हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं का विशेष स्थान है। ये दस रूप आदिशक्ति देवी के अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमयी स्वरूप हैं, जिनकी साधना तंत्र और अध्यात्म दोनों में की जाती है। इन्हीं दस महाविद्याओं में एक अत्यंत चमत्कारी और अद्भुत स्वरूप है — देवी छिन्नमस्ता। उनका नाम सुनते ही मन में एक रहस्यमयी छवि उभरती है, क्योंकि देवी छिन्नमस्ता (Devi Chinnamasta) का स्वरूप अन्य देवी रूपों से बिल्कुल अलग और शक्तिशाली है। वह स्वयं अपना सिर काटकर उसे हाथ में पकड़े रहती हैं, और उनके कंठ से तीन धाराओं में रक्त प्रवाहित होता है। यही कारण है कि उनकी उपासना को अत्यंत गूढ़ और सिद्धिदायक माना गया है।
छिन्नमस्ता जयंती 2025 में कब है?
पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को यानी 10 मई शाम 5 बजकर 29 मिनट पर शुरू होगी और 11 मई को शाम 8:01 बजे समाप्त होगी। चूंकि सनातन धर्म में तिथि की गणना सूर्योदय के आधार पर की जाती है, इसलिए छिन्नमस्ता जयंती (Chinnamasta Jayanti) 11 मई 2025 को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु देवी छिन्नमस्ता की पूजा-अर्चना और भक्ति भाव से साधना करेंगे।
छिन्नमस्ता जयंती के शुभ योग (Chinnamasta Jayanti Shubh Yoga)
वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर इस वर्ष रवियोग और भद्रावास सहित कई शुभ और फलदायी योग बन रहे हैं। इन विशेष योगों में मां छिन्नमस्ता की आराधना करने से साधकों की सभी इच्छाएं पूर्ण होने की संभावना रहती है। साथ ही, वे शारीरिक और मानसिक कष्टों से भी मुक्ति पा सकते हैं। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर देवी को प्रसन्न करने के लिए पूजा-अर्चना कर सकते हैं और मनचाहा फल प्राप्त कर सकते हैं।
छिन्नमस्तिका जयंती से जुड़ी मान्यताएं
देवी छिन्नमस्तिका (Devi Chinnamasta) को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी ने चंडी रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया, तो उनकी सहायिका योगिनी अजया और विजया की रक्त पिपासा शांत नहीं हुई। इसे शांत करने के लिए देवी ने अपना सिर काट दिया, और उनके रक्त की धाराओं से दोनों ने अपनी प्यास बुझाई।
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एक अन्य कथा में देवी पार्वती अपनी सहचरियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद, सहचरियों ने भूख से तंग आकर देवी से भोजन की प्रार्थना की। देवी ने अपनी क्षुधा शांत करने के लिए खड़ग से अपना सिर काट दिया, और रक्त की तीन धाराएं बहने लगीं। दोनों सहचरियों ने एक-एक धारा का पान किया, और तीसरी धारा देवी ने स्वयं पी ली। तभी से देवी छिन्नमस्तिका के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
छिन्नमस्ता जयंती का महत्व
हिंदू धर्म में देवी छिन्नमस्तिका (Devi Chinnamasta) को मां काली का एक उग्र और रहस्यमयी स्वरूप माना गया है। वे न केवल संहार की शक्ति हैं, बल्कि पुनर्जन्म और जीवनदायिनी शक्ति की प्रतीक भी हैं।
ऐसी मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक देवी छिन्नमस्तिका की पूजा करते हैं, उन्हें जीवन की जटिल समस्याओं से मुक्ति मिलती है। छिन्नमस्ता जयंती के दिन मां की विशेष उपासना करने से संतान की दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है और व्यक्ति को कर्ज जैसी परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है।
इस दिन देवी की आराधना से भक्त को आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति भी मिलती है। छिन्नमस्ता जयंती साधना और आराधना के माध्यम से आत्मबल, निर्भयता और मानसिक स्थिरता पाने का सशक्त अवसर होता है।
नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें।
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