Anjali Choudhary

Celebrate Gayatri Jayanti 2025 on June 6

गायत्री जयंती 2025: 6 जून को है देवी गायत्री का प्राकट्य दिवस, जानें तिथि, महत्व और पूजन विधि

गायत्री जयंती, वेदों की जननी देवी गायत्री के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस दिन ऋषि विश्वामित्र ने सर्वप्रथम गायत्री मंत्र का उद्घोष किया था। यह मंत्र आध्यात्मिक जागृति और ज्ञान का प्रतीक है। गायत्री जयंती 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 6 जून को देर रात 2 बजकर 15 मिनट पर आरंभ होगी और 7 जून की सुबह 4 बजकर 47 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में उदया तिथि को प्राथमिकता दी जाती है, इसलिए गायत्री जयंती (Gayatri Jayanti) का पर्व 6 जून को ही मनाया जाएगा। शुभ योग गायत्री जयंती 2025 (Gayatri Jayanti) के अवसर पर वरीयान योग, रवि योग और भद्रावास का शुभ संयोग बन रहा है। भद्रावास का योग दोपहर 3 बजकर 31 मिनट तक रहेगा, इस दौरान भद्रा पाताल लोक में स्थित रहेगी, जिससे शुभ कार्यों में कोई विघ्न नहीं होगा। गायत्री जयंती का धार्मिक महत्व गायत्री माता को वेदों की जननी, ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक प्रकाश की देवी माना जाता है। गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) का जप करने से मानसिक शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन देवी गायत्री की पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि का प्रवाह होता है। जानिए कैसे हुआ इस दिव्य मंत्र का प्राकट्य और क्या है इसके पीछे की मान्यता गायत्री मंत्र (Gayatri Jayanti) की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले इसका बोध स्वयं परमपिता ब्रह्मा को हुआ था। माता गायत्री की कृपा से ब्रह्माजी ने अपने चारों मुखों से इस मंत्र की व्याख्या की। ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म के चारों वेद, जो इसकी मूल आधारशिला माने जाते हैं, इसी मंत्र की विस्तृत व्याख्या हैं। प्रारंभ में गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) केवल देवताओं तक ही सीमित था, लेकिन जैसे भागीरथ ने गंगा को धरती पर लाकर मानवता को पवित्र किया, वैसे ही महान ऋषि विश्वामित्र ने इस दिव्य मंत्र को आम जनमानस तक पहुंचाकर आत्मा की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त किया। यह भी माना जाता है कि मां गायत्री सूर्य मंडल में निवास करती हैं और जिन लोगों की कुंडली में सूर्य से जुड़ी कोई बाधा होती है, वे इस मंत्र का जाप करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा पूजन विधि और मंत्र गायत्री जयंती (Gayatri Jayanti) के दिन पूजा आरंभ करने के लिए सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठें। फिर स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर गंगाजल मिला हुआ जल प्रयोग करें। इसके पश्चात आचमन करके पीले या लाल रंग के वस्त्र धारण करें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें और उसी समय गायत्री मंत्र का जप करें: ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ इसके बाद पंचोपचार विधि से मां गायत्री की श्रद्धापूर्वक पूजा करें। पूजा के दौरान मां को फल, फूल और मिष्ठान अर्पित करें। अंत में गायत्री माता की आरती करके पूजन पूर्ण करें। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Gayatri Jayanti #GayatriJayanti2025 #GoddessGayatri #GayatriMantra #HinduFestivals #VedicTradition #SpiritualIndia #GayatriPuja #June6Festival #DivineMother #PujaVidhi

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Masik Karthigai

मासिक कार्तिगाई 2025: 26 मई को मनाएं यह पावन पर्व, जानें तिथि, महत्व और पूजा विधि

मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह में कृतिका नक्षत्र के दिन मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व विशेष रूप से दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, भगवान शिव (Lord Shiva) और भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की आराधना के लिए प्रसिद्ध है। इस दिन दीप जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक मनाया जाता है। ज्येष्ठ माह में मासिक कार्तिगाई की तिथि वैदिक पंचांग के अनुसार 26 मई को ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि दोपहर 12:11 बजे तक रहेगी, जिसके बाद अमावस्या तिथि प्रारंभ होगी। इसी दिन सुबह 8:23 बजे से कृतिका नक्षत्र का योग भी आरंभ हो जाएगा। चूंकि मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) व्रत कृतिका नक्षत्र के शुभ संयोग में मनाया जाता है, इसलिए इस वर्ष यह पावन पर्व 26 मई को ही विधिपूर्वक मनाया जाएगा। शुभ योग इस बार मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) पर विशेष और दुर्लभ शोभन योग का संयोग बन रहा है। यह शुभ योग सुबह 7 बजकर 2 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इसके अलावा, इसी दिन दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से शिववास योग भी प्रारंभ हो जाएगा। मान्यता है कि शिववास योग के दौरान भगवान शिव )Lord Shiva) कैलाश पर्वत पर माता गौरी (Mata Gauri) के साथ विराजमान रहते हैं। ऐसे में इस योग में शिव की पूजा और आराधना करने से भक्तों को इच्छित फल की प्राप्ति होती है। मासिक कार्तिगाई का धार्मिक महत्व मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि यह दिन भगवान शिव (Lord Shiva) और भगवान मुरुगन (Lord Murugan)  की पूजा के लिए समर्पित होता है। कहा जाता है कि इस दिन दीप जलाने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और अज्ञानता का नाश होता है। यह पर्व आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मासिक कार्तिगाई कथा  पौराणिक मान्यता के अनुसार, मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai) का दिन भगवान मुरुगन (Lord Murugan)  के जन्म से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि भगवान शिव (Lord Shiva) की तीसरी आंख से इसी दिन भगवान मुरुगन का प्राकट्य हुआ था। वे छह विभिन्न रूपों में प्रकट हुए और छह अप्सराओं ने उनका पालन-पोषण किया। बाद में देवी पार्वती ने इन छह स्वरूपों को एकाकार कर एक बालक का रूप प्रदान किया। इसी कारण भगवान मुरुगन को ‘षण्मुख’ या ‘शनमुघम’ कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है—छह मुखों वाले देवता। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा पूजन विधि मासिक कार्तिगाई (Masik Karthigai)  के दिन भगवान शिव और भगवान मुरुगन (Lord Murugan)  की पूजा विधि इस प्रकार है: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर पूजा स्थल पर उत्तर-पूर्व दिशा में भगवान शिव और भगवान मुरुगन की तस्वीर स्थापित करें। भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र और धूप-दीप अर्पित करें। भगवान मुरुगन को विशेष रूप से फूल, फल और पंचामृत चढ़ाएं। इसके पश्चात दोनों देवी-देवताओं के मंत्रों का जाप करें और श्रद्धा से उनकी आरती करें। आरती के बाद प्रसाद सभी में बांटें। इस दिन घर में धूप और कपूर जलाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। साथ ही, दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Masik Karthigai #MasikKarthigai2025 #KarthigaiFestival #TamilFestival #HinduFestivals2025 #KarthigaiDeepam #SpiritualCelebration #TamilTradition #PoojaVidhi #KarthigaiSignificance #26May2025Festival

