महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में एक बड़ा और प्रभावशाली कदम उठाते हुए राज्य की आबकारी नीति में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए निर्णय के तहत शराब पर उत्पाद शुल्क (Excise duty) में भारी बढ़ोतरी की गई है, जिसका सीधा असर शराब की खुदरा कीमतों पर पड़ेगा। इस बदलाव का उद्देश्य सरकारी राजस्व बढ़ाना और स्थानीय शराब उद्योग को प्रोत्साहन देना है, लेकिन इसके साथ-साथ इससे उपभोक्ताओं और स्थानीय व्यापारियों के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी हो सकती हैं।
उत्पाद शुल्क में भारी बढ़ोतरी
कैबिनेट के इस नए फैसले के अनुसार भारत में बनी अंग्रेजी शराब (Indian Made Foreign Liquor – IMFL) पर अब उत्पाद शुल्क को उसकी विनिर्माण लागत के तीन गुना से बढ़ाकर 4.5 गुना कर दिया गया है। इसका सबसे अधिक असर उन ब्रांड्स पर पड़ेगा जिनकी विनिर्माण लागत लगभग 260 रुपये प्रति बल्क लीटर है। साथ ही देशी शराब पर भी शुल्क बढ़ा दिया गया है, जो पहले 180 रुपये प्रति प्रूफ लीटर था, उसे अब 205 रुपये प्रति प्रूफ लीटर कर दिया गया है।
इस बदलाव के कारण शराब की कीमतों में औसतन 30-50% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। उदाहरण के लिए, देशी शराब की 180 ml बोतल अब 60-70 रुपये की बजाय 80 रुपये में बिकेगी। IMFL की सामान्य श्रेणी की बोतल 115-130 रुपये से बढ़कर 205 रुपये की हो सकती है, जबकि प्रीमियम विदेशी शराब की कीमत 210 रुपये से बढ़कर 360 रुपये तक पहुंचने की संभावना है।
नई शराब श्रेणी – महाराष्ट्र निर्मित शराब (MML)
सरकार ने एक नई श्रेणी की घोषणा भी की है, जिसे “महाराष्ट्र निर्मित शराब” (Maharashtra Made Liquor – MML) नाम दिया गया है। यह श्रेणी देशी और अंग्रेजी शराब के बीच की कड़ी के रूप में विकसित की जाएगी। इसका निर्माण केवल अनाज आधारित शराब से किया जाएगा, और केवल वे उत्पाद ही इसमें शामिल होंगे जो महाराष्ट्र के भीतर निर्मित और पंजीकृत हैं। इससे राज्य के स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जबकि इसमें विदेशी या राष्ट्रीय ब्रांडों को शामिल नहीं किया जाएगा।
सरकार का मानना है कि इससे एक नई बाजार श्रेणी विकसित होगी, जिससे उत्पादों की विविधता बढ़ेगी और उपभोक्ताओं के पास स्थानीय विकल्प उपलब्ध होंगे।
सरकार की उम्मीदें और संभावित लाभ
सरकार को इस नई नीति से सालाना आबकारी संग्रह में 14,000 करोड़ रुपये (Maharashtra Made Liquor – MML) की बढ़ोतरी की उम्मीद है। इसके अलावा, MML श्रेणी से अलग से 3,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व जुटाए जाने की संभावना भी जताई गई है।
एक अन्य लाभ स्थानीय किसानों को हो सकता है, क्योंकि MML श्रेणी के तहत अनाज आधारित शराब का उत्पादन बढ़ेगा। इससे कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी और किसानों की आय में भी इज़ाफा हो सकता है। इसके अलावा राज्य में जिन 38 शराब निर्माण इकाइयों की गतिविधियाँ फिलहाल ठप हैं, उन्हें भी इस नई नीति के माध्यम से पुनर्जीवित किया जा सकता है।
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आलोचना और चुनौतियाँ
हालांकि सरकार इस नीति को राजस्व और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद मान रही है, लेकिन उद्योग विशेषज्ञ और कई व्यापारिक संगठनों ने इसकी आलोचना की है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी दर से उत्पाद शुल्क बढ़ाने से शराब की तस्करी बढ़ सकती है, खासकर पड़ोसी राज्यों से, जहां शराब सस्ती है। इससे राज्य को राजस्व में अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा और स्थानीय व्यवसायों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसके अतिरिक्त, उपभोक्ताओं पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ेगा। मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग, जो पहले ही महंगाई से जूझ रहे हैं, उनके लिए शराब अब और अधिक महंगी हो जाएगी। इससे अवैध शराब की बिक्री या उत्पादन बढ़ने का खतरा भी है, जो जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
महाराष्ट्र सरकार की नई आबकारी नीति दूरगामी आर्थिक लक्ष्यों और राजस्व बढ़ाने की दिशा में एक साहसिक कदम है। हालांकि इससे राज्य को वित्तीय रूप से लाभ मिल सकता है और स्थानीय उद्योगों को नई ऊर्जा मिल सकती है, लेकिन इसके साथ जुड़ी चुनौतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
यह आवश्यक है कि सरकार इस नई नीति के क्रियान्वयन के दौरान तस्करी, अवैध व्यापार और उपभोक्ता हितों पर विशेष ध्यान दे। साथ ही, शराब के दुरुपयोग को रोकने के लिए सामाजिक जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूत करना होगा। केवल राजस्व बढ़ाना ही नहीं, बल्कि संतुलित और जिम्मेदार नीति ही इस बदलाव को सफल बना सकती है।
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