Anjali Choudhary

solar eclipse 2025

Solar Eclipse: क्या भारत में भी दिखेगा 21 सितंबर को लगने वाला साल का दूसरा सूर्य ग्रहण?

साल 2025 का दूसरा सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) 21 सितंबर को लगने जा रहा है। इससे पहले इस वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण 29 मार्च को चैत्र अमावस्या के दिन पड़ा था, लेकिन वह भारत में दिखाई नहीं दिया था, इसलिए उस ग्रहण का सूतक काल भी प्रभावी नहीं था। अब जो आगामी सूर्य ग्रहण होगा, वह खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण तो है, लेकिन इसका भारतवासियों की धार्मिक और दैनिक गतिविधियों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होगा। 21 सितंबर की रात लगभग 11 बजे यह सूर्य ग्रहण प्रारंभ होगा और 22 सितंबर की सुबह 4 बजे तक चलेगा। चूंकि यह ग्रहण पूरी तरह रात्रिकालीन होगा और भारत में कहीं से भी दृश्य नहीं होगा, इसलिए इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा। भारतीय पंचांग और शास्त्रों के अनुसार, जब कोई ग्रहण किसी देश या स्थान पर दृश्य नहीं होता, तो उस ग्रहण का सूतक काल और धार्मिक प्रभाव उस स्थान पर मान्य नहीं माना जाता। सूतक काल, ग्रहण की शुरुआत से कुछ घंटे पहले का वह समय होता है जब धार्मिक कार्य, मंदिर में पूजा-पाठ, भोजन आदि पर कुछ रोक लगाई जाती है। लेकिन चूंकि यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका कोई धार्मिक प्रतिबंध या सावधानी आवश्यक नहीं मानी गई है। आम लोग अपने दैनिक कार्य बिना किसी व्यवधान के कर सकते हैं। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी यह ग्रहण भारतवासियों के लिए विशेष प्रभाव नहीं रखता। ग्रहण का प्रभाव मुख्यतः उन क्षेत्रों पर पड़ता है जहां से वह प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। 21 सितंबर को लगने वाला यह सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध के कुछ क्षेत्रों में, जैसे अंटार्कटिका, दक्षिण अमेरिका और अटलांटिक महासागर के कुछ हिस्सों में ही दिखाई देगा। ऐसे में यह सूर्य ग्रहण भारत के धार्मिक और ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में कोई विशेष महत्व नहीं रखता। फिर भी, खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से यह एक अहम खगोलीय घटना होगी, जिसे दुनिया के अन्य हिस्सों में वैज्ञानिक और शोधकर्ता अध्ययन हेतु महत्व देंगे। संक्षेप में, 21 सितंबर की रात लगने वाला यह सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) भारत में न तो दृश्य होगा, न ही इसका सूतक काल मान्य होगा और न ही यह किसी धार्मिक क्रिया पर प्रभाव डालेगा। अतः भारतवासी इस दिन अपने धार्मिक और पारंपरिक कार्य सामान्य रूप से कर सकते हैं। फिर भी अगर कोई व्यक्ति व्यक्तिगत आस्था या सतर्कता के चलते सामान्य सावधानियां रखना चाहता है, तो वह अपनी श्रद्धा अनुसार कर सकता है। कहां-कहां दिखाई देगा यह ग्रहण? यह सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, न्यूजीलैंड और प्रशांत एवं अटलांटिक महासागर के कुछ भागों में देखा जा सकेगा। विशेष रूप से अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड के कुछ इलाकों में यह ग्रहण स्पष्ट रूप से दृश्य रहेगा। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय ग्रहण के समय इन सावधानियों का रखें विशेष ध्यान  Latest News in Hindi Today Hindi news Solar Eclipse #SolarEclipse2025 #SeptemberEclipse #EclipseInIndia #SkyEvents2025 #AstronomyNews

