Ganga Dussehra date and significance

गंगा दशहरा 2025: धन, सुख और समृद्धि पाने का शुभ अवसर

हिंदू धर्म में गंगा दशहरा का पर्व अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व मां गंगा के धरती पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। गंगा दशहरा हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन मां गंगा राजा भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं।  गंगा दशहरा 2025: जानिए तिथि और पुण्य स्नान का शुभ समय पंचांग के अनुसार, गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2025 में यह तिथि 04 जून को रात 11 बजकर 54 मिनट से आरंभ होकर 06 जून की रात 02 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन पुण्य स्नान का विशेष महत्व होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 2025 में गंगा दशहरा का मुख्य स्नान 05 जून को होगा। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त का समय 05 जून को सुबह 04:02 से 04:42 बजे तक रहेगा। गंगा दशहरा का धार्मिक महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब राजा सगर के 60,000 पुत्रों की आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए भगीरथ ने कठोर तप किया, तब मां गंगा (Maa Ganga) ने प्रकट होकर धरती पर अवतरण किया। कहा जाता है कि गंगा जल का स्पर्श मात्र ही सभी पापों और कष्टों को दूर कर देता है। गंगा दशहरा पर स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व है। इस दिन मां गंगा (Maa Ganga) का पूजन करने और विशेष उपाय अपनाने से आर्थिक तंगी, दरिद्रता और जीवन की बाधाएं समाप्त होती हैं। गंगा जल से लक्ष्मी पूजन गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन अपने घर में मां लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के समक्ष गंगा जल से स्नान कराएं। फिर उन्हें चांदी का सिक्का, कमल का फूल, और मिश्री अर्पित करें। इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।  तुलसी में गंगाजल चढ़ाएं गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) के दिन तुलसी का पौधा घर में लगाना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस विशेष दिन यदि उत्तर दिशा में तुलसी का पौधा रोपा जाए, तो घर में देवी लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। इससे मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि यह उपाय अपनाने से तिजोरी कभी खाली नहीं होती और घर में सुख-शांति बनी रहती है। गंगा स्नान  यदि लगातार मेहनत करने के बावजूद भी व्यापार में सफलता नहीं मिल रही है, तो गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। स्नान के उपरांत तांबे के लोटे में जल भरकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। धार्मिक मान्यता है कि इस उपाय से न केवल व्यापार में तरक्की होती है, बल्कि घर-परिवार में भी सुख-समृद्धि और खुशियों का आगमन होता है। इसे भी पढ़ें:- महाभारत के युद्ध में गूंजे थे दिव्य अस्त्रों के नाम, जानिए उनकी अद्भुत शक्तियां गंगा दशहरा के दिन का विशेष दान गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) का दिन आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन श्रद्धापूर्वक मंदिर में या जरूरतमंद लोगों को जल से भरे मिट्टी के कलश का दान करें और साथ में दक्षिणा भी अर्पित करें। मान्यता है कि इस उपाय से आर्थिक संकट से मुक्ति मिलती है और घर में धन-संपत्ति बढ़ने के योग बनते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Ganga Dussehra #GangaDussehra2025 #SpiritualFestival #HinduFestivals #GangaMaa #WealthAndHappiness #FestivalOfPurity

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Vat Savitri 2025 date and significance

