Anjali Choudhary

Ganga Dussehra date and significance

गंगा दशहरा 2025: धन, सुख और समृद्धि पाने का शुभ अवसर

हिंदू धर्म में गंगा दशहरा का पर्व अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व मां गंगा के धरती पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। गंगा दशहरा हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन मां गंगा राजा भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं।  गंगा दशहरा 2025: जानिए तिथि और पुण्य स्नान का शुभ समय पंचांग के अनुसार, गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2025 में यह तिथि 04 जून को रात 11 बजकर 54 मिनट से आरंभ होकर 06 जून की रात 02 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन पुण्य स्नान का विशेष महत्व होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 2025 में गंगा दशहरा का मुख्य स्नान 05 जून को होगा। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त का समय 05 जून को सुबह 04:02 से 04:42 बजे तक रहेगा। गंगा दशहरा का धार्मिक महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब राजा सगर के 60,000 पुत्रों की आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए भगीरथ ने कठोर तप किया, तब मां गंगा (Maa Ganga) ने प्रकट होकर धरती पर अवतरण किया। कहा जाता है कि गंगा जल का स्पर्श मात्र ही सभी पापों और कष्टों को दूर कर देता है। गंगा दशहरा पर स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व है। इस दिन मां गंगा (Maa Ganga) का पूजन करने और विशेष उपाय अपनाने से आर्थिक तंगी, दरिद्रता और जीवन की बाधाएं समाप्त होती हैं। गंगा जल से लक्ष्मी पूजन गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन अपने घर में मां लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के समक्ष गंगा जल से स्नान कराएं। फिर उन्हें चांदी का सिक्का, कमल का फूल, और मिश्री अर्पित करें। इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।  तुलसी में गंगाजल चढ़ाएं गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन तुलसी का पौधा घर में लगाना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस विशेष दिन यदि उत्तर दिशा में तुलसी का पौधा रोपा जाए, तो घर में देवी लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। इससे मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि यह उपाय अपनाने से तिजोरी कभी खाली नहीं होती और घर में सुख-शांति बनी रहती है। गंगा स्नान  यदि लगातार मेहनत करने के बावजूद भी व्यापार में सफलता नहीं मिल रही है, तो गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। स्नान के उपरांत तांबे के लोटे में जल भरकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। धार्मिक मान्यता है कि इस उपाय से न केवल व्यापार में तरक्की होती है, बल्कि घर-परिवार में भी सुख-समृद्धि और खुशियों का आगमन होता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां गंगा दशहरा के दिन का विशेष दान गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) का दिन आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन श्रद्धापूर्वक मंदिर में या जरूरतमंद लोगों को जल से भरे मिट्टी के कलश का दान करें और साथ में दक्षिणा भी अर्पित करें। मान्यता है कि इस उपाय से आर्थिक संकट से मुक्ति मिलती है और घर में धन-संपत्ति बढ़ने के योग बनते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Ganga Dussehra #GangaDussehra2025 #SpiritualFestival #HinduFestivals #GangaMaa #WealthAndHappiness #FestivalOfPurity

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Sankashti Chaturthi moonrise time

कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी 2025: कब है व्रत, क्या है पूजन विधि और शुभ मुहूर्त?

सनातन धर्म में चतुर्थी तिथि को अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना गया है। यह पर्व प्रत्येक माह श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन विघ्नों को दूर करने वाले भगवान श्री गणेश (Lord Ganesha) की विधिवत पूजा की जाती है। विशेष कार्यों में सफलता प्राप्त करने, सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना के लिए इस दिन व्रत रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) व्रत करने से साधक की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और जीवन के संकट दूर होते हैं। यह व्रत विशेष रूप से बुद्धि, समृद्धि और बाधाओं को दूर करने वाले भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। आइए जानते हैं कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी 2025 की तिथि, शुभ समय (मुहूर्त) और योग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां। व्रत तिथि और चंद्रमा उदय का समय वैदिक पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 जून को दोपहर 3 बजकर 46 मिनट से आरंभ होकर 15 जून को दोपहर 3 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। तिथि की मान्यता के अनुसार, कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) व्रत इस वर्ष 14 जून को रखा जाएगा। इस दिन चंद्रमा का उदय रात्रि 10 बजकर 7 मिनट पर होगा, जो व्रतीजनों के लिए विशेष रूप से पूजन का शुभ समय माना जाता है। शुभ योग इस वर्ष आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से इंद्र योग का शुभ संयोग बन रहा है। साथ ही इस दिन भद्रवास का योग भी पड़ रहा है। इन दोनों मंगलकारी योगों में भगवान गणेश (Lord Ganesha) की उपासना करने से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने का विश्वास किया जाता है। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) के दिन एक विशेष और शुभ योग, शिववास योग बन रहा है, जिसकी शुरुआत दोपहर 3 बजकर 46 मिनट से होगी। यह योग पूजा-पाठ और व्रत के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस विशेष योग में माना जाता है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर विराजमान होते हैं। ऐसे में इस पावन समय पर भोलेनाथ का जलाभिषेक करने से साधक को समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। पूजन विधि और व्रत की प्रक्रिया इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां  व्रत का महत्व और लाभ कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी (Krishnapingal Sankashti Chaturthi) का व्रत रखने से जीवन की तमाम रुकावटें समाप्त होती हैं और व्यक्ति को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस उपवास से मन को शांति मिलती है, आत्मबल बढ़ता है और परिवारिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। भगवान गणेश की कृपा से व्रती के सभी कार्य निर्विघ्न पूर्ण होते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news #KrishnaPingalaChaturthi2025 #SankashtiChaturthi #GaneshVrat #PujaVidhi #MoonriseTime #ChaturthiPuja #HinduFestivals2025