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आषाढ़ अमावस्या

आषाढ़ अमावस्या 2025: पितृ तर्पण और लक्ष्मी कृपा पाने का दुर्लभ संयोग

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर माह की अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। यह दिन पितृ तर्पण, दान-पुण्य और देवी-देवताओं की आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। साल 2025 में आषाढ़ अमावस्या 25 जून, बुधवार को मनाई जाएगी। यह दिन न केवल पितरों की शांति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि मां लक्ष्मी की कृपा पाने का भी उत्तम अवसर है। मान्यता है कि यदि इस दिन कुछ विशेष कार्य कर लिए जाएं, तो घर में सुख-समृद्धि और धन की वर्षा होती है। यही नहीं, इस दिन विशेष उपाय करने से पितृ भी खुश होते हैं और पितृ दोष से राहत मिलती है।  आषाढ़ अमावस्या 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास की अमावस्या तिथि की शुरुआत 24 जून की शाम 7:00 बजे से हो रही है, जो 25 जून को शाम 4:02 बजे तक रहेगी। चूंकि अमावस्या की तिथि का निर्धारण उदयातिथि के आधार पर होता है, इसलिए 25 जून को ही आषाढ़ अमावस्या मनाई जाएगी। बन रहे हैं शुभ योग इस वर्ष आषाढ़ अमावस्या पर तीन शुभ योगों का संयोग बन रहा है: इन शुभ योगों में किया गया दान, पूजा और जप कई गुना फल प्रदान करता है। अतः यह दिन आध्यात्मिक साधना और पितृ तर्पण के लिए अत्यंत शुभ है। क्यों खास है आषाढ़ अमावस्या? आषाढ़ अमावस्या का संबंध विशेष रूप से पितरों की शांति से जुड़ा होता है। इस दिन जल में तिल, पुष्प और जल अर्पित कर पितरों का तर्पण करने से उनके आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। साथ ही, घर में दरिद्रता, क्लेश और रोग जैसे दोषों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान विष्णु, पीपल के वृक्ष और मां लक्ष्मी की पूजा से घर में धन, वैभव और सौभाग्य का वास होता है। आषाढ़ अमावस्या पर करें ये कार्य: 1. पीपल वृक्ष की पूजा करें सुबह स्नान करके पीपल वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं, दीपक जलाएं और परिक्रमा करें। मान्यता है कि पीपल में विष्णु और पितरों का वास होता है। इससे पितृ दोष और दरिद्रता दूर होती है। आषाढ़ अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करने से पितरों का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।  2. तिल और जल से पितृ तर्पण करें पवित्र जल में तिल, पुष्प डालकर पितरों को अर्पित करें। यह उन्हें शांति और मोक्ष प्रदान करता है। साथ ही पितरों का आशीर्वाद सुख-समृद्धि लेकर आता है। आषाढ़ अमावस्या के दिन तिल और जल से पितृ तर्पण करने से पितृ खुश होते हैं।  3. गरीबों और ब्राह्मणों को दान करें इस दिन अन्न, वस्त्र, तांबा, तिल, घी, धन और जरूरत की चीजें दान करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि आषाढ़ अमावस्या के गरीबों और ब्राह्मणों को दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।  4. मां लक्ष्मी की विशेष आराधना करें गाय के घी का दीपक जलाकर मां लक्ष्मी का पूजन करें। घर के उत्तर-पूर्व कोण को स्वच्छ करके वहां लाल वस्त्र बिछाएं, लक्ष्मी यंत्र या चित्र स्थापित करें, फिर कमलगट्टे की माला से “श्रीं” बीज मंत्र का जाप करें। इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना करने से घर में माँ लक्ष्मी का वास होता है।  5. शंख और झाड़ू खरीदना शुभ आषाढ़ अमावस्या के दिन शंख और झाड़ू खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। इसे घर में रखने से लक्ष्मी जी का स्थायी वास होता है और आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं।  इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय क्या न करें इस दिन? Latest News in Hindi Today Hindi news लक्ष्मी #AshadhaAmavasya2025 #PitrTarpan #LakshmiBlessings #AmavasyaRituals #SpiritualIndia #VedicTraditions

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Saturday Shani remedies

शनिदेव की कृपा पाना चाहते हैं? शनिवार को करें ये विशेष पूजा और उपाय

हिंदू धर्म में शनिदेव (Shani Dev) को न्याय के देवता माना जाता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। शनिदेव की कृपा जहां जीवन में खुशहाली और तरक्की लाती है, वहीं उनकी नाराजगी जीवन में दुख, बाधा और आर्थिक तंगी का कारण भी बन सकती है। यही कारण है कि शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से शनिवार के दिन पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है। अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन से दुखों का अंत हो, नौकरी-धंधे में तरक्की हो और शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का प्रभाव कम हो जाए, तो शनिवार को शनिदेव की विशेष पूजा विधि को अपनाना चाहिए। आइए जानते हैं शनिदेव (Shani Dev) की पूजा की सही और प्रभावशाली विधि, जिससे वे जल्दी प्रसन्न होते हैं। शनिदेव पूजा की विधि (Shani Dev Puja Vidhi) शनिवार के दिन सुबह जल्दी उठकर पूरे घर की अच्छे से सफाई करें। फिर स्नान कर साफ और स्वच्छ वस्त्र पहनें, विशेष रूप से काले या गहरे नीले रंग के कपड़े धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर में किसी शांत और साफ स्थान या मंदिर में एक चौकी स्थापित करें, जिस पर काले रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर शनिदेव की मूर्ति रखें। यदि लोहे की मूर्ति है, तो उसे पंचामृत से स्नान कराकर, चावलों से बने चौबीस पंखुड़ी वाले कमल पर स्थापित करें। साथ में भगवान शिव और हनुमान जी की मूर्तियों को भी स्थान दे सकते हैं, क्योंकि शनिवार को इनकी पूजा का भी महत्व है। पूजा से पहले व्रत और पूजन का संकल्प लें। फिर शनिदेव के सामने सरसों के तेल का दीपक, अगरबत्ती और धूप जलाएं। इसके बाद उन्हें सरसों का तेल अर्पित करें और काले तिल, काली उड़द दाल, नीले फूल, शमी और पीपल के पत्ते तथा काले वस्त्र अर्पित करें। पूजा पूर्ण होने पर शनिदेव की आरती करें और उनसे अपने द्वारा अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें। इसके पश्चात गरीबों और जरूरतमंदों को काले वस्त्र, तिल, उड़द की दाल या भोजन का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, चींटियों को आटा डालना भी लाभकारी होता है। यदि आप व्रत रख रहे हैं, तो दिनभर फलाहार करें और शाम को उड़द की दाल की खिचड़ी खा सकते हैं। इस विधि से पूजा करने पर शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आ रही बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं। व्रत कब शुरू करें? हिंदू धर्म में शनि देव (Shani Dev) को कर्मों का न्यायकर्ता माना गया है। मान्यता है कि वे किसी के साथ न तो अन्याय करते हैं और न ही पक्षपात, बल्कि हर व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुरूप फल प्रदान करते हैं। शनिवार का व्रत किसी भी समय शुरू किया जा सकता है, लेकिन यदि इसे श्रावण मास के शनिवार से आरंभ किया जाए, तो इसका विशेष महत्व होता है। इसके अलावा, यह व्रत किसी भी शुक्ल पक्ष के शनिवार से भी शुरू किया जा सकता है। माना जाता है कि शनिवार का व्रत करने से व्यक्ति को स्वास्थ्य, करियर और जीवन की अन्य समस्याओं में सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।  शनि मंत्रों का जाप करें:शनि देव (Shani Dev) को प्रसन्न करने के लिए निम्न मंत्रों का जाप करें: कम से कम 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है। इससे शनि देव की कृपा जल्दी प्राप्त होती है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय क्या करें दान? नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Shani Dev #ShaniDev #SaturdayPuja #ShaniRemedies #ShaniBlessings #HinduRituals #SpiritualTips #ShaniDosh

