Devshayani Ekadashi 2025

देवशयनी एकादशी 2025: किस्मत को जगाने वाला पर्व, जानिए कब, कहां और क्यों जलाएं दीपक

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 5 जुलाई 2025 को शाम 6 बजकर 58 मिनट पर होगा, जबकि इसका समापन 6 जुलाई की रात 9 बजकर 14 मिनट पर होगा। चूंकि हिन्दू धर्म में तिथि की गणना सूर्योदय से होती है, इसलिए देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) 6 जुलाई को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखेंगे और भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करेंगे। व्रत का पारण 7 जुलाई की सुबह 5:29 से 8:16 बजे के बीच किया जाएगा। पारण से पूर्व स्नान-ध्यान कर विधिवत पूजन करें और अन्न, वस्त्र या धन का दान करके व्रत का समापन करें। देवशयनी एकादशी: शुभ योग ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन अनेक शुभ योगों का संयोग बन रहा है। इस तिथि पर साध्य योग रात 9 बजकर 27 मिनट तक प्रभावी रहेगा, जिसके बाद शुभ योग आरंभ होगा। इन पावन योगों में लक्ष्मी-नारायण की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त इस दिन त्रिपुष्कर योग और रवि योग का संयोग भी बन रहा है, जो इसे और अधिक फलदायी बनाते हैं। इन योगों में किया गया व्रत और पूजन साधक को विशेष आध्यात्मिक लाभ एवं कार्यों में सफलता प्रदान करता है। घर में दीपक जलाने के 5 प्रमुख स्थान तुलसी के समीप दीपदान तुलसी का पौधा भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को अत्यंत प्रिय है। देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi)की संध्या के समय तुलसी के पास गाय के शुद्ध घी से दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में समृद्धि व धन-संपत्ति का वास होता है। मुख्य द्वार पर दीप जलाना इस दिन घर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह उपाय घर की नकारात्मकता को दूर करता है और वातावरण को शुद्ध करता है, जिससे घर में सुख और शांति बनी रहती है। पूजा स्थल में अखंड दीप भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और मां लक्ष्मी की मूर्तियों या चित्रों के समक्ष अखंड दीपक जलाने का विधान है। यह दीपक पूरी रात जलना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है और परिवार को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पीपल के नीचे दीपदान पीपल के वृक्ष में देवताओं और पितरों का वास माना जाता है। इस पवित्र दिन सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना श्रेयस्कर होता है। इससे पितृदोष शांत होता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। रसोई में दीपक जलाएं  रसोई को देवी अन्नपूर्णा का स्थान माना गया है। इसलिए रसोई में भी दीपक जलाना शुभ होता है। मान्यता है कि इससे घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती और गृह लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। इसे भी पढ़ें:- Govt Warns Online Shoppers: सरकार की यह सलाह नहीं मानने पर अपना सबकुछ गँवा सकते हैं ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले पूजा-विधि  देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) के दिन भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है और इस व्रत की पूजा विधि बेहद सरल है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर में पूजा स्थल को साफ-सुथरा कर लें और वहां भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद देसी घी या गाय के घी का दीपक जलाएं। पूजा में तुलसी पत्र, हरे पुष्प, पंचामृत, फल और मीठी वस्तुएं अर्पित करें।  व्रत के दौरान पुण्य लाभ की दृष्टि से अन्न, वस्त्र, दीपक या अन्य आवश्यक वस्तुएं जरूरतमंदों को दान करें। चूंकि इस दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है, अतः इस अवधि में मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि वर्जित माने जाते हैं। इसलिए संयमित जीवनशैली अपनाना और नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। रात्रि में विशेष पूजा विधान के तहत भगवान विष्णु को पीले वस्त्र और पीली चीजें जैसे चने की दाल या केले अर्पित करें। फिर मंत्रों का जाप करें और आरती करें। पूजा के अंत में यह विशेष मंत्र बोलना चाहिए “सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्, विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम्।” इस मंत्र का भाव यह है कि जब भगवान जगन्नाथ विश्राम करते हैं तो पूरा जगत विश्राम करता है, और जब वे जागते हैं तो सृष्टि भी जागृत हो जाती है। Latest News in Hindi Today Hindi Devshayani Ekadashi #devshayaniekadashi2025 #ekadashirituals #hindufestival #diwalighting #vishnu #auspiciousday #spiritualawakening

