Anjali Choudhary

Chhinnamasta Jayanti 2025

छिन्नमस्ता जयंती 2025: आत्मबलिदान और शक्ति की आराधना का पर्व

हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष स्थान है। ये दस रूप आदिशक्ति देवी के अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमयी स्वरूप हैं, जिनकी साधना तंत्र और अध्यात्म दोनों में की जाती है। इन्हीं दस महाविद्याओं में एक अत्यंत चमत्कारी और अद्भुत स्वरूप है — देवी छिन्नमस्ता। उनका नाम सुनते ही मन में एक रहस्यमयी छवि उभरती है, क्योंकि देवी छिन्नमस्ता (Devi Chinnamasta) का स्वरूप अन्य देवी रूपों से बिल्कुल अलग और शक्तिशाली है। वह स्वयं अपना सिर काटकर उसे हाथ में पकड़े रहती हैं, और उनके कंठ से तीन धाराओं में रक्त प्रवाहित होता है। यही कारण है कि उनकी उपासना को अत्यंत गूढ़ और सिद्धिदायक माना गया है। छिन्नमस्ता जयंती 2025 में कब है? पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को यानी 10 मई शाम 5 बजकर 29 मिनट पर शुरू होगी और 11 मई को शाम 8:01 बजे समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में तिथि की गणना सूर्योदय के आधार पर की जाती है, इसलिए छिन्नमस्ता जयंती (Chinnamasta Jayanti) 11 मई 2025 को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु देवी छिन्नमस्ता की पूजा-अर्चना और भक्ति भाव से साधना करेंगे। छिन्नमस्ता जयंती के शुभ योग (Chinnamasta Jayanti Shubh Yoga) वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर इस वर्ष रवियोग और भद्रावास सहित कई शुभ और फलदायी योग बन रहे हैं। इन विशेष योगों में मां छिन्नमस्ता की आराधना करने से साधकों की सभी इच्छाएं पूर्ण होने की संभावना रहती है। साथ ही, वे शारीरिक और मानसिक कष्टों से भी मुक्ति पा सकते हैं। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर देवी को प्रसन्न करने के लिए पूजा-अर्चना कर सकते हैं और मनचाहा फल प्राप्त कर सकते हैं। छिन्नमस्तिका जयंती से जुड़ी मान्यताएं देवी छिन्नमस्तिका (Devi Chinnamasta) को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी ने चंडी रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया, तो उनकी सहायिका योगिनी अजया और विजया की रक्त पिपासा शांत नहीं हुई। इसे शांत करने के लिए देवी ने अपना सिर काट दिया, और उनके रक्त की धाराओं से दोनों ने अपनी प्यास बुझाई। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया एक अन्य कथा में देवी पार्वती अपनी सहचरियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद, सहचरियों ने भूख से तंग आकर देवी से भोजन की प्रार्थना की। देवी ने अपनी क्षुधा शांत करने के लिए खड़ग से अपना सिर काट दिया, और रक्त की तीन धाराएं बहने लगीं। दोनों सहचरियों ने एक-एक धारा का पान किया, और तीसरी धारा देवी ने स्वयं पी ली। तभी से देवी छिन्नमस्तिका के रूप में प्रसिद्ध हुईं। छिन्नमस्ता जयंती का महत्व हिंदू धर्म में देवी छिन्नमस्तिका (Devi Chinnamasta) को मां काली का एक उग्र और रहस्यमयी स्वरूप माना गया है। वे न केवल संहार की शक्ति हैं, बल्कि पुनर्जन्म और जीवनदायिनी शक्ति की प्रतीक भी हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक देवी छिन्नमस्तिका की पूजा करते हैं, उन्हें जीवन की जटिल समस्याओं से मुक्ति मिलती है। छिन्नमस्ता जयंती के दिन मां की विशेष उपासना करने से संतान की दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है और व्यक्ति को कर्ज जैसी परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है। इस दिन देवी की आराधना से भक्त को आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति भी मिलती है। छिन्नमस्ता जयंती साधना और आराधना के माध्यम से आत्मबल, निर्भयता और मानसिक स्थिरता पाने का सशक्त अवसर होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News  Devi Chinnamasta #ChhinnamastaJayanti2025 #GoddessChhinnamasta #SelfSacrifice #ShaktiWorship #TantricFestival #DivineFeminine #ChhinnamastaVrat #HinduFestivals2025 #FearlessGoddess #PowerOfShakti

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Mohini Ekadashi 2025

मोहिनी एकादशी 2025: व्रत में भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन, नहीं मिलेगी पुण्य की प्राप्ति

मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है, जो इस वर्ष गुरुवार 8 मई 2025 को पड़ रही है। यह व्रत भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की स्मृति में रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन उपवास करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है। मोहिनी एकादशी व्रत 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्तवैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि, जिसे मोहिनी एकादशी कहा जाता है, इस वर्ष 8 मई को मनाई जाएगी। यह तिथि 7 मई को सुबह 10:19 बजे शुरू होगी और 8 मई को दोपहर 12:29 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि को मान्यता मिलने के कारण मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) का व्रत 8 मई को रखा जाएगा। व्रत के दौरान क्या खाएं मोहिनी एकादशी का उपवास रखने वाले श्रद्धालु व्रत के दौरान दूध, दही, फल, शरबत, साबुदाना, बादाम, नारियल, शकरकंदी, आलू, हरी मिर्च, सेंधा नमक और राजगिरा के आटे से बने व्यंजनों का सेवन कर सकते हैं। ध्यान रखें कि भोजन या फलाहार भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के बाद ही करें। साथ ही, प्रसाद तैयार करते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। व्रत के दौरान इन चीजों से करें परहेज मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi)के दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, शराब, प्याज, लहसुन, अधिक मसाले और तेल का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस व्रत में चावल और सामान्य नमक का उपयोग भी वर्जित माना गया है। यदि आप इस व्रत का पालन कर रहे हैं, तो इन सभी नियमों का विशेष रूप से ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।  पूजा विधि मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) के दिन प्रातःकाल स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। ध्यान रखें कि इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित है, इसलिए पूर्व में तोड़े गए पत्तों का ही उपयोग करें। मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को भोग अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करें—“त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।।” इस मंत्र का जाप करते हुए श्रद्धा से भोग अर्पित करने पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर भोग स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा व्रत का पारण मोहिनी एकादशी व्रत का पारण 9 मई 2025 को सुबह 5:34 से 8:16 बजे के बीच किया जाएगा। इस दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत खोलना चाहिए। व्रत के नियमों का विधिपूर्वक पालन करने से भक्तों को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Mohini Ekadashi #MohiniEkadashi2025 #EkadashiFasting #HinduFestivals #VratRules #FastingDosAndDonts #SpiritualIndia #EkadashiTips #VratFoodGuide #MohiniVrat #HinduRituals

