Anjali Choudhary

Nirjala Ekadashi

निर्जला एकादशी 2025: सबसे कठिन व्रत, जो देता है साल भर की एकादशियों का पुण्य

हिंदू पंचांग के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत (Nirjala Ekadashi) को सभी एकादशियों में सबसे अधिक फलदायक और कठोर तपस्वी व्रत माना गया है। यह व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन व्रती बिना जल और अन्न के उपवास करता है, इसलिए इसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। निर्जला एकादशी 2025 में कब है? हिंदू धर्म में मान्यता के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 6 जून 2025 को रात 2 बजकर 15 मिनट पर होगी और यह तिथि 7 जून को सुबह 4 बजकर 47 मिनट तक रहेगी। पंचांग पर आधारित गणना के अनुसार उदया तिथि को ही प्रधानता दी जाती है, इसलिए इस बार निर्जला एकादशी का पावन व्रत शुक्रवार, 6 जून 2025 को रखा जाएगा। क्या है निर्जला एकादशी व्रत? निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) व्रत का मुख्य उद्देश्य शरीर और मन की पवित्रता, आत्मिक विकास और भगवान विष्णु की कृपा को प्राप्त करना होता है। यह व्रत खासतौर पर उन श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जो पूरे वर्ष एकादशी का व्रत नहीं रख पाते। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति केवल निर्जला एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से करता है, तो उसे वर्ष भर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को इस व्रत के महत्व को बताते हुए कहा था कि यह व्रत मनुष्य के सभी पापों को नष्ट करता है और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। निर्जला एकादशी व्रत के नियम  इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां निर्जला एकादशी के लाभ  निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) का व्रत अत्यंत पुण्यफलदायक माना जाता है और यह सभी एकादशियों में श्रेष्ठ स्थान रखता है। इसे भी भीमसेनी एकादशी के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों में से भीम ने केवल इसी एकादशी का कठोर व्रत रखकर सभी एकादशियों का पुण्य अर्जित किया था। ऐसा कहा जाता है कि यदि यह व्रत पूरी निष्ठा और आस्था के साथ किया जाए, तो भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है तथा आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Nirjala Ekadashi #NirjalaEkadashi2025 #EkadashiFast #HinduFasting #SpiritualBenefits #BhimseniEkadashi #HinduFestival2025 #EkadashiVrat

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Jagannath temple celebration

जगन्नाथ रथ यात्रा 2025: आस्था और भक्ति की भव्य यात्रा

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) इस वर्ष 27 जून 2025, शुक्रवार को आयोजित की जाएगी। यह यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि से प्रारंभ होती है और इसे ‘घोषा यात्रा’ या ‘श्री गुंडिचा यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 (Jagannath Rath Yatra 2025) की तिथि और प्रमुख अनुष्ठान  धार्मिक महत्व मान्यताओं के अनुसार, जो श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) के रथ को खींचते हैं, उसे देखते हैं या केवल स्पर्श भी करते हैं, उन्हें अत्यंत पुण्य की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि इस रथ यात्रा (Rath Yatra) के दर्शन मात्र से व्यक्ति के कई जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं। यह रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और भव्यता का अनुपम संगम है। यह यात्रा यह संदेश देती है कि जब मन निष्कलंक और प्रेम से परिपूर्ण होता है, तो स्वयं भगवान भी भक्तों के बीच आते हैं। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां मौसी के घर होती है विशेष सेवा  मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath), उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से पहले कुछ समय के लिए अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। जब वे स्वस्थ होकर विश्रामगृह से बाहर आते हैं, तब इस आनंद के अवसर पर रथ यात्रा (Rath Yatra) का आयोजन होता है।इस दौरान तीनों भगवान विशाल रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाते हैं, जहां उनका विशेष सत्कार होता है और वे सात दिनों तक वहां ठहरते हैं। इसके बाद वे पुनः अपने मूल स्थान श्रीजगन्नाथ मंदिर लौटते हैं। विशेष रथों में विराजते हैं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए विशेष रथ बनाए जाते हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा (Lord Jagannath) में तीन अलग-अलग रथ होते हैं, जिन पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा विराजमान होते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ, जिसे नंदीघोष कहा जाता है, लाल और पीले रंगों से सजाया जाता है और इसकी ऊंचाई लगभग 45.5 फीट होती है। इस रथ का निर्माण केवल नीम की लकड़ी से किया जाता है और इसमें कील या किसी भी प्रकार के धातु का इस्तेमाल नहीं होता। इसकी तैयारी अक्षय तृतीया से शुरू हो जाती है। इस रथ में कुल 16 पहिए होते हैं और यह बलभद्र तथा सुभद्रा के रथों की तुलना में थोड़ा बड़ा होता है।  सुरक्षा और प्रशासनिक तैयारियाँ श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने इस वर्ष के रथ यात्रा के लिए विशेष तैयारियाँ की हैं। पिछले वर्ष ‘पाहंडी’ अनुष्ठान के दौरान हुई दुर्घटना को ध्यान में रखते हुए, इस बार प्रत्येक रथ के लिए अलग-अलग ‘पाहंडी’ टीमों का गठन किया गया है। इसके अलावा, भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष उपाय किए गए हैं, और रथों पर मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध जारी रहेगा। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Lord Jagannath #JagannathRathYatra2025 #RathYatra #LordJagannath #PuriFestival #HinduFestivals #OdishaCulture #ChariotFestival

