महाराष्ट्र में भाषा को लेकर एक बार फिर सियासत गर्मा (Language controversy) गई है। बीती रात मुंबई के मीरा रोड इलाके में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर एक नॉर्थ इंडियन फेरीवाले की पिटाई कर दी वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वह मराठी बोलने से इनकार कर रहा था। यह घटना मीरा रोड (Mira Road) के बालाजी होटल के सामने हुई, जहां पीड़ित मसाला डोसा बेचने का काम करता है। इस घटना ने ना सिर्फ भाषा की अस्मिता पर बहस छेड़ दी है, बल्कि राज्य की राजनीति को भी एक बार फिर उबाल पर ला दिया है।
मनसे की सख्त प्रतिक्रिया
मनसे प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thakre) ने इस मामले पर खुलकर बयान दिया और हिंदी के बढ़ते प्रभाव पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि हिंदी एक बड़ी भाषा ज़रूर है, लेकिन उसे राष्ट्रीय भाषा (National Language) के रूप में जबरन थोपना स्वीकार नहीं किया जाएगा। राज ठाकरे ने जोर देकर कहा कि मराठी का इतिहास 3,000 वर्षों से भी पुराना है, जबकि हिंदी एक अपेक्षाकृत नई भाषा है। उनका यह बयान स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि मनसे राज्य में मराठी (Marathi) को सर्वोपरि रखने की नीति पर अडिग है। राज ठाकरे (Raj Thakre) ने यह भी कहा कि कुछ लोग हिंदी को मराठी से श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। उनके अनुसार यह मराठी अस्मिता पर सीधा हमला है।
हिंदी अनिवार्यता का फैसला रद्द
भाषा विवाद (Language controversy) के इसी बढ़ते दबाव के बीच राज्य सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Chief Minister Devendra Fadnavis) ने रविवार को घोषणा की कि पहली कक्षा से हिंदी को अनिवार्य करने का जो निर्णय लिया गया था, उसे वापस लिया जा रहा है। इस फैसले का विरोध शिवसेना (UBT) और मनसे दोनों ने ही किया था। 5 जुलाई को इन दोनों दलों ने मिलकर “महामोर्चा” निकालने की घोषणा की थी, जिसे अब सरकार के फैसले के बाद रद्द किया जा सकता है।
फडणवीस सरकार के इस कदम को विपक्ष ने सरकार की कमजोरी और दबाव में लिया गया फैसला बताया है। वहीं, मराठी समर्थकों का कहना है कि यह फैसला राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने की दिशा में सही कदम है।
उद्धव ठाकरे का तीखा हमला
शिवसेना (UBT) के प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने भी इस पूरे मसले पर सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार यह मानती है कि जो भी भाजपा या सरकार की नीतियों का विरोध करता है, वह देशद्रोही है। ठाकरे ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार को स्वतंत्रता संग्राम की भावना का कोई ज्ञान नहीं है। उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने दावा किया कि त्रिभाषा फार्मूले के तहत हिंदी (Hindi) को थोपने के विरोध में जो एकजुटता दिख रही थी, उसे देखते हुए ही सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। यह विपक्ष की एकजुटता और जन भावना की जीत है।
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मराठी अस्मिता बनाम राष्ट्रीय एकता?
यह पहला मौका नहीं है जब महाराष्ट्र में भाषा को लेकर विवाद हुआ है। मनसे और शिवसेना (UBT) (MNS and Shiv Sena UBT) वर्षों से राज्य में मराठी भाषा (Marathi Language) और संस्कृति को लेकर सख्त रुख अपनाते आए हैं। हालांकि, हर बार यह बहस इस सवाल पर खत्म होती है कि क्या किसी राज्य में एक विशेष भाषा को थोपना जायज़ है, और क्या ऐसा करना देश की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान के खिलाफ नहीं है?
वहीं, दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि देश की राजभाषा के रूप में हिंदी का सम्मान किया जाए, लेकिन जबरदस्ती नहीं। संविधान के अनुच्छेद 343 और 351 के अनुसार, हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन अन्य भाषाओं के अधिकारों का उल्लंघन किए बिना।
महाराष्ट्र में भाषा को लेकर चल रहा यह विवाद (Language controversy) सिर्फ शब्दों की लड़ाई नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी है राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता और राजनीतिक समीकरण। जहां एक ओर राजनीतिक दल अपने-अपने हितों को साधने में जुटे हैं, वहीं आम नागरिकों को ऐसी घटनाओं में नुकसान उठाना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि भाषा को विभाजन का नहीं, एकता का माध्यम बनाया जाए। सम्मान सभी भाषाओं को मिले और यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।
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