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Chanakya Niti

Chanakya Niti: इन पांच वर्गों का करें सम्मान, वरना रूठ जाएंगी मां लक्ष्मी

भारतीय इतिहास में चाणक्य एक ऐसा नाम हैं जिन्हें राजनीति, कूटनीति, अर्थशास्त्र और जीवन के व्यवहारिक ज्ञान का सर्वोच्च ज्ञाता माना जाता है। आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति (Chanakya Niti) शास्त्र के माध्यम से जीवन के अनेक पहलुओं को सरल भाषा में समझाया है। उनकी कही गई बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी हजारों वर्ष पहले थीं। चाणक्य नीति में उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि यदि व्यक्ति कुछ खास लोगों के साथ दुर्व्यवहार करता है, तो उसके जीवन से मां लक्ष्मी यानी धन की देवी रूठ सकती हैं। चाणक्य (Chanakya) के अनुसार, जीवन में सफलता, समृद्धि और सुख प्राप्त करने के लिए न केवल मेहनत बल्कि अच्छे आचरण की भी आवश्यकता होती है। यदि व्यक्ति धन अर्जित कर भी ले, लेकिन उसका व्यवहार अनुचित हो, तो वह धन स्थायी नहीं रहता। आइए जानते हैं कि किन लोगों से बुरा व्यवहार करने पर मां लक्ष्मी (Maa Laxmi) का वास हमारे घर में नहीं होता। 1. गुरु और शिक्षकों से दुर्व्यवहार चाणक्य नीति (Chanakya Niti) के अनुसार गुरु, शिक्षक या मार्गदर्शक का स्थान अत्यंत पूजनीय होता है। गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, हमें सही दिशा दिखाते चाणक्य के अनुसार, जो लोग अपने गुरुओं या बुजुर्गों का अनादर करते हैं या उन्हें कष्ट पहुँचाने की कोशिश करते हैं, उनसे मां लक्ष्मी दूर हो जाती हैं। ऐसे लोगों को कठिन परिश्रम के बावजूद धन की प्राप्ति नहीं होती, और यदि धन आता भी है तो वह व्यर्थ कार्यों में खर्च हो जाता है। गुरु का अपमान करना स्वयं ज्ञान और लक्ष्मी दोनों को खो देने के समान होता है। 2. माता-पिता और बुजुर्गों का अनादर माता-पिता और घर के बुजुर्गों को चाणक्य ने ईश्वर तुल्य माना है। जो संतान अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करती, उनका अनादर करती है, उनके साथ दुर्व्यवहार करती है, उनके प्रति कर्तव्यों की अवहेलना करती है, ऐसे व्यक्ति पर देवी लक्ष्मी कभी कृपा नहीं करतीं। मां-बाप का आशीर्वाद ही वास्तविक समृद्धि की कुंजी होती है। 3. गाय और अन्य निरीह प्राणियों को कष्ट देना चाणक्य नीति (Chanakya Niti) में यह भी उल्लेख किया गया है कि जो व्यक्ति गाय, कुत्ते, बिल्ली, पक्षियों जैसे निरीह जीवों को तकलीफ पहुंचाता है, उनके साथ अमानवीय व्यवहार करता है, वह व्यक्ति पाप का भागी बनता है। जो व्यक्ति अपने भीतर करुणा और दया का भाव रखते हैं, उन पर मां लक्ष्मी सदैव मेहरबान रहती हैं। इसीलिए हमें जानवरों के प्रति कभी भी निर्दयता या क्रूरता नहीं दिखानी चाहिए, चाहे वह अनजाने में ही क्यों न हो। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा 4. स्त्रियों का अपमान चाणक्य ने महिलाओं के सम्मान को समाज और परिवार की उन्नति से जोड़ा है। जो व्यक्ति स्त्रियों का अपमान करता है, उन्हें अपशब्द कहता है या उन्हें नीचा दिखाता है, उसका जीवन सदैव कष्टों से भरा होता है। स्त्री केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि संपूर्ण सृजन शक्ति की प्रतिनिधि होती है। उनके अपमान से देवी लक्ष्मी रूठ जाती हैं और दुर्भाग्य घर में प्रवेश कर जाता है। 5. गरीब और असहाय लोगों के साथ दुर्व्यवहार जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या किसी भी कारण से असहाय हैं, उनके साथ सहानुभूति और करुणा से व्यवहार करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति ऐसे लोगों का अपमान करता है, उनका मज़ाक उड़ाता है या उन्हें तिरस्कार की दृष्टि से देखता है, तो मां लक्ष्मी उनसे मुख मोड़ लेती हैं। आचार्य चाणक्य के अनुसार, दान और सेवा धन की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। जो व्यक्ति गरीबों का आदर करते हैं और उनकी सहायता करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी (Maa Laxmi) सदैव कृपा बनाए रखती हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Chanakya Niti #ChanakyaNiti #HinduWisdom #LakshmiBlessings #RespectInLife #AncientIndianTeachings #WealthAttraction #SpiritualSuccess #VedicKnowledge #LifeLessons #IndianCulture

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Krishna Janmashtami 2025

मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2025: 20 मई को लड्डू गोपाल की आराधना का शुभ दिन, जानें व्रत की तिथि, महत्व और पूजा की सही विधि

भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) के भक्तों के लिए मासिक कृष्ण जन्माष्टमी (Masik Krishna Janmashtami) एक अत्यंत शुभ और पावन अवसर होता है। यह तिथि हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है और इसे ‘मासिक कृष्ण जन्माष्टमी’ कहा जाता है। मई माह में आने वाली मासिक जन्माष्टमी विशेष रूप से फलदायी मानी जा रही है, क्योंकि इस दिन योगों का सुंदर संयोग बन रहा है, जो उपासना और व्रत को अत्यधिक प्रभावशाली बनाते हैं। इस दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का व्रत रखते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और रात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं। मान्यता है कि मासिक जन्माष्टमी व्रत रखने से व्यक्ति को श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के समस्त संकटों से मुक्ति मिलती है। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 20 मई को सुबह 5:51 बजे से होगा और यह 21 मई को सुबह 4:55 बजे तक चलेगी। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की पूजा विशेष रूप से रात के निशीथ काल में की जाती है। इसी कारण व्रत और पूजन की सभी विधियां 20 मई को ही सम्पन्न की जाएंगी। पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त रात 11:57 बजे से 12:38 बजे तक का रहेगा, जिसे श्रीकृष्ण के प्राकट्य का सबसे पावन समय माना जाता है। मासिक जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व हालांकि मासिक जन्माष्टमी को वैष्णव या भाद्रपद माह में आने वाली मुख्य जन्माष्टमी की तरह भव्य रूप से नहीं मनाया जाता, फिर भी इसका धार्मिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व होता है। यह तिथि उन भक्तों के लिए विशेष होती है जो हर महीने कृष्ण की विशेष आराधना करना चाहते हैं। श्रीकृष्ण विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं, और मासिक जन्माष्टमी पर उनका व्रत करने से मन को शांति, जीवन में सकारात्मकता और आत्मबल की प्राप्ति होती है। शुभ योग ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इस बार मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जिनमें दुर्लभ इंद्र योग और शिववास योग प्रमुख हैं। ये दोनों योग 20 मई की रात 2:50 बजे तक प्रभावी रहेंगे। ऐसी मान्यता है कि इंद्र योग के दौरान भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की उपासना करने से भक्त को मनचाहा फल प्राप्त होता है और उसके जीवन में शुभ कार्यों में सफलता सुनिश्चित होती है। वहीं शिववास योग में राधा रानी के साथ श्रीकृष्ण की आराधना करने से जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इसके अतिरिक्त, इस दिन धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र का संयोग भी पूजन को और अधिक मंगलकारी बनाता है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा लड्डू गोपाल की पूजा विधि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी (Masik Krishna Janmashtami) के दिन भक्त प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। फिर पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद उन्हें पंचामृत और गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कराया जाता है। स्नान के पश्चात लड्डू गोपाल को नए वस्त्र पहनाकर सुंदर श्रृंगार किया जाता है। उनके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित कर विधिवत पूजन किया जाता है। माखन-मिश्री में तुलसी डालकर भगवान को भोग अर्पित किया जाता है। अंत में मंत्र जाप कर लड्डू गोपाल की आरती की जाती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Masik Krishna Janmashtami #KrishnaJanmashtami2025 #LadduGopalPuja #MasikJanmashtami #KrishnaBhakti #JanmashtamiVrat #20May2025 #PujaVidhi #HinduFestival2025 #SpiritualIndia #VratMahatva

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Sankashti Chaturthi 2025

संकष्टी चतुर्थी 2025: सिद्ध योग, अमृत सिद्धि योग और रवि योग का महासंयोग, गणपति आराधना से होंगे जीवन के संकट दूर

इस बार की संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि इस पावन तिथि पर सिद्ध योग समेत कई शुभ और दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। गणेश उपासकों और श्रद्धालुओं के लिए यह सुनहरा अवसर है, जब वे भगवान श्रीगणेश (Lord Ganesha) की आराधना कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि इन विशेष योगों में की गई पूजा न केवल कष्टों को दूर करती है, बल्कि जीवन में उन्नति, समृद्धि और मानसिक शांति भी प्रदान करती है। एकदंत संकष्टी चतुर्थी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 16 मई 2025 को प्रातः 4:02 बजे होगा और यह तिथि 17 मई को प्रातः 5:13 बजे समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में उदया तिथि को प्रमुखता दी जाती है, इसलिए इस बार एकदंत संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) 16 मई को श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाई जाएगी। संकष्टी चतुर्थी का महत्व संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi) को विघ्नहर्ता और संकटमोचक श्रीगणेश (Lord Ganesha) को समर्पित किया गया है। ‘संकष्टी’ का अर्थ होता है ‘संकटों को हरने वाली’। इस दिन व्रत रखने और श्रीगणेश की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी कष्टों और बाधाओं का नाश होता है। विशेष रूप से इस दिन चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है, और भगवान गणेश से सुख-शांति, समृद्धि और सफलता की कामना की जाती है। इस बार बन रहे शुभ योग शिववास योगइस वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ शिववास योग बन रहा है, जो संपूर्ण रात्रि तक प्रभावी रहेगा। यह योग 17 मई को प्रातः 5:13 बजे तक रहेगा। इस शुभ अवधि में भगवान शिव, कैलाश पर्वत पर माता पार्वती के साथ विराजमान रहेंगे, जिससे यह समय आध्यात्मिक साधना और ईश्वर आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा सिद्ध योगइस चतुर्थी तिथि पर सिद्ध योग का भी संयोग बन रहा है, जो 16 मई को सुबह 7:15 बजे तक प्रभावी रहेगा। सिद्ध योग को सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला योग माना जाता है। इस पावन समय में यदि श्रद्धा से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाए, तो जीवन के शुभ कार्यों में निश्चित ही सफलता प्राप्त होती है। कैसे प्राप्त करें संकष्टी चतुर्थी का पूर्ण लाभ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Sankashti Chaturthi #SankashtiChaturthi2025 #GaneshChaturthi #SankashtiVrat #GanpatiBlessings #RaviYoga #SiddhaYoga #AmritSiddhiYoga #GanpatiPuja #HinduFestivals2025 #RemoveObstacles