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Baglamukhi Jayanti 2025

बगलामुखी जयंती 2025: वृद्धि योग और शुभ संयोग से होंगे बिगड़े काम बन

हिन्दू धर्म में देवी बगलामुखी  (Devi Baglamukhi)  की पूजा का विशेष महत्व है। बगलामुखी जयंती पर देवी की उपासना करने से ना केवल व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ दूर होती हैं, बल्कि उसे जीवन में प्रगति और समृद्धि भी मिलती है। इस वर्ष बगलामुखी जयंती 5 मई 2025 को मनाई जाएगी और इस दिन वृद्धि योग सहित कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जो जीवन के अटके कार्यों को सफल बनाने में सहायक सिद्ध होंगे। बगलामुखी का महत्व देवी बगलामुखी (Devi Baglamukhi) को “पीताम्बर देवी” भी कहा जाता है। वे शक्ति की देवी हैं और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाली मानी जाती हैं। बगलामुखी की पूजा से व्यक्ति के सारे विघ्न दूर होते हैं और उसे हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। खासकर यह देवी उन लोगों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती हैं जो किसी मुश्किल स्थिति में फंसे हों या जिनकी किस्मत प्रतिकूल हो। देवी की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता आती है और जीवन के बिगड़े हुए काम भी सुधर जाते हैं। इस वर्ष बगलामुखी जयंती पर बनेगा विशेष योग वैदिक पंचांग के अनुसार, बगलामुखी जयंती (Baglamukhi Jayanti) 5 मई 2025 को मनाई जाएगी। इस विशेष दिन मां बगलामुखी की पूजा के साथ-साथ वृद्धि योग और अन्य शुभ योग भी बन रहे हैं, जो इस तिथि को और भी महत्वपूर्ण बना देते हैं। वृद्धि योग एक ऐसा योग है, जब किसी शुभ कार्य या पूजा का फल त्वरित रूप से मिलता है। यह योग व्यक्ति की सफलता में चार चाँद लगाता है और उसके सभी बिगड़े काम को सुधारने में मदद करता है। इस दिन देवी बगलामुखी (Devi Baglamukhi) की पूजा से न केवल शत्रुओं पर विजय मिलती है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक दृष्टिकोण से भी उन्नति होती है। वृद्धि योगज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस वर्ष बगलामुखी जयंती पर वृद्धि योग का संयोग बन रहा है, जो रात 12:20 बजे तक प्रभावी रहेगा। इस शुभ योग में देवी बगलामुखी की आराधना करने से आर्थिक उन्नति, भाग्य में वृद्धि और सफलता के प्रबल संकेत मिलते हैं। साथ ही देवी की कृपा से जीवन के तमाम संकट दूर हो सकते हैं। रवि योगइस विशेष दिन पर रवि योग भी बन रहा है, जो दोपहर 2:01 बजे से शाम 5:36 बजे तक रहेगा। मान्यता है कि रवि योग में मां बगलामुखी की आराधना करने से साधकों की मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं और इच्छित सफलता प्राप्त होती है। शिववास योगबगलामुखी जयंती (Baglamukhi Jayanti) पर शिववास योग का भी संयोग बन रहा है, जो सुबह 7:35 बजे से आरंभ होगा। इस योग में भगवान शिव कैलाश पर देवी पार्वती के साथ विराजमान रहते हैं। इस पावन समय में की गई पूजा से घर में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है। इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा बगलामुखी जयंती (Baglamukhi Jayanti) पर पूजा विधि इस दिन देवी बगलामुखी की पूजा का विशेष महत्व है। पूजा के दौरान श्रद्धालु पीले कपड़े, पीले फूल, और पीली वस्तुएं चढ़ाते हैं, क्योंकि देवी बगलामुखी का रंग पीला है। पूजा में विशेष रूप से नवग्रह शांति, वशीकरण, और शत्रुनाशक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। सबसे प्रभावशाली मंत्रों में से एक है: “ॐ बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ॐ स्वाहा।” इस मंत्र का जप करने से न केवल शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, बल्कि मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। बगलामुखी जयंती के दिन देवी बगलामुखी (Devi Baglamukhi) के हवन और यज्ञ का आयोजन भी अत्यंत फलदायक माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Devi Baglamukhi #BaglamukhiJayanti2025 #VridhiYoga #BaglamukhiMata #HinduFestivals2025 #JayantiPuja #SpiritualRituals #AuspiciousDay #TurnSetbacksIntoSuccess #BaglamukhiMantra #DivineBlessings

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Hanuman Ji

जब हनुमान जी ने सूर्य को समझा फल, निगल गए पूरे ब्रह्मांड का उजाला

हनुमान जी (Hanuman Ji) को बल, बुद्धि और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे बालपन से ही असाधारण शक्तियों से संपन्न थे और यही कारण है कि उनकी बाल लीलाएं भी उतनी ही अद्भुत और चमत्कारी हैं, जितनी उनकी युवावस्था की वीरता। ऐसी ही एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जब बालक हनुमान ने सूर्य देव (Lord Sun) को लाल फल समझकर निगल लिया था। इस घटना से न केवल धरती बल्कि पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा गया और देवताओं में हाहाकार मच गया था। बाल हनुमान की भूख और सूर्य को फल समझने की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा केसरी और माता अंजनी के घर एक विलक्षण बालक का जन्म हुआ, जिसे मारुति नाम दिया गया। यह बालक साधारण नहीं था, उसमें देवताओं द्वारा प्रदान की गई दिव्य शक्तियां विद्यमान थीं। बचपन से ही मारुति बेहद चंचल, बलवान और बुद्धिमान थे। एक दिन उन्होंने आकाश में चमकते हुए सूर्य को देखा, जो उन्हें एक लाल और दमकते हुए पके आम की तरह प्रतीत हुआ। उसे देखकर उनके भीतर उसे खाने की इच्छा जाग उठी। वे तुरंत आकाश की ओर उड़ चले और इतनी तेजी से बढ़े कि देवता भी अचंभित रह गए। हनुमान जी (Hanuman Ji) ने सूर्य को पकड़ने की कोशिश की और अंत में उसे निगल लिया। जैसे ही उन्होंने सूर्य को निगला, समस्त पृथ्वी पर अंधकार छा गया और दिन में ही रात जैसा माहौल बन गया। इससे सभी जीव-जंतु भयभीत हो उठे। देवताओं की चिंता और इंद्र का हस्तक्षेप इसके बाद सभी देवता चिंतित होकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने इंद्र देव को निर्देश दिया कि वे उस बालक को रोकें। इंद्र देव ने अपने वज्र से मारुति यानी हनुमान जी पर प्रहार किया, जिससे वे सीधे धरती पर गिर पड़े। यह देखकर ब्रह्मा जी ने हनुमान जी (Hanuman Ji) को उठाया और कहा, “यह बालक असाधारण है, इसे कोई भी क्षति नहीं पहुंचा सकता।” इसके बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें अमरता और विजय का वरदान दिया। अन्य देवताओं ने भी हनुमान जी को अनेक शक्तियां प्रदान कीं—जैसे अग्नि से रक्षा, जल में न डूबने की क्षमता, हवा में उड़ने की कला और अनेकों दिव्य वरदान। परंतु, बाल्यावस्था में हनुमान जी जब अपनी शक्तियों का अनुचित प्रयोग करने लगे और ऋषियों की तपस्या में विघ्न डालने लगे, तो ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि वे अपनी शक्तियों को भूल जाएंगे और तब तक नहीं याद कर पाएंगे, जब तक कोई उन्हें स्मरण न कराए। इसी कारण जब आगे चलकर हनुमान जी (Hanuman Ji) की भेंट श्रीराम से हुई, तभी उन्हें अपनी सभी दिव्य शक्तियों का पुनः स्मरण हुआ और वे भगवान राम के अनन्य भक्त व शक्तिशाली बजरंगबली के रूप में प्रतिष्ठित हुए इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा देवताओं का समाधान और हनुमान को वरदान समस्त देवताओं ने वायुदेव को शांत करने और हनुमान जी (Hanuman Ji) की क्षमा याचना हेतु मिलकर उन्हें अनेक वरदान दिए। ब्रह्मा जी, इंद्र देव, वरुण देव, यमराज आदि ने बालक हनुमान को अमरता, अजेयता, बल, बुद्धि, वेदों का ज्ञान और हर प्रकार के दैवीय वरदान दिए। इस प्रकार हनुमान जी त्रेतायुग के सबसे बलशाली और बुद्धिमान देवता बने। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Hanuman Ji #Hanuman #HanumanStory #HinduMythology #SuryaDev #IndianLegends #HanumanJayanti #MythologicalTales #LordHanuman #SpiritualIndia #DivineStories