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Baba Khatu Shyam

कब जरुरी है बाबा खाटू श्याम के दरबार में हाजिरी लगाना

भारत के आध्यात्मिक और धार्मिक मान्यताओं में बाबा खाटू श्याम (Baba Khatu Shyam) का नाम विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है। राजस्थान के खाटू गांव में स्थित बाबा के मंदिर में लाखों श्रद्धालु हर वर्ष आते हैं, अपनी मनोकामनाएं पूरी करने और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए। बाबा खाटू श्याम को भगवान कृष्ण (Lord Krishna) का अवतार माना जाता है, जो संकट में अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनका जीवन सुखमय बनाते हैं। बाबा खाटू श्याम का महत्व और इतिहास बाबा खाटू श्याम जी (Baba Khatu Shyam) का असली नाम बरद्वाज ऋषि का पुत्र बारद्वाज था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने महाभारत युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के लिए युद्ध किया था। भगवान कृष्ण ने उनकी वीरता और भक्ति को देखते हुए अपने रूप में उनके नाम से खाटू श्याम जी का पूजन करने का आदेश दिया। इसीलिए उनके भक्त उन्हें “श्री खाटू श्याम” के नाम से पुकारते हैं। कब लगानी चाहिए बाबा के दरबार में हाजिरी? धार्मिक मान्यता है कि जीवन में जब भी संकट, परेशानी या कठिनाइयों का सामना हो, तब बाबा खाटू श्याम (Baba Khatu Shyam) के दरबार में हाजिरी लगाना शुभ और फलदायक होता है। लेकिन इसके साथ ही कुछ संकेत भी होते हैं, जिनके मिलने पर बाबा के दरबार में विशेष भक्ति और आराधना करनी चाहिए। आइए जानते हैं उन प्रमुख संकेतों के बारे में: 1. सपनों में बाबा का दर्शन यदि आपको सपने में बाबा खाटू श्याम का दर्शन होता है, तो इसे एक विशेष संकेत माना जाता है कि बाबा आपको अपनी ओर बुला रहे हैं। ऐसे अवसर पर आपको बाबा खाटू श्याम (Baba Khatu Shyam) के दर्शन अवश्य करने चाहिए और उनकी भव्य पूजा-अर्चना करनी चाहिए। धार्मिक विश्वास के अनुसार, बाबा खाटू श्याम की उपासना से साधक के जीवन में सकारात्मक बदलाव और शुभ फल प्राप्त होते हैं, साथ ही उनकी असीम कृपा सदैव बनी रहती है। 2. खाटू श्याम बाबा की कृपा से बदली जीवन की दिशा? जीवन में कई ऐसी घटनाएं होती हैं जो हमारे मार्ग को बदल सकती हैं। यदि आपके जीवन में खाटू श्याम बाबा (Baba Khatu Shyam) की वजह से कोई सकारात्मक बदलाव आया है, तो इसे बाबा की ओर से बुलावे का संकेत समझना चाहिए। ऐसे समय में आपको अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अवश्य खाटू श्याम मंदिर जाकर उनके दर्शन करने चाहिए। 3. खाटू श्याम मंदिर की समूह यात्रा के लिए आपको कोई संकेत या संदेश प्राप्त हुआ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान अपने भक्तों तक विभिन्न माध्यमों से संकेत पहुँचाते हैं। यदि आपको खाटू श्याम मंदिर (Baba Khatu Shyam) की किसी सामूहिक यात्रा के बारे में कोई संदेश या सूचना प्राप्त होती है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह समझना चाहिए कि यह बाबा खाटू श्याम की ओर से आपको उनके मंदिर में आने का आमंत्रण है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां 4. बार-बार सुनाई दे रहा है खाटू श्याम बाबा का नाम अगर आप लगातार किसी न किसी रूप में खाटू श्याम बाबा का नाम सुनते रहते हैं, तो इसे एक संकेत माना जाता है कि बाबा आपको अपने पास बुला रहे हैं। ऐसे में आपको खाटू श्याम बाबा (Baba Khatu Shyam) से दर्शन करने के लिए खाटू धाम अवश्य जाना चाहिए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Baba Khatu Shyam #BabaKhatuShyam #Krishna #LordKrishna #ShyamBhakti