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Budhwa Mangal 2025

बुढ़वा मंगल 2025: चौथा बड़ा मंगल, हनुमान भक्ति से कटेंगे सारे संकट

इस वर्ष 2025 में बुढ़वा मंगल (Budhwa Mangal) का चौथा मंगलवार 3 जून को पड़ रहा है। यह दिन विशेष रूप से उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश में भगवान हनुमान (Lord Hanuman) की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ हनुमानजी की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।  बुढ़वा मंगल का महत्व बड़ा मंगल (Budhwa Mangal) का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। मान्यता है कि त्रेता युग में ज्येष्ठ माह के एक मंगलवार को भगवान श्रीराम (Lord SriRam) और हनुमान जी का प्रथम मिलन हुआ था, जिसे अत्यंत शुभ और पावन घटना माना जाता है। इसी कारण ज्येष्ठ मास के मंगलवार ‘बड़ा मंगल’ के रूप में मनाए जाते हैं। एक अन्य कथा के अनुसार अवध के नवाब शुजा-उद-दौला की बेगम को संतान की प्राप्ति होने पर उन्होंने अलीगंज (लखनऊ) में एक हनुमान मंदिर (Hanuman Mandir) का निर्माण कराया। संयोगवश मंदिर का उद्घाटन ज्येष्ठ महीने के मंगलवार को हुआ, जिसके बाद से इस माह के सभी मंगलवारों को बड़ा मंगल (Budhwa Mangal) के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। बड़ा मंगल न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द और आपसी एकता का भी प्रतीक बन चुका है। इस दिन हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर भंडारे और प्रसाद वितरण जैसे सेवा कार्य करते हैं, जिससे समाज में भाईचारे की भावना और अधिक प्रबल होती है। पूजा विधि और अनुष्ठान बड़ा मंगल (Budhwa Mangal) के पावन अवसर पर हनुमान जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ और लाल रंग के वस्त्र धारण करें। फिर घर में या मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा की शुरुआत देसी घी का दीपक जलाकर करें। हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें, जो उन्हें अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। साथ ही, लाल फूल और तुलसी की माला चढ़ाएं। भोग स्वरूप बूंदी के लड्डू, गुड़ और भुने चने अर्पित करें। इसके पश्चात श्रद्धापूर्वक हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करें। पूजन के दौरान “ॐ हं हनुमते नमः” जैसे मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायक माना जाता है। पूजन का समापन आरती के साथ करें और यदि किसी प्रकार की त्रुटि पूजा में हुई हो, तो भगवान से क्षमा-याचना करें। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां हनुमानजी के मंत्रों का जाप बुढ़वा मंगल (Budhwa Mangal) के शुभ अवसर पर यदि श्रद्धा और आस्था के साथ हनुमान जी के विशेष मंत्रों का जाप किया जाए, तो इससे न केवल जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, बल्कि भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक शक्तियों और ऊर्जा से भी रक्षा मिलती है। यह माना जाता है कि इन मंत्रों के उच्चारण से मानसिक शांति, साहस और आत्मबल की वृद्धि होती है। हनुमान जी के कुछ ऐसे चमत्कारिक मंत्र इस दिन विशेष फल प्रदान करते हैं, जैसे: नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Budhwa Mangal #BudhwaMangal2025 #HanumanBhakti #BigMangal #HanumanTuesday #HinduFestivals #BudhwaMangalRemedies #SpiritualTuesday #LordHanuman

