प्रेम विवाह में रुकावट का कारण बनते हैं कुंडली के ये ग्रह दोष
प्रेम जीवन में हर व्यक्ति चाहता है कि जिसे वह दिल से चाहता है, वही उसका जीवनसाथी बने। लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा हमेशा संभव नहीं हो पाता। कई बार दो लोग एक-दूसरे से बेहद प्रेम करते हैं, परंतु उनका रिश्ता विवाह तक नहीं पहुंच पाता। इसके पीछे सिर्फ सामाजिक या पारिवारिक कारण ही नहीं, बल्कि कुंडली में मौजूद कुछ ग्रह दोष भी होते हैं जो प्रेम विवाह में रुकावटें खड़ी करते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुछ विशेष ग्रह यदि कुंडली में कमजोर या पीड़ित हों तो प्रेम विवाह या लव मैरिज में सफलता नहीं मिलती। आइए जानते हैं ऐसे ग्रहों और भावों के बारे में जो सच्चे प्यार की मंज़िल तक पहुंचने में अड़चन बनते हैं। 1. शुक्र ग्रह का महत्व शुक्र ग्रह को प्रेम, आकर्षण, कला, रोमांस और वैवाहिक सुख का कारक माना गया है। यदि जन्म कुंडली में शुक्र दुर्बल हो, किसी शत्रु ग्रह के साथ स्थित हो या राहु, केतु अथवा शनि जैसे ग्रहों की अशुभ दृष्टि से प्रभावित हो, तो व्यक्ति को प्रेम जीवन में असफलताओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोग कई बार चाहकर भी रिश्तों को आगे नहीं बढ़ा पाते या अपने सच्चे प्यार को खो बैठते हैं। 2. सप्तम भाव और सप्तमेश की दशा जन्म कुंडली में सप्तम भाव विवाह और जीवनसाथी से जुड़ा प्रमुख भाव होता है। यदि यह भाव या इसका स्वामी यानी सप्तमेश नीच स्थिति में हो, या शनि, राहु जैसे अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो, तो विवाह में बाधाएं आती हैं। लव मैरिज (Love Marriage) के मामलों में इसका प्रभाव और भी गहरा होता है, क्योंकि ऐसे मामलों में निर्णय व्यक्ति स्वयं लेता है। ऐसे में यदि ग्रह सहयोग न दें, तो प्रेम विवाह में देर, अड़चनें या असफलता देखने को मिलती है। 3. पंचम भाव और पंचमेश की भूमिका जन्म कुंडली का पंचम भाव प्रेम संबंधों, आकर्षण और रोमांटिक जीवन से जुड़ा होता है। यदि इस भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो, जैसे शनि, राहु या केतु, या इसका स्वामी (पंचमेश) कमजोर या पीड़ित हो, तो प्रेम जीवन में स्थिरता नहीं रहती। ऐसे जातकों के रिश्ते टूटने की संभावना अधिक होती है, या परिवार की ओर से प्रेम विवाह (Love Marriage) में अड़चनें आती हैं। कई बार प्रेम की शुरुआत तो होती है, लेकिन वह विवाह तक नहीं पहुंच पाता। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां 4. राहु-केतु का प्रभाव ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है, जो भ्रम, अनिश्चितता और अस्थिरता का संकेत देते हैं। यदि राहु पंचम, सप्तम या एकादश भाव में स्थित हो, तो प्रेम संबंधों की शुरुआत तो होती है, लेकिन उनका अंत अक्सर सुखद नहीं होता। विशेष रूप से जब राहु शुक्र ग्रह को प्रभावित करता है, तो रिश्तों में धोखा, असत्य या रहस्य उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी विवाह तय होते-होते रुक भी जाता है। 5. चंद्रमा की भूमिका: चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। यदि चंद्रमा कमजोर हो या उस पर शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो, तो व्यक्ति की भावनात्मक स्थिरता प्रभावित होती है। ऐसा व्यक्ति अक्सर अपने रिश्तों को लेकर असमंजस में रहता है—कभी स्वीकृति देता है, तो कभी इंकार करता है। यह असमर्थता और भ्रम प्रेम संबंधों को कमजोर कर देती है और उनका भविष्य संकट में डाल देती है। Latest News in Hindi Today Hindi news Love Marriage #LoveMarriage #KundliDosha #AstrologyRemedies #PlanetaryDosha #MarriageObstacles #VedicAstrology #LoveProblems