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Jyeshtha Purnima

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: जानिए तिथि, व्रत विधि और धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें व्रत, पूजन, दान और स्नान का विशेष महत्व होता है। इस वर्ष, ज्येष्ठ पूर्णिमा 11 जून 2025, बुधवार को मनाई जाएगी।  ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: तिथि और समय इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) का पावन पर्व 11 जून 2025, दिन बुधवार को मनाया जाएगा। पंचांग के मुताबिक, पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 10 जून को सुबह 11:35 बजे होगी और इसका समापन 11 जून को दोपहर 1:13 बजे होगा। ऐसे में व्रत और पूजन कार्य 11 जून को करना श्रेष्ठ रहेगा।  ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व ऐसा माना जाता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन व्रत रखकर चंद्रमा की आराधना करने से चंद्र दोष शांत होता है। जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा अशुभ स्थिति में होता है या चंद्र की दशा चल रही होती है, उनके लिए इस दिन की गई पूजा विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भक्ति करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। इसके अलावा, इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व होता है, जो न केवल पापों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा को भी जाग्रत करता है। पूजन विधि और व्रत के नियम ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन श्रद्धालु सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजा में फूल, धूप, दीप, नैवेद्य और तुलसी पत्र अर्पित कर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) व माता लक्ष्मी (Mata Laxmi)  की आराधना की जाती है। इस दिन परिवार सहित सत्यानारायण कथा का पाठ भी किया जाता है। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर चंद्र दोष शांति की प्रार्थना की जाती है। यह व्रत आत्मशुद्धि और मानसिक शांति का माध्यम माना जाता है। यदि पूर्णिमा तिथि चतुर्दशी से प्रारंभ हो, तो उपवास एक दिन पहले से भी रखा जा सकता है। साथ ही, इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या धन दान करना विशेष पुण्यकारी होता है, जो समाज में सहयोग और करुणा की भावना को भी बढ़ाता है। विशेष भोग  ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और माता लक्ष्मी (Mata Laxmi) को विशेष भोग अर्पित करने की परंपरा है। इस दिन खीर का भोग चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके अलावा फल, मिठाई और पंचामृत भी भगवान को अर्पित किए जा सकते हैं। ध्यान रहे कि भोग में तुलसी के पत्तों का समावेश अवश्य हो, क्योंकि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। कुछ स्थानों पर इस दिन वट सावित्री व्रत भी मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण करती हैं। इस अवसर पर भी विशेष भोग तैयार किए जाते हैं, जिनमें फल और मिठाई का विशेष स्थान होता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां  दान और पुण्य ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन दान का विशेष महत्व होता है। इस दिन जल से भरे घड़े, छाता, वस्त्र, चप्पल, पंखा, शक्कर, अनाज आदि का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। यह दान ब्राह्मणों, जरूरतमंदों और गरीबों को करना चाहिए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Jyeshtha Purnima #JyeshthaPurnima2025 #PurnimaVrat #HinduFestival #VratVidhi #PurnimaKatha #FullMoonRituals #HinduReligion #ReligiousSignificance

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Jyeshtha Purnima 2025

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: जानिए व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

