Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?: क्या सच में हो गया था पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को अपनी मौत का आभास?

Did Rajiv Gandhi know about his assassination

आज ही के दिन 34 वर्ष पूर्व लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम के आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) थी। हैरत की बात यह कि इस घटना से कुछ घंटे पहले ही नीना गोपाल ने राजीव गांधी का इंटरव्यू लिया था। इस दौरान उन्होंने राजीव से पूछा कि “क्या उन्हें लगता है कि उनकी जिंदगी खतरे में है?” इस सवाल के जवाब पर राजीव गांधी ने उल्टा पूछा कि “क्या आपने कभी गौर किया है कि दक्षिण एशिया में जब भी कोई महत्वपूर्ण नेता सत्ता पर काबिज होता है या अपने देश के लिए कुछ हासिल करने के करीब होता है, तब उसे कैसे नीचे गिराया जाता है, उस पर हमला किया जाता है, उसे मार दिया जाता है, श्रीमती इंदिरा गांधी को देखिए, शेख मुजीब, जुल्फिकार अली भुट्टो, भंडारनायके को देखिए।” नीना के मुताबिक इस इंटरव्यू के कुछ देर बाद राजीव गाँधी की हत्या कर दी गई थी। 

रजीव गाँधी को भी अपनी हत्या का हो गया (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) था आभास?

ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या जिस तरह इंदिरा गांधी ने अपनी हत्या की आशंका जता दी थी ठीक उसी तरह क्या रजीव गाँधी को भी अपनी हत्या का आभास हो गया (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) था? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लिट्‌टे के इंटरसेप्ट किए गए कई मैसजों में राजीव गांधी को खत्म करने की बात कही गई थी। ये खुफिया इनपुट अप्रैल 1990 से मई 1991 के बीच इंटरसेप्ट किए गए थे। बता दें कि नीना गोपाल ने कर्नल हरिहरन के हवाले से अपनी किताब में लिखा है कि जब उनकी टीम ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश रचने का संकेत देने वाला लिट्‌टे का एक कैसेट उन्हें सुनाया, तो वे सन्न रह गए थे। यहाँ ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह कि अनहोनी होने की आशंका के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर भयावह लापरवाही बरती गई। 

लिट्टे के खिलाफ सशस्त्र बलों को भेजना राजीव गाँधी को पड़ा (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) भारी

दरअसल, श्रीलंका में फैले उग्रवादी विद्रोह को समाप्त करने हेतु राजीव गाँधी ने भारतीय सशस्त्र बलों को भेजा था। उनका यही कदम उनके जान की आफत (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) बना। जानकारी के मुताबिक यह कदम उठाने की सलाह कोलंबो स्थित भारतीय उच्चायोग, सैन्य कमांडरों और खुफिया एजेंसियों ने दी थी। खैर, इस दौरान कई भारतीय सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इन सब के बावजूद लिट्टे पर काबू नहीं पाया जा सका। इसके बाद भारतीय सैनिकों को वापस बुला लिया गया। भले ही सैनिकों को वापस बुला लिया लेकिन तब तक राजीव गांधी लिट्टे का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुके थे। 

नहीं थे, सुरक्षा के पुख्ता (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) इंतजाम 

गौरतलब हो कि साल 1991 में केंद्र में चंद्रशेखर सरकार के पतन के बाद मध्यावधि चुनावों की घोषणा कर दी गई (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) थी। चुनाव प्रचार जोरों पर थे। उन दिनों राजीव गांधी तमिलनाडु के चुनावी दौर पर थे। इस बीच 21 मई की रात चेन्नई से तकरीबन 40 किमी दूर श्रीपेरंबुदुर पहुंचे। हैरत की बात यह कि सुरक्षा के इन्तेजामत उस  तरह के नहीं थे जिस तरह के होने चाहिए थे। खैर, उन्हें पहुँचते-पहुँचते 10 बज गए थे। रात काफी हो चुकी थी, सो वो तेजी से कदम बढ़ाते हुए रेड कार्पेट से होते हुए स्टेज की तरफ बढ़ रहे थे। इस दौरान वो सभी से फूलमालाएं स्वीकार करते जा रहे थे। तभी उनकी नजर एक छोटी-सी लड़की कोकिला पर गई, जो कविता सुना रही थी। उसे देख वो रुक गए तभी आत्मघाती दस्ते में शामिल धनु हाथ में चंदन की माला लेकर आगे बढ़ी। 

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धमाके के बाद उनकी पहचान उनके जूते से हो हुई (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) थी

खैर, इस बीच उन्होंने कांस्टेबल अनुसूया को भीड़ को नियंत्रित करने का इशारा किया, लेकिन तब तक धनु राजीव के चरण स्पर्श करने का बहाना करते हुए झुकी और तभी उसने अपने शरीर से लिपटे आरडीएक्स विस्फोट से लदे डिवाइस के बटन को दबा दिया। धमाका इतना तीव्र था कि राजीव गाँधी के चिथड़े उड़  (Did Rajiv Gandhi Sense His Own Death?) गए। धमाके की तीव्रता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि उनकी पहचान उनके जूते से हो हुई थी। कहते हैं बम विस्फोट में 46 साल के राजीव का शव इस कदर क्षत-विक्षत हो गया था कि डॉक्टरों ने बमुश्किल उसे रुई और पट्टियों की मदद से आकार दिया था। 

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