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Yogini Ekadashi 2025

Yogini Ekadashi 2025: योगिनी एकादशी पर विशेष पूजा से दूर होगी सभी परेशानी

हिंदू धर्म में वर्षभर में 24 एकादशी तिथियां आती हैं, जिनमें से प्रत्येक का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व होता है। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से पापों से मुक्ति दिलाने वाला और पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है। योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) का पालन करने से रोग, दोष और दरिद्रता का नाश होता है तथा मनुष्य मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा व नियमपूर्वक करने से व्रती को 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। योगिनी एकादशी 2025 तिथि और समय (Yogini Ekadashi 2025 Date & Time) हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। यह तिथि हर साल अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। वर्ष 2025 में योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) व्रत 21 जून (शनिवार) को रखा जाएगा, क्योंकि तीज-त्योहारों का निर्धारण उदया तिथि (सूर्योदय के समय की तिथि) के आधार पर होता है। तिथि और समय योगिनी एकादशी का महत्व (Significance of Yogini Ekadashi) योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यकारी और प्रभावशाली व्रतों में से एक माना गया है। यह व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2025 में यह व्रत 21 जून को मनाया जाएगा। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है, और योगिनी एकादशी विशेष रूप से आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली मानी जाती है। पद्म पुराण और भविष्य पुराण जैसे ग्रंथों में योगिनी एकादशी का महत्व विस्तार से बताया गया है। पद्म पुराण के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत करने से मनुष्य को 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन के सभी दोषों और पापों को दूर करता है, और उसे अध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है। इस व्रत को लेकर ऐसी मान्यता भी है कि यह स्वर्ग प्राप्ति के साथ-साथ व्यक्ति को धरती पर भी सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय योगिनी एकादशी व्रत और पूजा विधि (Yogini Ekadashi Vrat Puja Vidhi) योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और श्री हरि के समक्ष व्रत का संकल्प लें। घर के पूजा स्थल को स्वच्छ करें और गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक पवित्र चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। उन्हें हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाएं और पीले फूल, फल, पंचामृत, पंजीरी, मिठाई तथा तुलसी दल अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं, धूप दिखाएं और पूरी श्रद्धा से पूजा करें। इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें। योगिनी एकादशी व्रत की कथा का पाठ करें या उसे सुनें। अंत में भावपूर्ण आरती करें। रात्रि में भजन-कीर्तन करें। योगिनी एकादशी व्रत  (Yogini Ekadashi vrat) रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन संयम और श्रद्धा के साथ उपवास करना चाहिए। यदि स्वास्थ्य कारणों से निर्जल व्रत संभव न हो, तो फलाहार या दूध-फल का सेवन किया जा सकता है। व्रत के दौरान तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा और नकारात्मक व्यवहार जैसे क्रोध या विवाद से बचना चाहिए। इस दिन मन, वाणी और कर्म से शुद्धता बनाए रखना आवश्यक है। भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा, मंत्र जाप और कथा श्रवण करने से व्रत का पुण्य बढ़ता है। अगले दिन द्वादशी को प्रातः स्नान करके पूजा करें और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का प्रसाद ग्रहण कर व्रत का विधिवत पारण करें। व्रत का पारण ब्राह्मण या जरूरतमंदों को दान देकर भी किया जा सकता है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Vishnu #YoginiEkadashi2025 #EkadashiVrat #HinduFestivals2025 #SpiritualRituals #EkadashiPuja

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Jagannath Rath Yatra 2025

जगन्नाथ रथ यात्रा 2025: हवा को मात देती है मंदिर की पताका, हर दिन होता है चमत्कार

भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर की रथ यात्रा हर वर्ष श्रद्धालुओं को न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है, बल्कि इसकी कई रहस्यमयी घटनाएं भी लोगों को चमत्कृत करती हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 की शुरुआत इस वर्ष 26 जून को हो रही है और लाखों भक्त भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों को खींचने के लिए पुरी में उमड़ पड़े हैं। इस भव्य आयोजन के बीच एक रहस्य बार-बार चर्चा में आता है, जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लहराने वाली पताका (ध्वज) हवा की उल्टी दिशा में लहराती है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की पताका सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराती है। यह रहस्यमयी घटना विज्ञान के लिए भी अब तक एक अबूझ पहेली बनी हुई है, जिससे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं आज भी लोगों की आस्था को और प्रगाढ़ करती हैं। यह नजारा हर किसी को चौंका देता है और विज्ञान भी आज तक इसका ठोस कारण स्पष्ट नहीं कर पाया है। हर दिन बदला जाता है मंदिर का ध्वज, हवा की विपरीत दिशा में लहराता है पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर फहराने वाला ध्वज अपने आप में एक रहस्य है। हैरानी की बात यह है कि यह ध्वज सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराता है, जो सामान्य विज्ञान के नियमों के बिल्कुल विरुद्ध प्रतीत होता है। यह ध्वज हर दिन बदला जाता है और यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। स्थानीय मान्यता है कि यदि किसी दिन यह ध्वज नहीं बदला गया या नहीं फहराया गया, तो मंदिर के पट 18 वर्षों तक बंद हो जाएंगे। इसी कारण इस परंपरा का पालन अत्यंत श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाता है। मंदिर के शिखर पर स्थित एक अन्य रहस्यमयी तत्व है, सुदर्शन चक्र। यह चक्र ऐसा प्रतीत होता है कि आप मंदिर की किसी भी दिशा में खड़े हों, यह हमेशा आपकी ओर ही मुड़ा हुआ नजर आता है। इसे ‘नीलचक्र’ भी कहा जाता है, और यह दर्शाता है कि भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) की दृष्टि सदैव अपने भक्तों पर बनी रहती है। हनुमान से जुड़ी है ध्वज और वायु के रहस्य की पौराणिक कथा इन चमत्कारी रहस्यों के पीछे एक पुरानी पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जिसका संबंध भगवान श्री हनुमान (Lord Hanuman) से जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार, एक समय भगवान विष्णु समुद्र की लहरों की आवाज़ के कारण विश्राम नहीं कर पा रहे थे। जैसे ही यह बात हनुमान जी को पता चली, उन्होंने समुद्र देव से विनती की कि वे अपनी तरंगों की ध्वनि को शांत करें, ताकि भगवान विष्णु विश्राम कर सकें। लेकिन समुद्र देव ने उत्तर दिया कि यह कार्य उनके बस की बात नहीं है, क्योंकि जहां तक वायु बहती है, वहां तक लहरों की गूंज भी जाती है। इसके बाद हनुमान जी (Lord Hanuman) पवन देव से मिलने गए और उनसे सहायता मांगी। पवन देव ने स्पष्ट कहा कि हवा की दिशा बदलना उनके वश में नहीं है, लेकिन एक उपाय सुझाया – उन्होंने हनुमान जी से कहा कि यदि तुम मंदिर के चारों ओर इतनी तीव्र गति से परिक्रमा करो कि एक स्थायी वायुवृत (Air Barrier) बन जाए, तो सामान्य वायु मंदिर के गर्भगृह तक नहीं पहुंच पाएगी। हनुमान जी (Lord Hanuman) ने ऐसा ही किया और उनकी तेज गति से बनी वायु की परत ने समुद्र की आवाज़ को मंदिर के भीतर पहुंचने से रोक दिया। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय उस दिन से मान्यता है कि मंदिर क्षेत्र में वायु के बहाव की दिशा सामान्य नहीं रही। यही कारण है कि मंदिर की पताका हर समय हवा की विपरीत दिशा में लहराती है, और सुदर्शन चक्र की दृष्टि हर दिशा में समान बनी रहती है। 1800 फीट की ऊंचाई पर फहराई जाती है ध्वज श्री जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई लगभग 214 फीट है, और यहां हर दिन एक सेवायत (पुजारी) बिना किसी आधुनिक उपकरण का उपयोग किए, मंदिर की चोटी पर चढ़कर ध्वजा को बदलता है। यह कार्य अत्यंत कठिन और जोखिमभरा होता है, फिर भी यह परंपरा सदियों से बिना रुके चल रही है। ऐसा माना जाता है कि यदि किसी दिन ध्वजा न बदली जाए तो उस दिन मंदिर के पट बंद हो जाते हैं और कोई पूजा नहीं होती।  Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Jagannath #JagannathRathYatra2025 #PuriRathYatra #JagannathTemple #DivineMiracle #IndianFestivals

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sani dev

क्यों चढ़ाया जाता है शनिदेव को तेल? जानिए धार्मिक आस्था और विज्ञान से जुड़ा रहस्य

