news #DwipushkarYoga #RareYoga2024 #AuspiciousTime #HinduAstrology #ShubhMuhurat #YogaForSuccess #LuckyDays #SpecialYoga #VedicAstrology #DivineTiming

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Celebrate Holi 2025 in Mathura

होली का अद्भुत रंगारंग उत्सव: मथुरा की इन खास जगहों पर मनाएं रंगों का त्योहार

मथुरा, भारत के सबसे प्रसिद्ध त्योहारों में से एक होली का आगाज हो चुका है। यह शहर भगवान कृष्ण की जन्मस्थली होने के कारण होली के उत्सव के लिए विश्वभर में मशहूर है। मथुरा की गलियों में होली का जश्न देखने के लिए देश-विदेश से लाखों पर्यटक यहां आते हैं। आइए जानते हैं मथुरा की उन खास जगहों के बारे में, जहां होली का उत्सव अद्भुत और अविस्मरणीय होता है।  बांके बिहारी मंदिर: होली की रंगत का केंद्र मथुरा (Mathura) में होली का जश्न बांके बिहारी मंदिर (Banke Bihari Temple) से शुरू होता है। यह मंदिर भगवान कृष्ण के प्रमुख मंदिरों में से एक है और होली के मौके पर यहां का नजारा देखने लायक होता है। मंदिर में होली का उत्सव लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जिसमें फूलों की होली, गुलाल की होली और लट्ठमार होली जैसे आयोजन होते हैं। मंदिर के पुजारी भगवान कृष्ण को रंगों से सजाते हैं और भक्तों के साथ मिलकर होली का जश्न मनाते हैं। यहां की होली की खास बात यह है कि इसमें केवल प्राकृतिक रंगों और गुलाल का ही इस्तेमाल किया जाता है, जो पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित होते हैं। गोकुल की रंगीली होली पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बालकृष्ण बचपन में अत्यंत चंचल और नटखट थे। गोकुल की गोपियां उनकी शरारतों से खूब आनंदित होती थीं। इसी कारण मथुरा में विशेष रूप से लठमार होली मनाई जाती है, जिसकी परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस अनूठे आयोजन में महिलाएं लाठियां लेकर पुरुषों को हल्के-फुल्के अंदाज में हंसी-मजाक के रूप में मारती हैं। बरसाना की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है, जहां नंदगांव (Nandgaon) के ग्वालों और बरसाना की गोपियों के बीच यह पारंपरिक उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। नंदगांव में ‘फाग आमंत्रण उत्सव’ आयोजित किया जाता है, जिसमें सखियों को होली खेलने का निमंत्रण दिया जाता है। इसी दिन बरसाना के श्रीराधारानी मंदिर में ‘लड्डू मार होली’ का आयोजन भी होता हैं। इसे भी पढ़ें:- होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों से करें ये चमत्कारिक टोटके! नंदगांव और बरसाना: लट्ठमार होली की धूम मथुरा (Mathura) से कुछ किलोमीटर दूर स्थित नंदगांव (Nandgaon) और बरसाना की लट्ठमार होली पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां की होली का अपना एक अलग ही इतिहास और परंपरा है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण नंदगांव से बरसाना आकर राधा और उनकी सखियों के साथ होली खेलते थे। इस दौरान महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारती थीं और पुरुष खुद को बचाने की कोशिश करते थे। आज भी यह परंपरा जीवित है और लट्ठमार होली के दिन नंदगांव (Nandgaon) के पुरुष बरसाना जाते हैं, जहां महिलाएं उन्हें लाठियों से मारती हैं। यह नजारा बेहद ही मनोरंजक और अनोखा होता है। इसके अलावा, यहां की होली में रंग-गुलाल और पारंपरिक गीत-संगीत का भी विशेष महत्व होता है। मथुरा की गलियों में होली का मजा मथुरा (Mathura) की गलियों में होली का जश्न देखने के लिए हजारों लोग यहां आते हैं। यहां की गलियों में रंग-गुलाल और पानी के रंगों से होली खेली जाती है। लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर और गले मिलकर होली का जश्न मनाते हैं। मथुरा की गलियों में होली के दिन पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य का भी आयोजन किया जाता है। यहां के लोग होली के दिन घरों में पकवान बनाते हैं और एक-दूसरे के साथ मिलकर खाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Banke Bihari Temple #Holi2025 #MathuraHoli #HoliFestival #BrajHoli #HoliInVrindavan #HoliCelebration #ColorsOfHoli #HoliTourism #FestivalOfColors #RadhaKrishnaHoli