भारतीय पंचांग में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है। हर माह की पूर्णिमा को धार्मिक दृष्टि से शुभ और पुण्यदायी माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा का स्थान और भी विशिष्ट है। यह दिन न केवल व्रत और पूजा के लिए उत्तम माना जाता है, बल्कि कई महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन के लिए भी शुभ होता है। आइए जानते हैं, ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 (Jyeshtha Purnima 2025) में कब मनाई जाएगी, इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और इसका धार्मिक महत्व क्या है। ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025 की तिथि और समय वैदिक पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 10 जून को प्रातः 11:35 बजे होगी और यह 11 जून को दोपहर 1:13 बजे समाप्त होगी। ऐसे में ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) का पावन पर्व 11 जून 2025 को धूमधाम से मनाया जाएगा। ज्येष्ठ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन व्रत रखकर चंद्रदेव का पूजन करने से कुंडली में मौजूद चंद्र दोष का निवारण होता है। यदि जन्म पत्रिका में चंद्रमा कमजोर स्थिति में हो या उसकी दशा का प्रभाव चल रहा हो, तो इस दिन की पूजा से उसके नकारात्मक प्रभावों में भी कमी आती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र और धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima) के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख और समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही, इस दिन गंगा स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा 2025: करें और न करें ये विशेष बातें ज्येष्ठ पूर्णिमा (Jyeshtha Purnima 2025) के दिन घर में अंधेरा नहीं रखना चाहिए, विशेष रूप से संध्या के समय। मान्यता है कि इस शुभ अवसर पर देवी लक्ष्मी घर में आगमन करती हैं, और वे अंधेरे स्थानों में प्रवेश नहीं करतीं।इस दिन काले वस्त्र पहनने से भी बचना चाहिए, क्योंकि काला रंग नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित कर सकता है, जिससे जीवन, कार्य और व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।दान और पूजा के समय भी काले रंग से जुड़े वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे चंद्रमा की शुभ स्थिति प्रभावित हो सकती है और राहु के दुष्प्रभाव बढ़ सकते हैं। इसलिए इस दिन हल्के और शुभ रंगों का प्रयोग करना और शुद्ध भाव से पूजा-अर्चना करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया ज्येष्ठ पूर्णिमा : करें ये शुभ कार्य इस पावन दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें या स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय मन में गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पवित्र नदियों का स्मरण करना अत्यंत शुभ होता है।स्नान के उपरांत घर के मंदिर में दीपक जलाएं और यदि संभव हो तो पूरे दिन व्रत का संकल्प लें।घर के देवालय में सभी देवी-देवताओं का गंगा जल से अभिषेक करें। इस दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। उनके साथ माता लक्ष्मी की भी विधिपूर्वक आराधना करें।भगवान विष्णु को भोग अर्पित करते समय ध्यान रखें कि भोग में तुलसी पत्र अवश्य हो, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु (Lord Vishnu) भोग स्वीकार नहीं करते। केवल सात्विक भोजन का ही भोग लगाना चाहिए।पूजन के पश्चात भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और माता लक्ष्मी की आरती करें और उनका ध्यान तथा नाम-स्मरण अधिक से अधिक करें। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का पूजन भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करें, जिससे चंद्र दोष और अन्य ग्रहदोषों से मुक्ति प्राप्त होती है।इस पुण्य अवसर पर जरूरतमंदों को दान देना अत्यंत शुभ माना गया है। साथ ही यदि आपके आसपास गाय हो, तो उसे भोजन कराना भी अत्यंत पुण्यदायी होता है, जिससे कई प्रकार के दोषों का निवारण होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Jyeshtha Purnima 2025 #JyeshthaPurnima2025 #PurnimaVrat #HinduFestival #FullMoon2025 #PurnimaSignificance #VratDates2025 #SpiritualIndia #HinduRituals #PurnimaCelebration #ReligiousFestival

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Story of Lord Parshuram’s Wrath

परशुराम जयंती 2025: धर्म की रक्षा के लिए उठाया था फरसा, जानिए क्यों किया क्षत्रियों का 21 बार संहार