शनिवार के दिन तिल का तेल चढ़ाना क्यों है विशेष? जानिए शास्त्रों की मान्यता, पौराणिक कथाएं और वैज्ञानिक पहलू जो बताते हैं कि यह परंपरा सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और ऊर्जा संतुलन का प्रतीक भी है। शनिवार के दिन देशभर में शनिदेव की पूजा विशेष श्रद्धा और भक्ति से की जाती है। विशेषकर शनि जयंती और शनिवार के दिन लोग शनि मंदिर जाकर उन्हें तिल का तेल चढ़ाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शनिदेव को तेल ही क्यों चढ़ाया जाता है? इसके पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक अर्थ भी छिपा हुआ है। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा कैसे शुरू हुई और इसका महत्व क्या है। शनिदेव को तेल चढ़ाने की पौराणिक कथा शनिदेव (Lord Shani) पर तेल चढ़ाने की परंपरा के पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं बताई जाती हैं। पहली कथा के अनुसार, रावण ने अपने घमंड में सभी नवग्रहों को कैद कर लिया था और शनिदेव को उल्टा लटका कर बंदीगृह में डाल दिया था। उसी समय जब हनुमानजी (Hanuman Ji) लंका पहुंचे, उन्होंने शनिदेव को इस स्थिति में देखा और उनके शरीर पर तेल मालिश की, जिससे शनिदेव को राहत मिली। प्रसन्न होकर शनिदेव ने वचन दिया कि जो भी भक्त उन्हें श्रद्धा से तेल चढ़ाएगा, वह सभी दुखों से मुक्त होगा। हनुमान और शनिदेव का युद्ध: तेल चढ़ाने की परंपरा का रहस्य एक और पौराणिक कथा के अनुसार, शनिदेव (Lord Shani) को अपने बल और पराक्रम पर गर्व हो गया था। उसी समय भगवान हनुमान की वीरता और भक्ति की ख्याति चारों दिशाओं में फैल रही थी। शनिदेव ने जब यह सुना, तो वे हनुमानजी की परीक्षा लेने और उनसे युद्ध करने के इरादे से निकल पड़े। जब वे भगवान हनुमान (Hanuman Ji) के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि हनुमान जी एक शांत स्थान पर श्रीराम के ध्यान में लीन थे। शनिदेव ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। हनुमानजी ने उन्हें शांत करने की कोशिश की, लेकिन शनिदेव अड़े रहे और युद्ध की जिद पर कायम रहे। आखिरकार दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ, जिसमें शनिदेव बुरी तरह घायल हो गए। उन्हें गंभीर पीड़ा होने लगी। हनुमानजी (Hanuman Ji) ने दया दिखाते हुए शनिदेव के शरीर पर तेल लगाया, जिससे उन्हें राहत मिली। इस अनुभव से शनिदेव इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वचन दिया कि जो भी श्रद्धा और भक्ति से उन्हें तेल चढ़ाएगा, उसकी सभी पीड़ाएं दूर होंगी और मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। तभी से शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। इसे भी पढ़ें: शांत मुद्रा में शेषनाग पर क्यों विराजते हैं भगवान विष्णु? जानिए क्षीर सागर से जुड़े गहरे रहस्य शनिवार को सरसों का तेल चढ़ाने के फायदे शनिदेव (Lord Shani) को न्याय का देवता माना जाता है, जो प्रत्येक जीव के कर्मों का हिसाब रखते हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति शनिवार के दिन श्रद्धा से शनिदेव की मूर्ति पर सरसों का तेल अर्पित करता है, उसे उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसा करने से न केवल आर्थिक समस्याओं में राहत मिलती है, बल्कि धन से जुड़ी परेशानियों में भी सुधार देखा जाता है। साथ ही जिन लोगों पर शनि की ढैय्या या साढ़ेसाती का प्रभाव चल रहा होता है, उन्हें भी सरसों का तेल चढ़ाने से काफी हद तक राहत मिलती है और शनि की महादशा का प्रभाव कम होता है। जो भी जातक किसी भी तरह की शनि पीड़ा अथवा साढ़े साती से ग्रसित है वो यदि प्रत्येक शनिवार सुबह स्नान कर सच्ची श्रद्धा से शनिदेव की मूर्ति पर सरसों का तेल अर्पित करता है उसे शनि देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ध्यान रहे तेल सीधा मूर्ति पर नहीं उड़ेलना है। तेल को शनि देव के दाएं पैर की सबसे छोटी वाली ऊँगली पर उड़ेलना है। मान्यता है ऐसा करने से शनि देव जल्द प्रसन्न होते हैं।  Latest News in Hindi Today Hindi news Hanuman Ji #ShaniDev #OilOffering #SpiritualBelief #ScientificReason #HinduRituals #ShaniDosh #SaturdayWorship

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Seven pot cooking mystery

पुरी रसोई का रहस्य: अग्नि पर रखे सात बर्तनों में सबसे ऊपर की हांडी पहले पकती है।

हर साल की तरह इस वर्ष भी भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथ यात्रा 26 जून 2025 से आरंभ होगी। पंचांग के अनुसार यह यात्रा आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आरंभ होती है, जो इस बार दोपहर 1 बजकर 27 मिनट से प्रारंभ होगी। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन हेतु पुरी पहुंचते हैं और वहां पर महाप्रसाद का पवित्र भोग ग्रहण करते हैं। इस भोग से जुड़ा एक ऐसा रहस्य है जिसे आज तक विज्ञान भी नहीं समझ पाया है। जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 के दौरान उभरता है यह चमत्कारी दृश्य, विज्ञान भी हैरान, परंपरा में छुपा है अद्भुत रहस्य। श्रद्धा और विज्ञान की अद्वितीय संगति बनाती है इस परंपरा को अनोखा। भव्य रसोई में प्रतिदिन लगभग 500 से अधिक महाराज और 300 के करीब सहयोगी मिलकर भगवान के लिए छप्पन भोग करते हैं तैयार  पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई को विश्व की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है। इस भव्य रसोई में प्रतिदिन लगभग 500 से अधिक महाराज और 300 के करीब सहयोगी मिलकर भगवान के लिए छप्पन भोग तैयार करते हैं। मंदिर की यह रसोई न सिर्फ विशाल है, बल्कि इसके काम करने का तरीका भी पूरी दुनिया के लिए रहस्य बना हुआ है। रथ यात्रा के दौरान प्रतिदिन मंदिर में 2,000 से लेकर 2 लाख तक श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए आते हैं। इन सभी को ‘महाप्रसाद’ स्वरूप एक विशेष प्रकार की खिचड़ी दी जाती है। लेकिन इस खिचड़ी को पकाने की विधि इतनी अनोखी है कि उसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं। रहस्यमयी तरीके से बनता है यह महाप्रसाद भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद किसी धातु के नहीं, बल्कि खास तौर पर मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है। इसे पकाने के लिए सात मिट्टी की हांडियों (बर्तनों) को एक के ऊपर एक रखकर चूल्हे पर चढ़ाया जाता है। इस प्रक्रिया का सबसे चौंकाने वाला और रहस्यमय पहलू यह है कि नीचे आग जलने के बावजूद सबसे नीचे की हांडी सबसे आखिर में पकती है, जबकि सबसे ऊपर रखी हुई हांडी का चावल सबसे पहले तैयार हो जाता है। साधारण तर्क से देखा जाए तो आग के सबसे पास रखी हांडी पहले पकनी चाहिए, लेकिन यहां ठीक उल्टा होता है। ऊपर से नीचे की ओर क्रम में हांडियां धीरे-धीरे पकती हैं, और नीचे की हांडी सबसे आखिर में पककर तैयार होती है। इसी विशेष तरीके से तैयार किया गया यह भोग भगवान जगन्नाथ को चढ़ाया जाता है, जिसे श्रद्धालु “महाप्रसाद” के रूप में ग्रहण करते हैं। यह तरीका आज भी विज्ञान के लिए एक रहस्य बना हुआ है। इसे भी पढ़ें: शांत मुद्रा में शेषनाग पर क्यों विराजते हैं भगवान विष्णु? जानिए क्षीर सागर से जुड़े गहरे रहस्य दुनिया की सबसे बड़ी रसोई जगन्नाथ मंदिर परिसर में स्थित ‘अन्न रसोई’ को दुनिया की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है। इस रसोई में हर दिन हजारों श्रद्धालुओं के लिए भोजन तैयार किया जाता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यहां आने वाले किसी भी भक्त को अब तक प्रसाद के बिना लौटना नहीं पड़ा। भीड़ चाहे जितनी हो, सभी को भरपेट भोजन मिलता है। यहां भोजन बनाने का पारंपरिक तरीका और उसकी सटीक व्यवस्था किसी चमत्कार से कम नहीं लगती। इसे चमत्कार ही कहेंगे कि श्रद्धालु चाहे लाखों की तादात में आए करोड़ों की, प्रासद कभी कम नहीं होता। ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी श्रद्धालु को बिना प्रसाद के ही लौटना पड़ा हो। इसे चमत्कार ही कहेंगे। सही मायनों में यह श्रद्धा और शक्ति का ही कमाल है। आज का विज्ञान और बुद्धिजीवी भले ही इसपर आसानी से यकीन न करें लेकिन यह सच है कि जगन्नाथ मंदिर परिसर में स्थित ‘अन्न रसोई’ से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटा है।  Latest News in Hindi Today Hindi news बर्तनों जगन्नाथ #PuriKitchen #TraditionalCooking #SevenPotMystery #IndianFoodCulture #CulinaryScience #OdishaTradition