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Holi 2025: होली के दिन अवश्य करें इस स्तोत्र का पाठ, भगवान कृष्ण प्रसन्न होकर दूर करेंगे सब दुख

होली, रंगों का त्योहार भारत के सबसे प्रसिद्ध और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार न केवल रंगों और उल्लास से भरा होता है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक महत्व भी छिपा होता है। होली के दिन भगवान कृष्ण (Lord Krishna) की पूजा और उनके स्तोत्र का पाठ करने से जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं और भक्तों को आनंद और शांति की प्राप्ति होती है। होली 2025 में भी इस परंपरा को निभाने का विशेष महत्व होगा। आइए जानते हैं कि होली (Holi) के दिन किस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए और इसका क्या महत्व है। होली 2025 की तारीख होली (Holi)  का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में होली 14 मार्च 2025, शुक्रवार को मनाई जाएगी। होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाएगा, जो 13 मार्च 2025, गुरुवार को होगा। होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है। श्री राधा कृष्ण अष्टकम  चथुर मुखाधि संस्थुथं, समास्थ स्थ्वथोनुथं।हलौधधि सयुथं, नमामि रधिकधिपं॥भकाधि दैथ्य कालकं, सगोपगोपिपलकं।मनोहरसि थालकं, नमामि रधिकधिपं॥सुरेन्द्र गर्व बन्जनं, विरिञ्चि मोह बन्जनं।वृजङ्ग ननु रञ्जनं, नमामि रधिकधिपं॥मयूर पिञ्च मण्डनं, गजेन्द्र दण्ड गन्दनं।नृशंस कंस दण्डनं, नमामि रधिकधिपं॥प्रदथ विप्रदरकं, सुधमधम कारकं।सुरद्रुमपःअरकं, नमामि रधिकधिपं॥दानन्जय जयपाहं, महा चमूक्षयवाहं।इथमहव्यधपहम्, नमामि रधिकधिपं॥मुनीन्द्र सप करणं, यदुप्रजप हरिणं।धरभरवत्हरणं, नमामि रधिकधिपं॥सुवृक्ष मूल सयिनं, मृगारि मोक्षधयिनं।श्र्वकीयधमययिनम्, नमामि रधिकधिपं॥ वन्दे नवघनश्यामं पीतकौशेयवाससम्।सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम्॥राधेशं राधिकाप्राणवल्लभं वल्लवीसुतम्।राधासेवितपादाब्जं राधावक्षस्थलस्थितम्॥राधानुगं राधिकेष्टं राधापहृतमानसम्।राधाधारं भवाधारं सर्वाधारं नमामि तम्॥राधाहृत्पद्ममध्ये च वसन्तं सन्ततं शुभम्।राधासहचरं शश्वत् राधाज्ञापरिपालकम्॥ध्यायन्ते योगिनो योगान् सिद्धाः सिद्धेश्वराश्च यम्।तं ध्यायेत् सततं शुद्धं भगवन्तं सनातनम्॥निर्लिप्तं च निरीहं च परमात्मानमीश्वरम्।नित्यं सत्यं च परमं भगवन्तं सनातनम्॥यः सृष्टेरादिभूतं च सर्वबीजं परात्परम्।योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम्॥बीजं नानावताराणां सर्वकारणकारणम्।वेदवेद्यं वेदबीजं वेदकारणकारणम्॥योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम्।गन्धर्वेण कृतं स्तोत्रं यः पठेत् प्रयतः शुचिः।इहैव जीवन्मुक्तश्च परं याति परां गतिम्॥हरिभक्तिं हरेर्दास्यं गोलोकं च निरामयम्।पार्षदप्रवरत्वं च लभते नात्र संशयः॥ इसे भी पढ़ें:- होलिका दहन की रात काले तिल और सरसों से करें ये चमत्कारिक टोटके! होली के दिन स्तोत्र पाठ का महत्व होली (Holi) के दिन भगवान कृष्ण (Lord Krishna) की पूजा और उनके स्तोत्र का पाठ करने का विशेष महत्व है। भगवान कृष्ण को होली का त्योहार अत्यंत प्रिय है, क्योंकि वे स्वयं रासलीला और रंगों के प्रेमी थे। होली के दिन भगवान कृष्ण (Lord Krishna) के स्तोत्र का पाठ करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। स्तोत्र पाठ करने से न केवल भक्तों को आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि उनके मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है। होली के दिन स्तोत्र पाठ करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Holi #Holi2025 #KrishnaBhakti #HoliPuja #HoliFestival #SpiritualHoli #BhagwanKrishna #HoliMantra #HoliStotra #KrishnaBlessings #HoliCelebration