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Gupt Navratri puja vidhi

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2025: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष स्थान है। साल भर में कुल नौ नवरात्रि मनाए जाते हैं, जिनमें से आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि भी एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह नवरात्रि भगवान शिव और माता दुर्गा की आराधना का खास समय माना जाता है। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2025 (Ashadha Gupt Navratri 2025) की तिथियां और घट स्थापना का शुभ मुहूर्त जानना हर भक्त के लिए आवश्यक है, ताकि वे इस पावन पर्व का सही तरीके से आयोजन कर सकें। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2025 (Ashadha Gupt Navratri 2025) कब है? पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 25 जून की शाम 4 बजे से आरंभ होगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है, इसलिए आषाढ़ गुप्त नवरात्रि (Ashadha Gupt Navratri) 26 जून से शुरू होगी। यह नवरात्रि 26 जून को दोपहर 1 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगी। हिंदू पंचांग के मुताबिक, घटस्थापना का शुभ समय 26 जून को सुबह 5:25 बजे से लेकर सुबह 6:58 बजे तक होगा। इसके अलावा, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:56 बजे से दोपहर 12:52 बजे तक रहेगा, जिसमें भी घटस्थापना की जा सकती है। गुप्त नवरात्रि का धार्मिक महत्व सनातन परंपरा में गुप्त नवरात्रि को अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमय साधना का काल माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri) के दौरान मां दुर्गा (Maa Durga) की दस महाविद्याओं का प्राकट्य हुआ था, और इसी कारण इस काल में उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि यदि इस पावन समय में देवी दुर्गा के 32 विशिष्ट नामों का जाप श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए, तो जीवन की सभी समस्याएं और संकट समाप्त हो सकते हैं। साथ ही दुर्गा सप्तशती, देवी महात्म्य और श्रीमद् देवी भागवत जैसे ग्रंथों का पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri)  की साधना विशेष रूप से कुंडली के दोषों को दूर करने वाली मानी जाती है। यह काल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए अत्यंत उपयुक्त है। मान्यता है कि इस दौरान की गई साधना साधक को आध्यात्मिक रूप से जागरूक करती है और उसे देवी कृपा का भागी बनाती है। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में घट स्थापना क्यों जरूरी है? गुप्त नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना से होती है। यह घट पूजा नवरात्रि के दौरान देवी माँ के आवास के रूप में स्थापित किया जाता है। इसे स्थापित करना शुभ माना जाता है क्योंकि घट से घर और मंदिर में पवित्रता आती है। इस घट में जल, पंचामृत, सुपारी, अक्षत, आदि रखा जाता है जो देवी शक्ति का प्रतीक हैं। घट स्थापना से पूरे नवरात्रि की पूजा विधिवत संपन्न होती है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां घट स्थापना की विधि नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Ashadha Gupt Navratri #AshadhaGuptNavratri2025 #GhatasthapanaMuhurat #GuptNavratriPujaVidhi #AshadhaNavratri #SecretNavratri #NavratriRituals

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payal and black thread together meaning

पैरों में पायल और काला धागा एक साथ पहनना: शुभ है या अपशकुन?