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Ashok Sundari,

भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी: एक अनसुनी देवी की कथा

भारतीय पौराणिक कथाओं में भगवान शिव और माता पार्वती की कहानियां अत्यंत प्रसिद्ध हैं। परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश के अलावा उनकी एक पुत्री भी थीं — जिनका नाम था अशोक सुंदरी। देवी अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) की कथा ‘पद्म पुराण’ में वर्णित है, जो न केवल रहस्यमय है बल्कि यह स्त्री शक्ति और मातृत्व के अद्भुत पहलुओं को भी दर्शाती है। जन्म की कथा हिंदू कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत से बाहर घूमते हुए एक इच्छापूर्ति वृक्ष कल्पवृक्ष के पास पहुंचे। चूंकि शिव अक्सर राक्षसों से युद्ध के लिए बाहर रहते थे, पार्वती को अकेलापन महसूस होता था। ऐसे में उन्होंने कल्पवृक्ष से एक बेटी की कामना की, और उसी से अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) का जन्म हुआ। ‘अशोक’ का अर्थ होता है ‘शोक रहित’, क्योंकि उसने पार्वती के दुख को दूर किया, और ‘सुंदरी’ का अर्थ होता है सुंदर, जो उसकी सुंदरता के अनुरूप था।  अशोक सुंदरी को मिला वरदान देवी अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) ने न केवल माता पार्वती के दुख को दूर किया, बल्कि आगे चलकर उन्होंने अद्भुत महत्ता और प्रतिष्ठा भी प्राप्त की। जब वह बड़ी हुईं, तो उन्हें वरदान मिला कि वह भविष्य में नहुष नामक महान राजा से विवाह करेंगी। नहुष कोई साधारण पुरुष नहीं, बल्कि वह वही राजा थे जो बाद में इंद्र के पद पर आसीन हुए थे। हुंड दैत्य का आगमन और अशोक सुंदरी का अटल संकल्प एक बार दानवराज विप्रचिति का पुत्र हुंड, जो अत्यंत क्रूर और स्वेच्छाचारी था, उस वन में आया जहाँ अशोक सुंदरी भ्रमण कर रही थीं। उसे देखते ही वह मोहित हो गया और विवाह का प्रस्ताव रख दिया। अशोक सुंदरी (Ashoka Sundari) ने गर्व से उत्तर दिया कि वह भगवान शिव और माता पार्वती की पुत्री हैं, और उनका विवाह भविष्य में धर्मात्मा नहुष से तय है, जो सोमवंश में जन्म लेकर महान पराक्रमी और भगवान विष्णु के समान होंगे। हुंड ने उनकी बात को ठुकराते हुए कहा कि नहुष तो अभी बालक है और उम्र में छोटे हैं, ऐसे में अशोक सुंदरी की जवानी व्यर्थ जाएगी। उसने उनसे प्रेम और साथ रहने का आग्रह किया। लेकिन शिवपुत्री अशोक सुंदरी अपने निश्चय में अडिग रहीं। उन्होंने हुंड को चेताया कि वह पतिव्रता हैं और उसका मन विचलित नहीं किया जा सकता। यदि वह नहीं गया, तो वे उसे भस्म कर देंगी। इसे भी पढ़ें:- अहमदाबाद से लंदन जा रही एयर इंडिया की फ्लाइट हुई क्रैश, पूर्व मुख्यमंत्री समेत 242 यात्री थे सवार नहुष से विवाह दानव हुंड ने माया रचते हुए कन्या का रूप धारण किया और अशोक सुंदरी को बहला-फुसलाकर अपने महल में ले गया। जब अशोक सुंदरी को यह सच्चाई ज्ञात हुई कि वह कन्या नहीं बल्कि वही दुष्ट हुंड है, तो वह क्रोधित हो उठीं और उसे डांटते हुए स्पष्ट कहा कि वह उसे कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता। अशोक सुंदरी ने हुंड को श्राप देते हुए कहा कि वह ही उसके विनाश का कारण बनेगी और उसके वंश का अंत होगा। वह गंगा तट पर बैठकर प्रतिज्ञा करती है कि जब तक हुंड को नहुष युद्ध में पराजित कर नहीं मार देता, वह विवाह नहीं करेगी। नहुष का जन्म और शिक्षा हुंड ने नहुष के जन्म को रोकने के कई प्रयास किए, लेकिन ऋषि दत्तात्रेय की कृपा से वह असफल रहा। नहुष का जन्म हुआ और वशिष्ठ मुनि के आश्रम में वह वेद, अस्त्र-शस्त्र और नीति की शिक्षा लेकर महान योद्धा बना। वशिष्ठ ने नहुष को बताया कि अशोक सुंदरी उसकी पत्नी है, जो उसके लिए तपस्या कर रही है और उसे हुंड के चंगुल से मुक्त करना उसका धर्म है। बाद में अशोक सुंदरी और राजा नहुष का विवाह संपन्न हुआ। नहुष को अत्यंत धर्मपरायण, तेजस्वी और वीर राजा माना गया।  Latest News in Hindi Today Hindi Ashoka Sundari #AshokSundari #LordShiva #HinduMythology #Parvati #DivineDaughter #UntoldStories #IndianGods