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Dos and Don’ts of Shaligram Puja

शालिग्राम पूजा के नियम: भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए जानें क्या करें और क्या न करें

हिंदू धर्म में शालिग्राम शिला को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। शालिग्राम की पूजा से घर में सुख-शांति, धन-समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है। यह शिला मुख्यतः नेपाल के गंडकी नदी से प्राप्त होती है और इसे अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना जाता है। खासतौर पर वैष्णव संप्रदाय में शालिग्राम की उपासना अत्यधिक महत्व रखती है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जिस घर में शालिग्राम की विधिवत पूजा की जाती है, वहां दुर्भाग्य, रोग और कलह प्रवेश नहीं करते। हालांकि, शालिग्राम जी की पूजा करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है, अन्यथा पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। पुराणों के अनुसार, शालिग्राम भगवान (Lord Shaligram) के कुल 33 स्वरूपों का वर्णन मिलता है, जिनमें से 24 शालिग्राम श्रीहरि विष्णु के 24 अवतारों के प्रतीक माने जाते हैं। उदाहरण स्वरूप, गोलाकार शालिग्राम को गोपाल स्वरूप का प्रतीक माना जाता है, वहीं मछली की आकृति वाला लंबा शालिग्राम मत्स्य अवतार का संकेत देता है। इसी तरह, कछुए जैसे आकार वाला शालिग्राम भगवान विष्णु के कूर्म या कच्छप अवतार का प्रतीक होता है। ऐसा कहा जाता है कि जहां शालिग्राम जी (Shaligram Ji)की पूजा होती है, वहां स्वयं भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जिस घर में शालिग्राम का वास होता है, वह स्थान तीर्थ के समान पुण्यदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, शालिग्राम को अर्पित पंचामृत को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। शालिग्राम जी की पहचान शालिग्राम (Shaligram) एक काले रंग का गोल या अंडाकार पत्थर होता है, जिसमें प्राकृतिक रूप से चक्र और रेखाएं बनी होती हैं। इसे विशेष रूप से भगवान विष्णु का प्रतीक माना गया है। हर शालिग्राम में अलग-अलग लक्षण होते हैं, जैसे शंखचक्रधारी शालिग्राम, नृसिंह शालिग्राम, लक्ष्मी नारायण शालिग्राम आदि। शालिग्राम पूजन विधि: ध्यान देने योग्य बातें शालिग्राम जी (Shaligram Ji) की पूजा करते समय घर की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जिस स्थान पर शालिग्राम विराजमान हों, उसे एक मंदिर की तरह पवित्र और सजावटी बनाना चाहिए। साथ ही अपने व्यवहार और विचारों को भी सात्विक बनाए रखें। शालिग्राम पूजन में नियमितता बहुत महत्वपूर्ण है। पूजन की प्रक्रिया किसी भी दिन नहीं टूटनी चाहिए — प्रतिदिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करना आवश्यक है। शास्त्रों में शालिग्राम पर कच्चे अक्षत (चावल) चढ़ाने की मनाही है। यदि चावल अर्पित करना चाहें, तो उन्हें पहले हल्दी से पीला रंग देकर ही चढ़ाएं। यह भी माना जाता है कि भगवान शालिग्राम की पूजा तुलसी दल के बिना अधूरी मानी जाती है। तुलसी अर्पित करते ही भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं। पूजा के दौरान शालिग्राम को जल से स्नान कराएं, फिर उन पर चंदन लगाएं और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। अंत में भोग लगाएं और आरती करें। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां इन गलतियों से बचेंशालिग्राम शिला को उपहार स्वरूप लेना वर्जित माना गया है। इसे किसी से भेंट स्वरूप प्राप्त करना अशुभ परिणाम दे सकता है। इसी प्रकार, पूजा के समय शालिग्राम पर कभी भी सफेद अक्षत यानी बिना रंगे चावल अर्पित नहीं करने चाहिए। इन नियमों का पालन करके आप नकारात्मक प्रभावों से बच सकते हैं और पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार, शालिग्राम जी (Shaligram Ji) को गंगाजल अर्पित नहीं करना चाहिए, क्योंकि मान्यता है कि मां गंगा का उद्गम शालिग्राम शिला से हुआ है। इसलिए शालिग्राम पर गंगाजल चढ़ाना वर्जित माना गया है। पूजा करते समय शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराएं, फिर उन पर चंदन का लेप करें और तुलसी दल अर्पित करें। ऐसा करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Shaligram #ShaligramPuja #VishnuWorship #HinduRituals #Spirituality #VishnuBlessings #PujaRules #HinduTraditions #ShaligramDosAndDonts