भारतीय संस्कृति में महिलाओं के पहनावे और आभूषणों का विशेष महत्व होता है। पायल (Anklets) और काला धागा (Black Thread) जैसे परिधान न केवल सौंदर्य को बढ़ाते हैं, बल्कि इन्हें कई धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है। हालांकि इन दोनों का प्रयोग अलग-अलग कारणों से होता है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या महिलाएं एक साथ पैरों में पायल और काला धागा पहन सकती हैं? क्या यह शुभ होता है या इससे अपशकुन आता है? इस लेख में हम इस विषय के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा करेंगे। पायल का महत्व  पायल (Anklets) पहनने की प्रथा बहुत प्राचीन है और इसे केवल सजावट के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ्य और ऊर्जा के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेष रूप से चांदी की पायल पहनने से शरीर में ठंडक बनी रहती है, क्योंकि चांदी एक ऐसी धातु है जो शरीर की गर्मी को संतुलित करने में मदद करती है। यह पैरों में सूजन, दर्द और थकान जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करती है। इसके अलावा, चांदी नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, पायल पहनने से घर में सकारात्मक वातावरण बनता है और महिलाओं के जीवन में सौभाग्य आता है। विशेष रूप से विवाहित महिलाएं इसे शुभ माना करती हैं क्योंकि इससे उनके वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है और मानसिक तनाव भी कम होता है। काला धागा पहनने की परंपरा काला धागा (Black Thread) नकारात्मक ऊर्जा और नजरदोष से सुरक्षा का एक प्राचीन उपाय माना जाता है। इसे पैरों में बांधने से इसका प्रभाव और भी मजबूत हो जाता है। काले रंग का संबंध राहु, केतु और शनि जैसे ग्रहों से होता है, जो अशुभ प्रभावों को कम करने में सहायता करते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, शनिवार को किसी भैरव मंदिर जाकर काले धागे (Black Thread) को सिद्ध कर पहनना बहुत शुभ माना जाता है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है, मन में सकारात्मकता आती है और मानसिक तनाव, भय तथा चिंता में भी कमी आती है।  इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां क्या एक साथ पहनना सही है? भारतीय संस्कृति में पायल (Anklets) को सुहाग का प्रतीक माना जाता है, इसलिए विवाहित महिलाएं इसे विशेष रूप से महत्व देती हैं। वहीं, काले धागे को नजरबट्टू के रूप में देखा जाता है और अक्सर पति या सास की सलाह पर पहनाया जाता है। ग्रामीण इलाकों में आज भी यह माना जाता है कि पायल और काला धागा एक साथ पहनना अशुभ होता है, खासकर त्योहारों या धार्मिक अवसरों पर। दूसरी ओर, शहरी युवतियां इसे फैशन ट्रेंड की तरह अपनाती हैं और नियमित पहनती हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो, यदि पायल और काला धागा सही भावना और श्रद्धा के साथ पहने जाएं तो इनमें कोई दोष नहीं माना जाता।  फिर भी, खास ध्यान रखने वाली बात यह है कि जिन महिलाओं की राशि मेष, वृश्चिक या कर्क हो, उन्हें यह दोनों चीजें पैरों में साथ-साथ पहनने से बचना चाहिए। ऐसा करने पर उनके स्वास्थ्य में परेशानियां आ सकती हैं, परिवार में कलह हो सकती है और आर्थिक हानि भी हो सकती है। इन राशियों की महिलाओं के लिए सलाह दी जाती है कि वे काले धागे की जगह सफेद धागा या चांदी का कड़ा पहनें, जिससे उनका भाग्य मजबूत होता है और शुभ प्रभाव आता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Anklets #Payal #BlackThread #AuspiciousSigns #IndianTradition #SpiritualBeliefs #HinduRituals #FashionWithMeaning #MythVsTruth

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Shani Dev under feet

रावण ने शनिदेव को क्यों रखा था अपने चरणों तले?

भारतीय पौराणिक कथाओं में रावण एक ऐसा पात्र है जिसे उसके बल, बुद्धि और अहंकार के लिए जाना जाता है। लंका का राजा रावण केवल एक शक्तिशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि महान ज्योतिषाचार्य, तांत्रिक और शिवभक्त भी था। रामायण के अनुसार, रावण ने अपने पुत्र मेघनाद के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की थी। लेकिन इसी प्रसंग में शनिदेव (ShaniDev) से उसका टकराव हो गया। यह कथा आज भी धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ग्रहों को किया था नियंत्रित कहते हैं कि जब रावण के पुत्र मेघनाद का जन्म होने वाला था, तब रावण (Ravana) चाहता था कि वह अमर और अजेय योद्धा बने। इसके लिए रावण ने नवग्रहों को एक-एक कर बंदी बना लिया और उन्हें अपने दरबार में एक विशेष स्थान पर उल्टी दिशा में बैठा दिया। उसका उद्देश्य यह था कि ग्रहों की चाल उसके अनुसार चले और किसी भी तरह से मेघनाद के जीवन में कोई बाधा न आए। रावण ने शनि, बृहस्पति, मंगल, बुध, शुक्र, राहु, केतु, सूर्य और चंद्रमा – सभी ग्रहों को नियंत्रण में ले लिया। उसने प्रत्येक ग्रह को आदेश दिया कि वे अपनी-अपनी ऊंची स्थिति में रहें, ताकि मेघनाद की कुंडली श्रेष्ठतम बन सके। शनिदेव से हुआ विरोध रावण (Ravana) ज्योतिष शास्त्र का गहरा जानकार था और चाहता था कि उसका पुत्र अत्यंत शक्तिशाली और दीर्घायु हो। इसी उद्देश्य से जब उसकी पत्नी मंदोदरी गर्भवती थी, तो रावण ने सभी ग्रहों को आदेश दिया कि वे मेघनाद के जन्म के समय उच्च और शुभ स्थिति में रहें ताकि उसके पुत्र को उत्तम ग्रहों का आशीर्वाद मिल सके। रावण (Ravana) के भय से सभी ग्रह उसकी आज्ञा का पालन करने लगे, लेकिन शनिदेव को यह अन्यायपूर्ण लगा। चूंकि शनि आयु और कर्मों का न्याय करते हैं, वे स्वेच्छा से रावण के आदेश का पालन नहीं करना चाहते थे। यह भांपते हुए रावण ने बलपूर्वक शनिदेव को उस स्थिति में स्थापित कर दिया जो मेघनाद के दीर्घायु होने के लिए आवश्यक थी। हालांकि शनिदेव (ShaniDev) ने ऊपर से रावण की बात मान ली, लेकिन जैसे ही मेघनाद के जन्म का समय आया, उन्होंने अपनी दृष्टि वक्री कर ली, जिससे मेघनाद अल्पायु हो गया। जब रावण को इस बात का पता चला, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और गुस्से में आकर अपनी तलवार से शनि के पैर पर वार कर दिया, जिससे उनका एक पैर कट गया। कहा जाता है कि तभी से शनि देव लंगड़ाकर चलते हैं और उनकी गति धीमी मानी जाती है। यही कारण है कि शनि को धीमी चाल वाला ग्रह कहा जाता है और उनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां हनुमान जी ने किया शनिदेव को मुक्त हनुमान जी (Hanuman Ji) ने जब शनि देव को रावण की कैद से मुक्त कराया था, तब शनि महाराज (ShaniDev) ने उनसे प्रसन्न होकर वचन दिया कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा से हनुमान जी की पूजा करेगा, मैं उसे अपने प्रकोप से नहीं सताऊंगा। इसी कारण माना जाता है कि शनि दोष, साढ़े साती या ढैय्या से बचाव के लिए हनुमान जी (Hanuman ji) की उपासना सबसे प्रभावी उपाय है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news ShaniDev #Ravana #ShaniDev #HinduMythology #Ramayan #ShaniDosha #MythologicalFacts