भगवान परशुराम की जयंती (Parshuram Jayanti) प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2025 में यह तिथि 29 अप्रैल को शाम 5 बजकर 31 मिनट से आरंभ होकर 30 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 12 मिनट तक रहेगी। हालांकि, अधिकांश हिन्दू त्योहार उदयातिथि के आधार पर मनाए जाते हैं, लेकिन चूंकि भगवान परशुराम का जन्म प्रदोष काल में हुआ था, इसलिए इस बार परशुराम जयंती (Parshuram Jayanti) 29 अप्रैल 2025, मंगलवार के दिन मनाई जाएगी। भगवान परशुराम को ‘दिव्य योद्धा’, ‘ब्रह्म क्षत्रिय’ और ‘अखंड तपस्वी’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का क्रोधी रूप माना जाता है, जिन्होंने अन्याय और अधर्म के विरुद्ध खड़े होकर अपने फरसे से क्षत्रियों का 21 बार विनाश किया। लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर परशुराम ने क्षत्रियों को 21 बार क्यों मारा था? इसके पीछे कौन सी कथा है? 21 बार क्षत्रियों का विनाश क्यों? एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान परशुराम (Lord Parshuram) और सहस्त्रार्जुन के बीच एक भीषण युद्ध हुआ। सहस्त्रार्जुन, जो महिष्मती का सम्राट था, अत्यंत अहंकारी हो गया था और धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चुका था। वह वेदों, पुराणों और ब्राह्मणों का अपमान करता था, साथ ही ऋषियों के आश्रमों को भी नष्ट कर रहा था। जब यह अन्याय पराकाष्ठा पर पहुंचा, तब परशुराम अपने फरसे (परशु) को लेकर महिष्मती पहुंचे और सहस्त्रार्जुन से युद्ध किया। इस संग्राम में उन्होंने अपने अद्भुत पराक्रम से सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और उसके धड़ को काट डाला। इस घटना के बाद, परशुराम ने अपने पिता के कहने पर इस वध का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा शुरू की। इसी बीच सहस्त्रार्जुन का पुत्र अपने अन्य क्षत्रिय साथियों के साथ परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा, जहां तपस्या कर रहे ऋषि की हत्या कर दी और आश्रम को भी आग के हवाले कर दिया। जब माता रेणुका ने इस भयावह दृश्य को देखा, तो उन्होंने दुख में डूबे स्वर में अपने पुत्र परशुराम को पुकारा। जब परशुराम लौटे, तो उन्होंने अपनी मां को विलाप करते देखा और पाया कि उनके पिता का सिर धड़ से अलग था, और शरीर पर 21 गंभीर घाव थे। यह दृश्य देखकर परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने उसी क्षण यह प्रतिज्ञा की कि वे हैहय वंश और उसके समर्थक क्षत्रियों का अंत करेंगे। उन्होंने शपथ ली कि वे 21 बार क्षत्रियों का संहार कर इस पाप का प्रतिशोध लेंगे। पुराणों के अनुसार परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा करते हुए 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया। उनका यह अभियान धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए था। परशुराम नाम कैसे पड़ा पुराणों के अनुसार, भगवान परशुराम (Lord Parshuram) का वास्तविक नाम ‘राम’ था। लेकिन जब भगवान शिव ने उन्हें एक दिव्य अस्त्र ‘परशु’ प्रदान किया, तो वे हमेशा उसी अस्त्र को अपने साथ रखने लगे। शिवजी द्वारा दिए गए इस परशु को धारण करने के कारण ही वे ‘परशु-राम’ कहलाए, जिसका अर्थ है – परशु धारण करने वाला राम। यही नाम कालांतर में प्रसिद्ध हुआ और वे ‘परशुराम’ के नाम से विख्यात हो गए। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया क्षत्रियों का संहार और धर्म की स्थापना कहा जाता है कि परशुराम ने प्रत्येक युद्ध में क्षत्रियों को पराजित करने के बाद उनकी भूमि को ब्राह्मणों को दान कर दिया। उन्होंने कुरुक्षेत्र के निकट ‘समंतपंचक’ नामक स्थान पर क्षत्रियों का रक्त बहाया और वहाँ पाँच सरोवर बनाए। इसके बाद उन्होंने तपस्या की और हिंसा का मार्ग त्याग दिया। परशुराम अमर माने जाते हैं और आज भी कई मान्यताओं के अनुसार वे हिमालय में तपस्या कर रहे हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Lord Parshuram #ParshuramJayanti2025 #LordParshuram #HinduFestival #ParshuramHistory #DharmaProtector #VishnuAvatar #ParshuramWrath #KshatriyaAnnihilation #ParshuramLegend #ParshuramStory

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Ganga Saptami 2025

गंगा सप्तमी 2025: गंगा अवतरण का पावन पर्व कब और कैसे मनाएं?