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Powerful goddess Baglamukhi

बगलामुखी जयंती 2025: शत्रुनाशिनी देवी की आराधना से मिलती है विजय और सुरक्षा

हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष महत्व है, जिनमें से एक हैं मां बगलामुखी। इन्हें तंत्र साधना की देवी भी कहा जाता है। मां बगलामुखी की उपासना विशेष रूप से शत्रु नाश, वाद-विवाद में विजय, मुकदमे में सफलता और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए की जाती है। हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामुखी जयंती मनाई जाती है। यह तिथि 2025 में कब पड़ रही है और मां की उपासना का क्या महत्व है, आइए विस्तार से जानते हैं। बगलामुखी जयंती 2025 में कब है? मां बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवें स्थान पर आती हैं। इन्हें ‘पीताम्बरा देवी’ भी कहा जाता है क्योंकि इनका वस्त्र, श्रृंगार और आसन पीले रंग का होता है। पीला रंग मां का प्रिय रंग है, और यही रंग तंत्र साधना में भी अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। मां का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और रौद्र है। उनके हाथ में एक गदा होती है, जिससे वे शत्रुओं का संहार करती हैं। देवी पार्वती के उग्र रूप के रूप में पूजित मां बगलामुखी की जयंती (Baglamukhi Jayanti 2025) हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। इस वर्ष यह पर्व 5 मई को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि की शुरुआत 4 मई को सुबह 7:18 बजे होगी और इसका समापन 5 मई को सुबह 7:35 बजे होगा। चूंकि हिंदू धर्म में उदया तिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए बगलामुखी जयंती 5 मई को मनाई जाएगी और इसी दिन मां की पूजा और विशेष साधना की जाएगी। पीले रंग का महत्वमां बगलामुखी का स्वरूप सुनहरे पीले रंग का होता है, इसलिए उनकी पूजा में पीले वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूजा सामग्री भी अधिकतर पीले रंग की होती है। साधना शुरू करने से पहले हरिद्रा गणपति की पूजा और उनका आह्वान किया जाता है। साधना का ज्ञान ब्रह्माजी ने दिया थापौराणिक कथाओं के अनुसार, बगलामुखी साधना का प्रथम उपदेश ब्रह्माजी ने सनकादि ऋषियों को दिया था। उनसे प्रेरित होकर देवराज नारद ने मां बगलामुखी की उपासना की। आगे चलकर भगवान विष्णु ने यह दिव्य विद्या भगवान परशुराम को प्रदान की थी। बगलामुखी जयंती पर क्या करें पूजा विधि? बगलामुखी जयंती के दिन विशेष पूजा और अनुष्ठान करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनें और पीले फूल, हल्दी, चना दाल, बेसन के लड्डू आदि का उपयोग कर पूजन करें। पूजन विधि: इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया युद्ध से पहले पांडवों ने की थी आराधना पांडवों ने भी मां बगलामुखी की आराधना की थी। ऐसा कहा जाता है कि महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को रात के समय मां बगलामुखी की साधना करने का सुझाव दिया था, जिससे उन्हें विशेष सिद्धि प्राप्त हो सके। मां बगलामुखी के तीन प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर भारत में स्थित हैं—मध्य प्रदेश के दतिया और नलखेड़ा (आगर मालवा) में दो, और तीसरा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News  #BaglamukhiJayanti2025 #ShatruNashiniDevi #BaglamukhiPuja #GoddessBaglamukhi #VictoryWithPuja #HinduFestivals2025 #DeviBhakti #TantricWorship #SpiritualProtection #BaglamukhiMantra