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Yamuna Kalindi meaning

क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा

हिंदू धर्म में नदियों को केवल जल की धारा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें देवी के रूप में पूजा जाता है। उन्हीं में से एक हैं देवी यमुना (Devi Yamuna), जिन्हें विशेष रूप से यमराज की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त के रूप में जाना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देवी यमुना को ‘कालिंदी’ क्यों कहा जाता है? यह नाम सिर्फ एक उपनाम नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी है एक अत्यंत रोचक और आध्यात्मिक कथा, जो भगवान श्रीकृष्ण से गहरा संबंध रखती है। ‘कालिंदी’ नाम का अर्थ और प्रतीक ‘कालिंदी’ नाम की उत्पत्ति ‘कलिंद’ पर्वत से मानी जाती है, क्योंकि यमुना नदी का उद्गम स्थल यही पर्वत है। अर्थात जो कलिंद पर्वत से निकलती है, उसे कालिंदी (Kalindi) कहा जाता है। हालांकि इस नाम के पीछे और भी कई पौराणिक मान्यताएं और कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो देवी यमुना के महत्व को और भी गहराई से समझाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी यमुना को भगवान सूर्य की बेटी तथा यमराज की बहन के रूप में जाना जाता है। वे भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं और उन्होंने कई जन्मों तक उन्हें अपने पति के रूप में पाने की तपस्या की। उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे द्वापर युग में जब कृष्ण के रूप में अवतरित होंगे, तब वे उन्हें प्राप्त करेंगी। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब उनके पिता वासुदेव उन्हें मथुरा से गोकुल ले जा रहे थे और रास्ते में यमुना नदी पार करनी थी। उस समय यमुना ने अपने जल को शांत कर श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया और उनका स्वागत किया। यही कारण है कि यमुना नदी को विशेष रूप से श्रीकृष्ण (Lord Krishna) की प्रिय मानी जाती है। ब्रजभूमि में बाल कृष्ण की अनेक लीलाएं यमुना के तट पर ही घटित हुईं। एक अन्य लोककथा के अनुसार, जब भगवान कृष्ण (Lord Krishna) अर्जुन के साथ यमुना तट पर आए, तो उन्होंने वहां एक तपस्या में लीन सुंदर कन्या को देखा। वह कन्या और कोई नहीं बल्कि देवी यमुना ही थीं, जो श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थीं। उनकी अटल भक्ति और प्रेम को देखकर श्रीकृष्ण ने उनसे विवाह किया। इसी कारण यमुना को ‘कालिंदी’ (Devi Yamuna) भी कहा जाता है — ‘काली कमली वाले’ श्रीकृष्ण से जुड़े होने के कारण। ‘कालिंदी’ नाम यमुना का एक विशेष नाम है, जो उनके कृष्ण से दिव्य संबंध को दर्शाता है। यह नाम न सिर्फ उनके रंग या प्रवाह की गहराई को दर्शाता है, बल्कि उस पवित्र प्रेम को भी दर्शाता है जो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति रखा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया तीर्थों और मंदिरों में विशेष पूजन भारत में अनेक ऐसे तीर्थस्थल हैं, जहां देवी यमुना (Devi Yamuna) को कालिंदी (Kalindi) रूप में पूजा जाता है। ब्रज भूमि, विशेषकर वृंदावन और मथुरा में यमुना आरती का विशेष महत्व है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं में यमुना नदी को साक्षी बनाया। कदंब वन, यमुना घाट और कालिंदी कुंज जैसे स्थानों पर आज भी भक्तजन श्रद्धा से पूजन करते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Devi Yamuna #Kalindi #YamunaRiver #LordKrishna #HinduMythology #DivineStory #KrishnaMarriage #KalindiMyth #KrishnaLeela #KalindiYamuna #SpiritualIndia

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Importance of Shani Puja

शनि जयंती 2025: जानिए शनि देव की पूजा का महत्व और इस वर्ष कब मनाई जाएगी शनि जयंती

ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाई जाने वाली शनि जयंती इस बार 27 मई को पड़ रही है। इस दिन विशेष पूजा, व्रत और दान से शनि देव की कृपा प्राप्त की जाती है और जीवन में सुख-शांति आती है। शनि जयंती, भगवान शनि के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है।  शनि जयंती 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वर्ष 2025 में शनि जयंती (Shani Jayanti) का पर्व 27 मई, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 26 मई को दोपहर 12:11 बजे से शुरू होकर 27 मई को सुबह 8:31 बजे तक रहेगी। ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को शनि देव का प्राकट्य दिवस माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनि देव सूर्य भगवान और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। शनि जयंती पर पूजा विधि शनि जयंती के लाभ शनि जयंती (Shani Jayanti) के दिन पूजा-पाठ और दान करने से शनि की अशुभ दृष्टि और दशाओं का प्रभाव काफी हद तक शांत हो जाता है। इस दिन श्रद्धा से की गई उपासना आर्थिक समस्याओं से राहत दिलाने में सहायक होती है और करियर में स्थिरता एवं प्रगति लाने का मार्ग प्रशस्त करती है।शनि देव (Shani Dev) की कृपा से पुराने और लंबे समय से चले आ रहे रोगों से भी छुटकारा मिल सकता है। यह दिन मानसिक शांति प्राप्त करने और आध्यात्मिक रूप से स्वयं को विकसित करने के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। साथ ही, शत्रुओं की बाधा और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा भी प्राप्त होती है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया शनि देव: कर्म और न्याय के देवता नवग्रहों में शनि देव (Shani Dev) को न्याय का प्रतिनिधि और कर्मों के अनुसार फल देने वाला ग्रह माना गया है। वे व्यक्ति के अच्छे या बुरे दोनों ही कर्मों का उचित परिणाम देने के लिए जाने जाते हैं। उनकी दृष्टि को जहां एक ओर कठोर दंड देने वाली कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति धर्म और सद्कर्म के मार्ग पर हो, तो शनि की कृपा से उसे उन्नति और प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो सकती है।शनि  जयंती का ज्योतिषीय महत्व शनि जयंती (Shani Jayanti) को शनि दोष, साढ़ेसाती, ढैया और शनि की अशुभ दृष्टि से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, शनि मंदिरों में दर्शन कर विशेष पूजन करते हैं और तिल, तेल, काले कपड़े, काले चने, लोहे के बर्तन जैसी वस्तुओं का दान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन की पूजा से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और स्थिरता का आगमन होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Shani Jayanti #ShaniJayanti2025 #ShaniDev #ShaniPuja #ShaniJayanti #ShaniWorship #ShaniSignificance #ShaniRemedies #ShaniVrat #ShaniDevPuja #HinduFestivals

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Effects of Ketu Mahadasha

केतु महादशा: सात वर्षों की रहस्यमयी यात्रा

केतु महादशा वैदिक ज्योतिष में एक रहस्यमयी और प्रभावशाली अवधि मानी जाती है, जो व्यक्ति के जीवन में गहरे बदलाव और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। हालांकि, इस महादशा में यदि व्यक्ति सत्कर्म करता है और भगवान शिव की उपासना करता है, तो उसे सकारात्मक फल प्राप्त होते हैं। शिव पूजा से मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल और जीवन में स्थिरता आने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। केतु महादशा की अवधि और महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, केतु की महादशा लगभग सात वर्षों तक प्रभाव डालती है। इस दौरान शुरुआत में केतु की ही अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा होती है। यदि कुंडली में केतु उच्च राशि में स्थित हो, तो व्यक्ति को इस समय सकारात्मक और शुभ फल प्राप्त होते हैं। लेकिन यदि केतु नीच स्थिति में हो, तो यह जातक को मानसिक भ्रम, गलत निर्णय और करियर या व्यापार में असफलता की ओर धकेल सकता है। ऐसे समय में प्रयासों के बावजूद सफलता मिलना कठिन हो जाता है। केतु की महादशा (Ketu Mahadasha) के दौरान सूर्य, चंद्रमा और गुरु की अंतर्दशाएं शुभ फल नहीं देतीं, बल्कि चुनौतियां बढ़ा सकती हैं। इसके बाद क्रम से शुक्र और सूर्य की अंतर्दशा आती है, जिनमें भी सावधानी बरतनी चाहिए। केतु की अपनी अंतर्दशा लगभग पांच महीनों तक चलती है, उसके बाद शुक्र की बारी आती है। केतु की महादशा और गंडमूल नक्षत्र का प्रभाव ज्योतिष के अनुसार, जिन लोगों का जन्म छह विशेष नक्षत्रों में होता है, उन्हें गंडमूल नक्षत्र का जातक माना जाता है। इनमें अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र विशेष रूप से केतु के प्रभाव वाले माने गए हैं। माना जाता है कि ये नक्षत्र जातक के लिए नहीं, बल्कि उसके माता-पिता के लिए कठिनाइयां ला सकते हैं। इसलिए ज्योतिषाचार्यों की सलाह होती है कि ऐसे बच्चों के जन्म के 27 दिनों के भीतर गंडमूल नक्षत्र शांति पूजा अवश्य करानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में केतु लग्न में स्थित हो, तो उसका स्वभाव आमतौर पर चिड़चिड़ा और उग्र हो सकता है। वहीं, यदि केतु के स्वामित्व वाले नक्षत्र में कई अन्य ग्रह भी मौजूद हों, तो ऐसा जातक अत्यधिक महत्वाकांक्षी और लक्ष्य को लेकर जुनूनी स्वभाव का हो सकता है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया केतु की महादशा में राहत पाने के उपाय नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Ketu Mahadasha #KetuMahadasha #VedicAstrology #PlanetKetu #MahadashaEffects #SpiritualJourney #KarmicCycle #KetuTransit #MysticAstrology #KetuRemedies #AstrologyInsights