Vat Savitri Vrat 2025: आस्था और अखंड सौभाग्य का पर्व वट सावित्री व्रत

भारतीय संस्कृति में व्रत-त्योहारों का विशेष स्थान है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को सशक्त करते हैं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को भी मजबूती प्रदान करते हैं। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) हिन्दू धर्म में महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे विवाहित स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सफल वैवाहिक जीवन की कामना के लिए करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि 26 मई 2025 को दोपहर 12:11 बजे आरंभ होकर 27 मई की सुबह 8:31 बजे तक रहेगी। तिथि की गणना के आधार पर इस वर्ष वट सावित्री व्रत सोमवार, 26 मई 2025 को रखा जाएगा। यह व्रत पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में भी मिलता है। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) का मुख्य आधार वह पौराणिक कथा है, जिसमें सावित्री ने अपने अद्भुत धैर्य और भक्ति से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लिए थे। यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस पावन व्रत को विवाहित महिलाएं (Married women) श्रद्धा पूर्वक करती हैं और बरगद (वट) वृक्ष की पूजा करती हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन (Married Life) में सुख-शांति बनी रहती है और पति-पत्नी के संबंधों में मधुरता तथा मजबूती आती है। वटवृक्ष को त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – का स्वरूप माना गया है।  व्रत की विधि: वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) की पूजा प्रातःकाल से ही प्रारंभ होती है। व्रति महिलाएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं और निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके पश्चात पूजा की थाली में रोली, चावल, मौली, फल, फूल, धूप, दीपक, नई चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी आदि सामग्री रखी जाती है। इसके बाद महिलाएं वटवृक्ष (बरगद के पेड़) के पास जाकर विधिवत पूजा करती हैं। इसके साथ ही महिलाएं वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Story) का श्रवण करती हैं या स्वयं पढ़ती हैं। पूजा के बाद महिलाएं अपने पति का आशीर्वाद लेती हैं और शाम को जल या फलाहार ग्रहण करती हैं। इसे भी पढ़ें:- क्यों देवी यमुना कहलाती हैं ‘कालिंदी’? जानिए भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी इस दिव्य कथा व्रत कथा: प्राचीन समय में अश्वपति नामक राजा की पुत्री सावित्री का विवाह वनवासी सत्यवान से हुआ था, जो धर्मात्मा किंतु निर्धन थे। विवाह के पश्चात सावित्री को ज्ञात हुआ कि सत्यवान अल्पायु हैं और एक वर्ष बाद उनका देहांत हो जाएगा। इस बात को जानकर भी उसने अपने धर्म का पालन किया और अंतिम समय में जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तो सावित्री ने अपने विवेक और तपस्या से यमराज को प्रसन्न कर लिया। सावित्री की दृढ़ निष्ठा, धर्मपरायणता और समर्पण से प्रभावित होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और उसे दीर्घायु का आशीर्वाद दिया। तभी से यह व्रत स्त्रियों द्वारा श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Vat Savitri Vrat #VatSavitriVrat2025 #VatSavitriPuja #HinduFestivals #MarriedWomenFast #IndianTraditions #SavitriSatyavan #VatPurnima2025 #PujaVidhi #SpiritualIndia

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Mohini Ekadashi 2025

मोहिनी एकादशी 2025: व्रत में भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन, नहीं मिलेगी पुण्य की प्राप्ति

मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है, जो इस वर्ष गुरुवार 8 मई 2025 को पड़ रही है। यह व्रत भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की स्मृति में रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन उपवास करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है। मोहिनी एकादशी व्रत 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्तवैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि, जिसे मोहिनी एकादशी कहा जाता है, इस वर्ष 8 मई को मनाई जाएगी। यह तिथि 7 मई को सुबह 10:19 बजे शुरू होगी और 8 मई को दोपहर 12:29 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि को मान्यता मिलने के कारण मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) का व्रत 8 मई को रखा जाएगा। व्रत के दौरान क्या खाएं मोहिनी एकादशी का उपवास रखने वाले श्रद्धालु व्रत के दौरान दूध, दही, फल, शरबत, साबुदाना, बादाम, नारियल, शकरकंदी, आलू, हरी मिर्च, सेंधा नमक और राजगिरा के आटे से बने व्यंजनों का सेवन कर सकते हैं। ध्यान रखें कि भोजन या फलाहार भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के बाद ही करें। साथ ही, प्रसाद तैयार करते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। व्रत के दौरान इन चीजों से करें परहेज मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi)के दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, शराब, प्याज, लहसुन, अधिक मसाले और तेल का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस व्रत में चावल और सामान्य नमक का उपयोग भी वर्जित माना गया है। यदि आप इस व्रत का पालन कर रहे हैं, तो इन सभी नियमों का विशेष रूप से ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।  पूजा विधि मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) के दिन प्रातःकाल स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। ध्यान रखें कि इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित है, इसलिए पूर्व में तोड़े गए पत्तों का ही उपयोग करें। मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को भोग अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करें—“त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।।” इस मंत्र का जाप करते हुए श्रद्धा से भोग अर्पित करने पर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर भोग स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। इसे भी पढ़ें:-  क्यों चढ़ाया जाता है हनुमान जी को सिंदूर? जानिए त्रेता युग से जुड़ी यह अद्भुत कथा व्रत का पारण मोहिनी एकादशी व्रत का पारण 9 मई 2025 को सुबह 5:34 से 8:16 बजे के बीच किया जाएगा। इस दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत खोलना चाहिए। व्रत के नियमों का विधिपूर्वक पालन करने से भक्तों को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi News Mohini Ekadashi #MohiniEkadashi2025 #EkadashiFasting #HinduFestivals #VratRules #FastingDosAndDonts #SpiritualIndia #EkadashiTips #VratFoodGuide #MohiniVrat #HinduRituals