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Tulsi plant dried

तुलसी के नियम: सूख जाए तुलसी का पौधा तो घबराएं नहीं, अपनाएं ये उपाय, मिलेगी सुख-समृद्धि

तुलसी का पौधा हिंदू धर्म में अत्यंत पूजनीय माना जाता है। इसे केवल एक साधारण पौधा नहीं, बल्कि देवी का स्वरूप माना गया है। तुलसी (Tulsi) को ‘विष्णुप्रिया’ कहा गया है और यह हर घर की आस्था, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा की प्रतीक होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी (Tulsi) का पौधा घर में लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-समृद्धि बनी रहती है। लेकिन अक्सर देखा गया है कि समय के साथ तुलसी के पत्ते सूख जाते हैं या पौधा पूर्ण रूप से सूख जाता है। ऐसे में कई लोग भ्रमित हो जाते हैं कि क्या सूखी तुलसी को फेंकना पाप होगा या इसके लिए कोई विशेष नियम हैं? तो आइए जानें तुलसी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यताएं और सूखी तुलसी से जुड़े नियम (Tulsi Rule), जिनका पालन करने से दोष नहीं लगता, बल्कि जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। तुलसी का धार्मिक महत्व तुलसी (Tulsi) का उल्लेख अनेक पुराणों और धर्मग्रंथों में मिलता है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में तुलसी (Tulsi) की महिमा का विस्तृत वर्णन है। माना जाता है कि तुलसी के पौधे में माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) का वास होता है। इसे घर में लगाना पवित्रता का प्रतीक माना गया है। हर दिन तुलसी की पूजा करना, उसके सामने दीप जलाना और “ॐ तुलस्यै नमः” मंत्र का जाप करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और दरिद्रता दूर होती है। क्या करें सूखी हुई तुलसी के पत्तों या पौधे का? अगर आपके घर में तुलसी (Tulsi) का पौधा बिना मौसम के अचानक सूख जाए, तो इसे नजरअंदाज न करें। यह घर में बढ़ती नकारात्मक ऊर्जा, पारिवारिक कलह या आर्थिक नुकसान का संकेत हो सकता है। हालांकि तुलसी का सूखना स्वाभाविक भी हो सकता है, लेकिन यदि यह अनायास और बिना कारण हो रहा है, तो कुछ विशेष उपायों को अपनाकर आप सकारात्मक ऊर्जा को फिर से आमंत्रित कर सकते हैं। 1. तुलसी की जड़ को प्रवेश द्वार पर टांगेसूखी तुलसी (Tulsi) के पौधे की जड़ को धीरे से निकालकर साफ पानी से धो लें। इसके बाद इसे लाल या पीले रंग के साफ कपड़े में लपेट लें और घर के मुख्य द्वार पर टांग दें। यह उपाय घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है और मां लक्ष्मी की कृपा बनाए रखता है। 2. तुलसी की लकड़ियों से बनाएं दीपकसूखी हुई तुलसी (Tulsi) से सात छोटी-छोटी लकड़ियां एकत्र करें और इन्हें सूत या कलावे से बांध दें। अब इन लकड़ियों को गाय के घी में डुबोकर एक दीपक में रखें और भगवान विष्णु के सामने जलाएं। यह उपाय विशेष रूप से एकादशी या त्रयोदशी तिथि पर करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इससे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में शांति बनी रहती है। 3. गंगाजल से करें शुद्धिकरणतुलसी (Tulsi) की इन्हीं सात लकड़ियों को साप्ताहिक रूप से गंगाजल में भिगो दें। इसके बाद उसी गंगाजल से पूरे घर में हल्का छिड़काव करें। यह विधि घर से नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने में सहायक होती है और वातावरण को पवित्र बनाती है। 4. तुलसी की लकड़ी पर्स या तिजोरी में रखेंतुलसी की सात लकड़ियों को पूजन कर एक लाल कपड़े या पीले धागे में बांध लें। अब इसे अपने पर्स, तिजोरी या धन रखने के स्थान में रखें। यह उपाय धन की स्थिरता बनाए रखने में सहायक माना गया है और इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां 5. तुलसी की जड़ से करें ग्रह दोष निवारणयदि आपकी कुंडली में ग्रह दोष हैं, तो सूखी तुलसी की थोड़ी सी जड़ लेकर उसे लाल कपड़े में लपेटें और इसे गले या बाजू में धारण करें। यह उपाय नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को कम करता है और कुंडली में संतुलन स्थापित करता है। इन सभी उपायों में आस्था और श्रद्धा अत्यंत आवश्यक है। तुलसी केवल एक पौधा नहीं, बल्कि एक देवी स्वरूप है, जिसकी पूजा से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। इसलिए जब भी तुलसी का पौधा सूख जाए, तो उसे फेंकने के बजाय इन उपायों से उसका सम्मानजनक निस्तारण करें और उसके दिव्य प्रभाव का लाभ उठाएं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Tulsi #Tulsi #VastuTips #PlantCare #HolyBasil #TulsiRemedies #SpiritualBenefits #PositiveEnergy #HinduRituals #GardeningTips