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Why Sindoor is Offered to Hanuman

क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा

हिंदू धर्म में भगवान हनुमान जी (Lord Hanuman) को बल, बुद्धि, भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वे कलियुग के सबसे जाग्रत और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने जाते हैं। भक्तजन मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से हनुमान जी की पूजा करते हैं और उनके विग्रह पर सिंदूर चढ़ाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है? यह परंपरा केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि इसके पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो त्रेता युग के समय की बताई जाती है। हनुमान जी और सिंदूर की कथा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे और राजपाट संभाल रहे थे, उस समय एक दिन माता सीता किसी कार्य में व्यस्त थीं। तभी हनुमान जी ने जिज्ञासावश उनसे पूछा कि भगवान श्रीराम को कौन-सी चीज़ सबसे अधिक प्रिय है। माता सीता ने उत्तर दिया कि भगवान राम (Lord Rama) को किसी वस्तु से विशेष मोह नहीं है, वे सभी चीजों को समान दृष्टि से देखते हैं और सब चीज़ों से प्रसन्न हो जाते हैं। तभी हनुमान जी की दृष्टि सीता माता के मांग में लगे सिंदूर पर पड़ी। उन्होंने उत्सुकता से पूछा, “माते, आप यह सिंदूर क्यों लगाती हैं?” तब माता सीता ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “यह सिंदूर मेरे सुहाग की निशानी है और इसे लगाने से प्रभु श्रीराम प्रसन्न रहते हैं।” तभी हनुमान जी (Lord Hanuman) के मन में एक विचार आया। उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया और प्रभु श्रीराम के दरबार में उपस्थित हुए। उन्हें इस रूप में देखकर वहां मौजूद लोग हँसने लगे। जब भगवान राम ने इसका कारण पूछा, तो हनुमान जी ने भावुकता से उत्तर दिया—“जब माता सीता की मांग में थोड़ा-सा सिंदूर (Sindoor) देखकर आप प्रसन्न होते हैं, तो मैंने सोचा कि यदि मैं पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लूं, तो आपको अत्यधिक प्रसन्नता होगी।” हनुमान जी की यह मासूम और भक्ति से भरी भावना सुनकर भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) अत्यंत प्रसन्न हुए। हनुमान जी ने इस माध्यम से अपने प्रभु के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण प्रकट किया। तभी से हनुमान जी (Lord Hanuman) को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा आरंभ हुई, जो आज भी श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक रूप में निभाई जाती है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया हनुमान जी पर सिंदूर चढ़ाने का महत्व सिंदूर मुख्य रूप से दो रंगों में उपलब्ध होता है—लाल और नारंगी। हिंदू परंपराओं में लाल सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है, जिसे विवाहित महिलाएं अपने माथे पर लगाती हैं। वहीं नारंगी सिंदूर त्याग, भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना गया है। हनुमान जी के व्यक्तित्व में प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट समर्पण और निष्ठा प्रमुख रूप से दिखाई देती है, इसलिए उन्हें नारंगी सिंदूर अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से हनुमान जी पर सिंदूर (Sindoor) चढ़ाता है, उसकी सभी परेशानियाँ और कष्ट संकटमोचन हनुमान दूर कर देते हैं। यह परंपरा न केवल भक्ति भाव का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि समर्पण और सेवा के माध्यम से प्रभु की कृपा प्राप्त की जा सकती है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Lord Hanuman #HanumanSindoor #TretayugStory #HanumanDevotion #HinduBeliefs #SindoorSignificance #RamayanTales #HanumanBhakti #SpiritualIndia #MythologyFacts #DivineStories