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Mahabharata war weapons

महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां

महाभारत (Mahabharata) केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास का एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें धर्म, नीति, राजनीति, रणनीति, युद्ध कौशल और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। खास बात यह है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़े गए इस महायुद्ध में केवल तलवारें और धनुष-बाण ही नहीं, बल्कि अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का भी प्रयोग हुआ था, जिनकी शक्ति आज के आधुनिक हथियारों से भी कहीं अधिक थी। आइए जानते हैं उन प्रमुख अस्त्र-शस्त्रों के बारे में, जो महाभारत के युद्ध को निर्णायक बनाने में सहायक बने। 1. ब्रह्मास्त्र ब्रह्मा जी द्वारा प्रदान किया गया यह अस्त्र सबसे शक्तिशाली माना जाता था। इसका प्रयोग अर्जुन, अश्वत्थामा और कर्ण जैसे योद्धाओं के पास था। कहा जाता है कि यह अस्त्र जहाँ गिरता, वहाँ कई मीलों तक जीवन समाप्त हो जाता और भूमि बंजर हो जाती। इस अस्त्र का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में ही किया जाता था क्योंकि इसका प्रभाव अत्यंत विनाशकारी था। 2. पाशुपतास्त्र भगवान शिव द्वारा प्रदान किया गया यह अस्त्र केवल परम भक्तों को ही प्राप्त होता था। अर्जुन को यह अस्त्र भगवान शिव ने खुद एक परीक्षा के बाद दिया था। इसकी विशेषता यह थी कि यह शत्रु का संपूर्ण नाश कर देता था और इसे मन, वाणी, दृष्टि या धनुष से चलाया जा सकता था। 3. नारायणास्त्र नारायणास्त्र एक ऐसा दिव्य शस्त्र था जिससे पूरे ब्रह्मांड में भय व्याप्त हो जाता था। यह भगवान विष्णु का अस्त्र माना जाता है। महाभारत के युद्ध में जब अश्वत्थामा ने इसे पांडवों की सेना पर प्रयोग किया, तो देखते ही देखते हजारों सैनिक मारे गए। इसकी शक्ति इतनी प्रचंड थी कि इसका सामना कोई भी अस्त्र नहीं कर सकता था। इसे शांत करने का केवल एक ही उपाय था—पूरा समर्पण भाव और शांति का मार्ग अपनाना। 4. वरुणास्त्र इसका प्रयोग जल उत्पन्न करने के लिए किया जाता था। यह विरोधी के चारों ओर जल का घेरा बना देता था जिससे उसकी गति बाधित होती थी। युद्ध के दौरान इसे कई बार अग्नि को शांत करने के लिए भी प्रयोग किया गया। 5. सुदर्शन चक्र सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु का प्रमुख प्रतीक माना जाता है और यह श्रीकृष्ण के पास था। महाभारत (Mahabharata) युद्ध में कौरव और पांडव केवल बाहरी पात्र थे, जबकि असल में पापियों को उनके पापों की सजा श्रीकृष्ण अपने सुदर्शन चक्र से देते थे। यह तथ्य बर्बरीक के कटे सिर ने भी सबके सामने रखा था। सुदर्शन चक्र को न्याय और धर्म की अद्भुत शक्ति का प्रतीक माना जाता है। 6. वज्रास्त्र इंद्रदेव का यह अस्त्र भीषण गर्जना और प्रकाश के साथ वार करता था। इसकी टक्कर का कोई अस्त्र नहीं था, और यह भारी विनाश करने की क्षमता रखता था। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा 7. वसावी शक्ति इंद्र देव के पास वसावी शक्ति नामक एक बेहद प्रभावशाली और एकबारगी प्रयोग होने वाला अस्त्र था। यह अस्त्र इंद्र ने कर्ण को दिया था। कर्ण ने इसे अर्जुन को हराने के लिए रखा था, लेकिन परिस्थितियों के कारण उसे इसका इस्तेमाल भीम के पुत्र घटोत्कच पर करना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि यदि यह अमोघ शक्ति अर्जुन पर प्रयोग किया जाता, तो अर्जुन का बचना लगभग असंभव होता। 8. गांडीव धनुष यह अर्जुन का धनुष था जो अग्निदेव ने उन्हें खांडव वन दहन के समय दिया था। इसकी विशेषता यह थी कि इससे निकले प्रत्येक बाण अपने लक्ष्य को भेदते थे। यह धनुष दिव्य था और इससे लगातार बिना थके तीर चलाए जा सकते थे। 9. ब्रह्मास्त्र ब्रह्मास्त्र एक अत्यंत शक्तिशाली दिव्य अस्त्र था, जिसे महाभारत (Mahabharata) के महान योद्धा जैसे अर्जुन, कर्ण और श्रीकृष्ण ने चलाने का ज्ञान प्राप्त था। युद्ध में अश्वत्थामा ने इसका उपयोग किया, जिससे गर्भ में रहे हुए शिशु तक की मृत्यु हो गई। हालांकि, अश्वत्थामा के पास इसे वापस लेने का तरीका नहीं था। शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मास्त्र के प्रभाव को खत्म करने के लिए एक और ब्रह्मास्त्र का प्रहार करना आवश्यक होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Mahabharata #Mahabharata #DivineAstras #IndianMythology #CelestialWeapons #Brahmastra #Pashupatastra #MahabharataWar #EpicBattle