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Harihar Milan,

हरिहर मिलन: जब देवघर में भगवान शिव और श्रीकृष्ण खेलते हैं होली

होली का त्योहार भारत के सबसे प्रसिद्ध और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार न केवल रंगों और उल्लास से भरा होता है, बल्कि इसमें आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व भी छिपा होता है। भारत में एक ऐसा धाम है, जहां होली के दिन भगवान शिव (Lord Shiva) और भगवान कृष्ण (Lord Krishna) की अद्भुत लीला देखने को मिलती है। यह स्थान है देवघर मंदिर, जहां महादेव के साथ होली खेलने आते हैं कन्हैया। आइए जानते हैं कि देवघर में होली कैसे मनाई जाती है और इसका क्या महत्व है। हरिहर मिलन के दिन देवघर आए थे बाबा बैद्यनाथ पौराणिक ग्रंथों और बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, ‘हरिहर मिलन’ (Harihar Milan) के दिन ही बाबा बैद्यनाथ देवघर पहुंचे थे। इस अवसर पर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) अपने आराध्य भगवान शिव से मिलने आते हैं। दोनों देवता साथ में होली खेलते हैं और आनंद से भर जाते हैं। हरिहर मिलन का प्रसंग बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहित प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, हरिहर मिलन (Harihar Milan) के दिन ही भगवान शिव देवघर पहुंचे थे। इस घटना का संबंध रावण से जुड़ी कथा से है। मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव से आग्रह किया था कि वे लंका चलें। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव (Lord Shiva) शिवलिंग के रूप में लंका जाने के लिए तैयार हुए, लेकिन एक शर्त रखी कि यात्रा के दौरान रावण शिवलिंग को कहीं भी न रखे, क्योंकि जहां भी वह शिवलिंग रखेगा, वह वहीं स्थापित हो जाएगा। जब रावण शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था, तब भगवान विष्णु वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। इसी दौरान रावण को लघुशंका महसूस हुई, जिससे वह शिवलिंग को रखने के लिए मजबूर हो गया। बैद्यनाथ धाम वह स्थान है, जहां माता सती का हृदय गिरा था, और यही कारण था कि भगवान विष्णु की योजना के तहत रावण को यहां शिवलिंग रखना पड़ा। इसे भी पढ़ें:- कब मनाई जाएगी छोटी होली, जानिए इस दिन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? हरिहर मिलन पर खेली जाती है होली रावण ने भगवान शिव (Lord Shiva) से वचन लिया था कि यदि वह शिवलिंग को जमीन पर रख देगा, तो शिव वहीं स्थापित हो जाएंगे। भगवान विष्णु ने ही रावण से शिवलिंग लेकर इसे देवघर में स्थापित कर दिया। इसी स्थान पर माता सती और भगवान शिव का मिलन हुआ। जिस शिवलिंग को भगवान विष्णु ने ग्रहण किया था, उसी के साथ वे श्रीकृष्ण के रूप में ‘हरिहर मिलन’ के अवसर पर होली खेलते हैं। भगवान शिव और श्रीकृष्ण खेलते हैं गुलाल प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, ‘हरिहर मिलन’ (Harihar Milan) के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की प्रतिमा वर्ष में केवल एक बार बाहर लाई जाती है। इस दौरान वे बैजू मंदिर के पास झूला झूलते हैं और आनंदित हो जाते हैं। इसके बाद वे परमानंद महादेव के पास जाते हैं, जहां भगवान शिव और श्रीकृष्ण एक साथ गुलाल खेलते हैं। इस दिन भगवान को विशेष भोग अर्पित किया जाता है, जिसमें मालपुआ चढ़ाया जाता है। भक्त भी भगवान के साथ गुलाल अर्पित कर इस पावन अवसर को मनाते हैं। चूंकि गुलाल प्राकृतिक रंग होता है, इसलिए इसे भगवान को समर्पित किया जाता है। ‘हरिहर मिलन’ (Harihar Milan) के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण अपनी मूल स्थान पर लौट जाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi news Harihar Milan #HariharMilan #DevgharHoli #ShivaKrishnaHoli #SpiritualFestivals #HoliWithGods #DivineCelebration #MythologicalHoli #ShivKrishnaLeela #FestiveDevghar #HoliTraditions

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