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Sita Navami Celebration Tips

सीता नवमी 2025: घर में सुख-समृद्धि के लिए मां जानकी को अर्पित करें ये भोग

सीता नवमी (Sita Navami) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे माता सीता (Goddess Sita) के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसे जानकी जयंती भी कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना कर उनके जीवन से सीख लेते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां जानकी को विशेष भोग अर्पित करने से घर में कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं होती। आइए जानते हैं सीता नवमी 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और भोग के महत्व। सीता नवमी 2025 कब है? (Sita Navami 2025 Date & Time) सीता नवमी (Sita Navami) का पर्व वर्ष 2025 में सोमवार, 5 मई को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, नवमी तिथि 5 मई को सुबह 7 बजकर 35 मिनट से आरंभ होकर 6 मई को सुबह 8 बजकर 38 मिनट तक रहेगी। इस पावन अवसर पर महिलाएं सुखमय वैवाहिक जीवन और घर-परिवार में समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। सीता नवमी पर माता जानकी (Goddess Sita) की पूजा से दांपत्य जीवन में प्रेम, सौहार्द और सुख-शांति बनी रहती है। मां सीता को लगाएं ये दिव्य भोग (Sita Navami Bhog & Offerings)   चावल की खीर: सीता नवमी के शुभ पर्व पर केसर मिलाकर चावल की खीर तैयार कर माता सीता को भोग लगाना अत्यंत फलदायी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिव्य भोग से घर में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहती है।   मखाने की खीर: व्रत करने वाले भक्तों के लिए मखाने की खीर एक आदर्श भोग है। इस दिन माता सीता को इसका नैवेद्य चढ़ाने से घर में अन्न और धन की वृद्धि होती है।   नारियल के लड्डू: नारियल शुभता और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। सीता माता को नारियल के लड्डू अत्यंत प्रिय हैं। इनका भोग लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।   पंजीरी: पारंपरिक प्रसाद के रूप में पंजीरी सीता नवमी पर अर्पित करना अत्यंत फलदायी होता है। इससे घर में संपन्नता और सौभाग्य बना रहता है।   ऋतु फल और मेवे: सीता नवमी के अवसर पर माता सीता को ताजे मौसम के फल जैसे केला, सेब, अनार और विभिन्न प्रकार के सूखे मेवे अर्पित किए जाते हैं। यह सात्विक और पवित्र भोग न केवल मन को शांति प्रदान करता है, बल्कि भक्त को पुण्य भी प्राप्त होता है। सीता नवमी पर करें ये शुभ उपाय, मिलेगा माता सीता का आशीर्वाद इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया सीता नवमी की पूजा विधि: कैसे करें मां जानकी की आराधना सीता नवमी (Sita Navami) के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ और सात्विक वस्त्र धारण करें। फिर पूजा स्थान की सफाई कर माता सीता की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। उन्हें पुष्प, अक्षत, कुमकुम और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं समर्पित करें। इसके पश्चात श्रद्धा से तैयार किया गया दिव्य भोग माता को अर्पित करें और भक्तिभाव से प्रार्थना करें। पूजा उपरांत यह प्रसाद अपने परिवारजनों व आस-पास के लोगों में वितरित करें। यह दिन माता जानकी की विशेष कृपा प्राप्त करने का शुभ अवसर माना जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Sita Navami #SitaNavami2025, #SitaNavamiBhog, #MaaSitaBlessings, #JankiPuja, #HappinessAndProsperity, #NavamiCelebrations, #RamayanFestival, #DivineOfferings, #FestiveRituals, #HinduFestivals2025

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Surdas poems in praise of Krishna