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Bada Mangal

बड़ा मंगल 2025: हनुमान जी की कृपा पाने के लिए इस दिन जरूर लाएं ये शुभ वस्तुएं

लखनऊ सहित उत्तर भारत में बड़े मंगल का पर्व हनुमान जी (Hanuman Ji) की कृपा प्राप्ति का विशेष अवसर माना जाता है। इस दिन बजरंगबली की पूजा और व्रत करने से संकट कटते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। आइए जानें, बड़े मंगल 2025 की तिथि, महत्व और इस दिन क्या विशेष चीजें घर लाना शुभ होता है। कब है बड़ा मंगल 2025? हिंदू पंचांग के अनुसार, बड़ा मंगल (Bada Mangal) ज्येष्ठ माह के हर मंगलवार को मनाया जाता है। साल 2025 में ज्येष्ठ माह की शुरुआत 13 मई से हो रही है। ऐसे में बड़ा मंगल की पहली तिथि 13 मई 2025 को पड़ेगी।  पहला बड़ा मंगल: 13 मई 2025दूसरा बड़ा मंगल: 20 मई 2025तीसरा बड़ा मंगल: 27 मई 2025चौथा बड़ा मंगल: 3 जून 2025पांचवां बड़ा मंगल: 10 जून 2025 लखनऊ और उत्तर भारत में इस पर्व को बड़े श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। इस दिन हनुमान मंदिरों में विशेष पूजन और भंडारों का आयोजन किया जाता है। बड़ा मंगल का महत्व बड़े मंगल (Bada Mangal) का दिन हनुमान जी को समर्पित होता है। माना जाता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से जीवन में हर प्रकार की बाधाएं समाप्त होती हैं और संकटों से रक्षा होती है। विशेषकर उत्तर भारत में यह पर्व बेहद लोकप्रिय है और लाखों श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। ऐसा विश्वास है कि बड़े मंगल पर हनुमान जी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और भक्तों के कष्टों का निवारण होता है। बड़ा मंगल पर घर में लाएं ये चीजें हनुमान जी (Hanuman Ji) के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए सिंदूर अर्पित करना हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इसलिए, बड़े मंगल या बुढ़वा मंगल के दिन आप घर में नारंगी रंग का सिंदूर ला सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बजरंगबली को बूंदी और बेसन के लड्डू अत्यधिक प्रिय होते हैं। इस कारण, बड़े मंगल की पूजा के समय आप इन स्वादिष्ट पकवानों को हनुमान जी को भोग के रूप में अर्पित कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया बड़ा मंगल पर हनुमान जी की पूजा कैसे करें? बड़ा मंगल (Bada Mangal) के दिन हनुमान जी (Hanuman Ji)  को प्रसन्न करने के लिए प्रात: काल स्नान करके लाल रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें और मंदिर में या घर पर पूजा का आयोजन करें। सबसे पहले एक स्वच्छ स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। फिर उन्हें फूल, सिंदूर, चोला और चमेली का तेल अर्पित करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें और “ॐ हं हनुमते नमः” मंत्र का 108 बार जप करें। भोग में गुड़-चना या बूंदी का प्रसाद चढ़ाएं और अंत में भक्तिपूर्वक आरती करें। आरती के बाद प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Bada Mangal #BadaMangal2025 #HanumanJayanti #HanumanBlessings #BadaMangalPuja #AuspiciousItems #TuesdayPuja #HanumanDevotion #BadaMangalRituals #PujaEssentials #SpiritualOfferings

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Adi Shankaracharya

Adi Shankaracharya: सनातन धर्म के पुनरुत्थान के प्रतीक हैं ‘आदि शंकराचार्य’