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Copper Ring

तांबे का छल्ला पहनने के चमत्कारी फायदे

तांबा (Copper) एक ऐसा धातु है, जिसका उपयोग हजारों वर्षों से आयुर्वेद और वास्तु शास्त्र में किया जाता रहा है। खासकर तांबे का छल्ला (Copper Ring) या अंगूठी पहनने को शुभ माना जाता है। यह केवल एक आकर्षक आभूषण ही नहीं होता, बल्कि इसे धारण करने से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। आज के समय में भी तांबे के छल्ले  (Copper Ring) का चलन बना हुआ है और लोग इसे पहन कर अपने स्वास्थ्य और जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस करते हैं। तांबे का संबंध किससे है ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तांबा मुख्य रूप से सूर्य ग्रह से जुड़ा हुआ धातु माना जाता है। जब व्यक्ति तांबे का छल्ला (Copper Ring) पहनता है, तो यह उसकी कुंडली में सूर्य की स्थिति को मजबूत करने में सहायक होता है। इसके अलावा, तांबे का संबंध मंगल ग्रह से भी माना गया है। इसलिए यदि कुंडली में मंगल ग्रह कमजोर हो, तो तांबे का छल्ला धारण करना लाभकारी हो सकता है। तांबे का छल्ला पहनने के नियम ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तांबे का छल्ला (Copper Ring) धारण करने के लिए रविवार का दिन अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह दिन सूर्य देव को समर्पित होता है और तांबा भी सूर्य ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। इसे पहनने का सबसे उपयुक्त स्थान अनामिका उंगली (Ring Finger) मानी जाती है, क्योंकि यह उंगली सूर्य से संबंधित मानी जाती है और इसमें तांबे का प्रभाव अधिक सकारात्मक होता है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा तांबे का छल्ला पहनने के फायदे ध्यान देने योग्य बातें नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Copper Ring #CopperRingBenefits #HealthTips #VastuShastra #SpiritualHealing #CopperTherapy #WellnessTips #AncientRemedies #HolisticHealing #EnergyBalance

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Vat Savitri 2025 date and significance