हिंदू धर्म में गंगा नदी को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि एक दिव्य माता और मोक्ष का मार्ग माना गया है। जिस तरह जीवन में माता का स्थान सर्वोपरि होता है, ठीक उसी प्रकार गंगा माता (Maa Ganga) को भी समस्त पापों का नाश करने वाली और जीवन में पवित्रता लाने वाली देवी माना गया है। हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रद्धा और भक्ति के साथ गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व मनाया जाता है। यह दिन मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने की स्मृति में समर्पित होता है। गंगा सप्तमी का महत्व गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे गंगा जयंती भी कहा जाता है। यह दिन मां गंगा (Maa Ganga) के धरती पर आगमन की याद दिलाता है। राजा भगीरथ की कठिन तपस्या के फलस्वरूप मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। उन्होंने अपने पूर्वजों के पापों को धोकर उन्हें मोक्ष प्रदान किया। इस दिन ही मां गंगा (Maa Ganga) का पवित्र जल धरती पर आया, जिससे न केवल धार्मिक शुद्धता मिली, बल्कि यह दिन आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक भी बन गया। गंगा सप्तमी के दिन गंगा नदी में स्नान, पूजा और ध्यान करने का विशेष महत्व है। ऐसा करने से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है। साथ ही, इस दिन किए गए दान से अत्यधिक पुण्य मिलता है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है।इसे भी पढ़ें:-   गंगा सप्तमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त: वैदिक पंचांग के अनुसार, 03 मई 2025 को सुबह 07:51 बजे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि आरंभ होगी और 04 मई 2025 को सुबह 04:18 बजे समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदया तिथि को महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए 03 मई 2025 को ही गंगा सप्तमी (Ganga Saptami) का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन गंगा स्नान के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 10:58 बजे से दोपहर 01:38 बजे तक रहेगा। इसे भी पढ़ें:-  शिवधाम की ओर आध्यात्मिक सफर फिर से शुरू, जानिए तारीखें और पंजीकरण प्रक्रिया गंगा सप्तमी शुभ योग (Ganga Saptami Shubh Yoga) ज्योतिषियों के अनुसार, इस वर्ष गंगा सप्तमी पर त्रिपुष्कर योग का निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही रवि योग और शिववास योग का भी संयोग है। रवि योग में गंगा स्नान करने से सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, जबकि शिववास योग में गंगा स्नान कर महादेव की पूजा करने से सुख, समृद्धि और सौभाग्य में वृद्धि होती है। गंगा सप्तमी पर इन गलतियों से बचें नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Ganga Saptami #GangaSaptami2025 #GangaAvataran #HinduFestival #GangaPuja #SpiritualIndia #VratRituals #HinduTradition #RiverGanga #GangaJayanti #PiousFestival

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Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीया 2025: 30 अप्रैल को दुर्लभ योगों में मनाएं यह पावन पर्व