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Kuldevi and Kuldevata

क्या आप जानते हैं आपके कुलदेवी-देवता कौन हैं?

भारतीय संस्कृति में कुलदेवी (Kuldevi) और कुलदेवता का विशेष स्थान है। ये वे दिव्य शक्तियाँ हैं जो पीढ़ियों से किसी कुल या वंश की रक्षा करती आई हैं। हर जाति, समाज या गोत्र की अपनी एक कुलदेवी या कुलदेवता होते हैं, जिन्हें परिवार की परंपराओं के अनुसार पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि कुलदेवी-देवता की कृपा से परिवार में सुख, समृद्धि और उन्नति बनी रहती है, वहीं अगर इनकी उपेक्षा की जाए तो जीवन में बाधाएं, अशांति और कष्ट आ सकते हैं। लेकिन आज के बदलते समय में बहुत से लोग यह नहीं जानते कि उनके कुलदेवी या कुलदेवता (Kuldevta) कौन हैं, या उन्हें कैसे पूजा जाए। कई बार यह जानकारी बुजुर्गों के जाने के साथ ही परिवार में खत्म हो जाती है। आइए जानते हैं कि कैसे आप अपने कुलदेवी-देवता की पहचान कर सकते हैं, और किन बातों का ध्यान रखकर आप उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह लगाएं अपने कुलदेवी-देवता का पतायदि आपको अपने कुलदेवी (Kuldevi) या कुलदेवता (Kuldevta) की जानकारी नहीं है, तो आप अपने गोत्र के माध्यम से इसका पता लगा सकते हैं। हर गोत्र से संबंधित एक विशिष्ट देवी या देवता होते हैं। इसके लिए आप किसी विद्वान ज्योतिषाचार्य या पंडित से मार्गदर्शन ले सकते हैं। इसके अलावा, अपने परिवार के बुजुर्गों से भी इस विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है, क्योंकि वे पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति से परिचित होते हैं। यदि परिवार में कोई बुजुर्ग जीवित नहीं हैं, तो यह जानने का प्रयास करें कि आपके कुल या वंश की मुख्य पूजा कहां और किस स्थान पर होती है। यह जानकारी भी आपको आपके कुलदेवी-देवता की पहचान करने में मदद कर सकती है। कैसे जानें कौन हैं आपके कुलदेवी-देवता? कई परिवारों के पारंपरिक पुरोहित या पंडित होते हैं जो पीढ़ियों से परिवार की पूजा करते आए हैं। वे आपके कुलदेवता या कुलदेवी के बारे में जानकारी दे सकते हैं, साथ ही यह भी बता सकते हैं कि उनकी पूजा कब और कैसे करनी चाहिए। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां कुलदेवी-देवता को नाराज करने वाले कार्य अपने कुलदेवी (Kuldevi) या कुलदेवता की पूजा-अर्चना कभी भी बंद न करें और उन्हें भूलने की भूल न करें। ऐसा करने से उनकी कृपा आपसे दूर हो सकती है, जिससे जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ और परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। पूजा के समय अपने कुलदेवी-देवता का मन ही मन स्मरण अवश्य करें। यदि आपको उनके नाम याद न हों, तो आप उस स्थान का नाम लेकर भी उनकी पूजा कर सकते हैं, जहाँ वे विराजमान हैं। इसके अलावा, यदि आपके कुलदेवी-देवता किसी अन्य स्थान पर स्थित हैं, तो समय-समय पर वहां जाकर उनके दर्शन करना और आशीर्वाद लेना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Kuldevi #Kuldevi #Kuldevata #FamilyDeity #HinduTradition #SpiritualHeritage #AncestralGod