Vat Savitri Vrat 2025: आस्था और अखंड सौभाग्य का पर्व वट सावित्री व्रत

भारतीय संस्कृति में व्रत-त्योहारों का विशेष स्थान है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को सशक्त करते हैं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को भी मजबूती प्रदान करते हैं। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) हिन्दू धर्म में महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे विवाहित स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सफल वैवाहिक जीवन की कामना के लिए करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि 26 मई 2025 को दोपहर 12:11 बजे आरंभ होकर 27 मई की सुबह 8:31 बजे तक रहेगी। तिथि की गणना के आधार पर इस वर्ष वट सावित्री व्रत सोमवार, 26 मई 2025 को रखा जाएगा। यह व्रत पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में भी मिलता है। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) का मुख्य आधार वह पौराणिक कथा है, जिसमें सावित्री ने अपने अद्भुत धैर्य और भक्ति से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे। यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस पावन व्रत को विवाहित महिलाएं (Married women) श्रद्धा पूर्वक करती हैं और बरगद (वट) वृक्ष की पूजा करती हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन (Married Life) में सुख-शांति बनी रहती है और पति-पत्नी के संबंधों में मधुरता तथा मजबूती आती है। वटवृक्ष को त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – का स्वरूप माना गया है।  व्रत की विधि: वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) की पूजा प्रातःकाल से ही प्रारंभ होती है। व्रति महिलाएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं और निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके पश्चात पूजा की थाली में रोली, चावल, मौली, फल, फूल, धूप, दीपक, नई चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी आदि सामग्री रखी जाती है। इसके बाद महिलाएं वटवृक्ष (बरगद के पेड़) के पास जाकर विधिवत पूजा करती हैं। इसके साथ ही महिलाएं वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Story) का श्रवण करती हैं या स्वयं पढ़ती हैं। पूजा के बाद महिलाएं अपने पति का आशीर्वाद लेती हैं और शाम को जल या फलाहार ग्रहण करती हैं। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा व्रत कथा: प्राचीन समय में अश्वपति नामक राजा की पुत्री सावित्री का विवाह वनवासी सत्यवान से हुआ था, जो धर्मात्मा किंतु निर्धन थे। विवाह के पश्चात सावित्री को ज्ञात हुआ कि सत्यवान अल्पायु हैं और एक वर्ष बाद उनका देहांत हो जाएगा। इस बात को जानकर भी उसने अपने धर्म का पालन किया और अंतिम समय में जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तो सावित्री ने अपने विवेक और तपस्या से यमराज को प्रसन्न कर लिया। सावित्री की दृढ़ निष्ठा, धर्मपरायणता और समर्पण से प्रभावित होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और उसे दीर्घायु का आशीर्वाद दिया। तभी से यह व्रत स्त्रियों द्वारा श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Vat Savitri Vrat #VatSavitriVrat2025 #VatSavitriPuja #HinduFestivals #MarriedWomenFast #IndianTraditions #SavitriSatyavan #VatPurnima2025 #PujaVidhi #SpiritualIndia

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Special Worship in Jyeshtha

लड्डू गोपाल की कृपा पाने के लिए ज्येष्ठ माह में करें विशेष पूजा

भारतीय सनातन परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को बाल स्वरूप में पूजने की परंपरा अत्यंत पुरानी है। लड्डू गोपाल, अर्थात भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) का बाल रूप, भक्तों के लिए केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत भावनात्मक संबंध का प्रतीक होते हैं। उनके लिए भोग बनाना, वस्त्र पहनाना, झूला झुलाना और सेवा करना भक्तों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। वर्ष का हर माह लड्डू गोपाल की भक्ति के लिए विशेष होता है, लेकिन ज्येष्ठ मास में उनकी सेवा-पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। कैसे करें लड्डू गोपाल की सेवा–पूजा ज्येष्ठ मास में? ज्येष्ठ माह में प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात सबसे पहले घंटी बजाकर लड्डू गोपाल (Laddu Gopal) को जागृत करें। इसके बाद मंदिर की साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर स्थान को पवित्र बनाएं। फिर लड्डू गोपाल को स्नान कराएं और उन्हें साफ-सुथरे वस्त्र पहनाएं। उनके मस्तक पर चंदन का तिलक लगाएं और सुंदर शृंगार करें। इसके पश्चात दीप प्रज्वलित कर उनकी आरती करें। भोग में फल, मिठाई और माखन-मिश्री अर्पित करें। ध्यान रखें कि भोग में तुलसी के पत्ते अवश्य डालें, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि बिना तुलसी के लड्डू गोपाल भोग स्वीकार नहीं करते। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा ज्येष्ठ मास में विशेष तिथि – निर्जला एकादशी और वट सावित्री व्रत इस माह की निर्जला एकादशी और वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक महत्व होता है। इन अवसरों पर लड्डू गोपाल की विशेष पूजा, व्रत और दान करना अति पुण्यकारी माना गया है। इन तिथियों पर भगवान को तुलसी पत्र, पंचामृत, फल एवं दक्षिणा अर्पित कर व्रत किया जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Lord Krishna #LadduGopal #JyeshthaMonth #KrishnaPuja #SpiritualBenefits #HinduRituals #DivineBlessings #JyeshthaPuja2025 #LadduGopalSeva #BhaktiVibes #LordKrishna

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Chandra Mahadasha

चंद्र महादशा: कैसे प्रभावित करती है आपका जीवन और क्या हैं इससे मुक्ति के उपाय?

ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों की दशाओं का जीवन पर गहरा प्रभाव होता है। इनमें चंद्र की महादशा (Chandra Mahadasha) विशेष मानी जाती है क्योंकि यह व्यक्ति के मन, भावनाओं, स्वास्थ्य और पारिवारिक संबंधों को प्रभावित करती है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा शुभ स्थिति में हो, तो यह दशा अत्यंत लाभकारी होती है, लेकिन यदि अशुभ स्थिति में हो तो मानसिक अशांति, भ्रम, अनिद्रा और भावनात्मक असंतुलन जैसे प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। आइए जानते हैं कि चंद्र की महादशा (Chandra Mahadasha)  कितने वर्षों तक चलती है, इसका जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, और सोम देव को प्रसन्न करने के उपाय क्या हैं। चंद्र महादशा कितने वर्षों तक चलती है? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्रमा की महादशा  (Chandra Mahadasha) लगभग 10 वर्षों तक प्रभावी रहती है। इस अवधि में प्रारंभ में चंद्रमा की ही अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा चलती है। माना जाता है कि चंद्र देव विशेष रूप से वृषभ और कर्क राशि के जातकों के लिए शुभ परिणाम प्रदान करते हैं। यदि कुंडली में चंद्रमा बलवान स्थिति में हो, तो व्यक्ति निर्णय लेने में सक्षम और मानसिक रूप से स्थिर रहता है। यदि चंद्रमा का संयोग शुभ ग्रहों के साथ हो, तो इसका प्रभाव अत्यंत सकारात्मक होता है। हालांकि, जब चंद्रमा की महादशा  (Chandra Mahadasha) में राहु या केतु की अंतर्दशा आती है, तो फल अनुकूल नहीं माने जाते। इसके पश्चात मंगल और राहु की अंतर्दशा व प्रत्यंतर दशा आती है, जबकि केतु की अंतर्दशा करीब 10 महीनों तक रहती है। इसके बाद मंगल और शुक्र की दशाएं आती हैं। चंद्र महादशा  (Chandra Mahadasha) में यदि जातक अच्छे और धार्मिक कर्मों का पालन करे, तो उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है। विशेषकर भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना करने से इस अवधि में सुख, शांति और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा कैसे करें सोम देव (चंद्रमा) को प्रसन्न? ज्योतिषाचार्यों के अनुसार चंद्र देव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। विशेष रूप से सोमवार और शुक्रवार के दिन, प्रातः काल स्नान करने के बाद शिवलिंग पर गाय के कच्चे दूध से अभिषेक करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। चाहें तो इस दूध में थोड़ी मात्रा में गंगाजल मिलाकर भी अभिषेक किया जा सकता है। इसके साथ ही, सफेद वस्त्र, चावल, दूध, दही या चीनी जैसी सफेद वस्तुओं का दान करने से भी चंद्र देव प्रसन्न होते हैं और जीवन में शांति, मानसिक संतुलन एवं सौम्यता का संचार होता है। शिव चालीसा और शिव आरती का पाठ करें चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। अतः शिव की आराधना चंद्र दोष के निवारण में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Chandra Mahadasha #ChandraMahadasha #MoonMahadasha #VedicAstrology #MahadashaEffects #ChandraDashaRemedies #AstrologyTips #PlanetaryPeriods #LifeInMahadasha #JyotishVidya #SpiritualRemedies