सर्वार्थ सिद्धि योग और रोहिणी नक्षत्र का संयोग, खरीदारी और मांगलिक कार्यों के लिए अत्यंत शुभ अक्षय तृतीया, जिसे अखा तीज भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पुण्यदायी पर्व माना जाता है। इस दिन किए गए धार्मिक कार्य, दान-पुण्य और खरीदारी का फल अक्षय यानी कभी नष्ट न होने वाला होता है। वर्ष 2025 में अक्षय तृतीया 30 अप्रैल, बुधवार को मनाई जाएगी, जो कई शुभ योगों के संयोग के कारण विशेष महत्व रखती है।​ अक्षय तृतीया 2025: तिथि और महासंयोग इस वर्ष अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) का आयोजन 29 अप्रैल को सायं 05:31 मिनट से शुरू होकर 30 अप्रैल को दोपहर 02:31 मिनट तक रहेगा। इस बार अक्षय तृतीया पर महासंयोग बनेगा। पंचांग के अनुसार, अक्षय तृतीया इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि योग में मनाई जाएगी। ज्योतिष में इसे एक खास योग माना गया है, जिसका सीधा संबंध मां लक्ष्मी से है। इस विशेष योग में पूजा करने से मां लक्ष्मी भक्तों की हर इच्छा पूरी करती हैं। इस दिन स्वर्ण आभूषण की खरीदारी से उनकी अक्षय वृद्धि होती है। साथ ही इस दिन किए गए जप, तप, ज्ञान, स्नान, दान, और होम आदि कार्य भी अक्षय फल प्राप्त करते हैं, जिससे इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।  तीर्थ स्नान और अन्न-जल का दान अक्षय तृतीया ((Akshaya Tritiya) के इस पवित्र दिन पर तीर्थ स्नान का महत्व अत्यधिक है। धार्मिक ग्रंथों में यह कहा गया है कि इस दिन तीर्थ स्नान करने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं और हर तरह के दोष समाप्त हो जाते हैं, इसे दिव्य स्नान के रूप में जाना जाता है। यदि तीर्थ स्थल पर स्नान करने का अवसर न हो तो घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी पुण्यकारी होता है और तीर्थ स्नान के समान फल मिलता है। इसके बाद अन्न और जल का दान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति इस दिन दान का संकल्प लेकर जरूरतमंदों को अन्न और जल का दान करता है, उसे कई यज्ञ और कठिन तपस्या करने जितना पुण्य प्राप्त होता है।  पूजा विधि और दान-पुण्य इसे भी पढ़ें:-  विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व अक्षय तृतीया पर कर सकते हैं ये विशेष कार्यअक्षय तृतीया, (Akshaya Tritiya) जिसे आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत शुभ और पवित्र पर्व है। इस दिन भगवान परशुराम की जयंती भी मनाई जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, सतयुग और त्रेतायुग की शुरुआत भी इसी दिन हुई थी। अक्षय तृतीया के दिन बिना किसी विशेष मुहूर्त के भी शुभ कार्य, जैसे विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यापार की शुरुआत, और सोना-चांदी की खरीदारी आदि किए जा सकते हैं। इस दिन व्रत, उपवास और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है — यानी ऐसा पुण्य जो कभी समाप्त नहीं होता।​ भगवान विष्णु के अवतार अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) को चिरंजीवी तिथि भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था। परशुराम जी को चिरंजीवी माना जाता है, अर्थात वे सदैव जीवित रहेंगे। इसके अतिरिक्त, भगवान विष्णु के नर-नरायण और हयग्रीव अवतार भी इसी तिथि पर प्रकट हुए थे। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Akshaya Tritiya #AkshayaTritiya2025 #AkshayaTritiya #HinduFestival #RareYogas #AuspiciousDay #HinduPuja #GoldBuying #AkshayaTritiyaYog #April30Festival #SpiritualCelebration

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Varuthini Ekadashi

वरूथिनी एकादशी 2025: विष्णु भक्ति से मिलेगा अक्षय पुण्य, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और भोग का महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) कहते हैं। यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक मानी जाती मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और भक्त को सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। वरूथिनी एकादशी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 23 अप्रैल को शाम 4 बजकर 43 मिनट पर होगा और इसका समापन 24 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 32 मिनट पर होगा। चूंकि हिंदू धर्म में उदया तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है, इसलिए वरूथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) का व्रत 24 अप्रैल 2025 को रखा जाएगा। वरूथिनी एकादशी का महत्व वरूथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) का उल्लेख कई पुराणों में मिलता है। ‘वरूथिनी’ का अर्थ होता है – “सुरक्षा देने वाली”। इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को भगवान विष्णु का विशेष संरक्षण प्राप्त होता वरूथिनी एकादशी का व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है और इसका पालन करने से भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति के साथ अनेक पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार, वरूथिनी एकादशी का व्रत सभी प्रकार के पापों का नाश करता है। इस एकादशी का व्रत मोक्ष की ओर अग्रसर करता है और व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और भक्ति भाव से की गई पूजा भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होती है। इससे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख, शांति, यश, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है। इसे भी पढ़ें:-  पहली बार रख रही हैं व्रत? जानें संपूर्ण विधि और जरूरी सावधानियां वरूथिनी एकादशी व्रत विधि वरूथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) के दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें। इसके लिए हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर भगवान विष्णु का ध्यान करें और संकल्प करें। फिर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक करें और शुद्ध जल से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं और सुंदर रूप से शृंगारित करें। भगवान को पीला चंदन और रोली का तिलक लगाएं, पीले पुष्प और तुलसीदल अर्पित करें। धूप और दीप जलाकर पूजा करें। भोग में केसर युक्त खीर, पंचामृत और धनिए की पंजीरी अर्पित करें।“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें और वरूथिनी एकादशी की कथा का पाठ या श्रवण करें। पूजा के अंत में विष्णु जी की आरती करें और अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रार्थना करें। व्रत का पारण अगले दिन नियमपूर्वक करें। भगवान विष्णु को लगाएं ये भोग नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Varuthini Ekadashi #VaruthiniEkadashi2025 #EkadashiVrat #LordVishnu #HinduFestival #EkadashiPuja #SpiritualIndia #EkadashiFasting #VaruthiniVrat #Ekadashi2025 #HinduDevotion