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Goddess Chhinnamasta

Goddess Chhinnamasta: चमत्कारी रूप… अद्भुत अवतार — देवी छिन्नमस्तिका का कैसे हुआ अवतरण?

देवी छिन्नमस्तिका (Goddess Chhinnamasta) हिन्दू धर्म की एक अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली देवी हैं, जिन्हें छिन्नमस्ता, छिन्नमूर्ति और छिन्नमालिनी के नाम से भी जाना जाता है। वे शक्ति की प्रकटीकरण हैं और उनके रूप में दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। उनकी भव्य और रहस्यमय छवि अनेक लोगों को आकर्षित करती है। आज हम जानेंगे कि कैसे हुआ देवी छिन्नमस्तिका का अवतरण और उनकी पूजा का महत्व क्या है। छिन्नमस्तिका पूजा का महत्व देवी छिन्नमस्तिका (Goddess Chhinnamasta) की पूजा विशेष रूप से तंत्र साधना में महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनकी आराधना से भक्तों को भय, रोग, शत्रुता, मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, छिन्नमस्तिका देवी अपने भक्तों को आत्मविश्वास, साहस, और जीवन की अनिश्चितताओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करती हैं। उनकी पूजा में मंत्र जाप, हवन और यंत्र स्थापना की जाती है। विशेषकर नवमी या चतुर्दशी तिथि को उनकी आराधना की जाती है, जिसे उनके अनुयायी बड़ी श्रद्धा और विधिपूर्वक करते हैं। शिव जी से जुड़ा संबंध:  कई स्थानों पर यह माना जाता है कि माता छिन्नमस्तिका देवी काली का ही एक रूप हैं। अन्य प्रसिद्ध कथाओं के अनुसार, एक बार संसार में भारी संकट और अराजकता फैल गई थी। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने देवी पार्वती की तपस्या की। तब माता ने भक्तों के दुःख दूर करने हेतु छिन्नमस्ता का रूप धारण किया और विश्व में पुनः शांति स्थापित की।हालांकि, मां का यह स्वरूप अत्यंत प्रचंड था, जिससे पृथ्वी पर विनाश फैल गया। इस स्थिति में सभी देवताओं ने एकजुट होकर भगवान शिव (Lord Shiva) से सहायता मांगी। उनकी प्रार्थना सुनकर भोलेनाथ मां छिन्नमस्ता के पास पहुँचे। स्वयं को इस प्रकार किया संतुष्ट:जब भगवान शिव (Lord Shiva) माता छिन्नमस्ता के पास पहुँचे, तब देवी ने उनसे कहा, “हे स्वामी, मुझे अत्यंत भूख लगी है, मैं अपनी इस भूख को कैसे शांत करूं?” इस पर शिवजी (Lord Shiva) ने उत्तर दिया, “आप ही समस्त ब्रह्मांड की धारक हैं, फिर आपको किसी और की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए?”यह सुनकर देवी छिन्नमस्ता ने तुरंत अपने खड्ग से अपनी गर्दन काट ली और अपना सिर अपने बाएं हाथ में धारण कर लिया।देवी के कटे हुए गले से तीन रक्त धाराएं निकलने लगीं — एक धारा को उन्होंने स्वयं ग्रहण किया, जबकि शेष दो धाराओं के माध्यम से उन्होंने अपनी दोनों सहचरी देवियों को संतुष्ट किया। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां देवी छिन्नमस्ता की पूजा क्यों मानी जाती है चुनौतीपूर्ण? देवी छिन्नमस्ता (Goddess Chhinnamasta) को एक अत्यंत तीव्र, भयावह और उग्र रूप में जाना जाता है। वे तंत्र साधना की महत्वपूर्ण देवी हैं और उनकी आराधना जैन व बौद्ध परंपराओं में भी की जाती है। बौद्ध धर्म में उन्हें “छिन्नमुण्डा वज्रवराही” के रूप में पूजा जाता है।छिन्नमस्ता देवी मृत्यु की प्रतीक मानी जाती हैं और वे योगशक्ति, कामनाओं पर नियंत्रण और यौन वासनाओं के दमन का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी का रूप अत्यंत विचित्र है — वे स्वयं अपने खड्ग से अपना सिर काटकर उसे हाथ में धारण करती हैं और अपनी गर्दन से निकलती रक्त की धाराओं में से एक को स्वयं पीती हैं।उनका यह स्वरूप भयावह और उग्र माना जाता है। इसी कारण आम घरों में या पारंपरिक मंदिरों में उनकी पूजा नहीं की जाती। उनकी आराधना केवल विशेष तांत्रिक मंदिरों या साधना स्थलों पर की जाती है, जहां विशेष विधियों और सावधानियों के साथ पूजा सम्पन्न की जाती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Goddess Chhinnamasta #goddesschhinnamasta #hindugoddesse #mahavidya #spiritualawakening #shaktipath #chhinnamastika #fiercegoddess #tantricsymbolism