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Lord Vishnu Sheshnag

शांत मुद्रा में शेषनाग पर क्यों विराजते हैं भगवान विष्णु? जानिए क्षीर सागर से जुड़े गहरे रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को संहार नहीं, बल्कि सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें ‘श्री हरि’ कहा जाता है, जो संसार की रक्षा करते हैं, अधर्म का विनाश करते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं। लेकिन एक बात जो हमेशा लोगों को आकर्षित करती है, वह है भगवान विष्णु की क्षीर सागर में शेषनाग पर विश्राम मुद्रा में स्थिति। आखिर भगवान विष्णु सदैव एक शांत मुद्रा में शेषनाग की शैय्या पर क्यों विराजमान रहते हैं? और उन्हें श्री हरि (Shree Hari) क्यों कहा जाता है? इन सवालों के उत्तर हमें पौराणिक कथाओं और शास्त्रों में मिलते हैं।  क्षीर सागर और शेषनाग का प्रतीकात्मक अर्थ आपने कई बार भगवान विष्णु (Shree Hari) को चित्रों या मूर्तियों में शेषनाग की शैय्या पर अत्यंत शांत और सहज मुद्रा में विश्राम करते हुए देखा होगा। यह दृश्य मन में यह प्रश्न जरूर उत्पन्न करता है कि आखिर भगवान विष्णु ने विश्राम के लिए शेषनाग जैसे भयंकर नाग को ही क्यों चुना? इसके पीछे एक गहन प्रतीकात्मक अर्थ छिपा है। दरअसल, भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं और शेषनाग को ‘काल’ यानी समय का प्रतीक माना जाता है। विष्णु जी का शेषनाग पर विश्राम करना इस बात का संकेत है कि उन्होंने काल यानी समय पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। यह दृश्य सृष्टि के सभी प्राणियों को यह संदेश देता है कि यदि व्यक्ति संतुलन, धैर्य और आत्मबल के साथ जीवन को जिए, तो वह समय और परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकता है। नारायण क्यों करते हैं शेषनाग पर विश्राम? जानिए इसका आध्यात्मिक अर्थ भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को अक्सर शेषनाग की शैय्या पर क्षीर सागर में विश्राम करते हुए दर्शाया जाता है। उनका यह शांत रूप गहरी आध्यात्मिक सीख देता है। यह चित्र हमें कठिन समय में धैर्य, संतुलन और आत्म-नियंत्रण बनाए रखने की प्रेरणा देता है। क्षीर सागर को सुख और शांति का प्रतीक माना गया है, जबकि शेषनाग ‘काल’ का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में विष्णु का यह रूप यह संदेश देता है कि चाहे जीवन में कितनी भी समस्याएं, पीड़ा या भय हो, एक व्यक्ति को समय और परिस्थितियों से ऊपर उठकर संतुलित और शांत रहना चाहिए। इसे भी पढ़ें: सत्तू शरबत: शरीर को मजबूत और स्वस्थ बनाने में फायदेमंद है यह देसी टॉनिक  इंसान को धैर्य और आत्मबल के साथ हर मुश्किल का करना चाहिए सामना  जिस प्रकार भगवान विष्णु पर सृष्टि के पालन की जिम्मेदारी है, उसी प्रकार हर मनुष्य भी अपने कर्तव्यों और दायित्वों से जुड़ा होता है। जीवन में उतार-चढ़ाव, समस्याएं और संघर्ष आना स्वाभाविक है, लेकिन इनसे टूटना नहीं चाहिए। भगवान विष्णु की तरह, जो विषम परिस्थितियों में भी शेषनाग की विषैली शैय्या पर स्थिर और शांत रहते हैं, उसी प्रकार एक इंसान को भी धैर्य और आत्मबल के साथ हर मुश्किल का सामना करना चाहिए। श्री हरि (Shree Hari) का यह रूप हमें यह सिखाता है कि विषम स्थितियों में घबराने या विचलित होने की बजाय, शांत चित्त और सकारात्मक दृष्टिकोण से परिस्थितियों का सामना करना ही सच्चा धर्म है। उनका यह दिव्य स्वरूप हर व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है कि जीवन की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी मन को स्थिर और शांत रखा जा सकता है। भगवान विष्णु को ‘श्री हरि’ क्यों कहा जाता है? ‘हरि’ (Shree Hari) शब्द का अर्थ होता है हर लेने वाला – विशेषतः दुख, भय और अज्ञान को हरने वाला। भगवान विष्णु को ‘श्री हरि’ कहने के पीछे यह मान्यता है कि वे अपने भक्तों के पापों को हर लेते हैं और उन्हें मोक्ष की ओर ले जाते हैं। साथ ही ‘श्री’ शब्द माता लक्ष्मी का सूचक है, जो भगवान विष्णु की पत्नी हैं। अतः ‘श्री हरि’ नाम यह दर्शाता है कि वे लक्ष्मीपति हैं और संसार की सुख-समृद्धि के दाता भी। Latest News in Hindi Today Hindi news Shree Hari #LordVishnu #Sheshnag #KshiraSagar #HinduMythology #SpiritualSecrets #DivinePose