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राम नवमी 2020: भगवान राम के जीवन की अनसुनी कहानियां और प्रेरणादायक संदेश

राम नवमी (Ram Navami) हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो भगवान राम (Lord Ram) के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जाना जाता है, और उनकी पूजा करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। राम नवमी के दिन भगवान राम की पूजा करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस लेख में हम आपको भगवान राम के बारे में कुछ सुनी-अनसुनी कथाएं बता रहे हैं, जो उनके जीवन और उनके संदेशों को और भी गहराई से समझने में मदद करेंगी। भगवान राम का जन्म भगवान राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के यहां हुआ था। उनका जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था, जिसे राम नवमी के रूप में मनाया जाता है। भगवान राम के जन्म के समय अयोध्या में खुशियों का माहौल था, और सभी लोग उनके जन्म का जश्न मना रहे थे। भगवान राम और हनुमान जी की मित्रता भगवान राम और हनुमान जी की मित्रता एक अनोखी मित्रता थी। हनुमान जी भगवान राम के परम भक्त थे, और उन्होंने भगवान राम की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। हनुमान जी ने भगवान राम की खोज में लंका तक का सफर तय किया और माता सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने में मदद की। भगवान राम और लक्ष्मण की भाईचारे की मिसाल भगवान राम और लक्ष्मण की भाईचारे की मिसाल आज भी दी जाती है। लक्ष्मण भगवान राम के छोटे भाई थे, और उन्होंने भगवान राम की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। लक्ष्मण ने भगवान राम के साथ वनवास के दौरान कई कठिनाइयों का सामना किया और उनकी रक्षा की। भगवान राम और सीता माता का प्रेम भगवान राम (Lord Ram) और सीता माता का प्रेम एक आदर्श प्रेम की मिसाल है। सीता माता ने भगवान राम के साथ वनवास के दौरान कई कठिनाइयों का सामना किया और उनके साथ हर परिस्थिति में खड़ी रहीं। सीता माता ने भगवान राम के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम को कभी नहीं छोड़ा। भगवान राम और रावण का युद्ध भगवान राम और रावण का युद्ध एक महाकाव्य युद्ध था, जिसमें भगवान राम ने रावण का वध किया और धर्म की स्थापना की। रावण एक बहुत ही शक्तिशाली राक्षस था, जिसने माता सीता का अपहरण कर लिया था। भगवान राम ने रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया और धर्म की स्थापना की। इसे भी पढ़ें:-  भगवान राम के जन्मोत्सव पर होगा भव्य आयोजन भगवान राम का राज्याभिषेक भगवान राम (Lord Ram) का राज्याभिषेक एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसमें भगवान राम को अयोध्या का राजा बनाया गया। भगवान राम ने अपने राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में धर्म और न्याय की स्थापना की और अपने प्रजा का पालन-पोषण किया। भगवान राम के संदेश भगवान राम के संदेश आज भी हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक हैं। भगवान राम ने धर्म, न्याय, और सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने हमें यह सिखाया कि हमें हर परिस्थिति में धर्म और न्याय का साथ देना चाहिए। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Ram Navami #RamNavami2024 #LordRam #Ramayana #RamNavami #HinduFestival #BhagwanRam #RamKatha #RamBhakti #RamMandir #Spirituality

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