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Gangaur Vrat 2025 Date, Significance & Puja Vidhi

गणगौर व्रत 2025: जानें तारीख, महत्व और पूजा विधि

गणगौर व्रत हिंदू धर्म में महिलाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र व्रत माना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए किया जाता है। गणगौर व्रत विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इसे करने से उन्हें अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। आइए जानते हैं कि गणगौर व्रत 2025 में कब है, इसका क्या महत्व है और इसकी पूजा विधि क्या है। गणगौर व्रत 2025 की तारीख गणगौर व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में गणगौर व्रत 31 मार्च 2025, मंगलवार को पड़ रहा है। इस दिन महिलाएं गणगौर माता की विधि-विधान से पूजा करती हैं और व्रत का पारण करती हैं। गणगौर व्रत का महत्व गणगौर व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस व्रत को करने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा, कुंवारी कन्याएं भी यह व्रत करती हैं ताकि उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो सके। गणगौर व्रत का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह व्रत माता पार्वती के अपने मायके आगमन की कथा से जुड़ा हुआ है।  गणगौर व्रत की पूजा विधि गणगौर व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल और पवित्र मानी जाती है। यह व्रत 16 दिनों तक चलता है और इस दौरान महिलाएं विधि-विधान से गणगौर माता की पूजा करती हैं। आइए जानते हैं कि गणगौर व्रत की पूजा कैसे की जाती है: इसे भी पढ़ें:- भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ गणगौर उत्सव क्यों मनाया जाता है? गणगौर पूजा महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखती है। यह देवी गौरी या माता पार्वती के प्रति सम्मान प्रकट करने और विवाह व प्रेम के आनंद को मनाने का पर्व है। खासतौर पर राजस्थान में, इसे वैवाहिक प्रेम और संपूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इस उत्सव में विवाहित और अविवाहित महिलाएं उत्साहपूर्वक भाग लेती हैं। वे शिव और पार्वती की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाती हैं और श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करती हैं। महिलाएं वैवाहिक सुख और समृद्धि की कामना करते हुए उपवास रखती हैं। गणगौर के दिन पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news गणगौर व्रत #GangaurVrat2025 #GangaurPuja #GangaurFestival #GangaurDate #HinduFestivals #GangaurSignificance #GangaurPooja #IndianTradition #FastingRituals #GangaurCelebration

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Gangaur Vrat 2025 Date, Puja Vidhi & Significance