सूरदास जयंती 2025: भक्ति और काव्य के सच्चे साधक को श्रद्धांजलि

संत सूरदास (Surdas Jayanti), भक्ति काल के प्रमुख कवि और भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त माने जाते हैं। उनकी जयंती हर वर्ष वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। हर वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को श्रद्धा और भक्ति के साथ सूरदास जयंती मनाई जाती है। इस विशेष अवसर पर देशभर के मंदिरों में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है, और भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna) के महान भक्त संत सूरदास को श्रद्धांजलि दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के सच्चे भक्तों को जीवन में सुख, सम्मान और प्रसिद्धि निश्चित रूप से प्राप्त होती है। सूरदास जी वैष्णव परंपरा के महान संत थे, जिन्होंने भक्ति, गीत और संगीत के माध्यम से श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति की। अपने जीवन में सूरदास जी ने कई भावपूर्ण रचनाएं कीं, जिनमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, रास लीला और वात्सल्य भाव का सुंदर चित्रण है। आज भी उनके दोहे और पद लोगों के दिलों में बसे हैं और भक्ति संगीत में नियमित रूप से गाए जाते हैं। इस जयंती पर आइए जानते हैं सूरदास जयंती 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, बन रहे योग और उनके अमर दोहे जो आज भी हमारे जीवन को प्रकाश देते हैं। सूरदास का जीवन परिचय संत सूरदास का जन्म 15वीं शताब्दी के अंत में माना जाता है। उनका जन्मस्थान हरियाणा के फरीदाबाद जिले के सीही गांव या आगरा के पास स्थित रुनकता गांव में हुआ था। जन्म से ही दृष्टिहीन होने के बावजूद, सूरदास ने अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का अद्भुत वर्णन किया। उन्होंने श्री वल्लभाचार्य से दीक्षा ली और पुष्टिमार्ग के अनुयायी बने।​ सूरदास जयंती 2025 (Surdas Jayanti 2052): तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि इस वर्ष 1 मई को सुबह 11:23 बजे शुरू होकर 2 मई को सुबह 9:13 बजे समाप्त होगी। ऐसे में सूरदास जयंती 2 मई 2025 को मनाई जाएगी। उल्लेखनीय है कि 1 मई को विनायक चतुर्थी का पर्व भी रहेगा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया सूरदास जयंती पर बन रहे शुभ योगज्योतिष गणनाओं के अनुसार इस बार सूरदास जयंती के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का विशेष संयोग बन रहा है। इसके अलावा रवि योग और दुर्लभ शिववास योग का भी निर्माण हो रहा है। इन तीनों योगों में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना विशेष फलदायक मानी जाती है। कहा जाता है कि इस दिन सूरदास जी के आराध्य श्रीकृष्ण (Shri Krishna) की पूजा करने से साधक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।  सूरदास के प्रसिद्ध दोहे नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Surdas Jayanti #SurdasJayanti2025 #SurdasPoetry #BhaktiMovement #IndianSaints #DevotionalPoet #KrishnaBhakti #SantSurdas #HinduFestivals2025 #IndianLiterature #SpiritualLegends

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Sawan 2025 start date

हर-हर महादेव! जानिए कब से शुरू हो रहा है सावन 2025 का पावन महीना

हिंदू पंचांग के अनुसार सावन का महीना (Sawan Month) भगवान शिव (Lord Shiva) की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। यह महीना भक्तों के लिए भक्ति, उपवास और पूजा का विशेष समय होता है। सावन में विशेष रूप से सोमवार  (Monday) और मंगलवार को व्रत रखे जाते हैं, जिन्हें क्रमशः सावन सोमवार व्रत और मंगला गौरी व्रत कहा जाता है।​ सावन 2025 (Sawan 2025) की शुरुआत और समाप्ति ज्योतिष गणनाओं के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा इस वर्ष 10 जुलाई को है। इसके अगले दिन यानी 11 जुलाई से पवित्र सावन मास की शुरुआत होगी। इस महीने की पहली सावन सोमवारी का व्रत 14 जुलाई 2025 को रखा जाएगा। इसके बाद दूसरी सोमवारी 21 जुलाई, तीसरी सोमवारी 28 जुलाई और चौथी व अंतिम सोमवारी 4 अगस्त को होगी। वहीं, 9 अगस्त को सावन पूर्णिमा है, जिस दिन रक्षाबंधन का पर्व भी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। सावन सोमवार व्रत की तिथियां सावन 2025 (Sawan 2025) की शुभ शुरुआत वैदिक पंचांग के अनुसार इस बार आषाढ़ पूर्णिमा गुरुवार, 10 जुलाई को पड़ेगी। इसके बाद, सावन मास (Sawan Month) की शुरुआत अगले दिन यानी 11 जुलाई से मानी जाएगी। यदि इसे आसान भाषा में समझें, तो इस साल सावन महीना 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से आरंभ होगा। आषाढ़ पूर्णिमा की तारीख 11 जुलाई की रात 2 बजकर 6 मिनट से प्रारंभ होकर 12 जुलाई की रात 2 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। सनातन परंपरा में “उदयातिथि” को मान्यता दी जाती है, इसी कारण सावन की शुरुआत 11 जुलाई से होगी। सावन सोमवार व्रत 2025 की तिथियां मंगला गौरी व्रत की तिथियां इन व्रतों के दौरान महिलाएं विशेष पूजा करती हैं और देवी पार्वती (Devi Parvati) का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए व्रत रखती हैं। ​ इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व सावन महीने का महत्व सावन का महीना (Sawan Month) भगवान शिव (Lord Shiva) को समर्पित होता है। सावन माह में शिव भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग (Shivling) की पूजा करते है। और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित करते हैं और शिव मंत्रों का जाप करते हैं। ऐसा माना जाता है कि सावन में की गई पूजा और व्रत से भगवान शिव (Lord Shiva) शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।​ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Sawan Month #Sawan2025 #ShravanMonth #SawanStartDate2025 #HarHarMahadev #LordShiva #SawanSomwar #SawanFestival #ShivaBhakti #HinduFestivals #SpiritualMonth