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Lord Kuber

कैसे बने भगवान कुबेर धन के देवता? जानिए शिव से मिले अद्भुत वरदान की कथा

भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं बल्कि वे समृद्धि, वैभव और धन के प्रतीक भी माने जाते हैं। जानिए कैसे घोर तपस्या के बाद शिवजी से उन्हें यह दिव्य पद और सम्मान प्राप्त हुआ। हिंदू धर्म में धन, वैभव और समृद्धि के प्रतीक माने जाने वाले भगवान कुबेर न केवल देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं, बल्कि स्वर्ग के खजाने के रक्षक भी हैं। उन्हें लोकसभा और वैश्विक स्तर पर भी “गॉड ऑफ वेल्थ” (धन के देवता) के रूप में पूजा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे कैसे धन के देवता बने और उन्हें यह पद कैसे प्राप्त हुआ? इस लेख में हम जानेंगे भगवान कुबेर की पौराणिक कथा, उनका जन्म, शिव से प्राप्त वरदान और धार्मिक महत्ता। कुबेर का जन्म और वंश भगवान कुबेर (Lord Kuber) का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हालांकि उनमें एक दोष था, उन्हें चोरी करने की आदत थी, और उस वजह से उनके पिता को इस बात का पता चला, तो उन्होंने कुबेर को घर से निकाल दिया। कुबेर भटकते हुए एक शिव मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने एक पुजारी को सोते देखा और प्रसाद चुराने का निश्चय किया। चोरी करते समय पुजारी को न जगाने और दीपक को बुझने से बचाने के लिए उन्होंने दीपक के सामने अपना अंगोछा फैला दिया। फिर भी वह पकड़े गए, हाथापाई हुई और उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के पश्चात यमदूत उन्हें ले जा रहे थे, लेकिन मार्ग में भगवान शिव के गण भी पहुंच गए। उन्होंने कुबेर को शिवजी के समक्ष प्रस्तुत किया। भगवान शिव को यह प्रतीत हुआ कि कुबेर ने चोरी करते हुए भी दीपक की लौ को बचाने का प्रयास किया था, जिससे उनकी भक्ति झलकती थी। महादेव इस भाव से प्रसन्न हुए और उन्होंने कुबेर को ‘धन के देवता’ का पद प्रदान किया। तभी से भगवान कुबेर को समृद्धि और धन के अधिपति के रूप में पूजा जाता है। रामायण में उल्लिखित रामायण में वर्णित एक कथा के अनुसार, भगवान कुबेर (Lord Kuber) ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय में कठोर तपस्या की थी। इस तप के दौरान शिवजी के साथ माता पार्वती भी प्रकट हुईं। जब कुबेर ने पार्वती जी को अपनी बाईं आंख से देखा, तो उनके दिव्य तेज के प्रभाव से उनकी वह आंख जलकर पीली हो गई। इसके बाद कुबेर ने एक अन्य स्थान पर जाकर पुनः तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी तपस्या ने मुझे अत्यंत प्रसन्न किया है। इसलिए अब से तुम एकाक्षी पिंगल के नाम से प्रसिद्ध होगे, जिसका अर्थ है, एक आंख वाला और पीले नेत्रों वाला। इसे भी पढ़ें:- पति की लंबी आयु के लिए रखें ये शुभ व्रत और करें ये उपाय धार्मिक महत्ता और पूजा हिंदू धर्म में भगवान कुबेर (Lord Kuber) की पूजा विशेष रूप से धनतेरस, दीपावली, अक्षय तृतीया, और नववर्ष जैसे अवसरों पर की जाती है। विशेष रूप से व्यापारी वर्ग और धन-संपत्ति की इच्छा रखने वाले लोग कुबेर की आराधना करते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, धन के देवता कुबेर की प्रतिमा को घर की उत्तर दिशा में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से न केवल भगवान कुबेर की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि मां लक्ष्मी का आशीर्वाद भी घर में बना रहता है और समृद्धि में वृद्धि होती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Kuber #lordkuber #godofwealth #shivablessing #hindumythology #wealthgod #kuberstory #divineboon #spiritualstory

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