गणगौर व्रत 2025: मार्च में कब है यह शुभ त्योहार? जानें पूजा विधि और महत्व

गणगौर व्रत हिंदू धर्म में महिलाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है, जो माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है। साल 2025 में गणगौर व्रत (Gangaur Vrat) मार्च महीने में मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि गणगौर व्रत 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि क्या है। गणगौर व्रत 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 31 मार्च को सुबह 9:11 बजे आरंभ होगी और 1 अप्रैल को सुबह 5:42 बजे समाप्त होगी। इस दौरान, गणगौर व्रत 31 मार्च को रखा जाएगा। गणगौर व्रत का महत्व गणगौर व्रत (Gangaur Vrat) का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है। इसके अलावा, कुंवारी लड़कियां भी इस व्रत को करती हैं ताकि उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो। गणगौर व्रत (Gangaur Vrat) माता पार्वती (Mata Parvati) और भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है। यह व्रत माता पार्वती के भगवान शिव (Lord Shiva) से विवाह की कथा को दर्शाता है और उनकी भक्ति और समर्पण को प्रदर्शित करता है। गणगौर व्रत की पूजा विधि गणगौर व्रत क्यों मनाया जाता है? गणगौर उत्सव महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह देवी गौरी या पार्वती (Devi Parvati) के प्रति सम्मान प्रकट करने और विवाह व प्रेम का उत्सव मनाने का प्रतीक है। खासतौर पर राजस्थान में, देवी पार्वती को वैवाहिक प्रेम और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व में विवाहित और अविवाहित महिलाएं श्रद्धा और उत्साह के साथ भाग लेती हैं। वे शिव और पार्वती की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाती हैं और विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं। वैवाहिक सुख की कामना के लिए महिलाएं पूरे दिन उपवास रखती हैं। इस दिन पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। मां पार्वती के मंत्र नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Gangaur Vrat #GangaurVrat2025 #GangaurFestival #GangaurPuja #HinduFestivals #GangaurMata #GangaurSignificance #IndianTraditions #VratFestival #MarchFestivals #GangaurPujaVidhi

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Kalashtami 2025 Date, Puja Vidhi & Spiritual Significance

कालाष्टमी 2025: 22 या 23 मार्च, कब है यह शुभ तिथि? जानें पूजा विधि और महत्व

हिंदू धर्म में कालाष्टमी (Kalashtami) का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान शिव के रुद्र रूप कालभैरव को समर्पित है और इसे हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में कालाष्टमी 22 और 23 मार्च को पड़ रही है, लेकिन इसकी सही तिथि और शुभ मुहूर्त को लेकर लोगों में उलझन है। आइए जानते हैं कि कालाष्टमी 2025 कब है, इसकी शुभ तिथि और पूजा के नियम क्या हैं। कालाष्टमी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 22 मार्च को सुबह 4:23 बजे आरंभ होगी और 23 मार्च को सुबह 5:23 बजे समाप्त होगी। काल भैरव देव की पूजा निशा काल में की जाती है, इसलिए चैत्र माह की कालाष्टमी 22 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन निशा काल में पूजा का शुभ समय देर रात 12:04 बजे से 12:51 बजे तक रहेगा। शुभ योग ज्योतिषीय दृष्टि से फाल्गुन माह की कालाष्टमी (Kalashtami) पर वरीयान और शिववास योग का संयोग बन रहा है। शिववास योग में काल भैरव की पूजा करने से साधक को दोगुना फल प्राप्त होता है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। इसके अतिरिक्त, इस दिन बालव और कौलव करण का भी विशेष योग बन रहा है। कालाष्टमी का महत्व कालाष्टमी (Kalashtami) का व्रत भगवान शिव (Lord Shiva) के कालभैरव (Kaalbhairav) रूप को समर्पित है। कालभैरव को भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है, जो समय के स्वामी और काल के नियंत्रक हैं। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को समय और मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। कालाष्टमी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी होता है, जो शनि, राहु और केतु जैसे ग्रहों की अशुभ स्थिति से परेशान हैं। इस व्रत को रखने से ग्रहों की अशुभ स्थिति का प्रभाव कम होता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ कालाष्टमी पूजा के नियम नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news  Kalashtami #Kalashtami2025 #KaalBhairav #KalbhairavPuja #HinduFestivals #KalashtamiDate #ShubhMuhurat #PujaVidhi #SpiritualRituals #KalashtamiSignificance #Devotional

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Sheetala Ashtami 2025 Date, Puja Muhurat & Rituals