वैशाख शुक्ल पंचमी (Vaishakh Shukla Panchami) तिथि को आदि शंकराचार्य की जयंती मनाई जाती है। यह दिन भारतीय आध्यात्मिक विरासत के सबसे महान विचारकों और संतों में से एक, आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) को समर्पित होता है।  उनका जन्म लगभग 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी नामक गांव में हुआ था। उन्होंने मात्र 32 वर्ष की आयु में भारत में धर्म, दर्शन और संस्कृति की ऐसी नींव रखी, जो आज भी अडिग है। आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) का जीवन अत्यंत तपस्वी और विचारशील रहा। वे एक अद्वैतवादी (Advait Vedanta) संत थे, जिन्होंने यह प्रतिपादित किया कि “अहम् ब्रह्मास्मि” अर्थात आत्मा और परमात्मा अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं। उनके विचारों ने उस समय समाज में फैली धार्मिक कुरीतियों और अंधविश्वास को चुनौती दी और सनातन धर्म की आत्मा को फिर से जीवित किया। धर्म की रक्षा हेतु लिए गए साहसी निर्णय शंकराचार्य ने मात्र आठ वर्ष की अवस्था में संन्यास धारण किया और भारत की धार्मिक एकता के लिए चारों दिशाओं में यात्रा की। उन्होंने उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारका में चार मठों की स्थापना की। इन चार मठों के माध्यम से उन्होंने भारत के कोने-कोने में वेदांत दर्शन का प्रचार-प्रसार किया। उनका उद्देश्य केवल धार्मिक उपदेश देना नहीं था, बल्कि उन्होंने बौद्ध धर्म के अंधानुकरण और ब्राह्मणवाद के अतिवाद के बीच एक संतुलन प्रस्तुत किया। उन्होंने कर्मकांड की जटिलता के बजाय आस्था, आत्मज्ञान और सरल भक्ति को महत्व दिया। आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने धार्मिक ग्रंथों को सरल बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों, और वेदों पर भाष्य लिखे, जिससे इन जटिल ग्रंथों का अध्ययन सरल हो गया। उनके लिखे गए भाष्यों ने धर्म और ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने में मदद की। इसके अलावा, शंकराचार्य ने दशनामी संन्यासी अखाड़ों की स्थापना भी की थी। इसके साथ ही माना जाता है कि कुंभ मेले जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों की शुरुआत में भी उनका अहम योगदान था। केवल 32 वर्षों में किए असाधारण कार्य इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं जब किसी संत ने इतनी अल्पायु में इतना विशाल कार्य किया हो। मात्र 32 वर्षों के जीवनकाल में शंकराचार्य ने 72 से अधिक धार्मिक ग्रंथों की रचना की। इनमें ब्रह्मसूत्र भाष्य, भगवद्गीता पर टीका और उपनिषदों की व्याख्या प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने समाज में फैले धार्मिक भ्रमों को दूर करने के लिए जनसंवाद और शास्त्रार्थ की परंपरा को अपनाया। काशी, प्रयाग, मथुरा और अन्य तीर्थस्थलों पर उन्होंने विभिन्न मतों से शास्त्रार्थ किया और अद्वैत वेदांत को प्रतिष्ठित किया। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया आदि शंकराचार्य जन्म कथा कई वर्षों तक संतान न होने के कारण एक ब्राह्मण दंपति ने भगवान शंकर की आराधना की। उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ब्राह्मण दंपति ने भगवान शिव (Vaishakh Shukla Panchami) से ऐसी संतान की कामना की जो दीर्घायु हो और उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैले। भगवान शिव (Lord Shiva)  ने उन्हें बताया कि वे या तो दीर्घायु संतान प्राप्त कर सकते हैं, जो सर्वज्ञ नहीं होगी, या फिर सर्वज्ञ संतान, जो दीर्घायु नहीं होगी। दंपति ने दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ संतान का वरदान मांगा। भगवान शिव (Lord Shiva) ने उनके वरदान के अनुसार संतान रूप में जन्म लिया। दंपति ने अपने पुत्र का नाम शंकर रखा। शंकराचार्य बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। जब वह तीन साल के थे, उनके पिता का निधन हो गया, लेकिन इस छोटी सी उम्र में ही उन्होंने मलयालम भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया। आठ साल की उम्र में वे वेदों के ज्ञाता बन गए और 12 साल की उम्र में शास्त्रों का अध्ययन पूरा किया। 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने 100 से अधिक ग्रंथों की रचना की। इसके बाद, माता की आज्ञा से उन्होंने वैराग्य धारण किया और सन्यास जीवन को स्वीकार किया। केवल 32 साल की उम्र में उनका निधन हुआ, और वे धर्म की रक्षा के लिए किए गए अपने कार्यों के लिए हमेशा याद किए जाते हैं। Latest News in Hindi Today Hindi News Vaishakh Shukla Panchami #AdiShankaracharya #SanatanDharma #Vedanta #Advaita #Jagadguru #Hinduism #SpiritualReformer #Shankaracharya #VedicWisdom #HinduPhilosophy

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