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Kanwar Yatra start date

कांवड़ यात्रा 2025: 11 जुलाई से शुरू होगी भोलेनाथ की भक्ति यात्रा

हर वर्ष की तरह इस बार भी सावन मास में भगवान शिव के भक्तों की आस्था का महापर्व ‘कांवड़ यात्रा’ 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से आरंभ होगी। यह यात्रा श्रावण मास के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होती है और शिवरात्रि तक चलती है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु गंगा जल लेकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। सावन मास की तिथियां और शिवरात्रि पंचांग के अनुसार, 2025 में श्रावण मास की शुरुआत 11 जुलाई से होगी। इस महीने के प्रत्येक सोमवार को ‘सावन सोमवार’ का व्रत रखा जाता है, जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस वर्ष की श्रावण शिवरात्रि 15 जुलाई को मनाई जाएगी। सावन 2025 की शुरुआत और समाप्ति तिथिवैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 11 जुलाई को रात 2 बजकर 6 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि 12 जुलाई की रात 2 बजकर 8 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए, सावन मास की शुरुआत 11 जुलाई से मानी जाएगी, जबकि यह माह 9 अगस्त को समाप्त होगा। कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) का संबंध समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव (Lord Shiva) ने ग्रहण किया, तब उनके गले में जलन हुई। इस जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने गंगा जल से उनका अभिषेक किया। तब से यह परंपरा चली आ रही है कि श्रावण मास में भक्त गंगा जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। कांवड़ यात्रा क्यों होती है कठिन?कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) को बेहद कठिन माना जाता है क्योंकि श्रद्धालुओं को सिर या कंधे पर भारी कांवड़, जिसमें गंगा जल भरा होता है, लेकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इस यात्रा की शारीरिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, यात्रा से पहले अच्छे स्वास्थ्य का होना आवश्यक है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सहायता के लिए कई कांवड़ यात्रा शिविर लगाए जाते हैं, जिन्हें सरकार, धार्मिक और सामाजिक संगठनों द्वारा संचालित किया जाता है। उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रियों पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा भी की जाती है, जिससे उनकी हौसला-अफजाई होती है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां जानिए कांवड़ यात्रा की शुरुआत कहाँ से होती हैकांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) की शुरुआत आमतौर पर हरिद्वार या गंगा नदी से जल भरने के बाद होती है। कांवड़िए गंगा नदी से पवित्र जल लेकर भगवान शिव (Lord Shiva) के मंदिर की ओर निकलते हैं। कई कांवड़िए इस दौरान पैदल सैकड़ों किलोमीटर की लंबी यात्रा करते हैं। कांवड़ यात्रा के कई मार्ग होते हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध रास्ता हरिद्वार से देवघर तक जाता है। यात्रा इन मार्गों से होकर गुजरेगीकांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) के रास्ते में हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश, हाथरस, बुलंदशहर, दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, प्रयागराज, वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर कांवड़ यात्रा शिविर लगाए जाते हैं। पूरे सावन माह के दौरान कांवड़ यात्री “बम-बम भोले” और “जय शिव” के जयकारे लगाते हुए यात्रा करते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता, सद्भाव और भाईचारे का भी प्रतीक है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Kanwar Yatra #KanwarYatra2025 #BholeBaba #Sawan2025 #ShivBhakti #BolBam2025 #ShivYatra #HarHarMahadev

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