शीतला अष्टमी 2025: 22 मार्च को मनाई जाएगी, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) का विशेष महत्व है। यह त्योहार देवी शीतला की आराधना के लिए मनाया जाता है। देवी शीतला को स्वास्थ्य और स्वच्छता की देवी माना जाता है। शीतला अष्टमी के दिन देवी की पूजा करने से भक्तों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है और संक्रामक रोगों से सुरक्षा प्राप्त होती है। इस दिन देवी शीतला की पूजा करने से उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है। शीतला अष्टमी का महत्व शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) का त्योहार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन देवी शीतला की पूजा करने से भक्तों के सभी रोग दूर हो जाते हैं और उन्हें स्वास्थ्य लाभ मिलता है। देवी शीतला की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इस दिन बासी भोजन का प्रसाद बनाकर देवी को अर्पित किया जाता है। शीतला अष्टमी 2025 की तिथि और मुहूर्त साल 2025 में शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) 22 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 22 मार्च 2025 को सुबह 4:23 बजे शुरू होगी और 23 मार्च 2025 को सुबह 5:23 बजे समाप्त होगी।  मान्यता है कि इस दिन माता शीतला की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वे चेचक जैसी बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं। शीतला अष्टमी पूजा विधि शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद देवी शीतला की मूर्ति या चित्र को स्थापित करके उनकी पूजा की जाती है। पूजा में देवी शीतला को जल, दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें फूल, धूप, दीप और प्रसाद अर्पित किया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का प्रसाद बनाकर देवी को अर्पित किया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन क्या करें? इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ शीतला अष्टमी के दिन क्या न करें? शीतला अष्टमी पर विशेष आयोजन शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami) के दिन देश के प्रसिद्ध शीतला मंदिरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख मंदिर हैं: Latest News in Hindi Today Hindi news Sheetala Ashtami #SheetalaAshtami2025 #SheetalaAshtami #HinduFestivals #ShubhMuhurat #PujaVidhi #SheetalaMata #VratKatha #Festival2025 #IndianTradition #Spirituality

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Papmochani Ekadashi 2025 date

पापमोचनी एकादशी 2025: पुण्य प्राप्ति और पापों से मुक्ति का पावन अवसर

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और पापमोचनी एकादशी इनमें से एक अत्यंत पवित्र और फलदायी एकादशी मानी जाती है। यह व्रत चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) 25 मार्च को पड़ रही है। इस दिन मां तुलसी की विशेष पूजा करने से पापों से मुक्ति और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं कि पापमोचनी एकादशी पर कैसे करें मां तुलसी की पूजा और इस व्रत का क्या है महत्व। पापमोचनी एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त साल 2025 में पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) 25 मार्च को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 25 मार्च को  सुबह 05:05 बजे से शुरू होकर 26 मार्च को रात 03:45 बजे तक रहेगी। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने का विशेष महत्व है। पापमोचनी एकादशी के दिन सुबह 06:15 बजे से 08:45 बजे तक पूजा करने का शुभ मुहूर्त रहेगा। इस दौरान पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी का महत्व पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह व्रत पापों से मुक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। इस दिन मां तुलसी की पूजा करने से अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi)  के दिन व्रत रखने और मां तुलसी (Maa Tulsi)  की पूजा करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी होता है, जो अपने पापों से मुक्ति चाहते हैं। पापमोचनी एकादशी की पूजा विधि इसे भी पढ़ें:-  भगवान विट्ठल की दिव्य धाम, जहां पीएम मोदी भी हो चुके हैं दर्शनार्थ तुलसी पूजा मंत्र (Tulsi Puja Mantra) 1. वृंदा देवी-अष्टक: गाङ्गेयचाम्पेयतडिद्विनिन्दिरोचिःप्रवाहस्नपितात्मवृन्दे । बन्धूकबन्धुद्युतिदिव्यवासोवृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम् ॥ 2. ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ॥ 3. समस्तवैकुण्ठशिरोमणौ श्रीकृष्णस्य वृन्दावनधन्यधामिन् । दत्ताधिकारे वृषभानुपुत्र्या वृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम् ॥ नोट: यहां दी गई जानकारी धर्म से जुड़े ग्रंथों के अनुसार साझा की गई है। अगर आप कोई विशेष पूजा करवाना चाहते हैं, तो अपने धर्म गुरुओं के बताये अनुसार करें। Latest News in Hindi Today Hindi news Papmochani Ekadashi #PapmochaniEkadashi #EkadashiVrat #HinduFestivals #PapmochaniEkadashi2025 #LordVishnu #Spirituality #FastingBenefits #HinduReligion #PunyaKarma #VratKatha

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