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Jyeshtha Purnima 2025

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: जानिए व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

भारतीय पंचांग में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है। हर माह की पूर्णिमा को धार्मिक दृष्टि से शुभ और पुण्यदायी माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा का स्थान और भी विशिष्ट है। यह दिन न केवल व्रत और पूजा के लिए उत्तम माना जाता है, बल्कि कई महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन के लिए भी शुभ होता है। आइए जानते हैं, ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 (Jyeshtha Purnima 2025) में कब मनाई जाएगी, इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और इसका धार्मिक महत्व क्या है। ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 की तिथि और समय वैदिक पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 10 जून को प्रातः 11:35 बजे होगी और यह 11 जून को दोपहर 1:13 बजे समाप्त होगी। ऐसे में ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) का पावन पर्व 11 जून 2025 को धूमधाम से मनाया जाएगा। ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन व्रत रखकर चंद्रदेव का पूजन करने से कुंडली में मौजूद चंद्र दोष का निवारण होता है। यदि जन्म पत्रिका में चंद्रमा कमजोर स्थिति में हो या उसकी दशा का प्रभाव चल रहा हो, तो इस दिन की पूजा से उसके नकारात्मक प्रभावों में भी कमी आती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र और धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख और समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही, इस दिन गंगा स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: करें और न करें ये विशेष बातें ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima 2025) के दिन घर में अंधेरा नहीं रखना चाहिए, विशेष रूप से संध्या के समय। मान्यता है कि इस शुभ अवसर पर देवी लक्ष्मी घर में आगमन करती हैं, और वे अंधेरे स्थानों में प्रवेश नहीं करतीं।इस दिन काले वस्त्र पहनने से भी बचना चाहिए, क्योंकि काला रंग नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित कर सकता है, जिससे जीवन, कार्य और व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।दान और पूजा के समय भी काले रंग से जुड़े वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे चंद्रमा की शुभ स्थिति प्रभावित हो सकती है और राहु के दुष्प्रभाव बढ़ सकते हैं। इसलिए इस दिन हल्के और शुभ रंगों का प्रयोग करना और शुद्ध भाव से पूजा-अर्चना करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया ज्येष्ठ पूर्णिमा : करें ये शुभ कार्य इस पावन दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें या स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय मन में गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पवित्र नदियों का स्मरण करना अत्यंत शुभ होता है।स्नान के उपरांत घर के मंदिर में दीपक जलाएं और यदि संभव हो तो पूरे दिन व्रत का संकल्प लें।घर के देवालय में सभी देवी-देवताओं का गंगा जल से अभिषेक करें। इस दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। उनके साथ माता लक्ष्मी की भी विधिपूर्वक आराधना करें।भगवान विष्णु को भोग अर्पित करते समय ध्यान रखें कि भोग में तुलसी पत्र अवश्य हो, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु (Lord Vishnu) भोग स्वीकार नहीं करते। केवल सात्विक भोजन का ही भोग लगाना चाहिए।पूजन के पश्चात भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और माता लक्ष्मी की आरती करें और उनका ध्यान तथा नाम-स्मरण अधिक से अधिक करें। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का पूजन भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करें, जिससे चंद्र दोष और अन्य ग्रहदोषों से मुक्ति प्राप्त होती है।इस पुण्य अवसर पर जरूरतमंदों को दान देना अत्यंत शुभ माना गया है। साथ ही यदि आपके आसपास गाय हो, तो उसे भोजन कराना भी अत्यंत पुण्यदायी होता है, जिससे कई प्रकार के दोषों का निवारण होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Jyeshtha Purnima 2025 #JyeshthaPurnima2025 #PurnimaVrat #HinduFestival #FullMoon2025 #PurnimaSignificance #VratDates2025 #SpiritualIndia #HinduRituals #PurnimaCelebration #ReligiousFestival

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