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Jyestha Amavasya puja

ज्येष्ठ अमावस्या पर करें पितृ तर्पण और स्तोत्र पाठ, मिलेगा पितृ दोष से छुटकारा

सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व होता है, लेकिन ज्येष्ठ अमावस्या का स्थान पितरों के तर्पण और पितृ दोष (Pitru Dosha) शांति के लिए सर्वोपरि माना जाता है। इस दिन पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करके श्रद्धापूर्वक पितरों को जल तर्पण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन नियमपूर्वक तर्पण करने और पितृ स्तोत्र का जाप करने से पितृ दोष खत्म हो जाता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है। कब है ज्येष्ठ अमावस्या 2025? वर्ष 2025 में ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) का आरंभ 26 मई को दोपहर 12 बजकर 12 मिनट पर होगा और इसका समापन 27 मई को सुबह 8 बजकर 32 मिनट पर होगा। पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि का महत्व उदया तिथि के अनुसार मान्यता प्राप्त है, इसलिए ज्येष्ठ अमावस्या 26 मई को मनाई जाएगी। इस दिन सोमवार होने के कारण इसे सोमवती अमावस्या के रूप में भी मनाया जाएगा, जो धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ मानी जाती है। साथ ही, इसी दिन शनि जयंती और वट सावित्री व्रत भी पड़ रहे हैं, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। चूंकि अमावस्या तिथि का समापन मंगलवार को हो रहा है, अतः 27 मई को भौमवती अमावस्या के रूप में भी इसे देखा जाएगा। ज्येष्ठ अमावस्या पर बन रहे हैं दुर्लभ योग, दांपत्य जीवन के लिए बेहद शुभ ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) के दिन 2025 में कई खास ज्योतिषीय संयोग बन रहे हैं, जो इस दिन को और अधिक शुभ और प्रभावशाली बना देते हैं। इस दिन चंद्रमा वृषभ राशि में स्थित होंगे, जो उनकी उच्च राशि मानी जाती है। साथ ही, चंद्रमा के साथ सूर्य और बुध भी इसी राशि में विराजमान रहेंगे। ग्रहों की यह स्थिति — सूर्य (राजा), चंद्रमा (रानी) और बुध (राजकुमार) — एक ही राशि में होने के कारण यह समय विशेष रूप से वैवाहिक जीवन और दांपत्य संबंधों के लिए अनुकूल माना जा रहा है। इस दिन सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य योग का भी निर्माण होगा, जो ज्ञान, बुद्धि और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि करने वाला योग होता है। इसके अलावा शुक्र भी अपनी उच्च राशि मीन में स्थित रहेंगे, जो प्रेम, सौंदर्य और विलासिता के दृष्टिकोण से शुभ संकेत देता है। चंद्रमा से गुरु द्वितीय भाव में रहेंगे और इस स्थिति में सुनफा योग बन रहा है, जो आर्थिक समृद्धि और आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला माना जाता है। वहीं, एक और विशेष बात यह है कि शनि जयंती के दिन शनि ग्रह 30 वर्षों के बाद फिर से मीन राशि में प्रवेश कर रहे हैं, जो गुरु की राशि है। यह परिवर्तन कर्म, अनुशासन और न्याय की दिशा में एक नई शुरुआत का संकेत देता है। पितृ तर्पण का महत्व ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) को पितरों के पृथ्वी पर आने का विशेष दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन पितृ पूजा और पितृ दोष (Pitru Dosha) निवारण के उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इसी दिन शनि देव की जयंती भी होती है, जो उनके जन्म के अवसर के रूप में मनाई जाती है। इस दिन शनि देव को सरसों का तेल, काले तिल आदि अर्पित करना शुभ माना जाता है। शनि मंत्र का जप करने से भी विशेष फल प्राप्त होते हैं। साथ ही पीपल के पेड़ की जड़ पर जल अर्पित करना और दीपक जलाना भी इस अवसर पर किए जाने वाले महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान हैं। इसे भी पढ़ें:-  कैसे प्रभावित करती है आपका जीवन और क्या हैं इससे मुक्ति के उपाय? तर्पण की विधि ज्येष्ठ अमावस्या (Jyeshtha Amavasya) के दिन पूजा की विशेष विधि अत्यंत फलदायक मानी जाती है। सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए, लेकिन यदि नदी स्नान संभव न हो तो घर पर गंगाजल से स्नान कर सकते हैं। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करना आवश्यक है। पितरों की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करना इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि संभव हो तो तीर्थ स्थान पर स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। इसके बाद पीपल के पेड़ पर जल, अक्षत, सिंदूर आदि चढ़ाकर दीपक जलाना चाहिए और कम से कम सात या ग्यारह बार उसकी परिक्रमा करनी चाहिए। अंत में शनिदेव के मंदिर जाकर उन्हें सरसों का तेल, काले तिल, काले वस्त्र और नीले फूल अर्पित करें। इस तरह किए गए धार्मिक कर्म व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और पुण्य लेकर आते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Jyeshtha Amavasya #JyeshthaAmavasya #PitruTarpan #PitruDoshNivaran #AncestorWorship #AmavasyaRituals #HinduTradition #SpiritualRemedies #PitruStotraPath #HinduFestivals #Amavasya2025

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